History in Hindi for All Competitive Exams (State Level) Part 2

मानव समाज अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक स्थिति के कारण विलक्षण होता है। संस्कृति ही मानव की धारणाओं एवं रहन-सहन का निर्धारण करती है और उसे प्राणीजगत मे विशिष्ट बनाती है।

हड़प्पा नामक पुरास्थल सिंधु घाटी सभ्यता से संबंधित है। इस सभ्यता का प्रथम पुरातात्विक प्रमाण हड़प्पा से प्राप्त होने के कारण सैंधव सभ्यता को हड़प्पा सभ्यता के नाम से भी जाना जाता है। कालानुक्रम की दृष्टि से यह सभ्यता मिस्र एवं मेसोपोटामिया की प्राचीन सभ्यताओं के समकालिक थी।

लेखन कला के ज्ञान से पहले का कालखंड आद्य-ऐतिहासिक कालखंड होता है। भारतीय इतिहास में 2500 C. से 6000 B.C. का कालखंड आद्य-ऐतिहासिक कालखंड माना गया है। सैंधव सभ्यता आद्य-ऐतिहासिक काल की सभ्यता है, क्योंकि यहां पर लेखन कला का ज्ञान तो हैं किंतु इतिहास निर्माण में इसका प्रयोग नही किया जा सकता है।

सिंधु घाटी की सभ्यता गैर-आर्य मुख्य रुप से इसलिए थी, क्योंकि यह नगरीय सभ्यता थी, जबकि आर्य सभ्यता ग्रामीण थी।

सिंधु घाटी सभ्यता लिपि ज्ञान और नगर नियोजन आदि के संदर्भ में प्रारंभिक आर्यों से अधिक विकसित थी। पुरातात्विक साक्ष्यों में अलग-अलग कालों में पाए गए मृदभांड ही सिंधु घाटी सभ्यता को आर्यों से पूर्व का सिध्द करते हैं। काले रंग की आकृतियों से चित्रित लाल मृदभांड जहां हड़प्पा सभ्यता की विशेषता है, वही धूसर एवं चित्रित धूसर मृदभांड (जो बाद के हैं) आर्यों से संबंधित माने गए हैं।

सिंधु घाटी संस्कृति वैदिक सभ्यता से अनेक बातों में भिन्न थी। सिंधु घाटी सभ्यता नगरीय थी, जबकि वैदिक सभ्यता ग्रामीण थी। सिंधु सभ्यता की लिपि भावचित्रात्मक थी। वैदिक सभ्यता के लोग लोहे तथा रक्षा शस्त्रों के ज्ञान से युक्त थे। जबकि सिंधु घाटी की सभ्यता में लोहे के ज्ञान का अभाव था।

हड़प्पा सभ्यता की लिपि का वाचन अभी नही हो सका है, अतः सभ्यता से संबंध्द अनकों पुरास्थलों से प्राप्त पुरावशेष ही हड़प्पा संस्कृति के विशिष्ट तत्वों पर प्रकाश डालते हैं।

सैंधव सभ्यता के संबध्द विभिन्न पुरास्थलों की खुदाई के फलस्वरुप कहां से प्राप्त पुरावशेष यथा- बर्तन, जेवर, हथियार तथा औजार आदि सैंधव घाटी के निवासियों की सभ्यता को जानने के मूल स्रोत हैं, क्योंकि सैंधव लिपि का अभी तक वाचन नही हो सका है।

हड़प्पा सभ्यता की उत्पत्ति के संदर्भ में अनेकों विद्वानों ने अलग-अलग मत प्रस्तुत किए हैं। ई.जे. एच. मैके का मानना है कि हड़प्पा सभ्यता की उत्पत्ति सुमेर (दक्षिणी मेसोपोटामिया) से लोगें के प्रवसन के कारण हुआ। इन्हीं के समरुप प्रवसन के सिध्दांत के इतिहासविद् डी.एच. गार्डेन, मार्टीमर ह्वीलर का मानना है कि हड़प्पा सभ्यता की उत्पत्ति पश्चिमी एशिया से सभ्यता के विचार के प्रवसन के कारण हुआ। इस संदर्भ में अमलनंदा घोष का विचार है कि हड़प्पा सभ्यता का उद्भव पूर्व हड़प्पा सभ्यता की परिपक्वता के परिणामस्वरुप हुआ। जबकि एम. रफीक मुगल का मानना है कि हड़प्पा सभ्यता का विकास रावी नदी क्षेत्र में हड़प्पा में हुआ। इन्होंने इस पुरानी मान्यता का खंडन किया है कि हड़प्पा सभ्यता ने पश्चिमी, मेसोपोटामिया सभ्यता से प्रेरणा ली।

हड़प्पावासियों को चांदी की जानकारी थी। मोहनजोदड़ो और हड़प्पा के निवासियों के मध्य इसके विधिवत प्रयोग के साक्ष्य मिलते हैं। ये लोग राजस्थान की जावर और अजमेर खानों से चांदी प्राप्त करते रहे होंगे।

प्रारंभिक हड़प्पा सभ्यता मे पैर से चालित चाक का प्रयोग किया जाता था। परिपक्व हड़प्पा के दौर में हाथ से चालित चाको का प्रयोग किया जाने लगा था। डिजाइन के आधार पर इन बर्तनों की दो श्रेणियाँ थी – एक तो बिना डिजाइन वाले बर्तन तथा दूसरे चित्रित मृदभांड। मृदभांडों को बनाने वाली मिट्टी मे रेत का मिश्रण किया जाता था, जिनको पकाने पर यह हल्के भूरे लाल रंग का रुप ग्रहण कर लेती थी। इन मृदभांडों के ऊपरी हिस्सों में लाल रंग की पुताई कर दी जाती थी तथा निचले हिस्से में काले रंग से विभिन्न प्रकार की चित्रकारी की जाती थी।

मूर्ति पूजा का प्रारंभ पूर्व आर्य काल से माना जाता है। सैंधव सभ्यता में मूर्ति पूजा प्रचलित थी, इसके उदाहरण अनेक सैंधव पुरास्थलों से प्राप्त मातृ देवी की मृण्मूर्तियाँ हैं।

हड़प्पा संस्कृति की मुहरों एवं टेराकोटा कलाकृतियों मे गाय का चित्रण नही मिलता जबकि हाथी, गैंडा, बाघ, हिरण, भेड़ा आदि का अंकन मिलता है। गाय को महत्व वैदिक काल से प्राप्त हुआ।

हड़प्पा सभ्यता के स्थलों मे से खम्भात की खाड़ी के निकट स्थित लोथल से गोदीबाड़ा के साक्ष्य मिले हैं। राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले में घग्गर नदी के किनारे स्थित कालीबंगा से जुते हुए खेत के साक्ष्य मिले हैं। गुजरात के धौलावीरा से हड़प्पा लिपि के बड़े आकार के 10 चिन्हों वाला एक शिलालेख मिला है। हरियाणा के फतेहाबाद जिले में स्थित बनावली से पकी मिट्टी की बनी हुई हल की प्रतिकृति मिली है।

हड़प्पा रावी नदी, हस्तिनापुर, गंगा नदी, नागार्जनु कोंडा-कृष्णा नदी तथा पैठन-गोदावरी नदी से संबंधित स्थल हैं।

सैंधव सभ्यता के महान स्नानागर के साक्ष्य मोहनजोदड़ों से प्राप्त हुए हैं. इसकी लंबाई उत्तर से दक्षिण की ओर 55 मीटर और चौड़ाई पूर्व से पश्चिम दिशा की और 33 मीटर है।

सैंधव सभ्यता कांस्ययुगीन सभ्यता थी तथा यहां के लोग लोहे से परिचित नही थे, जबकि सैंधव नगरों में नालियों की सुदृढ़ व्यवस्था थी और व्यापार एवं वाणिज्य उन्नत दशा में था। मातृदेवी की उपासना के ढेर सारे साक्ष्य सैंधव नगरों से मिलते हैं, जिससे प्रमाणित होता है कि मतृदेवी की उपासना का जाती रही होगी।

सिंधु घाटी सभ्यता की प्रमुख विशेषता नगर नियोजना माना जाता है। साथ ही हड़प्पा और मोहनजोदड़ों, सिंधु घाटी सभ्यता के दो प्रमुख नगर थे। हड़प्पा नामक पुरास्थल सर्वप्रथम ज्ञात होने के कारण इसको हड़प्पा सभ्यता के नाम से भी जाना जाता है। कालीबंगा से कृषि संबंधी साक्ष्य तथा लोथल से उद्योग संबंधी साक्ष्य प्राप्त हुए हैं।
कालीबंगा राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले में स्थित है। इसकी खोज वर्ष 1951 में अमलानंद घोष ने की थी।
राखी गढ़ी हरियाणा के हिसार जिले में घग्गर नदी पर स्थित है। इस स्थल की खोज वर्ष 1969 में सूरजभान ने की थी।

हड़प्पीय स्थल एवं उनकी स्थिति–
हड़प्पीय स्थल            स्थिति

माण्डा                  महाराष्ट्र

दायमाबाद               महाराष्ट्र

कालीबंगा               राजस्थान

राखीगढ़ी                हरियाणा

मोहनजोदड़ों से लगभग 130 किमी. दक्षिण-पूर्व मे स्थित चन्हूदड़ों की खोज सर्वप्रथम वर्ष 1931 में एन.जी. मजूमदार ने किया तथा वर्ष 1935 मे मैके ने यहां उत्खनन करवाया।

हड़प्पा के अवशेष आधुनिक पाकिस्तान में मांटगोमरी (वर्तमान शाहीवाल) जिले में स्थित है, यह स्थल रावी नदी के तट पर स्थित था। जबकि कालीबंगा राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले में, लोथल गुजरात प्रांत में तथा आलमगीरपुर उत्तर प्रदेश में स्थित है।

रंगपुर गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र में हैं, यहाँ से प्राक्-हड़प्पा, हड़प्पा और उत्तर-हड़प्पाकालीन सभ्यता के साक्ष्य मिले हैं।

दधेरी एक परवर्ती पुरास्थल है, जो पंजाब प्रांत के लुधियाना जिले में गोविंदगढ़ के पास स्थित है। दधेरी स्थल चित्रित धूसर मृदभांड काल से संबंधित है, जो कि आर्यों के आगमन का काल भी है।

सिंधु सभ्यता से संबंधित लोथल नामक पुरास्थल गुजरात के अहमदाबाद चिले में भोगवा नामक नदी के तट पर सरगवल गांव से 2 किमी. उत्तर में स्थित है। हड़प्पा और मोहनजोदड़ों पाकिस्तान मे स्थित है।
हरियाणा के फतेहाबाद जिले में स्थित बनावली से हल का टेराकोटा प्राप्त हुआ है।

कालीबंगन, रोपड़ तथा लोथल सिंधु घाटी सभ्यता से संबंधित स्थल है, जबकि पाटलिपुत्र महाजनपद कालीन एक प्रमुख नगर है।

हरियाणा के हिसार जिले में अवस्थित राखीगढ़ी भारत में हड़प्पा सभ्यता का सबसे बड़ा स्थल है। मोहनजोदड़ों, हड़प्पा और गनवेरीवाला (पाकिस्तान) तथा राखागढ़ी एवं धौलावीरा (भारत हड़प्पा सभ्यता के पांच वृहद स्थलों की श्रेणी में आते हैं।

राखी गढ़ी हडप्पा सभ्यता का दूसरा सबसे बड़ा (मोहनजोदड़ों के बाद) स्थल है। भारत मे सिंधु घाटी का दूसरा बड़ा स्थल धौलावीरा है।

स्थापित सिंधु घाटी की सभ्यता का विस्तार उत्तर में झेलम नदी के पूर्वी तट से दक्षिण में यमुना की सहायक नदी हिंडन के तट तक माना जाता है। इसमें झेलम, सिंधु एवं चेनाब नदियाँ तो शामिल हैं परंतु गंगा नदी इसमे शामिल नही है।

हड़प्पा सभ्यता में ऐसे प्रचुर साक्ष्य मिलते हैं, जिनके आधार पर यह कहा जा सकता है कि मातृदेवी की उपासना वहां व्यापक रुप से प्रचलित थी। विभिन्न मृण्मूर्तियाँ, मुद्राओं आदि पर अंकित आकृतियों आदि से जो चित्र उभरता है उससे नारी (शक्ति) उपासना के प्रचलन के साक्ष्य मिलते हैं।

सिंधु घाटी के लोग पशुपति शिव की पूजा भी करते थे। इसका प्रमाण मोहनजोदड़ों से प्राप्त एक मोहर है जिस पर योगी की आकृति बनी है।

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के महानिदेशक सर जॉन मार्शल के निर्देश पर वर्ष 1921 मे दयाराम साहनी ने हड़प्पा के तथा वर्ष 1922 में राखालदास बनर्जी ने मोहनजोदड़ों के टीलों का पता लगाया।

हड़प्पा का उत्खनन दयाराम साहनी, लोथल का उत्खनन एस.आर. राव तथा सुरकोटडा का उत्खनन जे.पी. जोशी ने कराया था, जबकि धौलावीरा का उत्खनन वी.के. थापड़ ने नही बल्कि आर.एस. बिष्ट ने कराया था।
ए. कनिंघम महोदय ने भारतीय उपमहाद्वीप के ऐतिहासिक महत्व के टीलों की खोज की थी किंतु वह हड़प्पा के टीलों के महत्व को नही जान सके थे।

वर्ष 1921 में दयाराम साहनी ने हड़प्पा का सर्वेक्षण किया। वर्ष 1926 में माधोस्वरुप वत्स हड़प्पा के सर्वेक्षण से संबंधित रहे। मोहनजोदड़ों की खोज सर्वप्रथम वर्ष 1922 में राखालदास बनर्जी ने की तथा इसके पुरातात्विक महत्व की ओर ध्यान आकर्षित किया। इनके अतिरिक्त कुछ अन्य विदवान के.एन. दीक्षित, अर्नेस्ट मैके, आरेल स्टीन, ए.घोष, जे.पी. जोशी आदि ने भी इस सभ्यता की खोज में महत्वपूर्ण योगदान दिया। अतः स्पष्ट है कि स्मिथ हड़प्पा सभ्यता की खोज से संबंधित नही रहे बल्कि ये भारतविद एवं कला इतिहासकार के रुप में प्रसिध्द थे।
मोहनजोदड़ों के ध्वंसावशेष पाकिस्तान के सिंध प्रातं के लरकाना जिले में सिंधु नदी के दाहिने तट पर स्थित है। यहां लगभग प्रत्येक घर मे निजी कुएं एवं स्नानागार होते थे। और पानी के निकास के लिए नालियोँ की व्यवस्था थी।

भारत में सबसे प्राचीन सभ्यता हड़प्पा सभ्यता अपनी नगर योजना के लिए विख्यात है। हड़प्पा सभ्यता की नगर योजना की आधार-सामग्री मोहनजोदड़ों, हड़प्पा, चन्हूदड़ों, कालीबंगा, लोथल, सुरकोटदा तथा बनावली से प्राप्त होती है। सिंधु घाटी की सभ्यता कांस्य कालीन है। लोहे का ज्ञान कांसे के बाद वैदिक काल में लगभग 1000 ई.पू. में हुआ। भारत में सबसे प्राचीन सिक्के आहत मुद्रा के रुप में छठी शताब्दी ई.पू. में अस्तित्व में आएं। सबसे पहले भारत में सोने के सिक्के हिंद-यवन शासकों (द्वीतीय शताब्दी ई.पू.) ने जारी किए जिनकी संख्या कुषाण काल में बढ़ी।

सर्वप्रथम मानव द्वारा तांबा धातु का प्रयोग किया गया। इसके शिव के विभिन्न भागों में प्रयोग की तिथि में अंतर है।
हड़प्पा सभ्यता भारत की प्राचीनतम सभ्यता थी। हड़प्पायी संदर्भ में हाथी दांत का पैमाना लोथल से मिला है। यह गुजरात में है।

हड़प्पा सभ्यता एक कांस्ययुगीन सभ्यता थी। यहां से तांबा, कांसा, स्वर्ण और चांदी आदि धातुए तो मिली हैं परंतु लोहे की प्राप्ति नही हुई है। वस्तुतः हड़प्पा कालीन लोग लोहे से परिचित थे। भारत में लौह युग का प्रारंभ उत्तर वैदिक काल (लगभग 1000 ई.पू.) से माना जाता है।

हरियाणा में स्थित बनावली नामक हड़प्पा स्थल घग्गर एवं उसकी सहायक नदियों की घाटी में स्थित है।

हड़प्पा, मोहनजोदड़ों, रोपड़, लोथल एवं कालीबंगा सिंधु घाटी सभ्यता के प्रमुख स्थल है। सैंधव सभ्यता में सड़के एक-दूसरे को समकोण पर काटती (ऑक्सफोर्ड प्रणाली) थी। सड़कों के दोनों किनारों पर पक्की नालियाँ बनाई जाती थी, जिन्हें बड़ी ईटों अथवा पत्थर के टुकड़ों से ढंका जाता था। इस समय सोने तथा चांदी के आभूषण बनाए जाते थे। तांबे के साथ टिन मिलाकर कांसा तैयार किया जाता था।

मोहनजोदड़ों (वर्तमान पाकिस्तान के सिंध प्रांत के लरकाना जिले मे सिंधु नदी के दाएँ तट पर) तथा हड़प्पा (वर्तमान पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के शाहीवाल (मांटगोमरी) जिले में रावी नदी के बाएँ तट पर ) नगर सैंधव सभ्यता के दो प्रमुख नगर थे जिनकी खोज उत्खननों के दौर क्रमशः राखालादास  बनर्जी तथा दयाराम साहनी ने की थी। वर्तमान मे ये नगर मृतप्राय (विलुप्त) स्थिति मे है।

धौलावीरा हड़प्पा की भारत मे स्थित दूसरी सबसे बड़ी (प्रथम राखीगढ़ी) बस्ती है। यह गुजरात के कच्छ के रन में अवस्थित है। यहां से उत्खनन के परिणामस्वरुप हड़प्पा सभ्यता की अनेक महत्वपूर्ण जानकारियाँ प्राप्त की गई। इन खोजों में 7 मीटर गहरा तथा 79 मीटर लंबा शैलकृत जलकुंड महत्वपूर्ण है।

धौलावीरा नगर आयताकार बना था। इस नगर को तीन भागों-किला, मध्य नगर एवं निचला नगर में विभाजित किया गया था।

धौलावीरा के निवासी एक उन्नत जल प्रबंधन व्यवस्था से परिचित थे। ये लोग बांध बनाकर जलाशयों में पानी संग्रहीत करते थे, जो इस तरह का प्राचीनतम साक्ष्य है।

उ.प्र. के बागपत जिले में बारोट तहसील के सनौली नामक हड़प्पन पुरास्थल से क्रमबध्द रुप से 125 मानव शवाधान प्राप्त हुए हैं जिनकी दिसा उत्तर से दक्षिण है। इन शवाधानों के साथ दैनिक उपयोग की वस्तुएँ भी मिली हैं जिनमें गहने प्रमुख हैं। इनके साथ ही इनमे कुछ जानवरों की हड़डियाँ भी प्राप्त हुई हैं।

वस्त्रों के लिए कपास का उत्पादन सर्वप्रथम भारत में किया गया। वर्ष 1922 में राखालदास बनर्जी के नेतृत्व मे सिंधु नदी के किनारे स्थित मोहनजोदडों (वर्तमान पाकिस्तान के लरकाना जिले मे स्थित) उत्खनन के कपास के सूत की प्राप्ति की गई थी।

सिंधु घाटी सभ्यता के संदर्भ में सामान्यतः माना जाता है कि यह प्रधानतया लौकिक सभ्यता थी, इसमें धार्मिक तत्व यद्यपि उपस्थित था, वर्चस्वशाली नही। सिंधु सभ्यता मे अनेक स्थलों से कपास के वस्त्र के साक्ष्य मिल हैं, जिससे स्पष्ट होता है कि वहां के लोग इसका निर्माण करते थे।

आज तक सिंधु घाटी सभ्यता के स्थलों की खुदाई में किसी मंदिर अथवा पूजा स्थल का साक्ष्य नही मिला है। अतः इस सभ्यता के धार्मिक जीवन का एकमात्र स्रोत यहां पाई गई मिट्टी और पत्थर की मूर्तियाँ एवं मुहरे हैं। इनसे यह ज्ञात होता है कि मातृदेवी, पशुपति तथा उनके लिंग की पूजा और पीपल, नीम आदि पेडों एवं नाग आदि जीव-जंतुओं की उपासना प्रचलित थी। पशुओं में हाथी, बाघ, भैंसा, गैंडा और घड़ियाल के चित्र मिले हैं लेकिन  घोड़े के चित्र का अभाव है। हालांकि घोड़े की अस्थियां लोथल, सुरकोटडा एवं कालीबंगा इत्यादि स्थलों से प्राप्त हुई हैं, फिर भी घोड़े का उपयोग युध्द के रख को खींचने में किया जाता था, ऐसे साक्ष्य का अभाव है।

मोहनजोदड़ों में अनेक वस्तुएँ प्राप्त हुई, जिसमें कूबड़ वाले बैल (ककुदमान वृषभ) की आकृति वाली मुहर भी शामिल थी।

सिंधु घाटी सभ्यता के निवासी अश्व से परिचित थे लेकिन उसका अंकन हड़प्पा की मुहरों पर नही मिलता है।

मिस्र की सभ्यता का विकास नील नदी की द्रोणी में हुआ। नील नदी विश्व की इस प्राचीन सभ्यता का आधार थी। मिस्र को नील नदी का उपहार कहा जाता है क्योंकि इस नदी के अभाव में यह भू-भाग रेगिस्तान होता। मिस्र अफ्रीका महाद्वीप में स्थित है। इसकी समकालीन सभ्यताएँ सिंधु घाटी सभ्यता (भारत) तथा मेसोपोटामिया की सभ्यता (इराक) थी।

एजटेक सभ्यता का विस्तार मेसोअमेरिका के उत्तरी भाग पर था। मेसोअमेरिका के अंतर्गत मध्य मेक्सिकों से लेकर बेलिज, ग्वाटेमाला, अलसल्वाडोर, होंडुरास, निकारागुआ तथा उत्तरी कोस्टारिका तक का क्षेत्र शामिल है। इस प्रकार एजटेक सभ्यता का विस्तार मध्य मेक्सिकों में, माया सभ्यता का विस्तार मोसोअमेरिका के दक्षिणी भाग अर्थात दक्षिणी मेक्सिकों से लेकर दक्षिणी ग्वाटेमाला, बेलिज, अलसल्वाडोर एवं होंडुरास तक था। इसके अलावा मुइस्का सभ्यता दक्षिणी अमेरिका महाद्वीप के कोलम्बिया के पूर्वी भाग मे विस्तृत थी, जबकि इंका सभ्यता का विस्तार दक्षिणी अमेरिका  के पश्चिमी भा में उत्तर मे क्वीटों से लेकर दक्षिण में सेंटियागों तक था।
सुमेरिया सभ्यता के लोग प्राचीन विश्व के प्रथम लिपि-आविष्कर्ता थे। इनकी प्रारांभिक लिपि का स्वरुप अत्यंत सरल एवं आदिम था। सुमेरिया की क्यूनीफार्म लिपि को सामान्यतः प्राचीनतम लिपि माना जाता है।

वैदिक काल

वैदिक शब्द वेद से बना है। वेद का अर्थ ज्ञान होता है। भारत में सैंधव संस्कृति के पश्चात जिस नवीन सभ्यता का विकास हुआ, उसे वैदिक सभ्यता या आर्य सभ्यता के नाम से जाना जाता है।
आर्य शब्द भाषा सूचक है जिसका अर्थ है श्रेष्ठ या कुलीन। क्लासिकीय संस्कृति में आर्य शब्द का अर्थ है – एक उत्तम व्यक्ति। आर्यों का इतिहास मुख्यतः वेदो से ज्ञात होता है। सामान्यतः वैदिक साहित्य की रचना का श्रेय आर्यों को दिया जाता है। आर्यों के मूल निवास स्थान को लेकर मतभेद है। प्रमुख इतिहासकारों ने इस पर अलग-अलग विचार व्यक्त किए हैं –
आर्यों का मूल निवास स्थान  विद्वान


  • कश्मीर अथवा हिमालय क्षेत्र

  • एल.डी. कल्ल

  • ब्रह्मार्षि देश

  • पं. गंगानाथ झा

  • सप्त-सैंधव प्रदेश

  • डॉ. अविनाश चंद्र दास

  • देविका प्रदेश

  • डी.एस. त्रिवेदी

  • दक्षिणी रुस

  • गार्डन चाइल्ड एवं नेहरिंग

  • मध्य एशिया

  • मैक्स मूलर

  • उत्तरी ध्रुव

  • पं. बाल गंगाधर तिलक

  • तिब्बत

  • स्वामी दयानंद सरस्वती

  • जर्मनी

  • हर्ट एवं पेन्का

  • हंगरी

  • गाइल्स

वैदिक काल को दो भागों में विभाजित किया जाता है – ऋग्वैदिक अथवा पूर्ववैदिक काल (1500 ई.पू.-1000 ई.पू.)। उत्तर वैदिक काल (1000 ई.पू.-600 ई.पू.)

ऋग्वैदिक काल का इतिहास पूर्णतया ऋग्वेद से ज्ञात होता है। ऋग्वेद में लोहे का उल्लेख नही है। उत्तर वैदिक ग्रंथों में लोहे का उल्लेख मिलता है। ऋग्वेद में अफगानिस्तान की चार नदियों क्रुमु, कुभा, गोमती और सुवास्तु का उल्लेख मिलता है। ऋग्वेद में सप्त सैंधव प्रदेश की सात नदियों का उल्लेख मिलता है। ये नदियाँ हैं – सरस्वती, विपासा, परुष्णी, वितस्ता, सिंधु, शुतुद्री तथा अस्किनी।

ऋग्वेद में यमुना नदी का तीन बार जबकि गंगा नदी का एक बार उल्लेख हुआ है। इसमें कश्मीर की एक नदी मरुद्वृधा का उल्लेख मिलता है। ऋग्वेद में सिंधु नदी का सर्वाधिक बार उल्लेख हुआ है, जबकि ऋग्वैदिक आर्यों की सबसे पवित्र नदी सरस्वसती थी जिसे मातेतमा, देवीतमा एवं नदीतमा (नदियों में प्रमुख) कहा गया है।
सिंधु नदी को उसके आर्थिक महत्व के कारण ‘ हिरण्यनी‘ कहा गया है। तथा इसके गिरने की जगह ‘ परावत अर्थात् अरब सागर बताई गई है। गंगा-यमुना के दोआब एवं उसके समीपवर्ती क्षेत्रों को आर्यों ने ‘ ब्रहार्षि देश ‘ कहा है। आर्यों ने हिमालय और विंध्याचल पर्वतों के बीच का नाम ‘ मध्य देश ‘ रखा। कालांतर में आर्यों ने संपूर्ण उत्तर भारत पर अधिकार कर लिया | जिसे ‘ आर्यावर्त ‘ कहा जाता था। 1400 ई. पू. के बोगजकाई ( एशिया माइनर ) के अभिलेख में ऋग्वैदिक काल के देवताओं का उल्लेख मिलता है।

ऋग्वैदिक काल की नदियाँ –


  • प्राचीन नाम         

  • आधुनिक नाम

  • अस्किनी

  • चिनाब

  • विपासा

  • व्यास

  • परुष्णी

  • रावी

  • वितस्ता

  • झेलम

  • कुभा

  • काबुल

  • क्रुमु

  • कुर्रम

  • गोमती

  • गोमल

  • सुवास्तु

  • स्वात

  • सदानीरा

  • गंडक

  • शुतुद्री

  • सतलज

  • दृशाद्ती

  • घग्घर

वैदिक साहित्य को श्रुति भी कहा जाता है। श्रुति का शाब्दिक अर्थ है सुना हुआ। भारतीय साहित्य में वेद सर्वाधिक प्राचीन है। यह चार हैं –

ऋग्वेद
सामवेद
यजुर्वेद
अथर्ववेद

ऋग्वेद, यजुर्वेद तथा सामवेद को वेदत्रयी या त्रयी कहा जाता है। प्रत्येक वेद के चार भाग होते हैं –
संहिता
ब्राह्मण ग्रंथ
आरण्यक
उपनिषद

ऋग्वेद में कुल 10 मंडल तथा 1028 सूक्त हैं। 1017 सूक्त काकल में तथा 11 सूक्त बालखिल्य में हैं। ऋग्वेद के 2 से 7 तक के मंडल प्राचीन माने जाते हैं।
ऋग्वेद के मंडल एवं उसके रचयिता

  • ऋग्वेद के मंडल

  • रचयिता

  • प्रथम मंडल

  • मधुच्छन्दा, दीर्घतमा आदि

  • द्वीतीय मंडल

  • गृत्समद

  • तृतीय मंडल

  • विश्वामित्र

  • चतुर्त मंडल

  • वामदेव

  • पंचम मंडल

  • अत्रि

  • षष्ठम मंडल

  • भारद्वाज

  • सप्तम् मंडल

  • वशिष्ठ

  • अष्ट्म मंडल

  • कण्व एवं आंगिरस

  • नवम् मंडल

  • आंगिरस, काश्यप आदि

  • दशम् मंडल

  • त्रित, इंद्राणी, शची, श्रध्दा आदि
ऋग्वेद के तृतीय मंडल में गायत्री मंत्र का उल्लेख है। इसके रचनाकार विश्वामित्र हैं। यह सविता (सूर्य देवता) को समर्पित है। यह मंत्र ऋग्वेद के तृतीय मंडल में वर्णित है। ऋग्वेद के नौवें मंडल के सभी 114 मंत्र सोम को समर्पित हैं। प्रारंभ में हम तीन वर्णों का उल्लेख पाते हैं – ब्रह्म, छत्र तथा विश।

शुद्र शब्द का उल्लेख सर्वप्रथम ऋग्वेद के दसवें मंडल के पुरुष सूक्त में हुआ है। ऋग्वेद के मंत्रों का उच्चारण करके यज्ञ संपन्न कराने वाले पुरोहित को होता कहा जाता था। ऐतरेव तथा कौषीतकी ऋग्वेद के दो ब्राह्मण ग्रंथ है। पतंजलि के अनुसार, ऋग्वेद की 21 शाखाएँ हैं। ऐतरेय ब्राह्मण में शुनः शेप आख्यान का वर्णन मिलता है।
यजुर्वेद में स्तोत्र एवं कर्मकांड वर्णित है। यह वेद गद्य एवं पद्य दोनों में है। यजुर्वेद के कर्मकांडो को संपन्न कराने वाले पुरोहित को ‘ अर्ध्वयु ‘ कहा जाता था। यजुर्वेद की दो शाखाएं है- कृष्ण यजुर्वेद जो गद्य एवं पद्य दोनों में है।

और शुक्ल यजुर्वेद जो केवल पद्य में है। यजुर्वेद का अंतिम भाग ‘ ईशोपनिषद है , जिसका संबंध याज्ञिक अनुष्ठान से न होकर अध्यात्मिक चिंतन से है | शुक्ल यजुर्वेद की मुख्य संहिताओं को ‘ वाजसनेय ‘ भी कहा गया है। क्योंकि वाजसनी के पुत्र याज्ञवल्क्य इसके द्रष्टा थे। कृष्ण यजुर्वेद की मुख्य शाखाएं है – तैत्तिरीय, मैत्रायणी तथा कपिष्ठल | शतपथ ब्राह्मण यजुर्वेद का ब्राह्मण ग्रंथ है | इसमें पुनर्जन्म का सिद्धांत , जल प्लावन तथा पुरुरवा -उर्वशी आख्यान तथा पुरुषमेध का वर्णन है | साम का अर्थ संगीत अथवा गान होता है | सामवेद में यज्ञों के अवसर पर गाए जाने वाले मंत्रों का संग्रह है जो व्यक्ति इन मंत्रों को गाता था उसे ‘ उदगाता ‘  कहा जाता था | सामवेद में कुल 1810 छंद है ,  जिनमें से 75 को छोड़कर शेष सभी ऋग्वेद में भी उपलब्ध है | सामवेद की प्रमुख  शाखाएं हैं – कौथुमीय ,  राणायनीय  एवं जैमिनीय |

अथर्ववेद के मंत्रों का उच्चारण करने वाले पुरोहित को ब्रह्मा कहा जाता था | अथर्ववेद में मगध तथा अंग दोनों को दूरस्थ प्रदेश कहा गया है |इसमें सभा और समिति को प्रजापति की दो पुत्रियां कहा गया है | इसमें सामान्य मनुष्य के विचारों विश्वासों तथा अंधविश्वासों का वर्णन मिलता है | अथर्ववेद की दो शाखाएं उपलब्ध है – पिप्पलाद तथा शौनक |याज्ञवल्क्य -गार्गी के प्रसिद्ध संवाद का उल्लेख वृहदारण्यक उपनिषद में है। कठोपनिषद में यम और नचिकेता का संवाद उल्लिखित है। कठोपनिषद कृष्ण यजुर्वेद का उपनिषद है। ‘सत्यमेव जयते ‘ शब्द मुंडकोपनिषद से लिया गया है। अर्थववेद का एकमात्र ब्राह्मण ग्रंथ गोपथ ब्राह्मण है। इसका कोई आरण्यक नहीं है। उपनिषद दर्शन पर आधारित पुस्तकें हैं जिन्हें वेदांत भी कहा जाता है। उपनिषद का अर्थ शिष्य द्वारा ज्ञान प्राप्ति हेतु गुरू के समीप बैठना है। उपनिषद में प्रथम बार मोक्ष की चर्चा की गई है। यह शब्द श्वेताश्वर उपनिषद में पहली बार आया है।

वेदांग की संख्या 6 है यह है –
शिक्षा
कल्प
व्याकरण
निरुक्त
छंद एवं
ज्योतिष
शुल्व सूत्र में यज्ञीय वेदियों  को मापने , उनके स्थान चयन तथा निर्माण आदि का वर्णन है |
पुराणों की संख्या 18 है | यह है –
मत्स्य पुराण
मार्कंडेय पुराण
भविष्य पुराण
भागवत पुराण
ब्रह्मांड पुराण
ब्रह्मपुराण
वामन पुराण
वराह पुराण
विष्णु पुराण
अग्नि पुराण
नारद पुराण
लिंग पुराण
गरुड़ पुराण
स्कंद पुराण
शिव पुराण
पद्म पुराण
कूर्म
ब्रह्मवैवर्त

इनकी रचना लोमहर्ष ऋषि तथा उनके पुत्र उग्रश्र्वा  ने की थी | इनमें भविष्यत काल शैली में कलयुग के राजाओं का वर्णन मिलता है | हिंदू पौराणिक कथा के अनुसार समुद्र मंथन हेतु मथानी के रूप में मंदराचल पर्वत तथा रस्सी  के रूप में सर्पों के राजा वासुकी का प्रयोग किया गया था | इसमें विष्णु ने कूर्मा अवतार धारण कर मंद्राचल पर्वत को अपने ऊपर रखा था |

अनु , द्रहु , पुरु , यदु तथा तुर्वस को ‘ पंचजन ‘ कहा गया है |  जन के अधिपति को ‘ राजा ‘ कहा गया है | कुलप ,  परिवार का स्वामी पिता अथवा बड़ा भाई होता है | ग्राम का मुखिया  ‘ ग्रामणि ‘ तथा विश का प्रमुख विशपति कहलाता था। दशराज्ञ युद्ध का उल्लेख ऋग्वेद  7वें मंडल में मिलता है इस युद्ध में प्रत्येक पक्ष में आर्य अनार्य थे | यह  युद्ध परुष्णी  नदी ( आधुनिक रावी नदी ) के तट पर लड़ा गया | दशराज्ञ युद्ध  भरतों के राजा सुदास ( त्रित्सु राजवंश) तथा 10 राजाओं का एक संघ  ( इसमें पंचजन  तथा पांच लघु जनजातियों – अनिल , पक्थ , भलानस  शिव तथा विषाणिन के राजा सम्मिलित थे ) के मध्य हुआ था | इस युद्ध में सुदास  की विजय हुई | सुदास  के पुरोहित वशिष्ठ थे | ऋग वैदिक युग में राजा भूमि का स्वामी नहीं था वह प्रधानतः युद्ध में जन का नेता होता था | विदथ आर्यों की प्राचीन संस्था थी |  ऋग्वेद में पुरोहित सेनानी तथा ग्रामीणों का उल्लेख मिलता है | पुरोहित युद्ध के समय राजा के साथ जाता था | स्पश ( गुप्तचर ) तथा दूत नामक कर्मचारियों का भी उल्लेख मिलता है।
ऋग्वैदिक समाज की सबसे छोटी इकाई परिवार या कुल होती थी। परिवार के लिए ‘ गृह ‘ शब्द प्रयुक्त हुआ है। ऋगवैदिक समाज पितृसत्तामक समाज था। वरुण सूक्त के शुनःशेप आख्यान से ज्ञात होता है कि पिता अपनी संतान को बेच सकता था।

ऋग्वैदिक कालीन समाज प्रारंभ में वर्ग- विभेद से रहित था। ऋगवेद में ‘ वर्ण ‘ शब्द रंग के अर्थ में तथा कही कही व्यवसाय चयन के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। ऋगवेद के दसवें मंडल के पुरुष सूक्त के सर्वप्रथम ‘ शुद्र ‘ शब्द मिलता है। इसमें विराट पुरुष के विभिन्न अंगों से चार वर्णों की उत्पत्ति बताई गई है। विराट पुरुष के मुख से ब्राह्मण , भुजाओं से राजन्य ( श्रत्रिय ) , ऊरू ( जंघा ) से वैश्य और पैरों से शुद्र उत्पन्न हुए। गोत्र शब्द का सर्वप्रथम उल्लेख ऋग्वेद में हुआ था। गोत्र शब्द का मूल अर्थ है- गोष्ठ अथवा वह स्थान जहां समूचे कुल का गोधन पाला जाता था। परंतु बाद में इसका अर्थ एक ही मूल पुरुष से उत्पन्न लोगों का समुदाय हो गया। गोत्र प्रथा की स्थापना उत्तर वैदिक काल में हुई थी। आर्यों द्वारा अनार्यों को दिए गए विभिन्न नाम है – अब्रहमन ( वेदों को न मानने वाले ) , अयज्वन् (यज्ञ न करने वाले ) , अनासः (बिना नाक वाले) , अदेवयु (देवों को न मानने वाले) ,अव्रत ( वैदिक व्रतों का पालन न करने वाले) तथा मृधवाक् (कटु वाणी वाले)।

शतपथ ब्राह्मण में पत्नी को पति की अर्धांगिनी कहा गया है। ऋग्वेद में जायेदस्तम अर्थात् पत्नी ही गृह है, कह कर उसके महत्व को स्वीकार किया गया है | कन्या के विदाई के समय जो उपहार दिए जाते थे उसे ‘ वहतु ‘ कहा जाता था | स्त्रियों में पुनर्विवाह , नियोग प्रथा प्रचलित थी | नियोग प्रथा से उत्पन्न संतान ‘ क्षेत्रज ‘ कहलाती थी | समाज में सती प्रथा के प्रचलन का उदाहरण नहीं मिलता है| जो कन्याएं जीवन भर कुंवारी रहती थी  उन्हें अमाजू  कहा जाता था | ऋगवेद में घोषा , लोपामुद्रा , विश्ववारा , अपाला आदि स्त्रियां शिक्षित थी। तथा जिन्होंने कुछ मंत्रों की रचना भी की थी |  लोपामुद्रा अगस्त ऋषि की पत्नी थी |

आर्य मांसाहारी तथा शाकाहारी दोनों प्रकार का भोजन करते थे | भोजन में दूध , घी , दही आदि का विशेष महत्व था। दूध में पकी हुई खीर (क्षीरपाकौदन) का उल्लेख मिलता है। जो की सत्तू को दही में मिलाकर ‘ करंभ ‘ नामक खाद्य पदार्थ बनाया जाता था। ऋग्वैदिक काल में तीन प्रकार का वस्त्र प्रचलित था। ये था – नीवी , वासस् एवं अधिवासस् | स्त्री-पुरुष दोनों आभूषण पहनते थे।

ऋग्वैदिक आर्य आमोद प्रमोद का जीवन व्यतीत करते थे | रथदौड़, घुड़दौड़ तथा पासा खेलना भी उनके मनोरंजन के साधन थे | वाद्यों में झांझ मंजीरे , दुंदुभि , कर्करि, वीणा , बांसुरी आदि का उल्लेख मिलता है |
आर्यों की संस्कृति मूलतः ग्रामीण थी। कृषि और पशुपालन उनके आर्थिक जीवन का मूल आधार था | ऋग्वेद में पशुपालन की तुलना में कृषि का उल्लेख बहुत कम मिलता है | ऋग्वेद के मात्र 24 मंत्रों में ही कृषि का उल्लेख प्राप्त होता है | ‘ उर्वरा ‘ या क्षेत्र कृषि योग्य भूमि को कहा जाता था | बुआई , कटाई  , मड़ाई आदि क्रियाओं से लोग परिचित थे | ऋग्वेद में  कुल्या ( नहर) , कूप  तथा अवट ( खोदकर बनाए गए गड्ढे ) , अश्मचक्र ( रहट की चरखी ) आदि का उल्लेख है | ऋग वैदिक समाज में व्यवसाय अनुवांशिक नहीं थे |

ऋग्वेद में तक्षा (बढ़ई) ,  स्वर्णकार, चर्मकार , वाय ( जुलाहे ) , कर्मा ( धातु कर्म करने वाला ) , कुंभकार  आदि का उल्लेख मिलता है | कताई – बुनाई , का कार्य स्त्री पुरुष दोनों करते थे | ऋग्वेद से पता चलता है कि सिंध तथा गंधार प्रदेश सुंदर ऊनी वस्त्रों के लिए विख्यात थे। व्यापार अदल-बदल प्रणाली पर आधारित था। विनिमय के माध्यम के रूप में ‘ निष्क ‘ का उल्लेख हुआ है | व्यापार वाणिज्य  प्रधानतः ‘ पणि ‘ वर्ग के लोग करते थे |  ऋगवैदिक आर्य लोहे से परिचित नही थे।

ऋग्वैदिक कालीन शब्दावली एवं अर्थ –


  • नीवी

  • कमर के नीचे पहना जाने वाला वस्त्र

  • वासस्

  • कमर के ऊपर पहना जाने वाल वस्त्र

  • अधिवासम्

  • ऊपर से धारण किया जाने वाला चादर या ओढ़नी

  • तक्षा

  • बढ़ई

  • कर्मा

  • धातु कर्मे करने वाले

  • वेकनाट

  • सूदखोर

  • अरित्र

  • पतवार

  • अरितृ

  • नाविक


वैदिक साहित्य में ऋग्वेद प्राचीनतम ग्रंथ है जिसमें हमें सर्वप्रथम बहूदेववाद के दर्शन प्राप्त होते हैं | यास्क के निरुक्त के अनुसार ऋग्वैदिक देवताओं की संख्या मात्र 3 बताई गई है | ऋग्वेद में एक अन्य स्थल पर प्रत्येक लोक में 11 देवताओं का निवास मानकर उनकी संख्या 33 बताई गई है | ऋग्वैदिक देवताओं का वर्गीकरण तीन वर्गों में किया गया है |  पृथ्वी के देवता — पृथ्वी , अग्नि , बृहस्पति , सोम आदि |  आकाश के देवता — सूर्य , मित्र , पूषन , विष्णु , द्यौ , अश्विन आदि। अंतरिक्ष के देवता — इंद्र , पर्जन्य , रुद्र  , आप  , वायु  , वात  आदि  | * इंद्र को विश्व का स्वामी बताया गया है| * इन्हें पुरंदर अर्थात्  ‘ किलों को तोड़ने वाला ‘ कहा गया है।

ऋगवेद में सर्वाधिक सूक्त (250) इंद्र को समर्पित है। * इंद्र को आर्यों का युद्ध नेता तथा वर्षा का देवता माना जाता है। * ऋगवेद में अग्नि को 200 सूक्त समर्पित है। और वह इस काल के दूसरे सर्वाधिक महत्वपूर्ण देवता है। ऋग्वैदिक देवताओं में वरुण को तीसरा स्थान प्राप्त था | वरुण को समुंद्र का देवता एवं ऋतु का नियामक कहा जाता है | * वरुण को वैदिक सभ्यता में नैतिक व्यवस्था का प्रधान माना जाता था। इसी कारण उन्हें ‘ ऋतस्यगोपा ‘ भी कहा जाता था |ईरान में वरुण को ‘ अहुरमज़्दा ‘  तथा यूनान में वरुण को ‘ ओरनोज़ ‘ नाम से जाना जाता है |  ऋग्वेद के नौवें मंडल के सभी 114 मंत्र ‘ सोम ‘ को समर्पित हैं | वनस्पतियों एवं औषधियों का देवता पूषन है | इनके रथ को बकरे द्वारा खींचते हुए प्रदर्शित किया गया है | जंगल की देवी ‘ अरण्यानी ‘  जबकि ज्ञान की देवी ‘ सरस्वती ‘ थी।

उत्तर वैदिक काल में अनु ,द्रुह्य, तुर्वश , क्रिवि , पुरु तथा भरत आदि जनों का लोप हो गया | शतपथ ब्राह्मण में कुरू और पांचाल को वैदिक सभ्यता का सर्वश्रेष्ठ प्रतिनिधि माना गया | छंदोंग्योपनिषद से ज्ञात होता है कि कुरु जनपद में कभी ओले नहीं पड़े न ही टिड्डीयों  के उपद्रव के कारण अकाल ही पड़ा | उत्तर वैदिक काल में काशी , कोशल , कुरु , पांचाल वैदेही आदि प्रमुख राज्य थे | विदेह के जनक , पांचाल के राजा  प्रवाहणजाबालि  , केकय के राजा अश्वपति , और काशी के राजा अजातशत्रु प्रमुख थे।

विभिन्न दिशाओं में राजा के विभिन्न नाम


  • पूर्व

  • सम्राट

  • पश्चिम

  • स्वराट्

  • उत्तर

  • विराट

  • दक्षिण

  • भोज

  • मध्य

  • राजा

ऐतरेय ब्राह्मण में सर्वप्रथम राजा की उत्पत्ति का सिद्धांत मिलता है | *ऐतरेय ब्राह्मण में कहा गया है कि समुद्रपर्यंत पृथ्वी का शासक एकराट होता है |अथर्ववेद में एकराट सर्वोच्च शासक को कहा गया है | * अथर्ववेद में परीक्षित को ‘ मृत्युलोक का देवता ‘ कहा गया है |

छांदोग्योपनिषद में उद्दालक आरुणि एन उनके पुत्र श्वेतकेतु के बीच ब्रह्म एवं आत्मा की अभिन्नता के विषय में संवाद है। अथर्ववेद में सभा और समिति को प्रजापति की दो पुत्रियां कहा गया है | वैदिक काल में सभा और समिति नामक दो संस्थाएं राजा की निरंकुशता पर नियंत्रण रखती थी | * संभवतः सभा कुलीन या वृद्ध मनुष्यों की संस्था थी जिसमें उच्च कुल में उत्पन्न व्यक्ति ही भाग ले सकते थे इसके विपरीत समिति सर्वसाधारण की सभा थी जिसमें जनों के सभी व्यक्ति अथवा परिवारों के प्रमुख भाग ले सकते थे| सभा का ऋग्वेद में 8 बार उल्लेख मिलता है। ऋग्वेद में समिति का 9 बार उल्लेख मिलता है | उत्तर वैदिक काल में सभा में महिलाओं की भागीदारी बंद कर दी गई |संहिता एवं ब्राह्मण काल तक समिति का प्रभाव कम हो गया और यह केवल परामर्शदायिनी परिषद ही रह गई।

शतपथ ब्राह्मण मे सर्वाधिक 12 रत्नियों का उल्लेख है।


  • पुरोहित

  • राजा का प्रमुख परामर्शदाता

  • सेनानी

  • सेना का प्रमुख

  • ग्रामीण

  • ग्राम का मुखिया

  • महिषी

  • राजा की पत्नी

  • सूत

  • रथ सेना का नायक

  • संग्रहीता

  • कोषाध्यक्ष

  • भागदुध

  • कर एकत्र करने वाला अधिकारी

  • अक्षावाप

  • लेखाधिकारी

  • पालागल

  • विदूषक

  • क्षता

  • प्रतिहारी या दौवारिक

शतपथ ब्राह्मण तथा काठक संहिता में गोविकर्तन ( गवाध्यक्ष ) , तक्षा (बढ़ई) , रथकार (रथ बनाने वाला) का नाम भी रत्नियों की सूची में मिलता है। * शतपथ ब्राह्मण में राजसूय यज्ञ का विस्तृत वर्णन है। * राजसूय यज्ञ में राजा का अभिशेक 17 प्रकार के जल से किया जाता था।

पारिवारिक जीवन ऋग्वैदिक काल के समान था। समाज पितृसत्तामक था। ऐतरेय ब्राह्मण से पता चलता है कि अजीगर्त ने अपने पुत्र शुनः शेप को 100 गाये लेकर बलि के लिए बेच दिया था। उत्तर वैदिक काल में समाज चार वर्णों में विभक्त था – ब्रह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र। ऐतरेय ब्राह्मण में चार वर्णों के कर्त्तव्यों का वर्णन मिलता है। श्रत्रिय या राजा भूमि का स्वामी होता था। वैश्य दूसरों को कर देते थे (अन्यस्यबलिकृत) शूद्र को तीनों वर्णों का सेवक (अन्यस्य प्रेष्यः) कहा गया है। ऐतरेय ब्राह्मण में कन्या को चिंता का कारण माना गया है। मैत्रायणी संहिता में स्त्री को घूत और मदिरा की श्रेणी में रखा गया है। *वृहदारण्यक उपनिषद में याज्ञवल्क्य – गार्गी संवाद का उल्लेख है। उत्तर वैदिक काल में स्त्रियों की  दशा में गिरावट आई।

छांदोग्योपनिषद में केवल तीन आश्रमों का उल्लेख है , जबकि सर्वप्रथम चार आश्रमों का उल्लेख जाबालोपनिषद में मिलता है। ये है – ब्रह्मचर्य (25 वर्ष ) , गृहस्थ ( 25-50 ) , वान प्रस्थ ( 50-75 वर्ष ) तथा संन्यास ( 75-100 वर्ष ) | मनुष्य की आयु 100 वर्ष मानकर प्रत्येक आश्रम के लिए 25-25 वर्ष आयु निर्धारित की गई। 

बौधायन धर्मसूत्र के अनुसार , गायत्री मंत्र द्वारा ब्राह्मण बालक का उपनयन संस्कार वसंत ऋतु में 8 वर्ष की अवस्था में किया जाता था | त्रिष्टुप  मंत्र द्वारा छत्रिय बालक का उपनयन संस्कार ग्रीष्म ऋतु में 11 वर्ष की अवस्था में होता था | जगती मंत्र द्वारा वैश्य बालक का उपनयन संस्कार शरद ऋतु में 12 वर्ष की अवस्था में होता था | वैदिक काल में जीविकोपार्जन हेतु वेद वेदांग पढ़ाने वाला अध्यापक ‘ उपाध्याय ‘ कहलाता था | ब्रह्मवादिनी वे कन्याएं थी  जो जीवन भर आश्रम में रहकर शिक्षा प्राप्त करती थी। जबकि साधोवधू विवाह पूर्व तक शिक्षा प्राप्त करने वाली कन्याए थी | गृहस्थ आश्रम  में मनुष्य को पांच महा यज्ञ का अनुष्ठान करना पड़ता था |

यह पांच महायज्ञ है – *ब्रह्म यज्ञ – प्राचीन ऋषियों के प्रति श्रद्धा प्रकट करना ।देवयज्ञ –  देवताओं का सम्मान * भूतयज्ञ –  सभी प्राणियों के कल्याणर्थ  पितृ यज्ञ – पितरों के तर्पण हेतु * मनुष्य यज्ञ – मानव मात्र के कल्याण हेतु
शतपथ ब्राह्मण में कृषि की चारों क्रियाओं का उल्लेख हुआ है यह है जुताई , बुवाई , कटाई तथा मड़ाई | काठक संहिता में 24 बैलों द्वारा हलों को खींचने का उल्लेख मिलता है | उत्तर वैदिक काल में उत्तर भारत में लोहे का प्रचार हुआ उत्तर वैदिक साहित्य में लोहे को ‘ कृष्ण अयस ‘ कहा गया है | तैत्तिरीय संहिता में ऋण के लिए ‘ कुसीद ‘ तथा शतपथ ब्राह्मण में उधार देने वाले के लिए ‘ कुसीदिन ‘ शब्द मिलता है।  माप की विभिन्न इकाइयां थी – निष्क , शतमान , कृष्णल , पाद आदि |  ‘ कृष्णल ‘ संभवतः बाट की मूलभूत इकाई थी | गुंजा तथा रत्तिका भी उसी के समान थे। रत्तिका को साहित्य में ‘ तुलीबाज ‘ कहा गया है। शतपथ ब्राह्मण में पूर्वी तथा पश्चिमी समुद्रों का उल्लेख हुआ। *वाजसनेयी संहिता एवं तैत्तिरेय ब्राह्मण में विभिन्न व्यवसायों की लंबी सूची मिलती है। इनमें प्रमुख है -रथकार , स्वर्णकार , लोहार , सूत ,  कुंभकार , चर्मकार , रज्जुकार आदि | स्त्रियां रंगाई , सूईकारी  आदि में निपुण थी |   उत्तर वैदिक काल के लोगों में लाल मृदभांड अधिक प्रचलित था | उत्तर वैदिक काल में व्यापार वस्तु विनिमय पर आधारित था |

उत्तर वैदिक काल में धर्म और दर्शन के क्षेत्र में महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए| ऋग्वैदिक काल के वरुण , इंद्र आदि का स्थान प्रजापति , विष्णु  एवं रुद्र शिव ने ले लिया | यज्ञ में पशुबलि  को प्राथमिकता दी गई तथा अन्य आहुतियां गौण होने लगी। | राजसूय , अश्वमेध तथा वाजपेय जैसे विशाल यज्ञों का अनुष्ठान किया जाने लगा ! अग्निष्टोम यज्ञ पांच दिनों तक चलता था। पहली बार शतपथ ब्राह्मण में पुनर्जन्म के सिद्धांत का उल्लेख मिलता है। उपनिषदों में  ब्रह्म एवं आत्मा के संबंधों की व्याख्या की गई। पुरुषार्थ की संख्या चार है – धर्म , अर्थ , काम तथा मोक्ष | धर्म , अर्थ तथा काम को त्रिवर्ग कहा गया है। गृह्य सूत्रों में 16 प्रकार के संस्कारों का  उल्लेख है। ये हैं – गर्भाधान , पुंसवन , सीमंतोन्नयन , जातकर्म , नामकरण , निष्क्रमण , अन्नप्राशन , चूड़ाकर्म , कर्णवेध , विधारम्भ, उपनयन , वेदारम्भ , केशांत , समावर्तन  , विवाह एवं अंत्येष्टि | गृह्य सूत्र में आठ प्रकार के विवाहों का  उल्लेख है।  ये हैं-. – ब्रह्मा , दैव , आर्ष , प्रजापत्य , गंधर्व , असुर , राक्षस , पैशाच विवाह |

आर्य प्राचीन भारत-यूरोपीय एवं प्राचीन ईरानी भाषा बोलने वालों के लिए प्रयुक्त शब्द है। वैदिक संस्कृति मे आर्य शब्द श्रेष्ठ, शिष्ट अथवा सज्जन तथा नैतिक अर्थ में महाकुल, कुलीन सभ्य, साधू आदि के लिए प्रयुक्त हुआ है। सायणाचार्य ने अपने ऋग्भाष्य में आर्य का अर्थ विज्ञ, यज्ञ का अनुष्ठाता, विज्ञ स्रोता, विज्ञान आदरणीय अथवा सर्वत्र गंतव्य, उत्तम वर्ष, मनु, कर्मयुक्त और कर्मानुष्ठान से श्रेष्ठ आदि बताया है। अतः आर्य संस्कृत भाषा का शब्द है जिसका शाब्दिक अर्थ श्रेष्ठ या कुलीन है।

क्लासिकीय संस्कृति में आर्य शब्द का अर्थ है – एक उत्तम व्यक्ति। वैदिक साहित्य में कही भी आर्य का एक जाति अथवा विशेष भाषा-भाषी के रुप में उल्लेख नही हुआ है।
भारतीय साहित्य में चार वेद हैं – ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद तथा अथर्ववेद। इनमे से ऋग्वेद सर्वाधित प्राचीन माना जाता है।

ऋग्वेद, यजुर्वेद तथा सामवेद को वेदत्रयी या त्रयी कहा जाता है।
वर्ण शब्द का सर्वप्रथम उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है। ऋग्वेद में वर्ण शब्द रंग के अर्थ में तथा कहीं-कहीं व्यवसाय-चयन के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। आर्यों को गौर वर्ण तथा दासों को कृष्ण वर्ण का कहा गया है। ऋग्वेद के दसवें मंडल के पुरुषयुक्त में सर्वप्रथम शूद्र शब्द मिलता है।

अथर्ववेद औषधियों से संबंधित है। ऋग्वेद में ईश्वर महिमा (देवताओं की स्तुति), यजुर्वेद में कर्मकांड (बलिदान विधि) एवं सामवेद में संगीत का विस्तृत उल्लेख है।

ऋग्वेद मे स्तोत्र एवं प्रार्थनाएँ हैं, इसमें कुल 1028 सूक्त या ऋचाएँ है। यजुर्वेद में स्तोत्र एवं कर्मकांड वर्णित हैं। सामवेद के पद गेय रुप में (संगीतमय स्तोत्र) हैं, जिनको उद्गाता पुरोहित गाता था। अथर्ववेद में कुल 20 अध्यायों एवं 731 सूक्तों में तंत्र-मंत्र एवं वशीकरण के संदर्भ में साक्ष्य हैं।

सही सुमेलित हैं

  • ऋग्वेद    – ऐतरेय

  • सामवेद   – पंचवीश

  • अथर्ववेद   – गोपथ

  • यजुर्वेद    – शतपथ


ब्राह्मण ग्रंथ तथा यज्ञों तथा उनके अनुष्ठान के विधि-विधानों के संबंध में जानकारी देते हैं। ऐतरेय ब्रह्मण तथा कौशीतकी ब्राह्मण ऋग्वेद से, ताण्डव ब्राह्मण, पंचविश ब्राह्मण तथा जैमिनीय ब्राह्मण सामवेद से, शतपथ ब्राह्मण यजुर्वेद से, जबकि गोपथ ब्राह्मण अथर्ववेद से संबंध्द है।

ऋग्वेद में कुल 10 मंडल हैं। इसके नौवें मंडल के सभी 114 सूक्त सोम को समर्पित हैं।
यज्ञ संबंधी विधि-विधानों का पता यजुर्वेद से चलता है। यजुर्वेद के दो भाग हैं – शुक्ल यजुर्वेद तथा कृष्ण यजुर्वेद।
सामवेद में कुल 1810 छंद हैं, जिनमें से 75 को छोड़कर शेष सभी ऋग्वेद मे भी उपलब्ध है। अतः सामवेद का संकलन ऋग्वेद पर आधारित है।

अहिच्छत्र, अतरंजीखेड़ा, आलमगीरपुर, मथुरा, रोपड़, श्रावस्ती, काम्पिल्य आदि स्थानों की खुदाइयों से लौह युगीन संस्कृति के अवशेष प्राप्त हुए हैं। अतरंजीखेड़ा से लौह धातु मल तथा धातु शोधन में प्रयुक्त होने वाली भठ्ठियाँ मिली हैं, जिनसे यह संकेत मिलता है कि यहां लौह धातु को गलाने का कार्य स्थानीय रुप से होता था।
उपनिषद दर्शन पर आधारित पुस्तकें हैं। इन्हें वेदांत भी कहा जाता है।

वेदो में मोक्ष शब्द प्रयुक्त नही हुआ है। उपनिषदों में प्रथम बार मोक्ष की चर्चा मिलती है। यह शब्द श्वेताश्वर उपनिषद में पहली बार आया है।

कठोपनिषद में यम और नचिकेता का संवाद उल्लिखित है, जिसमें आचार्य यम ने नचिकेता को उपदेश दिया है – न इस आत्मा का कभी जन्म होता है और न इसकी कभी मृत्यु होती है। यह अजन्मा, नित्य तथा शाश्वत है। कठोपनिषद कृष्ण यजुर्वेद का उपनिषद है।

उपनिषदों में वर्णित राजाओं में – विदेह के राजा जनक, पांचाल के राजा प्रवाहणजाबालि, केकय के राजा अश्वपति और काशी के राजा अजातशत्रु प्रमुख थे।

वैदिक संहिताओं का सही क्रम है – वैदिक संहिताएँ, ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषद।
सिंधु नदी का ऋग्वैदिक काल में सर्वाधिक महत्व था। इसी कारण इसका उल्लेख ऋग्वेद में सर्वाधिक हुआ है। सिंधु नदी को उसके आर्थिक महत्व के कारण हिरण्यनी कहा गया है।
वैदिक नदी अस्किनी की पहचान चेनाब नदी से की गई है।

ऋग्वेद में उल्लिखित कुंभा (काबुल), क्रमु (कुर्रम), गोमती (गोमल) एवं सुवालु (स्वात) नदियाँ अफगानिस्तान में बहती थी। इन नदियों का उल्लेख से स्पष्ट होता है कि आर्यों का अफगानिस्तान के साथ गहन संबंध था।
ऋग्वेद में हमें धर्म के अतिरिक्त दूसरा शब्द ऋत मिलता है। सभी देवताओं का संबंध ऋत (विश्व की नैतिक एवं भौतिक व्यवस्था) से माना गया है। ऋग्वेद में इसका वर्णन है। सृष्टि के आदि में सर्वप्रथम ऋत की उत्पत्ति हुई थी। ऋत के द्वारा विश्व में सुव्यवस्था तथा प्रतिष्ठा स्थापित होती है। यह विश्व की व्यवस्था का नियामक है।
बृहस्पति जी को वैदिक देवताओं का पुरोहित मान जाता था।

वैदिक साहित्य में कई ऐसी विदुषी स्त्रियों का उल्लेख मिलता है, जिन्होंने वेद मंत्रों की रचना की थी। यथा- आपाला, घोषा, विश्वावारा, लोपामुद्रा आदि। मुद्रा अगस्त्य ऋषि की पत्नी थी।
वैदिक काल में सोने के हार को निष्क कहा जाता था। निष्क के प्रयोग ने आगे आने वाले सिक्कों के व्यवहार के मार्ग को प्रशस्त कर दिया।

बौध्द जातक में तीन प्रकार के स्वर्ण सिक्कों का उल्लेख मिलता है। प्रथम क्रम में निशाका, दूसरे क्रम में सुवर्ण और तीसरे क्रम में मशाका। मशाका मूल्य की दृष्टि से सबसे निम्न और निशाका उच्च मूल्य वाली मुद्रा थी।
एशिया माइनर स्थित बोगजकोई से चौदहवी शताब्दी ई.पू. के अभिलेख में ऋग्वैदिक काल में देवताओं (इंद्र, वरुण, मित्र तथा नासत्य) का उल्लेख मिलता है। इससे ज्ञात होता है कि वैदिक आर्य ईरान से होकर ही भारत में आए होंगे।

बाल गंगाधर तिलक ने आर्यों के आदि देश के बारे में लिखा था। तिलक ने यह मत व्यक्त किया था कि आर्यों का आदि देश उत्तरी ध्रुव था। किंतु तिलक का यह मत इतिहासकारों में मान्य नही है।
शतपथ ब्राह्मण यजुर्वेद का ब्राह्मण है। पुरुष मेध का उल्लेख शतपथ ब्रह्मण में ही हुआ है।
आर्यों के पूर्व दिशा की ओर प्रसार के विषय मे शतपथ ब्रह्मण में वर्णित निदेघ माधव की आख्यायिक उल्लेखनीय है। इसके अनुसार राजा विदेघ माधव में संबंधित ऋषि गौतम रहुगण थे।

अंग तथा मगध को आर्य संस्कृति का धुर माना जाता है। ये लोग प्राकृत भाषा बोलते थे। और आर्य संस्कृति के प्रभाव से बाहर थे। इनके प्रति तिरस्कार पूर्ण भाव प्रकट किए गए हैं। तथा यहाँ के लोगों के ज्वर ग्रसित होने की भावना भी व्यक्त की गई है। अथर्ववेद में मगध तथा अंग दोनो को दूरस्थ प्रदेश कहा गया है।

गोत्र शब्द का सर्वप्रथम उल्लेख ऋग्वेद मे हुआ था। गोत्र शब्द का मूल अर्थ है – गोष्ठ अथवा वह स्थान जहाँ समूचे कुल का गोधन पाला जाता था।

पूर्व वैदिक आर्यों का धर्म मुख्यतः प्रकृति पूजा और यज्ञ पर आधारित था। भक्ति का उदय मौर्योत्तर काल में हुआ था, जबकि वैदिक काल में मूर्ति पूजा का प्रचलन नही था।

ऋग्वैदिक काल में यज्ञ की प्रधानता थी। यज्ञ हिंसात्मक और अहिंसात्मक दोनों ही होता था। देव-पूजा के साथ-साथ पितरों की पूजा भी होती थी।

दशराज युध्द (दस राजाओं का युध्द) परुष्णी नदी (आधुनिक रावी नदी) के तट पर लड़ा गया, जिसमें भरतों के राजा सुदास विजय हुई।

ऋग्वेद में सरस्वती को मातेतमा, देवीतमा एवं नदीतमा कहा गया है अर्थात् सबसे अच्छी मां, सबसे अच्छी देवी तथा सबसे अच्छी नदी।

ऋग्वैदिक आर्यों की पंचजनों में यद्, द्रुह्यु, पुरु, अनु, तुर्वसु शामिल थे।
प्रारंभ में आर्य खानाबदोश एवं शिकारी थे, प्रायः अस्थायी जीवन जीते थे और इनके जीवन में कृषि का महत्व नगण्य था। उत्तर वैदिक काल में ही आर्यों के स्थायी आवास का साक्ष्य मिलता है।
वैदिक काल में प्रचलित लोकप्रिय शासन प्रणाली-वंश परंपरागत राजतंत्र थी। यद्यपि जनता द्वारा चुनाव के उदाहरण भी मिलते हैं।

वैदिक काल में समिति नामक दो संस्थाएँ राजा की निरंकुशता पर नियंत्रण रखती थी। संभवतः सभा कुलीन या वृध्द मनुष्यों की संस्था थी, जिसमें उच्च कुल में उत्पन्न व्यक्ति ही भाग ले सकते थे।
अथर्ववेद में सभा और समिति को प्रजापति की दो पुत्रियाँ कहा गया है।

अथर्ववेद में सामान्य मनुष्यों के विचारों तथा अंधविश्वासों का विवरण मिलता है। इसमें विविध विषयों यथा – रोग निवारण, समन्वय, राजभक्ति, विवाह तथा प्रणय-गीतों आदि के विवरण सुरक्षित हैं।

ऋग्वेद में सर्वप्रथम बहुदेववाद के दर्शन होते हैं। आर्य विभिन्न देवताओँ के अस्तित्व में विश्वास करते थे। मुख्यतः वैदिक देवताओं के तीन वर्ग हैं –
द्युस्थान (आकाश) के देवता
अंतरिक्ष के देवता
पृथ्वी के देवता

ऋग्वेद में इंद्र का वर्णन सर्वाधिक प्रतापी देवता के रुप में किया जाता है, जिसे 250 सूक्त समर्पित है। यह ऋग्वैदिक काल में सर्वाधिक लोकप्रिय देवता था। इन्द्र को आर्यों का युध्द नेता तथा वर्षा, आंधी, तूफान का देवता माना जाता है।

800 से 600 ईसा पूर्व का काल ब्राह्मण युग से जुड़ा है। प्रायः सातवी या छठी शताब्दी ई.पू. से लेकर तीसरी शताब्दी ई.पू. तक का समय सूत्र काल कहा जाता है।

गायत्री मंत्र ऋग्वेद में उल्लिखित है। इसमें रचनाकार विश्वामित्र हैं। यह साविता (सूर्य देवता) को समर्पित है। यह मंत्र ऋग्वेद के तृतीय मंडल में वर्णित है।

पुराणों में पांच प्रकार के विषयों का वर्णन सिध्दांततः इस प्रकार है – सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, मन्वन्तर तथा वंशानुचरित। सर्ग बीज या आदि सृष्टि का पुराण है, प्रतिसर्ग प्रलय के बाद ही पुनर्सृष्टि को कहते हैं, वंश में देवताओं या ऋषियों के वंश वृक्षों का वर्णन है, मन्वन्तर में कल्प के महायुगें का वर्णन है और वंशानुचरित पुराणों के वे अंग हैं, जिनमें राजवंशों की तालिकाएँ दी हुई हैं और राजनीतिक अवस्थाओं, कक्षाओं तथा घटनाओं के वर्णन हैं।

पुराणों की संख्या 18 है। इनकी रचना लोमहर्ष ऋषि तथा उनके पुत्र उग्रश्रवा द्वारा की गई थी।
श्रीमद्भागवतगीता मौलिक रुप से संस्कृत भाषा में लिखी गई थी। यह प्राचीन धार्मिक ग्रंथ महाभारत का एक भाग है।

महाभारत के प्रारंभिक रचना काल में 8800 श्लोक थे और इसे जयसंहिता के नाम से जाना जाता था। महाभारत का दूसरा संस्करण भारत था जिसमें श्लोकों की संख्या 24000 थी। वर्तमान महाभारत में एक लाख श्लोक प्राप्त हैं। यह इसका अंतिम संस्करण है, जिसे शतसहस्त्री संहिता या महाभारत कहा गया।

हिंदू पौराणिक कथा के अनुसार, समुद्र मंथन हेतु मथानी के रुप में मंद्राचल पर्वत तथा रस्सी के रुप में सर्पो के राजा वासुकी का प्रयोग किया गया था।

धर्मशास्त्रों के समय में (सूत्र काल में) चार वर्णों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र) के अतिरिक्त समाज में अन्य अनेक जातियों यथा – अम्बष्ठ, उग्र, निषाद, मागध, वैदेहक, रथकार आदि का आविर्भाव अनुलोम एवं प्रतिलोम विवाहों के फलस्वरुप हो गया। पाणिनि ने दो प्रकार के शूद्रों का उल्लेख किया है – निरवसित एवं अनिरवसित। इनमें पहले प्रकार के शूद्र ही अस्पृश्य माने जाते थे।

सत्यमेव जयते शब्द मुंडकोपनिषद से लिया गया है, न कि मंडूकोपनिषद से, जिसका अर्थ है – सत्य की ही विजय होती है। यह भारत के राजचिन्ह पर भी अंकित है।

तमसो मा ज्योर्तिर्गमय कथन वृहदारण्यक उपनिषद से लिया गया है। इस कथन का अर्थ है – अंधकार से प्रकाश की ओर।

सत्यकाम जाबाल महर्षि गौतम के शिष्य थे, जिनकी माता का नाम जबाला था। सत्यकाम जाबाल की कथा जो अनब्याही मां होने के लांछन को चुनौती देती है, इनकी कथा छांदोग्य उपनिषद् में उल्लिखित है।
अवेस्ता और ऋग्वेद दोनों भाषिक समानताओं के कारण आर्यों की सभ्यता से संबंधित माना जाते हैं। अवेस्ता ईरान के क्षेत्र से संबंधित हैं।

वैदिक काल में गाय को अघन्या (न मारे जाने योग्य) माना गया है। गाय की हत्या अथवा उसे घायल करने वाले व्यक्ति को मृत्युदंड तथा देश निकाला की व्यवस्था वेदों में दी गई है।

ऋग्वैदिक काल के प्रारंभ में गाय को महत्वपूर्ण संपत्ति समझा जाता था। इस काल में गायें मुख्यतः विनिमय का माध्यम होती थी। ऋग्वेद के कुछ सूक्तों में गाय को देवता के रुप में कल्पित किया गया है।
प्राचीन भारतीय समाज के संदर्भ में कुल, वंश तथा गोत्र परिवार से संबंधित हैं, जबकि कोश परिवार से संबंधित न होकर भंडार से संबंधित है।

संस्कार का शाब्दिक अर्थ है – परिष्कार, शुध्दता अथवा पवित्रता। गौतम धर्मसूत्र मे इसकी संख्या अड़तालीस मिलती है। मनु ने गर्भाधान से मृत्यु-पर्यंत तेरह संस्कारों का उल्लेख किया है। बाद की स्मृतियों में इनकी संख्या सोलह स्वीकार किया गया। आज यही सर्वप्रचलित है।

वैदिक काल में जीविकोपार्जन हेतु – वेद-वेदांग पढ़ाने वाला अध्यापक उपाध्याय कहलाता था, आचार्य गुरुकुल की स्थापना करके अपने शिष्यों को पढ़ाता था तथा कोई फीस नही लेता था, किंतु शिष्य के द्वारा दी गई दक्षिणा स्वीकार कर लेता था।