History in Hindi for All Competitive Exams (State Level) Part 4

आलमगीरपुर उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले में हिंडन नदी के किनारे स्थित है | यहां पर खुदाई में मृदभांड एवं मनके मिले हैं | कुछ बर्तनों पर त्रिभुज , मोर , गिलहरी आदि की चित्रकारियां मिली है।
हुलास, उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले में स्थित है | यहां से कांचली मिट्टी के मनके, चूड़ियां, खिलौना-गाड़ी आदि मिले हैं | सैंधव लिपियुक्त एक ठप्पा का भी साक्ष्य मिला है। देसलपुर से एक रक्षा प्राचीर मिला है।
सुल्कागेनडोर स्थल दक्षिण बलूचिस्तान में दाश्त नदी के किनारे मिला है। इसकी खोज वर्ष 1927 में आरेल स्टीन ने की थी। इसका दुर्ग एक प्राकृतिक चट्टान के ऊपर है | यहां से मृदभांड , एक ताम्रानिर्मित बाणाग्र , ताम्रानिर्मित ब्लेड के टुकड़े , तिकोने ठीकरे तथा मिट्टी की चूड़ियों के अवशेष प्राप्त हुए हैं।
सोत्काकोह सुत्कागेनडोर के पूर्व में स्थित है। वर्ष 1962 में इसकी खोज डेल्स द्वारा की गई। यहां से दो टीले मिले हैं। जिसका आकार सुल्कागेनडोर जैसा ही है।
·      बलूचिस्तान के दक्षिणी तटवर्ती पट्टी पर स्थित बालाकोट एक बंदरगाह के रूप में कार्य करता था। यहां से हड़प्पा पूर्व एवं हड़प्पाकालीन अवशेष प्राप्त हुए हैं। इसकी नगर योजना सुनिश्चित थी। भवनों के निर्माण में कच्ची ईंटों की जबकि नालियों के निर्माण में पक्की ईटों का प्रयोग किया जाता था। यहां का सबसे समृद्ध उद्योग सीप उद्योग था | यहां से हजारों की संख्या में सीप की बनी चूड़ियों के टुकड़े मिले हैं।
·      बनावली हरियाणा के हिसार जिले में स्थित है। वर्ष 1973-74 में आर. एस. बिष्ट द्वारा इस स्थल का उत्खनन करवाया गया।  यहाँ से संस्कृति के तीन स्तर प्रकाश में आए हैं – प्राक् सैंधव , विकसित सैंधव एंव उत्तर सैंधव | यहाँ की सड़के नगर को तारांकित ( star shaped ) भागों में विभाजित करती है। यहां से मुहरे , बटखरे , लाजवर्द तथा कार्नेलियन के मनके , हल की आकृति  के खिलौने , तांबे.के बाणाग्र आदि के साक्ष्य मिले है। भगवानपुरा हरियाणा के कुरुक्षेत्र जिले में सरस्वती नदी के दक्षिणी किनारे पर स्थित है। जे पी जोशी ने इसका उत्खनन कराया था। यहां के प्रमुख अवशेषों में सफेद , काले तथा आसमानी रंग की कांच की चूड़ियां , तांबे की चूड़ियां, कांच की मिट्टी के चित्रित मनके आदि हैं।
माण्डा जम्मू-कश्मीर के चेनाब नदी के दक्षिणी किनारे पर स्थित है। वर्ष 1982 में इसका उत्खनन जे पी जोशी तथा मधुबाला द्वारा करवाया गया था | उत्खनन से प्राप्त यहां से तीन संस्कृति स्तर हैं – प्राक् सैंधव , विकसित सैंधव एंव उत्तर कालीन सैंधव | यहां से मिट्टी के ठीकरे , हड्डी के नुकीले बाणाग्र चर्ट ब्लेड , कांस्य निर्मित पंचदार पिन तथा एक आधी-अधूरी मुहर आदि के अवशेष प्राप्त हुए है। उत्तर प्रदेश के बागपत जिले में बारोट तहसील के सनौली नामक हड़प्पा पुरास्थल से क्रमबद्ध रूप से 125 मानव शवाधान प्राप्त हुए हैं जिनकी दिशा उत्तर से दक्षिण है। मिस्र की सभ्यता का विकास नील नदी की द्रोणी में हुआ | मिस्र को नील नदी का उपहार कहा जाता है क्योंकि इस नदी के अभाव में यह भू-भाग  रेगिस्तान होता | सुमेरिया सभ्यता के लोग प्राचीन विश्व के प्रथम लिपि–आविष्कर्ता थे|
खुदाई से प्राप्त बहुसंख्यक नारी मूर्तियों से अनुमान लगाया जाता है कि सैंधव सभ्यता मातृसत्तात्मक थी | सैंधव लोग शाकाहारी और मांसाहारी दोनों भोजन करते थे | उनके वस्त्र ऊनी और सूती दोनों प्रकार के होते थे | कंठहार , कर्णफूल , कड़ा , भुज बंद , अंगूठी , हंसुली ,  करघनी आदि आभूषण पहने जाते थे | नौसारों से स्त्रियों की मांग में सिंदूर के प्रमाण मिले हैं जो हिंदू धर्म में सुहाग का प्रतीक है | सैंधव काल में प्रमुख खेल पासा था |
सिंधु घाटी सभ्यता के लोगों का मुख्य खाद्यान्न गेहूं और जौ थे | रंगपुर से धान की भूसी तथा लोथल से चावल के अवशेष मिले हैं | लोथल से वृत्ताकार चक्की के दो पाट मिले हैं | सूती वस्त्रों के अवशेषों से यह निष्कर्ष निकाला जाता है कि यहां के निवासी कपास उगाना जानते थे |  सर्वप्रथम  सैंधव निवासियों ने कपास की खेती प्रारंभ किया था। भारत से कपास यूनान गई जिसे यूनानी हिंडन के नाम से पुकारते थे | भारत में कपास की खेती का प्रारंभ 3000 ईसा पूर्व किया गया, जबकि मिस्र में इसकी खेती 2500 ईसा पूर्व के लगभग शुरू की गई |  हड़प्पा , मोहनजोदड़ो , कालीबंगन , सुरकोटडा के स्थलों से कूबड़दार ऊंट का जीवाश्म मिला है | सुरकोटडा , लोथल , कालीबंगन से घोड़े की मृण्मूर्तियां , हड्डियां , जबड़े आदि के अवशेष प्राप्त हुए हैं |
सिंधु सभ्यता का प्रमुख उद्योग वस्त्र उद्योग था | मोहनजोदड़ो से तांबे के दो उपकरणों से लिपटा हुआ सूती धागा एवं कपड़ा प्राप्त हुआ है | लोथल तथा चन्दूदड़ों में मनके का कार्य होता था। * लोथल तथा बालाकोट सीप उद्योग के लिए प्रसिद्ध था |
प्रमुख धातु एवं प्राप्ति स्थल

कच्चा माल

प्राप्त स्थल

तांबा

खेतड़ी (राजस्थान) एवं ब्लूचिस्तान

लाजवर्द

बदख्शां (अफगानिस्तान)

फिरोजा, टिन

ईरान

चांदी

राजस्थान की जावर एवं अजमेर खानों से, अफगानिस्तान एवं ईरान

सीसा

अफगानिस्तान

शिलाजीत

हिमालय

गोमेद

गुजरात





सैंधव निवासियों का आंतरिक एवं बाह्य व्यापार उन्नत अवस्था में था।* सिक्कों का प्रचलन नहीं था तथा क्रय-विक्रय वस्तु विनिमय द्वारा किया जाता था | लोथल एवं  मोहनजोदड़ो से हाथी दांत के बने तराजू के पलड़े मिले हैं। उनके बाट मुख्यतः घनाकार होते थे। कुछ बाट बेलनाकार , ढोलाकार , वर्तुलाकार प्रकार के भी मिले हैं | सारगोन  युगीन सुमेरियन लेख से ज्ञात होता है कि मेलुहा , दिलमुन तथा मगन के साथ मेसोपोटामिया के व्यापारिक संबंध थे | मेलुहा की पहचान सिंध क्षेत्र से की गई है | दिलमुन की पहचान फारस की खाड़ी के बहरीन से की गई है | सुमेरी  अभिलेखों में दिलमुन को ‘ साफ सुथरे नगरों का स्थान‘ या ‘ सूर्योदय का क्षेत्र ‘ और ‘ हाथियों का देश ‘ कहा गया है | मिस्र के साथ व्यापारिक संबंध का पता लोथल से प्राप्त ‘ ममी’ की एक आकृति से चलता है |
·      सैंधव सभ्यता में मूर्ति कला , वास्तुकला , उत्कीर्ण कला , मृदभांड कला आदि के उन्नत होने का प्रमाण मिलता है | हड़प्पा से दो पाषाण मूर्तियां तथा मोहनजोदड़ो से लगभग एक दर्जन पाषाण मूर्तियां प्राप्त हुई हैं। मोहनजोदड़ो से एक संयुक्त पशु मूर्ति प्राप्त हुई है जिसमें शरीर भेड़  का तथा मस्तक सूंडदार हाथी का है | हड़प्पा की पाषाण मूर्तियों में दो सिर रहित मानव  मूर्तियां उल्लेखनीय हैं | धातु मूर्तियां लुप्त मोम  या मधुच्छिष्ट विधि ( lost wax ) से बनाई गई थी | मोहनजोदड़ो से प्राप्त नर्तकी की कांस्य मूर्ति अत्यंत प्रसिद्ध है | लोथल से कुत्ते तथा कालीबंगन से ताम्र मूर्ति प्राप्त हुई है | चन्हूदड़ों से इक्का गाड़ी एवं बैलगाड़ी की मूर्तियां उल्लेखनीय है | मृण्मूर्तियां पुरुषों , स्त्रियों और पशु पक्षियों की प्राप्त हुई है | मूर्तियां अधिकतर स्त्रियों की हैं। सर्वाधिक मृण्मूर्तियां पशु पक्षियों की प्राप्त हुई है |
सैंधव काल में सर्वाधिक मुहरे सेलखड़ी की बनी है। इसके अतिरिक्त कांचली मिट्टी , चर्ट , गोमेद मिट्टी आदि की बनी मोहरे भी है ।अधिकांश मुहरें वर्गाकार या चौकोर है किंतु कुछ मुहरे घनाकार , गोलाकार , अथवा बेलनाकार भी है | सिंधु सभ्यता की मुहरों  पर सर्वाधिक अंकन एक श्रृंगी बैलों का है | उसके बाद कूबड़ वाले बैल का |  पशुपति शिव का प्रमाण मोहनजोदड़ो से प्राप्त एक मुहर  है जिस पर योगी की आकृति बनी है | उस  योगी के दाई और चीता और हाथी तथा बाई ओर गैंडा एवं भैसा  चित्रित किए गए हैं | योगी के सिर पर एक त्रिशूल जैसा आभूषण है तथा इसके तीन मुख है। मार्शल  महोदय ने इसे ‘ रूद्र शिव ‘ से संबंधित किया है।

सैंधव मृदभांड मुख्यता लाल या गुलाबी रंग के है। कुछ मृदभांडों पर लाल रंग से रंगकर काली रेखाओं से चित्र बनाए गए हैं। कुछ बर्तनों पर मोर , हिरन , कछुआ , मछली , गाय , बकरा पीपल , नीम , खजूर केला आदि का अंकन है। सैंधव मृदभांडो में मर्तबान , कटोरे , तशतारियाँ , थालियाँ प्रमुख हैं। स्त्री-पुरुष दोनों आभूषण पहनते थे | सोने चांदी के अतिरिक्त हाथी दांत , शंख आदि के भी आभूषण तैयार किए जाते थे |
सैंधव सभ्यता में मातृ देवी की पूजा प्रमुख थी |  हड़प्पा के प्राप्त एक स्त्री की मूर्ति में उसके गर्भ से निकलता एक पौधा दिखाया गया है संभवत यह देवी धरती की मूर्ति थी जिसे लोग उर्वरता की देवी समझते थे तथा इसकी पूजा उसी तरह करते थे जिस प्रकार मिस्र के लोग नील नदी की देवी आइसिस की। मातृदेवी एवं  शिव की पूजा के अतिरिक्त सैंधव निवासी पशु पक्षियों , वृक्षों आदि की उपासना करते थे | लोथल तथा कालीबंगन के पुरास्थलों से अग्निकुंड अथवा यज्ञ वेदियों  के साक्ष्य  मिलते हैं | उत्तर-दक्षिण दिशा में शव दफनाने की प्रथा प्रचलित थी किंतु इसके अपवाद भी मिलते हैं | कालीबंगन में शव दक्षिण-उत्तर , रोपड़ में पश्चिम-पूर्व तथा लोथल में पूर्व पश्चिम दिशा में प्राप्त हुए हैं | आंशिक समाधिकरण के उदाहरण बहावलपुर से मिले हैं |
सैंधव सभ्यता के विनाश के कारणों पर विभिन्न इतिहासकारों एवं विद्वानों का मत

विनाश का कारण

इतिहासकार/विद्वान

बाढ़

मार्शल, मैके, एस.आर.राव

आर्यों का आक्रमण

गार्डेन चाइल्ड, मार्टीमर ह्वीलर, स्टुटवर्ट पिग्गट

जलवायु परिवर्तन

आरेल स्टाइन, अमलानंद घोष

भू-तात्विक परिवर्तन

एम.आर. साहनी, एच.टी. लैम्ब्रिक, जी.एफ. डेल्स

महामारी

के.यू. कनेडी

अदृश्य गाज

एम.दिमित्रियेव






बौध्द धर्म

गौतम बुद्ध का जन्म कपिलवस्तु के निकट लुंबिनी में 563 ईसा पूर्व में हुआ था | उनके पिता शुद्धोधन शाक्यगण के प्रधान थे तथा माता माया देवी अथवा महामाया कोलिय गणराज्य ( कोलिय वंश ) गणराज्य की कन्या थी। गौतम बुद्ध के बचपन का नाम सिद्धार्थ था। इन के जन्म के कुछ दिनों बाद इनकी माता का देहांत हो गया | अतः इनका लालन-पालन इनकी मौसी प्रजापति गौतमी ने किया था | इनका विवाह 16 वर्ष की अल्पायु में  शाक्य कुल की कन्या यशोधरा के साथ हुआ | उत्तर कालीन बौद्ध ग्रंथों में यशोधरा के अन्य नाम गोपा , बिंबा , भदकच्छना आदि मिलते हैं |इनके पुत्र का नाम राहुल था।  बुद्ध के जीवन में चार दृश्यों का अत्याधिक प्रभाव पड़ा। ये थे – वृध्द व्यक्ति, बीमार व्यक्ति, मृतक तथा प्रसन्नचित संन्यासी| सिद्धार्थ ने पत्नी और बच्चों को सोते हुए छोड़कर गृह त्याग दिया |  गृह त्याग के समय सिद्धार्थ की आयु 29 वर्ष थी | बौद्ध ग्रंथों में गृह त्याग को ‘ महाभिनिष्क्रमण ‘ की संज्ञा दी गई है | सांख्य दर्शन के आचार्य आलार कालाम  से वैशाली के समीप उनकी मुलाकात हुई | जहां से सिद्धार्थ राजगृह के समीप निवास करने वाले रूद्रक रामपुत्त नामक  एक दूसरे धर्म आचार्य के पास पहुंचे | इसके पश्चात सिद्धार्थ उरूवेला (बोधगया) पहुंचे | 6 वर्षों  की कठिन साधना के पश्चात 35 वर्ष की अवस्था में वैशाख पूर्णिमा की रात्रि को एक पीपल के वृक्ष के नीचे गौतम को ज्ञान प्राप्त हुआ | ज्ञान प्राप्ति के बाद वह बुद्ध कहलाए |  बुद्ध का एक अन्य नाम तथागत मिलता है जिसका अर्थ है – सत्य है ज्ञान जिसका |  शाक्य कुल में जन्म लेने के कारण उन्हें ‘ शाक्यमुनि’ भी कहा गया|
ज्ञान प्राप्ति के पश्चात गौतम बुद्ध ने अपने मत का प्रचार प्रारंभ किया | उरूवेला से वे सबसे पहले ऋषिपत्तन ( वर्तमान सारनाथ, वाराणसी) पहुंचे | यहां उन्होंने 5 ब्राह्मण संन्यासियों को प्रथम उपदेश दिया | *इस प्रथम उपदेश को ‘ धर्मचक्रप्रवर्तन ‘ कहा जाता है |
बुध्द के जीवन से संबंधित बौध्द धर्म के प्रतीक
घटना
प्रतीक
जन्म
कमल एवं सांड
गृह त्याग
घोड़ा
ज्ञान
पीपल (बोधि वृक्ष)
निर्वाण
पद चिन्ह


राजगृह में उन्होंने द्वितीय , तृतीय तथा चतुर्थ वर्षाकाल व्यतीत किया | मगध के राजा बिंबिसार ने उनके निवास के लिए ‘ वेलुवन ‘ नामक महाविहार बनवाया।
राजगृह से चलकर बुद्ध लिच्छवियों की राजधानी वैशाली पहुंचे जहां उन्होंने पांचवा वर्षाकाल व्यतीत किया | लिच्छवियों ने उनके निवास के लिए महावन में प्रसिद्ध ‘ कुटाग्रशाला ‘ का  निर्माण करवाया | वैशाली की प्रसिध्द नगर-वधू आम्रपाली उनकी शिष्या बनी तथा भिक्षु-संघ के निवास के लिए अपनी आम्रवाटिका  प्रदान कर दी |ज्ञान प्राप्ति के आठवे वर्ष गौतम बुद्ध ने वैशाली में अपने प्रिय शिष्य आनंद के कहने पर महिलाओं की संघ में प्रवेश की अनुमति दी। बुद्ध की मौसी तथा विमाता संघ में प्रवेश करने वाली प्रथम महिला थी। देवदत्त , बुद्ध का चचेरा भाई था। * यह पहले उनका अनुगत बना और फिर उनका विरोधी बन गया। वह बौद्ध संघ से बुद्ध को हटाकर स्वंय संघ का प्रधान बनना चाहता था , किंतु इसमें उसे सफलता नहीं मिली।*
बौद्ध धर्म का सर्वाधिक प्रचार कौशल राज्य में हुआ | जहां उन्होंने 21 वास किए | कोशल राज्य के अनाथपिण्डक नामक धनी व्यापारी ने उनकी शिष्यता ग्रहण की तथा संघ के लिए ‘ जेतवन ‘ विहार प्रदान किए | भरहुत से प्राप्त एक शिल्प के ऊपर इस दान का उल्लेख है |  इसमें ‘ जेतवन अनाथपेण्डिकों देति कोटिसम्थतेनकेता ‘ लेख उत्कीर्ण है। कौशल नरेश प्रसेनजीत ने भी अपने परिवार के साथ बुद्ध की शिष्यता ग्रहण की तथा  संघ के लिए ‘ पुब्बाराम ‘  (पूर्वा राम) नामक विहार बनवाया |
बुद्ध ने अपने जीवन की अंतिम वर्षा ऋतु वैशाली में बिताई थी | अपने मत का प्रचार करते हुए वे मल्लों की राजधानी पावा पहुंचे , जहां वे चुंद नामक लुहार की आम्रवाटिका में ठहरे | उसने बुद्ध को सूकरमद्दव खाने को दिया इससे उन्हें ‘ रक्तातिसार ‘ को गया। फिर ये पावा में कुशीनारा चले गए और यही पर सुभद्द को उन्होंने अपना अंतिम उपदेश दिया। कुशीनारा ( मल्ल गणराज्य की राजधानी ) में 483 ई. पू . में 80 वर्ष की अवस्था में उन्होंने शरीर त्याग दिया | बौद्ध ग्रंथों में इसे ‘ महापरिनिर्वाण ‘ कहा जाता है। महापरिनिर्वाण सूत्र में बुद्ध की शरीर धातु के दावेदारों के नाम है – मगध नरेश अजातशत्रु , वैशाली के लिच्छवि , पावा के मल्ल , कपिलवस्तु के शाक्य , रामगाम के कोलिय , अलकप्प के बुलि , पिप्पलिवन के मोरिय , तथा वेठद्वीप के ब्राह्मण |
बुद्ध के प्रथम उपदेश को ‘ धर्मचक्रप्रवर्तन ‘ की संज्ञा दी जाती है | उनका यह उपदेश  दुख , दुख के कारण तथा उसके समाधान  से संबंधित था | इसे चार आर्य सत्य कहा जाता है | ये हैं –
दुख
दुख समुदाय
दुख निरोध तथा
दुख निरोधगामिनी प्रतिपदा |
बुद्ध के अनुसार दुख का मूल कारण अविद्या के विनाश का उपाय अष्टांगिक मार्ग है | * अष्टांगिक मार्ग आठ है जो इस प्रकार हैं –
सम्यक दृष्टि
सम्यक संकल्प
सम्यक वाक्
सम्यक कर्मांत
सम्यक आजीव
सम्यक व्यायाम
सम्यक स्मृति
सम्यक समाधि |
बुद्ध अपने मत को ‘ मध्यमा प्रतिपदा ‘ या मध्यम मार्ग कहते हैं | बौद्ध धर्म के अनुयायी दो वर्गों में बंटे हुए थे – भिक्षु, भिक्षुणी  तथा उपासक उपासिकाएं | सामान्य मनुष्य के लिए बुद्ध ने जिस धर्म का उपदेश दिया उसे ‘ उपासक धर्म ‘ कहा गया | बौद्ध धर्म के त्रिरत्न है –
बुद्ध
धम्म
संघ।


बौध्द संगीतियाँ

क्रम

वर्ष

स्थान

अध्यक्ष

शासक

प्रथम

483 ई.पू.

राजगृह

महाकस्यप

अजातशत्रु

द्वीतीय

383 ई.पू.

वैशाली

सुबुकामी

कालाशोक

तृतीय

247 ई.पू.

पाटलिपुत्र

मोग्गलिपुत्त तिस्स

अशोक

चतुर्थ

102 ई.पू.

कुंडलवन (कश्मीर)

वसुमित्र अश्वघोष  (उपाध्यक्ष)

कनिष्क





परंपरागत नियम में आस्था रखने वालों का संप्रदाय ‘ स्थविर ‘ या ‘ थेरावादी ‘ कहलाया | इनका नेतृत्व महाकच्चायन ने किया | परिवर्तन के साथ नियम को स्वीकार करने वाले को संप्रदाय ‘ महासांघिक ‘ अथवा ‘ सर्वास्तिवादी ‘ कहलाया | इनका नेतृत्व महाकस्सप ने किया | चतुर्थ बौद्ध संगीति में महासांघिकों का बोलबाला था | चतुर्थ बौद्ध संगीति के समय में बौद्धों ने भाषा के रूप में संस्कृत को अपनाया। इस संगीति के समय बौद्ध धर्म स्पष्ट रूप से हीनयान और महायान नाम दो संप्रदायों में विभाजित हो गया।
वैभाषिक मत की उत्पत्ति मुख्य रूप से कश्मीर में हुई | वैभाषिक मत के प्रमुख आचार्य है – धर्मत्रात , घोषक , बुद्धदेव , कसुमित्र आदि | सौत्रान्तिक संप्रदाय सुत्तपिटक पर आधारित है। शून्यवाद ( माध्यमिक ) के प्रवर्तक नागार्जुन है , जिसकी प्रसिद्ध रचना माध्यमिककारिका है।* नागार्जुन के अतिरिक्त इस मत के अन्य विद्वान थे – चन्द्रकीर्ति , शान्तिदेव , शन्तिरक्षित , आर्यदेव आदि | नागार्जुन की तुलना ‘ मार्टिन लूथर ‘ से की जाती है। ह्वेनसांग ने उसे ‘ संसार की चार मार्गदर्शक शक्तियों में से एक ‘ कहा है। उसे ‘ भारत का आइंस्टीन ‘ भी कहा जाता है। चीनी मान्यता के अनुसार , नागार्जुन ने चीन की यात्रा कर वहां बौद्ध शिक्षा प्रदान की थी |
विज्ञानवाद अथवा योगाचार संप्रदाय की स्थापना मैत्रेय अथवा मैत्रेयनाथ ने किया था। असंग तथा वसुबंधु ने इसका विकास किया | वज्रयान का सर्वाधिक विकास आठवी शताब्दी में हुआ। इसके सिद्धांत मंजुश्रीमूलकल्प तथा गुह्समाज नामक ग्रंथों में मिलते है। इसने भारत में बौद्ध धर्म के पतन का मार्ग प्रशस्त किया। बौद्ध दर्शन में क्षणिकवाद को स्वीकार किया गया। बुध्द ने स्वयं अनित्यवाद के सिध्दांत का प्रतिपादन किया था।
मैत्रेय को बौद्ध परंपरा में ‘ भावी बुद्ध ‘ कहा गया है। अवलोकितेश्वर प्रधान बोधिसत्व है इन्हें ‘ पद्मपाणि ‘(हाथ में कमल लिए हुए) भी कहते है। इनका प्रधान गुण दया है। मंजुश्री के एक हाथ में खड्ग तथा दूसरे हाथ में पुस्तक रहती है। इसका कार्य बुद्धि को प्रखर करना है।
बौद्ध साहित्य को ‘ त्रिपिटक ‘ कहा जाता है। यह पाली भाषा में रचित है। बुद्ध के महापरिनिर्वाण के पश्चात उनकी शिक्षाओं को संकलित कर तीन भागों में बाटा गया। इन्ही को त्रिपिटक कहते हैं। यह है –
विनयपिटक
सुत्तपिटक
अभिधम्मपिटक
विनयपिटक में संघ संबंधी नियम , तथा दैनिक जीवन संबंधी आचार-विचारों, विधि-निषेधो आदि का संग्रह है। सुत्तपिटिक में बौद्ध धर्म के सिद्धांत तथा उपदेशों का संग्रह है। अभिधम्मपिटक में बौद्ध धर्म के दार्शनिक सिद्धांतों का संग्रह मिलता है। अठ्ठ कथाएँ त्रिपिटकों के भाष्य के रुप में लिखी गई हैं। सुत्तपिटक की अठ्ठ कथा महा अठ्ठक तथा विनयपिटक की अठ्ठ कथा कुरुन्दी है। अभिधम्मपिटक की अठ्ठ तथा मूल रुप से सिंहली भाषा में पच्चरी है। बौध्दों का वह धर्म ग्रंथ, जिसमें गौतम बुध्द के पूर्ववर्ती जन्म की कथाएं संकलित हैं, जातक कहलाता है। यह पालि भाषा में है।
बौध्द ग्रंथ एवं उनके रचनाकार

ग्रंथ

रचनाकार

मिलिन्दपण्हों

नागसेन

बुध्दचरित, सौन्दरानन्द, शारिपुत्र प्रकरण

अश्वघोष

माध्यमिकाकरिका

नागार्जुन

विशुध्दिमग्ग

बुध्दघोष

अभिधम्म कोश

वसुबन्धु

बुद्ध की ‘ भूमिस्पर्श मुद्रा ‘ से तात्पर्य अपने तप की शुचिता और निरंतरता बनाए रखने से है। भूमिस्पर्श मुद्रा की सारनाथ की बुद्ध मूर्ति गुप्तकाल से संबंधित है।
प्राचीन काल में बौद्ध शिक्षा के तीन प्रमुख केंद्र थे –
नालंदा
वल्लभी
विक्रमशिला
नालंदा महायान बौद्ध धर्म की तथा वल्लभी हीनयान बौद्ध धर्म की शिक्षा का प्रमुख केंद्र था। विक्रमशिला महाविहार की स्थापना पाल नरेश धर्मपाल ने की थी। उसने यहां मंदिर तथा मठ भी बनवाएं थे। पांचवी शताब्दी के मध्य , गुप्तों के समय में नालंदा विश्वविद्यालय अस्तित्व में आया। सर्वप्रथम कुमारगुप्त – I ने नालंदा बौद्ध विहार को दान दिया। और बाद में बुधगुप्त , तथागतगुप्त , बालादित्य नामक गुप्त शासकों ने भी इस विहार को दान दिए। नवनालंदा महाविहार बौद्ध अध्ययन का आधुनिक केंद्र है। जिसे बिहार सरकार ने वर्ष 1951 में नालंदा में स्थापित किया था।
चैत्य का शाब्दिक अर्थ है – चिता संबंधी। शवदाह के पश्चात बचे हुए अवशेषों को भूमि में गाड़कर उनके ऊपर जो समाधियाँ बनाई गई, उन्हीं को प्रारंभ में चैत्य या स्तूप कहा गया। इन समाधियों में महापुरुषों के धातु अवशेष सुरक्षित थे, अतः चैत्य उपासना के केन्द्र बन गए। चैत्यगृहों के समीप ही भिक्षुओं के रहने के लिए आवास बनाए गए, जिन्हें विहार कहा गया।
सर्वप्रथम स्तूप शब्द का वर्णन ऋग्वेद में प्राप्त होता है। इसके अतिरिक्त अर्थववेद, वाजसनयी संहिता, तैतिरीय ब्राह्मण संहिता, पंचविश ब्राह्मण आदि ग्रंथों से स्तूप के संबंध में जानकारी मिलती है।* स्तूप का शाब्दिक अर्थ है – ‘  किसी वस्तु का ढेर ‘ | स्तूप का विकास ही संभवतः मिट्टी के ऐसे चबूतरे से हुआ, जिसका निर्माण मृतक की चिता के ऊपर अथवा मृतक की चुनी हुई अस्थियों में रखने के लिए किया जाता था | * कालांतर में बौद्धों ने इसे अपनी संघ पद्धति मे अपना लिया | *   इन स्तूपो में बुद्ध तथा उनके प्रमुख शिष्यों  की धातु रखी जाती थी अतः वह बौद्धों की श्रद्धा व उपासना के प्रमुख केंद्र बन गए | * स्तूप के चार भेद हैं –
शारीरिक स्तूप
पारिभौगिक स्तूप
उद्देशिका स्तूप
पूजार्थक स्तूप
गौतम बुद्ध को ‘ एशिया के ज्योति पुंज ‘ के तौर पर जाना जाता है। गौतम बुद्ध के जीवन पर एडविन अर्नोल्ड ने ‘ Light of Aisa ‘ नामक काव्य पुस्तक की रचना की थी।
महापरिनिर्वाण मंदिर ‘ उत्तर प्रदेश के कुशीनगर जिले में स्थित है। मंदिर में स्थापित भगवान बुद्ध की मूर्ति 1876 ई. में उत्खनन के द्वारा प्राप्त की गई थी। इस मंदिर में भगवान बुद्ध की 10 मी लंबी ऊची मूर्ति लेटी हुई मुद्रा में रखी है। यह मूर्ति उस काल को दर्शाती है जब 80 वर्ष की आयु में भगवान बुद्ध ने अपने पार्थिव शरीर को छोड़ दिया  और मृत्यु के बंधन से मुक्त हो गए अर्थात् निर्वाण की प्राप्ति हो गई।


हीनयान और महायान में अंतर

हीनयान

महायान

हीनयान का शाब्दिक अर्थ है – निम्न मार्ग

महायान का शाब्दिक अर्थ है – उत्कृष्ट मार्ग।

इसमें महात्मा बुध्द को एक महापुरुष माना जाता था।

इसमें उन्हें देवता माना जाता था।

यह व्यक्तिवादी धर्म है। इसके अनुसार, प्रत्येक व्यक्ति को अपने प्रयत्नों से ही मोक्ष प्राप्त करना चाहिए।

इसमें परोपकार एवं परसेवा पर बल दिया गया। इसका उद्देश्य समस्त मानव जाति का कल्याण है।

यह मूर्तिपूजा एवं भक्ति में विश्वास नही करता है।

यह आत्म एवं पुनर्जन्म में विश्वास करता है।

इसकी साधन पध्दति अत्यंत कठोर है तथा यह भिक्षु  जीवन का समर्थक है।

इनके सिध्दांक सरल एवं सर्वसाधारण के लिए सुलभ हैं। इसमें भिक्षु के साथ-साथ सामान्य उपासकों को भी महत्व दिया गया है।

इसका आदर्श अर्हत् पद को प्राप्त करना है।

इसका आदर्श बोधिसत्व है।

इसके प्रमुख संप्रदाय है – वैभाषिक तथा सौत्रान्तिका।

इसके प्रमुख संप्रदाय हैं – शून्यवाद (माध्यमिक)तथा विज्ञानवाद (योगाचार)।



गौतम बुध्द का जन्म कपिलवस्तु के निकट लुंबिनी में 563 ई.पू. में हुआ था। उनके पिता शुध्दोधन शाक्यगण के प्रधान थे तथा माता माया देवी कोलिय गणराज्य (कोलिय वंश) की कन्या थी। 29 वर्ष की अवस्था में उन्होंने गृह त्याग दिया, जिसे बौध्द ग्रंथों में महाभिनिष्क्रमण की संज्ञा दी गई।
गौतम के बचपन का नाम सिध्दार्थ था। इन्हें शाक्यमुनि, तथागत आदि नामों से जाना जाता है। आदि गुरु शंकराचार्य को प्रच्छन्न बौध्द या छिपा हुआ बुध्दमार्गी कहा जाता था। अतः पार्त, प्रछन्न, मिहिर, गुडाकेश भगवान बुध्द के अन्य नाम नही हैं।
मौर्य वंशीय शासक अशोक के रुम्मिनदेई अभिलेख से सूचना मिलती है कि शाक्यमुनि बुध्द का जन्म लुंबिनी में हुआ था। इस अभिलेख के अनुसार, अशोक राज्यभिषेक के 20 वर्ष बाद यहां आया था और उसने उस स्थान की पूजा की थी। जहां शाक्यमुनि बुध्द का जन्म हुआ था। साथ ही इस अभिलेख मे लुंबिनी के बुध्द का जन्म स्थल होने का कारण इसे कर छूट प्रदान करने की घोषणा का भी उल्लेख है।
बौध्द धर्म का प्रचार करते हुए महात्मा बुध्द मल्लों की राजधानी पावा पहुंचे, जहां से चुंद नामक लुहार की आम्रवाटिका मे ठहरे। उसने बुध्द को सूकरमद्दव खाने को दिया, इससे उन्हें रक्तातिसार हो गया और भयानक पीड़ा उत्पन्न हुई। इस वेदना के बाद भी वे कुशीनारा (मल्ल गणराज्य की राजधानी) पहुचे। यहीं 483 ई.पू. में 80 वर्ष की अवस्था में उन्होंने शरीर त्याग दिया। बौध्द ग्रंथों में इसे महापरिनिर्वाण कहा जाता था।
महापरिनिर्वाण मंदिर उत्तर प्रदेश के कुशीनगर जिले में स्थित है। मंदिर में स्थापित भगवान बुध्द की मूर्ति 1876 ई. में उत्खनन के द्वारा प्राप्त की गई थी। महापरिनिर्वाण मंदिर विश्व में बौध्द धर्म के सबसे पवित्र मंदिरों में से एक माना जाता है।
अपने जीवन के अंतिम वर्ष गौतम बुध्द अपने शिष्य चुंद के यहां पावा पहुंचे। यहां सूकरमाद्दव भोज्य सामग्री खाने से ये अतिसार रोग से पीड़ित हो गए। फिर ये पावा से कुशीनगर चले गए और यही पर सुभद्द को उन्होंने अपना अंतिम उपदेश दिया।



महापरिनिब्बान सूक्त से उनके जीवन के विविध आयामों एवं काल का निर्धारण किया जाता है जिसके अनुसार बुध्द ने अपने जीवन की अंतिम वर्षा ऋतु में बिताई थी।
महाभिनिष्क्रमण के बाद ज्ञान की खोज में महात्मा बुध्द, आलार कालाम के आश्रम में पहुंचे तथा उनसे दीक्षा ली। कालाम के आश्रम में उन्होंने तपस्या की किंतु इससे बुध्द संतुष्ट नही हुए। आलार कलाम सांख्य दर्शन के आचार्य थे तथा अपनी साधना शक्ति के लिए विख्यात थे।
बुध्द के सबसे अधिक शिष्य कोसल राज्य में हुए थे तथा यहां की राजधानी श्रावस्ती में ही उन्होने सर्वाधिक उपदेश दिए थे।
महात्मा बुध्द वत्सराज उदयन के शासनकाल में कौशांबी आए थे। वहां उन्होंने नवां विश्राम किया। उद्यन ने पिंडोला भारद्वाज के प्रभाव से बौध्द बनने के बाद घोषितराम विहार भिक्षु संघ को दान किया।
प्रथम बौध्द संगीति (प्रथम बौध्द परिषद) बुध्द की मृत्यु तत्काल बाद राजगृह की सप्तपर्णि गुफा में हुई। इस समय मगध का शासक अजातशत्रु था। इस संगीति के अध्यक्षता महाकस्सप ने की तथा इसमें बुध्द प्रमुख शिष्य आनंद और उपालि भी उपस्थित थे। इसमें बुध्द की शिक्षाओँ का संकलन हुआ तथा उन्हें सुत्त विनय नामक दो पिटकों में विभाजित किया गया। आनंद तथा उपालि क्रमशः धर्म और विनय के प्रमाण माने गए।
राजगीर (राजगृह) बिहार के नालंदा जिले में स्थित एक शहर है। राजगीर की वैभरा पहाड़ियों पर सप्तपर्णी गुफा स्थित है।
भारतीय कला में बुध्द के जीवन के प्रथम उपदेश का चित्रण मृग सहित चक्र द्वारा हुआ है। बुध्द ने अपना प्रथम उपदेश सारनाथ में मृगदाव (हरिण वन) में दिया था।
करमापा लामा तिब्बत के बौध्द संप्रदाय कंग्यूपा वर्ग से संबधित है।
बोधगया में 6 वर्ष की साधना के पश्चात 35 वर्ष की आयु में महात्मा बुध्द को वैशाख पूर्णिमा की रात को एक पीपल के वृक्ष के नीचे ज्ञान प्राप्त हुआ।
महाबोधि मंदिर स्थित वर्तमान बोधि वृक्ष वही नही है, जिसके नीचे बैठकर महात्मा बुध्द ने ज्ञान प्राप्त किया था। ह्वेनसांग के अनुसार, उस मूल वृक्ष को सातवीं शताब्दी में सम्राट शशांक ने नष्ट करा दिया था। इसके बाद इस स्थान पर 2 और वृक्ष रोपित हुए और नष्ट हुए। वर्तमान वृक्ष जिसे हम देख रहे हैं वह चौथी पीढ़ी का वृक्ष है, जिसे अलेक्जेंडर कनिंघम ने लगवाया था। यह वृक्ष पूरी तरह संरक्षित है और केवल इससे गिरी हुई पत्तियों की ही छूने एवं उठाने का अधिकार है।
पवित्र बौध्द स्थल बोधगया जहाँ गौतम बुध्द को सर्वप्रथम ज्ञान प्राप्त हुआ था, निरंजना नदी पर स्थित है। आधुनिक नदी को ही पूर्व में निरंजना के नाम से जाना जाता था। यह नदी दो छोटी धाराओं निरंजना एवं मोहना के मिलने के बाद बनती है।



महात्मा बुध्द के उपदेश आचरण की पवित्रता एवं शुध्दता से संबंधित थे। बुध्द के उपदेशों में आत्मा संबंधी विवाद नही हैं। धार्मिक कर्मकांडों की बुध्द ने आलोचना की है।
देवदत्त, बुध्द का चचेरा भाई था। यह पहले उनका अनुगत बना और फिर उनका विरोधी बन गया। वह बौध्द संघ से बुध्द को हटाकर स्वयं संघ का प्रधान बनना चाहता था, किंतु उसे इसमें सफलता नही मिली। वस्तुतः देवदत्त उसी दिन संघ का प्रधान बनने की सोचने लगा था, जब वह पहले-पहले भिक्षु बना था।
अपने प्रिय शिष्य आनंद के कहने पर बुध्द ने वैशाली में स्त्रियों को बौध्द संघ में  भिक्षुणी  के रुप में प्रवेश की अनुमति प्रदान की थी। बौध्द संघ में सर्वप्रथम शामिल होने वाली स्त्री महाप्रजापति गौतमी थी।
त्रिपिटक बौध्द ग्रंथों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण हैं। बुध्द की मृत्यु के बाद उनकी शिक्षाओं को संकलित कर तीन भागों में बांटा गया, उन्हीं को त्रिपिटक कहते हैं। ये हैं – विनय पिटक (संघ संबंधी नियम तथा आचार की शिक्षाएँ) सुत्त पिटक (धार्मिक सिध्दांत) तथा अभिधम्म पिटक (दार्शनिक सिध्दांत)।
सुत्त पिटक में महात्मा बुध्द के नैतिक एवं सिध्दांत संबंधित प्रवचन संकलित हैं। अर्थात् इसमें बौध्द धर्म के सिध्दांत एवं उपदेश संग्रह हैं, जबकि विनय पिटक में संघ संबंधी नियम तथा दैनिक जीवन संबंधी आचार-विचारों, विधि निषेधों आदि का संग्रह है। जातकों में बुध्द के पूर्व जन्मों की कहानियाँ संग्रहीत हैं.
वर्षा ऋतु के समय चार महीने बौध्द भिक्षु बौध्द महाविहारों में निवास करते थे। इस समय धर्म प्रचार का कार्य स्थगित रहता था। वर्षा ऋतु की समाप्ति पर जब पुनः धर्म प्रचार कार्य प्रारंभ होता था, तो बौध्द भिक्षु पवरन नामक समारोह का आयोजन करते थे जिसमे पीछे किए गए कार्यों पर विचार करते हुए आगे की कार्ययोजना बनाई जाती थी। इसके अतिरिक्त भिक्षु इस समारोह में अपने द्वारा किए गए अपराधों को स्वीकार करते थे।



प्रसिध्द बौध्द ग्रंथ महावंश के अनुसार, मौर्य शासक अशोक ने पाटलिपुत्र में अशोकाराम विहार को निर्मित करवाया था। इस विहार का निरीक्षण इद्रगुप्त नामस थेर भिक्षु के निरीक्षण मे हुआ था। तीसरी बौध्द संगीति (सभ) भी अशोक के समय में हुई थी।
बिहार में राजगीर की पहाड़ियों (400मी. की ऊंचाई) पर स्थित शांति स्तूप विश्व का सबसे ऊंचा कहा जाने वाला विश्व शांति स्तूप है। वैशाली स्थित शांति स्तूप की ऊंचाई 38 मी. (125 फीट) एवं चौड़ाई 36 मी. (118 फीट) तथा  गुंबद का व्यास 20 मी. (65 फीट) है।
बुध्द की 80 फुट ऊंची बोधगया में स्थित प्रतिमा लाल गेनाइट एवं बलुई पत्थर से निर्मित है, जिसके निर्माण में 7 वर्ष का समय लग। यह प्रतिमा जापान के दाईजोकियों संप्रदाय के सहयोग द्वारा निर्मित की गई थी।
सर्वप्रथम स्तूप शब्द का वर्णन ऋग्वेद में प्राप्त होता है। इसके अतिरिक्त अथर्ववेद, वाजसनयी संहिता, तैतिरीय ब्राह्मण संहिता, पंचविश ब्राह्मण आदि ग्रंथों से स्तूप के संबंध में जानकारी मिलती है। स्तूप का शाब्दिक अर्थ है – किस वस्तु का ढेर।
बोधगया का स्तूप स्थल बुध्द की ज्ञान प्राप्ति से, सारनाथ धर्मचक्रप्रवर्तन से तथा कुशीनगर या कुशीनारा बुध्द की मृत्यु से संबंधित हैं, जबकि सांची बुध्द के जीवन की किसी विशेष घटना से संबंधित नही है।
भरहुत एवं सांची के स्तूप की स्थापना मौर्य शासक अशोक के शासन-काल में हुई थी। कुछ ऐतिहासिक स्रोत धमेख स्तूप का निर्माण काल भी अशोक के शासनकाल को ही मानते हैं। अमरावती स्तूप का निर्माण सातवाहन के समय मे हुआ था। भरहुत, सांची एवं धमेख स्तूप के निर्माण क्रम निर्धारित करना संभव नही है।
बौध्द दर्शन में क्षणिकवाद को स्वीकार किया गया है। बुध्द ने स्वयं अनित्यवाद के सिध्दांत का प्रतिपादन किया था। क्षणिकवाद अनित्यतावाद का तार्किक विकास है, जो बुध्दोत्तर दर्शन में अस्तित्व में आया। क्षणिकवाद के अनुसार विश्व की प्रत्येक वस्तु का अस्तित्व क्षणमात्र के लिए ही रहता है।
गौतम बुध्द को एशिया के ज्योति पुंज के तौर पर जाना जाता है। गौतम बुध्द के जीवन पर एडविन अर्नाल्ड ने Light of Asia नामक काव्य पुस्तक की रचना की थी।
सर एडविन एर्नाल्ड की पुस्तक द लाइट ऑफ दी एशिया ललितविस्तार के विषय-वस्तु पर आधारित है। इस पुस्तक का प्रकाशन 1879 ई. में लंदन मे किया गया।
भारत में सबसे पहले बुध्द की प्रतिमाओं की पूजा की गई। बौध्द धर्म के महायान शाखा के अनुयायियों ने सर्वप्रथम बुध्द मूर्तियाँ स्थापित करके उनकी पूजा प्रारंभ की।
सर्वप्रथम मूर्ति पूजा की नींव बौध्दों के द्वारा रखी गई। महायानियों ने सर्वप्रथम बुध्द की प्रतिमा स्थापित करके पूजा आरंभ की।



गांधार कला की उत्पत्ति का स्रोत एशिया माइनर तथा हैलेनिस्टिक कला थी। इस शैली की कला का प्रमुख विषय महात्मा बुध्द का जीवन चरित है। इसके अंतर्गत बुध्द की धर्मचक्र मुद्रा, ध्यान मुद्रा, अभय मुद्रा और वरद मुद्रा आद मूर्तियों का निर्माम किया गया है।
कुषाण काल में ही गांधार एवं मथुरा कला शैली के तहत बुध्द एवं बोधिसत्वों के बहुसंख्यक मूर्तियों का (बैठी एवं खड़ी स्थित में) निर्माण हुआ। वी.एस. अग्रवाल के मतानुसार, सर्वपर्थम मथुरा में ही बुध्द मूर्तियों का निर्माण किया गया, जहां इनके लिए पर्याप्त आधार था।
बुध्द की भूमिस्पर्श मुद्रा से तात्पर्य अपने तक की शुचिता और निरंतरता को बनाए रखने से है। बुध्द की भूमिस्पर्श मुद्रा मार (कामदेव) के प्रलोभनों के बावजूद अपनी शुचिता और शुध्दता का साक्षी होने के लिए बुध्द का धरती का आह्वान को प्रदर्शित करती है।
बौध्द ग्रंथ अंगुत्तर निकाय में वर्णित षोडश महाजनपदों मे से मल्ल एक महाजनपद था, यह एक संघ राज्य था, जिसमें पावा (पडरौना) तथा कुशीनारा (कसया) के मल्लों के शाखाएँ सम्मिलित थी। महात्मा बुध्द को महापरिनिर्वाण कुशीनगर में प्राप्त हुआ।
सैंधव पुरास्थल लोथल (गुजरात) में गोदीबाड़ा के अवशेष मिले हैं। सारनाथ (वाराणसी) मे महात्मा बुध्द ने अपना प्रथम उपदेश (धर्मचक्रप्रवर्तन) दिया था। नालंदा बौध्द अधिगम का महान पीठ था, यहां कुमारगुप्त प्रथम के शासकनकाल में विश्वविद्यालय की स्थापना हुई । अशोक का सिंह स्तंभ शीर्ष राजगीर में नही बल्कि सारनाथ में स्थित है।
बौध्द दर्शन में यह माना गया है कि बोधिसत्वों मे अवलोकितेश्वर की स्थिति महिमामंडित है। उन लोगों ने यह निश्चय किया था कि वे तब तक बुध्द नही बनेंगे जब तक कि सभी मनुष्यों को निर्वाण नही प्राप्त हो जाता। वस्तुतः बौध्द धर्म हिंदू धर्म का प्रभाव परिलक्षित होता है। बोधिसत्व अवलोकितेश्वर या पदमाणि वैदिकयुगीन देवता विष्णु हैं. सप्त तथा गत हिंदू धर्म के सप्तर्षि हैं।
हीनयान अवस्था का विशालतम एवं सर्वाधिक विकसित शैलकृत चैत्यगृह कार्ले मे स्थित है। यह पुणे (महाराष्ट्र) के मावल तालुका मे स्थित है।
सलसेती द्वीप में स्थित कन्हेंरी गुफाएँ महाराष्ट्र में मुंबई शहर का एक प्रमुख पर्यटन स्थल हैं। यह गुफाएँ संजय गांधी राष्ट्रीय उद्यान परिसर में स्थित है। प्राचीन अभिलेखों मे कान्हाशैल, कृष्णागिरी, कान्हगिरी के नाम से उल्लिखित कन्हेरी बौध्दो का प्रमुख केन्द्र था। कन्हेरी मे एक ही पहाड़ी मे सर्वाधिक संख्या (90) मे गुफाओं का निर्माण हुआ है। कन्हेरी की गुफाओं का निर्माण तीसरी शताब्दी ई.पू. के मध्य में किया गया था और ये 11वीं शताब्दी ईस्वी तक इस्तेमाल मे रही. गुफा संख्या 41 में अवलोकितेश्वर की एक रोचक मूर्ति स्थित है, जिसकी चार भुजाएं और ग्यारह मुख हैं। यह अपनी किस्म की भारत में स्थित एकमात्र मूर्ति है। इस रुप की उपासना चीन, चीनी तुर्किस्तान,कंबोडिया तथा जापान् में 7वीं-8वीं सदी में लोकप्रिय थी।


नागार्जुन कनिष्क के दरबार की एक महान विभूति था। उसने अपनी पुस्तक माध्यमिक कारिका में सापेक्षता सिध्दांत को प्रस्तुत किया। चीनी मान्यता के अनुसार, नागार्जुन ने चीन की यात्रा कर वहां बौध्द शिक्षा प्रदान की थी।
प्राचीन काल में बौध्द शिक्षा के तीन प्रमुख केन्द्र थे –
नालंदा
वल्लभी
विक्रमशिला
नालंदा बिहार में आधुनिक पटना में दक्षिण मे लगभग 40 मील की दूरी पर आधुनिक बडगांव नामक ग्राम के समीप स्थित था। यह  महायान बौध्द धर्म की शिक्षा  का प्रमुख केन्द्र था। वल्लभी गुजरात के कठियावाड़ क्षेत्र में आधुनिक वल नामक स्थान पर स्थित पश्चिम भारत मे शिक्षा एवं संस्कृति का प्रमुख केन्द्र था।  यह हीनयान बौध्द धर्म की शिक्षा का प्रमुख केन्द्र था। विक्रमशिला बिहार में आधुनिक भागलपुर से 24 मील पूर्व की ओर पथरघाट नामक पहाड़ी पर स्थित था। विक्रमशिला के महाविहार की स्थापना पाल नरेश धर्मपाल (775-800 ई.) ने की थी। उसने यहां मंदिर तथा मठ भी बनवाएँ थे।

ह्वेनसांग के अनुसार, नालंदा विश्वविद्यालय का संस्थापक शक्रादित्य था। जिसने बौध्द धर्म के त्रिरत्नों की प्रति महती श्रध्दा के कारण इसकी स्थापना करवाई थी। शक्रादित्य की पहचान कुमारगुप्त प्रथम (415-455 ई.) से की जाती है। जिसकी प्रसिध्द उपाधि महेन्द्रादित्य थी।
नालंदा विश्वविद्यालय बौध्द दर्शन के अध्ययन के लिए विश्वप्रसिध्द था। उसी के अध्ययन के लिए चीनी यात्री ह्वेनसांग यहां आया था।
नव नालंदा महाविहार बौध्द अध्ययन का आधुनिक केन्द्र है, जिसे बिहार सरकार ने 1951 में नालंदा में स्थापित किया था। इस केन्द्र मे बौध्द एवं पाली अनुसंधान संस्थान हैं। यहां बड़ी संख्या में श्रीलंका, जापान, कोरिया, तिब्बत, भूटान आदि देशों से पाली एवं बौध्द अध्ययन पर अनुसंधान हेतु विद्यार्थी आते हैं।
तप (आत्मदमन) और भोग की अति का परिहार एवं मध्यम मार्ग का अनुसरण केवल बौध्द धर्म मे किया गया था, जैन धर्म में नही। जबकि वेदों की प्रामाण्यता के प्रति अनास्था, कर्मकांडों की फलवत्ता का निषेध एवं प्राणियों की हिंसा का निषेध दोनों धर्मों मे किया गया है।
संबोधि मे गौतम बुध्द को प्रतीत्यसमुत्पाद के सिध्दांत का बोध हुआ था। इस कार्य-कारण सिध्दांत को उन्होंने संपूर्ण जगत पर लागू किया। सर्वप्रथम उन्होने जिन चार आर्यसत्यों का उपदेश दिया, वे इस प्रकार हैं –
दुःख  – संसार में सर्वत्र दुःख है। जीवन दुःखों एवं कष्टों से पूर्ण है।

दुःख समुदाय – प्रत्येक वस्तु का कोई न कोई कारण अवश्य  होता है।

अतः दुःख  का  भी कारण है।

दुःख निरोध – दुःख का अंत संभव है।



दुःख निरोधगामिनी  प्रतिपदा – दुःख के मूल अविद्या के विनाश का उपाय अष्टांगिक मार्ग है।

बुध्द तथा महावीर दोनों ही छठी शताब्दी ई.पू. की धार्मिक क्रांति के अग्रदूत थे। इन दोनों ने वैदिक कर्मकांडों तथा वेदों की अपौरुषेयता का समान रुप से विरोध किया। अहिंसा तथा सदाचार पर दोनों ने बल दिया तथा दोनों ही कर्मवाद, पुनर्जन्म तथा मोक्ष मे विश्वास रखते थे।
बौध्द धर्म मे वर्णव्यवस्था को स्वीकार तो किया गया लेकिन उसने ब्राह्मण वर्ण की सर्वोच्च सामाजिक स्थिति को स्वीकार नही किया। बौध्द धर्म में कुछ शिल्पों को निम्न माना गया है।
बौध्द धर्म की सादगी, दलितों के लिए विशेष अपील, मिशनरी भावना तथा स्थानीय भाषा का प्रयोग बौध्द धर्म को विस्तार के प्रमुख कारणों में सम्मिलित थे, जबकि दार्शनिकों द्वारा वैदिक भावना की सुदृढ़ता इसमे शामिल नही थी।
आरंभिक मध्ययुगीन समय में भारत में बौध्द धर्म का पतन इसलिए हुआ कि उस समय बुध्द, विष्णु के अवतार समझे जाने लगे और वैष्णव धर्म का हिस्सा बन गए।
चैत्य का शाब्दिक अर्थ है – चिंता संबंधी। शवदाह के पश्चात बचे हुए अवशोषों को भूमि में गाड़कर उनके ऊपर जो समाधियाँ बनाई गई, उन्हीं को प्रारंभ मे चैत्य या स्तूप कहा गया। इन समाधियों मे महापुरुषों के धातु अवशेष सुरक्षित थे, अतः चैत्य उपासना के केन्द्र बन गए। कालांतर में बौध्दों ने इन्हें अपनी उपासना का केन्द्र बना लिया। चैत्यगृहों के समीप ही भिक्षुओं के रहने के लिए आवास बनाए गए जिन्हें विहार कहा गया।
मध्यकाल में बौध्दों की वज्रयान शाखा सबसे अधिक प्रभावशाली थी। वज्रयान का सबसे अधिक विकास आठवीं शताब्दी मे हुआ था तथा इसके सिध्दांत मंजुश्रीमूलकल्प तथा गुह्यसमाज नामक ग्रंथों में मिलते हैं।


जैन धर्म

जैन शब्द संस्कृत के जिन शब्द से बना है जिसका अर्थ विजेता है। जैन संस्थापकों को तीर्थंकर जबकि जैन महात्माओं को निर्ग्रंथ कहा गया। जैन धर्म में कुल 24 तीर्थंकर माने जाते हैं, जिन्होंने सयम-समय पर जैन धर्म का प्रचार-प्रसार किया। यह हैं –
ऋषभदेव
अजितनाथ
संभवनाथ
अभिनंदन
सुमतिनाथ
पद्मप्रभु
सुपार्श्वनाथ
चंद्रप्रभु
पुष्पदंत ( सुविधिनाथ )
शीतलनाथ
श्रेयांसनाथ
वासुपूज्य
विमलनाथ
अनंतनाग
धर्मनाथ
शांतिनाथ
कुंथुनाथ
अरनाथ
मल्लिनाथ
मुनिसुव्रत
नमिनाथ
नेमिनाथ या अरिष्टनेमि
पार्श्वनाथ
महावीर स्वामी |
जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव थे। इनके अन्य नाम ऋषभनाथ , आदिनाथ , वृषभनाथ भी है। ऋषभदेव एवं अरिष्टनेमि का उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है। पार्श्वनाथ जैन धर्म के 23 वे तीर्थंकर माने जाते है। इनका जन्म काशी ( वाराणसी ) में हुआ था। इनके पिता अश्वसेन कासी के राजा थे। पार्श्वनाथ को सम्मेद पर्वत पर ज्ञान प्राप्त हुआ था। पार्श्वनाथ ने अपने अनुयायियों को चातुर्याम शिक्षा का पालन करने को कहा था।




ये चार शिक्षाएं थी –

सत्य
अहिंसा
अस्तेय
अपरिग्रह
महावीर स्वामी का जन्म वैशाली के निकट कुंडग्राम में लगभग 599 ई पू में हुआ था। * इनके पिता सिद्धार्थ ज्ञातृक क्षत्रियों के संघ के प्रधान थे | इनकी माता त्रिशला अथवा विदेहदत्ता वैशाली के लिच्छवि गणराज्य के प्रमुख चेटक की बहन थी | महावीर स्वामी के बचपन का नाम वर्द्धमान था। इनकी पत्नी का नाम यशोदा (कुंडिन्य गोत्र की कन्या) था। इससे उन्हें अजोज्या ( प्रियदर्शना ) नामक पुत्री उत्पन्न हुई | इसका विवाह जामालि के साथ हुआ था।
जैन धर्म में पूर्ण ज्ञान के लिए ‘ कैवल्य ‘ शब्द का प्रयोग किया गया है | महावीर स्वामी को 12 वर्षों की कठोर तपस्या तथा साधना के पश्चात ‘ जृम्भिक ग्राम ‘  के समीप ऋजुपालिका नदी के तट पर एक साल वृक्ष के नीचे कैवल्य ( पूर्ण ज्ञान ) प्राप्त हुआ था | ज्ञान प्राप्ति के पश्चात वे केवलिन , अर्हत् (  योग्य  ) , जिन ( विजेता )  तथा निर्ग्रंथ (  बंधन रहित) कहलाए |  कैवल्य प्राप्ति के पश्चात महावीर स्वामी ने अपने सिद्धांतों का प्रचार प्रारंभ किया | वैशाली के लिच्छवी सरदार चेटक जो उनके मामा थे , जैन धर्म के प्रचार में मुख्य योगदान दिया |
महावीर स्वामी को उनके प्रथम शिष्य जामालि से मतभेद हो गया , मतभेद का कारण क्रियमाणकृत  सिद्धांत ( कार्य करते ही पूर्ण हो जाना ) था | इस मतभेद के कारण जामालि ने संघ छोड़ दिया और एक नए सिद्धांत बहुतरवाद (  कार्य पूर्ण होने पर ही पूर्ण माना जाएगा ) का प्रतिपादन किया | जैन धर्म में दूसरा विद्रोह जामालि  के विद्रोह के 2 वर्ष के पश्चात तीसगुप्त ने किया | मक्खलिगोसाल ने आजीवक संप्रदाय की स्थापना की | इनका मत नियतिवाद कहा गया है जिनके अनुसार संसार की प्रत्येक वस्तु भाग्य द्वारा नियंत्रित एवं संचालित की जाती है | 527 ईसा पूर्व के लगभग 72 वर्ष की आयु में राजगृह ( राजगीर ) के समीप स्थित पावापुरी नामक स्थान पर महावीर स्वामी ने शरीर त्याग दिया
महावीर स्वामी ने पंच महाव्रत की शिक्षा दी  जो इस प्रकार है –

अहिंसा
सत्य
अस्तेय
अपरिग्रह एंव
ब्रह्मचर्य |
प्रथम चार व्रत पार्श्वनाथ के समय से ही प्रचलित थे। महावीर ने इसमें पांचवा व्रत ब्रह्मचर्य को जोड़ा था। जैन धर्म में गृहस्थों के लिए पंच महाव्रत अणुव्रत के रूप में व्यवहृत हुआ है , क्योंकि संसार में रहते हुए इन महाव्रतों का पूर्णतः पालन करना संभव नही इसलिए आंशिक रूप से इनके पालन के लिए कहा गया।
ये पंच अणुव्रत है

अहिंसाणुव्रत
सत्याणुव्रत
अस्तेयाणुव्रत
ब्रह्मचर्याणुवत और
अपरिग्रहाणुव्रत |
महावीर स्वामी ने वेदों की अपौरूषेयता स्वीकार करने से इंकार किया तथा धार्मिक सामाजिक रूढ़ियों एवं पाखंडो का विरोध किया। उन्होंने आत्मवादियों तथा नास्तिकों के एकांतिक मतों को छोड़कर बीच का मार्ग अपनाया जिसे अनेकांतवाद अथवा स्यादवाद कहा गया | स्यादवाद को सप्तभंगी नय के नाम से भी जाना जाता है | यह ज्ञान की सापेक्षता का सिद्धांत है |
प्रमुख जैन तीर्थंकर एवं उनके प्रतीक चिन्ह

तीर्थंकर

प्रतीक चिन्ह

ऋषभदेव

बैल

अजितनाथ

हाथी

संभवनाथ

अश्व

पद्मप्रभु

कमल

सुपार्श्वनाथ

साथिया (स्वास्तिक)

मल्लिनाथ

कलश

नमिनाथ

नीलकमल

नेमिनाथ

शंख

पार्श्वनाथ

सर्प

महावीर स्वामी

सिंह



जैन धर्म में मोक्ष के लिए तीन साधन आवश्यक बताए गए हैं। * ये है –
सम्यक दर्शन ,
सम्यक ज्ञान एवं
सम्यक चरित्र
इन तीनों को जैन धर्म में ‘ त्रिरत्न ‘ की संज्ञा दी गई है। त्रिरत्नों का अनुसरण करने से कर्मों का जीव की ओर प्रवाह रुक जाता है। जिसे संवर कहते हैं। इसके बाद जीव में पहले से व्याप्त कर्म समाप्त होने लगते हैं। इसे ‘ निर्जरा ‘ कहा गया है। जब जीव में कर्म का अवशेष पूर्ण समाप्त हो जाता है तब वह मोक्ष प्राप्त कर लेता है। जैन धर्म में ‘ अनंत चतुष्ट्य ‘ है – अनंत ज्ञान , अनंत दर्शन , अनंत वीर्य तथा अनंत सुख |
महावीर स्वामी ने अपने जीवकाल में एक संघ की स्थापना की | इस संघ में 11 प्रमुख अनुयायी सम्मिलित थे।ये ‘ गणधर ‘ कहे गए। इनके नाम है – इंद्रभूति , अग्निभूति , वायुभूति ( तीनों भाई ) , व्यक्त , सुधर्मन , मंडित , मोरियपुत्र ,अकंपित , अचलभ्राता , मेतार्थ तथा प्रभास | महावीर की मृत्यु के पश्चात् सुधर्मन जैन संघ का प्रथम अध्यक्ष बना | सुधर्मन की मृत्यु के पश्चात् जम्बू 44 वर्ष तक संघ का अध्यक्ष रहा। * अंतिम नंद राजा के समय सम्भूतविजय तथा भद्रबाहु संघ के अध्यक्ष थे। महावीर द्वारा प्रदत्त 14 पूव्वो (प्राचीनतम जैन ग्रंथों) के विषय में जानने वाले ये दोनों अंतिम व्यक्ति थे।* कालांतर में जैन संप्रदाय दो संप्रदायों में विभक्त हो गया। * ये संप्रदाय थे – श्वेतांबर तथा दिगंबर| * स्थूलभद्र के अनुयायी ‘ श्वेतांबर ‘ कहलाए जबकि भद्रबाहु के अनुयायी ‘ दिगंबर ‘ कहलाए | यापनीय ‘ जैन धर्म का एक संप्रदाय है।
प्रथम जैन सभा चतुर्थ शताब्दी ई.पू में पाटलिपुत्र में स्थूलभद्र की अध्यक्षता में संपन्न हुई। इस सभा में जैन धर्म के 12 अंगों का संकलन किया गया। इससे भद्रबाहु के अनुयायियों ने भाग नही लिया।द्वितीय जैन सभा छठी शताब्दी में वल्लभी में देवर्धिगण या क्षमाश्रमण की अध्यक्षता में संपन्न हुई। द्वितीय जैन सभा के समय 12 अंग , 12 उपांग , 10 प्रकीर्ण , 6 छेदसूत्र , 4 मूलसूत्र , अनुयोग सूत्र का संकलन हुआ।
जैन साहित्य को ‘ आगम ‘ ( सिद्धांत ) कहा जाता है। इसके अंतर्गत 12 अंग , 12 उपांग , 10 प्रकीर्ण , 6 छेदसूत्र , 4 मूलसूत्र , अनुयोग सूत्र तथा नन्दिसूत्र की गणना की जाती है। * जैन आगम में 12 अंगों का प्रमुख स्थान है – आचारांग सुत्त , सूयग दंग ( सूत्र कृतांग ) , ठाणंग ( स्थानांग ) , समवायंग सुत्त , भगवती सुत्त , नायाधम्मकहा ( ज्ञाताधर्मकथा ) सुत्त , उवासगदसाओं ( उपासकदशा ) सुत्त , अंतर्गद्रदसाओं , अणुत्तरोववाइयदसाओं , पण्हावागरणाइ ( प्रश्न व्याकरण ) , विवागसुयम् तथा दिट्टिवाय ( दृष्टिवाद )इनमें ब्रह्मांड का वर्णन , प्राणियों का वर्गीकरण , खगोल विद्या , काल विभाजन , मरणोत्तर जीवनका वर्णन आदि का उल्लेख प्राप्त होता है। बारह उपांग है –
औपपातिक
जीवाभिगम
राजप्रश्नीय
प्रज्ञापना
चंद्र प्रज्ञाप्ति
जम्बूद्वीप प्रज्ञाप्ति
सूर्य प्रज्ञाप्ति
निर्यावलि
कल्पावसंतिका
पुष्पिका
पुष्प चूलिका तथा
वृष्णि दशा।
दस ‘ प्रकीर्ण ‘ प्रमुख ग्रंथों के परिशिष्ठ है। ये है –
चतु:शरण
देवेंद्रस्तव
आतुर
प्रत्याख्यान
वीरस्तव
भक्तिपरिज्ञा
तंदुल वैतालिका
चंद्रवैध्यक
गणितविद्या
संस्तार तथा महाप्रत्याख्यान
‘ छेदसूत्र ‘ की छह संख्या है। इसमें जैन भिक्षुओं के लिए विधिनियमों का संकलन है। छः छेदसूत्र हैं –
कल्प
पंचकल्प
निशीथ
महानिशिथ
व्यवहार तथा
आचार दशा
मूलसूत्र की संख्या चार है। * इसमें जैन धर्म के उपदेश , विहार के जीवन , भिक्षुओं के कर्तव्य , यम नियम आदि का वर्णन है। * चार मूलसूत्र है –
दशवैकालिक
उत्तराध्ययन
षडावशयक तथा
पिंडनिर्युक्ति या पाक्षिक सूत्र
अनुयोग सूत्र तथा नन्दिसूत्र जैनियों के स्वतंत्र ग्रंथ है | जो एक प्रकार का विश्वकोश है। इनमें भिक्षुओं के लिए आचरणीय बाते लिखी गई है। उपर्युक्त सभी ग्रंथ श्वेतांबर संप्रदाय के लिए हैं। दिगंबर संप्रदाय के अनुयायी इनकी प्रमाणिकता को स्वीकार नही करते हैं.
अन्य जैन ग्रंथ एवं उनके रचनाकार

जैन ग्रंथ

रचनाकार

कल्पसूत्र

भद्रबाहू

परिशिष्ट  पर्वन

हेमचंद्र

स्यादवादमंजरी

मल्लिसेन

द्रव्य संग्रह

नेमिचन्द्र

न्यायावतार

सिध्दसेन दिवाकर

तत्वार्थ सूत्र

उमास्वामी

न्याय दीपिका

धर्मभूषण

श्लोक वार्तिक

विद्यानंद स्वामी

प्रवचनसार

कुन्दकुन्द



जैन साहित्य में अशोक के पौत्र संप्रति को जैन मत का संरक्षक बताया गया है। इसे उज्जैन में शासन करने के कारण यह जैन धर्म का एक प्रमुख केंद्र बन गया। जैनियों का दूसरा प्रमुख केंद्र मथुरा था। यहां से अनेक मंदिर , प्रतिमाएं , अभिलेख आदि प्राप्त हुए है। कलिंग का चेदि शासक खारवेल जैन धर्म का महान संरक्षक था। इसने भुवनेश्वर के नजदीक उदयगिरि तथा खंडगिरि की पहाड़ियों को कटवा कर जैन भिक्षुओं के निवास के लिए गुहा विहार बनवाए थे।
राष्ट्रकूट राजाओं के शासनकाल (9वीं शताब्दी) में तथा गुजरात एंव राजस्थान में जैन धर्म 11 वी तथा 12वी शताब्दियों में अधिक लोकप्रिय रहा। खजुराहो के मंदिर हिंदू धर्म और जैन धर्म से संबंधित थे। माउंट आबू के दिलवाड़ा जैन मंदिर संगमरमर के बने हैं। इसका निर्माण गुजरात के चालुक्य ( सोलंकी ) शासक भीमदेव प्रथम के सामंत विमलशाह ने करवाया था। श्रवणबेलगेला कर्नाटक राज्य में स्थित है। यह गंग शासक रचमल्ल के शासनकाल में चामुंडराय नामक मंत्री ने लगभग 983 ई. में बाहुबली (गोमतेश्वर) की विशालकाय जैन मूर्ति का निर्माण कराया। * बाहुबली , प्रथम जैन तीर्थकर ऋषभदेव के पुत्र माने जाते हैं। महामस्ताभिषेक , जैन धर्म का एक महत्वपूर्ण उत्सव है , जो 12 वर्ष के अंतराल पर कर्नाटक राज्य के श्रवणबेलगोला में आयोजित किया जाता है।
श्वेतांबर एवं दिगंबर संप्रदाय में अंतर

श्वेतांबर

दिगंबर

इस संप्रदाय के लोग श्वेत  वस्त्र धारण करते हैं।

इस संप्रदाय के लोग पूर्णतया नग्न रहकर  तपस्या करते हैं।

इस मत के अनुसार, स्त्री के लिए मोक्ष प्राप्ति संभव है।

इस मत के अनुसार, स्त्री के लिए मोक्ष संभव नही है।

इस संप्रदाय के लोग ज्ञान प्राप्ति के बाद भोजन ग्रहण करने में विश्वास करते हैं।

जबकि  दिगंबर मत इसके विरुध्द है।

इस मत के अनुसार, महावीर  स्वामी विवाहित  थे।

दिगंबर मतानुसार महावीर स्वामी अविवाहित थे।

इस मत के अनुसार, 19वें मल्लिनाथ स्त्री थे।

दिगंबर मतानुसार वे पुरुष थे।