History in Hindi for All Competitive Exams (State Level) Part 9

भारत से  बाहर क्रांतिकारी गतिविधियां

फरवरी, 1905 में लंदन में श्यामजी कृष्ण वर्मा ने भारत के लिए स्वशासन की प्राप्ति के उद्देश्य से इंडियन होमरुल सोसाइटी की स्थापना की। सोसायटी द्वारा इंडिया हाउस की आधारशिला रखने तथा श्री वर्मा द्वारा “द इंडियन सोशियोलॉजिस्ट” नामक पत्र के प्रकाशन के साथ ब्रिटेन में भारतीय राष्ट्रीय क्रांतिकारी आंदोलन की नींव पड़ी। गदर पार्टी की स्थापना जून 1913 में पराधीन भारत को अंग्रेजों से स्वतंत्र कराने के उद्देश्य से की गई थी। इसे अमेरिका एवं कनाडा में बसे भारतीयों द्वारा गठित किया गया था। पार्टी का मुख्यालय सैन फ्रांसिस्को अमेरिका में स्थित था।
वर्ष 1913 में सोहन सिंह भाकना ने ‘हिंदुस्तान एसोसिएशन ऑफ दि पैसिफिक कोस्ट’ नामक संस्था की स्थापना की। इस संस्था ने गदर नामक एक अखबार निकाला, जिससे इस संस्था का नाम भी गदर पार्टी पड़ गया। लाला हरदयाल इस संस्था के मनीषी पथ-प्रदर्शक थे। गदर पार्टी के सदस्यों में रामचंद्र, बरकतुल्ला, रास बिहारी बोस, राजा महेंद्र प्रताप, अब्दुल रहमान, मैडम भीकाजी कामा, भाई परमानंद, करतार सिंह सराभा तथा पंडित काशीराम प्रमुख थे।
राजा महेंद्र प्रताप ने अपने सहयोगी बरकतुल्ला के साथ प्रथम महायुद्ध के दौरान वर्ष 1915 में काबुल (अफगानिस्तान) में भारत की प्रथम अस्थायी सरकार का गठन किया था। इसमें राजा महेंद्र प्रताप स्वयं राष्ट्रपति तथा बरकतुल्ला प्रधानमंत्री थे। मैडम कामा का जन्म 24 सितंबर 1861 को हुआ था। उनके माता पिता पारसी थे | सोराबजी प्रेमजी पटेल उनके पिता थे। उनका विवाह रुस्तम के.आर. कामा से हुआ, जो वकील और सामाजिक कार्यकर्ता थे।
मैडम कामा ने राष्ट्रीय आंदोलन के महान अग्रणी भारतीय नेता दादा भाई नौरोजी की निजी सचिव के रूप में सेवा की। भीकाजी रुस्तम कामा क्रांतिकारी राष्ट्रवाद की समर्थक थी। उन्होंने यूरोप एवं अमेरिका से क्रांति का संचालन किया। वर्ष 1907 में इन्होंने स्टुटगार्ट (जर्मनी) की अंतरराष्ट्रीय समाजवादी कांग्रेस में भाग लिया जहां इन्होने प्रथम भारतीय राष्ट्रीय झंडे को फहराया जिसकी डिजाइन इन्होंने स्वयं वी. डी. सावरकर एवं श्याम जी कृष्ण वर्मा के साथ मिलकर संयुक्त रूप से तैयार किया था। वह भारतीय क्रांति की मां के रूप में विख्यात है।
इंग्लैंड में अंग्रेज अधिकारियों की हत्या के आरोप में मदनलाल ढींगरा तथा उधम सिंह को फांसी की सजा मिली थी। ध्यातव्य है कि मदनलाल ढींगरा ने 1 जुलाई 1909, को लंदन में भारतीय राष्ट्रीय संघ की बैठक में भारत राज्य सचिव के सलाहकार कर्जन वायली तथा कोवास लोलक्का को गोलियों से भून दिया था। फलतः उन्हें फांसी की सजा दी गई। ऊधम सिंह ने जलियांवाला बाग में हत्या के अप्रत्यक्ष रूप से जिम्मेदार तत्कालीन पंजाब के गवर्नर माइकल ओ डायर की लंदन में मार्च, 1940 में हत्या कर दी थी
कामागाटामारू हांगकांग से कनाडा की यात्रा पर निकला एक जलपोत था जिसे प्रथम विश्व युद्ध के दौरान भारत के गुरदीप सिंह ने किराए पर लेकर उस पर 376 यात्रियों को बिठाकर कनाडा के बंदरगाह बैंकूवर की ओर प्रस्थान किया था। तट पर पहुंचने के बाद कनाडाई पुलिस ने भारतीय यात्रियों की घेराबंदी कर उन्हें देश में प्रवेश करने से रोक दिया। यात्रियों के अधिकार की लड़ाई लड़ने हेतु हुसैन रहीम, बलवंत सिंह तथा सोहनलाल पाठक की अगुवाई में शोर कमेटी  (तटीय समिति) का गठन हुआ।
अमेरिका में रह रहे भारतीयों भगवान सिंह, बरकतुल्ला, रामचंद्र और सोहन सिंह ने भी यात्रियों के समर्थन में आंदोलन चलाया। कामागाटामारू जहाज के बजबज (कोलकाता) पहुंचने पर क्रुध्द यात्रियों और पुलिस में संघर्ष हुआ, जिसमें लगभग 18 यात्री मारे गए तथा 202 यात्रियों को जेल में डाल दिया गया। रासबिहारी बोस जापान में रह रहे भारतीय अप्रवासी थे। 28 से 30 मार्च 1942 के दौरान राजनीतिक समस्याओं पर विचार-विमर्श हेतु इन्होंने टोकियो में भारतीयों का एक सम्मेलन आयोजित किया।
14 जून से 23 जून 1942 के बैंकांक सम्मेलन में इसको विधिवत रूप प्रदान किया गया एवं सुभाष चंद्र बोस को निमंत्रित किया गया | इसी सम्मेलन में रास बिहारी बोस ने इंडियन इंडिपेंडेंस लीग की स्थापना की |
मैडम भीकाजी कामा, एम. बरकतुल्ला, वी.वी.एस. अय्यर और एम.एन. राय क्रांतिकारी थे और विदेशों में भारत की स्वतंत्रता का बिगुल बजा रहे थे।
बंगाल विभाजन (1905) तथा स्वदेशी आंदोलन

ब्रिटिश सरकार ने 20 जुलाई, 1950 को बंगाल विभाजन के निर्णय की घोषणा कर दी। 7 अगस्त 1905 को कलकत्ता के टाउन हॉल में एक ऐतिहासिक बैठक में स्वदेशी आंदोलन की विधिवत घोषणा कर दी गई। इसमें ऐतिहासिक बहिष्कार प्रस्ताव पारित हुआ। इसी के बाद से बंगाल के विभिन्न क्षेत्रों में बंग-भंग विरोधी आंदोलन औपचारिक रूप से एकजुट होकर प्रारंभ हो गया।
16 अक्टूबर , 1905 को बंगाल विभाजन प्रभावी हो गया। इसी दिन पूरे बंगाल में शोक दिवस के रूप में मनाया गया। रवींद्र नाथ टैगोर के सुझाव पर संपूर्ण बंगाल में इस दिन को राखी दिवस के रूप में मनाया गया। विभाजन के बाद बंगाल, पूर्वी और पश्चिमी बंगाल में बंट गया।
पूर्वी बंगाल और असम को मिलाकर एक नया प्रांत बनाया गया जिसमें- राजशाही, चटगांव, ढाका आदि सम्मिलित थे। इस प्रांत का मुख्यालय ढाका में था। विभाजन के दूसरे भाग में पश्चिमी बंगाल, उड़ीसा और बिहार शामिल थे। बंगाल का विभाजन लॉर्ड कर्जन (1899-1905 ई.) के काल में 1905 में किया गया था |
सर एंडूज हेंडरसन लीथ फ्रेजर भारतीय सिविल सेवा के अधिकारी थे। इन्होंने वर्ष 1903 से 1908 तक बंगाल के लेफ्टिनेंट गवर्नर के रूप में अपनी सेवाएं दी थी। बंगाल विभाजन (1905 ईस्वी) की योजना में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही थी। रविंद्रनाथ टैगोर स्वदेशी आंदोलन के आलोचक थे तथा पूर्व एवं पाश्चात्य सभ्यता के मध्य एक बेहतर समन्वय संबंध के समर्थक थे। उनका मानना था कि पश्चिम ने पूर्व को समझने में गलती की है और यह दोनों के बीच असामंजस्य का मूल कारण है, परंतु इसका यह अर्थ यह व नहीं कि पूर्व भी पश्चिम को समझने में गलती करे।
बंगाल विभाजन के विरोध में बांग्ला पत्रिका संजीवनी के संपादक कृष्ण कुमार मित्र ने अपनी पत्रिका के 13 जुलाई 1905, के अंक में सर्वप्रथम सुझाव दिया था कि लोगों को सारे ब्रिटिश माल का बहिष्कार करना चाहिए, शोक मनाना चाहिए सरकारी अधिकारियों एवं सरकारी संस्थाओं से सभी संपर्क तोड़ लेने चाहिए। उनके इस सुझाव का समर्थन बागेरहाट (जिला-खुलना) की 16 जुलाई, 1905 की जनसभा द्वारा किया गया। ऊपरी तौर पर यद्यपि ब्रिटिश सरकार ने बंगाल विभाजन का उद्देश्य प्रशासनिक सुविधा बताया था परंतु वास्तव में यह मुख्यतः बंगाली राष्ट्रवाद की वृध्दि को दुर्बल करने के लिए किया गया था। तत्कालीन वायसराय लॉर्ड कर्जन के अनुसार अंग्रेजी हुकूमत का यह प्रयास कलकत्ता को सिंहासनाच्युत करना तथा बंगाली आबादी का बंटवारा करना था, एक ऐसे केंद्र को समाप्त करना था, जहां से बंगाल एवं पूरे देश में कांग्रेस पार्टी का संचालन होता था और साजिशें रची जाती थी।
·       स्वदेशी आंदोलन के प्रारंभ का तत्कालिक कारण बंगाल विभाजन था। इस अवधारणा की मुख्य प्रस्तुतकर्ता अरविंद घोष, लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक, बिपिन चंद्र पाल तथा लाला लाजपत राय थे। यह लोग स्वदेशी आंदोलन को पूरे देश में लागू करना चाहते थे किंतु उदारवादी गुट इसके विरुद्ध था। बंगाल से प्रारंभ हुए स्वदेशी आंदोलन का लोकमान्य तिलक ने सारे देश विशेषकर मुंबई और पुणे में अजीत सिंह और लाला लाजपत राय ने पंजाब एवं उत्तर प्रदेश में सैयद हैदर रजा ने दिल्ली में चिदंबरम पिल्लै ने मद्रास प्रेसीडेंसी में नेतृत्व किया था।
·      स्वदेशी आंदोलन के समय आंदोलन के प्रति  जन समर्थन एकत्र करने के उद्देश्य से अश्विनी कुमार दत्त ने स्वदेश बांधव समिति की स्थापना की। इस आंदोलन की सबसे बड़ी विशेषता थी महिलाओं का इसमें सक्रिय रुप से भाग लेना। किंतु किसान एवं बहुसंख्य मुस्लिम समुदाय स्वदेशी एवं बहिष्कार आंदोलन से अलग रहे।


स्वदेशी आंदोलन के दौरान वंदे मातरम भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का शीर्षक गीत बना। ब्रिटिश पत्रकार एच.डब्ल्यू. नेविंसन स्वदेशी आंदोलन से जुड़े थे। उन्होंने 4 महीने तक भारत में रहकर मानचेस्टर गार्जियन, ग्लास्गो हेराल्ड तथा डेली क्रॉनिकल के लिए रिपोर्टिंग की थी। बाद में इन्होंने इस रिपोर्ट को द न्यू स्प्रिट इन इंडिया नाम से पुस्तक के रूप में संपादित किया था। राष्ट्रीय आंदोलन के बढ़ते प्रभाव के वातावरण में अवनींद्रनाथ टैगोर ने वर्ष 1907 में अपने बड़े भाई गगनेन्द्रनाथ के साथ मिलकर इंडियन सोसाइटी ऑफ ओरिएंटल आर्ट की स्थापना की, जिसके द्वारा प्राच्य कला-मूल्यों का पुनर्जीवन एवं आधुनिक भारतीय कला में नई चेतना जागृत हुई। दिसंबर 1911 में ब्रिटिश सम्राट जॉर्ज पंचम और महारानी मेरी के भारत आगमन पर उनके स्वागत हेतु दिल्ली में एक दरबार का आयोजन किया गया। दिल्ली दरबार में ही 12 दिसंबर, 1911 को सम्राट ने बंगाल विभाजन को रद्द घोषित किया, साथ ही कलकत्ता की जगह दिल्ली को भारत की नई राजधानी बनाए जाने की घोषणा की घोषणा की। घोषणा के अनुरूप बंगाल को एक नए प्रांत के रूप में पुनर्गठित किया गया। उड़ीसा तथा बिहार (1912 में अलग प्रांत का दर्जा) को इससे अलग कर दिया गया। असम को एक नया प्रांत बनाया गया, जैसा कि उसकी स्थिति 1874 में थी तथा सिलहट को इसमें जोड़ दिया गया |


बंगाल के विभाजन (1905) के विरोध में हुए प्रारंभिक आंदोलन का नेतृत्व सुरेन्द्रनाथ बनर्जी ने किया था।
रबीन्द्रनाथ टैगोर स्वदेशी आंदोलन के आलोचक थे। तथा पूर्व एवं पाश्चात्य सभ्यता के मध्य एक बेहतर समन्वय संबंध के समर्थक थे।
बंगाल में ब्रिटेन की वस्तुओं के बहिष्कार का सुझाव सर्वप्रथम बांग्ला पत्रिका सजीवनी के संपादक कृष्ण कुमार मित्र अपनी पत्रिका के 13 जुलाई, 1905 के अंक मे दिया था।
1793 में लॉर्ड कार्नवालिस ने स्थायी बंदोबस्त प्रणाली लागू की। लॉर्ड वैलेजली (1798-1805) ने भारतीय राज्यों को अंग्रेजी राजनैतिक परिधि में लाने के लिए सहायक संधि प्रणाली का प्रयोग किया। लॉर्ड डलहौजी (1848-56) ने अंग्रेजी साम्राज्य का विस्तार करने हुते हड़प नीति का प्रयोग किया।


कांग्रेसः बनारस, कलकत्ता एवं सूरत अधिवेशन

गोपाल कृष्ण गोखले ने कांग्रेस के बनारस अधिवेशन (1905) की अध्यक्षता की। वर्ष 1905 में ही इन्होंने भारत सेवक समाज (Servants of India Society) की स्थापना की थी। वर्ष 1906 के कलकत्ता कांग्रेस अधिवेशन में अध्यक्ष पद को लेकर पार्टी में विभाजन की नौबत आ गई थी, लेकिन दादाभाई नौरोजी के अध्यक्ष बनने से संभावित विभाजन उस समय टल गया। राष्ट्रीय कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में ही पहली बार दादा भाई ने स्वराज की मांग की।
कांग्रेस ने स्वराज संबंधी प्रस्ताव पर सर्वप्रथम वर्ष 1905 में बनारस अधिवेशन में चर्चा हुई एवं वर्ष 1906 कलकत्ता के अधिवेशन में पूर्णरूप से पारित कर दिया गया। इस प्रस्ताव के साथ स्वदेशी बहिष्कार तथा राष्ट्रीय शिक्षा संबंधी प्रस्ताव भी पारित किए गए। दादाभाई नौरोजी को लोग श्रध्दा से भारत के वयोवृध्द नेता (Grand Old Man of India) के नाम से स्मरण करते हैं। 1892 में वे पहले भारतीय थे, जो उदारवादी दल की ओर से फिंसबरी से  ब्रिटिश संसद के सदस्य चुने गए। वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के 1886, 1893 और 1906 ई. में अध्यक्ष भी रहे। दादाभाई नौरोजी पहले भारतीय थे जो एलफिंस्टन कालेज, बंबई गणित एवं भौतिकी के प्रोफेसर नियुक्त हुए थे। इन्होंने एक गुजराती पत्रिका रस्ट गोफ्तार की शुरुआत 1851 ई. में की थी।
·       सी.वाई चिंतामणि ने दादाभाई नौरोजी के विषय में कहा था कि “भारत के सार्वजनिक जीवन को अनेक बुध्दिमान और निःस्वार्थ नेताओं ने सुशोभित किया है परंतु हमारे युग मे कोई भी दादाभाई नौरोजी जैसा नही था।” दूसरी ओर गोखले ने कहा था – “यदि मनुष्य मे कही देवत्व है तो वह दादभाई मे है।” वर्ष 1907 में सूरत मे आयोजित कांग्रेस के 23वें वार्षिक अधिवेशन मे उदारवादियों और उग्रवादियों मे अध्यक्ष पद को लेकर कांग्रेस का विभाजन हो गया। उग्रपंथी जहां लाला लाजपत राय को अध्यक्ष बनाना चाहते थे, वही उदारवादी रास बिहारी घोष को अध्यक्ष बनाना चाहते थे। अंततः रास बिहारी घोष अध्यक्ष बनने में सफल हुए।


गोपाल कृष्ण गोखले का जन्म 9 मई, 1866 को कोल्हापुर (महाराष्ट्र) के एक ब्राह्मण परिवार में हुआ। 1884 में बी.ए. पास करने के बाद (18 वर्ष में) वह रानाडे द्वारा स्थापित दक्कन शिक्षा सभा में सम्मिलित हो गए। उन्होने 20 वर्ष तक इस सभा की सेवा भिन्न-भिन्न रुपों में की अर्थात् विद्यालय के मुख्य, अध्यापक, फर्ग्यूसन कॉलेज पूना के प्राध्याक के रुप में और फिर प्रिंसिपल के रुप मे। पहली बार 1888 में इलाहाबाद कांग्रेस अधिवेशन के मंच से राजीति में भाग लिया, 1897 में उन्हें और वाचा को भारतीय व्यय के लिए नियुक्त वेल्बी आयोग के सम्मुख साक्ष्य देने को कहा गया। 1902 में वह बंबई में संविधान परिषद के लिए और कालांतर में Imperial Legislative Council के लिए चुने गए।
गोपाल कृष्ण गोखले ने कांग्रेस के बनारस अधिवेशन (1905) की अध्यक्षता की।
बाल गंगाधर तिलक का कथन था कि – स्वराज मेरा जन्मसिध्द अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूंगा। हालांकि स्वराज शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग दयानंद सरस्वती ने किया था।
1906 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में कांग्रेस के मंच से स्वराज की मांग पहली बार करने का श्रेय दादाभाई नौरोजी को है।
दादाभाई नौरोजी 1892 में ब्रिटिश पार्लियामेंट के सदस्य के रुप में उदारवादी पार्टी के टिकट पर चुने गए थे।


मुस्लिम लीग का गठन (1906)

अक्टूबर, 1906 में आगा खां के नेतृत्व में मुस्लिमों के शिमला प्रतिनिधिमंडल ने एक ऐसी केंद्रीय मुस्लिम सभा बनाने का विचार किया जिसका उद्देश्य मुसलमानों के हितों का संरक्षण हो| इसी विचारण अनुरुप ढाका में संपन्न अखिल भारतीय मुस्लिम शैक्षिक सम्मेलन ( all india mohammadan educational conference ) के दौरान दिसंबर, 1906 में इस सम्मेलन के स्वागत समिति के अध्यक्ष तथा राजनीतिक बैठकों के संयोजक ढाका के नवाब सलीमुल्लाह खान ने अखिल भारतीय मुस्लिम लीग के गठन का प्रस्ताव किया।
56 सदस्यीय अस्थायी समिति का चयन किया गया और मोहसिन-उल-मुल्क तथा वकार-उल-मुल्क को संयुक्त रुप से संगठन का सचिव नियुक्त किया गया। लखनऊ में मुस्लिम लीग का मुख्यालय बनाया गया और आगा खां इसके प्रथम अध्यक्ष बनाए गए। इस संगठन के तीन उद्देश्य थे –
ब्रिटिश सरकार के प्रति मुसलमानों में निष्ठा बढ़ाना।
लीग के अन्य उद्देश्यों को बिना, दुष्प्रभावित किए अन्य संप्रदायों के प्रति कटुता की भावना को बढ़ने से रोकना।
मुसलमानों के राजनीतिक अधिकारों की रक्षा और उनका विस्तार करना।
वर्ष 1907 में मुस्लिम लीग का वार्षिक अधिवेशन कराची में तथा वर्ष 1908 में अमृतसर मे हुआ था। इसी अधिवेशन में मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचक मण्डल की गई, जो इन्हें 1909 के मार्ले-मिण्टो सुधारों के द्वारा प्रदान कर दिया गया।  वर्ष 1908 में लंदन मे इसकी एक शाखा सैयद अमीर अली ने स्थापित की थी।
अहरार आंदोलन वर्ष 1906 मे शुरु किया गया। इसके नेताओं में मुहम्मद अली हकीम अजमल खाँ, हसन इमाम नजरुल हक तथा मौलाना जफर अली खाँ सम्मिलित थे। इन नेताओं का मानना था कि मुसलमानों को अब ब्रिटिश सरकार की चाटुकारिता नही करनी चाहिए बल्कि उन्हें राष्ट्रीय आंदोलन मे भाग लेना चाहिए।
1 अक्टूबर, 1906 को आगम खाँ के नेतृत्व मे मुसलमानों का एक शिष्टमंडल तत्कालीन वायसराय लार्ड मिंटो से शिमला मे मिला। शिष्टमंडल ने प्रांतीय, केन्द्रीय एवं स्थानीय निकायों मे निर्वाचन हेतु मुसलमानों के लिए विशिष्ट स्थिति की मांग की।
मुस्लिम लीग की स्थापना 1906 में ढाका में की गई थी। 1907 में इसका वार्षिक अधिवेशन कराची में तथा 1908 में अमृतसर में हुआ था।



लॉर्ड कर्जन की प्रेरणा से ढाका के नवाब सलीमुल्लाह ने बंगाल-विभाजन समर्थक आंदोलन का नेतृत्व किया। इन गतिविधियों की पृष्ठभूमि में 30 दिसंबर, 1906 को ढाका मे एक बैठक का आयोजन किया गया, जिसमें अखिल भारतीय मुस्लिम लीग नामक एक राजनीतिक संगठन की स्थापना करने का निर्णय लिया गया। इस संगठन के तीन उद्देश्य थे –
ब्रिटिश सरकार के प्रति मुसलमानों में निष्ठा बढ़ाना
लीग के अन्य उद्देश्यों को बिना दुष्प्रभावित किए अन्य संप्रदायों के प्रति कटुता की  भावना को बढ़ाने से रोकना
मुसलमानों के राजनीतिक अधिकारों की रक्षा और उनका विस्तार करना।
मुस्लिम लीग का मुख्यालय लखनऊ मे था। अन्य कई स्थानों पर भी इसकी शाखाएँ स्थापित की गई थी। 1908 में लंदन में इसकी एक शाखा सैयद अमीर अली ने स्थापित की थी।
डब्ल्यू. डब्ल्यू. हंटर ने अपनी पुस्तक द इंडियन मुसलमान में लिखा था कि – मुसलमान यदि खुश और संतुष्ट हैं, तो भारत में ब्रिटिश शक्ति का महत्तम बचाव होगा।


मार्ले-मिंटो सुधार

वर्ष 1905 में लार्ड कर्जन के स्थान पर लार्ड मिंटो को भारत का वायसराय नियुक्त किया गया तथा जॉन मार्ले को भारत सचिव। इनके द्वारा किए गए सुधारों को मार्ले–मिंटो सुधारों के नाम से जाना जाता है। ब्रिटिश संसद द्वारा पारित संवैधानिक सुधार जिन्हें औपचारिक रुप से भारतीय परिषद अधिनियम 1909 कहा गया, सामान्यतया मार्ले-मिंटो सुधारो के नाम से प्रसिध्द है।
भारतीय परिषद अधिनियम 1909 (मार्ले-मिंटो सुधार) का सबसे बड़ा दोष सांप्रदायिक प्रतनिधित्व प्रणाली के तहत मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचन मंडल की व्यवस्था करना था। इस व्यवस्था के अंतर्गत परिषदों में मुसलमान सदस्यों का निर्वाचन सामान्य निर्वाचक मंडल द्वारा नही अपितु केवल मुसलमानों के लिए गठित पृथक निर्वाचक मंडल द्वारा किया जाता था।
वस्तुतः इसका आशय यह था कि मुसलमान संप्रदाय को भारतीय राष्ट्र से पूर्णतया पृथक वर्ग के रुप में स्वीकार किया  गया। इस व्यवस्था ने  भारतीय राजनीति में बहुत बड़ी समस्या उत्पन्न कर दी। सदियों से  बनाई राष्ट्रीय एकता को एक ही चोट में समाप्त कर दिया। गांधी ने कहा था –  “मार्ले मिंटो सुधार (1909 के इडियन काउंसिल एक्ट) ने हमारा सर्वनाश कर दिया।”
वर्ष 1909 के मॉर्ले-मिंटो सुधारों का सबसे बुरा पक्ष था, मुसलमानों को पृथक अथवा सांप्रदायिक निर्वाचन पध्दति की सुविधा प्रदान करना। इस सुविधा ने कालांतर में भारत के सार्वजनिक-सांप्रदायिक जीवन को विषाक्त कर दिया और अंततः देश के विभाजन के बीजारोपण का काम किया। इसके विषय में जवाहरलाल नेहरु ने कहा था – इससे उनके चारो ओर एक राजनीतिक प्रतिरोध बन गए जिन्होने उन्हें शेष भारत से अलग कर दिया और इसने शताब्दियों से आरंभ हुए एकता तथा मिलन की ओर किए गए सभी प्रयत्नों को पलट दिया।
ब्रिटिश काल में दिल्ली से पहले भारत की राजधानी कलकत्ता थी। ब्रिटेन के राजा जॉर्ज पंचम के भारत आगमन (12 दिसंबर, 1911) के समय बंगाल विभाजन रद्द कर भारत की राजधानी कलकत्ता से दिल्ली स्थानांतरित करने की घोषणा की गई। लॉर्ड हार्डिंग द्वीतीय के कार्यकाल में यह सफलता से दिल्ली स्थानांतरित हुई। 1 अप्रैल, 1912 को दिल्ली राजधानी बनायी गई।




कांग्रेस का लखनऊ अधिवेशन

दिसंबर, 1916 में इंडियन नेशनल कांग्रेस तथा इंडियन मुस्लिम लीग ने लखनऊ में एक ही समय अपने अधिवेशन आयोजित किए थे। दोनों दलों ने पृथक-पृथक रूप से संवैधानिक सुधारों की संयुक्त योजना के संबंध में प्रस्ताव पारित किए और संयुक्त कार्यक्रम के आधार पर राजनीतिक क्षेत्र में एक-दूसरे के साथ सहयोग करने के संबंध में एक समझौता किया। यह समझौता सामान्यतया लखनऊ समझौता या कांग्रेस-लीग-योजना के नाम से प्रसिद्ध है।
अंबिका चरण मजूमदार ने लखनऊ के इस कांग्रेस अधिवेशन की अध्यक्षता की थी। वर्ष 1916 में कांग्रेस और मुस्लिम लीग में समझौता हो गया ताकि संवैधानिक सुधारों की एक ही योजना अपनाई जा सके। इसके फलस्वरुप जारी 19 स्मरण-पत्र में दोनों दलों के समकालीन राजनैतिक विचारों को साकार रूप दिया गया |
वर्ष 1916 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का लखनऊ अधिवेशन जिसकी अध्यक्षता अंबिका चरण मजूमदार ने की थी, दो दृष्टियों से स्मरणीय था। प्रथम – उग्रवादियों, जिन्हें नौ वर्ष पूर्व (1907) कांग्रेस से निष्कासित किया गया था, का क्राग्रेस में पुनर्प्रवेश हुआ था। द्वितीय – कांग्रेस और मुस्लिम लीग के मध्य समझौता हुआ था।
अतिवादियों एवं उदारवादियों के पुनर्मिलन की प्रक्रिया मे एनी बेसेंट एवं तिलक ने महती भूमिका निभाई, जबकि मुहम्मद अली जिन्ना और तिलक कांग्रेस लीग समझौते की मुख्य शिल्पी थे।
वर्ष 1916 से 1922 तक का काल इंडियन नेशनल कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच मतैक्य का काल था। लखनऊ समझौता केवल एक अस्थायी समझौता था। मुस्लिम लीग ने समझौते के बावजूद पृथक अस्तित्व बनाए रखा तथा वह मुसलमानों के लिए पृथक राजनीतिक अधिकारों की वकालत करती रही। 1922 तक दोनों इस समझौते के अनुरूप मिलकर कार्य करते रहे। किंतु असहयोग आंदोलन के साथ ही यह समझौता भंग हो गया और लीग ने पुनः अपना पुराना रास्ता पकड़ लिया।


लखनऊ समझौते (1916) के तहत कांग्रेस ने मुसलमानों के लिए प्रथम बार पृथक निर्वाचक मंडल की मांग को स्वीकार कर लिया, जो मुस्लिम लीग के लिए एक सकारात्मक उपलब्धि थी, क्योंकि कांग्रेस अब तक इसका विरोध करती आ रही थी। डॉ. रमेश चन्द्र मजूमदार ने लखनऊ समझौते की कटु आलोचना करते हुए कहा है कि – परवर्ती घटनाओं की पृष्ठभूमि में निसंदेह रुप से यह कहा जा सकता है कि 1916 में कांग्रेस द्वारा लखनऊ समझौता करने के निर्णय ने वस्तुतः वह नींव डाली, जिसके ऊपर तीस वर्षों बाद पाकिस्तान का निर्माण किया गया। लखनऊ समझौते ने भावी राजनीति में सांप्रदायिकता के उदय का भी मार्ग प्रशस्त किया।
वर्ष 1916 के लखनऊ के कांग्रेस अधिवेशन में तिलक को पुनः कांग्रेस में शामिल कर लिया गया। अध्यक्ष अंबिका चरण मजूमदार ने कहा – 10 वर्षों के दुखद अलगाव तथा गलतफहमी के कारण बेवजह के विवादों मे भटकने के बाद भारतीय राष्ट्रीय दल के दोनों खेमों (उदारवादियों एवं उग्रवादियों) ने अब यह महसूस किया है कि अलगाव उनकी पराजय है और एकता उनकी जीत। अब भाई-भाई फिर मिल गए हैं। कांग्रेस के लखनऊ अधिवेशन में ही महात्मा गांधी से राजकुमार शुक्ल की मुलाकात हुई थी, जिन्होने उन्हें चंपारण के किसानों की समस्याओं से अवगत कराया।


होमरुल लीग आंदोलन

28 अप्रैल, 1916 को तिलक ने एवं 3 सितंबर, 1916 को एनी बेसेंट ने अपनी-अपनी होमरूल लीग की स्थापना की। बेसेंट ने कॉमनवील और न्यू इंडिया तथा तिलक ने मराठा और केसरी के माध्यम से अपनी-अपनी लीग का प्रचार किया। तिलक द्वारा स्थापित होम रूल लीग के प्रथम अध्यक्ष जोसेफ बैपटिस्टा तथा सचिव एन. सी. केलकर थे। जबकि एनी बेसेंट द्वारा स्थापित लीग के सचिव जॉर्ज अरुंडेल थे। तिलक और एनी बेसेंट ने अपने-अपने कार्यक्षेत्रों का बंटवारा भी कर दिया।
तिलक के लीग के जिम्मे कर्नाटक, महाराष्ट्र (मुंबई को छोड़कर) मध्य प्रांत एवं बरार। देश के शेष हिस्से एनी बेसेंट की लीग के जिम्मे आए। दोनों लोगों ने अपना विलय नहीं किया क्योंकि एनी बेसेंट के शब्दों में “उनके (तिलक) कुछ समर्थक मुझे पसंद नहीं करते और मेरे कुछ समर्थक उन्हें पसंद नापसंद करते थे। लेकिन मेरे और उनके बीच किसी तरह का कोई झगड़ा नहीं था।
होमरूल आंदोलन के दोनों नेताओं तिलक एवं एनी बेसेंट की निगाह में स्वराज का अर्थ करीब एक जैसा ही था – ब्रिटिश साम्राज्य के अंतर्गत स्थानीय, प्रांतीय एवं केंद्रीय स्तर पर उत्तरदायी शासन एवं प्रशासन की अधिकाधिक व्यवस्था की जाए, जैसी गौरो द्वारा शासित डोमिनियम दर्जा प्राप्त अन्य ब्रिटिश उपनिवेशों में थी, यथा-कनाडा एवं ऑस्ट्रेलिया में। होमरूल आंदोलन की व्याख्या 2 जनवरी 1914 को अपने पत्र कॉमनवील में एनी बेसेंट ने की थी, जिसमें ब्रिटिश राष्ट्रमंडल के अंतर्गत स्वशासन के उद्देश्य को ध्यान में रखकर धार्मिक स्वतंत्रता, राष्ट्रीय शिक्षा तथा सामाजिक और राजनीतिक सुधारों को आधारभूत कार्यक्रम बनाया गया था। भारत में यह आंदोलन प्रथम विश्व युद्ध के दौरान काफी लोकप्रिय रहा।
वर्ष 1916 का लखनऊ अधिवेशन होमरूल लीग के सदस्यों के लिए अपनी ताकत दिखाने का अच्छा मौका था। तिलक के समर्थकों ने तो परंपरा ही बना दी, जिस पर कांग्रेस बहुत साल तक टिकी रही। उनके समर्थकों ने लखनऊ पहुंचने के लिए एक ट्रेन आरक्षित की, जिसे कुछ लोगों ने कांग्रेस स्पेशल का नाम दिया तो कुछ ने होमरूल स्पेशल कहा।
बेसेंट की लीग के संगठन मंत्री जॉर्ज अरुंडेल ने लीग के हर सदस्य से कहा था कि वह लखनऊ अधिवेशन में शामिल होने की हर संभव कोशिश करें। थियोसोफिकल सोसाइटी की स्थापना 1875 ई. में अमेरिका में मैडम ब्लावेट्स्की तथा कर्नल अल्कॉट ने की थी। एनी बेसेंट 1889 ईसवी में इसकी सदस्या बनी |


भारत में होमरूल लीग आंदोलन सर्वप्रथम एनी बेसेंट ने प्रारंभ किया था, यद्यपि होमरुल लीग की स्थापना सर्वप्रथम (अप्रैल, 1916) में तिलक ने की थी।
1916 में लखनऊ अधिवेशन में होमरूल लीग के सदस्यों ने अपनी राजनीतिक शक्ति का सफलतापूर्वक प्रदर्शन किया।
होमरुल आंदोलन के दोनों नेताओं तिलक एवं एनी बेसेंट की निगाह में स्वराज का अर्थ करीब एक जैसा ही था – ब्रिटिश साम्राज्य के अंतर्गत स्थानीय, प्रांतीय एवं केन्द्रीय स्तर पर उत्तरदायी शासन एवं प्रशासन का अधिकाधिक व्यवस्था की जाए।


गांधी एवं उनके प्रारंभिक आंदोलन

मोहनदास करमचंद गांधी का जन्म 2 अक्टूबर 1869 को गुजरात के पोरबंदर नामक स्थान पर हुआ। उनकी प्रारंभिक शिक्षा राजकोट में हुई। महात्मा गांधी का अल्प आयु (13 वर्ष) में ही कस्तूरबा गांधी के साथ विवाह हुआ था। उन्होंने द इनर टेम्पुल,  लंदन से बैरिस्टरी का प्रशिक्षण लिया था। करमचंद गांधी पोरबंदर, वंकानेर एवं राजकोट राज्यों के दीवान थे। ये गांधी जी के पिता थे। इनका उपनाम कबा (Kaba) गांधी था।
गांधी जी ने दक्षिण अफ्रीका में 1894 ई में नटाल इंडियन कांग्रेस की स्थापना की और दक्षिण अफ्रीका के लंबे आंदोलन के दौरान कई बार जेल की यात्रा की। अपने सहयोगियों की सहायता से उन्होंने टॉलस्टॉय फॉर्म की स्थापना की और वहीं रहने लगे। दक्षिण अफ्रीका में उन्होंने इंडियन ओपिनियन नामक अखबार निकाला ( यह गुजराती, हिंदी, तमिल और अंग्रेजी में प्रकाशित होता था) महात्मा गांधी ने फीनिक्स (डरबन, दक्षिण अफ्रीका) में वर्ष 1904 में एक आश्रम स्थापित किया। फीनिक्स आश्रम को 27 फरवरी 2000 को दोबारा खोला गया है।
फीनिक्स महात्मा गांधी द्वारा स्थापित प्रथम आश्रम था। इनके विचारों में आदर्शवाद की बजाय व्यावहारिक आदर्शवाद पर अधिक जोर दिया गया है। मार्क्स की तरह गांधीजी भी राज्य को हटाने की इच्छा रखते थे  तथा उन्होने स्वयं को दार्शनिक अराजकतावादी कहे जाने से गुरेज नही किया। सत्य तथा अहिंसा गांधीजी के रामराज्य के युगल सिध्दांत थे।  उन्होने सत्य और अहिंसा को अपने स्वप्नों के नवीन समाज का आधार बनाया था।
गांधी एक सच्चे समाजवादी भी थे। वे व्यक्ति के हित के साथ-साथ समाज के हित का ध्यान रखते थे। वे सामाजिक न्याय के उदात्त सिध्दांतों को क्रियात्मक रुप देना चाहते थे। वे अन्याय और अत्याचार के विरोधी थे। गांधीजी ने लुई फिशर से स्वयं कहा, “मैं सच्चा समाजवादी हूँ। मेरे समाजवाद का अर्थ है सर्वोदय।” गांधीजी के समाजवाद मे मार्क्सवाद की भी झलक मिलती है। गांधीजी श्रम को असाधारण महत्व देते थे। वे इस सिध्दांत को क्रियात्मक रुप देना चाहते थे कि प्रत्येक से इसके  सामर्थ्य के अनुसार काम लिया जाए तथा प्रत्येक को आवश्यकतानुसार पारिश्रमिक दिया जाए।
गांधीजी मार्क्सवादियों की भांति भावी आदर्शों व्यवस्था मे राज्य की सत्ता नही मानते थे। गांधीजी स्वयं कहते थे  कि “मैं उसी समस्या को सुलझाने में लगा हूँ, जो कि वैज्ञानिक समाजवाद के सामने है।” अतः गांधीजी को समाजवादियों में एक व्यक्तिवादी और समाजवादियों में एक मार्क्सवादी कहा जा सकता है।


गांधीजी की सत्याग्रह रणनीति मे हड़ताल को सबसे अंतिम स्थान प्राप्त था, जबकि उपवास को गांधीजी सबसे अधिक प्रभावकारी अस्त्र मानते थे और इसे इन्होने  अग्नि-बाण कहा है। गांधीजी के सत्याग्रह सिध्दांत में सत्याग्रही का उद्देश्य शत्रु को  पराजित करना नही है, बल्कि उसका हृदय-परिवर्तन करके उसे अपने अनुकूल बनाना है। यह कार्य सत्याग्राही अपने ऊपर कष्ट झेलकर करता है। गांधीजी ने परिवार नियोजन हेतु सर्वोत्तम उपाय आत्मनियंत्रण बताया था।
गांधीजी 24 वर्ष की उम्र में 1893 ई. में एक गुजराती व्यापारी दादा अब्दुल्ला का मुकदमा लड़ने के लिए दक्षिण अफ्रीका (डरबन) गए थे। वह अफ्रीका में लगभग 21 वर्ष रहे थे। जनवरी, 1915 में भारत लौटे। जनता ने बड़ी गर्मजोशी से उनका स्वाग किया।
दक्षिण अफ्रीका के उनके संघर्षों और उनकी सफलताओं ने उन्हें भारत में बहुत लोकप्रिय बना दिया था। भारत आने पर उनका संपर्क गोपाल कृष्ण गोखले से हुआ जिन्हें गांधीजी ने अपना राजनीतिक गुरु बनाया। उनके प्रभाव में आकर उन्होने अपने को भारत की सक्रिय राजनीति से जोड़ा।
महात्मा गांधी ने सर्वप्रथम वर्ष 1901 में आयोजित कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में भाग लिया था। इस अधिवेशन में गांधी का दक्षिण अफ्रीका पर प्रस्ताव भी पारित हुआ था। इस अधिवेशन की अध्यक्षता  दिनशा वाचा ने की थी। ध्यातव्य है गांधीजी अपने दक्षिण अफ्रीका प्रवास के बीच में वर्ष 1901 में भारत आए थे और इस दौरान उन्होने बंबई में अपने विधि कार्यालय की भी स्थापना की थी। महात्मा गांधी ने वर्ष 1915 में अहमदाबाद के कोचरब क्षेत्र में सत्याग्रह आश्रम की स्थापना की गई थी।
यह आश्रम विभिन्न आर्थिक गतिविधियों के संचालन की सुविधा की दृष्टि से 17 जून, 1917 को साबरमती नदी के किनारे स्थानांतरित कर दिया गया। महात्मा गांधी राजनीति को सामाजिक उत्थान और जनकल्याण के लिए सक्रियता समझते थे। इसके संबंध में गांधीजी के द्वारा सर्वाधिक महत्वपूर्ण सुझाव राजनीति के क्षेत्र में सत्ता के विकेन्द्रीकरण का दिया गया है। विकेन्द्रीकृत सत्ता से उनका तात्पर्य था ग्राम पंचायतों को अपने गांवो का प्रबंध और प्रशासन करने के लिए सक्रिय करना।
गांधीजी ने राजनीति का जो प्रतिमान प्रस्तुत किया। उसमे नैतिकता, धर्म और मानवता का समावेश था, लेकिन गांधीजी के पूर्ण आदर्श राजनीतिक व्यवस्था के अंतर्गत राज्य अर्थात सत्ता के लिए कोई स्थान नही था। वे राज्यविहीन समाज की स्थापना करना चाहते थे। गांधीजी द्वारा दक्षिण अफ्रीका में किए गए संघर्ष को निष्क्रिय प्रतिरोध नाम दिया गया, परंतु बाद में गांधी ने निष्क्रिय प्रतिरोध के स्थान पर सत्याग्रह शब्द चुना। भारतीय स्वतंत्रता को प्राप्त करने के लिए इसका सर्वाधिक प्रयोग किया गया, हालांकि गांधीजी ने सत्याग्रह और निष्क्रिय प्रतिरोध में अंतर किया है।
निष्क्रिय प्रतिरोध ए राजनीतिक अस्त्र है, जबकि सत्याग्रह एक नैतिक शक्ति है। सत्याग्रह का शाब्दिक अर्थ है —- सत्य को मानकर किसी वस्तु के लिए आग्रह करना अथवा सत्य और अहिंसा से उत्पन्न होने वाला  बल। महात्मा गांधी ने भारत के स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान वर्ष 1917 में चंपारन (बिहार) से सत्याग्रह प्रारंभ किया। यह गांधीजी का भारत में पहला सफल सत्याग्रह था। महात्मा  गांधी ने विदेशी वस्त्रों को नष्ट करने को राष्ट्र के आत्मसम्मान से जोड़ते हुए कहा था कि “विदेशी वस्त्रों की बर्बादी ही उनके साथ सर्वोत्तम व्यवहार है। ब्रिटिश निर्मित उत्पादों का गांधी का बहिष्कार प्रभावी हुआ क्योंकि ब्रिटेन भारत को एक बड़ा निर्मित वस्तुओं का  बाजार समझता था। गांधीजी के विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार के कारण देशी वस्तुओं के उत्पादन तथा बिक्री को काफी प्रोत्साहन मिला।
महात्मा गांधी ने अपने द. अफ्रीका प्रवास के दौरान जॉन रस्किन की पुस्तक Unto This Last पढ़ी थी। गांधीजी ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि इस पुस्तक ने उनके जीवन को परिवर्तित कर दिया। गांधीजी के अनुसार, इस पुस्तक का वह संदेश था – व्यक्ति का कल्याण सबके कल्याण में निहित है (The good of the individual is contained in the good of all)। इसी आधार पर गांधीजी ने सर्वोदय (The wellfare of all) की अवधारणआ का प्रतिपादन किया था।
धर्मनिरपेक्ष लेखकों मे गांधीवादी विचारधारा को थोरो, रस्किन और टॉलस्टाय ने सबसे अधिक प्रभावित किया। गांधीजी ने थोरो से सविनय अवज्ञा और कर बंदी की प्रेरणा पाई। रस्किन से गांधीजी ने शारीरिक परिश्रम का आदर करना सीखा तथा टॉलस्टॉय के प्रसिध्द वाक्य “ईश्वर का राज्य तुम्हारे भीतर है” से गांधीजी काफी प्रभावित हुए और उनके अहिंसक असहयोग का आधार बना।
गांधीजी ने जातिविहीन अछूतों की दशा में सुधार के लिए कठोर संघर्ष किया, गांधीजी कहते थे कि “हरिजन सेवा मेरा जीवन श्वास है, इसलिए इसके बिना मैं एक क्षण भी जिंदा नही रह सकता। 1917 और 1918 के आरंभ में गांधीजी ने तीन संघर्षों – चंपारन आंदोलन (बिहार), अहमदाबाद और खेड़ा (दोनों गुजरात) मे हिस्सा लिया। चांपरन तथा खेड़ा आंदोलन किसानों का आंदोलन था, जबकि अहमदाबाद का आंदोलन औद्योगिक मजदूरों का आंदोलन था।
बिहार में हुआ चंपारन सत्याग्रह (भारत गांधीजी का प्रथम सत्याग्रह) सर्वप्रथम घटना है। 19वीं सदी के आरंभ में गोरे बागान मालिकों ने चंपारन के किसानों से एक अनुबंध के आधार पर यह विनिश्चित करा लिया था कि उन्हें अपनी जमीन के 3/20वें भू-भाग में नील की खेती करना अनिवार्य है, जिसे तिनकठिया पध्दति के नाम से जाना जाता था। गोरे बागान मालिकों ने किसानों की मजबूरी का फायदा उठाकर उन्हें अनुबंध से मुक्त करने के लिए लगान एवं अन्य गैर-कानूनी अब्वाबों (करों) की  दर मनमाने  ढंग से बढ़ा दी। किसानों के इसी उत्पीड़न के विरोध में गांधीजी ने चंपारन सत्याग्रह प्रारंभ किया था। मामले की जांच के लिए सरकार ने एक कमेटी गठित की, जिसमें गांधीजी को भी सदस्य बनाया गया। बागान मालिक अवैध वसूली का 25 प्रतिशत वापस करने पर राजी हो गए।
इस प्रकार गांधीजी द्वारा चलाया गया पहला सत्याग्रह सफल रहा। महात्मा गांधी को चंपारन आने तथा कृषकों की समस्या की जांच करने के लिए पं. राजकुमार शुक्ल ने राजी किया था तथा चंपारन समस्या की जांच मे गांधीजी  के सहयोगियों में आचार्य जे.बी. कृपलानी के साथ डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, महादेव देसाई, सी.एफ. एन्डूज, डा. अनुग्रह नारायण सिंह, राज किशोर प्रसाद, एच.एस. पोलाक इत्यादि शामिल थे। एन.जी. रंगा ने महात्मा गांधी के चंपारन सत्याग्रह का विरोध किया था,  जबकि  रबीन्द्रनाथ टैगोर ने  चंपारन सत्याग्रह के  दौरान ही इन्हें महात्मा की उपाधि दी थी।


चंपारन सत्याग्रह के बाद गांधीजी का अगला प्रयोग वर्ष 1918 में अहमदाबाद की कॉटन मिल मालिकों और मजदूरों मे प्लेग बोनस को लेकर विवाद में हस्तक्षेप करना था। गांधीजी ने मालिकों और मजदूरों को इस सारे मामले को एक ट्रिब्यूनल को सौंप देने पर  राजी कर लिया। लेकिन बाद में मालिकों ने 20 प्रतिशत बोनस देने की घोषणा की और इसे स्वीकार न करने पर मजदूरों को नौकरी से निकालने की धमकी दी। मालिकों के इस व्यवहार को इन्होने गंभीरता से लिया तथा मजदूरों को हड़ताल पर जाने को कहा।
मजदूरों का उत्साह बढ़ाने तथा संघर्ष तेज करने के लिए इन्होने खुद अनशन पर बैठने का फैसला लिय़ा। इनके अनशन का मालिकों पर असर पड़ा और वे सारे मामले को ट्रिब्यूनल को सौपने को राजी हो गए। बाद में ट्रिब्यूनल ने 35 प्रतिशत बोनस  देने का फैसला सुनाया। 1918 मे गुजरात के खेड़ा में किसानों की फसल नष्ट हो जाने के बाद भी सरकार ने लगान में छूट नही दी थी और भू-राजस्व उगाही स्थगित नही  की थी। इसी मुद्दे पर महात्मा गांधी ने खेड़ा के किसानों के पक्ष में सत्याग्रह संघटित किया था। महात्मा गांधी को सर्वप्रथम राष्ट्रपिता सुभाष चन्द्र बोस ने कहा था।
6 जुलाई, 1944 को सुभाष चन्द्र बोस ने आजाद हिंद रेडियो पर बोलते हुए गांधीजी को संबोधित किया – भारत की स्वाधीनता का आखिरी युध्द शुरु हो चुका है। राष्ट्रपिताः भारत की मुक्ति के इस पवित्र युध्द में हम आपका आशीर्वाद और शुभकामनाएं चाहते हैं।
नोआखाली काल में प्यारे लाल महात्मा गांधी के सचिव थे। उनकी बहन डॉ. सुशीला नैयर गांधीजी की व्यक्तिगत चिकित्सक थी। प्यारे लाल ने गांधीजी के दांडी मार्च में भी महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी। जमनालाल बजाज कपड़ा व्यापारी, बैंकर, कांग्रेसी सामाजिक कार्यकर्ता और महात्मा गांधी के निकट सहयोगी थे। जमनालाल बजाज का जन्म 1889 ई. में जयपुर में हुआ था, इन्हें वर्धा में एक धनवान व्यापारी ने गोद लिया था।
वे वर्ष, 1915 मे गांधीजी के संपर्क में आए तथा जीवन भर उनके अनुयायी रहे। 30 वर्ष की अवस्था में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में भाग लिया। भारत के प्रति ब्रिटिश सरकार की नीति के विरोध मे उन्होने राय बहादुर की उपाधि त्याग दी। आप कांग्रेस के कोषाध्यक्ष रहे तथा गांधी सेवा संघ के संस्थापक थे। ग्रामीण उद्योगो तथा हथकरघा वस्त्र के विकास में इनकी गहन रुचि थी। कांग्रेस के नागपुर अधिवेशन में स्वागत समिति के अध्यक्ष के रुप में इन्होने बहुमूल्य कार्य किया। वे 1923 में झंडा सत्याग्रह मे भाग लेने के लिए तथा पुनः 1930 में सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान जेल गए थे।


चार्ल्स एन्डूज (दीनबंधु एन्डूज) सेंट स्टीफेन कॉलेज, दिल्ली में प्राध्यापक थे। भारतीयों से इनका गहरा लगाव था और वे हर तरह से भारतीय बनना चाहते थे। रबीन्द्रनाथ टैगोर, गोपाल कृष्ण गोखले तथा महात्मा गांधी से इनके घनिष्ठ संबंध थे। ये दक्षिण अफ्रीका के फीनिक्स फॉर्म मे गांधीजी के साथ रहे थे। गांधीजी ने ही गरीबों के प्रति इनकी निरंतर चिंता को देखते हुए उन्हें दीनबंधु की उपाधि से सम्मानित किया था।
एन्डूज 1925 और 1927 में ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन के अध्यक्ष भी रहे। गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने के लिए वे गांधीजी के साथ एक सहयोगी के रुप में लंदन गए थे। छत्तीसगढ़ में महात्मा गांधी का प्रथम आगमन 20 दिसंबर, 1920 को रायपुर स्थिति धमतारी मे हुआ था। इसके अतिरिक्त वे नवंबर में भी यहां आए थे।
भारत की स्वाधीनता के समय गांधीजी कांग्रेस के सदस्य नही थे। वर्ष 1934 में गांधीजी ने कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया था तथा वे फिर कांग्रेस के औपचारिक रुप से सदस्य नही बने तथापि राजनीतिक परिदृश्यों पर उनका शक्तिशाली मार्गदर्शी प्रभाव छाया रहा। राजकोट सत्याग्रह (1939) के संबंध में महात्मा गांधी के चार दिनों के अनशन के बाद वायसराय की मध्यस्थता से राजकोट को शासक समझौते पर राजी हुए थे। गांधीजी ने वर्ष 1903 में जोहॉन्सबर्ग में अपनी लॉ फर्म स्थापित की थी जहां वे 1910 तक रहे।
गांधीजी ने अपनी लॉ फर्म में ट्रस्टीशिप के सिध्दांतो को लागू किया था। गांधीजी का विचार था कि प्रत्येक देश की अर्थव्यवस्था, वहां की जलवायु भूमि तथा वहां के निवासियों के स्वभाव को ध्यान मे रखते हुए निश्चित की जानी चाहिए। इनकी अर्थनीति सभी तरह के शोषण का विरोध करती है चाहे वह शोषण देश के भीतर एक वर्ग द्वारा दूसरे वर्ग का हो या बाहर से हो।
गांधीजी इसको दूर करने के लिए ऐसी प्रणाली कायम करना चाहते थे जिसमें व्यक्ति अपने मौलिक प्रयत्न के द्वारा स्वतंत्र वातावरण में श्रम और कार्य कर सके, इसके लिए वे स्वदेशी उद्योगो का पुनरुध्दार करना चाहते थे ताकि लोंगो को पर्याप्त भोजन मिल सके और वे भूख से पीड़ित न हो। इसके लिए गांधीजी ने कुटीर उद्योगों  जैसे- गुड़ बनाना, घास कूटना, तेल पेरना, कागज बनाना, चमड़े का काम आदि पर जोर दिया। इससे गांधीजी का मानना था कि गरीबों और शोषितों का आर्थिक और सामाजिक सुधार करने में मदद मिलेगी।
30 जनवरी, 1948 को नाथूराम गोडसे ने गांधीजी को गोली मार दी। उनकी मृत्यु पर भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरु ने कहा था – “हमारे जीवन से प्रकाश चला गया है। हमारे चतुर्दिक अंधकार ही अंधकार हैं, मैं नही समझ पा रहा हूँ कि आपसे क्या कहूं और कैसे कहूं? राष्ट्रपिता, जिन्हें हम प्यार से बापू कहते थे, हमारे बीच नही रहे..।”


करमचंद गांधी पोरबंदर, राजकोट एवं वंकानेर राज्यों के दीवान थे। ये गांधीजी के पिता थे। इनका उपनाम कबा (Kaba) गांधी था।
महात्मा गांधी के राजनीतिक जीवन की कुछ घटनाएं –
घटना                  वर्ष

चंपारन                 1917

अहमदाबाद मिल हड़ताल    फरवरी-मार्च, 1918

खेड़ा                   22 मार्च, 1918

असहयोग आंदोलन                1920-1922

सविनय अवज्ञा आंदोलन            1930

महात्मा गांधी ने विदेशीं वस्त्रों को नष्ट करने को राष्ट्र के आत्मसम्मान से जोड़ते हुए कहा था कि – विदेशी वस्त्रों की बर्बादी ही उनके साथ सर्वोत्तम व्यवहार है।
ब्रिटिश निर्मित उत्पादों का गांधी का बहिष्कार प्रभावी हुआ क्योंकि ब्रिटेन भारत को एक बड़ा निर्मित वस्तुओं का बाजार समझता था।
महात्मा गांधी ने फीनिक्स (डरबन, दक्षिण अफ्रीका) में 1904 मे एक आश्रम स्थापित किया। फीनिक्स आश्रम को 27 फरवरी, 2000 को दोबारा खोला गया है। फीनिक्स महात्मा गांधी द्वारा स्थापित प्रथम आश्रम था।
गांधी जी अफ्रीका में लगभग 21 वर्ष रहे थे। गांधी जी 24 वर्ष की उम्र में 1893 में एक गुजराती व्यापारी दादा अब्दुल्ला का मुकदमा लड़ने के लिए दक्षिण अफ्रीका (डरबन) गए थे। वे जनवरी, 1915 में भारत लौटे।
महात्मा गांधी ने सर्वप्रथम 1901 में आयोजित कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में भाग लिया था।
गांधी जी ने परिवार नियोजन हेतु सर्वोत्तम उपाय आत्मनियंत्रण बताया था।
गांधीजी ने कहा था कि गरीबी का स्थायित्व हिंसा का क्रूरतम रुप है।
गांधी जी के सत्याग्रह सिध्दांत मे सत्याग्रही का उद्देश्य शत्रु को पराजित करना नही है, बल्कि उसका हृदय-परिवर्तन करके उसे अपने अनुकूल बनाना है।
गांधीजी की सत्याग्रह रणनीति में हड़ताल को सबसे अंतिम स्थान प्राप्त था।
दक्षिण अफ्रीका में गांधी जी ने इंडियन ओपिनियन नामक अखबार निकाला (यह गुजराती, हिन्दी, तमिल और अंग्रेजी मे प्रकाशित होता था) तथा 1904 में डरबन में फीनिक्स फार्म की स्थापना की।
सत्य, तथा अहिंसा गांधीजी के रामराज्य के युगल सिध्दांत थे।
महात्मा गांधी ने भारत में अपना पहला जनभाषण फरवरी, 1916 में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के उद्घाटन समारोह के अवसर पर दिया था।
गांधियन इनोवेशन (गांधी जी का नवाचार) का तात्पर्य है – कम निवेश से अधिक उत्पादन अधिक लोगों के लिए। यह शब्दावली सर्वप्रथम प्रोफेसर प्रह्लाद एवं आर.ए. माशेलकर द्वारा प्रयोग किया गया था।
चंपारन आंदोलन (1917) में गांधीजी का साथ राजेन्द्र प्रसाद, अनुग्रह नारायण सिन्हा, जे.बी. कृपलानी, महादेव देसाई, नरहरि पारेख आदि ने दिया था।
एन.जी. रंगा ने महात्मा गांधी के चंपारन सत्याग्रह का विरोध किया था, जबकि रबीन्द्रनाथ टैगोर ने चंपारन सत्याग्रह के दौरान ही इन्हें महात्मा की उपाधि दी थी।


किसान आंदोलन और किसान सभा

·      अवध में होमरूल लीग आंदोलन के कार्यकर्ता काफी सक्रिय थे | इन्होंने किसानों को संगठित करना शुरू किया | संगठन को नाम दिया गया ‘ किसान सभा ‘ | फरवरी , 1918 में इंद्र नारायण द्विवेदी, गौरी शंकर मिश्र और मदन मोहन मालवीय के प्रयासों से ‘ यूपी किसान सभा ‘ की स्थापना हुई | इस संगठन ने किसानों को बड़े पैमाने पर संगठित किया| किसान सभा ने किसानों को इस हद तक जागरूक बनाया, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि दिसंबर 1918 में दिल्ली में कांग्रेस अधिवेशन में बड़ी संख्या में उत्तर प्रदेश के किसानों ने भाग लिया | वर्ष 1919 के अंतिम दिनों में किसानों का संगठित विद्रोह खुलकर सामने आया|
·      अवध के प्रतापगढ़ जिले में एक जागीर में ‘ नाई-धोबी बंद ‘ सामाजिक बहिष्कार  एवं संगठित कार्रवाई की पहली घटना थी | झिंगुरी सिंह और दुर्गपाल ने इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाई लेकिन जल्दी ही आंदोलन में एक नया चेहरा उभरा – बाबा रामचंद्र जिन्होंने आंदोलन की बागडोर ही नहीं संभाली, अपितु उसे और मजबूत एवं जुझारु बनाया | बाबा रामचंद्र महाराष्ट्र के ब्राह्मण परिवार के थे | वर्ष 1920 के मध्य में वे एक किसान नेता के रूप में उभरे तथा उन्होंने अवध के किसानों को संगठित करना शुरू किया | उनमें संगठन की अद्भुत क्षमता थी |
·      वर्ष 1920 में इनके प्रयासों से प्रतापगढ़ में अवध किसान सभा का गठन हुआ | सहजानंद सरस्वती बिहार प्रांतीय किसान सभा के संस्थापक थे। इनके कृषि सुधार कार्यक्रम का वास्तविक लक्ष्य जमीदारी प्रथा का उन्मूलन तथा कृषकों को मालिकाना अधिकार दिलाना था | किसानों के प्रति इनकी समर्पित सेवाओं के कारण इन्हें ‘ किसान प्राण ‘ कहा जाता था | वर्ष 1936 में लखनऊ में अखिल भारतीय किसान कांग्रेस की स्थापना हुई जिसका नाम बाद में बदलकर ‘ अखिल भारतीय किसान सभा ‘ कर दिया गया, इसका अध्यक्ष भी स्वामी सहजानंद को तथा महासचिव एन जी रंगा को बनाया गया | फैजपुर में कांग्रेस सत्र के साथ अखिल भारतीय किसान कांग्रेस का भी दूसरा सत्र चला जिसकी अध्यक्षता एन. जी. रंगा ने की।


एका आंदोलन ( 1921-22 ) का नेतृत्व पिछड़ी जाति के मदारी पासी ने किया था | इस आंदोलन में , जिसकी गतिविधि के मुख्य केंद्र हरदोई , बाराबंकी , बहराइच तथा सीतापुर थे , किसानों की मुख्य शिकायतें लगान में बढ़ोतरी और उपज के रूप में लगान वसूल करने की प्रथा को लेकर थी | किसानों से 50% से अधिक लगान वसूल किया जा रहा था | इस आंदोलन में सरकार को लगान देना बंद नहीं किया गया, बल्कि आंदोलनकारियों की प्रमुख मांग थी – ‘ बढ़ती महंगाई के कारण लगान का नकद में रूपांतरण किया जाए | ‘ |
वर्ष 1928 में सूरत जिले के बारदोली तालुके में गांधीवादी आंदोलन और सत्याग्रह को पर्याप्त सफलता मिली | यहाँ मेहता बंधु सरीखे गांधी जी के अनुयायियों ने वर्ष 1922 में से ही निरंतर अभियान चला रखा था | वर्ष 1928 में यहां कृषक आंदोलन का नेतृत्व सरदार वल्लभ भाई पटेल जी ने किया था , जो बारदोली सत्याग्रह के नाम से प्रसिद्ध हुआ | इसी आंदोलन में सफलता के कारण पटेल को बारदोली की महिलाओं ने ‘ सरदार ‘ की उपाधि प्रदान की |
सितंबर 1946 में बंगाल की ‘ प्रांतीय किसान सभा ‘ द्वारा तिभागा आंदोलन प्रारंभ किया गया | इस आंदोलन में बर्गादारो ( बटाईदारों ) की मांग थी कि जमींदारों का फसल में हिस्सा आधे भाग से कम करके एक तिहाई किया जाए तथा शेष दो-तिहाई हिस्सा बर्गादारों का हो | इस आंदोलन से उतरी बंगाल के जिले विशेष रूप से प्रभावित हुए | आचार्य विनोबा भावे सर्वोदय सम्मेलन के सिलसिले में 18 अप्रैल 1951 को आंध्र प्रदेश के ‘नलगोंडा ‘ जिले में पहुंचे थे। यह जिला उस समय साम्यवादी गतिविधियों का प्रमुख केंद्र था | इसी जिले के ‘ पोचमपल्ली ‘ गांव में विनोबा जी ठहरे हुए थे |
पोचमपल्ली प्रवास के दौरान गांव के 40 हरिजन परिवारों के लिए भूमि की समस्या का समाधान तलाशते समय इसी गांव के जमींदार रामचंद्र रेड्डी ने 100 एकड़ भूमि देने का प्रस्ताव किया | यह स्वतः स्फूर्ति प्रस्ताव ही भूदान आंदोलन की उत्पत्ति का स्रोत बना | अक्टूबर 1951 से 1957 तक विनोबा जी ने पूरे भारत में 50 मिलियन एकड़ भूमि भूमिहीनों के लिए प्राप्त करने के उद्देश्य से भूदान आंदोलन का नेतृत्व किया।
डॉ. राजेन्द्र प्रसाद बिहार के किसान आंदोलन से जुड़े थे। ये संविधान सभा के अध्यक्ष थे। संविधान लागू होने के बाद ये भारत के प्रथम राष्ट्रपति बने।
वल्लभभाई पटेल के नेतृत्व में बारदोली का सफल किसान आंदोलन संपन्न हुआ। बारदोली सत्याग्रह के समय ही यहां की महिलाओं की ओर से गांधी जी ने वल्लभभाई पटेल को सरदार की उपाधि प्रदान की।
आधुनिक भारत के महान नेता विनोबा भावे गांधी जी के निकट सहयोगियों में से थे। 1940 में प्रारंभ व्यक्तिगत सत्याग्रह के दौरान चुने जाने वाले प्रथम सत्याग्रही थे। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात इन्होने भूदान आंदोलन चलाया  जिसका मुख्य उद्देश्य भूमिहीन किसानों में भूमि का वितरण करना था।


ट्रेड यूनियन एवं साम्यवादी दल

वी. पी. वाडिया के नेतृत्व में वर्ष 1918 में स्थापित मद्रास मजदूर संघ भारत का प्रथम आधुनिक मजदूर संघ संगठन था| इसमें मुख्यत: बकिंघम और कर्नाटक कपड़ा मिलों के मजदूर शामिल थे | इसके शीघ्र बाद बंबई में दो , कलकत्ता में एक (भारतीय नाविक संघ)और मद्रास में 4 मजदूर संघ बने | अहमदाबाद टेक्सटाइल लेबर एसोसिएशन की स्थापना वर्ष 1918 में महात्मा गांधी ने की थी |
भारत में ट्रेड यूनियन कांग्रेस ( अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस ) की स्थापना एन एम जोशी द्वारा 31 अक्टूबर , 1920 को बंबई में की गई | इसकी स्थापना का कारण वर्ष 1919 में अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन की स्थापना था| इसलिए भारतीय श्रमिक संगठनों ने आपस में संगठित होने का फैसला किया | इसके प्रथम अध्यक्ष लाला लाजपत राय थे तथा उपाध्यक्ष जोसेफ बैपटिस्टा एवं महामंत्री दीवान चमन लाल बजाज थे | इस संगठन का प्रथम विभाजन वर्ष 1929 में नागपुर अधिवेशन में हुआ | इस समय जवाहरलाल इसके अध्यक्ष थे | कम्युनिस्ट इंटरनेशनल की स्थापना मार्च 1919 में व्लादिमीर इल्यिच लेनिन और रूसी पार्टी ( बोल्शेविक ) द्वारा की गई | 
एम एन राय लेनिन के निमंत्रण पर मॉस्को गए तथा कम्युनिस्ट इंटरनेशनल के सदस्य बने | कम्युनिस्ट इंटरनेशनल के सदस्य बनने वाले वे पहले भारतीय थे| कम्युनिस्ट आंदोलन की शक्ति एवं बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए कानपुर में एक षड्यंत्र को आधार बनाकर कुछ कम्युनिस्टों पर मुकदमा चला | यह मुकदमा ‘ कानपुर षड्यंत्र ‘ के नाम से प्रसिद्ध है|
ब्रिटिश सरकार ने वर्ष 1924 में एम. एन. रॉय , श्रीपाद अमृत डांगे , मुजफ्फर अहमद , शौकत उस्मानी , गुलाम शौकत हुसैन , राम चरण लाल शर्मा और सिंगार वेलू चेटिटयार पर कानपुर में मुकदमा चलाया | सरकार ने उन पर आरोप लगाया कि यह लोग षड्यंत्र रच रहे हैं जिसका उद्देश्य में भारत में क्रांतिकारी संगठन को स्थापित करना था | ट्रेड यूनियन आंदोलन के क्रांतिकारी चरण का समय 1926-1939 तक माना जाता है | इस दौरान एम.एन. रॉय ,मुजफ्फर अहमद, श्रीपाद  ए. डांगे , , शौकत उस्मानी आदि भारत में ट्रेड यूनियन आंदोलन के प्रमुख नेता थे |
1940 में रेडिकल डेमोक्रेटिक दल की स्थापना एम.एन. रॉय ने की थी | अजीत राय एवं इंद्रसेन ने वर्ष 1941 में भारतीय बोल्शेविक लेनिन दल की स्थापना की थी | सोमेंद्रनाथ टैगोर ने वर्ष 1942 में क्रांतिकारी समाजवादी दल की स्थापना की थी |


वी.पी. वाडिया के नेतृत्व में वर्ष 1918 में स्थापित मद्रास मजदूर संघ भारत का प्रथम आधुनिक मजदूर संघ संगठन था।
अहमदाबाद टेक्सटाइल लेबर एसोसिएशन की स्थापना वर्ष 1918 में महात्मा गांधी ने की थी।
1929-33 के बीच हुए मेरठ षड्यंत्र मामले में 33 श्रमिक नेताओं पर राजद्रोह का मुकदमा चलाया गया। इसकी समस्त संसार में चर्चा हुई और प्रोफेसर आइंस्टीन, एच.जी. वेल्स, हैराल्ड लास्की, रोमारोलां तथा रुजवेल्ट ने इसकी कटु आलोचना की।
ट्रेड यूनियन आंदोलन के क्रांतिकारी चरण का समय वर्ष 1926-1939 माना जाता है। इस दौरान एम.एन. राय, मुजफ्फर अहमद, श्रीपाद ए. डांगे, शौकत अली उस्मानी आदि भारत में ट्रेड यूनियन आंदोलन के प्रमुख नेता थे।
17 अक्टूबर, 1920 को एम.एन. राय ने अवनी मुखर्जी, मो. अली और मो. शफीक के साथ मिलकर ताशकंद में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना की।
रौलेक्ट एक्ट और जलियांवाला बाग हत्याकांड (1919)

भारत में बढ़ रही क्रांतिकारी गतिविधियों को कुचलने के लिए सरकार ने वर्ष 1917 में न्यायाधीश सिडनी रौलेट की अध्यक्षता में एक समिति गठित की, जिसका उद्देश्य आतंकवाद को कुचलने के लिए एक प्रभावी योजना का निर्माण करना था | इसके सुझावों पर मार्च, 1919 में पारित विधेयक रौलेट एक्ट के नाम से जाना गया | रौलेट अधिनियम के द्वारा अंग्रेजी सरकार जिसको चाहे जब तक चाहे , बिना मुकदमा चलाए जेल में बंद रख सकती थी, इसलिए इस कानून को बिना वकील , बिना अपील तथा बिना दलील का कानून कहा गया | लॉर्ड चेम्सफोर्ड (1916-21) के कार्यकाल में 1919 में रौलेट एक्ट पारित हुआ था|
अखिल भारतीय राजनीति में गांधी का पहला साहसिक कदम रौलेट एक्ट के विरुद्ध वर्ष 1919 में प्रारंभ सत्याग्रह था। गांधी जी ने रौलेट सत्याग्रह के लिए तीन राजनीतिक मंच का उपयोग किया था – होमरूल लीग , खिलाफत एवं सत्याग्रह सभा | पंजाब के दो लोकप्रिय नेताओं डॉक्टर सैफुद्दीन किचलू और डॉक्टर सत्यपाल की गिरफ्तारी और ब्रिटिश दमन का विरोध करने के लिए 13 अप्रैल 1919 को बैसाखी के दिन अमृतसर के जलियांवाला बाग में एक सार्वजनिक सभा बुलाई गई थी,  जहां जनरल रेगिनैल्ड एडवर्ड हैरी डायर ने निहत्थी  शांतिपूर्ण भीड़ पर गोलियां चलवाकर लगभग 1000 लोगों की हत्या कराई | 13 अप्रैल 1919 को जलियांवाला बाग नरसंहार की हृदय-विदारक घटना के बाद रविंद्र नाथ टैगोर ने ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रदान की गई ‘ नाइट ‘ की उपाधि लौटा दी |
जलियांवाला बाग हत्याकांड के विरोध में शंकरन नायर ने वायसराय की कार्यकारिणी से इस्तीफा दे दिया था | जलियांवाला बाग हत्याकांड (13 अप्रैल, 1919) की जांच हेतु ब्रिटिश सरकार ने हंटर कमीशन का गठन किया था| इस कमीशन में सी. एच. सीतलवाड , पंडित जगत नारायण एवं सुल्तान अहमद खान भारतीय सदस्य थे। कमीशन ने मार्च 1920 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की जिसमें इस दुर्घटना के लिए सरकार को दोषी नहीं बताया गया | कहा गया कि उपद्रव क्रांति का रूप ग्रहण कर लेते हैं | अतः मार्शल लॉ अनिवार्य था तथा भीड़ की अधिकता को देखते हुए गोली चलाना पूर्णतः न्यायोचित था | साथ ही हंटर कमीशन ने डायर के इस कार्य को केवल निर्णय लेने की भूल बताया |
·      जनरल डायर को उसके अपराध के लिए नौकरी से हटना पड़ा किंतु ब्रितानी अखबारों ने उसे ‘ ब्रिटिश साम्राज्य का रक्षक ‘  और ब्रितानी लॉर्ड सभा ने उसे ‘ ब्रिटिश साम्राज्य का शेर ‘ कहा | सरकार ने उसकी सेवाओं के लिए उसे ‘ मान की तलवार ‘ की उपाधि दी|
·      मार्च 1940 में पंजाब के क्रांतिकारी नेता उधम सिंह ने जलियांवाला बाग के नरसंहार का बदला लेने के लिए इस हत्याकांड के समय पंजाब के गवर्नर रहे सर माइकल ओ डायर की लंदन में हत्या कर दी थी, जिसके लिए उन्हें गिरफ्तार कर मृत्युदंड दे दिया गया | जलियांवाला बाग नरसंहार (13 अप्रैल, 1919) पर कांग्रेस जांच समिति की रिपोर्ट के प्रारूप को लिखने का कार्य महात्मा गांधी को सौंपा गया था | जलियांवाला बाग नरसंहार को मांटेग्यू ने ‘ निवारक हत्या ‘ की संज्ञा दी | दीनबंधु सी. एफ. एंडूज ने इस हत्याकांड को जान-बूझकर की गई क्रूर हत्या कहा था |
लॉर्ड चेम्सफोर्ड वर्ष 1916 से 1921 के मध्य भारत के वायसराय रहे। इन्हीं के कार्यकाल में 1919 में रौलेट एक्ट पारित हुआ था।
रौलेट एक्ट को बिना वकील, बिना अपील, बिना दलील का कानून या काला कानून कहा जाता है। इसके तहत ब्रिटिश सरकार किसी भी व्यक्ति पर बिना किसी कारण बताए गिरफ्तार कर सकती थी। इसके विरोध में स्वामी श्रध्दानंद ने लगान ने देने का आंदोलन चलाने का सुझाव दिया था।
द अनार्किकल एंड रिवोल्यूशनरी क्राइम एक्ट 1919 को सामान्य बोल चाल में रौलेट एक्ट कहा जाता था। यह एक्ट न्यायाधीश सिडनी रौलेट की अध्यक्षता में गठित समिति के सुझावों के आधार पर पारित किया गया।
13 अप्रैल, 1919 को घटित जलियांवाला बाग नरसंहार को मांटेग्यू ने निवारक हत्या की संज्ञा दी। दीनबंधु सी.एफ. एन्डूज ने इस हत्याकांड को जान-बूझकर की गई क्रूर हत्या कहा था।


खिलाफत आंदोलन

खिलाफत आंदोलन प्रारंभ करने के लिए गठित खिलाफत कमेटी में शौकत अली, मोहम्मद अली, अब्दुल कलाम आजाद, हकीम अजमल खान हसरत मोहानी तथा डॉक्टर अंसारी शामिल थे | तथापि खिलाफत आंदोलन प्रारंभ करने का श्रेय मुख्यतः अली बंधुओं शौकत अली और मुहम्मद अली को दिया जाता है | भारत के मुसलमान तुर्की के सुल्तान को इस्लामी साम्राज्य का खलीफा मानते थे |
प्रथम विश्व युद्ध में तुर्की मित्र देशों के विरुद्ध लड़ रहा था | युद्ध के समय ब्रिटिश राजनीतिज्ञों ने भारतीय मुसलमानों को वचन दिया था कि वह तुर्की साम्राज्य को किसी प्रकार समाप्त नहीं होने देंगे, लेकिन युद्ध समाप्त होने के बाद ब्रिटिश सरकार ने तुर्की साम्राज्य का विघटन कर दिया | भारतीय मुसलमान बिटिश साम्राज्य से नफरत करने लगे और उन्होने तुर्की के ऑटोमन साम्राज्य की रक्षा और खलीफा को बनाए रखने के लिए आंदोलन आरंभ किया। तुर्की साम्राज्य के विभाजन के विरुध्द शुरु हुए खिलाफत आंदोलन ने उस समय अधिक जोर पकड़ लिया जब इसमें गांधीजी सम्मिलित हुए |
अंग्रेजों द्वारा तुर्की साम्राज्य का विभाजन करने के विरुद्ध खिलाफत आंदोलन प्रारंभ हुआ | दिल्ली में 23 नवंबर 1919 को होने वाली खिलाफत कमेटी के सम्मेलन की अध्यक्षता महात्मा गांधी को प्रदान की गई | दिसंबर , 1919 में हुए भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अमृतसर अधिवेशन से खिलाफत आंदोलन को और अधिक बढ़ावा मिला |  गांधी जी ने इसे हिंदू मुस्लिम एकता के एक ऐसे स्वर्णिम अवसर के रूप में देखा, जो आगे 100 वर्षों में भी समाप्त नहीं हो सकता|  तद्नुसार उन्होंने अंग्रेजों के विरुद्ध आंदोलन में भारतीय मुसलमानों का सहयोग प्राप्त करने के लिए खिलाफत आंदोलन का समर्थन किया|
हकीम अजमल खां ने खिलाफत आंदोलन के दौरान हाजिक-उल-मुल्क की पदवी त्याग दी थी |यह पदवी ब्रिटिश सरकार द्वारा वर्ष 1908 में उन्हें प्रदान की गई थी | मुहम्मद अली जिन्ना (जब वे राष्ट्रपति थे) खिलाफत आंदोलन को देश की स्वतंत्रता के आंदोलन से जोड़ने के विरोधी थे | उन्होंने गांधी जी को राजनीति में धर्म ना लाने की सलाह दी थी। उन्होंने खिलाफत आंदोलन में गांधीजी की भागीदारी के विरुद्ध गांधी जी को सावधान किया था कि वे मुस्लिम धार्मिक नेताओं और उनके अनुयायियों के कट्टरपन को प्रोत्साहित ना करें |
मौलाना मुहम्मद अली , शौकत अली , अब्दुल कलाम आजाद , हकीम अजमल खां और हसरत मोहानी खिलाफत आंदोलन में गांधी जी के प्रमुख सहयोगी थे | सितंबर 1920 में कलकत्ता में हुए कांग्रेस के अधिवेशन का प्रमुख मुद्दा जलियांवाला बाग कांड और खिलाफत आंदोलन था | खिलाफत आंदोलन में मदन मोहन मालवीय सम्मिलित नही हुए थे तथा उन्होंने इस आंदोलन में कांग्रेस की भागीदारी का विरोध किया था | सितम्बर 1919 में अखिल भारतीय खिलाफत कमेटी का गठन किया गया था |
मुहम्मद अली जिन्ना ने महात्मा गांधी की धार्मिक नेताओं द्वारा प्रारंभ खिलाफत आंदोलन में भागीदारी की भर्त्सना की थी जबकि मौलाना मुहम्मद अली, शौकत अली, अबुल कलाम आजाद, हकीम अजमल खां और हसरत मोहानी खिलाफत आंदोलन में गांधीजी  के प्रमुख सहयोगी थे।
गांधी जी ने खिलाफत आंदोलन को हिंदू-मुस्लिम एकता का एक सुनहरा अवसर माना। अतः इस आंदोलन का परिणाम हिंदू-मुस्लिम एकता के रुप में आमने आया। तुर्की के प्रश्न पर, ब्रिटेन के प्रति आक्रोश ने मुसलमानों को हिंदुओ के समीप ला दिया था।
4 अप्रैल, 1919 को दिल्ली की जामा मस्जिद के प्रवचन से स्वामी श्रध्दानन्द ने हिंदू मुस्लिम एकता पर लगभग 30000 मुस्लिमों के समक्ष भाषण दिया था।
मुहम्मद अली जिन्ना (जब वे राष्ट्रपति थे) खिलाफत आंदोलन को देश की स्वतंत्रता के आंदोलन से जोड़ने के विरोधी थे। उन्होने गांधी जी को राजनीति में धर्म को न लाने की सलाह दी  थी। उन्होने खिलाफत आंदोलन मे गांधीजी की भागीदारी के विरुध्द गांधीजी को सावधान किया  था कि वे मुस्लिम धार्मिक नेताओं एवं उनके अनुयायियों के कट्टरपन को प्रोत्साहित न करें।


असहयोग आंदोलन

सितंबर, 1920 में कलकत्ता में संपन्न भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के विशेष अधिवेशन में महात्मा गांधी ने असहयोग के प्रस्ताव को प्रस्तावित किया था जिसका सी.आर. दास ने विरोध किया था | दिसंबर, 1920 में नागपुर में संपन्न कांग्रेस के वार्षिक अधिवेशन में असहयोग प्रस्ताव पर व्यापक चर्चा हुई तथा इसका अनुसमर्थन किया गया| नागपुर अधिवेशन में असहयोग प्रस्ताव सी आर दास ने हीं प्रस्तावित किया था|
गांधी जी द्वारा असहयोग आंदोलन 1 अगस्त 1920 को प्रारंभ किया गया | पश्चिमी भारत , बंगाल तथा उत्तरी भारत में असहयोग आंदोलन को अभूतपूर्व सफलता मिली | असहयोग आंदोलन के दौरान ही मोतीलाल नेहरू , लाला लाजपत राय, सरदार वल्लभभाई पटेल , जवाहरलाल नेहरू तथा राजेंद्र प्रसाद न्यायालय का बहिष्कार कर आंदोलन में कूद पड़े थे | 5 नवंबर 1920 को ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी के अधिवेशन में गांधी जी ने असहयोग आंदोलन शुरू होने के ‘ 1 वर्ष के भीतर स्वराज ‘ प्राप्त करने का नारा दिया | इसके साथ ही सरकारी उपाधि , स्कूल न्यायालयों तथा विदेशी सामानों का पूर्णतः बहिष्कार की योजना भी थी|
असहयोग आंदोलन की अनेक सफलताएं है , इसी आंदोलन ने पहली बार देश की जनता को इकट्ठा किया | अब भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पर कोई यह आरोप नहीं लगा सकता था कि वह मुट्ठी भर लोगों का प्रतिनिधित्व करती है | इस आंदोलन की सबसे बड़ी विशेषता यह रही  कि उसने जनता को आधुनिक राजनीति से परिचित कराया , उनमें आजादी की भूख जगाई। मालाबार की घटनाओं के बावजूद इस आंदोलन में बड़े पैमाने पर मुसलमानों की भागीदारी और सांप्रदायिक एकता आंदोलन की कोई छोटी उपलब्धि नहीं थी | साथ ही इस आंदोलन से जनता के मन में ब्रिटिश शक्ति का भय हट गया |
जिस समय गांधी जी भारत आए (1915) उस समय प्रथम विश्व युद्ध चल रहा था उन्होंने सरकार के युद्ध प्रयासों में मदद की, जिसके लिए सरकार ने उन्हें ‘ कैसर-ए-हिंद ‘ के  सम्मान से सम्मानित किया , जिसे उन्होंने असहयोग आंदोलन में वापस कर दिया | जमनालाल बजाज ने अपनी ‘ राय बहादुर ‘ की उपाधि वापस कर दी | बाल गंगाधर तिलक ने असहयोग आंदोलन को समर्थन दिया , परंतु इस आंदोलन के प्रथम दिन 1 अगस्त 1920 को उनकी मृत्यु हो जाने के कारण वह इसका परिणाम नहीं देख सके|
चौरी-चौरा कांड की वास्तविक तिथि 5 फरवरी 1922 है | इस तिथि को संयुक्त प्रांत के गोरखपुर जिले में चौरी-चौरा नामक स्थान पर किसानों के एक जुलूस पर गोली चलाई जाने के कारण क्रुद्ध भीड़ ने थाने में आग लगा दी , जिससे 21  सिपाहियों की मौत हो गई | यही घटना इतिहास में चौरी-चौरा कांड के नाम से प्रसिद्ध है | चौरी-चौरा कांड से क्षुब्ध होकर महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन वापस ले लिया | 12 फरवरी 1922 को बारदोली में हुई कांग्रेस की बैठक में आंदोलन को स्थगित करने का निर्णय लिया गया | इस घटना के समय गांधी जी गुजरात के बारदोली में सामूहिक सत्याग्रह द्वारा सविनय अवज्ञा आंदोलन प्रारंभ करने की तैयारी कर रहे थे |
24 फरवरी 1922 को आयोजित अखिल भारतीय कांग्रेस समिति की दिल्ली में बैठक हुई जिसमें ऐसी सभी गतिविधियों पर रोक लगा दी गई जिनसे कानून का उल्लंघन होता है | इसी अधिवेशन में असहयोग आंदोलन वापस लेने के कारण डॉक्टर मुंजे के द्वारा गांधी जी के खिलाफ निंदा प्रस्ताव लाया गया |
रविंद्र नाथ टैगोर आंदोलन एवं विरोध प्रदर्शन के विपरीत रचनात्मक कार्यक्रम को विशेष महत्व प्रदान करते थे जिसके कारण उन्होंने विदेशी वस्त्रों की होली जलाने के विपरीत गांधी जी को  रचनात्मक कार्यक्रम अपनाने की बात अपने पत्र में कहीं | असहयोग आंदोलन के दौरान रविंद्र नाथ टैगोर ने विदेशी वस्त्रों को जलाए जाने को ‘ अविवेकी व निष्ठुर बर्बादी ‘ कहा  था। असहयोग आंदोलन (1920-22) के दौरान काशी विद्यापीठ बनारस 1920 में , गुजरात विद्यापीठ अहमदाबाद 1920  में तथा जामिया मिलिया इस्लामिया अलीगढ़ 1920 में जो बाद  में दिल्ली ले जाया गया, स्थापित हुए |  मदन मोहन मालवीय ने 1916 में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना की थी और 1919 से 1938 तक वे इसके कुलपति बने रहे।


1920 में कलकत्ता में कांग्रेस के विशेष अधिवेशन में पास हुए असहयोग संबंधी प्रस्ताव की, दिसंबर, 1920 में नागपुर में हुए कांग्रेस के वार्षिक अधिवेशन में पुष्टि कर दी गई।
असहयोग आंदोलन के दौरान सी.आर. दास, मोतीलाल नेहरु, राजेन्द्र प्रसाद, जवाहरलाल नेहरु, विठ्ठलभाई पटेल एवं वल्लभभाई पटेल ने अपनी वकालत छोड़ दी थी।
असहयोग आंदोलन महात्मा गांधी के नेतृत्व में वर्ष 1920 से 1922 तक संचालित हुआ। बाल गंगाधर तिलक ने असहयोग को समर्थन दिया, परंतु इस आंदोलन के प्रथम दिन 1 अगस्त, 1920 को उनकी मृत्यु हो जाने के कारण वह इसका परिणाम नही देख सके।
घटना वर्ष
चौरी-चौरा कांड                         5 फरवरी, 1922

बारदोली प्रस्ताव                        12 फरवरी, 1922

असहयोग आंदोलन का स्थगन                     1922 ई.

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का लाहौर अधिवेशन         31 दिसंबर, 1929

भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी            23 मार्च, 1931

असहयोग आंदोलन का आरंभ                 1 अगस्त, 1920

रौलेट सत्याग्रह                         अप्रैल, 1919

बिहार के सारण के सिताब दियारा में जन्में स्वतंत्रता सेनानी जयप्रकाश नारायण ने असहयोग आंदोलन के दौरान पटना कॉलेज छोड़ा, जबकि उनकी परीक्षा के केवल 20 दिन ही बचे थे। इसके पश्चात उन्होने कांग्रेस द्वारा संचालित बिहार विद्यापीठ मे प्रवेश लिया।


स्वराज पार्टी का गठन (1923)

1919 के भारतीय शासन अधिनियम द्वारा स्थापित केंद्रीय तथा प्रांतीय विधानमंडलों का कांग्रेस ने गांधी जी के निर्देशानुसार बहिष्कार किया था और 1920 के चुनावों में भाग नहीं लिया | असहयोग आंदोलन की समाप्ति और गांधीजी के गिरफ्तारी के बाद देश के वातावरण में अजीब निराशा का माहौल बन गया था | ऐसी स्थिति में मोतीलाल नेहरू तथा सी आर दास ने नई विचारधारा को जन्म दिया |
मोतीलाल नेहरू तथा सी.आर. दास ने कांग्रेस को विधानमंडलों के भीतर प्रवेश कर अंदर से लड़ाई लड़ने का विचार प्रस्तुत किया तथा 1923 के चुनावों के माध्यम से विधानमंडल में पहुंचने की योजना बनाई | किंतु 1922 में कांग्रेस के गया अधिवेशन में बहुमत के साथ इस योजना को अस्वीकार कर दिया गया | सीआर दास ने (इस दौरान वे कांग्रेस के अध्यक्ष थे) ने कांग्रेस की अध्यक्षता से त्यागपत्र दे दिया और मार्च 1923 में मोतीलाल नेहरू के साथ मिलकर स्वराज पार्टी की स्थापना की | इस पार्टी का मुख्य उद्देश्य चुनावों के माध्यम से काउंसिलो में प्रवेश कर तथा उन्हें काम न करने देकर 1919 के भारत शासन अधिनियम का उच्छेदन करना था |
सीआर दास स्वराज पार्टी के अध्यक्ष तथा मोतीलाल नेहरू इसके महासचिव थे | श्रीनिवास अयंगर ( मद्रास प्रांत स्वराज पार्टी के संस्थापक ) तथा एन. सी. केलकर स्वराज दल के मुख्य नेता थे | 1925 में विट्ठल भाई पटेल का सेंट्रल लेजिस्लेटिव ( केंद्रीय विधानमंडल ) असेंबली का अध्यक्ष चुना जाना स्वराजियों की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि थी | चितरंजन दास को ‘ देशबंधु ‘ के नाम से जाना जाता था |
देशबंधु का तात्पर्य था – The friend of Nation . चितरंजन दास इंग्लैंड से वकालत की पढ़ाई करने के बाद स्वदेश आकर बैरिस्टर हो गए तथा वकील के रूप में इनकी सबसे बड़ी सफलता अलीपुर बम कांड केस में अरविंद घोष का बचाव करना था | उन्होंने कहा था – ” स्वराज आम जनता के लिए होना चाहिए केवल वर्गो के लिए नहीं ” | 16 दिसंबर 1922 को इंडिपेंडेंट पार्टी बनाने का निर्णय मदन मोहन मालवीय तथा मोतीलाल नेहरू ने लिया था | मदन मोहन मालवीय हिंदू महासभा के संस्थापक सदस्य थे |


असहयोग आंदोलन की असफलता के बाद स्वराज पार्टी (कांग्रेस-खिलाफत स्वराज पार्टी) का गठन का मार्च, 1923 में सी.आर. दास और मोतीलाल नेहरु ने किया। सी.आर. दास इसके अध्यक्ष तथा मोतीलाल नेहरु इसके महासचिव थे। स्वराज पार्टी ने अपने को कांग्रेस के अभिन्न हिस्से के रुप में प्रचारित किया। साथ  ही अहिंसा और असहयोग के प्रति अपनी वचनबध्दता को दोहराया।
सेंट्रल लेजिस्टेलटिव एसेंबली के प्रथम भारतीय अध्यक्ष (स्पीकर) विठ्ठलभाई जे. पटेल थे, जो 1925 में इसके अध्यक्ष बने। ये स्वराज पार्टी के सह-संस्थापक थे।
देशबन्धु चितरंजन दास (सी.आर. दास) ने कहा था – स्वराज आम जनता के लिए होना चाहिए केवल वर्गों के लिए नहीं।
मांटेग्यू घोषणा के संबंध में कांग्रेस में मतभिन्नता के फलस्वरुप अंततः कांग्रेस में पुनः विघटनत हुआ। सूरत विघटन (1907) के समय उदारवादियों ने उग्रवादियों को कांग्रेस से निष्कासित कर दिया था पर इस बार उदारवादियों ने ही कांग्रेस को छोड़ दिया। सुरेन्द्रनाथ बनर्जी के नेतृत्व में कांग्रेस के उदारवादी एवं नरमपंथी नेताओं ने मांटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधारों का स्वागत किया तथा कांग्रेस से अलग होकर इंडियन लिबरल फेडरेशन (अखिल भारतीय उदारवादी संघ) की स्थापना की।


साइमन कमीशन (1927)

1919 ई के मांटेग्यू-चेम्सफोर्ड एक्ट में 10 वर्ष पर इसकी समीक्षा हेतु एक संवैधानिक आयोग के गठन का प्रावधान था| आयोग को यह देखना था कि यह अधिनियम व्यवहार में कहां तक सफल रहा तथा उत्तरदायी शासन की दिशा में कहां तक प्रगति करने की स्थिति में है | नवम्बर 1927 में साइमन कमीशन अथवा भारतीय सांविधिक आयोग की नियुक्ति तत्कालीन कंजरवेटिव ब्रिटिश प्रधानमंत्री स्टेनली बाल्डविन द्वारा की गई |
जॉन साइमन की अध्यक्षता में गठित इस आयोग में कुल 7 सदस्य थे। चूंकि इसमें सभी सदस्य अंग्रेज थे तथा कोई भी भारतीय सदस्य नहीं था, इसलिए भारतीयों ने इसे ‘ श्वेत’ कमीशन  कहकर इसका बहिष्कार एवं विरोध किया | साइमन कमीशन 3 फरवरी, 1928 को बंबई पहुंचा |
साइमन कमीशन के अध्यक्ष सर जॉन साइमन उदारवादी दल ( liberal party ) के सदस्य थे जबकि भारत की स्वतंत्रता (1947) के समय ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लीमेंट एटली इस कमीशन में श्रमिक दल ( labour party ) के सदस्य के रूप में शामिल थे |
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने दिसंबर 1927 में मद्रास में हुए अपने अधिवेशन में साइमन कमीशन का विरोध करने का निर्णय किया | 3 फरवरी 1928 को साइमन कमीशन बंबई पहुंचा और उस दिन देशव्यापी हड़ताल का आयोजन हुआ| कमीशन जहां गया वहां पूर्ण हड़ताल रखी गई तथा साइमन कमीशन वापस जाओ के नारों के साथ जुलूस निकाले गए| लाहौर में साइमन कमीशन विरोधी जुलूस का नेतृत्व करते समय पुलिस के लाठीचार्ज से लाला लाजपत राय गंभीर रूप से घायल हो गए | पुलिस द्वारा की गई बर्बरतापूर्वक पिटाई के कारण ही लाला लाजपत की मृत्यु हो गई | लाला लाजपत राय (1865-1928) पंजाब के प्रमुख राजनीतिक नेता थे ब्रिटिश राज के विरोध आंदोलन का नेतृत्व किया था| उन्हें ‘ पंजाब केसरी ‘ की उपाधि दी गई थी।
साइमन कमीशन ( 1927 ) के प्रत्युत्तर में नेहरू रिपोर्ट (1928) तैयार की गई थी, जिसमें भारत के नए डोमिनियन संविधान का खाका था | इसे तैयार करने वाली सर्वदलीय समिति के अध्यक्ष मोतीलाल नेहरू थे | जवाहरलाल नेहरू इस के सचिव थे। 2 मुस्लिमों सहित कुल 9 अन्य लोग इस समिति के सदस्य थे |
नेहरू रिपोर्ट (1928) में भारत के लिए पूर्ण स्वतंत्रता के स्थान पर डोमिनियन स्टेट्स (अधिराज्य का दर्ज) की बात ही कही गई थी | इसमें संप्रदायिक आधार पर पृथक निर्वाचक मंडलों के स्थान पर अल्पसंख्यकों हेतु आरक्षित स्थानों के लिए संयुक्त निर्वाचन-क्षेत्रों का प्रस्ताव था | साथ ही इसके तहत प्रस्तावित संविधान में भारतीयों के लिए भाषण देने , समाचार पत्र निकालने , सभाएं करने , संगठन बनाने आदि की स्वतंत्रता के अधिकार सहित  मौलिक अधिकारों का भी प्रावधान किया गया  था |
वर्ष 1928 में ‘ इंडिपेंडेंस फॉर इंडिया लीग ‘ का गठन जवाहरलाल नेहरू तथा सुभाष चंद्र बोस ने मिलकर किया था| इस लीग का उद्देश्य डोमिनियन स्टेट्स से आगे पूर्ण स्वतंत्रता की मांग को मुखर करना था |


साइमन कमीशन के अध्यक्ष सर जॉन साइमन उदारवादी दल के सदस्य थे, जबकि भारत की स्वतंत्रता (1947) के समय ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लीमेंट एटली इस कमीशन में श्रमिक दल के सदस्य के रुप में शामिल थे।
लार्ड इरविन के सुझावों पर भारतीयों को साइमन कमीशन से बाहर रखा गया था। उल्लेखनीय है कि साइमन कमीशन वर्ष 1928 में भारत पहुंचा था। सके (इसमें कोई सदस्य भारतीय न होने के कारण) विरुध्द भारत में व्यापक विरोध-प्रदर्शन हुए थे।
लाला लाजपत राय (1865-1928) पंजाब के प्रमुख राजनीतिक नेता थे। जिन्होने ब्रिटिश राज के विरुध्द स्वतंत्रता आंदोलन का नेतृत्व किया था। उन्हें पंजाब केसरी की उपाधि दी गई थी।
28 मार्च, 1929 को दिल्ली में मुस्लिम लीग का अधिवेशन हुआ, जिसमें जिन्ना ने नेहरु रिपोर्ट (1928 ई.) के विरोध स्वरुप 14 सूत्रीय प्रस्ताव रखा था। नेहरु रिपोर्ट में संयुक्त रुप से चुनाव लड़ने की बात कही गई थी जबकि इसमे चुनाव क्षेत्र की मांग की गई थी।
जवाहरलाल नेहरु के नेतृत्व में युवा और उग्रवादी राष्ट्रवादियों ने नेहरु रिपोर्ट पर आपत्ति रखी। ये पूर्ण स्वराज्य को तात्कालिक लक्ष्य के रुप में रखने की मांग कर रहे थे। फलतः जवाहरलाल नेहरु और सुभाष चन्द्र बोस ने इंडिपेंडेंस फॉर इंडिया लीग के रुप में कांग्रेस के भीतर एक दबाव समूह का निर्माण किया।


कांग्रेस का लाहौर  अधिवेशन, पूर्ण स्वराज प्रस्ताव (1929)

1921 के अहमदाबाद अधिवेशन में मौलाना हसरत मोहानी ने प्रस्तावित किया कि स्वराज को सभी प्रकार के विदेशी नियंत्रण से मुक्त संपूर्ण स्वतंत्रता या संपूर्ण स्वराज के रूप में परिभाषित किया जाए और इसे कांग्रेस का लक्ष्य माना जाए | 1921 में कांग्रेस के अमदाबाद अधिवेशन में अध्यक्ष सी. आर. दास चुने गए थे किंतु उनके जेल में होने के कारण हकीम अजमल खां ने इस अधिवेशन की अध्यक्षता की थी |
कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन (1928) में ब्रिटिश सरकार को यह अल्टीमेटम दिया गया कि वह 1 वर्ष में नेहरू रिपोर्ट स्वीकार कर ले या कांग्रेस द्वारा प्रारंभ किए जाने वाले जन आंदोलन का सामना करें | निर्धारित समय सीमा में सरकार द्वारा कोई निश्चित उत्तर न मिलने की स्थिति में दिसंबर 1929 में पंडित जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में कांग्रेस का ऐतिहासिक लाहौर अधिवेशन हुआ, जिसमें संबंधित प्रस्ताव पारित होने के बाद पंडित जवाहरलाल नेहरू ने पूर्ण स्वराज का लक्ष्य घोषित किया | जैसे ही 31 दिसंबर 1929 को मध्य रात्रि का घंटा बजा, कांग्रेस अध्यक्ष पंडित जवाहरलाल नेहरू ने लाहौर में रावी के तट पर भारतीय स्वतंत्रता का झंडा फहराया |
कांग्रेस कार्यसमिति द्वारा 2 जनवरी 1930 की अपनी बैठक में यह निर्णय लिया गया कि 26 जनवरी 1930 का दिन ‘ पूर्ण स्वराज दिवस ‘ के रुप में मनाया जाएगा तथा 26 जनवरी को प्रत्येक वर्ष ‘पूर्ण स्वाधीनता दिवस’ के रूप में | इस अधिवेशन में अपने अध्यक्षीय भाषण में बोलते हुए उन्होंने कहा था कि आज हमारा सिर्फ एक लक्ष्य है , स्वाधीनता का लक्ष्य | हमारे लिए स्वाधीनता है ‘ पूर्ण स्वतंत्रता ‘ |
·      कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन में 31 दिसंबर 1929 को घोषित संकल्प में स्पष्ट किया गया कि –
a.  गोलमेज सम्मेलन से कोई लाभ नहीं है |
b.  नेहरू कमेटी की डोमिनियन राज्य के दर्जे की योजना समाप्त की जाती है
c.  शब्द स्वराज का अर्थ है पूर्ण स्वतंत्रता
d.  अखिल भारतीय कांग्रेस जब उचित समझेगी नागरिक अवज्ञा आंदोलन प्रारंभ करेगी |


जवाहर लाल नेहरु की अध्यक्षता में वर्ष 1929 में लाहौर के रावी नदी तट पर कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन आयोजित किया गया। इस अधिवेशन में ऐतिहासिक पूर्ण स्वराज की मांग का संकल्प पारित किया गया और वर्ष 1930 की 26 जनवरी को प्रथम स्वाधीनता दिवस मनाया गया तथा उस वर्ष से प्रति वर्ष 26 जनवरी को स्वाधीनता दिवस मनाया जाने लगा।
घटना तारीख
दांडी मार्च का प्रारंभ             12 मार्च, 1930

भारत छोड़ो आंदोलन का प्रारंभ    अगस्त, 1942

साइमन कमीशन का आगमन         3 फरवरी, 1928

गांधी इरविन समझौता              5 मार्च, 1931

आचार्य विनोबा भावे गांधीजी के निकट सहयोगियों मे से थे। गांधीजी द्वारा संचालित विभिन्न आंदोलनों में उन्होने भाग लिया। 1930 में वे सविनय अवज्ञा आंदोलन में भाग लेने के दौरान प्रथम बार गिरफ्तार हुए।


सविनय अवज्ञा आंदोलन

1929 में लाहौर कांग्रेस अधिवेशन में कांग्रेस कार्यकारिणी को सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू करने का अधिकार दिया गया | फरवरी 1930 में साबरमती आश्रम में हुई कांग्रेस कार्यकारिणी की दूसरी बैठक में महात्मा गांधी को इस आंदोलन का नेतृत्व सौंपा गया | महात्मा गांधी ने 12 मार्च , 1930 को अपना प्रसिद्ध ‘ दांडी मार्च ‘ शुरू किया | उन्होंने साबरमती आश्रम (अहमदाबाद ) से 78 चुने हुए साथियों के साथ सत्याग्रह के लिए कूच किया | 24 दिनों की लंबी यात्रा के बाद उन्होंने 6 अप्रैल 1930 को दांडी में सांकेतिक रूप से नमक कानून भंग किया और इस प्रकार नमक कानून तोड़कर उन्होंने औपचारिक रूप से सविनय अवज्ञा आंदोलन का शुभारंभ किया |
सुभाष चंद्र बोस ने गांधी जी के इस अभियान की तुलना नेपोलियन के एल्बा से पेरिस की ओर जाने वाले अभियान से की थी | एक अंग्रेजी समाचार संवाददाता ने खिल्ली उड़ाई और कहा कि ” क्या सम्राट को एक केतली में पानी उबालने से हराया जा सकता है ” | इसके उत्तर में गांधी जी ने कहा कि ” गांधी महोदय समुद्री जल को तबतक उबाल सकते हैं, जब तक कि डोमिनियन स्टेट्स नहीं मिल जाता | ” | सविनय अवज्ञा आंदोलन गांधी जी के नेतृत्व में पूरे देश में फैल गया | तमिलनाडु में गांधीवादी नेता सी. राजगोपालाचारी ने तिरुचेनगोड आश्रम से त्रिचरापल्ली के वेदारण्यम तक नमक यात्रा की |
महात्मा गांधी के दांडी में विभिन्न राज्यों से सम्मिलित होने वाले सत्याग्रहियों की संख्या है –
गुजरात 31
महाराष्ट्र 13
उत्तर प्रदेश 8
कच्छ 6
केरल 4
पंजाब 3
राजपूताना 3
बांबे 2 ( दादू भाई , हरिलाल माहिमतुरा )
सिंध 1 (आनंद हिंगोरानी )
नेपाल 1 ( महावीर )
तमिलनाडु 1 ( तपन नायर )
आंध्र 1 ( सुब्रमण्यन )
उत्कल 1 ( मोतीवासदास )
कर्नाटक 1 ( महादेव मार्तंड )
बिहार 1 ( गिरिवरधारी चौधरी ) तथा
बंगाल 1 ( दुर्गेश चंद्र दास ) |
5 अप्रैल 1930 को महात्मा गांधी अपने नमक सत्याग्रह के तहत दांडी ग्राम पहुंचे , उन्होंने दांडी आए सभी देसी व विदेशी पत्रकारों को संबोधित करते हुए कहा कि ” शक्ति के विरुद्ध अधिकार की लड़ाई में मैं विश्व की सहानुभूति चाहता हूं ” |
सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान धरसना नमक गोदाम पर कांग्रेस कार्यकर्ताओं के धावे से पूर्व महात्मा गांधी को 5 मई 1930 को गिरफ्तार कर यरवदा जेल भेज दिया गया था | उनके स्थान पर अब्बास तैयबजी आंदोलन के नेता हुए | उनकी भी गिरफ्तारी के बाद श्रीमती सरोजिनी नायडू ने 21 मई 1930 को धरसना नमक गोदाम पर धावे का नेतृत्व किया था| इस लोमहर्षक घटना का विवरण अमेरिकी पत्रकार वेब मिलर ने प्रस्तुत किया | उत्तर पश्चिमी सीमा प्रांत में खान अब्दुल गफ्फार खां के नेतृत्व में ‘ खुदाई खिदमतगार ‘ नामक स्वयंसेवक संगठन स्थापित किया गया था | इन्हें लाल कुर्ती ( red shirts ) के नाम से भी जाना जाता है | ‘ लाल कुर्ती ‘ संगठन ने पठानों की राष्ट्रीय एकता का नारा बुलंद किया और अंग्रेजों से स्वतंत्रता के लिए ब्रिटिश उपनिवेशवाद के विरुद्ध आंदोलन संगठित किया तथा श्रमजीवियों की हालत में सुधार की मांग की |
उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रांत के मुसलमानों ने खान अब्दुल गफ्फार खां के नेतृत्व में सविनय अवज्ञा आंदोलन में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी | सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान पेशावर में गढ़वाल रेजीमेंट के सिपाहियों ने चंद्रसिंह गढ़वाली के नेतृत्व में निहत्थी भीड़ पर गोली चलाने से इनकार कर दिया | सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान मणिपुर की जनजातियों ने भी सक्रिय भागीदारी दिखाई | यहां पर आंदोलन का नेतृत्व नागा जनजाति की महिला गैडिनल्यू ने किया | इसे ‘ जियातरंग आंदोलन ‘ कहा जाता है |
दिसम्बर 1930 में सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान उत्तरी बिहार के सारण जिले में बिहोर नामक स्थान पर चौकीदारी टैक्स के विरोध में प्रदर्शन हुआ और प्रदर्शनकारियों ने बंदूक से 27 बार छर्रे दागे जाने की परवाह नहीं की | सविनय अवज्ञा आंदोलन की असफलता के बाद गांधी जी ने रचनात्मक कार्यक्रम को महत्व दिया |
अक्टूबर 1934 में गांधी जी ने अपना पूरा समय ‘ हरिजनोत्थान ‘ में लगाने के लिए सक्रिय राजनीति से स्वयं को हटाने का निश्चय किया |
सितंबर 1932 में गांधीजी ने हरिजन कल्याण हेतु ‘ अखिल भारतीय छुआछूत विरोधी लीग ‘ की स्थापना की तथा ‘ हरिजन ‘ नामक साप्ताहिक पत्रिका का प्रकाशन किया।


सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान मणिपुर की जनजातियों ने भी सक्रिय भागीदारी दिखाई यहां पर आंदोलन का नेतृत्व जगा जनजाति की महिला गैडिनल्यू ने किया। इसे जियातरंग आंदोलन कहा जाता है।
स्वतंत्रता आंदोलन में बिहार की महिलाओं ने महत्वपूर्ण योगदान दिया। इन महिलाओं में सरला देवी, प्रभावती देवी, राजवंशी देवी, सुनीति देवी तथा राधिका देवी प्रमुख हैं। प्रभावती देवी पटना की स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थी।
दिसंबर, 1930 में सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान उत्तरी बिहार के सारण जिले में बिहोर नामक स्थान पर चौकीदारी टैक्स के विरोध में प्रदर्शन हुआ और प्रदर्शनकारियों ने बंदूक से 27 बार छर्रे दागे जाने की परवाह नही की। अगले महीने बेगूसराय (मुंगेर जिला) में स्वतंत्रता दिवस के लिए एकत्रित भीड़ में भारी संख्या मे ग्रामवासी आकर सम्मिलित हो गये और उपमंडल अधिकारी को एक गड्डे में खदेड़ दिया। 146 बार गोलीबारी किए जाने के बाद ही वे विसर्जित हुए।


गांधी इरविन समझौता

सविनय अवज्ञा आंदोलन के विस्तारित होते स्वरूप को देखते हुए वायसराय इर्विन ने देश में सौहार्द्र का वातावरण उत्पन्न करने के उद्देश्य से 26 जनवरी, 1931 को गांधी जी को जेल से रिहा कर दिया। तेज बहादुर सप्रू तथा एम. आर. जयकर के प्रयत्नों से गांधी एवं इर्विन के मध्य फरवरी, 1931 में दिल्ली में वार्ता आरंभ हुई।
5 मार्च, 1931 को दोनों के मध्य एक समझौता हुआ जो गांधी इरविन समझौते के नाम से जाना जाता है। इस समझौते के परिप्रेक्ष्य में सरोजिनी नायडू ने गांधी और इरविन को ‘दो महात्मा (The Two Mahatmas) की संज्ञा दी थी।
·      गांधी-इरविन समझौता 5 मार्च, 1931 को संपन्न हुआ, इस समझौते के अनुसार-
1.  गांधी जी के नेतृत्व में कांग्रेस सविनय अवज्ञा आंदोलन स्थगित करने के लिए तैयार हो गई।
2. सभी युद्ध बंदियों, जिनके विरुद्ध हिंसा का आरोप नहीं था, को रिहा करने का आदेश
3. विदेशी कपड़ों और शराब की दुकानों पर शांतिपूर्ण धरना देने का अधिकार
4. समुद्र तटीय प्रदेशों में बिना नमक कर दिए नमक बनाने की अनुमति
5. कांग्रेस द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने के लिए तैयार हो गई।
·      परंतु इस समझौते ने जनता को निराश किया क्योंकि भगत सिंह, सुखदेव एवं राजगुरु को फांसी न दिए जाने की जनता की मांग को इसमें सम्मिलित नहीं किया गया था। इरविन के जीवनीकार एलन कैम्पबेल जॉनसन ने गांधी-इरविन समझौते में महात्मा गांधी के लाभों को “सांत्वना पुरस्कार” और इर्विन के एकमात्र आत्मसमर्पण के रूप में बातचीत के लिए सहमत होने को कहा था


कांग्रेस का कराची अधिवेशन (1931)

गांधी-इरविन समझौते (दिल्ली समझौते) को मंजूरी देने के लिए सरदार बल्लभ भाई पटेल की अध्यक्षता में 29 मार्च, 1931 को कांग्रेस का कराची अधिवेशन हुआ। इस अधिवेशन में पहली बार कांग्रेस ने मौलिक अधिकारों और राष्ट्रीय आर्थिक कार्यक्रमों से संबंध प्रस्ताव पारित किए। इसी अधिवेशन में कुछ लोगों के विरोध करने पर गांधी जी ने कहा था- “गांधी मर सकता है, गांधीवाद नहीं।” यह पहला अवसर था जब ‘पूर्ण स्वराज्य’ को कांग्रेस द्वारा परिभाषित किया गया।
1931 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने कराची अधिवेशन में पारित मूल अधिकारों तथा आर्थिक कार्यक्रम पर संकल्प पंडित जवाहरलाल नेहरू ने प्रारुपित किया था तथा एम.एन. रॉय ने इसमें सहयोगी की भूमिका निभाई थी। सुभाष चंद्र बोस ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कराची अधिवेशन (1931) को ‘महात्मा गांधी की लोकप्रियता और सम्मान की पराकाष्ठा’ माना है|


गोलमेज  सम्मेलन

27 मई, 1930 को साइमन कमीशन की रिपोर्ट प्रकाशित हुई। राजनीतिक संगठनों में कमीशन की सिफारिशों को अस्वीकार कर दिया। कांग्रेस के प्रमुख नेता जेल में थे। ब्रिटिश सरकार ने निराशा एवं असंतोष के वातावरण में नवंबर, 1930 में लंदन में प्रथम गोलमेज सम्मेलन बुलाया। इस सम्मेलन में 89 भारतीय प्रतिनिधियों ने भाग लिया किंतु कांग्रेस ने इसमें भाग नहीं लिया। इस सम्मेलन में भाग लेने वालों में प्रमुख थे तेज – बहादुर सप्रू, श्रीनिवास शास्त्री, मुहम्मद अली, मुहम्मद शफी, आगा खां, फजलुल हक, मुहम्मद अली जिन्ना, होमी मोदी, एम. आर. जयकर, मुंजे, भीमराव अंबेडकर तथा सुंदर सिंह मजीठिया आदि। इस सम्मेलन में ईसाइयों का प्रतिनिधित्व के.टी. पाल ने किया था। इस सम्मेलन का उद्घाटन ब्रिटिश सम्राट ने किया तथा अध्यक्षता ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैम्जे मैक्डोनाल्ड ने की थी।
7 सितंबर, 1931 से 1 दिसंबर 1931 तक चले द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में महात्मा गांधी ने कांग्रेस के एकमात्र प्रतिनिधि के रूप में हिस्सा लिया, इनके अलावा सरोजिनी नायडू तथा मदन मोहन मालवीय ने भी इस सम्मेलन में हिस्सा लिया। एनी बेसेंट ने भी इस सम्मेलन में भाग लिया था। गांधी जी एस. एस. राजपूताना नामक जलपोत से लंदन पहुंचे तथा वे लंदन के किंग्सले हॉल में ठहरे थे। गतिरोधों के कारण सम्मेलन 1 दिसंबर को समाप्त घोषित कर दिया गया एवं गांधी जी को लंदन से खाली हाथ वापस आना पड़ा। स्वदेश पहुंचने पर गांधी जी ने कहा – “यह सच है कि मैं खाली हाथ लौटा हूं किंतु मुझे संतोष है कि जो ध्वज मुझे सौंपा गया था, उसे नीचे नहीं होने दिया और उसके सम्मान के साथ समझौता नहीं किया।”
द्वितीय गोलमेज सम्मेलन सांप्रदायिक समस्या पर विवाद के कारण पूरी तरह असफल रहा। दलित नेता भीमराव अंबेडकर ने दलितों के लिए पृथक निर्वाचन मंडल की मांग की जिसे गांधी जी ने अस्वीकार कर दिया। डॉ भीमराव अंबेडकर (बी.आर. अंबेडकर) तीनों गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने वाले भारतीय प्रतिनिधि थे। लंदन में तीसरा गोलमेज सम्मेलन 17 नवंबर, 1932 से 24 दिसंबर, 1932 तक चला, कांग्रेस ने इस सम्मेलन का बहिष्कार किया |
5 मार्च, 1931 को महात्मा गांधी एवं वायसराय लॉर्ड इरविन के बीच एक समझौता हुआ इसे दिल्ली पैक्ट के नाम से जाना जाता है। इसमें कांग्रेस की ओर से गांधीजी ने निम्नलिखित बातो को स्वीकार किया –
सविनय अवज्ञा आंदोलन स्थगित कर दिया जाएगा।
कांग्रेस निकट भविष्य मे होने वाले दूसरे गोलमेज सम्मेलन में भाग लेगी।
कांग्रेस ब्रिटिश सामान का बहिष्कार नही करेगी।
गांधीजी पुलिस द्वारा की गई ज्यादतियों के बारे में जांच की मांग नही करेंगी।
दूसरे गोलमेज सम्मेलन में महात्मा गांधी ने राष्ट्रीय कांग्रेस का प्रतिनिधित्व किया था।

प्रथम गोलमेज सम्मेलन में डॉ. अम्बेडकर ने दलित वर्ग के लिए अलग निर्वाचक मंडल की मांग रखी थी। कांग्रेस ने प्रथम और तृतीय गोलमेज सम्मेलन में भाग नही लिया। पूना पैक्ट में प्रावधानित था कि स्थानीय निकायों के चुनाव या लोक सेवाओं मे नियुक्ति के लिए दलित वर्गों के सदस्यों के लिए कोई निर्बंधन आरोपित नही किए जाएंगे। तथा इनमें दलित वर्गों के उचित प्रतिनिधित्व के लिए (लोक सेवाओं में नियुक्ति के लिए अपेक्षित शैक्षिक अर्हताओं के अधीन रहते हुए) हरसंभव प्रयास किए जाएंगे।


सांप्रदायिक पंचाट एवं पूना पैक्ट (1932)

द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में विभिन्न संप्रदायों एवं दलित वर्गों के लिए पृथक निर्वाचक मंडल के विषय पर कोई सहमति नहीं बन पाई थी। अतः सम्मेलन ने इस समस्या के निदान के लिए ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैम्जे मैक्डोनाल्ड को प्राधिकृत किया। तदनुसार 16 अगस्त, 1932 को रैम्जे मैक्डोनाल्ड ने अपने सांप्रदायिक अधिनिर्णय की घोषणा की, जिसे सांप्रदायिक पंचाट (कम्युनल अवार्ड) कहा गया।
सांप्रदायिक पंचाट के अंतर्गत एक अल्पसंख्यक समुदाय के लिए विधानमंडलों में कुछ सीटें सुरक्षित कर दी गई जिनके सदस्यों का चुनाव पृथक निर्वाचक मंडलों द्वारा किया जाना था। मुसलमान और सिख तो पहले से ही अल्पसंख्यक माने जाते थे। अब इस नए कानून के अंतर्गत दलित वर्ग को भी अल्पसंख्यक मानकर, हिंदुओं से अलग कर दिया गया। इसके तहत मुसलमानों, ईसाइयों,सिक्खों, आंग्ल भारतीयों तथा अन्य के लिए पृथक निर्वाचन पध्दति की सुविधा प्रदान की गई, जो केवल प्रांतीय विधानमंडलों पर ही लागू थी। गांधी जी ने अपना पहला आमरण अनशन 20 सितंबर, 1932 को यरवदा जेल में रहते हुए ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैम्जे कैक्डोनाल्ड के सांप्रदायिक निर्णय के विरुद्ध प्रारंभ किया था जो कि 24 सितंबर, 1932 को अंबेडकर और गांधी जी के अनुयायियों के मध्य हुए पूना समझौते के बाद समाप्त हुआ। गांधी जी ने इस पर हस्ताक्षर नहीं किए थे। 24 सितंबर, 1932 दिन शनिवार को सायं 5 बजे पूना समझौता हस्ताक्षरित हुआ। दलित वर्ग की ओर से डॉ अंबेडकर ने तथा हिंदू जाति की ओर से पंडित मदन मोहन मालवीय ने इस पर हस्ताक्षर किए।
एम.एम. जयकर, देवदास गांधी, विश्वास, राज भोज, पी. बालू, गवई, ठक्कर, सोलंकी, तेज बहादुर सप्रू, जी. डी. बिड़ला, राजगोपालाचारी, डॉ राजेंद्र प्रसाद, राय बहादुर श्रीनिवास, एम.सी. राजा. सी.वी. मेहता, बाखले एवं कॉमत अन्य हस्ताक्षरकर्ता थे।
सांप्रदायिक अवार्ड में प्रांतीय विधानमंडलों में दलितों के लिए सुरक्षित सीटों की संख्या 71 थी, जिसे पूना पैक्ट में बढ़ाकर 148 (मद्रास-30 सिंध सहित बंबई 15, पंजाब-8 बिहार और उड़ीसा 18, मध्य प्रांत 20, असम 7, बंगाल-30 एवं संयुक्त प्रांत 20) कर दिया गया। कुछ पुस्तकों में यद्यपि यह संख्या 147 मिलती है। साथ ही केंद्रीय विधानमंडल में सामान्य वर्ग की सीटों में से 18% सीटे दलित वर्गों के लिए आरक्षित की गई।
पूना समझौते (1932) के बाद महात्मा गांधी जी की रुचि सविनय अवज्ञा आंदोलन में नहीं रही, अब वह पूरी तरह अस्पृश्यता विरोधी आंदोलन में रुचि लेने लगे तथा इस प्रकार अखिल भारतीय अस्पृश्यता विरोधी लीग (ऑल इंडिया एंटी अनटचेबिलिटी लीग) की स्थापना हुई, जिसका नाम परिवर्तित कर हरिजन सेवक संघ कर दिया गया। घनश्याम दास बिरड़ा इसके प्रथम अध्यक्ष थे। 1920 में डॉक्टर बी आर अंबेडकर द्वारा दि ऑल इंडिया डिप्रेस्ड क्लास फेडरेशन (दलित वर्गों का संघ) की स्थापना की गई थी।
1924 में डॉ अंबेडकर ने बंबई में दलित वर्ग संस्थान (बहिष्कृत हितकारिणी सभा) की स्थापना की। 3 वर्ष बाद 1927 उन्होंने मराठी पाक्षिक बहिष्कृत भारत का प्रकाशन प्रारंभ किया तथा इसी वर्ष सवर्ण हिंदुओं तथा अछूतों में सामाजिक समानता के सिद्धांत का प्रचार करने हेतु उन्होने समाज समता संघ स्थापित किया। जीवन के अंतिम समय में इन्होंने बौद्ध धर्म अपना लिया था। 14 अगस्त, 1931 को बंबई में महात्मा गांधी से वार्ता के दौरान डॉ बी आर अंबेडकर ने कहा था -इतिहास बताता है कि महात्मा गांधी क्षणिक भूत की भांति धूल उठाते हैं लेकिन स्तर नहीं उठाते|


कांग्रेस समाजवादी पार्टी (1934)

मई 1934 में पटना में कांग्रेस महासमिति की बैठक के दौरान ही इन सदस्यों की एक अलग बैठक हुई, जिसमें अखिल भारतीय समाजवादी दल की स्थापना को औपचारिक मान्यता दी गई तथा अक्टूबर-नवंबर, 1934 के दौरान बंबई में इसकी नीतियां एवं कार्य-प्रणालियां तय की गई। वर्ष 1934 में पटना में अखिल भारतीय कांग्रेस समाजवादी पार्टी के संयोजक जय प्रकाश नारायण थे।
जय प्रकाश नारायण को पार्टी का महासचिव तथा आचार्य नरेंद्र देव को अध्यक्ष चुना गया था। इन नेताओं ने युवा वर्ग को कम्युनिस्ट पार्टी की ओर जाने से रोकने के लिए कांग्रेस समाजवादी पार्टी की स्थापना की थी। इसके अन्य सदस्य थे – अशोक मेहता ,अच्युत पटवर्धन, मीनू मसानी, डॉ राम मनोहर लोहिया, पुरुषोत्तम विक्रम दास, यूसुफ मेहराले गंगा शरण सिंह तथा कमलादेवी चट्टोपाध्याय आदि। जय प्रकाश नारायण बिहार सोशलिस्ट पार्टी से जुड़े थे। 1931 ईस्वी में बिहार सोशलिस्ट पार्टी का गठन गंगा शरण सिंह, रामवृक्ष बेनीपुरी और रामानंद मिश्रा आदि ने किया था।
श्री नरसिंह नारायण समाजवादी थे। वे बिहार सोशलिस्ट पार्टी से जुड़े थे। जयप्रकाश नारायण को लोकनायक के नाम से भी जाना जाता है। 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान इन्होंने डॉ राम मनोहर लोहिया तथा अरूणा आसिफ अली के साथ मिलकर गुप्त रूप से भारतीय जनता को संगठित किया था। इन्होंने 5 जून, 1974 को पटना के गांधी मैदान पर संपूर्ण क्रांति का आह्वान किया। 1998 में मरणोपरांत उन्हें भारत रत्न प्रदान किया गया।
अप्रैल 1946 में जयप्रकाश नारायण की रिहाई के लिए जयप्रकाश दिवस मनाया गया। पटना के बांकीपुर मैदान में एक जनसभा हुई जिसमें राजनीतिक बंदियों को जेल में रखने की सरकारी नीति की आलोचना तथा जय प्रकाश की रिहाई की मांग की गई। 20 मई, 1936 को बंबई के 21 उद्योगपतियों ने मुंबई मेनिफेस्टो पर हस्ताक्षर किए। यह मेनिफेस्टो प्रत्यक्ष रूप से समाजवादी आदर्शों के प्रतिपादन का विरोधी था जैसा कि नेहरु ने लखनऊ अधिवेशन में कहा था |


कांग्रेस समाजवादी पार्टी ने ब्रिटिश उत्पादों तथा करों के बहिष्कार का समर्थन किया न कि करो के अपवंचन का। कांग्रेस समाजवादी पार्टी समानता के आधार पर समाजवादी समाज की स्थापना करना चाहते थे। सर्वहारा वर्ग का अधिनायकत्व स्थापित करना इनका लक्ष्य नही था यह मार्क्सवाद का लक्ष्य था। इसने अल्पसंख्यकों तथा दलित वर्गों के लिए पृथक निर्वाचन क्षेत्र की वकालत नही की।
कांग्रेस समाजवादी पार्टी –
स्थापना       – वर्ष 1934 में

संस्थापक      – आचार्य नरेन्द्र  देव एवं जयप्रकाश नारायण

अन्य सदस्य – अशोक मेहता, अच्युत पटवर्धन, मीनू समानी, डॉ. राम मनोहर लोहिया, पुरुषोत्तम विक्रम दास, यूसुफ मेहराले, गंगा शरण सिंह तथा कमलादेवी चट्टोपाध्याय आदि।

श्री नरसिंह नारायण समाजवादी थे। वे बिहार सोशलिस्ट पार्टी से जुड़े थे।



प्रांतीय चुनाव और मंत्रिमंडल का गठन (1937)

1935 के भारत सरकार अधिनियम के आधार पर फरवरी, 1937 में प्रांतीय विधानमंडलों के चुनाव हुए जिनमें कांग्रेस ने अपने प्रतिद्वंध्दी दलों का सफाया करते हुए पांच प्रांतों- मद्रास (65% मतों के साथ 215 में 159 सीटें), बिहार (75% मतों के साथ 152 में से 98 सीटें), मध्य प्रांत एवं बरार (61% मतों के साथ 112 में से 70 सीटें,) संयुक्त प्रांत (65% मतों के साथ 228 में से 134 सीटें), तथा उड़ीसा (60% मतों के साथ 60 में से 36 सीटें) में पूर्ण बहुमत प्राप्त किया। कांग्रेस मुंबई (लगभग पूर्ण बहुमत), असम तथा उत्तर पश्चिम प्रांत में सबसे बड़े दल के रूप में उभरी | केवल बंगाल, पंजाब तथा सिंध में ही कांग्रेस सबसे बड़ा दल बनने से वंचित रही।
1935 के अधिनियम के उपरांत, वर्ष 1937 में हुए चुनावों में गठित कांग्रेस मंत्रिमंडलों का कार्यकाल 28 माह था। जुलाई, 1937 के दौरान 6 प्रांतों में इसने अपने मंत्रिमंडल गठित किए। ये प्रांत थे – मद्रास, मुंबई, मध्य प्रांत, उड़ीसा, बिहार और संयुक्त प्रांत। बाद में पश्चिमोत्तर प्रांत और असम में भी कांग्रेस ने मंत्रिमंडल बनाए।
द्वितीय विश्व युद्ध में भारतीयों की स्वीकृति के बगैर ब्रिटेन द्वारा भारत को शामिल किए जाने के विरोध में 22 अक्टूबर, 1939  को सभी कांग्रेसी मंत्रिमंडल ने त्यागपत्र दे दिया। कांग्रेसी मंत्रिमंडलों के त्यागपत्र देने की खुशी में जिन्ना द्वारा भारत के सभी मुसलमानों से 22 दिसंबर (दिन-शुक्रवार), 1939 के दिन मुक्ति दिवस (Day of Delieverance) मनाने का आह्वान किया था।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की कार्यकारिणी कमेटी ने वर्ष 1937 में भू-स्वामित्व को समाप्त करने  की नीति अपनाई। संयुक्त प्रांत और बिहार में कांग्रेस सरकारों द्वारा काश्तकारी बिल पारित किए गए। वर्ष 1937 में संपन्न प्रांतीय विधानसभा चुनावों में यूपी (संयुक्त प्रांत) के कुल 228 में से 134 स्थानों पर कांग्रेस को सफलता मिली।
संयुक्त प्रांत में कांग्रेस ने अकेले ही सरकार बनाई। इस सरकार में प्रधानमंत्री गोविंद बल्लभ पंत और कानून एवं न्याय मंत्री कैलाश नाथ काटजू थे, जबकि वित्त विभाग रफी अहमद किदवई को सौंपा गया था। कांग्रेस प्रशासित प्रदेशों में मुस्लिमों की शिकायतों से संबंधित रिपोर्टो का कालक्रम इस प्रकार है- पीरपुर रिपोर्ट (1938), शरीफ रिपोर्ट ( मार्च, 1939) एवं फजलुल हक रिपोर्ट अथवा मुस्लिम सफरिंग्स अंडर कांग्रेस रूल (दिसंबर 1939)|


कांग्रेस का त्रिपुरी संकट (1939)

वर्ष 1938 के कांग्रेस के हरिपुरा (गुजरात) अधिवेशन में सुभाष चंद्र बोस कांग्रेस के पहली बार अध्यक्ष (निर्विरोध) बने थे। वर्ष 1939 के त्रिपुरी (म.प्र.) अधिवेशन में वे गांधी जी द्वारा समर्थित पट्टाभि सीतारमैया को पराजित कर कांग्रेस के दूसरी बार अध्यक्ष बने परंतु कार्यकारिणी के गठन के प्रश्न पर गांधीजी से मतभेद के कारण उन्होंने त्यागपत्र दे दिया, जिसके बाद डॉ. राजेंद्र प्रसाद कांग्रेस के अध्यक्ष बने।
वर्ष 1939 में त्रिपुरी संकट के बाद कांग्रेस की अध्यक्षता से त्यागपत्र के पश्चात सुभाष चंद्र बोस ने ‘फॉरवर्ड ब्लॉक’ की स्थापना की। यह संगठन वामपंथी विचारधारा पर आधारित था। जब द्वितीय विश्व युद्ध के बादल यूरोप में मंडरा रहे थे, सुभाष चंद्र बोस ने समय का लाभ उठाना चाहा और ब्रिटेन तथा जर्मनी के युद्ध का लाभ उठाकर एक प्रहार करके भारत की स्वाधीनता चाही। उनका विश्वास आयरलैंड की इस पुरानी कहावत पर था – “इंग्लैंड की आवश्यकता आयरलैंड के लिए अवसर है।” अतः उन्होंने गांधी जी तथा अन्य कांग्रेसी नेताओं को इस नीति पर लाना चाहा कि भारत की स्वतंत्रता के लिए इंग्लैंड के दुश्मनों की सहायता ले ली जाए |
वर्ष 1939 के त्रिपुरी सम्मेलन में अध्यक्ष पद हेतु हुए चुनाव मे सुभाष चन्द्र बोस, गांधीजी समर्थित पट्टाभि सीतारमैया से 1377 मतो के मुकाबले 1580 मतो से जीत गए। त्रिपुरी, जबलपुर (म.प्र.) में स्थित है।
जब द्वीतीय विश्व युध्द के बादल यूरोप में मंडरा रहे थे, सुभाष चन्द्र बोस ने समय का लाभ उठाना चाहा और ब्रिटेन तथा जर्मनी के युध्द का लाभ उठाकर एक प्रहार करके भारत की स्वाधीनता चाही। उनका विश्वास आयरलैंड की इस पुरानी कहावत पर था – इंग्लैंड की आवश्यकता आयरलैंड के लिए अवसर है। अतः उन्होने गांधीजी तथा अन्य कांग्रेसी नेताओं को इस नीति पर लाना चाहा कि भारत की स्वतंत्रता के लिए इंग्लैंड के दुश्मनो की सहायता ले ली जाए।
देसी रियासतें

बटलर समिति का गठन वर्ष 1927 में किया गया था, इसे ‘भारतीय रियासत समिति’ भी कहते हैं। इसका उद्देश्य भारत सरकार तथा भारतीय रियासतों के बीच संबंधों की जांच करना तथा ब्रिटिश भारत और भारतीय रियासतों के बीच आर्थिक एवं वित्तीय संबंधों को सुधारने हेतु सिफारिशें करना था। भारतीय नरेशों ने एक सुप्रसिद्ध वकील सर लेजली स्काट को कमेटी के सम्मुख उनका दृष्टिकोण प्रस्तुत करने के लिए नियुक्त किया।
दिसंबर, 1927 में अखिल भारतीय राज्य जन कॉन्फ्रेंस (ऑल इंडिया स्टेट्स पीपुल्स कॉन्फ्रेंस) का आयोजन किया गया। इसके विभिन्न रियासतों से आए 700 से अधिक राजनीतिक कार्यकर्ताओं ने भाग लिया। बलवंत राय मेहता, मणिलाल कोठारी और जी.आर. अभ्यंकर ने इसके आयोजन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
ब्रिटिश भारत तथा रजवाड़ों के राजनीतिक संघर्षों के साझे राष्ट्रीय लक्ष्यों को सामने रखने के लिए जवाहरलाल नेहरू को वर्ष 1939 में भारत प्रजा मंडल (ऑल इंडिया स्टेट्स पीपुल्स कॉन्फ्रेंस) का अध्यक्ष चुना गया था। भारतीय संघ में अधिकांश रजवाड़ों का विलय वर्ष 1947 में हुआ। 15 अगस्त, 1947 तक सिवाय जूनागढ़, जम्मू एवं कश्मीर तथा हैदराबाद को छोड़कर सभी रजवाड़े भारत में शामिल हो गए तथा वर्ष 1948 के अंत तक इन तीनों रियासतों को भी इसके लिए बाध्य होना पड़ा |
अंग्रेजी हुकूमत ने इन रियासतों को स्वाधीनता का दर्जा देकर बड़ी पेंचीदा समस्या खड़ी कर दी थी किंतु राष्ट्रीय नेतृत्व ने, विशेषकर सरदार वल्लभ भाई पटेल ने बड़ी समझदारी एवं सूझबूझ से इस समस्या को सुलझा दिया। 26 अक्टूबर, 1947 को कश्मीर के महाराजा हरि सिंह ने भारत में विलय के हस्ताक्षर–पत्र प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को सौंपे।
जवाहरलाल नेहरू ने शेख अब्दुल्लाह को प्रधानमंत्री नियुक्त करवाया तथा भारतीय सेना ने 27 अक्टूबर, 1947 से पाकिस्तान के कबाइली आक्राताओं को भगाना आरंभ किया। यथावत समझौता 29 नवंबर, 1947 को हैदराबाद रियासत एवं डोमिनियन ऑफ इंडिया के मध्य हस्ताक्षरित हुआ था। इस समझौते पर हैदराबाद राज्य के प्रधानमंत्री मीर लईक अली तथा डोमिनियन ऑफ इंडिया के गवर्नर जनरल लॉर्ड माउंटबेटन ने हस्ताक्षर किए |
भारत-विभाजन के दौरान पंजाब राज्य ने एक संयुक्त एवं स्वतंत्र अस्तित्व की योजना प्रस्तुत की, किंतु सरदार पटेल के प्रयासों से उसके मंसूबों पर पानी फिर गया। पूर्वी पंजाब, पटियाला तथा पहाड़ी रायों का एक संघ बनाया गया जिसे पेप्सू कहा गया।


द्वितीय विश्व युध्द

वर्ष 1939 में द्वितीय विश्व युद्ध प्रारंभ हुआ। कांग्रेस ने युद्ध में समर्थन के बदले भारत को स्वतंत्र राष्ट्र घोषित किए जाने का प्रस्ताव रखा। तत्कालीन वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो ने भारतीय विधानमंडलो की सहमति के बिना भारत को युद्ध में शामिल कर लिया, साथ ही देश में आपातकाल की घोषणा कर दी गई। कांग्रेस कार्यसमिति ने युद्ध के उद्देश्यों की घोषणा करने की मांग की तथा यह भी मांग की कि युद्ध के बाद भारत को स्वतंत्र कर दिया जाए।
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान कांग्रेस द्वारा स्वीकृत प्रस्ताव में पोलैंड पर नाजी हमले तथा नाजीवाद और फॉसीवाद की भर्त्सना की गई, लेकिन यह भी घोषित किया गया कि भारत किसी ऐसे युद्ध में शामिल नहीं हो सकता, जो प्रकटतः लोकतांत्रिक स्वाधीनता की रक्षा के लिए लड़ा जा रहा हो, जबकि खुद उसे स्वाधीनता से वंचित रखा जा रहा हो।
लार्ड लिनलिथगो ने 17 अक्टूबर, 1939 को भारत को जर्मनी के विरुद्ध युद्धग्रस्त घोषित कर दिया। भारतीय विधानमंडलों की सहमति के बिना युद्ध घोषित करने के कारण सभी प्रांतों में कांग्रेस मंत्रिमंडलों ने त्यागपत्र दे दिया।
द्वितीय विश्वयुद्ध 1 सितंबर, 1939 को जर्मनी के पोलैंड पर आक्रमण के साथ प्रारंभ हुआ था जो कि छः वर्षों बाद जापान के हिरोशिमा एवं नागासाकी पर अमेरिका द्वारा परमाणु बम गिराए जाने के बाद अगस्त, 1945 में समाप्त हुआ | विंस्टन चर्चिल द्वितीय विश्वयुद्ध (1939-1945) के दौरान ब्रिटेन के प्रधानमंत्री थे, इनका कार्यकाल 1940-1945 तक था।
लगभग 28 माह के कार्यकाल के बाद कांग्रेस मंत्रिमंडलों ने वर्ष 1939 में त्यागपत्र दे दिया था क्योंकि द्वीतीय विश्वयुध्द मे भारतीयों की सहमति के बगैर ब्रिटिश सरकार के द्वारा भारत को युध्दग्रस्त घोषित करते हुए शामिल कर दिया गया था।
विंस्टन चर्चिल द्वीतीय विश्व युध्द (1939-45) के दौरान ब्रिटेन के प्रधानमंत्री थे, इनका कार्यकाल वर्ष 1940-45 तक था।


पाकिस्तान की मांग

मुस्लिमों के लिए एक पृथक देश (Homeland) की प्रथम बार एक निश्चित अभिव्यक्ति वर्ष 1930 के मुस्लिम लीग के इलाहाबाद अधिवेशन के इकबाल के अध्यक्षीय भाषण में हुई थी। जबकि कैंब्रिज विश्वविद्यालय के एक छात्र चौधरी रहमत अली ने वर्ष 1933 में पाकिस्तान शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग –नाउ और नेवर, आर वी टू लिव ऑर पेरिस फॉरेवर? नाम से वितरित अपने पैंम्फलेट में किया था। ब्रिटिश भारत की पांच उत्तरी राजनीतिक इकाइयों के नामों के अंग्रेजी प्रथमाक्षरों को मिलाकर यह नाम बनाया गया था। यह इकाइयां थी  – पंजाब, नॉर्थ-वेस्ट फ्रंटियर प्रोविंस, कश्मीर, सिंध और ब्लूचिस्तान।
23 मार्च 1940 को मुस्लिम लीग अधिवेशन लाहौर में हुआ। इसकी अध्यक्षता मुहम्मद अली जिन्ना ने की। इस अधिवेशन में भारत से अलग एक मुस्लिम राष्ट्र पाकिस्तान की मांग की गई। जिन्ना ने अधिवेशन में भाषण देते हुए कहा कि वे एक अलग मुस्लिम राष्ट्र के अतिरिक्त और कुछ भी स्वीकार नहीं करेंगे। सरोजिनी नायडू ने मुहम्मद अली जिन्ना को हिंदू-मुस्लिम एकता का दूत कहा था। देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने अपनी पुस्तक डिस्कवरी ऑफ इंडिया के पृष्ठ 352 पर उल्लेख किया है कि मुहम्मद इकबाल ने उनसे मुलाकात के दौरान कहा था कि “आप (नेहरू) एक राष्ट्रभक्त हैं, जबकि जिन्ना एक राजनीतिज्ञ है।”
मार्च, 1940 में लाहौर में आयोजित मुस्लिम लीग के वार्षिक अधिवेशन में जिन्ना के द्विराष्ट्र सिद्धांत को मान्यता दी गई थी। इससे संबंधित प्रस्ताव का प्रारूप सिकंदर हयात खान ने तैयार किया था और उसे फजलुल हक ने 23 मार्च 1940 को प्रस्तुत किया था। इसी तिथि की स्मृति में 23 मार्च, 1943 को मुस्लिम लीग द्वारा पाकिस्तान दिवस मनाया गया |


भारतीय मुसलमानों के लिए पृथक राज्य पाकिस्तान शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के छात्र रहमत अली ने अपने पत्र, जिसका शीर्षक था नाउ ऑऱ नेवर में प्रस्तुत किया था।
प्रायः कवि और राजनैतिक चिंतक मुहम्मद इकबाल को मुसलमानों के लिए पृथक राष्ट्र के के विचार का प्रवर्तक माना जाता है। सर्व इस्लाम की भावना से प्रेरित होकर इकबाल ने वर्ष 1930 के अखिल भारतीय मुस्लिम लीग के इलाहाबाद अधिवेशन में कहा था – यदि यह सिध्दांत स्वीकार कर लिया जाता है कि भारतीय मुसलमान को अपने देश में अपनी संस्कृति और परंपराओं के पूर्ण और स्वतंत्र विकास का अधिकार है, तो मेरी इच्छा यह होगी कि पंजा, उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रांत, सिंध और बलूचिस्तान को मिलाकर एक पृथक राज्य बना दिया जाए। ब्रिटिश साम्राज्य के अंदर अथवा बाहर, एक उत्तर-पश्चिमी भारतीय मुस्लिम राज्य का गठन मुझे कम से कम उत्तर-पश्चिमी भारत में मुसलमानों का अंतिम लक्ष्य प्रतीत होता है।
वर्ष 1930 मे मुस्लिम लीग के इलाहाबाद अधिवेशन में अध्यक्षीय भाषण में मुहम्मद इकबाल ने सर्वप्रथम एक पृथक मुस्लिम राज्य का प्रस्ताव रखा था।
23 मार्च 1940 को मुस्लिम लीग के लाहौर अधिवेशन में प्रसिध्द पाकिस्तान प्रस्ताव पारित किया गया, जिसका आधार यह था कि ऐसा कोई संविधान मुसलमानों को स्वीकार्य नही होगा, जिसमें भारत के पूर्व और पश्चिम के मुस्लिम बहुल क्षेत्रों को एक स्वतंत्र और सार्वभौम राज्य के रुप में स्वीकार न किया गया हो।


व्यक्तिगत सत्याग्रह (1940)

अगस्त प्रस्ताव को पूरी तरह स्वीकार करते हुए कांग्रेस ने गांधी जी के नेतृत्व में व्यक्तिगत सत्याग्रह शुरू किया। यह सत्याग्रह ब्रिटिश सरकार की भारत नीति के प्रति नैतिक विरोध की प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति थी। व्यक्तिगत सत्याग्रह की शुरुआत 17 अक्टूबर, 1940 को हुई।
विनोबा भावे प्रथम सत्याग्रही थे तथा पंडित जवाहरलाल नेहरू दूसरे। सर्वोदय शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम महात्मा गांधी ने किया था। विनोबा भावे द्वारा गांधी जी के आदर्शों के प्रचार के लिए सर्वोदय समाज की स्थापना की गई थी |


क्रिप्स मिशन (1942)

द्वितीय विश्व युद्ध में जापान की बढ़ती हुई शक्ति को देखते हुए अंतरराष्ट्रीय समुदाय विशेषकर अमेरिका, चीन एवं ऑस्ट्रेलिया ने ब्रिटेन पर भारत को स्वतंत्र करने के लिए दबाव बढ़ाया जिसके फलस्वरूप स्टैफोर्ड क्रिप्स के नेतृत्व में मिशन भारतीय नेताओं से वार्ता हेतु मार्च, 1942 में भारत आया। इस मिशन ने एक प्रस्ताव प्रस्तुत किया जिसकी प्रमुख शर्तें इस प्रकार थी –
युद्ध के बाद भारत को डोमिनियन राज्य का दर्जा दिया जाएगा जो किसी बाहरी सत्ता के अधीन नहीं होगा।
भारतीयों को अपना संविधान निर्मित करने का अधिकार दिया जाएगा जिसके लिए युद्ध के बाद एक संविधान निर्मात्री परिषद बनेगी, जिसमें ब्रिटिश भारत के प्रांतों के निर्वाचित सदस्य और देसी रजवाड़ों के प्रतिनिधि शामिल होंगे।
ब्रिटिश भारत का कोई प्रांत यदि नए संविधान को स्वीकार न करना चाहे तो उसे वर्तमान संवैधानिक स्थिति बनाए रखने का अधिकार होगा। नए संविधान को न स्वीकार करने वाले प्रांतों को अपना अलग संविधान बनाने की आज्ञा होगी।
युद्ध के दौरान ब्रिटिश वायसराय की एक नई कार्यकारी परिषद का गठन किया जाएगा जिसमें भारतीय जनता के प्रमुख वर्गों के प्रतिनिधि शामिल होंगे। लेकिन रक्षा मंत्रालय ब्रिटिश नेतृत्व के पास होगा। महात्मा गांधी ने इसे उत्तर तिथीय चेक (Post-Dated Cheque) की संज्ञा दी। क्रिप्स मिशन के साथ कांग्रेस के अधिकारिक वार्ताकार पंडित जवाहरलाल नेहरू एवं मौलाना आजाद थे |


लॉर्ड लिनलिथगो ने गांधीजी के आंदोलनों को राजनैतिक फिरौती कहा। वायसराय और गवर्नर जनरल लॉर्ड लिनलिथगों का कार्यकाल भारत में सबसे लंबा था। इनका कार्यकाल भारत में वर्ष 1936 से 1944 तक रहा। भारत छोड़ो आंदोलन इन्हीं के कार्यकाल में महात्मा गांधी द्वारा चलाया गया।
द्वितीय विश्व युध्द मे भारत की भागीदारी और मदद मांगने के लिए मार्च, 1942 में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल की सरकार में मंत्री सर स्टैफोर्ड क्रिप्स ने नेतृत्व में क्रिप्स मिशन भारत आया था।
रंगून पर जापानी सेनाओं का अधिकार हो जाने पर अमेरिका के दबाव में ब्रिटिश सरकार ने ब्रिटिश मंत्रिमंडल के एक सदस्य सर स्टैफोर्ड क्रिप्स को भारत भेजने का निर्णय लिया ताकि भारतीय नेताओं के साथ बातचीत करके कोई समाधान ढंढ़ा जा सके। क्रिप्स भारत में तीन सप्ताह रहे (मार्च-अप्रैल, 1942) और भारतीय नेताओं के  साथ विचार-विमर्श करके उन्होने प्रारुप  घोषणा के रुप में अपने प्रस्तावों की घोषणा की।


भारत छोड़ो आंदोलन

वर्धा में 14 जुलाई 1942 में हुई कांग्रेस की समिति की बैठक में मौलाना अबुल कलाम आजाद, सरोजिनी नायडू, जवाहरलाल नेहरू, वल्लभभाई पटेल, डॉ राजेंद्र प्रसाद, सीतारमैया, जी. वी. पंत, प्रफुल्ल चंद्र घोष, सैयद महमूद अशरफ अली, जे. बी. कृपलानी, महात्मा गांधी इत्यादि ने भाग लिया तथा भारत छोड़ो नामक प्रस्ताव पास किया।
इसकी अध्यक्षता तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष अबुल कलाम आजाद ने ही की थी। 7 अगस्त, 1942 को मुंबई के ऐतिहासिक ग्वालिया टैंक में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की वार्षिक बैठक हुई जिसमें वर्धा प्रस्ताव (भारत छोड़ो) की पुष्टि हुई। थोड़े बहुत संशोधन के बाद 8 अगस्त, 1942 को प्रस्ताव स्वीकार कर लिया गया और भारत के स्वतंत्रता संघर्ष के तहत अंग्रेजों के विरुद्ध भारत छोड़ो आंदोलन प्रारंभ करने की घोषणा की गई।
भारत छोड़ो आंदोलन 1942 प्रारंभ करने के पूर्व दिन महात्मा गांधी ने निम्नलिखित बयान दिए थे –
सरकारी कर्मचारी नौकरी न छोड़ें लेकिन कांग्रेस के प्रति अपनी निष्ठा की घोषणा कर दे।
सैनिक अपने देशवासियों पर गोली चलाने से इनकार कर दें,
छात्र तभी पढ़ाई छोड़े जब आजादी प्राप्त हो जाने तक अपने इस निर्णय पर दृढ़ रह सके,
राजा-महाराजा भारतीय जनता की प्रभुसत्ता स्वीकार करें और उनकी रियासतों में रहने वाली जनता अपने को भारतीय राष्ट्र का अंग घोषित कर दे तथा राजाओं का नेतृत्व भी मंजूर करें जब वे अपना भविष्य जनता के साथ जोड़ ले।
इसमें गांधी जी द्वारा दिया गया यह वक्तव्य विशेष महत्वपूर्ण है, “संपूर्ण आज़ादी से कम किसी भी चीज से मैं संतुष्ट होने वाला नहीं, हो सकता है नमक टैक्स, शराबखोरी आदि को खत्म करने का प्रस्ताव अंग्रेज सरकार दें किंतु मेरे शब्द होंगे आजादी से कम कुछ भी नहीं। मैं आपको एक मंत्र देता हूं – करो या मरो। इस मंत्र का आशय है “या तो हम भारत को आजाद कराएंगे या आजादी के प्रयास में दिवंगत होंगे।”
8 अगस्त 1942 को अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की बैठक में पंडित जवाहरलाल नेहरू द्वारा “भारत छोड़ो प्रस्ताव” पेश किया गया था जिसका सरदार वल्लभ भाई पटेल ने समर्थन किया था। इस प्रस्ताव का आलेख स्वयं महात्मा गांधी ने नेहरू और आजाद के सहयोग से बनाया था। हिंदू महासभा, कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया, यूनियनिस्ट पार्टी ऑफ पंजाब एवं मुस्लिम लीग ने भारत छोड़ो आंदोलन का समर्थन नहीं किया था।
9 अगस्त, 1942 को भारत छोड़ो आंदोलन आरंभ हुआ। आंदोलन आरंभ होते ही ऑपरेशन जीरो ऑवर के तहत गांधी जी तथा अन्य चोटी के कांग्रेस नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। गांधी जी को गिरफ्तार कर सरोजिनी नायडू सहित पूना के आगा खां पैलेस में रखा गया और कांग्रेस कार्य समिति के सदस्यों (नेहरू, अबुल कलाम आजाद, गोविंद बल्लभ पंत, डॉ प्रफुल्ल चंद्र घोष, डॉक्टर पट्टाभि सीतारमैया, डॉ सैयद महमूद, आचार्य कृपलानी) को अहमदनगर किले में रखा गया।
कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्य राजेंद्र प्रसाद मुंबई नहीं आए थे। अतः उन्हें पटना में ही गिरफ्तार कर पटना (बांकीपुर) जेल में नजरबंद रखा गया। शिव कुमार और रामानंद को हजारीबाग में गिरफ्तार किया गया। 1942 के आंदोलन का सर्वाधिक प्रभाव मुंबई, बंगाल, बिहार, उड़ीसा, यू.पी. एवं मद्रास में था लेकिन समूचे देश की हिस्सेदारी इसमें अवश्य थी। आंदोलन के पूर्व ही अधिकांश शीर्ष नेताओं की गिरफ्तारी के कारण यह आंदोलन एक प्रकार का स्वतः स्फूर्त आंदोलन बन गया।
भारत छोड़ो आंदोलन (1942) के समय भारत का प्रधान सेनापति लॉर्ड वेवेल थे जो कि बाद में वर्ष 1943 से 1947 तक भारत के वायसराय और गवर्नर जनरल भी रहे। इस आंदोलन के समय इंग्लैंड के प्रधानमंत्री चर्चिल थे। कांग्रेस द्वारा भारत छोड़ो आंदोलन का प्रस्ताव पारित करते समय कांग्रेस अध्यक्ष मौलाना अबुल कलाम आजाद थे।
उल्लेखनीय है कि वे वर्ष 1940 के रामगढ़ अधिवेशन में कांग्रेस अध्यक्ष बने थे तथा वर्ष 1941-45 के मध्य 5 वर्षों तक कांग्रेस का कोई वार्षिक अधिवेशन न हो सका, इन 6 वर्षों में अबुल कलाम आजाद कांग्रेस के अध्यक्ष बने रहे। वे स्वतंत्रता पूर्व भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सबसे लंबे समय तक और सबसे नाजुक दौर में अध्यक्ष रहे। भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान बंबई के विभिन्न भागों से कांग्रेस का गुप्त रेडियो प्रसारित किया जाता था, जिसे मद्रास तक सुना जा सकता था। राम मनोहर लोहिया नियमित रूप से इस रेडियो पर प्रसारण करते थे।
उषा मेहता कांग्रेस के भूमिगत रेडियो का संचालन करने वाले छोटे से दल की एक महत्वपूर्ण सदस्या थी। महात्मा गांधी के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान अमेरिकी पत्रकार लुई फिशर (महात्मा गांधी के जीवनीकार) उनके साथ थे। अमेरिकी बुद्धिजीवी पर्लबक, एडगरस्नो, एम. एल. सुर्मेन, नॉर्मन थॉमस के साथ लुई फिशर ने भारतीय स्वतंत्रता की मांग की थी। भारत छोड़ो आंदोलन (1942) से उत्पन्न दंगे बिहार और यूपी (संयुक्त प्रांत) में सबसे अधिक व्यापक रहे। यहां विद्रोह जैसा माहौल बन गया। पूर्वी यूपी में आजमगढ़, बलिया और गोरखपुर तथा बिहार में गया, भागलपुर, सारन, पूर्णिया, शाहबाद, मुजफ्फरपुर और चंपारन स्वतः स्फूर्ति जन विद्रोह के मुख्य केंद्र रहे।
1942 का अगस्त आंदोलन किसानों के बीच काफी व्यापक हो गया था। किसानों के अंशकालिक जत्थे दिन में खेती करते और रात को तोड़-फोड़ की कार्यवाही में भाग लेते थे। उनकी उग्रता की प्रबलता इस कदर थी कि कई अर्थों में 1857 का स्मरण कराती थी। इसीलिए तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री चर्चिल को भेजे गए एक तार में तत्कालीन वायसराय लिनलिथगो द्वारा इस आंदोलन को 1857 के बाद का सबसे गंभीर विद्रोह कहना पड़ा।
भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान जयप्रकाश नारायण ने हजारीबाग के सेंट्रल जेल से फरार होकर भूमिगत गतिविधियों को संगठित किया था। योगेंद्र शुक्ल, जयप्रकाश नारायण के साथ ही 9 नवंबर, 1942 को हजारीबाग जेल से भागे, किंतु मुजफ्फरपुर में गिरफ्तार कर लिए गए तथा पटना लाए गए। भारत
छोड़ो आंदोलन (1942) के दौरान मुंबई के कांग्रेस सम्मेलन को संबोधित करते हुए गांधी जी ने जो भाषण दिया था उसके बारे में पट्टाभि सीतारमैया ने लिखा है कि “वास्तव में गांधी जी उस दिन अवतार एवं पैगंबर की प्रेरक शक्ति से प्रेरित होकर भाषण दे रहे थे।”
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन से पृथक रहा। वर्ष 1940 से लेकर विदेशी सत्ता के 1947 में समाप्त होने तक किसी भी राष्ट्रीय आंदोलन में संघ की कोई भूमिका नहीं थी। अरुणा आसफ अली प्रसिद्ध भारतीय स्वतंत्रता सेनानी थी। उन्हें वर्ष 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान मुंबई के ग्वालिया टैंक मैदान में कांग्रेस का झंडा फहराने के लिए हमेशा याद किया जाता है।
अरुणा आसफ अली, उषा मेहता, जयप्रकाश नारायण, राम मनोहर लोहिया आदि ने कांग्रेस के सभी बड़े नेताओं की गिरफ्तारी के बाद भूमिगत रहकर 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन का नेतृत्व किया था। भारत छोड़ो आंदोलन की एक महत्वपूर्ण विशेषता थी – देश के कई स्थानों पर समानांतर सरकार की स्थापना।
1942 के दौरान देश में तीन प्रमुख स्थानों
बलिया – अगस्त 1942 चित्तू पांडेय के नेतृत्व में
तामलुक (मिदनापुर) बंगाल-दिसंबर, 1942 से सितंबर 1944 तक यहां की जातीय सरकार ने तूफान पीड़ितों की सहायता के लिए कार्यक्रम प्रारंभ किया और
सतारा (महाराष्ट्र) 1943- के मध्य से 1945 तक सबसे लंबे समय तक चलने वाली सरकार थी। यहां पर प्रति सरकार के नाम से समानांतर सरकार स्थापित की गई, इसके प्रमुख नेता वाई.वी. चाह्वाण एवं नाना पाटिल थे। इसके अतिरिक्त उड़ीसा के तलचर में भी कुछ समय तक समानांतर सरकार रही थी। बीमारी के आधार पर गांधीजी को 6 मई, 1944 को रिहा कर दिया गया। विंस्टन चर्चिल ने गांधीजी के रिहाई के संबंध में कहा है कि – “जब हम हर जगह जीत रहे हैं, ऐसे वक्त में हम एक कमबख्त बुड्ढे के सामने कैसे झुक सकते हैं, जो हमेशा हमारा दुश्मन रहा है।”




14 जुलाई, 1942 को कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक वर्धा में संपन्न हुई। यही पर कांग्रेस कार्यसमिति द्वारा अंग्रेजों भारत छोड़ो प्रस्ताव पारित किया गया।
भारत छोड़ो आंदोलन (1942) के समय भारत का प्रधान सेनापति लॉर्ड वैवेल थे जो कि बाद में वर्ष 1943 से 1947 तक भारत के वायसराय और गवर्नर-जनरल भी रहे।
1942 का भारत छोड़ो आंदोलन निश्चयतः अहिंसक नही था। सरकारी आकलनों के अनुसार, इस आंदोलन के पहले हफ्ते ही 250 रेलवे स्टेशन या तो नष्ट कर दिए गए या क्षतिग्रस्त हुए और 500 से ज्यादा डाकघरों तथा 150 थानों पर हमला हुआ। सत्ता पक्ष से तो दमन के लिए भारी हिंसा हुई ही थी। महात्मा गांधी ने स्वयं 1942 में जनता द्वारा की गई हिंसा की निंदा करने से इंकार कर दिय था। उनका कहना था कि यह सत्ता की बड़ी हिंसा का जवाब था। आंदोलन के पूर्व ही अधिकांश शीर्ष नेताओं की गिरफ्तारी के कारण यह आंदोलन एक प्रकार का स्वतः स्फूर्त आंदोलन बन गया।
भारत छोड़ो आंदोलन के समय बंबई के विभिनन्न भागों से कांग्रेस का गुप्त रेडियो प्रसारित किया जाता था, जिसे मद्रास तक सुना जा सकता था। राम मनोहर लोहिया नियमित रुप से इस रेडियो का संचालन करने वाले छोटे से दल की एक महत्वपूर्ण सदस्या थी।
आगा खाँ पैलेस में कैद के समय महात्मा गांधी के स्वास्थ्य में आमरण अनशन के कारण तेजी से गिरावट आ रही थी। चिकित्सकों के परामर्श पर भारत मे ब्रिटिश सरकार द्वारा विचार किया गया कि अगर गांधी जी मर जाते हैं, तो बंबई सरकार, प्रांतीय सरकारों के पास रूबिकॉन कूट शब्द भेज देगी।
अखिल भारतीय मुस्लिम लीग तथा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के बीच संवैधानिक गतिरोध को दूर करने के लिए सी. राजगोपालाचारी ने 1944 में दी वे आउट नामक अपना प्रपत्र जारी किया था। जिसका कांग्रेस की ओर से विरोध किया गया था। गांधीजी ने जिन्ना से अपनी बातचीत में इस प्रस्ताव की चर्चा की थी जिसे जिन्ना ने अस्वीकार कर दिया था।


सुभाष चन्द्र बोस और आजाद हिंद फौज

नेताजी सुभाष चंद्र बोस का जन्म 23 जनवरी 1897 को उड़ीसा के कटक में हुआ था। उन्होंने वर्ष 1919 में कलकत्ता विश्वविद्यालय से स्नातक की उपाधि प्राप्त की और वर्ष 1920 में वह भारतीय नागरिक सेवा (आईसीएस) में उत्तीर्ण हुए।
वर्ष 1938 एवं 1939 में कांग्रेस के अध्यक्ष बने, वर्ष 1939 में कांग्रेस की अध्यक्षता से त्यागपत्र देकर फॉरवर्ड ब्लॉक की स्थापना की तथा वर्ष 1942 में जर्मनी भाग गए। उन्होंने वर्ष 1943 में आजाद हिंद फौज की कमान संभाली। प्रायः उन्हें नेताजी के नाम से स्मरण किया जाता है। सुभाष चंद्र बोस को वर्ष 1938 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अध्यक्ष बनने के बाद गुरुदेव रविंद्र नाथ टैगोर द्वारा शांतिनिकेतन में देश नायक की उपाधि से सम्मानित किया गया था। महात्मा गांधी ने उन्हें देशभक्तों का देशभक्त कहा था।
सुभाष चंद्र बोस 3 अप्रैल, 1941 को जर्मनी पहुंचे। 6 माह बाद जर्मन विदेश मंत्रालय की सहायता से उन्होंने “द फ्री इंडिया सेंटर” का गठन किया जहां से वे आजादी के पक्ष में पर्चे छपवाते थे तथा भाषण देते थे। वर्ष 1941 के अंत तक जर्मन तानाशाह एडोल्फ हिटलर ने निर्वासित आजाद हिंद सरकार को मान्यता दे दी और सुभाष चंद्र बोस को आजादी की लड़ाई हेतु सेना गठित करने की सहमति प्रदान कर दी।
वर्ष 1942 में सुभाष चंद्र बोस ने उत्तरी अफ्रीका के रोमेल से पकड़े गए भारतीय युद्धबंदियों को भर्ती कर 10 हजार सैनिकों का दल गठित किया। इसे ही द फ्री इंडियन लीजन कहा गया। आजाद हिंद फौज की स्थापना मूलतः कैप्टन मोहन सिंह ने की थी। वे ब्रिटेन की भारतीय सेना में अफसर थे। जब ब्रिटिश सेना पीछे हट रही थी, तो मोहन सिंह जापानियों के साथ हो गए थे। जापानियों ने जब भारतीय सैनिकों को मोहन सिंह को सुपुर्द कर दिया, तो वे उन लोगों को आजाद हिंद फौज में भर्ती करने लगे।
दिसंबर 1941 में उतरी मलय के जंगलों में कैप्टन मोहन सिंह के नेतृत्व वाली 1/14 पंजाब रेजीमेंट की टुकड़ी जापानी सेना से पराजित हुई। इस टुकड़ी के अंग्रेज लेफ्टिनेंट कर्नल एल.वी. फिट्जपैट्रिक जापान के युध्दबंदी हुए किंतु बैंकॉक निवासी भारतीय सिख ज्ञानी प्रीतम सिंह के जिम्मेदारी लेने पर कैप्टन मोहन सिंह एवं अन्य भारतीय सैनिकों को युद्ध बंदी के बजाय जापान के मित्र का दर्जा दिया गया |
जापान के मेजर आईवाची फूजीवारा एवं ज्ञानी प्रीतम सिंह ने ही कैप्टन मोहन सिंह को इंडियन नेशनल आर्मी का नेतृत्व करने के लिए उत्साहित किया। दिसंबर 1941 के अंत में कैप्टन मोहन सिंह इसके लिए सहमत हो गए। फरवरी/मार्च, 1942 में मोहन सिंह के नेतृत्व में इंडियन नेशनल आर्मी का गठन किया गया जिसमें जापान के मलय अभियान के तहत पराजित ब्रिटिश सेना के भारतीय सैनिकों को शामिल किया गया था। स्पष्ट है कि आई.एन.ए. का विचार सूत्र ज्ञानी प्रीतम सिंह एवं फुजीवारा ने दिया, जबकि कैप्टन मोहन सिंह ने उसे प्रथम नेतृत्व प्रदान करने का साहसिक कार्य किया।
आजाद हिंद फौज की पहली डिवीजन का औपचारिक गठन 1 सितंबर, 1942 को हुआ और कैप्टन मोहन सिंह इसके प्रथम सेनापति बने। 4 जुलाई, 1943 को रास बिहारी बोस ने आजाद हिंद फौज की कमान सुभाष चंद्र बोस को सौंप दी। 21 अक्टूबर, 1943 को सुभाष चंद्र बोस ने सिंगापुर में स्वतंत्र भारत की अस्थायी सरकार (आजाद हिंद सरकार) का गठन किया। आजाद हिंद फौज का गठन 4 जुलाई, 1943 को सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व में किया गया था। फौज का गठन सिंगापुर द्वीप पर किया गया था किंतु तब सिंगापुर दीप ब्रिटिश मलय का अंग था। ब्रिटिश मलय में शामिल 3 भाग थे – 
फेडरेटेड मलय
अनफेडरेटेड मलय
स्ट्रेट्स सेटेलमेंट। तृतीय यानी स्ट्रेट्स सेटलमेंट के अंतर्गत 4 अलग-अलग क्षेत्रों को जोड़ा गया था। जो इस प्रकार हैं –
मलक्का – वर्तमान में मलेशिया का एक राज्य है।
डिडिंग – वर्तमान में मलेशिया के पेराक राज्य का एक जिला है।
पेनांग – वर्तमान में मलेशिया का एक राज्य है।
सिंगापुर – अगस्त, 1963 में स्वतंत्रता की घोषणा की, 16 सितंबर, 1963 को मलेशिया का अंग बना, 9 अगस्त, 1965 को मलेशिया की संसद के एक प्रस्ताव द्वारा मलेशिया संघ से अलग कर दिया गया। इसी दिन से स्वतंत्र देश बना। स्पष्ट है कि जब सिंगापुर में आजाद हिंद फौज का गठन हुआ तब वह मलाया का हिस्सा था।
सिंगापुर (तत्कालीन मलय) में अपने सैनिकों का आह्वान करते हुए सुभाष चन्द्र बोस ने कहा था – बहुत त्याग किया है, किंतु अभी प्राणों की आहुति देना शेष है, आजादी को आज हमें अपने शीश फल चढ़ा देने वाले पागल पुजारी की आवश्यकता है, जो अपना सिर काटकर स्वाधीनता की देवी को भेंट चढ़ा सके, “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा।”  जय हिंद का नारा सुभाष चन्द्र बोस ने दिया था, यह आजाद हिंद फौज में नमस्कार का ढंग था तथा आज यह हमारे सारे देश का नारा हो गया है। आजाद हिंद फौज दिवस 12 नवंबर, 1945 को मनाया गया था जबकि 5 नवंबर से 11 नवंबर, 1945 तक आजाद हिंद फौज के सिपाहियों आर. के. सहगल, शाह नवाज तथा गुरुबख्श हिंद फौज के सैनिकों एवं अधिकारियों को गिरफ्तार कर ब्रिटिश सरकार ने नवंबर, 1945 में दिल्ली के लाल किले में उन पर मुकदमा चलाया। इसमें तीन अभियुक्तों प्रेम सहगल, गुरुबख्श सिंह एवं शाहनवाज को फांसी की सजा तथा राशिद अली की 7 वर्ष के कारावास का दंड दिया गया। इनके बचाव के लिए कांग्रेस ने आजाद हिंद फौज बचाव समिति का गठन किया जिसमें भूलाभाई देसाई के नेतृत्व में तेज बहादुर सप्रू, कैलाश नाथ काटजू, अरुणा आसफ अली और जवाहरलाल नेहरु प्रमुख वकील थे। सरकार के निर्णय के विरुध्द पूरे देश में तेज प्रतिक्रिया हुई अंत में विवश होकर वायसराय लॉर्ड वेवेल ने अपने विशेषाधिकार का प्रयोग करते हुए मृत्युदंड की सजा को माफ कर दिया। पं. जवाहरलाल नेहरु ने भारत के नाजीवाद, फॉसीवाद तथा साम्राज्यवाद विरोधी निश्चित रुख के कारण जापान के विरुध्द  गुरिल्ला युध्द की अपनी योजना के पक्ष में इलाहाबाद में हुई कांग्रेस कार्यकारिणी समिति की बैठक में बहुमत प्राप्त किया।



भूलाभाई देसाई, डॉ. कैलाश नाथ काटजू तथा पंडित जवाहरलाल नेहरु वर्ष 1945 में आजाद हिंद फौज के लाले किले में चले दिल्ली के मुकदमें की पैरवी में शामिल थे, जबकि सरदार वल्लभभाई पटेल इसमें शामिन नही थे।
पं. जवाहर लाल नेहरु ने भारत के नाजीवाद, फॉसीवाद तथा साम्राज्यवाद विरोधी निश्चित रुख के कारण जापान के विरुध्द गुरिल्ला युध्द की अपनी योजना के पक्ष मे इलाहाबाद में हुई कांग्रेस कार्यकारिणी समिति की बैठक में बहुमत प्राप्त किया।
अबुल कलाम आजाद वर्ष 1940 से 1945 तक कांग्रेस अध्यक्ष रहे। उन्होने क्रिप्स मिशन (1942) तथा लॉर्ड वेवेल (1945 मे) दोनों से वार्ताएँ की।
सुभाष चन्द्र बोस के राजनीतिक गुरु देशबंधु चितरंजन दास थे।
वर्ष 1945 मे लाल किले में आजाद हिंद फौज के सिपाहियों के प्रसिध्द मुकदमें की पैरवी कैलाश नाथ काटजू, सर तेज बहादुर सप्रू, जवाहरलाल नेहरु, भूलाभाई देसाई आदि कर रहे थे। वकीलों के इस समूह की अध्यक्षता भूलाभाई देसाई ने की थी।


कैबिनेट मिशन योजना (1946)

ब्रिटेन में 26 जुलाई, 1945 को इटली के नेतृत्व में ब्रिटिश मंत्रिमंडल ने सत्ता ग्रहण की। नौसेना विद्रोह के एक दिन बाद 1 फरवरी, 1946 को (द्वितीय विश्व युद्ध के बाद) भारत सचिव लॉर्ड पैथिक लोरेंस ने भारत में संवैधानिक सुधारों के लिए एक शिष्टमंडल भेजने का निर्णय लिया। कैबिनेट मिशन 2 अप्रैल, 1946 को दिल्ली आया। इसके अध्यक्ष भारत मंत्री लॉर्ड पैथिक लोरेंस थे तथा अन्य दो सदस्य स्टैफोर्ड क्रिप्स (अध्यक्ष बोर्ड ऑफ ट्रेड) तथा ए.वी. एलेक्जेंडर (नौसेना मंत्री) थे। कैबिनेट मिशन ने त्रिस्तरीय शासन व्यवस्था को सुझाया। प्रांतों के छोटे अथवा बड़े गुट बनाने के अधिकार की पुष्टि की तथा प्रांतों को अ, ब और स तीन श्रेणियों में विभक्त किया।
16 मई, 1946 को कैबिनेट मिशन ने अपने प्रस्तावों की घोषणा की, इसके प्रमुख प्रस्ताव थे –
भारत की एकता बनाए रखी जाए
मुस्लिम लीग की पाकिस्तान की मांग ठुकरा दी गई
भारत एक संघ होगा जिसमें ब्रिटिश प्रांत तथा देशी रियासतें शामिल होंगी।
संविधान निर्मात्री संस्था या संविधान सभा का गठन प्रांतीय विधान सभाओ तथा देशी रियासतों के प्रतिनिधि द्वारा किया जाए।
कैबिनेट मिशन, 1946 ने वायसराय की एक्जीक्यूटिव काउंसिल का पुनर्गठन कर अंतरिम सरकार के गठन का सुझाव दिया, जिसमें वॉर मेंबर सहित सभी विभाग भारतीय सदस्यों द्वारा धारण किए जाने थे। कैबिनेट मिशन योजना के पक्ष में गांधीजी पूरी तरह से थे। इस योजना के संदर्भ में गांधीजी ने कहा – “यह योजना उस समय की परिस्थितियों के परिप्रेक्ष्य में सबसे उत्कृष्ट योजना थी, जिसमें ऐसे  बीज थे, जिनसे दुःख की मारी भूमि यातना से मुक्त हो सकती थी। मौलाना अबुल कलाम आजाद कैबिनेट मिशन के भारत आगमन के समय भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष (1940-1945 तक) थे।
कैबिनेट मिशन, 1946 ने वायसराय की एग्जीक्यूटिव काउंसिल का पुनर्गठन कर अंतरिम सरकार के गठन का सुझाव दिया, जिसमें वॉर मेंबर सहित सभी विभाग भारतीय सदस्यों द्वारा धारण किए जाने थे।
कैबिनेट मिशन योजना के पक्ष मे गांधीजी पूरी तरह से थे। इस योजना के संदर्भ में गांधीजी ने कहा – यह योजना उस समय की परिस्थितियों के परिप्रेक्ष्य मे सबसे उत्कृष्ट योजना थी, जिसमें ऐसे बीज थे, जिनसे दुःख की मारी भारत भूमि यातना से मुक्त हो सकती थी।
मौलाना अबुल कलाम आजाद कैबिनेट मिशन के भारत आगमन के समय भारतीय कांग्रेस के अध्यक्ष थे। श्री आजाद को मिशन के साथ विचार-विमर्श करने हेतु कार्यसमिति ने पूर्ण अधिकार दे रखा था। 6 अप्रैल, 1946 को उन्होने सर्वप्रथम कैबिनेट मिशन के सदस्यों से मुलाकात की।


संविधान सभा (1946)

संविधान सभा के सिद्धांत के सर्वप्रथम दर्शन 1895 ई. के स्वराज्य विधेयक में होता है, जिसे तिलक के निर्देशन में तैयार किया गया था। 20वीं सदी में इस विचार की ओर सर्वप्रथम संकेत महात्मा गांधी ने किया जब उन्होंने, वर्ष 1922 में अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि “भारतीय संविधान भारतीयों की इच्छानुसार ही होगा।” वर्ष 1924 में मोतीलाल नेहरू ने ब्रिटिश सरकार के सम्मुख संविधान सभा के निर्माण की मांग प्रस्तुत की। इसके बाद औपचारिक रूप से संविधान सभा के विचार से प्रतिपादन एम.एन. राय ने किया और इस विचार को मूर्त रूप देने का कार्य पंडित जवाहरलाल नेहरू ने किया। इसके बाद दिसंबर, 1936 के कांग्रेस के फैजपुर अधिवेशन में संविधान सभा के अर्थ तथा महत्व की व्याख्या की गई।
कैबिनेट मिशन प्लान के अंतर्गत संविधान सभा का गठन किया गया था। भारत में कैबिनेट मिशन 2 अप्रैल, 1946 को नई दिल्ली आया। मिशन की घोषणा के समय इसके अध्यक्ष सर पैथिक लॉरेंस ने यह स्पष्ट किया था कि इस मिशन का उद्देश्य स्वतंत्र भारत का संविधान तैयार करने के लिए शीघ्र ही एक कार्य प्रणाली तैयार करना तथा अंतरिम सरकार के लिए आवश्यक प्रबंध करना था। कैबिनेट मिशन योजना के तहत यह व्यवस्था थी कि संविधान सभा के निर्माण के लिए प्रत्येक प्रांत को 10 लाख लोगों के लिए प्रतिनिधि के अनुपात में जनसंख्या के सांप्रदायिक आधार पर स्थान दिए जाएंगे। मतदाताओं के केवल 3 वर्ग माने गए – आम, मुस्लिम एवं सिक्ख (केवल पंजाब में) कैबिनेट मिशन योजना के अनुसार जुलाई, 1946 में संविधान सभा के चुनाव हुए। संविधान सभा के प्रांतों के लिए 296 सदस्यों के लिए ही यह चुनाव हुए।
कांग्रेस के 208, मुस्लिम लीग 73 तथा 15 अन्य दलों के स्वतंत्र उम्मीदवार निर्वाचित हुए। मुहम्मद अली जिन्ना संविधान सभा के सदस्य नहीं थे। संविधान सभा का प्रथम अधिवेशन 9 दिसंबर 1946 को हुआ। इसके अस्थाई अध्यक्ष डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा थे। 11 दिसंबर, 1946 को संविधान सभा की दूसरी बैठक दिल्ली में हुई जब डॉ. राजेंद्र प्रसाद को स्थायी अध्यक्ष निर्वाचित किया गया। भारत के संविधान को 26 नवंबर 1949 को अंगीकृत किया गया था अपने गठन के समय संविधान सभा संप्रभु नही थी।
14 अगस्त 1947 को संविधान सभा भारतीय अधिराज्य के लिए संप्रभु संविधान सभा घोषित की गई। उस दिन चूंकि इसके अध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद थे। ब्रिटिश युग की केंद्रीय लेजिस्लेटिव असेंबली तथा स्वतंत्र भारत की संसद में अध्यक्ष का पद जी.वी. मावलंकर ने संभाला। ब्रिटिश युग में मावलंकर वर्ष 1946 से 14 अगस्त 1947 तक केंद्रीय लेजिस्लेटिव असेंबली अध्यक्ष रहे एवं भारत के स्वतंत्र होने के बाद लोकसभा के प्रथम अध्यक्ष के रूप में वर्ष 1952 से 1956 तक रहे। वे वर्ष 1937-1946 के दौरान बंबई प्रांत की लाजिस्लेटिव असेंबली के भी अध्यक्ष रहे थे|


अपने गठन के समय संविधान सभा संप्रभु नही थी। 14 अगस्त, 1947 को संविधान सभा भारतीय अधिराज्य के लिए संप्रभु संविधान सभा घोषित की गई। उस दिन चूंकि इसके अध्यक्ष राजेन्द्र प्रसाद थे।
संविधान सभा की बैठक 9 दिसंबर, 1946 को दिल्ली में आरंभ हुई। दो दिन पश्चात 11 दिसंबर को सभा ने डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद को अपना स्थायी अध्यक्ष चुन लिया।
डॉ. राजेन्द्र प्रसाद संविधान सभा के अध्यक्ष थे।
कैबिनेट मिशन प्लान के अंतर्गत संविधान सभा का गठन किया गया था। भारत में कैबिनेट मिशन 24 मार्च, 1946 को नई दिल्ली आया। इसमें ब्रिटिश कैबिनेट के तीन मंत्री लॉर्ड पैथिक लॉरेंस, लॉर्ड ए.वी. एलेक्जेंडर एवं सर स्टैफोर्ड क्रिप्स सम्मिलित थे। मिशन की घोषणा के समय इसके अध्यक्ष सर पैथिक लॉरेस ने यह स्पष्ट किया था कि इस मिशन का उद्देश्य स्वतंत्र भारत का संविधान तैयार करने के लिए शीघ्र ही एक कार्यप्रणाली तैयार करना तथा अंतरिम सरकार के लिए आवश्यक प्रबंध करना था। मिशन के प्रस्तावों के अनुसार संविधान सभा का गठन प्रांतीय विधान सभाओं तथा देशी रियासतों के प्रतिनिधियों के द्वारा किया जाना था।


अंतरिम सरकार का गठन (1946)

कांग्रेस द्वारा वायसराय के नवीनतम प्रस्तावों को स्वीकार कर लेने के बाद 1 अगस्त 1946 को लॉर्ड वेवेल ने कांग्रेस अध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू को अंतरिम सरकार के गठन के लिए निमंत्रण दिया। 24 अगस्त 1946 को पंडित नेहरू के नेतृत्व में भारत की पहली अंतरिम राष्ट्रीय सरकार की घोषणा तथा 2 सितंबर, 1946 को इसका गठन हुआ, जिसमें प्रारंभ में मुस्लिम लीग की भागीदारी नहीं थी।
डॉ राजेंद्र प्रसाद वर्ष 1946 में बनी भारत की अंतरिम सरकार में खाद्य एवं कृषि मंत्री थे। इस सरकार में रक्षा विभाग बलदेव सिंह के पास था, जबकि विदेश मामले तथा राष्ट्रमंडल संबंध का विभाग जवाहरलाल नेहरू के पास था। वर्ष 1946 के अंतरिम सरकार में आसफ अली को रेल और परिवहन विभाग सौंपा गया था। वर्ष 1946 में लॉर्ड वेवेल के बहुत कहने सुनने पर अंतरिम सरकार में शामिल होने के लिए राजी हो गये। अक्टूबर में लीग के पांच सदस्य सरकार में शामिल हो गए। लियाकत अली को वित्त मंत्री बनाया गया, जिन्होंने नया बजट प्रस्तुत करते समय उद्योगपतियों और व्यापारियों पर अत्यधिक कर लगाए।
2 सितंबर, 1946 को गठित अंतरिम सरकार में अबुल कलाम आजाद मंत्री नहीं थे। इस सरकार में शामिल होने वाले 12 कांग्रेसी मंत्री थे –
पंडित जवाहरलाल नेहरू
सरदार वल्लभ भाई पटेल
डॉ राजेंद्र प्रसाद
अरुणा आसफ अली
सी. राजगोपालाचारी
शरत चंद्र बोस
डॉ जॉन मथाई
सरदार बलदेव सिंह
सर शफात अहमद खां
जगजीवन राम
सैयद अली जहीर और
सी. एच. भाभा।
हालांकि 2 सितंबर 1946 को गठित अंतरिम सरकार में लियाकत अली प्रारंभ में शामिल नहीं थे, लियाकत अली सहित लीग के 5 सदस्यों को 26 अक्टूबर, 1946 को सरकार में मंत्री बनाया गया जिसके कारण तीन कांग्रेसी सदस्यों सैयद अली जहीर, शरत चंद्र बोस तथा सर सफात अहमद खां को हटना पड़ा।
बंगाल में ए. के. फजलुल हक के नेतृत्व में कृषक प्रजा पार्टी तथा मुस्लिम लीग की गठबंधन सरकार वर्ष 1946 के चुनाव में सत्ता में आई किंतु बाद में मुस्लिम लीग का मंत्रिमंडल गठित हुआ, जो 14 अगस्त 1947 तक सत्ता में रहा। इसके प्रधानमंत्री एच.एस. सुहरावर्दी थे।
16 अगस्त, 1946 की तिथि मुस्लिम लीग द्वारा “सीधी कार्यवाही दिवस” हेतु सुनिश्चित की गई थी। वायसराय के अंतरिम सरकार के फैसले को नामंजूर करते हुए मुस्लिम लीग ने स्वतंत्र एवं संपूर्ण प्रभुता संपन्न पाकिस्तान राज्य की स्थापना की मांग की। उक्त तिथि को दंगे फैलाना एवं आतंक का माहौल बना कर यह प्रदर्शित करना था कि हिंदू और मुसलमान एक साथ नहीं रह सकते। इस कार्यवाही में नोआखाली दंगे का प्रमुख केंद्र रहा |


भारत का विभाजन एवं स्वतंत्रता

भारत की स्वतंत्रता के समय क्लीमेंट आर. एटली ब्रिटिश प्रधानमंत्री थे। उनका कार्यकाल 1945-1951 था। इस दौरान ब्रिटेन में लेबर पार्टी सत्ता में थी। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री एटली ने 20 फरवरी 1947 को हाउस ऑफ कॉमंस में यह घोषणा की थी कि अंग्रेज जून, 1948 के पहले ही उत्तरदायी लोगों को सत्ता हस्तांतरित करने के उपरांत भारत छोड़ देंगे। उन्होंने ही कहा था – ब्रिटिश सरकार भारत के विभाजन के लिए उत्तरदायी नहीं है।
एटली ने वेवेल के स्थान पर लॉर्ड माउंटबेटन को वायसराय नियुक्त किया। जिन्होंने 22 मार्च 1947 को भारत आकर शीघ्र ही सत्ता हस्तांतरण के लिए पहल शुरू कर दी। उन्हें सत्ता के हस्तांतरण के साथ यथासंभव भारत को संयुक्त रखने की विशेष हिदायत दी गई थी तथापि उन्हें इस बात के लिए भी अधिकृत किया गया था कि वे भारत की परिवर्तित परिस्थितियों के अनुरूप निर्णय ले सकते हैं ताकि ब्रिटेन सम्मानजनक रूप से न्यूनतम हानि के साथ भारत से हट सके। माउंटबेटन शीघ्र ही सत्ता हस्तांतरण संबंधी वार्ताओं के दौरान इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि भारत का बंटवारा तथा पाकिस्तान की स्थापना आवश्यक हो गई है।
उन्होंने एटली के वक्तव्य के दायरे में भारत विभाजन की एक योजना तैयार की जिसे माउंटबेटन योजना के नाम से जाना जाता है। माउंटबेटन योजना (3 जून, 1947)  के अनुरूप ब्रिटिश संसद द्वारा 18 जुलाई 1947 को भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम (द इंडियन इंडिपेंडेंस एक्ट) पारित किया गया जिसमें भारत और पाकिस्तान नामक दो डोमिनियनों की स्थापना के लिए 15 अगस्त, 1947 की तिथि निश्चित की गई। भारतीय स्वतंत्रता विधेयक 4 जुलाई 1947 को ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लीमेंट एटली द्वारा हाउस ऑफ कॉमंस में पेश किया गया था। 15 जुलाई 1947 को हाउस ऑफ कॉमंस द्वारा तथा इसके अगले दिन हाउस ऑफ लॉर्ड्स द्वारा इस विधेयक को पारित कर दिया गया। तत्पश्चात इस विधेयक को राजकीय स्वीकृति 18 जुलाई 1947 को प्राप्त हुई थी।
24 मार्च और 6 मई, 1947 के बीच भारतीय नेताओं के साथ 133 साक्षात्कारों की तीव्र श्रृंखला के बाद माउंटबेटन ने तय किया कि कैबिनेट मिशन की रूपरेखा अव्यावहारिक हो चुकी है। तब उन्होंने एक वैकल्पिक योजना बनाई, जिसे बाल्कन प्लान का गुप्त नाम दिया गया। ब्रिटिश भारत के वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन द्वारा भारत और पाकिस्तान के बीच पंजाब और बंगाल में सीमाओं का निर्धारण के लिए 30 जून, 1947 को पंजाब सीमा आयोग और बंगाल सीमा आयोग नाम से दो आयोग गठित किए गए।
साइरिल रैडक्लिफ को इन दोनों ही आयोगो का अध्यक्ष बनाया गया। इन आयोगों का कार्य पंजाब और बंगाल के मुस्लिम और गैर मुस्लिम आबादी के आधार पर दो भागों में बांटने हेतु सीमा निर्धारण करना था। इस कार्य में इन्हें और भी कारको का ध्यान रखना था। प्रत्येक आयोग में 4 सदस्य थे जिनमें से दो भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के और दो मुस्लिम लीग से थे।
गांधी जी की प्रथम मुलाकात माउंटबेटन से 31 मार्च 1947 को हुई। गांधी जी का यह सुझाव था कि अंतरिम सरकार पूर्ण रूप से लीग के नेता जिन्ना के हाथों सौंप दी जाए, जिससे भारत में सांप्रदायिक दंगों को रोका जा सके। परंतु गांधी जी का यह सुझाव कांग्रेस नेताओं तथा वर्किंग कमेटी का मान्य नहीं था। बंटवारे के विरोध में गांधी जी ने कहा था कि – अगर कांग्रेस बंटवारा करेगी तो उसे मेरी लाश के ऊपर करना पड़ेगा। जब तक मैं जिंदा हूं भारत के बंटवारे के लिए कभी राजी नहीं होऊंगा और अगर मेरा वश चला तो कांग्रेस को भी इसे मंजूर करने की इजाजत नहीं दूंगा।
14 जून 1947 को जिस समय कांग्रेस महासमिति ने दिल्ली में भारत के विभाजन का प्रस्ताव स्वीकार किया उस समय कांग्रेस के अध्यक्ष आचार्य जे बी कृपलानी थे। इस प्रस्ताव को गोविंद बल्लभ पंत ने प्रस्तुत किया था तथा मौलाना अबुल कलाम आजाद ने इसका समर्थन किया। नवंबर 1947 में जेबी कृपलानी ने कांग्रेस की अध्यक्षता से त्यागपत्र दे दिया। कृपलानी जी के त्यागपत्र के बाद डाक्टर राजेंद्र प्रसाद कांग्रेस के अध्यक्ष बने थे।
वर्ष 1948 में कांग्रेस के जयपुर अधिवेशन में पट्टाभि सीतारमैया कांग्रेस के अगले अध्यक्ष बने। वर्ष 1950 में कांग्रेस के नासिकग अधिवेशन में पुरुषोत्तम दास टंडन कांग्रेस के नए अध्यक्ष बने। इसके बाद वर्ष 1951 से 1954 तक कांग्रेस के अध्यक्ष पंडित जवाहरलाल नेहरू रहे और प्रधानमंत्री तथा पार्टी का नेतृत्व एक ही व्यक्ति द्वारा किए जाने की परंपरा प्रारंभ हुई। 14 जून 1947 को संपन्न अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की बैठक में भारत विभाजन के विपक्ष में खान अब्दुल गफ्फार खाँ (सीमांत गांधी) ने मतदान किया था।
डॉक्टर सैफुद्दीन किचलू ने वर्ष 1947 में कांग्रेस कमेटी को बैठक द्वारा विभाजन के प्रस्ताव के पारित होने को राष्ट्रवाद का संप्रदायवाद के पक्ष में समर्पण पर के रूप में लिया। पंजाब प्रांतीय कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष डॉ किचलू विभाजन के प्रबल विरोधी थे। भारत की स्वतंत्रता के बाद इन्होंने स्वयं को कांग्रेस पार्टी से पृथक कर लिया और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़ गए।
14/15 अगस्त, 1947 की मध्यरात्रि को अंतरिम संसद के रूप में संविधान सभा ने सत्ता ग्रहण की। नियत दिन से और जब तक दोनों डोमिनियनों की संविधान सभाएं नए संविधान की रचना न कर ले और उनके डोमिनियन के केन्द्रीय विधानमंडल के रुप में कार्य करना था। 14 अगस्त की मध्य रात्रि को भारतीय संघ की संविधान की बैठक हुई। स्वतंत्रता के अवसर पर संविधान सभा के सदस्यों के मध्य जवाहरलाल नेहरु प्रभावशाली भाषण दिया।
15 अगस्त, 1947 की मध्यरात्रि केन्द्रीय असेम्बली में जन-गण-मन तथा इकबाल का गीत सारे जहां से अच्छा हिंन्दोस्तां हमारा एम. एस. सुब्बालक्ष्मी ने गाया था। पहले अवसर पर पंडित जवाहरलाल नेहरू की भारत के प्रधानमंत्री पद पर नियुक्ति तत्कालीन गवर्नर जनरल लॉर्ड माउंटबेटन ने की थी। स्वतंत्र भारत के प्रथम गवर्नर जनरल लॉर्ड माउंटबेटन (1947-48) और प्रथम भारतीय गवर्नर जनरल चक्रवर्ती राजगोपालाचारी (1948-50) थे। सी. राजगोपालाचारी वर्ष 1948-1950 के दौरान स्वतंत्र भारत के प्रथम भारतीय और अंतिम गवर्नर जनरल थे। इस पद पर वे 26 जनवरी, 1950 तक रहे।
वर्ष 1952-1954 तक वे मद्रास के मुख्यमंत्री रहे। वर्ष 1959 में विभिन्न मुद्दों पर कांग्रेसी नेताओं से मतभेद के कारण उन्होने कांग्रेस छोड़कर स्वतंत्र पार्टी का गठन किया। स्वतंत्र भारत के प्रथम विधि मंत्री बी. आर. अंबेडकर थे। स्वतंत्रता के समय महात्मा गांधी की सलाह पर उन्हें केंद्रीय विधि मंत्री का पद संभालने का न्योता दिया गया था। इस भूमिका में उन्होंने संविधान के प्रारूप समिति के अध्यक्ष के रूप में काम किया।
भारतीय राष्ट्रीय नेता 26 जनवरी (1930 में घोषित स्वतंत्रता दिवस का दिन) की तिथि को यादगार बनाना चाहते थे। इसी कारण नवंबर 1949 में ही संविधान के तैयार हो जाने के बाद भी इसे 26 जनवरी 1950 को पूर्णतः लागू करने का निर्णय लिया गया तथा 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस के रूप में घोषित किया गया। आर. कोपलैंड अपने स्पष्ट शब्दों में लिखा था – ׅ“भारतीय राष्ट्रवाद तो अंग्रेजी राज की ही संतति थी।” परंतु कोपलैंड महोदय यह कहना भूल गए कि भारतीय राष्ट्रवाद एक अनैच्छिक संतति थी, जिसे इन्होंने जन्म के समय दूध पिलाने से इंकार कर दिया और फिर उसका गला घोंटने का प्रयत्न किया। ब्रिटिश राज्य में भारत के एकीकरण पर के.एम. मणिक्कर ने कहा था “ब्रिटिश शासन की सबसे अधिक महत्वपूर्ण उपलब्धि भारत का एकीकरण था।”
माउंटबेटन योजना (3 जून, 1947) के अनुरुप ब्रिटिश संसद द्वारा 18 जुलाई, 1947 को भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम (द इंडियन इंडिपेंडेंस एक्ट) पारित किया गया जिसमें भारत और पाकिस्तान नामक दो डोमिनियनों की स्थापना के लिए 15 अगस्त, 1947 की तिथि निश्चित की गई।
रेडक्लिफ रेखा 17 अगस्त, 1947 को भारत विभाजन के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच सीमा बन गई। सर सिरिल रेडक्लिफ की अध्यक्षता में सीमा आयोग द्वारा रेखा का निर्धारण किया गया, जो 88 करोड़ लोगो के बीच 175000 वर्ग मील (450000 वर्ग किमी) क्षेत्र को न्यायोचित रुप से विभाजित करने के लिए अधिकृत थे।
3 जून, 1947 की विभाजन योजना की पुष्टि के लिए अखिल भारतीय कांग्रेस समिति की 14 जून, 1947 को हुई बैठक में गोबिंद बल्लभ पंत ने भारत विभाजन का प्रस्ताव प्रस्तुत किया और मौलाना अबुल कलाम आजाद ने उसका समर्थन किया था।
15 अगस्त, 1947 की मध्य रात्रि केन्द्रीय असेम्बली में जन-गण-मन तथा इकबाल का गीत सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा एम.एस. सुब्बालक्ष्मी ने गाया था।
पहले अवसर पर पं. जवाहर लाल नेहरु की भारत के प्रधानमंत्री पद पर नियुक्ति तत्कालीन गवर्नर जनरल लार्ड माउंटबेटन ने की थी।
स्वतंत्र भारत के प्रथम गवर्नर जनरल लॉर्ड माउंटबेटन (1947-48) और प्रथम भारतीय गवर्नर जनरल चक्रवर्ती राजगोपालाचारी (1948-50) थे।
भारत के अंतिम ब्रिटिश वायसराय एवं गवर्नर जनरल लॉर्ड माउंटबेटन (1947-48) थे। जिन्होने मार्च, 1947 में कार्यभार संभाला और 3 जून, 1947 को भारत विभाजन की योजना प्रस्तुत की।
स्वतंत्र भारत के प्रथम विधि मंत्री बी.आर. अंबेडकर थे। स्वतंत्रता के समय महात्मा गांधी की सलाह पर उन्हें केन्द्रीय विधि मंत्री का पद संभालने का न्यौता दिया गया था। इस भूमिका में उन्होने संविधान की प्रारुप समिति के अध्यक्षता के रुप में काम किया।
राजेन्द्र प्रसाद भारत के पहले (1950 से 1962), एस. राधाकृष्णन दूसरे (1962 से 1967), जाकिर हुसैन तीसरे (1967 से 1969) तथा वी.वी. गिरि चौथे (1969 से 1974) राष्ट्रपति थे।
भारत के विभाजन के समय जे.बी. कृपलानी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष थे। ये 23 नवंबर, 1946 के मेरठ अधिवेशन में अध्यक्ष बने और नवंबर, 1947 तक अध्यक्ष रहे।
ब्रिटिश राज मे भारत के एकीकरण पर के.एम. पणिक्कर ने कहा था – ब्रिटिश शासन की सबसे अधिक महत्वपूर्ण उपलब्धि भारत का एकीकरण था।
भारत 15 अगस्त, 1947 को आजाद हुआ। उस समय ब्रिटेन का राजा जॉर्ज षष्ठम् था। जॉर्ज षष्ठम् को दिसंबर, 1936 में ब्रिटेन का सम्राट घोषित किया गया और वह मई, 1937 में गद्दी पर बैठा।


भारत का संवैधानिक विकास

ब्रिटिश सरकार ने कंपनी में व्याप्त भ्रष्टाचार एवं प्रशासन को दूर करने के लिए 1773 ई. का रेग्युलेटिंग एक्ट पारित किया। इसके तहत मद्रास एवं बंबई प्रेसिडेंसियों को कोलकाता प्रेसिडेंसी के अधीन कर दिया गया। बंगाल के गवर्नर को अब अंग्रेजी क्षेत्रों का गवर्नर जनरल कहा गया। बंगाल का प्रथम गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्स को बनाया गया।
रेग्युलेटिंग एक्ट का उद्देश्य भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी की गतिविधियों को भी सरकार की निगरानी में लाना था। रेग्युलेटिंग एक्ट 1773 के द्वारा सर्वप्रथम कलकत्ता मे एक सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना की गई, इसमें एक मुख्य न्यायाधीश तथा 3 अन्य न्यायाधीशों की व्यवस्था की गई। इस सर्वोच्च न्यायालय को सामान्य न्यायालय एवं देश विधि के न्यायालय नौसेना विधि के न्यायालय तथा धार्मिक न्यायालय के रूप में कार्य करना था। यह उच्चतम न्यायालय 1774 में गठित किया गया और एलिजा इम्पे इसके मुख्य न्यायाधीश तथा चेंबर्ज, लिमेस्टर एवं हाइड अन्य न्यायाधीश नियुक्त हुए।
1786 में एक अधिनियम ब्रिटिश संसद के सम्मुख इस भावना से रखा गया ताकि कार्नवालिस को भारत के गवर्नर जनरल का पद स्वीकार करने के लिए मना लिया जाए। वह गवर्नर जनरल तथा मुख्य सेनापति दोनों की शक्तियां लेना चाहता था। नए अधिनियम के अनुसार यह सब स्वीकार हो गया तथा उसे विशेष अवस्था में अपनी परिषद के निर्णयों को रद्द करने तथा अपने निर्णयों को लागू करने का अधिकार भी दे दिया गया। कार्नवालिस जिला कलेक्टरों को अधिक शक्तिशाली नहीं बनने देना चाहता था, अतः उसने शक्ति के पृथक्करण सिद्धांत को अपनाया।
ईस्ट इंडिया कंपनी के भारतीय व्यापार के अधिकार को (चाय एवं चीन के साथ व्यापार के अतिरिक्त) 1813 चार्टर एक्ट द्वारा समाप्त किया गया था। इसके द्वारा कंपनी को अगले 20 वर्षों के लिए भारतीय प्रदेशों तथा राजस्व पर नियंत्रण का अधिकार दे दिया गया। भारत में शिक्षा पर एक लाख रुपये वार्षिक खर्च करने का प्रावधान किया गया।
चार्टर एक्ट 1833 द्वारा कंपनी के सभी वाणिज्यिक अधिकार समाप्त कर दिए गए तथा उसे भविष्य में केवल राजनैतिक कार्य ही करने थे। इस अधिनियम द्वारा बंगाल का गवर्नर जनरल अब समूचे भारत का गवर्नर जनरल बन गया। इस अधिनियम द्वारा कानून बनाने के लिए गवर्नर जनरल की परिषद में एक कानूनी सदस्य चौथे सदस्य के रूप में सम्मिलित किया गया | वह सदस्य भारतीय नही बल्कि अंग्रेज होना था। सर्वप्रथम मैकाले को विधि सदस्य के रूप में परिषद में शामिल किया गया।
1853 के चार्टर एक्ट में यह व्यवस्था की गई कि नियंत्रण बोर्ड और उसके अन्य पदाधिकारियों का वेतन सरकार निश्चित करेगी, परंतु धन कंपनी देगी। डायरेक्टरों की संख्या 24 से घटाकर 18 कर दी गई, उसमें छह क्रॉउन द्वारा मनोनीत किए जाने थे। इसमें प्रावधानित था कि नियुक्तियां अब प्रतियोगी परीक्षाओं द्वारा की जाएंगी जिसमें किसी प्रकार का भेदभाव नहीं किया जाएगा।
1858 के भारत सरकार अधिनियम (गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट 1858) द्वारा भारतीय प्रशासन का नियंत्रण कंपनी से छीन कर राजमुकुट को सौंप दिया गया। अब बोर्ड ऑफ डायरेक्टर और बोर्ड ऑफ कंट्रोल के समस्त अधिकार भारत सचिव को सौंप दिए गए। इंडियन काउंसिल एक्ट, 1861 के द्वारा गवर्नर जनरल को अध्यादेश जारी करने की शक्ति प्रदान कर दी गई। ये अध्यादेश अधिकाधिक 6 माह तक लागू रह सकते थे। 1861 के भारतीय परिषद अधिनियम द्वारा वायसराय की परिषद को कानून बनाने की शक्ति प्रदान की गई,  जिसके तहत लॉर्ड कैनिंग ने विभागीय प्रणाली की शुरुआत की।
लार्ड कैनिंग ने भिन्न-भिन्न सदस्यों को अलग-अलग विभाग सौंप कर एक प्रकार से मंत्रिमडलीय व्यवस्था की नींव डाली। इस व्यवस्था के अनुसार प्रशासन का प्रत्येक विभाग एक व्यक्ति के अधीन होता था। भारतीय परिषद अधिनियम, 1861 के द्वारा कानून बनाने के लिए, वायसराय की कार्यकारी परिषद में न्यूनतम 6 और अधिकतम 12 अतिरिक्त सदस्यों की नियुक्ति से उसका विस्तार किया गया। इन्हें वायसराय मनोनीत करेगा और वे दो वर्ष तक अपने पद पर बने रहेंगे।
इनमें से न्यूनतम आधे सदस्यों गैर-सरकारी होंगे। इस अधिनियम के अनुसार बंबई तथा मद्रास प्रांतो को अपने लिए कानून बनाने तथा उनमें संशोधन करने का अधिकार पुनः दे दिया गया। तथापि, इन प्रांतीय परिषदों द्वारा बनाएं गए कोई भी कानून उस समय तक वैध नही माने जाएंगे जब तक कि गवर्नर-जनरल की अनुमति न प्राप्त कर ले।
बाम्बे, मद्रास और कलकत्ता उच्च न्यायालयों की स्थापना ब्रिटिश संसद द्वारा पारित 1861 ई. के भारतीय उच्च न्यायलय अधिनियम के तहत 1862 ई. में की गई थी। भारतीय परिषद अधिनियम, 1892 के अनुसार विधान मंडलों के सदस्यों के अधिकार दो क्षेत्रों में बढ़ा दिए गए –
बजट पर उन्हें अपने विचार प्रकट करने का अधिकार दिया गया यद्यपि इस विषय पर कोई प्रस्ताव रखने अथवा सदन में मत विभाजन कराने का अधिकार उन्हें नही था।
सार्वजनिक हित के मामलों में 6 दिन की सूचना देकर प्रश्न पूछने का भी अधिकार दिया गया।
भारत में ब्रिटेन के सभी संवैधानिक प्रयोगों में सबसे कम समय तक 1989 का इंडियन काउंसिल एक्ट चला। रैम्जे मैक्डोनाल्ड के शब्दों में ये सुधार प्रजातंत्रवाद और नौकरशाही के मध्य एक अधूरा और अल्पकालीन समझौता था। मांटेग्यू, चेम्सफोर्ड ने 1918 मे प्रस्तुत अपनी रिपोर्ट में अनुशंसा की थी कि प्रशासन में भारतीयों की भागीदारी बढ़ानी चाहिए।
रिपोर्ट में यह भी अनुशंसा की गई थी कि सिविल सेवा परीक्षा इंग्लैंड एवं भारत मे एक साथ आयोजित की जानी चाहिए तथा उच्च भारतीय सिविल सेवा के एक तिहाई पद भारतीयों के लिए आरक्षित होने चाहिए। मांटेग्यू चेम्सफोर्ड की संस्तुति के आधार पर ही 1922 से सिविल सेवा परीक्षा  इंग्लैंड एवं भारत में एक साथ आयोजित की जाने लगी।
एचिसन आयोग ने 1887 में प्रस्तुत अपनी रिपोर्ट में  यह अनुशंसा की थी कि सिविल सेवा परीक्षा इंग्लैंड एवं भारत मे एक साथ नही आयोजित की  जानी चाहिए। 20 अगस्त, 1917 के सुधारों की घोषणा को तात्कालीन भारत सचिव एडविन मांटेग्यू के नाम  पर मांटेग्यू घोषणा के नाम से जाना जाता है। तत्कालीन भारत सचिव एडविन  मांटेग्यू और वायसराय लॉर्ड चेम्सफोर्ड की रिपोर्ट भारतीय परिषद अधिनियम, 1919 का आधार बनी थी।
भारत में प्रांतो मे द्वैध शासन का प्रारंभ मांट-फोर्ड (मांटेग्यू-चेम्सफोर्ड) सुधारों 1919 से प्रारंभ किया गया, जिसे भारत सरकार अधिनियम 1919 भी कहा जाता है। इस अधिनियम ने पहली बार उत्तरदायी शासन शब्दों का स्पष्ट प्रयोग किया था। इस अधिनियम के तहत प्रांतो में विषयों को आरक्षित एवं हस्तांतरित दो भागों में बांटा गया। इनमें हस्तांतरित विषयों का प्रशासन विधायिका के चयनित सदस्यों को सौंपा गया जबकि आरक्षित विषय गवर्नर की कार्यकारिणी के पास ही रहे।
1926 में भारत मे एक लोक सेवा आयोग का गठन किया गय़ा। 1935 के अधिनियम के तहत लोक सेवा आयोग के स्थान पर संघीय लोक सेवा आयोग का गठन हुआ। 1937 से संघीय लोक सेवा आयोग ने ब्रिटिश लोक सेवा आयोग से स्वतंत्र परीक्षा आयोजित करना प्रारंभ किया। 1950 मे संविधान के लागू होने के बाद संघीय लोक सेवा आयोग (FPSC) का नाम बदलकर संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) कर दिया गया।
1935 के अधिनियम द्वारा सर्वप्रथम भारत में संघात्मक सरकार की स्थापना की गई। इस संघ को ब्रिटिश भारतीय प्रांतों तथा कुछ भारतीय रियासतें, जो संघ में शामिल होना चाहती थी, को मिलाकर बनाया गया था। इस अधिनियम के द्वारा प्रांतों में द्वैध शासन समाप्त कर, प्रांतों को स्वायत्तता प्रदान की गई एवं केंद्र में द्वैध शासन लागू किया गया। 1935 के भारत सरकार अधिनियम द्वारा प्रांतों को दोहरे शासन के स्थान पर स्वशासन मिल गया तथा आरक्षित एवं हस्तांतरित विषयों में भेद समाप्त हो गया।
गवर्नरों को आरक्षित तथा बचाव की संज्ञा के अधीन व्यक्तिगत निर्णय तथा विवेकाधीन शक्तियों का प्रयोग करने का अधिकार दिया गया, साथ ही गवर्नर को अध्यादेश जारी करने का अधिकार दे दिया गया। इस अधिनियम द्वारा सांप्रदायिक तथा वर्गीय मतदाता मंडलों का विस्तार हुआ और अनुसूचित जातियां, मुसलमान, सिक्ख, यूरोपीय, भारतीय ईसाई, एंग्लो-इंडियन तथा भारतीय मुसलमान आदि को पृथक-पृथक प्रतिनिधित्व मिला। भारत का वर्तमान संवैधानिक ढांचा बहुत कुछ 1935 के अधिनियम पर आधारित है।
1935 के मुख्य उपबंध इस प्रकार हैं –
संघात्मक सरकार की स्थापना
केन्द्र में द्वैध शासन की स्थापना
प्रांतो मे द्वैध शासन के स्थान पर स्वायत्त शासन की स्थापना
द्विसदनीय केन्द्रीय विधान मंडल
प्रांतीय शासन व्यवस्था
प्रांतीय विधान मंडल
केन्द्र एवं प्रांतो मे शक्तियों का विभाजन
फेडरल न्यायालय की स्थापना आदि।
1935 के अधिनियम के बारे में जवाहरलाल नेहरु ने कहा था – एक कार जिसमें ब्रेक तो है पर इंजन नही। वे 1947 से 1964 तक भारत के प्रधानमंत्री रहे। वे पंचशील के प्रणेता तथा गुट-निरपेक्षता में विश्वास रखने वाले थे। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने अपने लखनऊ अधिवेशन, 1936 में भारत सरकार अधिनियम, 1935 को अस्वीकार किया था। इस अधिवेशन की अध्यक्षता जवाहरलाल नेहरु ने की थी।
पंडित जवाहरलाल नेहरु ने भारत सरकार अधिनियम, 1935 को गुलामी का अधिकार या दासता का आज्ञा-पत्र बताते हुए उसकी कटु आलोचना की। ब्रिटिश शासन के पूरे इतिहास में 1935 का अधिनियम सबसे लंबा-चौड़ा प्रलेख था। इसमें 14 भाग, 321 धाराएं और 10 अनुसूचियां थी। भारत सरकार अधिनियम, 1935 में अंतर्विष्ट अनुदेश-पत्र को वर्ष 1950 मे भारत के संविधान में राज्य की नीति के निदेशक तत्व के रुप में समाविष्ट किया गया है। आलोचकों ने इसे केवल पवित्र लोकोक्तियाँ कहा है।


कॉर्नवालिस, जिला कलेक्टरों को अधिक शक्तिशाली नही बनने देना चाहता था, अतः उसने शक्ति के पृथक्करण सिध्दांत को अपनाया।
इंडियन काउंसिल एक्ट, 1861 के द्वारा गवर्नर जनरल को अध्यादेश जारी करने की शक्ति प्रदान की गई। ये अध्यादेश अधिकाधिक 6 माह तक लागू रह सकते थे।
बॉम्बे, मद्रास और कलकत्ता उच्च न्यायालयों की स्थापना ब्रिटिश संसद द्वारा पारित 1861 ई. के उच्च न्यायालय के तहत 1862 ई. में की गई थी।
1892 के अधिनियम द्वारा अंग्रेजों ने भारत में सर्वप्रथम परोक्ष निर्वाचन प्रणाली की शुरुआत की।
20 अगस्त, 1917 के सुधारों की घोषणा को तत्कालीन भारत सचिव एडविन मांटेग्यू के नाम पर मांटेग्यू घोषणा के नाम से जाना जाता है।
तत्कालीन भारत सचिव एडविन मांटेग्यू और वायसराय लॉर्ड चेम्सफोर्ड की रिपोर्ट भारतीय परिषद अधिनियम, 1919 का आधार बनी थी।
पंडित जवाहरलाल नेहरु ने भारत सरकार अधिनियम, 1935 को गुलामी का अधिकार या दासता का आज्ञापत्र बताते हुए उसकी कठोर आलोचना की। ब्रिटिश शासन के पूरे इतिहास में 1935 का अधिनियम सबसे लंबा-चौड़ा प्रलेख था। इसमें 14 भाग, 321 धाराएं और 10 अनुसूचियाँ थी।


आधुनिक इतिहासः विविध

19वीं शताब्दी में रूस देश का भारत की और विस्तार का डर एंग्लो-अफगान संबंधों का आधार था। तुरकोमनचाई की संधि (1828) के पश्चात रूस के बढ़ते प्रभाव से अंग्रेज घबरा गए। इंग्लैंड में विशेषज्ञों ने भारत संकट में है का नारा लगाया। मिस्टर मैकनील जो फारस में अंग्रेजी राजदूत थे उन्होंने 1836 में लिखा था कि कैस्पियन सागर पर स्थित रूसी रेजीमेंट सेंट पीटर्सबर्ग से अधिक दूर है और लाहौर से कम लगभग 1000 मील दोनों ओर।
अब एक वैज्ञानिक सीमा की खोज आरंभ हुई। उत्तर-पश्चिमी दर्रे भारत के प्रवेश द्वार की चाबी थे। यह सोचा गया कि अफगानिस्तान को एक मित्र या समर्थक शासक के अधीन होना चाहिए। यही एंग्लो-अफगान संबंधों का आधार बना। 19वीं शताब्दी में उड़ीसा अकाल 1866-1867 ने भीषण रूप धारण किया। 1865 में सूखा पड़ा और 1866 में उड़ीसा, मद्रास, उत्तरी बंगाल और बिहार में अकाल पड़ा।
अकाल की भीषणता उड़ीसा में अधिक थी, पहली बार इतने व्यापक स्तर पर जन क्षति हुई। अनुमान है कि लगभग 13 लाख तो उड़ीसा में ही मृत्युग्रस्त हो गए। इस अकाल को प्रकोप का समुद्र (सी ऑफ कैलेमिटी) कहा गया। उड़ीसा अकाल भारतीय अकालों के इतिहास में निर्णायक सिद्ध हुआ क्योंकि इसके पश्चात सर जॉर्ज कैम्बेल की अध्यक्षता में एक समिति नियुक्त की गई।
पिंडारियों का दमन लॉर्ड हेस्टिंग्स ने किया। वस्तुतः पिंडारियों का पहला उल्लेख मुगलों के महाराष्ट्र पर 1689 के आक्रमण के समय आता है। बाजीराव प्रथम के काल में ये अवैतनिक रूप से मराठों की ओर से लड़ते थे और केवल लूट में भाग लेते थे। 19वीं शताब्दी के आरंभिक वर्षों में पिंडारियों के तीन प्रमुख नेता थे- चीतू, वासिल मोहम्मद तथा करीम खां।
7 जुलाई 1896 को बंबई के वाटसन होटल में दि मार्बल ऑफ दि सेंचुरी के नाम से ल्युमिएरे बंधुओं (फ्रांस) द्वारा भारत में पहला सिनेमा शो आयोजित हुआ था। गांधी एवं तिलक दोनों ने ही भारत का व्यापक दौरा कर सामाजिक उत्थान का कार्य किया। तिलक प्रथम राष्ट्रवादी नेता थे जिन्होंने जनता से निकट संबंध स्थापित करने का प्रयत्न किया और इस दृष्टि से वह महात्मा गांधी के अग्रगामी थे। जी.वी. मावलंकर जो 1946 में सेंट्रल लेजिसलेटिव असेंबली के अध्यक्ष बने थे, ऐसे प्रथम अध्यक्ष जिन्होंने औपचारिक विग त्याग कर गांधी टोपी पहनकर सदन की अध्यक्षता की थी।
इस संदर्भ में अंग्रेजों द्वारा प्रश्न पूछे जाने पर उन्होंने कहा था आपकी विग इस गर्म जलवायु के अनुकूल नहीं है। वे लोक सभा के प्रथम अध्यक्ष भी बने | प्रख्यात संविधानविद डॉक्टर भीमराव अंबेडकर का जन्म 1891 ईसवी में मध्यप्रदेश के महू में हुआ था। उनकी मृत्यु 6 दिसंबर 1956 को हुई। मरणोपरांत उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया गया।
गुरुदेव की संज्ञा प्रसिद्ध साहित्यकार एवं नोबेल पुरस्कार विजेता रवींद्रनाथ टैगोर को प्रदान की जाती है। रवींद्र नाथ टैगोर का जन्म कोलकाता नगर में 7 मई, 1861 को श्री देवेंद्र नाथ टैगोर और शारदा देवी के 14वें बालक के रूप में हुआ था।
1901 में उन्होंने शांति निकेतन में एक विद्यालय प्रारंभ किया जो, 1918 में विश्व भारती नाम से विश्वविख्यात विश्वविद्यालय में परिवर्तित हो गया। 1913 में उनके गीतों की पुस्तिका गीतांजलि को साहित्य के रूप के लिए नोबेल पुरस्कार से पुरस्कृत किया गया। गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर को महान प्रहरी महात्मा गांधी ने कहा था। गांधी जी का मानना था कि वह भारत के स्वतंत्रता संघर्ष के पीछे नैतिक बल प्रदान करते थे।
जय जवान, जय किसान का प्रसिध्द नारा भारत के भूतपूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने दिया था। भारत छोड़ो आंदोलन जो कि 9 अगस्त 1942 को प्रारंभ हुआ था, के समय गांधी ने कहा था आजादी हमारी पहुंच के अंतर्गत है हमें इसे कस कर पकड़ना चाहिए। पंडित जवाहरलाल नेहरू ने स्वतंत्रता के पश्चात यह कहा था कि प्रत्येक वस्तु प्रतीक्षा कर सकती है, परंतु कृषि नही। जवाहरलाल नेहरू के जीवनीकार फ्रैंक मोरेस हैं।
लॉर्ड माउंटबेटन (1947-1948) ने भारत विभाजन के लिए मोहम्मद अली जिन्ना को उत्तरदायी ठहराया था। अगस्त, 1923 में संपन्न बनारस हिंदू महासभा के अधिवेशन की अध्यक्षता पंडित मदन मोहन मालवीय द्वारा की गई थी। इसमें लगभग 1500 प्रतिनिधियों ने भाग लिया जिसमें सनातनी हिंदू जैन बौद्ध पारसी भी सम्मिलित थे। ब्रिटिश भारत के भूतपूर्व उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रांत के पेशावर जिले (अब पाकिस्तान) में एक गांव में जन्मे अब्दुल गफ्फार खां सामान्यतया सीमांत गांधी (फ्रंटियर गांधी) बादशाह खाँ,  फख्र-ए-अफगान आदि नामों से जाने जाते हैं। इन्हें 1987 में भारत रत्न की उपाधि से सम्मानित किया गया था। डॉक्टर पट्टाभि सीतारमैया प्रमुख राष्ट्रवादी तथा  भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सरकारी इतिहासकार थे। वह व्यवसाय से चिकित्सक थे। 1939 में वे सुभाष चंद्र बोस से कांग्रेस अध्यक्ष पद का चुनाव हार गए थे।
1929 ई. के मध्य भारत सरकार ने भारतीय श्रम पर एक राजकीय आयोग की नियुक्ति की घोषणा की। जे.एच. ह्वीटली इसके अध्यक्ष हुए। इस आयोग का उद्देश्य भारत में औद्योगिक कार्यशालाओं और बागानों में श्रम की वर्तमान परिस्थितियों, कार्यकर्ताओं के स्वास्थ्य, क्षमता एवं जीवन की स्थिति तथा नियुक्तिकारियों और नियुक्तियों के बीच संबंध पर सिफारिशें करना था। बंगाल दुर्भिक्ष का वर्ष 1943 है।
इस दुर्भिक्ष में बंगाल में एक अनुमान के अनुसार 5 मिलियन से 4 मिलियन लोग मारे गए थे। शीतयुध्द काल में विश्व स्तर पर शांति और पारस्परिक सहयोग की स्थापना करने के लिए भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू द्वारा गुटनिरपेक्षता का सिद्धांत प्रस्तुत किया गया | नेहरू तथा भारत की नीति मुख्य रूप से यह रही कि शांति निःशस्त्रीकरण तथा जातीय समानता का पक्ष लिया जाए तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सहयोग दिया जाए ताकि अंतरराष्ट्रीय झगड़े शांतिपूर्वक सुलझाए जा सके।
ध्यातव्य है कि भारत के प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू, मिस्र के राष्ट्रपति कर्नल नासिर तथा युगोस्लाविया के राष्ट्रपति मार्शल टीटो के सहयोग से विश्व की तीसरी शक्ति के रूप में युगोस्लाविया की राजधानी में गुटनिरपेक्ष आंदोलन का गठन किया गया। गुटनिरपेक्ष देशों का प्रथम शिखर सम्मेलन सितंबर 1961 में बेलग्रेड में आयोजित किया गया।
15 अगस्त 1947 के बाद भारत का गोवा भाग पुर्तगाल के अधीन बना रहा। अमेरिका ने 1955 में पुर्तगाल के दावे का समर्थन किया कि गोवा पुर्तगाल का ही एक प्रदेश है। उसने भारत की तब आलोचना की जब चौदह वर्षों तक धैर्य रखने के बाद 1961 में उसने गोवा को फौज भेजकर मुक्त करा लिया। भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू समाजवाद के साथ साथ ब्रिटिश उदारवाद एवं महात्मा गांधी के विचारों से भी प्रभावित थे, वे जर्मन राष्ट्रवाद से किंचित मात्र भी प्रभावित नहीं थे। उनके प्रसिद्ध ग्रंथों (विश्व इतिहास की झलक, आत्मकथा), लेखो तथा भाषणों से उनके समाजवादी विचारों की स्पष्ट झलक मिलती है।
महिला शिक्षा को प्रोत्साहित करने वाले ईश्वर चंद्र विद्यासागर ने कलकत्ता में बेथुन स्थापित करने के साथ-साथ बंगाल में लगभग 35 महिला स्कूल खोले। प्रसिद्ध बांग्ला उपन्यासकार बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय 1858 में कलकत्ता विश्वविद्यालय के प्रथम स्नातक थे। अबुल कलाम आजाद देवबंद से संबंधित थे।
उन्होंने अल-नदवाह का प्रकाशन किया। वे 1940 से 1945 तक कांग्रेस के अध्यक्ष रहे। इंडिया विंस फ्रीडम पुस्तक उनकी प्रसिद्ध पुस्तक है। स्वाधीन भारत की प्रथम औद्योगिक नीति का प्रतिपादन 6 अप्रैल 1948 ई. के औद्योगिक नीति प्रस्ताव में किया गया। इस नीति में पहली बार देश के लिए मिश्रित अर्थव्यवस्था की संकल्पना की गई। इसके अंतर्गत सार्वजनिक तथा निजी क्षेत्र का विभाजन किया गया और दोनों क्षेत्रों के लिए अलग-अलग उद्योगों का निर्धारण किया गया। भारत में सर्वप्रथम केरल में 1957 में साम्यवादी सरकार की स्थापना हुई थी।
नेहरु, गांधी जी के सत्य अहिंसा तथा अस्पृश्यता जैसे राजनैतिक सामाजिक सिद्धांतों के अनुयायी थे, जबकि कई आर्थिक सिद्धांतों पर दोनों से गहरे मतभेद थे। जहां भारत के आर्थिक विकास के लिए गांधीजी ने लघु तथा कुटीर उद्योगों के विकास पर बल दिया, वहीं नेहरू जी भारी औद्योगीकरण के पक्षपोषक थे। द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात ब्रिटिश प्रधानमंत्री बने क्लीमेंट एटली ने कहा था कि डोडो (एक विलुप्त पक्षी) की भांति साम्राज्यवाद दिवंगत हो चुका है।


प्रथम अणुबम विस्फोट 6 अगस्त 1945 को द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान जापान के हिरोशिमा शहर में किया था। इसके बाद 9 अगस्त 1945 को दूसरा अणुबम विस्फोट जापान के ही नागासाकी शहर पर किया गया। इन दोनों विस्फोटो के परिणामस्वरुप जापान में 15 अगस्त, 1945 को संयुक्त शक्तियों के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया था।
फ्रांसीसी क्रांति 1789 में फ्रांस में हुई। यह क्रांति सामंतवाद, वर्गीय विशेषाधिकार, भ्रष्ट नौकरशाही और निरंकुश एवं आयोग्य राजतंत्र के विरुध्द मध्यम वर्ग का विद्रोह था।
भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की मृत्यु चौथी पदावधि (1947-1952, 1952-1957, 1957-1962, 1962-1964) के दौरान 27 मई 1964 को हुई। जवाहरलाल नेहरू संसद सदस्य के रूप में इलाहाबाद के फूलपुर संसदीय क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते थे। भारत के प्रथम गैर कांग्रेसी प्रधानमंत्री जनता पार्टी के मोरारजी भाई देसाई थे जो 24 मार्च 1977 को इस पद पर नियुक्त हुए। उन्होंने गुजरात के सूरत संसदीय क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया। राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम की रचना बंकिमचन्द्र चटर्जी ने मूलतः संस्कृत एवं बंगाली दोनों ही भाषाओं के मिश्रित प्रयोग से की थी। उनके उपन्यास आनंदमठ में संकलित है।
1971 के भारत-पाक युद्ध और बांग्लादेश की स्वतंत्रता के बाद इंदिरा गांधी और पाकिस्तान के नवनिर्वाचित प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो के बीच एक शिखर सम्मेलन जून, 1972 में शिमला में हुआ। तब दोनों पक्षों ने एक समझौते पर हस्ताक्षर किए जिसे शिमला समझौते के नाम से जाना जाता है। वर्ष 1999 में कारगिल विवाद के दौरान भारत ने पाकिस्तान के विरुद्ध सफल सैन्य कार्यवाई की थी जिसे ऑपरेशन विजय की संज्ञा दी गई थी।
भारत के भूतपूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय चौधरी चरण सिंह की स्मृति में प्रतिवर्ष 23 दिसंबर को कृषक दिवस मनाया जाता है। प्रथम अखिल भारतीय समाजवादी युवा कांग्रेस कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता) में 27 दिसंबर 1928 को संपन्न हुई थी। इस कांग्रेस की अध्यक्षता पंडित जवाहरलाल नेहरू ने की थी।
अलीपुर सेंट्रल जेल कोलकाता में स्थित है | इसकी स्थापना वर्ष 1910 में की गई थी। ब्रिटिश राज के समय यहां राजनीतिक बंदियों को रखा जाता था। हैदराबाद रियासत में सैनिक कार्यवाही के दौरान ऑपरेशन पोलो चलाया गया था। यह ऑपरेशन 13-18 सितंबर 1948 के मध्य चलाया गया था। पश्चिम बंगाल राज्य का सचिवालय भवन राइटर्स बिल्डिंग के नाम से जाना जाता है। कोलकाता स्थित इसी भवन में पश्चिम बंगाल का मुख्यमंत्री कार्यालय स्थित है। इस भवन के वास्तुविद् थॉमस लियॉन थे। इसका निर्माण मूलतः ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के जूनियर सर्वेन्ट्स (राइटर्स) के लिए 1777 में किया गया था।
भारतीय किसान यूनियन की स्थापना स्वर्गीय महेंद्र सिंह टिकैत द्वारा 17 अक्टूबर 1986 को एक गैर राजनीतिक संगठन के रूप में की गई थी। कार्ल मार्क्स ने वर्ग संघर्ष की प्रक्रिया को द्वंद्वात्मक भौतिकवाद के सिध्दांत की मदद से समझाया है। मार्क्स के विचारों मे ऐतिहासिक प्रक्रिया में प्राचीन समाज का आधार दासता, सामंतवादी समाज का आधार भूमि तथा मध्यमवर्गीय समाज का आधार नकद पूंजी है। यही उसकी इतिहास की भौतिकवादी व्याख्या है। उसके अनुसार समाज का इतिहास आर्थिक कारणों से निर्धारित होता है जिसके मूल में वर्ग संघर्ष का द्वंद्व होता है। वर्तमान में सर्वाधिक प्रचलित कैलेंडर ग्रेगोरियन कैलेंडर है। यह लगभग संपूर्ण विश्व में प्रयुक्त होता है।
फालुन गांग विश्वास तथा प्रथा की एक व्यवस्था है, जो चीन में ली होंगझी द्वारा 1992 में स्थापित की गई थी। मदर टेरेसा का जन्म अल्बानिया में 1910 में हुआ था और 18 वर्ष की आयु में उन्होंने एक मिशनरी की सदस्यता ग्रहण कर ली थी। वह 1929 में भारत आई और यही पर रहकर कलकत्ता के लोरेटो कान्वेंट स्कूल में अध्यापन कार्य किया। 5 सितंबर 1997 को उनकी मृत्यु के समय उन्हें भारत की नागरिकता प्राप्त थी। फतेह सिंह राठौर को टाइगर के उपनाम से जाना जाता है।
विश्व की प्रथम महिला प्रधानमंत्री होने का गौरव सिरिमाओ भंडारनायके (श्रीलंका) को प्राप्त है। 10 डाउनिंग स्ट्रीट ब्रिटिश प्रधानमंत्री के सरकारी आवास का नाम है। यह ब्रिटेन के फर्स्ट लॉर्ड ऑफ द ट्रेजरी अर्थात प्रधानमंत्री का निवास है। यह लंदन के वेस्टमिंस्टर  सिटी में स्थित है। चीन ने तिब्बत पर 1959 में कब्जा किया था। 1959 में तिब्बत की स्वायत्तता समाप्त हो गई।
सोवियत संघ की व्यवस्थापिका सर्वोच्च सोवियत द्वारा 26 दिसंबर 1991 को सोवियत संघ के विघटन के पश्चात रूस और अन्य स्वतंत्र गणराज्यों के रूप में सोवियत संघ विभाजित हो गया। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जर्मनी अमेरिका प्रभावित पश्चिमी जर्मनी एवं रूस प्रभावित पूर्वी जर्मनी में विभाजित हो गया था जो 40 वर्षों से अधिक समय के बाद 3 अक्टूबर 1990 को पुनः एकीकृत हुआ। चीन में भी वास्तविक कागज के प्रथम निर्माण का श्रेय साई-लून को प्राप्त है।
चीन के लीयांग प्रांत के निवासी साई-लून ने 105 ई. में कागज का निर्माण किया था। 14वीं शताब्दी में प्रारंभ पुनर्जागरण को यूरोप में मध्यकालीन सामंतवादी युग की समाप्ति और आधुनिक युग के प्रारंभ के रूप में व्यक्त किया जाता है। इसका प्रारंभ इटली से हुआ। पुनर्जागरण संस्कृति के इटली में प्रारंभ होने का कारण वहां विचारों को अभिव्यक्त करने की स्वतंत्रता थी |


लार्ड कार्नवालिस प्रथम गवर्नर जनरल थे जिन्होने पुलिस सुधार प्रक्रिया के अंतर्गत भारत में ब्रिटिश ढाचे पर आधारित एक नियमित पुलिस बल स्थापित किया था। रेग्यूलेटिंग एक्ट, 1773 के अधिनियम द्वारा 1774 में कलकत्ता में उच्चतम न्यायालय स्थापित किया गया। भारतीय दंड संहिता 1860 में लॉर्ड कैनिंग के कार्यकाल में लागू हुई।
भारत के संदर्भ में शासन में पितृसत्तात्मक एवं स्वच्छंदवाद दृष्टिकोण प्रायः मुनरो (1761-1827), मैल्कम (1769-1833), एलफिंस्टन (1779-1859) तथा मेटकॉफ (1785-1846) आदि ब्रिटिश प्रशासकों का माना जाता है। ये भारतीय गांवो के गणतंत्रात्मक स्वरुप के प्रमुख समर्थक थे। मुनरो ने मद्रास में 1820 ई. में रैयतवाड़ी व्यवस्था की शुरुआत की थी।
1866 ई. में जॉर्ज कैंपबेल के अधीन अकाल आयोग स्थापित किया गया जिसने राहत सेवा को सरकार की जवाबदेही माना। 1876-77 ई. के अकाल के बाद 1878 ई. में स्ट्रेची आयोग बनाया गया जिसकी अनुशंसा पर 1883 ई. में अकाल संहिता बनाई गई।
एक्ट वर्ष
ड्रैमेटिक परफार्मेंस                          1876

वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट                1878

बंगाल  टेनेंसी एक्ट                         1885

नार्थ-वेस्टर्न प्रोविंसेज एंड अवध एक्ट            1890

ब्रिटेन में श्रमिक दल के प्रधानमंत्री एटली ने हाउस ऑफ कॉमन्स में 20 फरवरी, 1947 को भारत को शीघ्र स्वतंत्रता प्रदान करने की ऐतिहासिक घोषणा की। उन्होने ही कहा था – ब्रिटिश सरकार भारत के विभाजन के लिए उत्तरदायी नही है।
गांधी एवं तिलक दोनो ने ही भारत का व्यापक दौरा कर सामाजिक उत्थान का कार्य किया। तिलक प्रथम राष्ट्रवादी नेता थे जिन्होने जनता से निकट संबंध स्थापित करने का प्रयत्न किया और इस दृष्टि से वह महात्मा गांधी के अग्रगामी थे।
भारतीय संविधान निर्माण मे मुख्य भूमिका निभाने वाले डॉ. भीमराव अंबेडकर का जन्म 14 अप्रैल, 1891 को तथा मृत्यु 6 दिसंबर, 1956 को हई थी।
प्रख्यात संविधानविद् डॉ. भीमराव अम्बेडकर का जन्म 1891 ई. में मध्य प्रदेश के महू में हुआ था। उनकी मृत्यु 6 दिसंबर, 1956 को हुई। परणोपरांत उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किय गया।
सूती वस्त्र की पहली मिल की स्थापना 1818 ई. में कोलकाता के समीप फोर्ट ग्लास्टर में की गई थी, किंतु यह असफल रही। सबस पहला सफल आधुनिक कारखाना 1854 ई. में मुंबई में ही कावसजी डाबर द्वारा खोला गया। इसका बॉम्बे, नाम स्पाइनिंग एंड विविंग कंपनी, बॉम्बे रखा गया।
मैं एक समाजवादी और गणतंत्रवादी हूँ और मुझे राजाओं और राजकुमारों में विश्वास नही है। यह कथन जवाहरलाल नेहरु का है।
जवाहरलाल नेहरु समाजवाद के समर्थक थे। नेहरु वर्ष 1933 में ब्रिटिश शासन, देशी राज्यों, जमींदारवाद और पूंजीवाद को उखाड़ फेंकना चाहते थे। नेहरु का समाजवाद सोवियत संघ के समाजवाद से प्रभावित था। उन्होने नवंबर, 1927 मे सोवियत संघ की यात्रा की थी।
जवाहर लाल नेहरु के जीवनीकार फ्रैंक मोरेस हैं।
आयरलैंड के सी.सी. बॉयकाट के नाम पर ही बॉयकाट शब्द का प्रयोग आधारित है। सी.सी. बॉयकाट ने ही सर्वप्रथम 1880 में भूराजस्व कम न करने के संबंध में इस विधा का उपयोग राजनीतिक अस्त्र के रुप में किया था।
अरुणा आसफ अली एक राष्ट्रवादी मुसलमान और स्वतंत्रता सेनानी थी। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में ये स्वयं और सुचेता कृपलानी भूमिगत आंदोलन की दो प्रमुख महिला संगठनकर्ता थी। अरुणा आसफ अली ने भारतीय राजनीति में 1947 के बाद सर्वाधिक योगदान दिया।
भारत की कम्युनिस्ट पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना वर्ष 1925 मे क्रमशः कानपुर और नागपुर में हुई थी।



डॉ.बी.एस. मुंजे एक हिंदू राष्ट्रवादी नेता थे। उन्होने अम्बेडकर द्वारा दलितों के लिए पृथक निर्वाचन क्षेत्र की मांग करने के कारण 1932 एक वक्तव्य जारी किया।
डॉ. पट्टाभि सीतारमैया प्रमुख राष्ट्रवादी तथा भारतीय राष्ट्रवादी कांग्रेस के सरकारी इतिहासकार थे। वे व्यवसाय से चिकित्सक थे। 1939 में वे सुभाष चन्द्र बोस से कांग्रेस अध्यक्ष पद का चुनाव हार गए थे।
कैथरीन मेयो, ऐल्डस हक्सले, चार्ल्स एंडूज और विलियम डिग्बी ने ब्रिटिश शासन के दौरान भारत की हालत पर टिप्पणियाँ लिखी। मदर इंडिया की लेखिका कैथरीन मेयो थी और विलियम डिग्बी ने द अवेकनिंग ऑफ इंडिया, लिखी। चार्ल्स एंडूज का जन्म 1871 ई. में इंग्लैंड मे हुआ।
स्वतंत्रता पूर्व बिहार मे भूमिहार, राजपूत तथा कायस्थ वर्चस्वशाली जातियाँ थी, जबकि कुर्मी जाति वर्चस्वशाली जाति नही थी।
भारत में अप्रत्यक्ष निर्वाचन की प्रथा वर्ष 1892 में प्रारंभ की गई थी।
अबुल कलाम आजाद देवबंद से संबंधित थे। उन्होने अल-नदवाह का प्रकाशन किया। वे 1940 से 1945 तक कांग्रेस के अध्यक्ष रहे। इंडिया विन्स फ्रीडम उनकी प्रसिध्द पुस्तक है।
भारत में सर्वप्रथम केरल में 1957 में साम्यवादी सरकार की स्थापना हुई थी।
दल और उनके संस्थापक
दल                    संस्थापक

आजाद मुस्लिम कॉन्फ्रेंस        अल्लाह बक्श

खाकसार पार्टी            अल्लामा मशरिकी

खुदाई खिदमतगार             अब्दुल गफ्फार खां

कृषक प्रजा पार्टी           फजलुल हक

होमरुल आंदोलन – 1916
रौलेक्ट एक्ट                 –    1919

साइमन कमीशन     –    1928 (1927 में नियुक्ति)

गांधी-इरविन समझौता –    1931

महात्मा गांधी – दांडी मार्च
जवाहरलाल नेहरु     –    लखनऊ कांग्रेस में पूर्ण स्वराज की मांग

खान अब्दुल गफ्फार खां    –    लाल कुर्ती अभियान

वल्लभभाई पटेल     –    बारदोली सत्याग्रह

रेग्युलेटिंग एक्ट – 1773
बंगाल विभाजन      –    1905

मुस्लिम लीग का गठन –    1906

सूरत की फूट                –    1907

होमरुल आंदोलन (सितंबर, 1916) की स्थापना एनी बेसेंट, बारदोली सत्याग्रह (फरवरी, 1928) – सरदार वल्लभभाई पटेल, असहयोग आंदोलन (अगस्त, 1920) एम.के. गांधी एवं स्वराज पार्टी का निर्माण (मार्च, 1923) सी. आर. दास द्वारा किया गया।
विनोबा भावे – वैयक्तिक सत्याग्रह
बी.जी. तिलक       –    होमरुल आंदोलन

अरुणा आसफ अली   –    भारत छोड़ो आंदोलन

सरोजिनी नायडू      –    धरसना रेड

खिलाफत आंदोलन –         अली बंधु
होमरुल आंदोलन     –    बाल गंगाधर तिलक

सविनय अवज्ञा आंदोलन    –    खान बंधु

भारत छोड़ो आंदोलन  –    बी.आर. अम्बेडकर

बारदोली सत्याग्रह –         सरदार वल्लभभाई पटेल (1928)
चंपारन सत्याग्रह     –    गांधीजी (1917)

कूका आंदोलन       –    राम सिंह (1872)

लाल कुर्ती           –    गफ्फार खां (सीमांत गांधी)



वर्ष 1957 में दक्षिणी राज्य केरल में विधान सभा चुनाव में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) ने कांग्रेस को हराया। केरल के मुख्यमंत्री के रुप में ईएमएस नंबूदिरीपाद ने स्वतंत्र भारत में पहली बार गैर-कांग्रेसी सरकार का गठन किया।
महिला शासिका संबंधित राज्य/राजधानी
रानी दुर्गावती        –        गढ़ा मंडल

महारानी अहिल्याबाई  –        होल्कर राज्य

महारानी लक्ष्मीबाई    –        झांसी

बेगम रजिया सुल्तान  –        दिल्ली

लखनऊ समझौता – 1916
चंपारण सत्याग्रह             –    1917

जलियांवाला बाग हत्याकांड  –    1919

खिलाफत आंदोलन    –                1920

सत्यशोधक समाज की स्थापना 1873 में ज्योतिबा फुले ने की थी, ये माली जाति के थे।
घटना कालानुक्रम
जलियांवाला बाग त्रासदी         –    13 अप्रैल, 1919

स्वराजिस्ट दल का निर्माण       –    मार्च, 1923

नौजवान भारत सभा का निर्माण   –    मार्च, 1926

दांडी मार्च                    –    12 मार्च-6 अप्रैल, 1930

पिट्स इंडिया अधिनियम, 1784 पारित होने के समय बंगाल का गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्स था।
भारत शासन अधिनियम –     1935
क्रिप्स प्रस्ताव                 –    1942

अगस्त प्रस्ताव                –    1940

वेवल योजना                 –    1945

31 अक्टूबर, 1929 को तत्कालीन गवर्नर जनरल लार्ड इर्विन द्वारा जारी किए गए दीपावली घोषणापत्र का संबंध भारत को डोमिनियन स्टेट्स करने से था।
कामागाटामारु प्रसंग 1914 में हुआ। गांधीजी 9 जनवरी, 1915 को दक्षिण अफ्रीका से भारत आए । अप्रैल, 1916 में बेलगांव में तिलक ने प्रांतीय सम्मेलन में होमरुल लीग के गठन की घोषणा की।
अगस्त प्रस्ताव – 1940
मंत्रिमंडल मिशन     –    1946

क्रिप्स मिशन योजना  –    1942

वेवेल की योजना      –    1945

नेहरु रिपोर्ट –    1928 ई.
गांधी-इरविन समझौता –    5 मार्च, 1931

द्वीतीय गोलमेज सम्मेलन  –    सितंबर-दिसंबर, 1931

सांप्रदायिक पंचाट (निर्णय)  -16 अगस्त, 1932

गदर पार्टी की स्थापना 1913 मे सैनफ्रांसिस्को (अमेरिका) में सोहन सिंह भाकना और लाला दरदयाल द्वारा की गई थी।
द्वीतीय विश्वयुध्द के पश्चात ब्रिटिश प्रधानमंत्री बने क्लीमेंट एटली ने कहा था कि डोडो (एक विलुप्त पक्षी) की भांति साम्राज्यवाद दिवंगत हो चुका है।
राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम की रचना बंकिमचन्द्र चटर्जी ने मूलतः संस्कृत एवं बंगाली दोनों ही भाषाओं के मिश्रित प्रयोग से की थी। यह उनके उपन्यास आनंदमठ में संकलित है।
वर्ष 1999 में कारगिल विवाद के दौरान भारत ने पाकिस्तान के विरुध्द सफल सैन्य कार्रवाई की थी जिसे ऑपरेशन विजय की संज्ञा दी गई थी।
भारत में भूतपूर्व प्रधानमंत्री स्व. चौधरी चरण सिंह की स्मृति में प्रतिवर्ष 23 दिसंबर को कृषक दिवस मनाया जाता है।
प्रथम अखिल भारतीय समाजवादी युवा कांग्रेस कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता) में 27 दिसंबर, 1928 को संपन्न हुई थी। इस कांग्रेस की अध्यक्षता पंडित जवाहरलाल नेहरु ने की थी।
अलीपुर सेंट्रल जेल कोलकाता में स्थित है। इसकी स्थापना वर्ष 1910 में की गई थी। ब्रिटिश राज के समय यहां राजनीतिक बंदियों को रखा जाता था।
राष्ट्रीय पत्रकारिता दिवस (National Press Day) 16 नवंबर को मनाया जाता है। इसी दिन 1966 में भारतीय प्रेस परिषद (Press Council of India) की स्थापना की गई थी।
हैदराबाद रियासत मे सैनिक कार्यवाही के दौरान ऑपरेशन पोलो चलाया गया था। यह ऑपरेशन 13-18 सितंबर, 1948 के मध्य चलाया गया था।
भारतीय किसान यूनियन (BKU) की स्थापना स्व. महेन्द्र सिंह टिकेट द्वारा 17 अक्टूबर, 1986 को एक गैर-राजनैतिक संगठन के रुप में की गई थी।
वेलेन्टाइन डे प्रतिवर्ष 14 फरवरी को वेलेन्टाइन नामक ईसाई संतों की याद मे मनाया जाता है। 14 फरवरी से तीन वेलेन्टाइन संतो का नाम जुडा है (दो-रोम एवं टर्की यूरोप स तथा एक अफ्रीका से) जो इस दिन शहीद हुए थे।
मदर टेरेसा द्वारा मानव सेवा के लिए 1950 मे स्थापित धर्म संघ मिशनरीज ऑफ चैरिटी कहलाता है।
वर्तमान में सर्वाधिक प्रचलित कैलेंडर ग्रिगोरियन कैलेंडर है। यह लगभग संपूर्ण विश्व में प्रयुक्त होता है।
फालुन गांग विश्वास तथ प्रथा की एक व्यवस्था है, जो चीन में ली होंगझी द्वारा 1992 में स्थापित की गई थी।



फतह सिंह राठौड़ को टाइगर मैन के उपनाम से जाना जाता है। मणि कौल फिल्म निर्माता तथा आर.एस. शर्मा को इतिहासकार के रुप में ख्याति प्राप्त है, जबकि सुरेश तेंदुलकर एक अर्थशास्त्री हैं।
10 डाउनिंग स्ट्रीट ब्रिटिश प्रधानमंत्री के सरकारी आवास का नाम है। यह ब्रिटेन के फर्स्ट लॉर्ड ऑफ द ट्रेजरी अर्थात प्रधानमंत्री का निवास है। यह लंदन की वेस्टमिंस्टर सिटी मे स्थिति है।
चीन ने तिब्बत पर 1959 में कब्जा किया था। 1959 में तिब्बत की स्वायत्तता समाप्त हो गई।
संयुक्त राज्य अमेरिका के प्रथम राष्ट्रपति जॉर्ज वाशिंगटन थे ज 1789 से 1797 तक इस पद पर रहे।
चीन में वास्तविक कागज के प्रथम निर्माण का श्रेय साई-लून को प्राप्त है। चीन के लीयांग प्रांत के निवासी साई-लून ने 105 ई. में कागज का निर्माण किया था।
बिशप डेसमंड टुटू द. अफ्रीका के एक अश्वेत पादरी थे जिन्होंने 1980 के दशक में रंगभेद विरोध का आंदोलन चलाकर विश्वव्यापी ख्याति अर्जित की थी। उन्हें 1984 में शांति का नोबेल पुरस्कार प्राप्त हुआ था। 2007 में उन्हें गांधी शांति पुरस्कार भी प्राप्त हुआ था।
प्रसिध्द यूनानी दार्शनिक प्लेटो, सुकरात का शिष्य था तथा अरस्तू, प्लेटो का शिष्य था। अपनी प्रसिध्द पुस्तक रिपब्लिक में प्लेटो ने न्याय तथा आदर्श राज्य की संकल्पना की विवेचना की है।


पत्रिकाएं पुस्तकें और उनके लेखक

एनी बेसेंट ने 1898 में सेंट्रल हिंदू कॉलेज की स्थापना की तथा 1907 में इन्हें थियोसोफिकल सोसायटी का अध्यक्ष चुना गया। 1914 में इन्होंने कॉमनवील तथा न्यू इंडिया पत्रों का प्रकाशन शुरू किया। अपनी पुस्तक एनल्स एंड एंटीक्विटीज ऑफ राजस्थान में कर्नल जेम्स टॉड ने राजस्थान की सामंतवादी व्यवस्था के बारे में विस्तार से लिखा है।
श्यामजी कृष्ण वर्मा भारतीय क्रांतिकारी अधिवक्ता एवं पत्रकार थे, जिन्होंने लंदन में दी इंडियन सोशियोलॉजिस्ट नामक प्रकाशन की स्थापना की थी। आमार सोनार बांगला गीत की रचना 1905 में बंग भंग आंदोलन के दौरान रबीन्द्र नाथ टैगोर ने की थी। इस गीत का संगीत गगन हरकारा के गीत कोढ़े पाबो तारे से प्रेरित है। इस गीत की प्रथम 10 पंक्तियों को 1972 में बांग्लादेश ने राष्ट्रगान (National Anthem) के रूप में अपना लिया है। इस गीत का अंग्रेजी अनुवाद सईद अली अहसान ने किया है।
उल्लेखनीय है रबीन्द्रनाथ टैगोर ने भारत के राष्ट्रगान जन–गण–मन की रचना भी की है। यह विश्व के एकमात्र ऐसे कवि हैं जिनकी रचनाएँ दो देशों ने राष्ट्रगान के रूप में अपनाएं हैं। गीतांजलि का मूल बांग्ला संस्करण 14 अगस्त 1910 को प्रकाशित हुआ। गीतांजलि का अंग्रेजी संस्करण में नवंबर, 1912 में पहली बार प्रकाशित हुआ। विचारात्मक पुस्तक हिंद स्वराज महात्मा गांधी ने मूल रूप से गुजराती भाषा में वर्ष 1909 में एक समुद्री जहाज के डेक पर उस समय लिखा था जब वे लंदन से दक्षिण अफ्रीका के केपटाउन के लिए वापसी यात्रा पर थे। जिस पर ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबंध लगा दिया गया था। इसके बाद प्रतिबंध से बचने के लिए इसे अंग्रेजी में अनुवादित किया गया था। महात्मा गांधी ने अपनी पुस्तक हिंद स्वराज में ब्रिटिश पार्लियामेंट को बांझ और वैश्या कहा है।
महात्मा गांधी द्वारा यह पुस्तक मूलतः गुजराती भाषा में वर्ष 1909 में लिखी गई थी। महात्मा गांधी द्वारा यह टिप्पणी ब्रिटिश पार्लियामेंट की कार्यप्रणाली पर की गई थी। गोखले भाई पॉलीटिकल गुरु पुस्तक के लेखक एमके गांधी हैं। इसका प्रथम प्रकाशन फरवरी 1955 में अहमदाबाद से किया गया। ईश्वर चंद्र विद्यासागर (1820-1891) उन्नीसवी शताब्दी के एक महान शिक्षा शास्त्री एवं समाज सुधारक थे। उन्हीं के प्रयासों से विधवा पुनर्विवाह अधिनियम, 1856 पारित किया गया। इन्होंने बहुविवाह प्रथा बाल्य विवाहेर दोस नामक पुस्तकें भी लिखी। दास कैपिटल जर्मन भाषा में प्रख्यात समाजवादी कार्ल मार्क्स द्वारा लिखित (1867 में प्रकाशित) पुस्तक है जिसके कुछ भाग का संपादन फ्रेडरिक एंजेल्स ने किया था। इस पुस्तक में मार्क्स ने पूंजीवाद के सिद्धांत की तीखी आलोचना करते हुए अपना  विशिष्ट समाजवादी सिद्धांत प्रस्तुत किया है, जिसे मार्क्सवाद के नाम से जाना जाता है। इस पुस्तक के प्रथम खंड का प्रकाशन मार्क्स के जीवन काल में हुआ तथा द्वितीय एवं तृतीय खंड का संपादन तथा प्रकाशन उनके मित्र एवं  सहयोगी फ्रेडरिक एंजेल्स द्वारा किया गया। बंकिम चंद्र चटर्जी का उपन्यास आनंदमठ बंगाली देशभक्ति की बाइबिल माना जाता है। इस पुस्तक का कथानक संन्यासी विद्रोह (1763-1800) पर आधृत है।
केसरी सिंह बारहठ राजस्थान के कवि तथा स्वतंत्रता सेनानी थे। उन्होंने 1903 में 13 कविताओं की चेतावनी-रा-चूंगढ्या लिखी थी। भारत भारती के लेखक हिंदी के प्रसिद्ध कवि तथा राष्ट्रकवि की उपाधि से विभूषित मैथिलीशरण गुप्त हैं। इनकी अन्य प्रमुख रचनाएं हैं- पंचवटी, साकेत, यशोधरा, जयद्रथ वध आदि। ऐ मेरे वतन के लोगों एक हिंदी देश भक्ति गीत है जिसके रचीयता कवि प्रदीप है। उज्जैन में जन्मे कवि प्रदीप का मूल नाम रामचंद्र नारायण जी द्विवेदी था। उन्होंने 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान शहीद हुए सैनिकों को श्रद्धांजलि में यह गीत लिखा था।


मोहम्मद इकबाल का जन्म 9 नवंबर 1877 को ब्रिटिश भारत के पंजाब के सियालकोट (अब पाकिस्तान) में हुआ था। उर्दू के प्रख्यात शायर तथा पेशे से वकील इकबाल प्रारंभ में महान राष्ट्रवादी थे।  सारे जहां से अच्छा हिंदोस्ता हमारा– गीत इन्होंने ही लिखा था, किंतु बाद में  ये मुस्लिम लीग से संबंध्द हो गए। मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना, मोहम्मद इकबाल द्वारा रचित प्रसिद्ध गीत सारे जहां से अच्छा का भाग है।
लैंडमार्क्स इन इंडियन कॉन्स्टिट्यूशनल एंड नेशनल डेवलपमेंट नामक पुस्तक के लेखक गुरुमुख निहाल सिंह हैं। यह 1956 से 1962 तक राजस्थान राज्य के प्रथम राज्यपाल रहे थे। कांग्रेस प्रेसिडेंशियल ऐड्रेसेज (1935) के संपादक जी. एन. नटेशन थे। यह पुस्तक दो भागों में प्रकाशित हुई थी इसके पहले भाग में 1885 से 1910 तक तथा दूसरे भाग में 1911 से 1934 तक के भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्षीय भाषण संकलित थे।
पंडित जवाहरलाल नेहरू ने 1942-1946 में अपने कारावास के दौरान अहमदनगर फोर्ट जेल में डिस्कवरी ऑफ इंडिया नामक पुस्तक लिखी थी। कैदी जीवन के दौरान ही पंडित नेहरू ने मेरी कहानी एवं ग्लिम्पसेज ऑफ वर्ल्ड हिस्ट्री नामक पुस्तकें लिखी थी। बंदी जीवन पुस्तक के लेखक सचींद्रनाथ सान्याल थे। उनकी पुस्तक बंदी जीवन क्रांतिकारी आंदोलन के लिए पाठ्य पुस्तक के समान थी। जर्नी थ्रू द किंगडम ऑफ अवध इन दी ईयर 1849-50 रिपोर्ट द्वारा लिखी गई थी। जिसका दो भागों में लंदन से प्रकाशन हुआ था।
भारत की दूसरी स्वतंत्रता नामक पुस्तक जयप्रकाश नारायण द्वारा लिखी गई है। जिसके लेखक एम.जी. देवासहायाम हैं। जनरल ब्रजमोहन कौल द्वारा लिखी गई पुस्तक दि अनटोल्ड स्टोरी है। यह पुस्तक 1967 में प्रकाशित हुई थी, जो भारतीय सेना के इतिहास पर प्रकाश डालती है। हेंस क्रिश्चियन एंडरसेन ने अपनी रचना में परियों की कहानियों का वर्णन किया है। इन की प्रमुख रचनाएं  इत्यादि हैं। दि गोल्डन गेट के रचयिता विक्रम सेठ है। 1986 में रचित यह इनका प्रथम उपन्यास है। साइलेंट स्प्रिंग पुस्तक के लेखक प्रसिद्ध अमेरिकी जैव वैज्ञानिक रशेल कार्सन हैं। इस पुस्तक मे कीटनाशकों के प्रयोग  पर प्रश्न उठाया गया है।
दि सैटेनिक वर्सेज सलमान रुश्दी का चौथा उपन्यास है। इनका प्रथम प्रकाशन 1988 में हुआ था। यह पुस्तक काफी विवादित होने के कारण चर्चा में रही थी। द नेमसेक झूंपा लाहिड़ी द्वारा लिखा गया पहला उपन्यास है। नेमसेक को झुम्पा ने 2003 में लिखा। झुंपा लाहिड़ी पुलित्जर पुरस्कार विजेता है यह पुरस्कार उन्हें उनकी कहानी संग्रह इंटरप्रेटर ऑफ मालडीज के लिए वर्ष 2000 में दिया गया। मानस का हंस प्रख्यात लेखक अमृतलाल नागर का प्रतिष्ठित उपन्यास है। इसमें पहली बार व्यापक कैनवास पर रामचरित मानस के लोकप्रिय लेखक गोस्वामी तुलसीदास के जीवन को आधार बनाकर कथा रची गई है।
सुमित्रानंदन पंत आधुनिक काल के हिंदी भाषा के प्रमुख कवियों में से एक हैं। वे छायावाद के कवि के रूप में विख्यात है। उनकी प्रमुख रचनाएं चिदंबरा, लोकायन, वीणा, युगवाणी, पल्लव, भारत माता, ग्रामवासिनी तथा कला और बूढ़ा चांद है। प्रसिद्ध ब्रिटिश लेखिका जे.के. रॉलिंग के हैरी पॉटर उपन्यास में कार्नेलियस फज एक जादू का मंत्री है।
मृगनयनी वृंदावन लाल वर्मा द्वारा लिखित उपन्यास है। इनके अन्य प्रमुख उपन्यास है – झांसी की रानी, भुवन विक्रम, संगम, लगन, अहिल्याबाई आदि। बिखरे मोती सुभद्रा कुमारी चौहान द्वारा 1932 में प्रकाशित लघु कथा है। इसके अतिरिक्त उन्होंने उन्मादिनी (1934) और सीधे–साधे चित्रा (1946) की भी रचना की थी।
उपन्यास डेविड कॉपरफील्ड के रचयिता अंग्रेजी भाषा के प्रसिद्ध उपन्यासकार चार्ल्स डिकिंस है। 1849–1850 में प्रकाशित यह उपन्यास चार्ल्स डिकिंस के जीवन पर आधारित है। दि प्राउडेस्ट डे, एंथनी रीड एवं डेविड फिशर द्वारा लिखित पुस्तक है। जिसकी कहानी भारत की स्वतंत्रता से संबंधित है।
कामायनी प्रसिद्ध हिंदी कवि जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित महाकाव्य है। इसी महाकाव्य में प्रसिद्ध मनु एवं श्रद्धा प्रसंग है। इनकी प्रमुख रचनाएं- आंसू, लहर, अजातशत्रु, तितली, और कंकाल हैं। बेरियर एल्विन ने बैगा जनजाति का अध्ययन किया तथा बैगा नामक पुस्तक लिखी। जनजातियों के लिए इन्होंने राष्ट्रीय उपवन बनाने का सुझाव दिया था।
इग्नाइटेड माइंड्स के लेखक भारत के भूतपूर्व राष्ट्रपति एवं प्रसिद्ध वैज्ञानिक डॉक्टर ए. पी. जे. अब्दुल कलाम है, ये मिसाइल मैन के नाम से भी जाने जाते थे। इनकी एक अन्य चर्चित पुस्तक – अग्नि की उड़ान (Wings of Fire)है। दि स्टोरी ऑफ दि इंटीग्रेशन ऑफ दि इंडियन स्टेट्स (The Story of the Integration of the Indian States) पुस्तक 1955 में वी.पी. मेनन द्वारा लिखी गई थी। इसका प्रकाशन लंदन स्थित लांगमैन प्रकाशन द्वारा किया गया था |


पत्रिकाएं / पुस्तकें
लेखक




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स्वराज
महात्मा गांधी
इंडिया विन्स फ्रीडम
अबुल कलाम आजाद
बापूः मई मदर शीर्षक संस्मरण
मनुबहन गांधी
गीता रहस्य
बाल गंगाधर तिलक
द लाइफ डिवाइन, द आइडियल ऑफ ह्यूमन यूनिटी, एस्सेज आन द गीता
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एनल्स एंड एंटिक्विटीज ऑफ राजस्थान
कर्नल जेम्स
केसरी, मराठा
बाल गंगाधर तिलक
दुर्गेश नंदिनी
बंकिमचन्द्र चटर्जी
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यंग इंडिया
महात्मा गांधी
इंडियन अनरेस्ट
वैलेंटाइन  शिरोल
इंडियन स्ट्रगल
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ऑटो बायोग्राफिकल राइटिंग्ज
लाला लाजपत राय
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स्प्रिंगिंग टाइगर
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टुवर्ड्स स्ट्रगल




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इंडिया  डिवाइडेड
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अमेरिकन  विटनेस टू इंडियाज पार्टीशंस
फिलिप्स टालबॉट
एन इंट्रोडक्शन टू दी  ड्रीमलैंड
भगत सिंह
बंदी जीवन
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मै अनीश्वरवादी क्यो हूँ
भगत सिंह
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श्यामजी कृष्ण वर्मा
दी  ड्रीमलैंड
लाला  रामसरन दास
दी फिलॉसफी ऑफ बम
भगवती चरण वोहरा
अनइहिलेशन ऑफ कास्ट (1936 मे)
बी.आर. अंबेडकर
जवाहरलाल नेहरु-ए बायोग्राफी
फ्रैंक राबर्ट मोरेस
द लाइफ ऑफ महात्मा गांधी
लुई फिशर
इंडिया फ्रॉम कर्जन टू नेहरु एंड ऑफ्टर
दुर्गादास
गिल्टी मैन ऑफ इंडियाज पार्टीशन
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 दी ग्रेट डिवाइड
एच.वी. हॉडसन
हिंद स्वराज
महात्मा गांधी
ग्लिम्पसेस ऑफ  दि वर्ल्ड  हिस्ट्री
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माइकेल मधुसूदन दत्त
गोरा
रबीन्द्रनाथ टैगोर
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नेशन इन मेकिंग
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श्री अरबिंदो


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दि इंग्लिश टीचर
आर. के. नारायण
प्लानिंग एंड दि पुअर
बगीचा सिंह मिन्हास
प्राब्लम्स ऑफ द फार ईस्टः जापान-कोरिया-चीन
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डेविड डिरिन्जर
ययाति (उपन्यास)
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घर और अदालत
लीला सेठ
झोपड़ी से राष्ट्रपति भवन तक
महेन्द्र कुलश्रेष्ठ
इमैजिंग इंडिया
नंदन नीलेकणि
जर्नी थ्रू बाबूडम एंड नेतालैड
टी.एस.आर. सुब्रमनियम
शो बिजनेस
शशि  थरुर
सर्किल ऑफ रीजन
अमिताभ
क्लियर लाइट ऑफ डे
अनीता देसाई
लव एंड लागिंग इन बाम्बे
विक्रम चन्द्र
सोज-ए-वतन
मुंशी प्रेमचन्द

हेंस क्रिश्चियन
साइलेंट स्प्रिंग
रशेल कार्सन
दि पाथ टू पावर
मार्गेट थैचर
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मणिशंकर अय्यर
दि पाथ टू पावर फिलिप डेयर और दी फ्यूचर ऑफ एन.पी.टी.
सविता पांडे


दि सैटेनिक वर्सेज
सलमान रुश्दी
दि गोल्डन गेट
विक्रम सेठ
टू इयर्स एट मंथ्स एंड ट्वेन्टी नाइट्स
सलमान रुश्दी
द नेमसेक 
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दि रोड अहेड
बिल गेट्स
डायनाः ए ट्रिब्यूट
जुंलिया डेलानो
रोमांसिक विद लाइफः एन ऑटोबायोग्राफी
देवानंद
पैरी पॉटर
जे.के. रोलिंग
सनी डेज (आत्म कथा), आइडल्स, रंस एंड रुइंस तथा वन डे वंडर्स
सुनील गावस्कर
उदयभान चरित
मुंशी इंशाअल्ला खान
काजर की कोठरी
बाबू देवकी नंदन खत्री
हठी  हमीर
पं. प्रतापनारायाण मिश्र
कंकाल
जयशंकर प्रसाद
लिविंग हिस्ट्री
बिल क्लिंटन
क्रिकेट माइ स्टाइल
कपिल देव
मिथ ऑफ महात्मा गांधी
आर्थर केम्प
द स्ट्रगल फार पीस
नेविले चैम्बरलेन
इन दि लाइन ऑफ फायर
परवेज मुशर्रफ
अंधा युग
धर्मवीर भारती
पालिटिक्स इन इंडिया
रजनी कोठारी