History in Hindi for All Competitive Exams (State Level) Part 8

भारत में यूरोपीय शक्तियों के आगमन का क्रम इस प्रकार है – पुर्तगीज–डच–अंग्रेज–डेन–फ्रांसीस जबकि इनकी कंपनियों की स्थापना के वर्ष निम्नानुसार हैं –

कंपनी

स्थापना वर्ष

1.    एस्तादों द इंडिया (पुर्तगीज कंपनी)

1498

2.    वेरिंग द्रे ओस्ट इंडिशे कंपनी (डच ईस्ट इंडिया कंपनी)

1602

3.    दि गवर्नर एंड कंपनी ऑफ मर्चेंट्स ऑफ ट्रेडिंग इन टू  द ईस्ट इंडीज (अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी)

1600

4.    डेन ईस्ट इंडिया कंपनी

1616

5.    कंपनी देस इंदसे ओरियंटलेस

1664



अंग्रेजी शासन काल में बिहार अफीम उत्पादन हेतु प्रसिध्द था।
यूरोपवासियों को सर्वोत्तम शोरा और अफीम बिहार से प्राप्त होता था।
कॉल्बर्ट के अनुरोध पर 1664 ई. मे कंपनी देस इंदेस ओरियंटलेस की स्थापना हुई। उसे ही भारत में फ्रांसीसी कंपनी का संस्थापक माना जाता है।
भारत में यूरोपीय शक्तियों के आगमन का क्रम इस प्रकार है – पुर्तगीज-डच-अंग्रेज-डेन-फ्रांसीसी
प्रथम कर्नाटक युध्द – एक्स ला चैपल की संधि से अंत
तृतीय कर्नाटक युध्द       – पेरिस की संधि से अंत

द्वीतीय कर्नाटक युध्द      – अनिर्णायक युध्द

प्रथम मैसूर युध्द     – ब्रिटिश की हार

ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने बंबई पुर्तगालियों से लिया था।
भारत में डचों द्वार स्थापित व्यापारिक केन्द्र –
नागपट्टनम                 – 1658 ई.

चिनसुरा            – 1653 ई.

मछलीपट्टनम       – 1605 ई.

सूरत              – 1616 ई.

भरुच              – 1619 ई.

आगरा             – 1619 ई.

कोचीन             – 1663 ई.

अहमदाबाद         – 1619 ई.

पटना              – 1638 ई.



ईस्ट इंडिया कंपनी और बंगाल के नवाब

मुगल सम्राट द्वारा स्वतंत्र रूप से नियुक्त बंगाल का अंतिम गवर्नर मुर्शीद कुली खान था |इसने अपनी राजधानी ढाका से मकसूदाबाद ले आया और नगर का नाम मुर्शिदाबाद रख दिया |इसने भूमि बंदोबस्त में इजारा व्यवस्था आरंभ की | अली वर्दी खान ने यूरोपियों की तुलना मधुमक्खियों से की और कहा यदि उन्हें छेड़ा ना जाए तो वह शहद देंगी और यदि उन्हें छेड़ा जाए तो वह काट काट कर मार डालेंगी| इसकी मृत्यु के पश्चात दौहित्र सिराजुद्दौला उत्तराधिकारी बना | ब्लैक होल की घटना 20 जून, 1756 को सिराजुद्दौला के समय में हुई|
जे. जेड. हॉलवेल जो शेष जीवित रहने वालों में से एक थे ,के अनुसार 18 फीट लंबे तथा 14 फीट 10 इंच चौड़े कक्ष में 146 अंग्रेज बंदी बंद कर दिए गए गले दिन उनमें से केवल 23 व्यक्ति ही बच पाए। यह घटना ब्लैक होल के नाम से प्रसिद्ध हुई | समकालीन मुस्लिम इतिहासकार गुलाम हुसैन ने अपनी पुस्तक सियार उल मुत्खैरीन में इसका कोई उल्लेख नहीं किया है  |
भारतवर्ष में ब्रिटिश साम्राज्य का संस्थापक रॉबर्ट क्लाइव को माना जाता है | जिसने प्लासी के युद्ध (23 जून 1757) में बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला को पराजित कर पहली बार भारत में ब्रिटिश प्रभुत्व की नींव रखी थी | प्लासी (वर्तमान नाम-पलाशी) का युद्ध मैदान पश्चिम बंगाल राज्य के नदिया जिले में भागीरथी नदी के किनारे स्थित है | क्लाइव भारत के गवर्नर के पद पर 1757-60 ई. तथा 1765-1767 ई. तक रहा।
इस दौरान उसने अवध के नवाब शुजाउद्दौला के साथ इलाहाबाद की संधि की | अंग्रेज सैनिकों का एक श्वेत विद्रोह उसके समय में हुआ था | क्लाइव द्वारा बंगाल में सफलतापूर्वक एक लुटेरा राज्य की स्थापना की गई | क्लाइव एक सैनिक के रूप में जन नेता था | पिट का यह कथन है कि वह स्वर्ग से उतरा जनरल था |
अली वर्दी खां के उत्तराधिकारी नवाबों में मीर कासिम सबसे योग्य था | पूर्णिया तथा रंगपुर के फौजदार के रूप में वह अपनी योग्यता पहले ही दर्शा चुका था | वह अपनी राजधानी मुर्शिदाबाद से मुंगेर ले गया | संभवतः मुर्शिदाबाद के षड्यंत्रमय वातावरण तथा कलकत्ता से दूर रहना चाहता था, ताकि अंग्रेजों का हस्तक्षेप अधिक ना हो। मीर कासिम ने सेना का गठन करने का निश्चय किया | इसके द्वारा मुंगेर में तोपें तथा तोड़ेदार बंदूकें बनाने की व्यवस्था की गई। इसके अतिरिक्त मीर कासिम राज्य की आर्थिक स्थिति को भी सुधारने के लिए प्रयत्नशील रहा | जिन अधिकारियों ने गबन किया था उन पर बड़े बड़े जुर्माने लगाए गए कुछ नए कर लगाए तथा पुराने करो का 3 / 32 भाग अतिरिक्त कर के रूप में लगाया गया | उसने एक और कर खिजरी जमा जो अभी तक अधिकारियों द्वारा छुपाया जाता था भी प्राप्त किया |
22 अक्टूबर 1764 को अंग्रेजों ने मीर कासिम, अवध के नवाब, शुजाउददौला तथा दिल्ली के मुगल सम्राट शाह आलम द्वितीय की सम्मिलित सेना को बक्सर के युद्ध में परास्त किया। इस युद्ध में अंग्रेजों की कमान मेजर हेक्टर मुनरो के हाथ में थी। इस युद्ध के समय वेन्सिटार्ट बंगाल का गर्वनर था । इस युद्ध के परिणाम ने प्लासी  के निर्णयों पर मुहर लगा दी, भारत में अब अंग्रेजों को चुनौती देने वाला कोई दूसरा नही था ।
इलाहाबाद तक का प्रदेश अंग्रेजों के अधिकार में आ गया तथा दिल्ली विजय का मार्ग खुल गया। बक्सर का युद्ध भारतीय इतिहास मे निर्णायक सिद्ध हुआ । बक्सर के युद्ध के समय बंगाल का नवाब मीर जाफर तथा दिल्ली का शासक शाहआलम द्वितीय था।
इलाहाबाद की दूसरी संधि (अगस्त ,1765) के अनुसार शाहआलम को अंग्रेज़ी संरक्षण में ले लिया गया तथा उसे इलाहाबाद में रखा गया। इलाहाबाद तथा कड़ा के जो क्षेत्र नवाब ने छोड़ दिए थे , शाहआलम को मिले । 12 अगस्त, 1765 के अपने फरमान द्वारा मुगल बादशाह शाह आलम द्वितीय ने कंपनी को बंगाल , बिहार तथा उड़ीसा की दीवानी स्थायी रूप से दे दी, जिसके बदले कंपनी द्वारा सम्राट को 26 लाख रुपये दिया जाना था तथा निजामत व्यय के लिए कंपनी को 53 लाख रुपये देना था।
इस समय रॉबर्ट क्लाइव ईस्ट इंडिया कंपनी का बंगाल का गवर्नर था। इसी समय बंगाल में द्वैध शासन की शुरुआत हुई कंपनी ने दीवानी कार्य के लिए दो उप-दीवान,  बंगाल के लिए मुहम्मद रजा खान तथा बिहार के लिए राजा शिताब राय की नियुक्ति की। शाहआलम द्वितीय का संपूर्ण जीवन आपदाओं से ग्रस्त रहा। उसे 1788 में अंधा कर दिया गया। 
शाहआलम द्वितीय के समय में 1803 ई. में दिल्ली पर अंग्रेजों का अधिकार हो गया। शाहआलम द्वितीय तथा उसके दो उत्तराधिकारी अकबर द्वितीय (1806-37 ई.) और बहादुर शाह द्वितीय (1837-57 ई.) ईस्ट इंडिया कंपनी के पेंशनभोगी मात्र बनकर रहे। 1765 ई. में अंग्रेजों द्वारा सिलहट की दीवानी प्राप्त की गई तथा बर्मा युद्ध के बाद स्कॉट द्वारा सिलहट को जयंतिया तथा गारो पहाड़ी क्षेत्रों से जोड़ने के लिए सड़कों का निर्माण किया जाने लगा जिसके विरोध स्वरुप इन पहाड़ियों पर रहने वाले खासी जनजाति के लोगों ने अपने नेता तीरत सिंह के नेतृत्व में विद्रोह किया था। के.एम. पन्निकर ने कहा है कि 1765 से 1772 ई. तक कंपनी ने बंगाल में डाकुओं का राज्य स्थापित कर दिया।


मुगल सम्राट फर्रुखसियर द्वारा वर्ष 1717 में मुर्शीद कुली खान को बंगाल का गवर्नर (सूबेदार) नियुक्त किया गया। मुर्शीद कुली खान की मृत्यु के पश्चात उसका दामाद शुजाउद्दीन बंगाल का सूबेदार बना जिसे तत्कालीन मुगल सम्राट मुहम्मदशाह रंगीला द्वारा मान्यता प्रदान की गई। अतः मुगल सम्राट द्वारा स्वतंत्र रुप से नियुक्त बंगाल का अंतिम गवर्नर मुर्शीद कुली खान था।
क्लाइव एक सैनिक के रुप में जननेता था। पिट का यह कथन है कि – वह स्वर्ग से उतरा जनरल था।
बक्सर के युध्द के समय बंगाल का नवाब मीर जाफर था।
अम्बर युध्द (अगस्त, 1749) – मुजफ्फरजंग, चंदा साहब तथा फ्रांसीसियों की संयुक्त सेनाओं ने वेल्लूर के समीप अम्बर नामक स्थान पर अनवरुद्दीन को पराजित कर उसकी हत्या कर दी। मुजफ्फरजंग दक्कन का सूबेदार बन गया। इस उपलक्ष्य में उसने अपने हितकारी डूप्ले को कृष्णा नदी के दक्षिणी भाग के मुगल प्रदेशों का गवर्नर नियुक्त कर दिया। तथा उत्तरी सरकार के कुछ जिले भी फ्रांसीसियों को दे दिए। इसके अतिरिक्त मुजफ्फरजंग की प्रार्थना पर एक फ्रेंच सेना की टुकड़ी बुस्सी के नेतृत्व में हैदराबाद में तैनात कर दी गई।
प्लासी युध्द (जून, 1757) – अंग्रेजों तथा बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला के मध्य। युध्द के परिणामस्वरुप अंग्रेजों का पूरे बंगाल पर नियंत्रण हो गया। क्लाइव ने मीर जाफर को बंगाल का नवाब बनाया। नवाब बनने के बाद मीरजाफर ने अंग्रेजों को उनकी सेवाओं के लिए 24 परगनों की जमींदारी से पुरस्कृत किया और क्लाइव को 234000 पाउंड की निजी भेंट दी।
वांडीवाश युध्द (जनवरी, 1760) – अंग्रेजों तथा फ्रांसीसियों के मध्य। युध्द में फ्रांसीसी पराजित हुए। अंग्रेजी सेना के नेतृत्वकर्ता थे सर आयरकूट जबकि फ्रांसीसी सेना का नेतृत्व काउंट डी लाली ने किया था।
बक्सर युध्द (अक्टूबर, 1764) – मीर कासिम, अवध के नवाब शुजाउद्दौला एवं मुगल सम्राट शाहआलम द्वीतीय की संयुक्त सेना तथा अंग्रेजों के मध्य। युध्द में अंग्रेज विजयी रहे। इस युध्द मे अंग्रेजी सेना का नेतृत्व हेक्टर मुनरो ने किया था। बक्सर के युध्द ने प्लासी के निर्णयों पर मुहर लाग दी।
खुर्दा का युध्द 1795 ई. में निजाम के विरुध्द मराठों द्वारा लड़ा गया। जिसमें निजाम की हार हुई।
भारत में अंग्रेजों का सर्वाधिक विरोध मराठों द्वारा किया गया था। चार आंग्ल-मराठा युध्दों के बाद ही मराठा शक्ति को दबाया जा सका। मुगल साम्राज्य के खंडहरों पर मराठों ने अपने साम्राज्य की आधारशिला रखी। उन्ही परिस्थितियों में अंग्रेजों ने भी लाभ उठाया। प्रथम आंग्ल-मराठा युध्द में अंग्रेजों को मुंह की खानी पड़ी। सालबाई की संधि से प्रथम युध्द बंद हुआ। वेलेजली ने 1802 ई. में अपने सहायक संधि के जाल में पेशवा को बांध लिया। 1818 ई. में लार्ड हेस्टिंग्स ने मराठों की रही सही शक्ति को समाप्त कर ब्रिटिश सर्वोच्चता की स्थापना की।




क्षेत्रीय राज्यः पंजाब एवं मैसूर

रणजीत सिंह का जन्म 13 नवंबर 1780 को सूकरचकिया मिसल के मुखिया महासिंह के घर हुआ था। महाराजा रणजीत सिंह और अंग्रेजो के बीच 25 अप्रैल 1809 को अमृतसर की संधि हुई। उसने 1818 में मुल्तान, 1819 में कश्मीर और 1834 में पेशावर को जीत लिया। 1798 में जमानशाह ने पंजाब पर आक्रमण किया। वापस जाते समय उसकी तोपें चिनाब नदी में गिर गई। रणजीत सिंह ने उन्हें निकलवा कर वापस भिजवा दिया। उस सेवा के बदले जमान शाह ने उसे लाहौर पर अधिकार करने की अनुमति दे दी।
1799 में रणजीत सिंह ने तत्काल लाहौर पर अधिकार कर लिया तथा उसे अपनी राजधानी बनाया जमान शाह ने उन्हें राजा की उपाधि दी और लाहौर का अपना सूबेदार मान लिया। उसने 1805 में अमृतसर को भी भंगी मिसल से छीन लिया। तत्पश्चात पंजाब को राजनीतिक राजधानी लाहौर और धार्मिक राजधानी अमृतसर दोनों ही उसके अधीन आ गई।
रणजीत सिंह एक योग्य शासक थे। उन्होंने कहा था कि “ईश्वर की इच्छा थी कि मैं सब धर्मों को एक निगाह से देखूं, इसलिए उसने दूसरी आंख की रोशनी ले ली।” अफगान अमीर शाहशुजा ने रणजीत सिंह को कोहिनूर हीरा प्रदान किया था।
1839 में रणजीत सिंह की मृत्यु के बाद उनका पुत्र खड़ग सिंह सिंहासन पर बैठा। इसे अफीम खाने की आदत थी। इसके शासनकाल के दौरान शीघ्र ही दबार में दो विरोधी दलों संधावालियां सरदार – चैत सिंह, अतर सिंह, लहना सिंह और उनके भतीजे अजीत सिंह और डोगरा बंधुओं- ध्यान सिंह, गुलाब सिंह, सुचेत सिंह की प्रतिद्वंधिता के कारण पंजाब में अराजकता फैल गई। चिलियांवाला का युद्ध 13 जनवरी 1849 में लड़ा गया। इस युद्ध में अंग्रेजी सेना का नेतृत्व लॉर्ड गफ ने किया तथा सिक्ख सेना शेर सिंह के नेतृत्व में लड़ी। यह युद्ध अनिर्णीत समाप्त हुआ। इस युध्द के समय भारत का गवर्नर जनरल लॉर्ड डलहौजी था।
महाराजा दलीप सिंह सिक्ख साम्राज्य का अंतिम शासक थे। उन्होंने 1843 से 1849 ईसवी तक शासन किया। दलीप सिंह ने सिक्ख धर्म छोड़कर इसाई धर्म को अपनाया था, इन्होंने रूस की यात्रा भी की थी। इनका निधन 23 अक्टूबर 1893 को पेरिस (फ्रांस) में हो गया था। इनकी अंत्येष्टि इंग्लैंड में हुई थी।
1849 ई. में द्वितीय आंग्ल सिक्ख युद्ध की समाप्ति पर अंग्रेजों द्वारा पंजाब का विलय कर लिया गया तथा दलीप सिंह को पेंशन देकर बाद में ब्रिटेन भेज दिया गया। पंजाब के ब्रिटिश साम्राज्य में विलय के बाद लॉर्ड डलहौजी ने वर्ष 1849 ईस्वी में पंजाब पर शासन करने के लिए तीन लोगों की एक परिषद का गठन किया जिसमें सर हेनरी लॉरेंस को अध्यक्ष तथा सर जॉन लॉरेंस और चार्ज ग्रेविल मानसेल को सदस्य के रूप में नियुक्त किया गया था। प्रथम आंग्ल मैसूर युद्ध 1767-69 ई. में हुआ। इस युद्ध में हैदर अली विजयी हुआ इस दौरान अंग्रेज गवर्नर वेरेल्स्ट था। युद्ध 4 अप्रैल 1769 मद्रास संधि द्वारा समाप्त हुआ।
*     द्वितीय आंग्ल मैसूर युद्ध(1780-84) के दौरान हैदर अली ने निजाम तथा मराठों के साथ मिलकर अंग्रेजों के विरुद्ध मोर्चा बनाया। जुलाई 1780 में हैदर अली ने कर्नाटक पर आक्रमण कर दिया तथा कर्नल बेली के अधीन अंग्रेजी सेना को हराकर  अर्काट पर अधिकार कर लिया। इसी दौरान टीपू ने हेक्टर मुनरो की सेना को पोलीलुर नामक स्थान पर हरा दिया।
*     1781 में हैदर अली का सामना अंग्रेजी जनरल आयरकूट से हुआ, जिसने पोर्टोनोवा (नवंबर, 1781), पोलीलुर तथा सोलिंगपुर में हैदर अली को परास्त किया। टीपू सुल्तान ने श्रीरंगपट्टनम को अपनी राजधानी बनाया एवं यहां जैकोबिन क्लब की स्थापना की और उसका सदस्य बना, साथ ही उसने अपनी राजधानी में फ्रांस और मैसूर के मैत्री का प्रतीक स्वतंत्रता का वृक्ष रोपा।
टीपू सुल्तान ने अपने समकालीन विदेशी राज्यों से मैत्री संबंध बनाने तथा अंग्रेजों के विरुध्द उनकी सहायता प्राप्त करने के लिए- अरब, कुस्तुंतुनिया/ (आधुनिक इस्तांबुल), काबुल और मॉरीशस को दूतमंडल भेजे और आधुनिक रीति पर दूतावासों की स्थापना की।
तृतीय ऑंग्ल-मैसूर युध्द (1790-92) का अवसान श्रीरंगपट्टनम की संधि (मार्च, 1792) द्वारा हुआ। इस संधि में अंग्रेजों की ओर से कार्नवालिस तथा मैसूर से टीपू सुल्तान शामिल थे। टीपू सुल्तान चतुर्थ आंग्ल-मैसूर युध्द (1799) के दौरान अंग्रेजों से लड़ते हुए मारा गया। इसके कुल के सदस्यों को वेल्लौर में कैद कर लिया गया। इस युध्द के समय अंग्रेजी सेना को वेलेजली और स्टुअर्ट ने अपना नेतृत्व प्रदान किया। मैसूर को जीतने की खुशी में आयरलैंड के लार्ड समाज ने वेलेजली को मार्क्विस की उपाधि प्रदान की।
युध्द के बाद अंग्रेजों ने मैसूर की गद्दी पर पुनः अड्यार वंश के एक बालक कॉष्णराय को बिठा दिया तथा कनारा, कोयंबटूर और श्रीरंगपट्टनम को अपने राज्य में मिला लिया। बेगम समरु (1753-1836) ने एक अति प्रसिध्द चर्च का निर्माण मेरठ के निकट सरघना में कराया था। बेगम समरु के पति एक यूरोपीय वाल्टर रेनहार्ट साम्ब्रे थे जिन्होंने की रियासतों को सैन्य सेवाएँ प्रदान की थी। साम्ब्रे को बंगाल का नवाब नजब खां ने सहारनपुर के रुहेला सरदार जाब्ता खां को हराने में  प्रमुख भूमिका के कारण सरधना की जागीर प्रदान की थी। अपने पति की मृत्यु के बाद बेगम समरु सरघना की शासिका बनी थी।
1781 ई. मे हैदर अली का सामना अंग्रेज जनरल आयरकूट से हुआ, जिसने पोर्टोनोवा के युध्द में (नवंबर, 1781) हैदर अली को परास्त किया।
टीपू सुल्तान चतुर्थ आंग्ल-मैसूर युध्द (1799) के दौरान अंग्रेजों से लड़ते हुए मारा गया।
टीपू सुल्तान ने श्रीरंगपट्टनम को अपनी राजधानी बनाया एवं यहां जैकोबिन क्लब की स्थापना की और उसका सदस्य बना।
टीपू सुल्तान ने आधुनिक पध्दति से विदेशो में दूतावास स्थापित किए थे।
बेगम समरु (1753-1836) ने एक अति प्रसिध्द चर्च का निर्माण मेरठ के निकट सरधना में कराया था।
अंग्रेजों तथा मराठों के मध्य तीन युध्द हुए थे। प्रथम आंग्ल-मराठा युध्द (1775-82 ई.) के समय वारेन हेस्टिंग्स कंपनी का गवर्नर जनरल था। द्वीतीय आंग्ल-मराठा युध्द (1803-06 ई.) के समय लॉर्ड वेलेजली गवर्नर जनरल था तथा तीसरे आंग्ल-मराठा युध्द ( 1817-18 ई.) के समय लॉर्ड
हेस्टिंग्स गवर्नर  जनरल था। तीसरे आंग्ल-मराठा युध्द का कारण पिंडारियों के विरुध्द अंग्रेजों का अभियान था।



गवर्नर/गवर्नर जनरल/वायसराय

क्लाइव के समय में असैनिक तथा सैनिक दोनों में सुधार हुए। असैनिक सुधारों के अंतर्गत के क्लाइव ने उपहार लेने बंद करा दिए तथा निजी व्यापार बंद करा दिए। उसने आंतरिक कर देना अनिवार्य बना दिया। सैनिक सुधारों के अंतर्गत क्लाइव ने आज्ञा दी कि दोहरा भत्ता बंद कर दिया जाए तथा जनवरी 1766 में यह भत्ता केवल उन सैनिकों को ही मिलता था जो बंगाल तथा बिहार की सीमा से बाहर कार्य करते थे।
प्रशासनिक सुधार के अंतर्गत हेस्टिंग ने सर्वप्रथम 1772 ई. में कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स के आदेशानुसार बंगाल में द्वैध शासन की समाप्ति की घोषणा की और राजकीय कोषागार का स्थानांतरण मुर्शिदाबाद से कलकत्ता कर दिया। वारेन हेस्टिंग्स का विचार था कि समस्त भूमि शासक की है। राजस्व सुधारों को व्यवस्थित करने के लिए उसने परीक्षण और अशुद्धि के नियम को अपनाया।
रेग्युलेटिंग एक्ट 1773 के तहत ब्रिटिश संसद के द्वारा बंगाल में पहली बार कालेजिस्ट सरकार की व्यवस्था की गई। इस सरकार में एक अध्यक्ष और चार सदस्यों का प्रावधान किया गया। अध्यक्ष को गवर्नर जनरल का पदनाम दिया गया। वारेन हेस्टिंग्स को 1774 में बंगाल का प्रथम गवर्नर जनरल नियुक्त किया गया।|
जन प्रशासन की नींव वॉरेन हेस्टिंग्स द्वारा मजबूती से रखी गई थी, जिस पर ऊपरी संरचना कार्नवालिस ने तैयार की। कार्नवालिस के समय में न्यायिक सुधारों फौजदारी कानून में सुधारों, पुलिस सुधार, कर संबंधी सुधारों तथा व्यापारिक सुधारो से जन प्रशासन की नींव पड़ी।
15 जनवरी 1784 में एशियाटिक सोसाइटी की स्थापना के समय बंगाल के गवर्नर जनरल लॉर्ड वॉरेन हेस्टिंग्स (1773-1785 ई.) थे। सुरक्षा प्रकोष्ठ या घेरे की नीति से वॉरेन हेस्टिंग्स तथा वेलेजली संबंधित थे। वॉरेन हेस्टिंग्स के अन्यायपूर्ण तथा निरंकुश कार्यों के कारण उस पर महाभियोग का मुकदमा चलाया गया जो 1788 से 1795 ई तक चलता रहा, किंतु ब्रिटिश संसद  ने उसकी सेवा को देखते हुए उसे सभी दोषों से मुक्त कर दिया |
रियासतों के प्रति प्रमुख ब्रिटिश नीतियां निम्नलिखित थी –
कंपनी का भारतीय रियासतों से समानता के लिए संघर्ष ( 1740-1765ई )
‘ सुरक्षा प्रकोष्ठ ‘ नीति या ‘ घेरे की नीति ‘ ( 1765-1813ई )
अधीनस्थ पार्थक्य की नीति ( 1813-1857 ई )
अधीनस्थ संघ की नीति ( 1858-1935 ई )
बराबर के संघ की नीति ( 1935-1947 ई ) |
दीवानी और फौजदारी कचहरियों के श्रेणीबद्ध संगठन के जरिए न्याय प्रदान करने की एक नई व्यवस्था की नींव अंग्रेजों ने रखी | इस व्यवस्था को वॉरेन हेस्टिंग्स ने आरंभ किया मगर कार्नवालिस ने 1793 ई में उसे और सुदृढ़ बनाया। शक्ति कलेक्टर के हाथों में केंद्रित कर दी | 1787 ईस्वी में जिले के प्रभारी कलेक्टरों को दीवानी अदालतों के दीवानी न्यायाधीश भी नियुक्त कर दिया गया तथा इसके अतिरिक्त उन्हें फौजदारी शक्तियां और सीमित मामलों में फौजदारी न्याय करने का भी अधिकार दे दिया गया |
1790-1792 ई के बीच भारतीय न्यायाधीशों से युक्त जिला फौजदारी अदालतों को समाप्त कर उसके स्थान पर चार भ्रमण करने वाले न्यायालय -तीन बंगाल हेतु एवं एक बिहार हेतु नियुक्त किए गए | इन अदालतों की अध्यक्षता यूरोपीय व्यक्ति द्वारा भारतीय काजी एवं मुफ्ती  के सहयोग से की जाती थी | कार्नवालिस ने ‘ कानून की विशिष्टता ‘ का नियम , जो इससे पूर्व नही था, भारत में लागू किया |
लॉर्ड कार्नवालिस ने अपने न्यायिक सुधारों को 1793 ई. तक अंतिम रूप देकर उन्हें ‘ कार्नवालिस संहिता ‘ के रूप में प्रस्तुत किया | यह सुधार प्रसिद्ध सिद्धांत ‘ शक्तियों के पृथक्करण ‘ पर आधारित था | उसने कर तथा न्याय प्रशासन को पृथक कर दिया | कलेक्टर की न्यायिक तथा फौजदारी शक्तियां ले ली गई तथा उसके पास केवल कर संबंधी शक्तियां ही रह गई | जिला दीवानी न्यायालयों में कार्य के लिए नए अधिकारियों के एक श्रेणी बनाई गई | जिला न्यायाधीशों को फौजदारी तथा पुलिस के कार्य भी दिए गए | भारत की प्रसंविदाबद्ध सिविल सेवा या लोक सेवा का प्रारंभ कार्नवालिस द्वारा किया गया था |
लॉर्ड कॉर्नवालिस 1786-1793 ई. एंव 30 जुलाई 1805 से 5 अक्टूबर 1805 तक बंगाल का गवर्नर जनरल रहा। इसकी मृत्यु 5 अक्टूबर 1805 को गाजीपुर (उत्तर प्रदेश) में हुई थी | यहीं पर इसकी कब्र स्थित है | ‘ बसीन की संधि ‘ दिसंबर 1802 में पेशवा बाजीराव द्वितीय और अंग्रेजो के मध्य हुई थी | लॉर्ड वेलेजली की सहायक संधि को स्वीकार करने वाला पहला मराठा सरदार पेशवा बाजीराव II था | इस सहायक संधि के तहत बाजीराव द्वितीय ने अंग्रेजों की संरक्षकता स्वीकार कर ली | इस संधि की शर्तों के अनुसार , अंग्रेजों ने पेशवा को पूना में पुनः स्थापित करने के साथ लगभग 60 हजार सैनिक पेशवा की रक्षा हेतु उसके राज्य में रखने का वादा किया जबकि इसके बदले में पेशवा ने अंग्रेजों को ₹26 लाख वार्षिक आय वाले क्षेत्र प्रदान करने पर सहमति जताई |
लॉर्ड वेलेजली ( 1798-1805 ई ) ने भारतीय राज्यों को अंग्रेजी राजनैतिक परिधि में लाने के लिए सहायक संधि प्रणाली का प्रयोग किया | उसने सहायक संधि का आविष्कार नहीं किया | इस प्रणाली का अस्तित्व तो पहले से ही था तथा वह क्रमिक रूप से विकसित हुई थी | संभवत: डूप्ले प्रथम यूरोपीय था जिसने अपनी सेना किराए पर भारतीय राजाओं को दी थी |  अंग्रेजों ने भी है प्रणाली अपनाई |
प्रथम सहायक संधि 1765 ई में अवध से की गई जब कंपनी ने निश्चित धन के बदले उसकी सीमाओं की रक्षा करने का वचन दिया | लॉर्ड वेलेजली द्वारा विशिष्ट रूप से प्रवर्तित सहायक संधि को स्वीकार करने वाले राज्य थे – हैदराबाद ( 1798 ई तथा 1800 ई ) मैसूर ( 1799 ई ) , तंजौर ( अक्टूबर ,1799 ई ) , अवध ( नवंबर 1801 ई ) , पेशवा ( दिसंबर , 1802 ई ), बरार के भोंसले ( दिसंबर , 1803 ई ) , सिंधिया ( फरवरी , 1804 ई ) , जोधपुर , जयपुर , मच्छेरी , बूंदी तथा भरतपुर |
लॉर्ड विलियम बेंटिक ने जुलाई 1828 में गर्वनर जनरल का कार्यभार संभाला | उसने सती प्रथा , बालिका शिशु वध जैसी सामाजिक कुरीतियों को समाप्त करने के लिए प्रभावकारी प्रयत्न किया। तथा देश में ठगी समाप्त कर शांति और व्यवस्था स्थापित की। उसने ‘ कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स ‘ की इच्छाओं के अनुसार भारतीय रियासतों के प्रति यथासंभव तटस्थता की नीति अपनाई |
जयपुर में अव्यवस्था ने ऐसा उग्र रूप धारण कर लिया कि ब्रिटिश रेजिडेंट पर ही प्रहार कर दिया गया परंतु इस पर भी बेंटिक ने हस्तक्षेप करना स्वीकार नहीं किया | इसी प्रकार जोधपुर , बूंदी , कोटा तथा भोपाल में भी उसने हस्तक्षेप नहीं किया यद्यपि ऐसा करने के लिए पर्याप्त कारण थे | परंतु उसने इस नीति का अनुसरण छोड़कर 1831 ई  में मैसूर तथा 1834 ई में कुर्ग एवं कछार की रियासतों  को अपने प्रदेश में मिला लिया क्योंकि वहां बहुत अधिक अव्यवस्था थी।
विलियम बेंटिक ( 1828-1835 ई) के शासन के 7 वर्षों में पुरानी निरंतर युद्धों तथा संयोजन की नीति को तिलांजलि दे दी गई | भारत के इतिहास में बेंटिक का नाम सामाजिक तथा प्रशासनिक सुधारों के कारण स्मरण किया जाएगा | 1833 ई के चार्टर एक्ट के द्वारा भारतीय प्रशासन को पूर्णतः केंद्रीकृत करने का प्रयास किया गया। इस एक्ट के द्वारा बंगाल के गर्वनर जनरल को भारत का गर्वनर जनरल बना दिया गया। 1833 ई. में लॉर्ड विलियम बेंटिक को भारत का प्रथम गर्वनर जनरल बनाया गया। लॉर्ड विलियम बेंटिक ने कैप्टन स्लीमैन को ठगों के विरुद्ध कार्यवाही करने के लिए नियुक्त किया गया |
उसने लगभग 1500 ठगों को बंदी बना लिया। अनेक ठगों को फांसी दी गई। शेष को आजीवन निर्वासित कर दिया गया। 1837 ई के पश्चात् संगठित रूप से ठगों का अंत हो गया। 1789 ई की घोषणा द्वारा बंगाल से दासों का निर्यात बंद कर दिया गया | 1811 ई एवं 1823 ई में दासों के संबंध में कानून बनाए गए।
1833 ईस्वी के चार्टर एक्ट मे दासता को शीघ्र-अतिशीघ्र समाप्त करने के लिए गवर्नर से कानून बनाने को कहा गया | 1843 ई में समस्त भाग से दासता को अवैध घोषित कर दिया गया |
1860 ई में ‘ भारतीय दंड संहिता ‘ के अंतर्गत दासता को अपराध घोषित कर दिया गया | आंग्ल-नेपाल युद्ध (1814-1816 ई ) लार्ड हेस्टिंग्स  के गवर्नर जनरल काल (1813-23 ) में हुआ था जो कि 1816 की सगौली की संधि से समाप्त हुआ था |
1854 ई में स्लीमैन के स्थान पर जेम्स आउट्रम को अवध का ब्रिटिश रेजिडेंट बनाया गया | उसने कहा कि अवध का प्रशासन बहुत ही दूषित है तथा जनता की अवस्था बहुत शोचनीय है | आउट्रम की रिपोर्ट को ही फरवरी , 1856 ई में अवध के अधिग्रहण का आधार बनाया गया था|
लॉर्ड डलहौजी ( 1848-56 ई ) ने अवध के नवाब वाजिद अली शाह पर कुशासन का आरोप लगाकर 13 फरवरी 1856 ई को उसका अंग्रेजी राज्य में विलय कर लिया | अवध के अतिरिक्त डलहौजी के व्यपगत सिद्धांत के अंतर्गत विलय किए गए प्रदेश थे – सातारा ( 1848 ई ) , जैतपुर एवं संबलपुर ( 1849 ई ) , बघाट ( 1850 ई ) , उदयपुर ( 1852 ई ) , झांसी ( 1853 ई ) , नागपुर ( 1854 ई ) तथा करौली ( 1855 ई ) थे | कोर्ट ऑफ  डाइरेक्टर्स  ने करौली के व्यपगत के  प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया |
भारत में रेल निर्माण की दिशा में प्रथम प्रयास ब्रिटिश गवर्नर लॉर्ड डलहौजी द्वारा किया गया | प्रथम रेलवे लाइन 1853 ई में बंबई से थाणे के बीच डलहौजी के समय बिछाई गई | रेल यात्रा का  प्रारंभ ग्रेट इंडियन पेनिनसुला रेलवे द्वारा किया गया था। भारत में रेलवे के विकास का मुख्य उद्देश्य कच्चे माल को देश के आंतरिक भागों से बंदरगाह तक ले जाना था | इसका दूसरा उद्देश्य सेना को दूरदराज के क्षेत्रों तक पहुंचाना भी था, ताकि ब्रिटिश शासकों के प्रति होने वाले किसी भी विद्रोह को सरलता से कुचला जा सके | रेलवे का सर्वाधिक विस्तार 1900 ई के आसपास लॉर्ड कर्जन के समय में हुआ | ब्रिटिश भारतीय राज्य क्षेत्र का अंतिम प्रमुख विस्तार डलहौजी के समय में हुआ |
डलहौजी से पूर्व सार्वजनिक निर्माण का कार्य एक सैनिक बोर्ड पर था | इसके कार्यकाल में पहली बार एक सार्वजनिक निर्माण विभाग बनाया गया और सार्वजनिक उपयोग के कार्य के लिए बहुत सा धन व्यय किया जाने लगा। पब्लिक वर्क्स डिपार्टमेंट को 1845-1855 ई के दौरान स्वरूप देने वाले डलहौजी थे | ईश्वरचंद्र विद्यासागर के अथक प्रयासों के फलस्वरूप लॉर्ड कैनिंग के समय ‘ विधवा पुनर्विवाह अधिनियम ‘ 1856 में पारित हुआ | इस अधिनियम के नियम 15 (XV)के तहत विधवा विवाह को वैध मान लिया गया और उस विवाह पर उत्पन्न हुए बालक वैध घोषित किए गए | विधवाओं के कल्याण से जुड़े अन्य नेता थे – पश्चिमी भारत में विष्णु शास्त्री और केशव कर्वे |  धोंदो केशव कर्वे ने 1899 ई में पूना में विधवा आश्रम की स्थापना की थी |
1857 ई की महान क्रांति का सबसे महत्वपूर्ण परिणाम था – महारानी की उद्घोषणा | यह उद्घोषणा 1 नवंबर 1858 ई को इलाहाबाद में हुए दरबार में लॉर्ड कैनिंग द्वारा घोषित की गई | इसमें ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन की समाप्ति और भारत के शासन को सीधे ब्रिटिश शाही राज के अंतर्गत लाए जाने की घोषणा की गई। इसके तहत लॉर्ड कैनिंग ब्रिटिश भारत का प्रथम वायसराय बना | महारानी विक्टोरिया को भारत की साम्राज्ञी , 1858 ई में नियुक्त किया गया जबकि जनवरी 1877 ई में आयोजित किए गए दिल्ली दरबार में इन्हें केसर-ए-हिंद की उपाधि दी गई |
प्रथम आंग्ल अफगान युद्ध 1839-1842 ई के मध्य हुआ | इस दौरान भारत के गवर्नर जनरल ऑकलैंड थे | लॉर्ड लिटन के समय द्वितीय आंग्ल-अफगान युद्ध ( 1878-1880 ई ) में हुआ था | 1843 के एक्ट V के द्वारा भारत में तत्कालीन गवर्नर जनरल एलेन बरो ने दास प्रथा का उन्मूलन किया था | इसके काल ( 1842-1844 ई ) के दौरान अगस्त 1843 को सिंध को पूर्ण रूप से ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लिया गया |
इस काल को ” कुशल अकर्मण्यता ” या ” चतुराईपूर्ण निष्क्रियता ” ( policy of masterly inactivity ) की नीति आंग्ल-अफगान संबंध के संदर्भ में लॉर्ड  एलेन बरो के काल से प्रारंभ होकर लॉर्ड नार्थ ब्रुक के काल तक चलती रही। इस काल को कुशल अकर्मण्यता की नीति का काल कहा जाता है।
इस नीति को प्रायः जॉन लॉंरेंस के नाम से विशिष्ट रुप से संबंधित किया जाता है, क्योंकि उसके वायसराय काल में  इस नीति का अनुसरण करने का स्पष्ट अवसर मिला और इस नीति की रुपरेखा स्पष्ट रुप से निश्चित की गई।
कुशल अकर्मण्यता ( masterly inactivity ) शब्द का जे डब्ल्यू एस वाइली ने एडिनबरा रिव्यू के एक लेख में प्रयोग किया था | *भारत में अंग्रेजों के समय प्रथम जनगणना लॉर्ड मेयो (1869-72 ई.) के काल में 1872 ईसवी में प्रारंभ हुई, किंतु लॉर्ड रिपन के काल में नियमित जनगणना 1881ई से शुरू हुई | लार्ड मेयो (1869-72 ई.) की हत्या अंडमान निकोबार दीप समूह के भ्रमण के दौरान एक शेर अली अफरीदी नामक कैदी द्वारा की गई |
मेयो प्रथम गर्वनर जनरल था जिनकी हत्या उनके कार्यकाल में की गई। 1876 ई में लिटन के वायसराय बनकर आने पर अफगानिस्तान के प्रति अपनाई  गई नीति में परिवर्तन आया | कुशल अकर्मण्यता की नीति के स्थान पर अग्रगामी नीति का अनुसरण होने लगा | मेजर सेन्डेमन की बलूचिस्तान में गवर्नर जनरल के एजेंट के रूप में नियुक्ति के साथ ही बलूचिस्तान   में हस्तक्षेप न करने के स्थान पर हस्तक्षेप की नीति अपनाई गई |
वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट या भारतीय भाषा समाचार पत्र अधिनियम 1878 ई. में लॉर्ड लिटन के काल में पारित किया गया | इस अधिनियम को ” मुंह बंद करने वाला अधिनियम ” भी कहा गया। *अर्सकिन पेरी ने इस अधिनियम को ‘ विपरीतगामी और असंगत ‘ तथा भारत की भावी प्रगति के लिए घातक पग बताया |
श्री एस एन बनर्जी ने इसे आकाश से वज्रपात कहा है। सर पीसी इल्बर्ट जो वॉयसरॉय की परिषद के विधि सदस्य थे |  इन्होंने 2 फरवरी 1883 ई को विधान परिषद में एक विधेयक प्रस्तुत किया जिसे इल्बर्ट बिल की संज्ञा दी जाती है | इस विधेयक का उद्देश्य था कि ” जाति भेद पर आधारित सभी न्यायिक योग्यताएं तुरंत समाप्त कर दी जाए और भारतीय यूरोपीय न्यायाधीशों की शक्तियां समान कर दी जाए “। जैसे ही यह विधेयक प्रस्तुत किया गया, एक बवंडर खड़ा हो गया |  यूरोपीय लोगों ने इसे अपने विशेषाधिकारों पर कुठाराघात बताया |
लार्ड रिपन को ब्रिटिश भारत के वायसरायों में सबसे अधिक उदारवादी माना जाता है | उन्होंने सौ या उससे अधिक कार्यरत मजदूरों वाली फैक्टरियों में काम करने वाली महिलाओं तथा बच्चों के संबंध में कुछ उदारवादी नियम बनाए , जिन्हें ‘ प्रथम फैक्टरी अधिनियम 1881 के नाम से जाना जाता है | इस अधिनियम के तहत 7 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को फैक्ट्रियों में काम करने पर रोक एवं 7  से 12 वर्ष के बच्चों की कार्य अवधि प्रतिदिन 9 घंटे तथा इन्हें महीने में 4 दिन की छुट्टी का प्रावधान किया गया |
दूसरा फैक्ट्री अधिनियम 1891 में बनाया गया | इसमें सभी मजदूरों के लिए साप्ताहिक छुट्टी की व्यवस्था थी | लॉर्ड मेयो के समय में सृजित स्थानीय शासन को वास्तविक स्थानीय शासन बनाने के लिए लॉर्ड रिपन ने उन्हें आवश्यक नियम प्रदान किए। इस कार्य के कारण लॉर्ड रिपन को आधुनिक भारत में स्थानीय शासन का जनक माना जाता है |
चार्ल्स मेटकोफ ने प्रेस पर से प्रतिबंध हटाया , इसलिए उसे ‘ समाचार पत्रों का मुक्तिदाता ‘ कहा जाता है | * भारत में पुरातत्व सर्वेक्षण संबंधी प्रयास 1784 ई कलकत्ता में विलियम जोन्स द्वारा एशियाटिक सोसाइटी की स्थापना के साथ प्रारंभ हुए थे |
1861 ई में लॉर्ड कैनिंग द्वारा अलेक्जेंडर कनिंघम को प्रथम पुरातात्विक सर्वेक्षक नियुक्त किया गया था तथा 1871 ई में पुरातात्विक सर्वेक्षण को सरकार में अलग विभाग बनाकर कनिंघम को इसका महानिदेशक नियुक्त किया गया | लॉर्ड कर्जन के कार्यकाल ( 1899-1905 ई ) के दौरान , 1901 ई में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) को एकीकृत और केंद्रीयकृत स्वरूप  देते हुए जॉन मार्शल को इसका नया महानिदेशक नियुक्त किया गया | प्राचीन स्मारक संरक्षण अधिनियम , 1904 के द्वारा लॉर्ड कर्जन ने भारत में पहली बार ऐतिहासिक इमारतों की सुरक्षा एवं मरम्मत की ओर ध्यान देते हुए 50000 पौंड की धनराशि का आवंटन किया | गोपाल कृष्ण गोखले ने कर्जन के प्रशासन की तुलना मुगल सम्राट औरंगजेब से की थी |
नवंबर 1905 में लॉर्ड कर्जन के स्थान पर लॉर्ड मिंटो को भारत का वायसराय नियुक्त किया गया तथा जॉन मार्ले को भारत सचिव नियुक्त किया। इनके द्वारा किए गए सुधार को मार्ले-मिंटो सुधार ( 1909 ई ) के नाम से जाना जाता है | इस अधिनियम के द्वारा मुसलमानों के लिए पृथक मताधिकार तथा पृथक निर्वाचन क्षेत्रों की स्थापना की गई | वायसराय लॉर्ड हार्डिंग के समय भारत की राजधानी कलकत्ता से दिल्ली स्थानांतरण किया गया |
वायसराय लॉर्ड हार्डिंग ने 1911 में जॉर्ज पंचम तथा महारानी मेरी को भारत बुलाया तथा दिल्ली में भव्य दरबार का आयोजन किया , जिसे दिल्ली दरबार (तृतीय) के नाम से जानते है | इसी दरबार में बंगाल विभाजन को रद्द कर दिया गया तथा राजधानी के स्थानांतरण की घोषणा की गई |


चूक का सिध्दांत/हड़प नीति – डलहौजी
बंगाल का विभाजन             – लार्ड कर्जन

बंगाल में दोहरा शासन                 – क्लाइव

सामाजिक सुधार              – बेंटिक

1876 ई. में लिटन के वायसराय बनकर आने पर अफगानिस्तान के प्रति अपनाई गई नीति में परिवर्तन आया। कुशल अकर्मण्यता की नीति के स्थान पर अग्रगामी नीति का अनुसरण होने लगा।
महारानी विक्टोरिया को भारत की साम्राज्ञी, 1858 ई. में नियुक्त किया गया, जबकि जनवरी, 1877 में आयोजित किए गए दिल्ली दरबार में इन्हें कैसर–ए–हिन्द की उपाधि प्रदान की गई।
1843 के एक्ट-V के द्वारा भारत में तत्कालीन गवर्नर जनरल लार्ड एलेनबरो ने दास प्रथा का उन्मूलन किया था। इसका कार्यकाल 1842-44 ई. तक था।
1853 ई. में बंबई के बोरीबंदर स्टेशन से थाणे के मध्य भारत में सर्वप्रथम रेल यात्रा का प्रारंभ ग्रेट इंडियन पेनिनसुला रेलवे द्वारा किया गया था।
डलहौजी के व्यपगत सिध्दांत के अंतर्गत विलय किए गए राज्य-सतारा (1848 ई.), जैतपुर एवं संभलपुर (1849 ई.), बघात (1850 ई.), उदयपुर (1852 ई.), झांसी (1853 ई.) तथा नागपुर (1854 ई.) थ ।
1848 ई. में लार्ड डलहौजी जिसे अर्ल ऑफ डलहौजी भी कहा जाता है, गवर्नर जनरल बनकर भारत आया। उसका वास्तविक नाम जेम्स एंडूज रेम्जे था।
1789 ई. की घोषणा द्वारा बंगाल से दासों का निर्यात बंद कर दिया गया था।
विलियम बेंटिक ने 1831 ई. में मैसूर तथा 1834 ई. में कुर्ग एवं कछार की रियासतों को अपने प्रदेश मे मिला लिया क्योंकि वहां बहुत अधिक अव्यवस्था थी।
लॉर्ड वेलेजली प्रथम अंग्रेज था जिसने भारतीय राज्यो को अंग्रेजी राजनैतिक परिधि में लाने के लिए सहायक संधि प्रणाली का सूत्रपात किया।
बसीन की संधि दिसंबर, 1802 में पेशवा बाजीराव द्वीतीय और अंग्रेजों के मध्य हुई थी।
15 जनवरी, 1784 एशियाटिक सोसायटी की स्थापना के समय बंगाल के गवर्नर जनरल लॉर्ड वॉरेन हेस्टिंग्स (1773-1785 ई.) थे।
चतुराईपूर्ण निष्क्रियता या कुशल अकर्मण्यता की नीति आंग्ल-अफगान संबंध के संदर्भ में लार्ड एलन बरो के काल से प्रारंभ होकर लार्ड नार्थब्रुक के काल तक चलती रही।
वायसरायों का सही कालानुक्रम
लॉर्ड कर्जन – 1899-1905 ई.
लॉर्ड हार्डिंग – 1910-1916 ई.
लार्ड चेम्सफोर्ड – 1916-1921 ई.
लॉर्ज इरविन – 1926-1931 ई.
भारत का एकमात्र यहूदी वायसराय लॉर्ड रीडिंग (1921-1926) था। इसके समय चौरी-चौरा की घटना, स्वराज पार्टी का गठन तथा रौलेट एक्ट निरसित हुआ।
लार्ड लिटन के कार्यकाल में भारतीयों को राय बहादुर और खान बहादुर की उपाधियां प्रदान करना प्रारंभ हुआ। वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट 1878 ई. में लार्ड लिटन के काल में पारित किया गया।


ब्रिटिश शासन का भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्रभाव

औपनिवेशिक शासन काल में भारत सरकार के गृह शुल्कों ( Home charges) से तात्पर्य इंग्लैंड स्थित राज्य सचिव ( secretory of state ) द्वारा भारत सरकार की ओर से किया गया व्यय था | इसमें शामिल थे – भारतीय सार्वजनिक ऋण एवं रेलों पर लगाई गई पूंजी पर दिया गया ब्याज , भारत को दी गई सैनिक और अन्य सामग्री की लागत , भारत के कारण इंग्लैंड में दिए जाने वाले नागरिक और सैनिक शुल्क , इंग्लैंड में राज्य सचिव का सारा व्यय ( 1919 तक ) , तथा भारत सरकार द्वारा यूरोपीय अफसरों को दिया जाने वाले भत्ते और पेंशन |
भारत के बाहर हुए युद्धो और लड़ने में अंग्रेजों द्वारा प्रयोग में लाई जाने वाली निधि गृह शुल्कों पर भारित नहीं थी | ब्रिटिश काल में ‘ इंपीरियल प्रेफरेंस’ शब्दावली का प्रयोग भारत में ब्रिटिश आयातो पर दी जाने वाली विशेष रियायतों के लिए किया जाता था | इसके तहत भारत में ब्रिटिश आयातो पर नाम मात्र का शुल्क ( या बिल्कुल नहीं ) लगता था जबकि भारत के निर्यातों पर ब्रिटेन में भारी शुल्क लगाया जाता था |
ब्रिटिश शासन के दौरान भारत में धनिक वर्ग द्वारा भू संपत्ति में निवेश करने को तरजीह दिए जाने के कारण उद्योगों का कोई स्वतंत्र विकास नहीं हो सका | 1793 में कार्नवालिस ने भू-राजस्व की स्थाई बंदोबस्त प्रणाली आरंभ किया | इसे इस्तमरारी ,जागीरदारी , मालगुजारी एवं बीसवेदारी आदि भिन्न-भिन्न  नामों से भी जाना जाता है | यह व्यवस्था बंगाल , बिहार, उड़ीसा तथा उत्तर प्रदेश के वाराणसी एवं उत्तरी कर्नाटक में लागू थी |
इसके अंतर्गत समूचे ब्रिटिश भारत के क्षेत्रफल का लगभग 19% हिस्सा शामिल था | इस व्यवस्था के अंतर्गत जमींदारों के एक नए वर्ग को भूमि का भू-स्वामी घोषित कर दिया गया, भूमि के लगान का 10/11 भाग कंपनी को देना था तथा 1/11 भाग अपनी सेवाओं के लिए अपने पास रखना था |
स्थायी बंदोबस्त के अंतर्गत जमींदार छोटे पूंजीपति ( भद्र नवाब ) थे | स्थायी भूमि बंदोबस्त या जमींदारी प्रथा के बाद अंग्रेजों द्वारा भारत में भू राजस्व वसूली हेतु लागू की गई दूसरी व्यवस्था रैयतवाड़ी व्यवस्था थी | इस व्यवस्था के जन्मदाता टॉमस मुनरो और कैप्टन रीड थे , जिन्होंने सर्वप्रथम तमिलनाडु के बारामहल जिले में लागू किया | तत्पश्चात यह व्यवस्था मद्रास , बंबई के कुछ हिस्से , पूर्वी बंगाल , असम तथा कुर्ग (आधुनिक कर्नाटक का एक भाग)  में लागू की गई |
इस प्रथा के अंतर्गत रैयतों को भूमि के मालिकाना और कब्जाधारी अधिकार दिए गए थे और प्रत्यक्ष रूप से या सीधे तथा व्यक्तिगत रूप से स्वंय सरकार को भू-राजस्व का भुगतान करने के लिए उत्तरदायी थे | इस व्यवस्था ने कृषक भू स्वामित्व की स्थापना की | इसके अंतर्गत कुल ब्रिटिश भारत के भू-क्षेत्र का 51% हिस्सा  शामिल था। इस व्यवस्था के अंतर्गत लगान की वसूली कठोरता से की जाती थी तथा लगान कि दर भी काफी ऊंची होती थी |
महालवाड़ी पद्धति में भू राजस्व व्यवस्था कृषक के साथ नहीं, बल्कि प्रत्येक ग्राम अथवा महल ( जागीर का एक भाग ) के साथ स्थापित की जाती थी | इसके अंतर्गत यदि कोई व्यक्ति अपनी भूमि छोड़ देता था तो ग्राम समाज इस भूमि को संभाल लेता था | यह ग्राम समाज ही सम्मिलित भूमि (शामलात) तथा अन्य भूमि का स्वामी होता था | यह पद्धति उत्तर प्रदेश , मध्य प्रदेश तथा पंजाब में (कुछ परिवर्तनों के साथ) लागू की गई इसके अंतर्गत कुल ब्रिटिश भारत के भू क्षेत्र का 30% हिस्सा शामिल था। बहिर्गमन की राष्ट्रवादी परिभाषा का तात्पर्य भारत से धन संपत्ति एवं माल का इंग्लैंड में हस्तांतरण था, जिसके बदले में भारत को इसके समतुल्य कोई भी आर्थिक, वाणिज्यिक या भौतिक प्रतिलाभ नहीं होता था |
इस प्रकार भारतीय दृष्टिकोण से बहिर्गमन का अर्थ था, आयात की तुलना में अधिक निर्यात का होना | दादाभाई नौरोजी धन के बहिर्गमन के सिद्धांत को सबसे पहले और सर्वाधिक प्रखर प्रतिपादक थे। उन्होंने अपने लेखों एवं पुस्तकों – (” इंग्लैंड डेब्ट टू इंडिया , पॉवर्टी एंड अनब्रिटिश रूल इन इंडिया , द वॉन्ट्स एंड मीन्स ऑफ इंडिया ) के माध्यम से अपने अपवाह सिद्धांत का प्रतिपादन किया|
रमेश चंद्र दत्त ने भी धन के बहिर्गमन के सिद्धांत पर बल दिया | उन्होंने अपने लेख ‘ इकोनामिक हिस्ट्री ऑफ इंडिया ‘ में यह मत प्रकट किया था कि सकल राजस्व का आधा भाग प्रतिवर्ष भारत से बाहर चला जाता है |
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने 1896 ईसवी में अपने कलकत्ता अधिवेशन में अधिकारिक तौर पर ‘ बहिर्गमन के सिद्धांत ‘ को स्वीकार किया और उस समय कांग्रेस ने घोषणा की कि देश में पड़ने वाले अकालों और लोगों की निर्धनता का कारण वर्षों से लगातार चला आ रहा ” धन का बहिर्गमन ‘ है | सर सैयद अहमद खां ब्रिटिश शासन के प्रति वफादार थे और मुस्लिम समाज का विकास वे भारत में आंग्ल सत्ता बने बने रहने में ही संभव मानते थे | अतः वे दादाभाई नौरोजी के उत्सारण सिद्धांत में विश्वास नहीं करते थे | ब्रिटिश शासन के समय अर्थव्यवस्था को खोखला करने के सिद्धांत ( इकोनामिक ड्रेन थ्योरी ) पर दादाभाई नौरोजी ने पुस्तक लिखी |
दादा भाई ने अंग्रेजी राज्य की शोषक नीतियां का अनावरण किया और कहा कि यह राज्य भारत को दिन-प्रतिदिन लूटने में लगा है जिसके कारण भारत निर्धन देश बनता जा रहा है | इस के परिपेक्ष्य में ही उन्होंने अपनी ड्रेन थ्योरी दी|
दादाभाई नौरोजी ( 1825-1917 ई ) ने 1865 ईस्वी में डब्ल्यू सी बनर्जी के साथ मिलकर लंदन इंडिया सोसाइटी का गठन किया, जिसका कार्य भारत के दुख दर्दों का प्रचार करना था | 1892 ई में लिबरल पार्टी के टिकट पर ब्रिटिश हाउस ऑफ कॉमन्स के लिए चुने जाने वाले वह पहले भारतीय थे।


ब्रिटिश काल में इंपीरियल प्रेफरेंस शब्दावली का प्रयोग भारत में ब्रिटिश आयातों पर दी गई विशेष रियायतों के लिए किया जाता था।
ब्रिटिश शासन के दौरान भारत में धनिक वर्ग द्वारा भू-संपत्ति में निवेश करने को वरीयता दिए जाने के कारण उद्योगों का कोई स्वतंत्र विकास नही हो सका।
असम में सर्वप्रथम चाय कंपनी की स्थापना 1839 ई. में हुई थी। यह कंपनी 5 लाख रु. की पूंजी के साथ इंलैंड में स्थापित की गई थी तथा नजीरा, असम में इस कंपनी का मुख्यालय था। द असम कंपनी भारत की सबसे पुरानी व्यावसायिक चाय कंपनी है, जो वर्तमान में भी कार्यरत है।
ब्रिटिश व्यवस्था में रैयतवारी भू-राजस्व संग्रह दक्षिण भारत में प्रचलित था, जिसमें मद्रास प्रेसीडेंसी प्रमुख थी।
सर सैयद अहमद खां ब्रिटिश शासन के प्रति वफादार थे और मुस्लिम समाज का विकास वे भारत में आंग्ल सत्ता के बने रहने मे ही संभव मानते थे। अतः वे दादाभाई नौरोजी के उत्सारण सिध्दांत में विश्वास नही करते थे।
दादाभाई नौरोजी आधुनिक भारत के प्रथम ऐसे राष्ट्रवादी नेता थे, जिन्होंने गहरे शोध और विश्लेषण के बल पर यह सिध्द किया कि ब्रिटेन भारत का आर्थिक शोषण कर रहा है और प्रतिवर्ष एक निश्चित रकम इंग्लैंड ले जाई जा रही है। इसके परिप्रेक्ष्य में ही उन्होने अपनी ड्रेन थ्योरी दी।
सर आर्थर कॉटन ब्रिटिश सिंचाई अभियंता थे। उन्होने दक्षिण भारतीय राज्यों के सिंचाई व्यवस्था में उल्लेखनीय कार्य किया है। इसलिए सर आर्थर काटन को दक्षिण भारत में सिंचाई व्यवस्था का अग्रदूत माना जाता है।
ब्रिटिश शासन के समय अर्थव्यवस्था को खोखला करने के सिध्दांत पर दादाभाई नौरोजी ने पुस्तक लिखी।


1857 की क्रांति

दिसंबर , 1856 में सरकार ने पुराने लोहे वाली बंदूक ब्राउन बेस (brown bess ) के स्थान पर नवीन एनफील्ड राइफल के प्रयोग का निर्णय लिया | इसका प्रशिक्षण डम -डम , अंबाला और स्यालकोट में दिया जाना था | इस नई राइफल में कारतूस के ऊपरी भाग को मुंह से काटना पड़ता था |
जनवरी 1857 में बंगाल सेना में यह अफवाह फैल गई कि चर्बी वाले कारतूस में गाय और सुअर की चर्बी है | सैनिक अधिकारियों ने इस अपराध की जांच के बिना तुरंत इसका खंडन कर दिया किंतु सैनिकों को विश्वास हो गया कि चर्बी वाले कारतूस का प्रयोग उनके धर्म को भ्रष्ट करने का एक निश्चित प्रयत्न है | यही भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम 1857 के विद्रोह का तात्कालिक कारण बना।
29 मार्च , 1857 को बैरकपुर में सैनिकों ने चर्बी वाले कारतूस प्रयोग करने से इंकार कर दिया और एक सैनिक मंगल पांडे ने अपने एजुडेंट पर आक्रमण कर उसकी हत्या कर दी गई |अंग्रेजों द्वारा 34वीं एन आई रेजिमेंट भंग कर दी गई तथा अपराधियों को दंड दिया गया |
1857 की क्रांति का प्रमुख कारण ब्रिटिश साम्राज्य की घिनौनी नीतियां थी , जिससे तंग आकर अंततः विद्रोह का ज्वालामुखी फट पड़ा। एंग्लो-इंडियन इतिहासकारों ने सैनिक असंतोषों तथा चर्बी वाले कारतूस को ही 1857 के महान विद्रोह का सबसे मुख्य तथा महत्वपूर्ण कारण बताया है | परंतु आधुनिक भारतीय इतिहासकारों ने यह सिद्ध कर दिया है कि चर्बी वाले कारतूस ही इस विद्रोह का एकमात्र कारण अथवा सबसे प्रमुख कारण नहीं थे | चर्बी वाले कारतूस और सैनिकों का विद्रोह तो केवल एक चिंगारी थी, जिसने उन समस्त विस्फोटक पदार्थों में , जो राजनैतिक , सामाजिक , धार्मिक और आर्थिक कारणों से एकत्रित हुए थे, आग लगा दी और जिसने दावानल का रूप धारण कर लिया।|
1857 की क्रांति का प्रारंभ 10 मई को मेरठ से हुआ | यहां की तीसरी कैवेलरी रेजीमेंट के सैनिकों ने चर्बी युक्त कारतूसों को छूने से इंकार कर दिया तथा खुलेआम बगावत कर दी। अपने अधिकारियों पर गोली चलाई और अपने साथियों को मुक्त करवाकर दिल्ली की ओर चल पड़े। जनरल हेविट ( general hewitt ) के पास  2200  यूरोपीय सैनिक थे परंतु उसने इस तूफान को रोकने का कोई प्रयास नहीं किया |
विद्रोहियों ने 12 मई 1857 को दिल्ली पर अधिकार कर लिया | इस प्रकार सैनिकों का दिल्ली के लाल किले पर पहुंचना पहली घटना थी। 1857 के स्वाधीनता संग्राम का प्रतीक कमल और रोटी था |


बरेली में रुहेलखंड के भूतपूर्व शासक के उत्तराधिकारी खान बहादुर ने 1857 के विद्रोह की रहनुमाई की | मुगल सम्राट बहादुर शाह द्वितीय ने उन्हें वायसराय के पद पर नियुक्त किया था | रानी लक्ष्मीबाई ( मूल नाम मणिकर्णिका ) का जन्म 19 नवंबर 1835 को गोलघर में हुआ था जो वर्तमान में वाराणसी में है | उनके पिता मोरोपंत झांसी के महाराजा गंगाधर राव के दरबार में गए | उस समय लक्ष्मीबाई की उम्र 13 वर्ष थी। *14 वर्ष की उम्र में उनका विवाह झांसी के राजा गंगाधर राव के साथ हुआ | इनकी मृत्यु ग्वालियर में हुई थी | ग्वालियर में ही महारानी लक्ष्मीबाई की समाधि स्थित है |
रानी लक्ष्मी बाई झांसी के अंतिम मराठा राजा गंगाधर राव की विधवा थी। जब किसी उत्तराधिकारी के अभाव में राजा गंगाधर राव की मृत्यु हो गई तो डलहौजी ने व्यपगत सिद्धांत के अंतर्गत 1853 में झांसी का ब्रिटिश राज्य में विलय कर लिया | झांसी  में 4 जून 1857 को रानी लक्ष्मीबाई के नेतृत्व में विद्रोह का श्रीगणेश हुआ |
अंग्रेज जनरल ह्यूरोज से लड़ते हुए 17 जून 1858 को वे वीरगति को प्राप्त हुई | रानी की मृत्यु पर हूरोज ने कहा – ” भारतीय विद्रोहियों में यहां सोई हुई औरत अकेली मर्द है |
लखनऊ ( अवध ) में विद्रोह का प्रारंभ 4 जून 1857 को हुआ। विद्रोह का नेतृत्व बेगम हजरत महल ने किया | उन्होंने अपने अल्पव्यस्क बेटे बिरजिस कादिर को नवाब घोषित किया तथा प्रशासन की बागडोर अपने हाथ में ले ली |अंत में 21 मार्च , 1858 को कैम्पबेल ने गोरखा रेजीमेंट की सहायता से लखनऊ पर पुनः अधिकार कर लिया।
कानपुर में 5 जून , 1857 को नानासाहेब ( नाना धोंदो पंत ) को पेशवा मानकर स्वतंत्रता की घोषणा कर दी गई | नाना साहब को सेनापति ( कमांडर इन चीफ ) तात्या तोपे से बहुत सहायता मिली। अजीमुल्ला खान नाना साहब के सलाहकार थे | इन्होंने नाना साहब के सचिव के रूप में भी कार्य किया था | इन्हें ‘ क्रांतिदूत ‘  के नाम से भी जाना जाता है |
तात्या टोपे ( 1814-1859 ) को रामचंद्र पांडुरंग के नाम से भी जाना जाता है | वे 1857 के भारतीय विद्रोह के प्रमुख नेता थे | इनका जन्म महाराष्ट्र में येओला ( yeola ) गांव में हुआ था | उनके एक विश्वसनीय मित्र मानसिंह ने उन्हें धोखा देकर उस समय पकड़वा दिया जब वह पारो के जंगलों में अपने कैंप में शयन कर रहे थे | यहां से उन्हें पकड़कर शिवपुरी लाया गया और सैनिक अदालत में 18 अप्रैल 1859 को फांसी की सजा दे दी गई |
1857 में जगदीशपुर में विद्रोह की अगुवाई करने वाले कुंवर सिंह बिहार के तत्कालीन शाहाबाद जिला ( वर्तमान भोजपुर जिले ) से संबंधित थे। जब उन्होंने अंग्रेजों के विरुध्द विद्रोह का झंडा बुलंद किया , उस समय वे 80 वर्ष के थे।
असम में 1857 की क्रांति के समय वहां के दीवान मनीराम दत्त ने वहां के अंतिम राजा का पौत्र कंदपेश्वर सिंह को राजा घोषित कर के विद्रोह की शुरुआत की , परंतु शीघ्र ही विद्रोह का दमन करके मनिराम को फांसी दे दी गई |
आउवा के ठाकुर कुशल सिंह ने 1857 की क्रांति में अंग्रेजों और जोधपुर की संयुक्त सेना को पराजित किया था | मौलवी अहमदुल्लाह शाह ने फैजाबाद में 1857 के विद्रोह का नेतृत्व प्रदान किया | यह अंग्रेजों के सबसे कट्टर दुश्मन थे। वह मूलतः तमिलनाडु में अर्काट के रहने वाले थे | पर वह फैजाबाद में आकर बस गए थे |उन्होंने भारत के विभिन्न धर्मानुयायियों का आह्वान करते हुए कहा कि ” सारे लोग काफिर अंग्रेजों के विरुद्ध खड़े हो जाओ और उन्हें भारत से बाहर खदेड़ दो ” | इनके बारे में अंग्रेजों ने कहा कि ”  अदम्य साहस के गुणों से परिपूर्ण और दृढ़ संकल्प वाले व्यक्ति तथा विद्रोहियों में सर्वोत्तम सैनिक हैं ” | इनकी गिरफ्तारी के लिए ब्रिटिश सरकार ने ₹50000 का इनाम रखा था | 1857 के विद्रोह को मिर्जा गालिब ने स्वयं अपनी आंखों से देखा था | इनका जन्म 27 दिसंबर 1796 को आगरा में और मृत्यु 15 फरवरी 1869 को दिल्ली में हुई थी |
1857 के स्वतंत्रता संघर्ष में ग्वालियर के सिंधिया ने अंग्रेजों की सर्वाधिक मदद की | यूरोप इतिहासकारों ने ग्वालियर के मंत्री सर दिनकर राव और हैदराबाद के मंत्री सालारंगराज की राजभक्ति की बहुत सराहना की है | संकट के समय कैनिंग ने कहा था ” यदि सिंधिया भी विद्रोह में सम्मिलित हो जाए तो मुझे कल ही बिस्तर गोल करना होगा ” |
1857 का विद्रोह बहुत बड़े क्षेत्र में फैला हुआ था और जनता का व्यापक समर्थन मिला | फिर भी पूरे देश को या भारतीय समाज के सभी अंगों तथा वर्गों को यह अपनी लपेट में नहीं ले सका |
यह दक्षिणी भारत तथा पूर्वी और पश्चिमी भारत के अधिकांश भागों में नहीं फैल सका | ग्वालियर के सिंधिया , इंदौर के होल्कर , हैदराबाद के निजाम , जोधपुर के राजा , भोपाल के नवाब ,पटियाला , नाभा और जींद के सिख शासक तथा पंजाब के दूसरे सिख सरदार , कश्मीर के महाराजा तथा उनके सरदार और बड़े जमींदारों ने विद्रोह को कुचलने में अंग्रेजों की सक्रिय सहायता की |
गवर्नर जनरल कैनिंग ने बाद में टिप्पणी की कि इन शासकों द्वारा सरदारों ने ” तूफान के आगे बांध ( तरंग रोधक ) की तरह काम किया , वर्ना यह तूफान एक ही लहर में हमें बहा ले जाता। ” 1857 के विद्रोह में शिक्षित वर्ग ने कोई रुचि नहीं ली , जो इस महासमर की असफलता के प्रमुख कारणों में से एक था |
1857 के विद्रोह के समय भारत का गवर्नर जनरल लॉर्ड कैनिंग(1856-62) था | विद्रोह के समय लॉर्ड कैनिंग ने इलाहाबाद को आपातकालीन मुख्यालय बनाया था | लॉर्ड कैनिंग भारत में कंपनी द्वारा नियुक्त अंतिम गवर्नर जनरल तथा ब्रिटिश सम्राट के अधीन नियुक्त भारत का पहला वायसराय था। न्यायिक सुधारों के अंतर्गत कैनिंग ने ‘ इंडियन हाई कोर्ट एक्ट ‘ द्वारा बंबई , कोलकाता , मद्रास में एक-एक उच्च न्यायालय की स्थापना की | * सामाजिक सुधारों के अंतर्गत विधवा पुनर्विवाह अधिनियम 1856 में कैनिंग के समय में ही पारित हुआ था |
1857 के सिपाही विद्रोह को भारत में प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के नाम से तथा ब्रिटेन में इंडियन म्यूटिनी ( Indian mutiny) के नाम से अभिहित किया जाता है | 1857 के विद्रोह के समय बैरकपुर में लेफ्टिनेंट जनरल सर जॉन बेनेट हैरसे ( john bennet hearsey )   कमांडिंग ऑफिसर थे। जिस समय भारत में 1857 की क्रांति हुई, ब्रिटेन में विस्कांट पामर्स्टन  ब्रिटेन के प्रधानमंत्री थे | इनका कार्यकाल 1855-1858 ई तक था।
1857 के विद्रोह की असफलता का मुख्य कारण किसी सामान्य योजना एवं केंद्रीय संगठन की कमी था। विद्रोहियों के नेताओं में कोई संगठन की भावना देखने में नहीं आई | उनके पास किसी सुनियोजित कार्यक्रम का पूर्ण अभाव था | उनमें  अनुशासन की कमी भी थी।  कभी-कभी  तो वे अनुशासित सेना के बजाय दंगाई भीड़ की तरह व्यवहार करते थे| उनके पास एक भविष्योन्मुख कार्यक्रम , सुसंगत विचारधारा , राजनीतिक परिप्रेक्ष्य या  भावी समाज और अर्थव्यवस्था के प्रति दृष्टिकोण का अभाव था |
14 सितंबर , 1857 को अंग्रेजों द्वारा दिल्ली पर अधिकार करने के क्रम में जनरल जॉन निकलसन की मृत्यु हुई थी| लखनऊ में 1857 के विद्रोह के दौरान अंग्रेज रेजीडेंसी की रक्षा करते हुए सर हेनरी लॉरेंस , मेजर जनरल हैवलॉक तथा जनरल नील की मृत्यु हुई | सर जेम्स आउट्रम एवं डब्ल्यू टेलर ने 1857 के विद्रोह को हिंदू-मुस्लिम षडयंत्र का परिणाम बताया है | आउट्रम का विचार था कि यह मुस्लिम षड्यंत्र था जिसमें हिंदू शिकायतों का लाभ उठाया गया| जॉन लॉरेंस और सीले के अनुसार यह केवल ‘ सैनिक विद्रोह ‘ था |
टी आर होम्स के अनुसार , यह बर्बरता और सभ्यता के बीच युद्ध था। वी. डी सावरकर ने अपनी पुस्तक ‘ द इंडियन वॉर ऑफ इंडिपेंडेंस 1857 ‘ में इस विद्रोह को सुनियोजित स्वतंत्रता संग्राम की संज्ञा दी। उन्होंने इसे स्वतंत्रता की पहली लड़ाई कहा था | 1857 के भारतीय स्वाधीनता आंदोलन के सरकारी इतिहासकार सुरेंद्रनाथ सेन (एस.एन.सेन) थे जिनकी पुस्तक ‘ एट्टीन फिफ्टी सेवन ‘ 1957 में प्रकाशित हुई थी | सर सैयद अहमद खां द्वारा लिखित पुस्तक ‘ असबाब-ए- बगावत-ए-हिंद ‘  वर्ष 1859  में प्रकाशित हुई थी | जिसमें 1857  के विद्रोह के कारणों की चर्चा की गई थी |
भारत सरकार द्वारा आर सी मजमूदार को 1857 के विद्रोह का इतिहास लिखने के लिए नियुक्त किया गया था। परंतु सरकारी समिति से अनबन होने के कारण उन्होंने यह कार्य करने से इंकार कर दिया तथा अपनी पुस्तक ” the sepoy mutiny and the rebellion of 1857″ को स्वतंत्र रूप से 1957 में प्रकाशित किया |
मजमूदार ने ही 1857 के विद्रोह को ” तथाकथित प्रथम राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम न प्रथम , न राष्ट्रीय और न ही स्वतंत्रता संग्राम था” कहा था | 1857 के विद्रोह का सबसे महत्वपूर्ण परिणाम महारानी विक्टोरिया की उद्घोषणा थी | यह घोषणा 1 नवंबर 1858 को इलाहाबाद में हुए दरबार में लॉर्ड कैनिंग द्वारा उद्घोषित की गई | इसमें भारत में कंपनी के शासन को समाप्त कर भारत का शासन सीधे क्रॉउन के अधीन कर दिया गया | इस उद्घोषणा में भारत में ब्रिटिश साम्राज्य के विस्तार पर रोक ,  लोगों के धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप न करना , एकसमान कानूनी सुरक्षा सबको उपलब्ध कराना शामिल था |
भारतीय रजवाड़ों के प्रति विजय और विलय की नीति का परित्याग कर दिया गया और सरकार ने राजाओं को गोद लेने की अनुमति प्रदान की तथापि अन्य आश्वासन ब्रिटिश शासन द्वारा पूरे नही किए जा सके।
1857 के विद्रोह के दमन के बाद ब्रिटिश सरकार ने भारतीय फौज के ‘ नव गठन’ के लिए पील आयोग का गठन किया , जिसमें सेना के रेजिमेंटो को जाति , समुदाय और धर्म के आधार पर विभाजित किया | यूरोपीय सैनिकों की संख्या जो 1857  से पूर्व 45000 थी अब 65000 कर दी गई  तथा भारतीय सैनिकों की संख्या 238000 से घटाकर 140000 कर दी गई |
बंगाल में यूरोपीय सैनिकों का भारतीय सैनिकों से 1:2 का अनुपात रखा गया जबकि मद्रास तथा बंबई में यह अनुपात 1:3 का रखा गया। 1857 के विद्रोह के बाद ब्रिटिश सरकार ने सिपाहियों का चयन गोरखा , सिख , पंजाब के उत्तर प्रांत से किया।


सर सैयद अहमद खां द्वारा लिखित पुस्तक असबाब-ए-बगावत-ए-हिंद वर्ष 1559 ई में प्रकाशित हुई थी। जिसमें 1857 के विद्रोह के कारणो की चर्चा की गई थी।
1857 के भारतीय स्वाधीनता आंदोलन के सरकारी इतिहासकार सुरेन्द्र नाथ सेन (एस.एन.सेन) थे जिनकी पुस्तक एट्टीन फिफ्टी सेवन 1957 में प्रकाशित हुई थी।
वी.डी. सावरकर ने अपनी पुस्तक “The Indian war of Indepence 1857” में इस विद्रोह को सुनियोजित स्वतंत्रता संग्राम की संज्ञा दी। उन्होने इसे स्वतंत्रता की पहली लड़ाई कहा था।
आउवा के ठाकुर कुशल सिंह ने 1857 ई. की क्रांति में अंग्रेजों और जोधपुर की संयुक्त सेना को पराजित किया था।
1857 के विद्रोह में शहादत खान ने अँग्रेजों से संघर्ष किया था।
अजीमुल्ला खां नाना साहब के सलाहकार थे।
कानपुर में 5 जून, 1857 को नाना साहब को पेशवा मानकर स्वतंत्रता की घोषणा की गई। नाना साहब सेनापति (कमांडर-इन-चीफ) तात्या टोपे से बहुत सहायता मिली थी।
इलाहाबाद में 1857 के संग्राम में विद्रोहियों की कमान मौलवी लियाकत अली ने संभाली। बाद में यहां के विद्रोह को जनरल नील ने समाप्त किया।
महारानी लक्ष्मीबाई का जन्म वाराणसी में जबकि इनकी मृत्यु ग्वालियर में हुई थी। ग्वालियर में ही महारानी लक्ष्मीबाई की समाधि स्थित है।
लखनऊ (अवध) मे विद्रोह का प्रारंभ 4 जून, 1857 को हुआ। विद्रोह का नेतृत्व बेगम हजरत महल ने किया।
रानी लक्ष्मीबाई (मूल नाम मनिकर्णिका) का जन्म 19 नवंबर, 1835 को गोलघर में हुआ था जो वर्तमान मे वाराणसी मे है।
कैप्टन निकोलस के नेतृत्व में तीन महीने की घेराबंदी के पश्चात् 20 सितंबर, 1857 ई. को अंग्रेजों द्वारा दिल्ली की पुनर्प्राप्ति कर ली गई।
1857 के स्वाधीनता संग्राम का प्रतीक कमल और रोटी था।
मंगल पाण्डे 34वीं नेटिव इंफैंट्री के 6वीं कपनी में एक सैनिक (सिपाही) थे।
1857 की क्रांति का प्रमुख कारण ब्रिटिश साम्राज्य की घिनौनी नीतियां थी, जिनसे तंग आकर अंततः विद्रोह का ज्वालामुखी फूट पड़ा।
असम में 1857 की क्रंति के समय वहाँ के दीवान मनिराम दत्त ने वहां के अंतिम राजा के पौत्र कंदपेश्वर सिंह को राजा घोषित करके विद्रोह की शुरुआत की, परंतु शीघ्र ही विद्रोह का दमन करके मनिराम को फांसी दे दी गई।
पटना (बिहार) के निकट जगदीशपुर के जमींदार कुंवर सिंह ने विद्रोह का नेतृत्व किया। उनकी जमींदारी कंपनी की नीतियों के कारण छिन गई थी, फलस्वरुप उन्होने अपने रोष की आभिव्यक्ति विद्रोह में कर दी।
उर्दू शायर मिर्जा गालिब का जन्म 27 दिसंबर, 1796 को आगरा में और मृत्यु 15 जनवरी, 1869 को दिल्ली में हुई थी।
भगत सिंह ने 1857 की आजादी की पहली लड़ाई में भाग नही लिया, जबकि रानी लक्ष्मीबाई, बहादुरशाह जफर एवं तात्या टोपे ने 1857 की लड़ाई में भारतीय जनमानस का नेतृत्व किया।
1857 के विद्रोह में झांसी में रानी लक्ष्मीबाई, लखनऊ में बेगम हजरत महल, कानपुर एवं फतेहपुर में अजीमुल्लाह खां तथा फैजाबाद में मौलवी अहमदुल्लाह शाह ने नेतृत्व किया था।
कांतिकारी स्थान
नाना साहेब                 कानपुर

नवाब हामिद अली खान         दिल्ली

मौलवी महमूद उल्लाह      लखनऊ

मनीराम दीवान           असम



1857 विद्रोह के समय बैरकपुर में लेफ्टिनेंट जनरल सर जॉन बेनेट हैरसे कमाण्डिंग ऑफिसर थे।
1857 के विद्रोह के समय तत्कालीन गवर्नर जनरल लॉर्ड कैनिंग ने इलाहाबाद को आपातकालीन मुख्यालय बनाया था।
जिस समय भारत में 1857 की क्रांति हुई, ब्रिटेन मे विस्कॉन्ट पामर्स्टन ब्रिटेन का प्रधानमंत्री था। उसका कार्यकाल 1855-1858 ई. तक था।


अन्य जन आंदोलन

1857 के विद्रोह के ठीक बाद बंगाल में नील विद्रोह ( 1859-60) हुआ। संन्यासी विद्रोह 1763-1800 में , संथाल विद्रोह 1855-66 में तथा पाबना उपद्रव – 1873-76 में हुआ जबकि नील विद्रोह की शुरूआत बंगाल के नदिया जिले में गोविंदपुर गांव से हुई।
एक नील उत्पादक के दो भूतपूर्व कर्मचारियों – दिगंबर विश्वास तथा विष्णु विश्वास के नेतृत्व में वहां के किसान एकजुट हुए तथा उन्होंने नील की खेती बंद कर दी |
1860 तक नील आंदोलन नदिया , पावना , खुलना , मालदा , ढाका , दिनाजपुर आदि क्षेत्रों में फैल गया | बंगाल के बुद्धिजीवी वर्ग ने अखबारों में अपने लेखों द्वारा तथा जन सभाओं के माध्यम से इस विद्रोह के प्रति अपना समर्थन को व्यक्त किया | इसमें ‘ हिंदू पैट्रियाट ‘ के संपादक हरीश चंद्र मुखर्जी की विशेष भूमिका रही |
नील बागान मालिकों के अत्याचारों का खुला चित्रण दीनबंधु मित्र ने अपने नाटक ‘ नील दर्पण ‘ में किया है | वंदे मातरम ‘ गीत बंकिमचंद्र चटर्जी की प्रसिद्ध उपन्यास ‘ आनंदमठ ‘ से लिया गया है | इस उपन्यास का कथानक सन्यासी विद्रोह पर आधारित है|
1896 में कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में ‘ वंदे मातरम ‘ को पहली बार गाया गया था| अंग्रेजी प्रभुसत्ता को सबसे सुनियोजित तथा गंभीर चुनौती वहाबी आंदोलन से मिली जो 19वीं शताब्दी के चौथे दशक से सातवें दशक तक चलता रहा |
रायबरेली के सैयद अहमद भारत के इस आंदोलन के प्रवर्तक थे | वह अरब के अब्दुल वहाब से प्रभावित हुए परंतु अधिक प्रभाव दिल्ली के एक संत शाह वलीउल्लाह का था। सैयद अहमद के प्रयत्नों से इस आंदोलन की विचारधारा शीघ्र ही काबुल , उत्तर पश्चिमी सीमा प्रांत , बंगाल , बिहार , मध्य प्रांत आदि में फैल गई |
कुछ समय के लिए इन्होंने 1830 में पेशावर पर कब्जा कर लिया और अपने नाम के सिक्के ढ़लवाए, किंतु अगले ही वर्ष वह बालाकोट की लड़ाई में मारे गए | सैयद अहमद की मृत्यु के बाद पटना इस  आंदोलन का केन्द्र बना। इस अवधि में आंदोलन  का नेतृत्व मौलवी कासिम , विलायत अली , इनायत अली , अहमद उल्लाह आदि ने किया | पटना के अतिरिक्त हैदराबाद , मद्रास , बंगाल , यूपी तथा बंबई मे भी इस आंदोलन की शाखाएं स्थापित की गई |
कूका आंदोलन वहाबी आंदोलन से बहुत कुछ मिलता जुलता था। दोनों धार्मिक आंदोलन के रूप में आरंभ हुए किंतु बाद में यह राजनीतिक आंदोलन के रूप में परिवर्तित हो गए, जिसका सामान्य उद्देश्य अंग्रेजों को देश से बाहर निकालना था |
पश्चिमी पंजाब में कूका आंदोलन की शुरुआत 1840 में भगत जवाहर मल द्वारा की गई, जिन्हें मुख्यतः सियान साहब के नाम से पुकारा जाता था | इनका उद्देश्य सिख धर्म में प्रचलित बुराइयों और अंधविश्वासों को दूर कर इस धर्म को शुद्ध करना था |
1872 में इस आंदोलन के नेता राम सिंह को रंगून निर्वासित कर दिया गया | जहां इनकी 1885 में मृत्यु हो गई | पागलपंथ एक अर्द्ध धार्मिक संप्रदाय था जिसे उत्तरी बंगाल के करम शाह ने चलाया था। करमशाह के पुत्र तथा उत्तराधिकारी टीपू , धार्मिक तथा राजनीतिक उद्देश्यों से प्रेरित था। उसने जमींदारों के द्वारा मुजारों ( Tenants ) पर किए गए अत्याचारों के विरुद्ध आंदोलन किया |
1825 में टीपू ने शेरपुर पर अधिकार कर लिया तथा राजा बन बैठा | वह इतना शक्तिशाली हो गया की स्वतंत्र सत्ता का प्रयोग करने लगा और प्रशासन को चलाने के लिए उसने एक न्यायाधीश , एक मजिस्ट्रेट और एक कलेक्टर नियुक्त किया | फराजी लोग बंगाल के फरीदपुर के हाजी शरीयतुल्लाह द्वारा चलाए गए संप्रदाय के अनुयायी थे | ये लोग अनेक धार्मिक , सामाजिक तथा राजनैतिक आमूल परिवर्तनों का प्रतिपादन करते थे। शरीयतुल्लाह के पुत्र दादू मियां ने बंगाल से अंग्रेजों को निकालने की योजना बनाई |
यह विद्रोह 1838-1860 के दौरान चलता रहा, अंत में इस संप्रदाय के अनुयायी वहाबी दल में सम्मिलित हो गए | 1805 में वेलेजली ने त्रावणकोर ( केरल ) के महाराजा को सहायक संधि करने पर विवश किया | महाराजा संधि की शर्तों से अप्रसन्न था और इसलिए उसने सहायक संधि संबंधी कर देने में आनाकानी की | अंग्रेज रेजिडेंट का व्यवहार भी बहुत धृष्टतापूर्ण था जिसके फलस्वरूप दीवान वेलु थंपी ने विद्रोह कर दिया , जिसमें नायर बटालियन ने उसका समर्थन किया |
प्रारंभिक भारतीय क्रांतिकारियों में अग्रगण्य वासुदेव बलवंत फड़के ( 1845-83) ने बंबई प्रेसीडेंसी के रामोसी जनजाति के लोगों को संगठित करके उन्हें प्रशिक्षित लड़ाकू में परिवर्तित किया और रामोसी कृषक जत्था की स्थापना की | गडकरी लोग मराठों के किलो में काम करने वाले उनके वंशानुगत कर्मचारी थे |
उन्होंने मनमाने ढंग से भू राजस्व की वसूली , मराठा सेना से मुक्त किए जाने और उनकी जमीनों को मामलतदारों की देख रेख के अधीन कर दिए जाने के विरुद्ध 1844 में कोल्हापुर में विद्रोह कर दिया | खोंद जनजाति के लोग तमिलनाडु से लेकर बंगाल और मध्य भारत तक फैले विस्तृत पहाड़ी क्षेत्रों में रहते थे और पहाड़ी क्षेत्र होने के कारण वे वस्तुतः स्वतंत्र थे | उन्होंने 1837-1856 तक अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह किया |
इस आंदोलन का नेतृत्व युवा राजा के नाम पर चक्र बिसोई ने किया | इस विद्रोह के मुख्य कारण ब्रिटिश सरकार द्वारा मानव बलि ( मरिहा ) को प्रतिबंधित करने का प्रयास , अंग्रेजों द्वारा नए करो का आरोपण और अनेक क्षेत्रों में जमींदारों तथा साहूकारों के प्रवेश से संबंधित थे। जिनके कारण आदिवासियों को अनेक कष्टों का सामना करना पड़ा | अंग्रेजों ने एक ‘ मरिहा एजेंसी ‘ गठित की जिसके विरुद्ध खोंदो ने विद्रोह किया |
छोटा नागपुर क्षेत्र में कोल विद्रोह का नेतृत्व 1831-32 मे बुद्धू या बुद्धों भगत एवं गंगा नारायण ने किया था| यह विद्रोह रुक रुक कर 1848 तक चलता रहा अंततः इसे सरकार द्वारा कुचल दिया गया | बघेरा विद्रोह 1818 इसवी में बड़ौदा में अंग्रेज सरकार के विरुद्ध किया गया था |
1857 के पूर्व के प्रमुख विद्रोह का क्रम इस प्रकार है –
बंगाल का सिपाही विद्रोह (1764 ई )  जिसमें हेक्टर मुनरो की एक बटालियन बक्सर की रणभूमि से मीर कासिम से जा मिली थी
वेल्लोर का सिपाही विद्रोह (1806 ई )
कच्छ का विद्रोह (1819-31ई)
कोल विद्रोह (1831-32ई )
संथाल विद्रोह (1855-56) |
1855-56 का संथाल विद्रोह एक प्रसिद्ध आदिवासी विद्रोह था जिसमें मूलभूत आदिवासी आवेग और ब्रिटिश प्रशासन के पूर्ण तिरस्कार जैसी भावनाएं देखने को मिलती है | भागलपुर से राज महल के बीच का क्षेत्र जो कि दामन-ए-कोह के नाम से जाना जाता है में यह विद्रोह मूलत: आर्थिक कारणों से हुआ | साहूकारों तथा औपनिवेशिक प्रशासक दोनों ही उनका शोषण कर रहे थे |
दिकुओं ( बाहरी लोगों ) एवं व्यापारियों ने संथालों द्वारा लिए गए ऋण पर 50 से 500% ब्याज वसूल किया | इस विद्रोह के नेता सिद्धू , कान्हू , चांद एवं भैरव नामक चार भाई थे | सिद्धू ने अधिकारियों से कहा था कि ” ठाकुर जी ने मुझे आदेश देते समय कहा था कि यह देश साहबों का नहीं है | ठाकुर जी खुद हमारी तरफ से लड़ेंगे इस तरह आप साहब लोग और सिपाही लोग खुद ठाकुर जी से लड़ेंगे | यह आंदोलन 1856 तक जारी रहा और अंततः विद्रोही नेताओं को पकड़ने के बाद आंदोलन को भारी दमन के साथ कुचल दिया गया |
1855 ई में संथालों  ने भागलपुर क्षेत्र के भगनीडीह ताल्लुके में विद्रोह कर दिया था | संथाल विद्रोह को दबाने के लिए मेजर बारों के नेतृत्व में एक सेना भेजी गई जिसे संथालों ने हरा दिया था| अंततः भागलपुर के कमिश्नर ब्राउन और मेजर जनरल लॉयड ने क्रूरतापूर्वक विद्रोह का दमन किया था|
भील विद्रोह – भीलो की आदिम जाति पश्चिमी तट के खानदेश में रहती थी | 1812-19 तक इन लोगों ने अपने नए स्वामी अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह कर दिया | कंपनी के अधिकारियों का कथन था कि इस विद्रोह को पेशवा बाजीराव द्वितीय तथा उसके प्रतिनिधि त्र्यंबकजी दांगलिया ने प्रोत्साहित किया था | वास्तव में कृषि संबंधित कष्ट तथा  नई सरकार का भय ही इस  विद्रोह का कारण था | 1825 में सेवरम के नेतृत्व में इन लोगों ने पुनः विद्रोह कर दिया |
ब्रिटिश सेना काफी प्रयास के बाद इस विद्रोह को कुचल सकी। रम्पा विद्रोह – आंध्र प्रदेश के गोदावरी जिले के उत्तर में स्थित ‘ रम्पा ‘ पहाड़ी क्षेत्र में हुआ | आदिवासियों का यह विद्रोह शोषण और वन कानूनों के विरुद्ध हुआ। उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में सुर्जी भगत एवं गोविंद गुरु नामक समाज सुधारकों ने राजस्थान के मेवाड़ , डूंगरपुर , बांसवाड़ा , प्रतापगढ़ , सिरोही , पाली इत्यादि रियासतों में बसी भील जनजाति में सामाजिक सुधारों के प्रयास किए |
गोविंद गुरु ( इन्हें लसोड़िया भी कहा जाता है ) ने भीलों  को संगठित करने के उद्देश्य से 1883 में ‘ सभ्य सभा ‘ की स्थापना की | गोविंद गुरु को लसोडिया आंदोलन का प्रवर्तक माना जाता है |
मुंडा आदिवासियों का विद्रोह 1899-1900 के बीच हुआ ,इसका नेतृत्व बिरसा मुंडा ने किया। मुंडा जाति में सामूहिक खेती का प्रचलन था , लेकिन जागीरदारों , ठेकेदारों , बनियों और सूदखोरों ने सामूहिक खेती की परंपरा पर हमला बोला | मुंडा सरदार 30 वर्ष तक सामूहिक खेती के लिए लड़ते रहे | उनका यह विद्रोह ‘ सरदारी लड़ाई ‘ के नाम से भी जाना जाता है |
1895 में बिरसा ने अपने आपको ‘ भगवान का दूत ‘ घोषित किया था। मुंडा विद्रोह के नेता बिरसा मुंडा को उल्गुलान ( महान हलचल ) और इनके विद्रोह को उल्गुलन ‘ (महाविद्रोह) ‘ के नाम से जाना गया | यह विद्रोह इस अवधि का सर्वाधिक प्रसिद्ध आदिवासी विद्रोह था | मुंडा की पारंपरिक सामूहिक खेती वाली भूमि व्यवस्था खूंटकट्टी या मुंडारी के जमींदारी या व्यक्तित्व भू स्वामित्व वाली व्यवस्था में परिवर्तन के विरुद्ध मुंडा विद्रोह की शुरुआत हुई | लेकिन कालांतर में बिरसा ने इसे धार्मिक , राजनीतिक आंदोलन का रूप प्रदान किया | इनको ‘ जगत पिता ‘ या ‘ धरती आबा ‘ भी कहते हैं | उन्होंने कहा कि ” दिकुओं ( गैर-आदिवासियों) से हमारी लड़ाई होगी और खून से जमीन इस तरह लाल होगी जैसे लाल झंडा ” |
फरवरी , 1900 के शुरू में बिरसा को गिरफ्तार कर लिया गया और जून 1900 में वह जेल में मर गया | बिरसा मुंडा का कार्यक्षेत्र रांची से लेकर भागलपुर तक था। बिरसा ने अनेक देवताओं ( बोंगा ) की पूजा को छोड़कर अपने अनुयायियों से एक ईश्वर ( सिंग बोंगा ) की पूजा करने का आह्वान किया |
ठक्कर बापा ने जनजातीय लोगों के संबंध में ‘ आदिवासी ‘ शब्द का प्रयोग किया था | यह हरिजन सेवक संघ के महासचिव थे |
हौज विद्रोह 1820-21 में हुआ था जिसका केंद्र बिहार का संथाल परगना था | खैरवार आदिवासी आंदोलन भागीरथ मांझी के नेतृत्व में हुआ था| संभलपुर की गद्दी के दावेदार सुरेंद्र साईं ने यहां ब्रिटिश विरोधी आंदोलन का नेतृत्व किया था | 1862 में उसने आत्मसमर्पण कर दिया | मोपला विद्रोह केरल के मालाबार क्षेत्र में 1921 में हुआ था | यहां पर काश्तकार अधिकतर बंटाईदार मुसलमान थे और जमींदार अधिकतर हिंदू थे |
यह आंदोलन जमींदारों के शोषण के खिलाफ था। अहोम विद्रोह 1828 में प्रारंभ हुआ था | इसके नेता गोमधर कुंवर थे। ताना भगत आंदोलन का प्रारंभ उरांव आदिवासियों के मध्य 1914 में छोटानागपुर में हुआ था | इस आंदोलन के नेतृत्वकर्ता जतरा भगत , बलराम भगत तथा देव मेनिया भगत थे |
महात्मा गांधी और उनकी विचारधारा से प्रभावित होने वाले पहले जनजातीय नेता जदोनांग ( जोड़ानांग ) थे | वे मणिपुर के नागा जनजाति के अग्रणी स्वतंत्रता सेनानी थे |


विद्रोह वर्ष
पाबना विद्रोह             1873 ई.

दक्कन किसान विद्रोह      1875 ई.

संन्यासी विद्रोह           1763-1800 ई.

कोल विद्रोह                 1831-32 ई.

मुंगेर के बरहियाताल विरोध का उद्देश्य बाकाश्त भूमि की वापसी की मांग थी।
बिरसा मुंडा को 3 मार्च, 1900 को चक्रधरपुर (बंगाल) के जामकोपाई वन मे सोते समय गिरफ्तार कर लिया गया था और उसी वर्ष 9 जून को जेल में ही रहस्यमय तरीके से उनकी मृत्यु हो गई।
बिरसा मुंडा को जगत पिता या धऱती आबा कहा जाता था। मुंडा आदिवासियों का विद्रोह 1899-1900 के बीच हुआ। इसका नेतृत्व किया बिरसा मुंडा ने।
हौज विद्रोह 1820-21 में हुआ था जिसका केन्द्र बिहार का संथाल परगना था।
कूकी विद्रोह (1917-19) मणिपुर एवं त्रिपुरा में, कूका विद्रोह (1840-72) पंजाब में, पावना विद्रोह (1873-76) बंगाल में, तथा बिरसा मुंडा विद्रोह (1899-1900) बिहार (वर्तमान झारखंड) मे हुआ था।
नारायण मेघाजी लोखंडे (1848-1897) भारत में श्रम आंदोलन के अग्रदूत माने जाते हैं। उन्होने ने केवल 19वीं शताब्दी में कपड़ा मिल में काम करने वाले कामगारों की परिस्थतियों में सुधार के लिए सुधार के लिए प्रयास किया, अपितु जाति और  सांप्रदायिक मुद्दों पर साहसी  पहल के लिए  भी उन्हें याद किया जाता है। भारत सरकार ने वर्ष 2005 में उनकी तस्वीर के साथ एक डाक टिकट जारी किया था।
विद्रोह वर्ष
अहोम                     1828

कोल               1831-32

संथाल             1855-56

मोपला             1921

खैरवार आदिवासी आंदोलन भागीरथ मांझी के नेतृत्व में 1874 में हुआ था।
छोटा नागपुर क्षेत्र में कोल विद्रोह का नेतृत्व 1831-32 में बुध्दू या बुध्दों भगत एवं गंगा नारायण ने किया था।


आधुनिक भारत में शिक्षा का विकास

1781 में वारेन हेस्टिंग्स ( warren hastings ) ने कोलकाता में मदरसा की स्थापना की थी | इनके प्रथम प्रमुख ( नाजिन) मुल्ला मुजदुद्दीन थे | इस मदरसे में फारसी , अरबी और मुस्लिम कानून पढ़ा जाता था और इसके स्नातक ब्रिटिशराज में दुभाषिए ( interpreter )  के रूप में सहायता करते थे |
1791 में बनारस के ब्रिटिश रेजिडेंट जोनाथन डंकन के प्रयत्नों के फलस्वरूप बनारस में एक ( प्रथम ) संस्कृत कॉलेज खोला गया जिसका उद्देश्य ” हिंदुओं के धर्म , साहित्य और कानून का अध्ययन करना था “ | पेरिस की रॉयल एशियाटिक सोसायटी की सदस्यता माइकल मधुसूदन दत्त को प्रदान की गई | वारेन हेस्टिंग्स ( warren hastings ) के काल में चार्ल्स विल्किंस ने ‘ भगवतगीता ‘ का प्रथम आंग्ल अनुवाद किया , जिसकी प्रस्तावना स्वयं वारेन हेस्टिंग्स ( warren hastings ) ने लिखी थी |
विल्किंस ने फारसी तथा बांग्ला मुद्रण के लिए ढलाई के अक्षरों का आविष्कार किया | हॉलहेड ने 1778 में संस्कृत व्याकरण प्रकाशित किया | सर विलियम जोंस वारेन हेस्टिंग्स के समय कलकत्ता उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश नियुक्त हुए | इनकी प्रेरणा पर 1784 में एशियाटिक सोसाइटी की स्थापना हुई एवं ये स्वयं इसके सभापति नियुक्त हुए| इस संस्था ने ‘ एशियाटिक रिसर्जेज ‘ नामक पत्रिका के माध्यम से भारत के अतीत को प्रकाश में लाने का कार्य किया| इसी क्रम में उन्होंने 1789 में कालिदास रचित ‘ अभिज्ञानशकुंतलम ‘ का अंग्रेजी में अनुवाद किया है एवं इसके पांच संस्करण प्रकाशित किए | 1854 के पश्चात शिक्षा के क्षेत्र में हुई प्रगति की समीक्षा करने के लिए 1882 में डब्ल्यू डब्ल्यू हंटर की अध्यक्षता में एक आयोग नियुक्त किया गया | इस आयोग की रिपोर्ट में प्राथमिक शिक्षा के सुधार एवं विकास पर विशेष जोर दिया गया |
राष्ट्रीय शिक्षा के क्षेत्र में सर्वप्रथम 8 नवंबर 1905 ई को ‘ रंगपुर नेशनल स्कूल ‘ की स्थापना हुई | 16 नवम्बर 1905 में कलकत्ता में एक सम्मेलन का आयोजन किया गया | इस सम्मेलन में राष्ट्रीय साहित्यिक , वैज्ञानिक और तकनीकी शिक्षा देने के लिए ‘ राष्ट्रीय शिक्षा परिषद ‘ ( national council of education )  स्थापित करने का फैसला हुआ | 15 अगस्त 1906 ई को सदगुरु दास बनर्जी द्वारा ‘ राष्ट्रीय शिक्षा परिषद ‘ की स्थापना की गई |
1813 के चार्टर अधिनियम के तहत प्रति वर्ष शिक्षा के लिए एक लाख रुपये खर्च करने की व्यवस्था की गई थी | सैडलर आयोग शिक्षा से संबंधित था | 1917 में  सरकार ने कलकत्ता विश्वविद्यालय की संभावनाओं के अध्ययन तथा रिपोर्ट के लिए एक आयोग नियुक्त किया | डॉ एम ई सैडलर जो लीड्स विश्वविद्यालय के उपकुलपति थे इसके अध्यक्ष नियुक्त किए गए | इस आयोग के सदस्य दो भारतीय , डॉ आशुतोष मुखर्जी और डॉ जियाउद्दीन अहमद भी थे।
इस आयोग को कलकत्ता विश्वविद्यालय की शिक्षा पर अपनी रिपोर्ट देने को कहा गया था | इस आयोग का यह विचार था कि यदि विश्वविद्यालय शिक्षा का सुधार करना है तो माध्यमिक शिक्षा का सुधार आवश्यक है | भारतीय शिक्षा पद्धति में भाषा संबंधी विवाद पर अपना विवरण देने के लिए विलियम बेंटिक ने अपने काउंसिल के विधि सदस्य लॉर्ड मैकाले को लोक शिक्षा समिति का प्रमुख नियुक्त किया | मैकाले ने भारत में शिक्षा हेतु अंग्रेजी भाषा का समर्थन किया था|
भारत के औपनिवेशिक काल में ‘ अधोमुखी निस्यंदन सिद्धांत ‘ ( the theory of downward filtration ) शिक्षा के क्षेत्र से संबंधित था। इस सिद्धांत का अर्थ था कि शिक्षा समाज के उच्च वर्ग को ही दी जाए , इस वर्ग से छन-छनकर ही शिक्षा का असर जन सामान्य  तक पहुंचे |
भारत में आधुनिक शिक्षा प्रणाली की नींव 1835 के मैकाले के स्मरण पत्र (minutes) से पड़ी | * मैकाले ने भारतीय रीति रिवाजों के लिए अपना तिरस्कार इन शब्दों में व्यक्त किया – ” यूरोप के एक अच्छे पुस्तकालय की अलमारी का एक कक्ष , भारत और अरब के समस्त साहित्य से अधिक मूल्यवान है ” |
लॉर्ड विलियम बेंटिक के काल में 7 मार्च, 1835 के प्रस्ताव द्वारा मैकाले का दृष्टिकोण अपना लिया गया| गवर्नर जनरल लॉर्ड विलियम बेंटिक (1828-35 ई.) के शासनकाल में 7 मार्च , 1835 ई को लार्ड मैकाले के प्रस्ताव को स्वीकृत कर भारत में अंग्रेजी को उच्च शिक्षा का माध्यम लिया गया | भारतीय शिक्षा का मैग्नाकार्टा कहे जाने वाले 1854 के चार्ल्स वुड के डिस्पैच को आधार बनाकर लंदन विश्वविद्यालय की तर्ज पर ब्रिटिश भारत में 3 विश्वविद्यालय कलकत्ता , मद्रास एवं बंबई की स्थापना 1857 में की गई थी।
डी. के. कर्वे के प्रयत्नों से बंबई में प्रथम महिला विश्वविद्यालय की स्थापना हुई। ये महाराष्ट्र के समाज सुधारक एवं सामाजिक कार्यकर्ता थे | इन्होंने विधवाओं के उत्थान के लिए ‘ विधवा विवाह प्रतिबंध निवारक मंडली ‘ की भी स्थापना की | 1896 ई में उन्होंने पूना में विधवा ग्रह की स्थापना की थी | उन्होंने स्वयं एक ब्राह्मणी विधवा से विवाह किया था|
वर्ष 1958 में इन्हें ‘ भारत रत्न ‘ प्रदान किया गया | डेक्कन एजुकेशनल सोसाइटी की स्थापना 1880 में मूलतः ‘ न्यू इंग्लिश स्कूल ‘ के प्रारंभ के साथ पुणे में की गई थी तथा 1884 ई में डेक्कन एजुकेशन सोसाइटी औपचारिक रूप से गठित की गई | इस संस्था के संस्थापकों में वी के चिपलुंकर , बी जी तिलक एवं एम. बी. नामजोशी प्रमुख थे |
राजा राममोहन राय आधुनिक शिक्षा के सबसे बड़े प्रचारकों में से एक थे | 1817 में इन्होंने डेविड हेयर एवं एलेक्ज़ेंडर डफ के साथ मिलकर कोलकाता में प्रसिद्ध हिंदू कॉलेज की स्थापना की थी | मेयो कॉलेज की स्थापना 1875 में अजमेर में , मुस्लिम एंग्लो ओरिएंटल कॉलेज की स्थापना 1875 में अलीगढ़ एवं दिल्ली कॉलेज की स्थापना 1824 में हुई थी |
भारतीय विश्वविद्यालयों में धार्मिक शिक्षा के लिए मदन मोहन मालवीय ने प्रबल रूप से वकालत की थी | उन्होंने 1916 में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना की और 1919 से 1938 तक इसके कुलपति बने रहे | इन्होने हिंदी और अंग्रेजी में ‘ हिंदुस्तान ‘ , ‘ दि इंडिया यूनियन ‘ , ‘ अभ्युदय ‘ , ‘ मर्यादा ‘ तथा ‘ किसान’ नामक पत्र पत्रिकाएं प्रकाशित की |


1781 में वारेन हेस्टिंग्स (Warren Hastings) ने कलकत्ता मे मदरसा की स्थापना की थी।
वॉरेन हेस्टिंग्स के काल में चार्ल्स विल्किंस ने भगवदगीता का प्रथम आंग्ल अनुवाद किया, जिसकी प्रस्तावना स्वयं वारेन हेस्टिंग्स ने लिखी।
बनारस हिंदू विश्वविद्यालय का शिलान्यास 4 फरवरी, 1916 को वसंत पंचमी के दिन तत्कालीन वायसराय लॉर्ड हार्डिंग द्वारा किया गया था।
भारतीय विश्वविद्यालयों में धार्मिक शिक्षा के लिए मदनमोहन मालवीय ने प्रबल रुप से वकालत की थी। मदनमोहन मालवीय अग्रणी राष्ट्रवादी तथा देशभक्त थे। वे आरंभ में एक स्कूल अध्यापक तथा बाद में व्यवसाय से वकील रहे।
भारतीय शिक्षा का मैग्नाकार्टा कहे जाने वाले 1854 के चार्ल्स वुड के डिस्पैच को आधार बनाकर लंदन विश्वविद्यालय की तर्ज पर ब्रिटिश भारत में तीन विश्वविद्यालय कलकत्ता, मद्रास, एवं बंबई की स्थापना 1857 में की गई थी।


आधुनिक भारत में प्रेस का विकास

भारत का पहला समाचार पत्र ‘ बंगाल गजट ‘ था | आधुनिक भारतीय प्रेस का प्रारंभ 1766 ई में विलियम बोल्ट्स द्वारा एक समाचार पत्र के प्रकाशन से हुआ | परंतु ईस्ट इंडिया कंपनी ने इनको इंग्लैंड भेज दिया | 1780 ईसवी में जे. के. हिक्की ने ‘ बंगाल गजट ‘ नामक समाचार पत्र प्रकाशित करना आरंभ किया | लॉर्ड वेलेजली ने 1799 ईसवी में सभी समाचार पत्रों पर सेंसर बैठा दिया। उसने 1799 ई में समाचार पत्रों का पत्रेक्षण  अधिनियम पारित कर दिया और समाचार पत्रों पर युद्ध कालीन सेंसर लागू कर दिया |
1807 ईस्वी में यह अधिनियम पत्रिकाओं , पैम्पलेट तथा पुस्तकों पर भी लागू कर दिया गया | लॉर्ड हेस्टिंग्स ने 1818 ईस्वी में इस अधिनियम को रद्द कर दिया था | लॉर्ड रिपन ने 1882 ईसवी में वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट अथवा देशी भाषा प्रेस अधिनियम को रद्द कर दिया और भारतीय भाषाओं के समाचार पत्रों को अंग्रेजी भाषा के समाचार पत्रों के समान ही स्वतंत्रता दे दी | ज्ञातव्य है कि वर्नाकुलर प्रेस एक्ट , 1878 में लॉर्ड लिटन के कार्यकाल ( 1876-1880 ) में पारित हुआ था | इस अधिनियम को ‘ मुंह बंद करने वाला अधिनियम ‘ कहा गया | इस एक्ट के तहत जिला मजिस्ट्रेट को यह अधिकार था कि वह किसी भी भारतीय भाषा के समाचार पत्र से बांड पेपर ( bond paper ) पर हस्ताक्षर करवा ले की वह कोई भी सामग्री नहीं छापेगा जो सरकार विरोधी हो|
कानून का विरोध करने वाले मुद्रणालयों की जमानत को मजिस्ट्रेट रद्द कर सकता था | इस अधिनियम के अधीन – ‘ सोम प्रकाश ‘ , ‘ भारत मिहिर ‘ , ‘ ढाका प्रकाश ‘ , सहचर ‘ इत्यादि  समाचार पत्रों के विरुद्ध मामले दर्ज किए गए | पत्रकारिता के लिए ब्रिटिश सरकार द्वारा सजा पाने वाले पहले भारतीय बाल गंगाधर तिलक थे |1882 ई में उन्हें सरकार ने 4 माह का कारावास दिया क्योंकि उन्होंने अंग्रेजों द्वारा कोल्हापुर में महाराजा के प्रति धृष्टता करने पर कड़े शब्दों में निंदा की थी |
1897 ई में उन्हें दो अंग्रेजों की हत्या के लिए , चापेकर बंधु को उत्तेजित करने ( शिवाजी द्वारा अफजल खां का वध संबंधी लेख के आधार पर ) के लिए 18 माह के कारावास का दंड दिया गया | उत्तरी अमेरिका महाद्वीप ( वैंकूवर ) में ‘ फ्री हिंदुस्तान ‘ अखबार तारकनाथ दास ने शुरू किया | राजा राम मोहन राय ने अपने विचारों को प्रेस के माध्यम से प्रचारित व प्रसारित किया |
दिसंबर 1821 , में उन्होंने बांग्ला सप्ताहिक ‘ शब्द कौमुदी ‘ अथवा ‘ प्रज्ञा का चांद ‘ का प्रकाशन आरंभ किया | इसके एक वर्ष पश्चात इन्होंने फारसी भाषा में एक अन्य साप्ताहिक समाचार पत्र ‘ मिरातुल अखबार ‘ या ‘ बुद्धि दर्पण ‘ का प्रकाशन प्रारंभ किया | ‘ इंडियन मिरर ‘ अखबार का प्रकाशन कलकत्ता ( बंगाल ) से होता था|
इंडियन मिरर की स्थापना (1861 ई.) का श्रेय देवेंद्र नाथ टैगोर तथा मनमोहन घोष को है | भारत को ब्रिटिश राज से मुक्त कराने हेतु संयुक्त राज्य अमेरिका और कनाडा में लाला हरदयाल , सोहन सिंह भाकना और करतार सिंह सराभा आदि ने मिलकर गदर आंदोलन की स्थापना की थी | इस पार्टी का मुखपत्र ‘ गदर ‘ एक साप्ताहिक पत्र था , जिसके प्रथम संस्करण का प्रकाशन 1 नवंबर 1913 को सैन फ्रांसिस्को से किया गया था | यह उर्दू में था | *
9 दिसंबर 1913 से यह गुरुमुखी में भी छपने लगा | यह पत्र मराठी , हिंदी , अंग्रेजी , गुजराती में भी प्रकाशित हुआ | इसका एक अंक पख्तूनी भाषा में भी छपा था | ‘ अमृत बाजार पत्रिका ‘ की स्थापना शिशिर कुमार घोष ने 1868 ई में कोलकाता में की | प्रारंभ में यह बंगाली भाषा में प्रकाशित होती थी |
1878 में देशी भाषा प्रेस अधिनियम से बचने के लिए रातों-रात अंग्रेजी भाषा में रूपांतरित हो गई | गिरीश चंद्र घोष ने ‘ बंगाली ‘ का प्रकाशन 1862 ईसवी में शुरू किया , जिसे 1879 ई में एस एन बनर्जी ने ले लिया | हिंदू पैट्रियाट ‘ की स्थापना भी गिरीश चंद्र घोष ने की थी बाद में हरिश्चंद्र मुखर्जी इसके संपादक बने | 1881 में बंबई से ‘ केसरी ‘ और ‘ मराठा ‘ नामक दो महत्वपूर्ण समाचार पत्र प्रारंभ किए गए | मराठी भाषा में प्रकाशित ‘ केसरी ‘ को तिलक ने होमरूल आंदोलन का मुख्य पत्र बनाया था |
मराठा ‘ अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित होता था | प्रारंभ में ‘ केसरी ‘ के संपादक केलकर और ‘ मराठा’ के संपादक आगरकर थे | बाद में इन दोनों पत्रों का संपादन तिलक द्वारा किया गया | बंगवासी , काल एवं केसरी आदि पत्रिकाएं क्रांतिकारी आंदोलन की समर्थक और कांग्रेस की उदारवादी नीतियों की आलोचक थी। ‘ संध्या ‘ , ‘ युगांतर ‘ , एवं ‘ काल’ इन तीनों समाचार पत्रों ने स्वतंत्रता संग्राम के लिए क्रांतिकारी आतंकवाद की वकालत की थी | बांग्ला सप्ताहिक ‘ सोम प्रकाश ‘ ( som prakash ) समाचार पत्र का प्रकाशन 1859 ई  में ईश्वर चंद्र विद्यासागर ने प्रारंभ किया था | इस समाचार पत्र ने नील आंदोलन के किसानों के हितों का समर्थन किया था | * ‘  फ्री प्रेस जनरल ‘ एक न्यूज़ एजेंसी थी |
इंडियन ओपिनियन ‘ महात्मा गांधी द्वारा दक्षिण अफ्रीका से वर्ष 1903 में प्रारंभ की गई पत्रिका थी जिसके प्रथम संपादक मनसुखलाल नजर थे , जो नटाल कांग्रेस के सचिव थे। यह पत्र गुजराती, हिंदी , तमिल और अंग्रेजी में निकलता था | यंग इंडिया ‘ बंबई से द्विसप्ताहिक के रूप में प्रकाशित होता था | 7 मई 1919 से यह अहमदाबाद से साप्ताहिक रूप से प्रकाशित होने लगा | यहां के प्रारंभिक संस्करणों में जमुनादास द्वारकादास तथा शंकरलाल बैंकर इसके संपादक रहे |
8 अक्टूबर 1919 से यंग इंडिया के संपादक महात्मा गांधी बने | जमुनादास द्वारकादास तथा शंकरलाल बैंकर , एनी बेसेंट की होम रूल लीग के सदस्य थे | बंगाल का नील विद्रोह शोषण के विरुद्ध किसानों की सीधी लड़ाई थी | हिंदू पैट्रियाट ‘ के संपादक हरिश्चंद्र मुखर्जी ने तो इस आंदोलन पर काफी काम किया | हिंदू पैट्रियाट के पहले 2 वर्षों में गिरीश चंद्र घोष संपादक थे | 1855 ई में हरिश्चंद्र मुखर्जी इसके संपादक हो गए | वह निर्भीकता से बागान मालिकों के अत्याचारों की पोल खोलने तथा सताए हुए किसानों की सहायता में लगे रहे | 1861 ईस्वी में क्रिस्टोदास पाल इसके संपादक बने |
अंग्रेजी साप्ताहिक ‘ वंदे मातरम ‘ के साथ अरविंद घोष संपादक के रूप में जुड़े थे | वर्ष 1931 में दरभंगा के महाराज कामेश्वर सिंह ने ‘ दि इंडियन नेशन ‘ की स्थापना की | इसका प्रकाशन पटना से होता था | ‘ स्वदेशवाहिनी’ अथवा ‘ स्वदेशभिमानी ‘ के संपादक रामकृष्ण पिल्लै थे | रामकृष्ण पिल्लै का जन्म 1878 ई में तत्कालीन त्रावणकोर राज्य के नायर परिवार में हुआ था | गांधी जी ने साप्ताहिक समाचार पत्रों के रूप में ‘ हरिजन ‘ अंग्रेजी में , ‘ हरिजन बंधु ‘ गुजराती में तथा ‘ हरिजन सेवक ‘ हिंदी में प्रारंभ किए थे। ‘ हरिजन ‘ का प्रथम अंक 11 फरवरी 1933 को यरवदा सेंट्रल जेल पुणे, महाराष्ट्र से प्रकाशित किया गया
जुलाई 1924 में भीमराव अंबेडकर ने बंबई में एक संस्था ‘ बहिष्कृत हितकारिणी सभा ‘ बनाई जिसका उद्देश्य अस्पृश्य लोगों की नैतिक तथा भौतिक उन्नति करना था | उन्होंने ही मराठी पाक्षिक ‘ बहिस्कृत भारत ‘ आरंभ किया | अबुल कलाम आजाद ने वर्ष 1912 में उर्दू साप्ताहिक अल हिलाल का प्रकाशन आरंभ किया था | अल हिलाल का प्रकाशन इन्होंने वर्ष 1913 में किया |
वर्ष 1914 में अल-हिलाल पर प्रेस एक्ट के तहत प्रतिबंध लगा दिया गया था। लाला लाजपत राय ने लाहौर से एक उर्दू दैनिक ‘ वंदे मातरम ‘ और एक अंग्रेजी साप्ताहिक ‘ दि पीपुल ‘निकाला | इसके पहले वह संयुक्त राज्य अमेरिका में ‘ यंग इंडिया ‘ का प्रकाशन कर चुके थे | ‘द पायनियर ‘ समाचार पत्र का प्रारंभ 1865 में इलाहाबाद से जार्ज एलन ने किया था | ‘कौमी आवाज ‘ नामक उर्दू अखबार का प्रकाशन वर्ष 1945 में जवाहरलाल नेहरू तथा रफी अहमद किदवई द्वारा लखनऊ से प्रारंभ किया गया था |
वर्ष 1997 में इस अखबार का प्रकाशन बंद हो गया | ‘ रास्त गोफ्तार ‘ नामक पत्र दादाभाई नौरोजी से संबंधित है | भारत के लिए स्वशासन की मांग करते हुए मोतीलाल नेहरू ने ‘ इंडिपेंडेंट ‘ नामक समाचार पत्र निकाला था | कॉमनवील ‘ मद्रास से प्रकाशित अंग्रेजी पत्र था जिसकी संपादिका एनी बेसेंट थी |


पत्रकारिता के लिए ब्रिटिश सरकार द्वारा सजा पाने वाले पहले भारतीय बाल गंगाधर तिलक थे।
अमेरिका में (वैंकूवर) फ्री हिंदुस्तान अखबार तारकनाथ दास ने शुरु किया।
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की सेवा के उद्देश्य से 1881 ई. में बंबई से केसरी और मराठा नामक दो महत्वपूर्ण समाचार पत्र प्रारंभ किए गए थे।
बंगवासी, काल एवं केसरी आदि पत्रिकाएँ क्रंतिकारी आंदोलन की समर्थक और कांग्रेस की उत्तरदायी नीतियों की आलोचक थी।
अंग्रेजी साप्ताहिक वंदे मातरम के साथ अरबिंद घोष संपादक के रुप में जुड़े थे।
समाचार पत्र एवं उनसे संबंधित भाषा का सुमेलन निम्नानुसार है –
समाचार–पत्र         भाषा

भारत मित्र          हिंदी

राष्ट्रमत            मराठी

प्रजामित्र            गुजराती

नायक                     बंगाली

1931 ई. में दरभंगा के महाराज कामेश्वर सिंह ने दि इंडियन नेशन की स्थापना की। इसका प्रकाशन पटना से होता था।
समाचार–पत्र और उनके संस्थापक –
समाचार–पत्र             संस्थापक

दैनिक आज                 शिवप्रसाद गुप्त

द लीडर                 मदन मोहन मालवीय

द नेशनल हेराल्ड             जवाहरलाल नेहरु

द पायनियर                     जॉर्ज एलेन

भारत के लिए स्वशासन की मांग करते हुए मोतीलाल नेहरु ने अंग्रेजी पत्र इंडिपेंडेंट प्रारंभ किया।
गांधी जी द्वारा शुरु किया गया एक साप्ताहिक-पत्र हरिजन का प्रथम अंक 11 फरवरी, 1933 को यरवदा सेंट्रल जेल, पुणे (महाराष्ट्र) से प्रकाशित किया गया।
जुलाई 1924 में भीमराव अम्बेडकर ने बंबई में एक संस्था बहिष्कृत हितकारिणी सभा बनाई जिसका उद्देश्य अस्पृश्य लोगों की नैतिक तथा भौतिक उन्नति करना था। उन्होने ही मराठी पाक्षिक बहिष्कृत भारत आरंभ किया।



समाचार–पत्र प्रकाशक
बॉम्बे क्रानिकल      –    फिरोजशाह मेहता

इंडिपेंडेंट            –    मोतीलाल नेहरु

जस्टिस            –    टी.एम.नायर

लोकमान्य तिलक         –    केसरी

जवाहर लाल नेहरु      –    नेशनल हेराल्ड

महात्मा गांधी        –    द पायनियर

मौलाना आजाद      –    अल-हिलाल

एनी बेसेंट           –    कॉमनवील

यंग इंडिया          –    गांधी जी

मूक नायक          –    भीमराव अम्बेडकर

एनी बेसेंट           –    न्यू इंडिया

महात्मा गांधी        –    यंग इंडिया

कॉमनवील मद्रास से प्रकाशित अंग्रेजी पत्र था, जिसकी संपादिका एनी बेसेंट थी।
समाचार दर्पण – जे.सी. मार्शमैन
मिरात-उल-अखबार   –    राजा राममोहन राय

केसरी              –    बी.जी. तिलक

वंदे मातरम्             –    अरविंद घोष

कॉमरेड            –    मुहम्मद अली



सामाजिक एवं धार्मिक सुधार आंदोलन

19वीं शताब्दी के सामाजिक एवं धार्मिक सुधार आंदोलनों का भारत के आधुनिक इतिहास में विशेष स्थान है| इस आंदोलन ने बुद्धिजीवियों और मध्यम वर्ग को सर्वाधिक प्रभावित किया | निर्धन सर्वसाधारण वर्ग इन आंदोलनों से लगभग अप्रभावित ही रहा | बुद्धिजीवी ,नगरीय उच्च जातियां एवं उदार राजवाड़े इस आंदोलन से प्रभावित थे |
राजा राम मोहन राय प्रथम भारतीय थे , जिन्होंने सबसे पहले भारतीय समाज में व्याप्त बुराइयों के विरोध में आंदोलन चलाया | उनके नवीन विचारों के कारण ही 19वीं शताब्दी के भारत में पुनर्जागरण का उदय हुआ | राजा राम मोहन राय को ‘ भारतीय पुनर्जागरण का पिता ‘ , ‘ भारतीय राष्ट्रवाद का पैगंबर ‘ , ‘अतीत और भविष्य के मध्य सेतु ‘ , ‘ भारतीय राष्ट्रवाद का जनक  ‘ , ‘ आधुनिक भारत का पिता ‘ , ‘ प्रथम आधुनिक पुरुष ‘ तथा ‘ युगदूत ‘  कहा गया |
हिंदू धर्म के एकेश्वर वादी मत का प्रचार करने के लिए 1814 ईसवी में राजा राममोहन राय ने अपने युवा समर्थकों के सहयोग से ‘आत्मीय सभा ‘ की स्थापना की | 1828 ई में उन्होंने ब्रह्म सभा के नाम से एक नए समाज की स्थापना की जिसे आगे चलकर ‘ब्रह्म समाज ‘ के नाम से जाना गया | देवेंद्र नाथ टैगोर ने राजा राम मोहन के विचारों के प्रचार के लिए 1839 ई में ‘ तत्वबोधिनी सभा ‘ की स्थापना की | हिंदू धर्म का पहला सुधार आंदोलन ‘ ब्रह्म समाज ‘ था, जिस पर आधुनिक पाश्चात्य विचारधारा का बहुत बड़ा प्रभाव  पड़ा था |
मुगल बादशाह अकबर द्वितीय ने राजा राम मोहन राय को ‘ राजा ‘की उपाधि के साथ अपने दूत के रूप में 1830 ईसवी में तत्कालीन ब्रिटिश सम्राट विलियम चतुर्थ के दरबार में भेजा था | राय को इंग्लैंड में सम्राट से मुगल बादशाह अकबर द्वितीय को मिलने वाली पेंशन की मात्रा बढ़ाने पर बातचीत करनी थी | इंग्लैंड के ब्रिस्टल में ही 27 सितंबर 1833 को राजा राम मोहन राय की मृत्यु हो गई , जहां उनकी समाधि स्थापित है | शिक्षा के क्षेत्र में राजा राममोहन राय अंग्रेजी शिक्षा के पक्षधर थे | उनके अनुसार , एक उदारवादी पाश्चात्य शिक्षा ही अज्ञान के अंधकार से हमें निकाल सकती है और भारतीयों को देश के प्रशासन में भाग दिला सकती है | उन्होंने मूर्ति पूजा , बाल विवाह , सती प्रथा जैसी सामाजिक कुरीतियों का विरोध किया था।
रामकृष्ण परमहंस ने इस बात पर जोर दिया था कि ईश्वर तक पहुंचने के कई मार्ग सकते हैं | उन्होंने उपासना के सभी रूपों में एक ही परमात्मा की आराधना करते हुए सभी धर्मों की पूजा विधियों में एक ही ईश्वर की खोज की जिसे पाने के लिए सभी धर्मावलंबी अपने अपने मार्ग से उस गंतव्य का ध्यान करते हैं | रामकृष्ण परमहंस की शिक्षाओं की व्याख्या को साकार करने का श्रेय स्वामी विवेकानंद ( 1863-1902 ई ) को है | उन्होंने इस शिक्षा का साधारण भाषा में वर्णन किया | स्वामी विवेकानंद इस नवीन हिंदू धर्म ( neo hinduism ) के प्रचारक के रूप में उभरे | 1893 ईसवी में वे शिकागो गए , जहां उन्होंने ‘ वर्ल्ड पार्लियमेंट ऑफ रिलीजन ‘ ( विश्व धर्म संसद ) में अपना सुप्रसिद्ध भाषण दिया | सुभाष चंद्र बोस ने उनके बारे में कहा था कि ” जहां तक बंगाल का संबंध है हम विवेकानंद को आधुनिक राष्ट्रीय आंदोलन का ‘ आध्यात्मिक पिता ‘ कह सकते हैं |
रामकृष्ण मिशन की स्थापना स्वामी विवेकानंद ने 1897 ई में की थी। (1909 में सोसाइटी पंजीकरण अधिनियम के अंतर्गत इसे विधिवत औपचारिक रूप से पंजीकृत कराया गया ) | रामकृष्ण मिशन का कलकत्ता के बेलूर और अल्मोड़ा के मायावती स्थानों पर मुख्यालय खोला गया | मिशन का नामकरण रामकृष्ण परमहंस के नाम पर हुआ था | यह 19वीं सदी का अंतिम महान धार्मिक एवं सामाजिक आंदोलन था | इसकी विशेषता है प्राच्य या पूर्वी और आधुनिक या पश्चिमी इन दोनों महान शक्तियों का समन्वय |
रामकृष्ण मिशन का उद्देश्य धार्मिक एवं सामाजिक सुधार है किंतु यह भारत की प्राचीन संस्कृति से अपनी प्रेरणा ग्रहण करता है | यह शुद्ध वेदांत के सिद्धांत को अपना आदर्श मानता है | इसका लक्ष्य मनुष्य के भीतर की उच्चतम आध्यात्मिकता का विकास करना है , किंतु साथ ही यह हिंदू धर्म में पीछे विकसित मूर्ति पूजा जैसी चीजों की कीमत और उपयोगिता भी स्वीकार करता है | मिशन की दूसरी विशेषता है – सभी धर्म की सच्चाई में विश्वास | स्वामी विवेकानंद कहा करते थे कि ” सभी विभिन्न धार्मिक विचार एक ही मंजिल तक पहुंचने के केवल विभिन्न रास्ते हैं। ” | शारदामणि मुखोपाध्याय देवी के नाम से जाना जाता है , का विवाह 23 वर्षीय रामकृष्ण परमहंस से 5 वर्ष की उम्र में 1859 ईसवी में हुआ था |
मूलशंकर ( स्वामी दयानंद ) का जन्म 1824 ई. में गुजरात के मोरबी रियासत ( काठियावाड़ क्षेत्र ) में एक ब्राह्मण कुल में हुआ था | उन्होंने 1860 ईसवी में मथुरा में स्वामी विरजानंद जी से वेदों के शुद्ध अर्थ तथा वैदिक धर्म के प्रति अगाध श्रद्धा प्राप्त की | 1863 ईस्वी में उन्होंने पाखंड खंडिनी पताका लहराई | 1875 ई में उन्होंने मुंबई में आर्य समाज की स्थापना की | उनके विचार उनकी प्रसिद्ध पुस्तक ‘ सत्यार्थ प्रकाश ‘ में वर्णित है | उनकी अन्य रचनाओं में पाखंड खंडन , वेदभाष्य भूमिका , ऋग्वेद भाष्य , अद्वैत मंत्र का खंडन , पंच महायज्ञ विधि तथा वल्लभाचार्य मत खंडन प्रमुख है।
स्वामी दयानंद ने कहा था ” अच्छा शासन स्वशासन का स्थानापन्न  नहीं है ” | दयानंद सरस्वती (मूल शंकर ) ने 7 अप्रैल 1875 को मुंबई में आर्य समाज की स्थापना की , जिसका मुख्य उद्देश्य प्राचीन वैदिक धर्म की शुद्ध रूप से पुनः स्थापना करना था | आर्य समाज आंदोलन का प्रसार प्रायः  पाश्चात्य प्रभावों की प्रतिक्रिया के रूप में हुआ था| 1877 में आर्य समाज का मुख्यालय लाहौर में स्थापित किया गया , जिसके उपरांत आर्य समाज का अधिक प्रचार हुआ | शुद्ध वैदिक परंपरा में विश्वास के चलते स्वामी जी ने ” पुनः वेदों की ओर चलो ” का नारा दिया | स्वामी दयानंद का उद्देश्य था कि भारत को धार्मिक सामाजिक तथा राष्ट्रीय रूप से एक कर दिया जाए | धार्मिक क्षेत्र में वह मूर्ति पूजा , बहुदेववाद ,  अवतारवाद , पशु बलि , श्रद्धा , तंत्र मंत्र तथा झूठे कर्मकांडो को स्वीकार नहीं करते |
स्वामी दयानंद को उनके धार्मिक सुधार प्रयासों के कारण ‘ भारत का मार्टिन लूथर किंग ‘ कहा जाता है | आर्य समाज के नियम तथा सिद्धांत सबसे पहले बंबई में गठित किए गए | 1892-93 ईसवी में आर्य समाज दो गुटों में बैठ गया | एक गुट पाश्चात्य शिक्षा का समर्थक था जबकि दूसरा पाश्चात्य शिक्षा का विरोधी | पाश्चात्य शिक्षा के विरोधियों में स्वामी श्रद्धानंद , लेखराज और मुंशीराम प्रमुख थे। इन लोगों ने 1902 ई में गुरुकुल की स्थापना की | पाश्चात्य शिक्षा के समर्थकों में लाला लाजपत राय तथा हंसराज प्रमुख थे। इन लोगों ने ‘ दयानंद एंग्लो वैदिक कॉलेज ‘ की स्थापना की| सर्वप्रथम स्वामी दयानंद सरस्वती ने ‘ स्वराज्य ‘ शब्द का प्रयोग किया और हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में स्वीकार किया | उन्होंने ही सबसे पहले विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार और स्वदेशी को अपनाने पर बल दिया |
प्रार्थना समाज की स्थापना 1867 ईस्वी में बंबई में आचार्य केशव चंद्र सेन की प्रेरणा से आत्माराम पांडुरंग द्वारा की गई थी | महादेव गोविंद रानाडे इस संस्था से 1869 ईस्वी में जुड़े | इस संस्था का प्रमुख उद्देश्य जाति प्रथा का विरोध , स्त्री पुरुष की विवाह की आयु में वृद्धि , विधवा विवाह एवं स्त्री शिक्षा को प्रोत्साहन देना था | रानाडे का उल्लेख ” पश्चिमी भारत में सांस्कृतिक पुनर्जागरण के अग्रदूत ” के रूप में किया जाता है | ‘ देव समाज ‘ की स्थापना 1887 ईसवी में शिवनारायण अग्निहोत्री ने लाहौर में की थी | ये ब्रह्म समाज के पूर्व अनुयायी थे | इस समाज के उपदेशों को ‘ देव शास्त्र ‘ नामक एक पुस्तक में संकलित किया गया |
1873 ई में सत्यशोधक समाज की स्थापना ज्योतिबा फुले ने की थी | इनका जन्म 1827ई  में एक माली के घर हुआ था | इन्होने शक्तिशाली गैर ब्राह्मण आंदोलन का संचालन किया | इन्होंने अपनी पुस्तक ‘ गुलामगीरी’ (1872 ई )  एवं अपने संगठन ‘ सत्यशोधक समाज ‘ के द्वारा पाखंडी ब्राह्मणों एवं उनके अवसरवादी धर्म ग्रंथों से निम्न जाति की रक्षा की आवश्यकता पर बल दिया |
राजा राधाकांत देव ने 1830 ई में बंगाल में ‘ धर्म सभा ‘ की स्थापना कर सामाजिक-धार्मिक सुधारों का विरोध किया और रूढ़िवादिता का समर्थन किया | राधास्वामी सत्संग आंदोलन की स्थापना 1861 ई में आगरा के एक महाजन या बैंकर तुलसीराम , जो शिवदयाल साहब या स्वामी जी महाराज के नाम से लोकप्रिय थे , ने की। राधास्वामी मत को मानने वाले लोग एक ही परमेश्वर , गुरू की महत्ता , संतों का साथ ( सत्संग ) तथा साधारण सामाजिक जीवन में विश्वास करते थे | महाराष्ट्र के समाज सुधारक गोपाल हरि देशमुख (1823-92 ई ) ‘ लोकहितवादी ‘ के रूप में प्रख्यात थे | पेशे की दृष्टि से न्यायधीश गोपाल हरि 1880 ई  में गवर्नर जनरल की काउंसिल के सदस्य भी रहे |
महाराष्ट्र में विधवा पुनर्विवाह हेतु प्रथम अभियान का नेतृत्व विष्णु परशुराम पंडित ने किया | उन्होंने वर्ष 1850 ई में ‘ विडो रिमैरिज सोसायटी ‘की स्थापना की थी और साथ ही विधवा विधवा पुनर्विवाह आंदोलन चलाया था| उन्नीसवीं सदी के महानतम पारसी समाज सुधारक बहरामजी एम. मालाबारी थे | उनका जन्म  बड़ौदा के पारसी परिवार में 1853 ई में हुआ था | उन्होंने बाल विवाह  के खिलाफ तथा विधवा विवाह का समर्थन में एक परिपत्र का संपादन किया था | 1891 का ‘ सम्मति आयु अधिनियम ‘ ( age of consent act ) इन्ही के प्रयासों से पारित हुआ था| भारतीय राष्ट्रीय सामाजिक सम्मेलन ‘ की स्थापना 1887 ई में एम जी रानाडे एवं रघुनाथ राव द्वारा की गई थी | इस सम्मेलन का प्रमुख उद्देश्य बहु विवाह , बाल विवाह एवं कुलीनवाद जैसी कुप्रथाओं का समापन करना था |
1856 ईसवी में धार्मिक अक्षमता कानून ( रिलीजियस डिजेबिलिटीज एक्ट ) द्वारा हिंदुत्व से धर्मांतरित व्यक्तियों के नागरिक अधिकारों की रक्षा का प्रावधान किया गया | 1856 ई के हिंदू विधवा पुनर्विवाह कानून (हिंदू विडो रिमैरिज एक्ट) कानून बनाया गया | सती निषेध रेगुलेशन लॉर्ड विलियम बेंटिक के समय 1829 में बनाया गया था | कलकत्ता के संस्कृत कॉलेज के आचार्य ईश्वर चंद्र विद्यासागर ने विधवा पुनर्विवाह के लिए अथक संघर्ष किया | इन्होंने यह प्रमाणित करने का प्रयास किया कि वेदों में विधवा विवाह को मान्यता दी गई है | इनके प्रयासों के फलस्वरूप 26 जुलाई 1856 में ‘ हिंदू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम ‘ पारित हुआ |
राजा राममोहन राय ने सती प्रथा का प्रबल विरोध किया था | यह उन्हीं के प्रयासों का फल था कि 1829 के 17वें नियम के अनुसार विधवाओं को जिंदा जलाना बंद कर दिया गया और न्यायालय को आज्ञा दी गई कि वह ऐसे मामले में सदोष मानव हत्या के लिए मुकदमा चलाएं और दोषियों को दंडित करें |
लॉर्ड ऐलनबरो के काल में 1843 के एक्ट V ने गुलामी ( दासता ) गैरकानूनी बना दिया | केशवचंद्र सेन ने 1872 के नेटिव मैरिज एक्ट पारित कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी | इस एक्ट से लड़कियों के लिए विवाह की न्यूनतम आयु 14 वर्ष तथा लड़कों के लिए न्यूनतम 18 वर्ष निर्धारित की गई थी | इसे ब्रह्म विवाह अधिनियम भी कहा जाता है |
1929 ई. में अजमेर निवासी एवं प्रसिद्ध शिक्षाविद डॉक्टर हरविलास शारदा के प्रयत्नों से बाल विवाह निषेध कानून बन पाया | उन्हीं के नाम पर ही इसे शारदा अधिनियम ( शारदा एक्ट ) कहा गया | इस अधिनियम के द्वारा लड़कियों के विवाह की न्यूनतम सीमा 14 वर्ष तथा लड़कों की 18 वर्ष निर्धारित की गई | ” थियोसोफिकल सोसाइटी ” की स्थापना एक रूसी महिला मैडम एच पी ब्लावेट्स्की , अमेरिकी सैनिक अधिकारी कर्नल अल्कॉट विलियम क्वॉन जज एवं अन्य द्वारा 1875 ई में न्यूयार्क में की गई थी। इन सोसाइटी के संस्थापक 1882 ई में मद्रास के पास अड्यार नामक स्थान पर सोसाइटी का मुख्यालय स्थापित किए जो बाद में इसका अंतराराष्ट्रीय कार्यालय बना। 1888 ई में श्रीमती एनी बेसेंट इस सोसाइटी की सदस्या बनी तथा 1893 ई में भारत आकर उन्होंने सोसाइटी के लिए सर्वाधिक भूमिका निभाई | श्रीमती एनी बेसेंट ने प्राचीन हिंदू धर्म को विश्व का अत्यधिक गूढ़ एवं अध्यात्मिक धर्म माना। थियोसोफी या ब्रह्म विद्या हिंदू धर्म के अध्यात्मिक दर्शन और कर्म सिद्धांत तथा आत्मा के पुनर्जन्म के सिद्धांत का समर्थन करती थी। इसी कारण एनी बेसेंट भारतीय लोगों को इससे जोड़ सकी, जो इसकी सफलता का मुख्य कारण था।
रानाडे के शिष्य गोपाल कृष्ण गोखले ने वर्ष 1905 में ‘ सर्वेंट्स ऑफ इंडिया सोसाइटी ‘ की स्थापना की। गोपाल कृष्ण गोखले ने कांग्रेस के इक्कीसवें अधिवेशन ( जो 1905 में बनारस में हुआ था। ) की अध्यक्षता की थी। गोखले महात्मा गांधी के राजनीतिक गुरु थे। 1910 के उपरांत ज्योतिबा फुले के विचारो से प्रेरित होकर मुकुंदराव पाटिल एवं शंकरराव जाधव ने एक ब्राह्मण विरोधी एवं प्रबल कांग्रेस विरोधी ‘ बहुजन समाज ‘ की स्थापना की। नाडारों द्वारा मंदिरों में प्रवेश के अधिकार की मांग की प्रस्तुति के कारण 1899 ई में तिरुनेलवेली में भयंकर दंगे हुए थे। छुआछूत उन्मूलन के लिए आयोजित एक सम्मेलन में तिलक ने कहा था , ” यदि भगवान भी छुआछूत को बरदाश्त करे , तो मैं भगवान को नहीं मानूंगा | ”  | तिलक को लोग प्रायः ‘ लोकमान्य ‘ और भारत का ‘ बेताज बादशाह ‘ कहते थे।  दार-उल–उलूम-देवबंद के संस्थापक सदस्यों में मौलाना हुसैन अहमद भी थे। दार-उल–उलूम-देवबंद की स्थापना 1866 ई में हुई थी।


हाली पध्दति बंधुआ मजदूर एवं बंधुआ मजदूरी से संबंधित हैं। हाली पध्दति के अंतर्गत बारदोली क्षेत्र में कपिलराज जनजाति के लोगों को उच्च जातियों के यहां पुश्तैनी मजदूर के रुप में कार्य करना होता था।
वर्ष 1924 में बंगाल के तारकेश्वर शिव मंदिर के भ्रंष्ट महंत के विरुध्द तारकेश्वर आंदोलन चला था। महंत पर एक सरकारी कर्मचारी की पत्नी के साथ अवैध संबंध तथा मंदिर के धन के दुरुपयोग जैसे आरोप लगे थे।
देवबंद आंदोलन की शुरुआत मौलाना हुसैन अहमद एवं अन्य लोगों द्वारा 1866 ई. में देवबंद, यू.पी. (संयुक्त प्रांत) में दार-उल-उलूम की स्थापना के साथ हुई।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस अपने कार्यक्रम में सामाजिक सुधारों को नही रखना चाहती थी। इसीलिए प्रस्तुत उद्देश्य के लिए उसने अलग से संगठन बनाने का सुझाव दिया।
तूलसीदास का काल 16वीं शती ई. राजा राममोहन राय का 1772-1833 ई., दयानंद सरस्वती का 1824-1883 ई. तथा विवेकानंद का 1863-1902 ई. था।
शारदामणि मुखापाध्याय जिन्हें शारदा देवी के नाम से जाना जाता है, का विवाह 23 वर्षीय रामकृष्ण परमहंस से 5 वर्ष की उम्र में 1859 ई. में हुआ था।


कांग्रेस से पूर्व स्थापित राजनीतिक संस्थाएं

·      आधुनिक भारत में समाज सुधारो एवं राजनीतिक आंदोलन के पथ प्रदर्शक राजा राममोहन राय थे | इनके सहयोगियों ने सर्वप्रथम 1836 ईसवी में बंगभाषा प्रकाशिका सभा नामक राजनीतिक संस्था की स्थापना की | राजनैतिक सुधारों को लेकर विरोध करने वाले पहले भारतीय राजा राममोहन राय थे |
·      जमींदारी एसोसिएशन या लैंडहोल्डर्स सोसायटी की स्थापना 1838 ईस्वी में कोलकाता में हुई थी | यह पहली राजनीतिक संस्था/संगठन थी, जिसने संगठित राजनीतिक प्रयासों का शुभारंभ किया तथा शिकायतों को दूर करने के लिए संवैधानिक उपचारों का प्रयोग किया | इसका उद्देश्य जमींदारों के स्वार्थों की रक्षा करना था | इसके संस्थापक द्वारकानाथ टैगोर एवं उनके सहयोगी जमींदार थे |
·      पूना सार्वजनिक सभा की स्थापना 1870 ई में एम जी रानाडे तथा जी वी जोशी द्वारा की गई | रानाडे ने सभा को विलक्षण नेतृत्व प्रदान किया | 1875 ईसवी में इस संस्था ने ब्रिटिश संसद में भारतीयों के प्रत्यक्ष प्रतिनिधित्व की मांग करते हुए हाउस ऑफ कॉमन्स के समक्ष याचिका प्रस्तुत की |
·      26 जुलाई 1876 को सुरेंद्रनाथ बनर्जी ने आनंद मोहन बोस के सहयोग से इंडियन एसोसिएशन या भारत संघ की स्थापना कोलकाता में की। यह तत्कालीन राजनीतिक संस्थाओं में सबसे प्रमुख महत्वपूर्ण थी, जिसे कांग्रेस से पूर्व अखिल भारतीय स्तर की संस्था का सम्मान प्राप्त था |
·      सुरेंद्रनाथ बनर्जी 1869 में भारतीय सिविल सेवा के लिए उत्तीर्ण घोषित किए गए, किंतु तकनीकी आधारों पर इन्हें अयोग्य घोषित कर दिया गया | इन्होंने जन चेतना के प्रसार के लिए बंगाली पत्रिका का संपादन किया | उन्हें दो बार कांग्रेस का अध्यक्ष चुना गया | ब्रिटिश इंडियन एसोसिएशन की स्थापना अक्टूबर 1851 में कलकत्ता में हुई थी| इसके संस्थापक सदस्य राजेंद्रलाल मित्र , राधाकांत देव (अध्यक्ष) ,  हरिश्चंद्र मुखर्जी , देवेंद्र नाथ टैगोर ( महासचिव ) आदि थे|
·      सैयद अमीर अली ने 1877 ईस्वी में कोलकाता में सेंट्रल मोहम्मडन नेशनल एसोसिएशन की स्थापना की। राजनारायण बोस के विचारों से प्रेरित होकर नवगोपाल मित्र ने 1867 ई में ‘ हिन्दू मेला ‘ नामक संस्था की स्थापना की। इस संस्थान का उद्देश्य जनमानस में स्वायत्तता का भाव उत्पन्न करना एवं देसी उत्पादों को बढ़ावा देना था |
·      1843 में बंगाल ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी की स्थापना जॉर्ज थॉमसन की अध्यक्षता में हुई | बंबई प्रेसीडेंसी एसोसिएशन की स्थापना 1885 ई में फिरोजशाह मेहता, के टी तेलंग एवं बदरूदीन तैय्यब जी द्वारा की गई थी। इन तीनों की बंबई के त्रिमूर्ति के रूप में जाना जाता था।


सुरेन्द्रनाथ बनर्जी द्वितीय भारतीय थे जिन्होने आई.सी.एस. (ICS) परीक्षा उत्तीर्ण की थी। इनकी प्रथम नियुक्ति सिलहट (बांग्लादेश) में असिस्टेंट मजिस्ट्रेट के पद पर हुई थी। यहाँ पर मामूली भूल की वहज से 1874 ई. में इन्हें पद से हटाया गया।
1885 ई. में फिरोजशाह मेहता, बदरुद्दीन तैय्यब जी तथा के.टी. तैलंग के प्रयास से बंबई प्रेसीडेंसी एसोसिएशन की स्थापना हुई थी।
संगठन संस्थापक
लैंड होल्डर्स सोसाइटी       द्वारिकानाथ टैगोर

ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी विलियम एडम्स

इंडियन सोसाइटी          आनंद मोहन बोस

इंडियन एसोसिएसन       एस. एन. बनर्जी

संस्था स्थापना वर्ष
बंगभाषा प्रकाशिका सभा                 1836

लैंडहोल्डर्स सोसाइटी            1838

बंगाल ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी            1843

इंडियन लीग                          1875



भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस

एलन आक्टेवियन ह्यूम (ए. ओ. ह्यूम ) भारतीय सिविल सेवा के सेवानिवृत्त ब्रिटिश अधिकारी थे | ये शिमला में बस गए थे | 1884 ई में इन्होंने भारतीय राष्ट्रीय संघ ( इंडियन नेशनल यूनियन ) की स्थापना की, जो कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस  का अग्रदूत था। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना 1885 ई. में ए.ओ. ह्यूम द्वारा की गई थी।
इसका पहला अधिवेशन 28 दिसंबर , 1885 को बंबई स्थित गोकुलदास तेजपाल संस्कृत विद्यालय में आयोजित किया गया। इसी सम्मेलन में दादाभाई नौरोजी के सुझाव पर भारतीय राष्ट्रीय संघ का नाम बदलकर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस कर दिया गया | इसमें कुल 72 प्रतिनिधियों ने भाग लिया | भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के पहले अधिवेशन की अध्यक्षता व्योमेश चंद्र बनर्जी ( डब्ल्यू सी बनर्जी ) ने की तथा इसके प्रथम महासचिव स्वयं ए ओ ह्यूम थे |
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना ( 1885 ई ) के समय भारत का वायसराय लार्ड डफरिन ( कार्यकाल 1884-1888 ई ) था | उसने कांग्रेस का यह कहकर मजाक उड़ाया था कि यह ” सूक्ष्मदर्शी अल्पसंख्यकों की संस्था है ” | कांग्रेस का दूसरा अधिवेशन 1886 ई में कोलकाता में हुआ था | इसकी अध्यक्षता दादाभाई नौरोजी ने की थी | इसी अधिवेशन में इंडियन नेशनल कॉन्फ्रेंस का भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में विलय हुआ था | इसके अतिरिक्त दादाभाई नौरोजी ने 1893 में लाहौर अधिवेशन तथा वर्ष 1906  में कोलकाता अधिवेशन की अध्यक्षता की थी|
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सर्वप्रथम मुस्लिम अध्यक्ष होने का गौरव बदरुद्दीन तैयब जी को है , यह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के 27-28 दिसंबर 1887 को मद्रास में संपन्न हुए तीसरे अधिवेशन के अध्यक्ष पद के लिए चुने गए | इस अधिवेशन में कुल 607 प्रतिनिधियों ने भाग लिया | इसी सम्मेलन में पहली बार कांग्रेस के कार्य संचालन का भार प्रतिनिधियों की एक कमेटी के हाथों में सौंपा गया | यह कमेटी आगे चलकर ‘ विषय निर्धारिणी समिति ‘ कहलाई |
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का प्रथम निर्वाचित यूरोपीय अध्यक्ष जार्ज यूले था | इसने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के इलाहाबाद में संपन्न चतुर्थ अधिवेशन ( 1888 ई ) की अध्यक्षता की थी | कांग्रेस के लिए समर्थन प्राप्त करने के उद्देश्य से जुलाई , 1889 में लंदन में विलियम डिग्बी की अध्यक्षता में ‘ ब्रिटिश कमेटी ऑफ इंडिया ‘ की स्थापना की गई | यह ‘ इंडियन नेशनल कांग्रेस ‘ की एक समिति थी | इस समिति ने भारतीय मामलों से अंग्रेजों को अवगत कराने के उद्देश्य से ‘ इंडिया ‘ नामक साप्ताहिक पत्र निकाला |
लाला लाजपत राय , जिन्हें लोग प्रायः ‘ शेरे-पंजाब ‘ (  पंजाब का सिंह )  कहते थे , वर्ष 1920 में कोलकाता के विशेष अधिवेशन में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष बने , इस अधिवेशन में असहयोग का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया गया | श्रीमती एनी बेसेंट आंग्ल-आयरलैंड कुल से थी, वे वर्ष 1907-1933  तक थियोसॉफिकल सोसायटी की प्रधान रही , वर्ष 1916 में होमरूल लीग का गठन किया तथा वर्ष 1917 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की पहली महिला अध्यक्ष बनी | भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का 27वा अधिवेशन दिसम्बर , 1912 में बांकीपुर ( बिहार ) में संपन्न हुआ। इस अधिवेशन की अध्यक्षता आर एन मुधोलकर ने की थी। इसी अधिवेशन में ए ओ ह्यूम   को ‘ कांग्रेस का पिता ‘ कहा गया |
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग दोनों ने वर्ष 1916 में लखनऊ में अधिवेशन किया | तदनुसार , कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग के बीच लखनऊ समझौता हुआ जो कांग्रेस लीग योजना ‘ लखनऊ पैक्ट ‘ के नाम से जाना जाता है | इसी अधिवेशन में उग्रपंथियों को जिन्हें पिछले 9 वर्ष से कांग्रेस से निष्कासित कर दिया गया था पुनः कांग्रेस में शामिल किया गया | कांग्रेस के लखनऊ अधिवेशन की अध्यक्षता अंबिका चरण मजूमदार ने की थी। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के लखनऊ अधिवेशन 1916 में बाल गंगाधर तिलक ने कहा था , ” स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं उसे लेकर रहूंगा | “
1818 ई. में सर सैयद अहमद खां ने एक संयुक्त भारतीय राजभक्त सभा ( united indian patriotic association ) बनाई जिसका उद्देश्य कांग्रेस के प्रचार को निष्फल करना था और लोगों को कांग्रेस से दूर करना था | वर्ष 1900 मे कर्जन ने कहा था – ” कांग्रेस अब लड़खड़ा रही है और जल्दी गिरने वाली है | मेरा सबसे बड़ा मकसद भी यही है कि मेरे भारत प्रवास के दौरान इस पार्टी का अंत हो जाए ” | भारत की स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद महात्मा गांधी ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को समाप्त करने का सुझाव दिया था |
लार्ड विलिंगटन ने कांग्रेस के 31वें अधिवेशन में भाग लिया था | इस दौरान वह बंबई का गवर्नर था | यह अधिवेशन बंबई में वर्ष 1915 में आयोजित किया गया | महात्मा गांधी ने केवल एक बार 1924 के बेलगांव अधिवेशन की अध्यक्षता की थी | सरोजिनी नायडू ( 1879-1949 ई ) प्रख्यात कवयित्री और राष्ट्रवादी नेत्री थी | वर्ष 1925 में कानपुर में हुए भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के 40वें वार्षिक अधिवेशन में कांग्रेस की प्रथम भारतीय महिला अध्यक्ष बनी | 1947-48 में यह उत्तर प्रदेश की राज्यपाल भी रही |
जवाहरलाल नेहरू ने वर्ष 1929 में लाहौर , 1936 में लखनऊ तथा 1937 में फैजापुर अधिवेशन की अध्यक्षता की | कांग्रेस का 51 वां अधिवेशन 19-21 फरवरी 1938 के दौरान गुजरात के हरिपुरा में संपन्न हुआ था | इस अधिवेशन की अध्यक्षता सुभाष चंद्र बोस ने की थी | इस अधिवेशन में राष्ट्रीय नियोजन समिति का गठन किया गया तथा पंडित जवाहरलाल नेहरू को इसका अध्यक्ष बनाया गया |
वर्ष 1940-1945 तक अबुल कलाम आजाद कांग्रेस के अध्यक्ष रहे | जे बी कृपलानी को कांग्रेस के 54वें अधिवेशन ( नवंबर 1946 मेरठ ) का अध्यक्ष चुना गया था तथा वह आजादी के समय भी अध्यक्ष रहे | कांग्रेस के 55वें अधिवेशन ( दिसम्बर 1948 जयपुर ) की अध्यक्षता डॉ पट्टाभि सीतारमैया ने की थी |
रवींद्र नाथ टैगोर द्वारा मूल रूप से बांग्ला में रचित और संगीतबद्ध ‘ जन गण मन ‘ के हिंदी संस्करण को संविधान सभा ने भारत के राष्ट्रगान के रूप में 24 जनवरी 1950 को अपनाया | *यह सर्वप्रथम 27 दिसंबर 1911 को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में गाया गया था। बाल गंगाधर तिलक ने अंतिम रूप से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अमृतसर अधिवेशन 1919 में भाग लिया था |


हरिपुरा कांग्रेस अधिवेशन की (1938) अध्यक्षता सुभाष चन्द्र बोस ने, नासिक अधिवेशन (1950) की अध्यक्षता पुरुषोत्तम दास टंडन ने, मद्रास अधिवेशन (1927) की अध्यक्षता डॉ. एम.ए. अंसारी ने एवं कानपुर अधिवेशन (1925) की अध्यक्षता सरोजिनी नायडू ने की थी।
अध्यक्ष भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की सभाओं के स्थान
मोतीलाल नेहरु       अमृतसर, 1919

सरोजिनी नायडू      कानपुर, 1925

डॉ. राजेन्द्र प्रसाद बंबई, 1934

अबुल कलाम आजा    रामगढ़, 1940

भारत की स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद महात्मा गांधी ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को समाप्त करने का सुझाव दिय था।
अपने अध्यक्षीय संबोधन के समय सुभाष चन्द्र बोस ने हिंदी भाषा के लिए रोमन लिपि लागू करने की वकालत की थी। सुभाष चन्द्र बोस ने कांग्रेस के हरिपुरा अधिवेशन (1938) की अध्यक्षता की थी।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का प्रथम निर्वाचित यूरोपीय अध्यक्ष जार्ज यूले था। इसने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के चतुर्थ अधिवेशन (1888 ई.) की अध्यक्षता की थी।
कांग्रेस का दूसरा अधिवेशन 1886 ई. में कलकत्ता में हुआ। इसकी अध्यक्षता दादाभाई नौरोजी ने की।




कांग्रेस में गरम दल और नरम दल

भारत में राष्ट्रीय आन्दोलन की दिशा को महात्मा गाँधी के पर्दापण के पूर्व इटली – अबीसीनिया युद्ध (जिसमें इटली की औपनिवेशिक शक्ति पराजित हुई), 1899-1901 इसवी के दौरान चीन में साम्राज्यवादियो के विरुद्ध चलाये गये बक्सर आन्दोलन तथा रूस पर जापान की विजय , इन सबने प्रभावित किया किन्तु इनमें वर्ष 1905 में जापान की रुस पर विजय का सर्वाधिक प्रभाव पड़ा |
जापान ने वर्ष 1905 में जारशाही रूस को हराकर स्वयं को सैनिक दृष्टि से एक शक्तिशाली यूरोपीय देश से श्रेष्ट सिद्ध कर दिया था |  इससे इस मिथ्या भ्रम का निवारण हो गया की गोरी जाती के लोग अजय हैं |कांग्रेस के नरम दल के नेताओं की आन्दोलन की प्रमुख पद्थी राजवांमबध्य आन्दोलन अर्थात प्रशाशन में भारतीयों की भागीदारी की मांग तथा जनता में राजनीतिक जागरूकता उत्पन्न करना था |वहीँ गरम दल के नेताओं की मुख्य मांगे अनुकूल प्रविघटन पध्दति की थी |
वर्ष 1907 में कांग्रेस के सूरत अधिवेशन में कांग्रेस नरमपंथी और गरमपंथी दो अलग अलग गुटों में विभक्त हो गयी | उदारवादी राजनीति या राजनीतिक भिक्षावृति के युग में अधिकांश नरमपंथी नेता यथा – दादाभाई नैरोजी , फिरोजशाह मेहता , दिनशा वाचा , व्योमेश बनर्जी और सुरेन्द्रनाथ बनर्जी आदि शहरी क्षेत्रों से सम्बन्ध थे |इस काल में कांग्रेस पर समृद्धशाली मध्यमवर्गीय बुध्दिजीवियो का जिनमें वकील , डॉक्टर , इंजिनियर , पत्रकार  एवं साहित्यिक व्यक्ति सम्मिलित थे , का अधिकार था |  उपाधियाँ और बड़े बड़े पद इन लोगो के लिए आकर्षण रखते थे | कांग्रेस में आने वाले ये प्रतिनिधि बड़े बड़े नगरो से आते थे तथा जन साधारण से इनका कोई संपर्क नहीं था |


फिरोजशाह मेहता ने स्वयं कहा था ,” कांग्रेस की आवाज जनता की आवाज नही है , परन्तु उनके साथ रहने वाले अन्य देशवासियों का यह कर्त्तव्य है की वे इनकी भावनाओं को समझे और उन्हें व्यक्त करें और उनके उपचार का प्रयत्न करें “ |गोपाल किशन गोखले उदारवादी खेमे से संबंध थे | वह समभाव  और मृदु न्यायप्रियता में विश्वास करते थे। उन्हें पूर्ण विश्वास था कि देश का पुनरुध्दार उत्तेजना के बवंडरो में नही हो सकता | वे साधन और साध्य दोनों की पवित्रता में विश्वास करते थे |  इन्ही विचारों से प्रभावित होकर गाँधी जी उनके शिष्य बन गये |  इन्होने 1888  के इलाहाबाद कांग्रेस अधिवेशन के मंच से राजनीति में सर्वप्रथम भाग लिया |
1897 में उन्हें और वाचा को भारतीय व्यय के लिए नियुक्त वेल्बी आयोग के सम्मुख साक्ष्य देने को कहा गया | वर्ष 1902 में वह बम्बई संविधान परिषद् के लिए कालांतर में इम्पीरियल लेजिस्लेटिव कौंसिल के लिए चुने गये | वर्ष 1906 के बाद भारतीय राजनीति में कांग्रेस के अन्दर उग्रवादी दल के उदय के साथ-साथ देश में क्रांतिकारी उग्रवादी दलों का आविर्भाव हुआ |
उग्रवादी विचारधारा के चार प्रमुख नेता थे – बाल गंगाधर तिलक , लाला लाजपत राय , विपिन चन्द्र पाल तथा अरबिंद घोष | इन नेताओं ने स्वराज्य प्राप्ति को ही अपना लक्ष्य बनाया | उन्हें उदारवादी नेताओं की तरह संवैधानिक दायरे के अंदर अपनी मांगे मनवाने में विश्वास नहीं था | तिलक ने कहा कि हमारा उद्देश्य आत्मनिर्भरता है भिक्षावृत्ति नहीं | उन्होंने कांग्रेस पर प्रार्थना , याचना तथा विरोध की राजनीति करने का आरोप लगाया | उनके नेतृत्व में कांग्रेस की प्रार्थना और याचना की नीति समाप्त हो गई |
जहां उदारवादी दल संवैधानिक आंदोलन में अंग्रेजों की न्यायप्रियता में , वार्षिक सम्मेलन में , भाषण देने में , प्रस्ताव पारित करने में और इंग्लैंड में शिष्टमंडल भेजने में विश्वास करता था वहीं दूसरी और उग्रवादी दल आक्रमक प्रतिरोध में सामूहिक आंदोलन में तथा आत्म बलिदान के लिए दृढ़ निश्चय में विश्वास करत था | इनके लिए स्वराज का अर्थ – ” विदेशी नियंत्रण से पूर्ण स्वतंत्रता था, जबकि उदारवादी दल के स्वराज का अर्थ – ” साम्राज्य के अंदर औपनिवेशिक  स्वशासन था ” | लाला लाजपत राय ‘ शेर-ए-पंजाब ‘ के नाम से भी जाने जाते थे | ये भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में गरम दल के नेता तथा पूरे पंजाब के प्रतिनिधि थे | इन्हें पंजाब केसरी भी कहा जाता है |
लाला लाजपत राय , बाल गंगाधर तिलक , विपिन चंद्र पाल को ‘ लाल-बाल-पाल ‘ के नाम से भी जाना जाता है | साइमन कमीशन का विरोध करते समय लाठीचार्ज से लाला लाजपतराय घायल हुए जिसके कारण 17 नवंबर 1928 को उनकी मृत्यु हो गई | लाला लाजपत राय ने इटली के क्रांतिकारी मैजिनी के जीवनवृत्त को पढ़ने के बाद उन्हें अपना राजनीतिक गुरु माना तथा और में उन्होंने मैजिनी की उत्कृष्ट रचना ‘ द ड्यूटी ऑफ मैन ‘ का उर्दू में अनुवाद भी किया। बंगाल के विभाजन के विरोध में चलाए गए ‘ स्वदेशी आंदोलन ‘ के अरविंद घोष प्रमुख नेता थे | इस आंदोलन के अन्य प्रमुख नेता लाला लाजपत राय(पंजाब) , बाल गंगाधर तिलक (महाराष्ट्र) तथा बिपिन चंद्र पाल (बंगाल) थे | तिलक सेवा और बलिदान में विश्वास करते थे और उनमें सरकार की सत्ता को चुनौती देने का साहस था |
सर वेलेंटाइन शिरोल ने उन्हें भारत में ‘ अशांति का जन्मदाता ‘ कहा था | बाल गंगाधर तिलक को सजा सुनाए जाने के पश्चात प्रसिद्ध विद्वान मैक्स मूलर ने 17 जनवरी 1898 को प्रिवी काउंसिल के सदस्य सर जॉन लुब्बॉक को लिखे पत्र में दया की वकालत करते हुए कहा था कि ” संस्कृत के एक विद्वान के रूप में तिलक में मेरी दिलचस्पी है ” | 1908 ई. में बाल गंगाधर तिलक को ‘ केसरी ‘ में प्रकाशित लेखों के आधार पर राजद्रोह का मुकदमा चलाकर 6 वर्ष के कारावास की सजा देकर मांडले जेल (बर्मा ) जेल भेज दिया गया | तिलक को हुई इस सजा के विरोधस्वरुप बंबई के कपड़ा मिल मजदूरों ने देश में पहली राजनीतिक हड़ताल की थी | मांडले जेल में ही इन्होंने ‘ गीता रहस्य ‘ नामक पुस्तक लिखी थी| तिलक सांप्रदायिकतावादी नहीं थे।
वह प्रथम राष्ट्रवादी नेता थे, जिन्होंने जनता के निकट का संबंध स्थापित करने का प्रयत्न किया और इस दृष्टि में वे महात्मा गांधी के अग्रगामी थे। इस उद्देश्य से उन्होंने अखाड़े , लाठी क्लब , गो-हत्या विरोधी सभाएं स्थापित की | उन्होंने भारत में शिवाजी महोत्सव तथा गणपति पर्व आरंभ किया ताकि जनता में राष्ट्रसेवा की भावना जागे | बाल गंगाधर तिलक की 1 अगस्त 1920 को हुई मृत्यु के बाद उनकी अर्थी को महात्मा गांधी के साथ मौलाना शौकत अली तथा डॉक्टर सैफुदीन किचलू ने उठाया था | मौलाना हसरत मोहानी ने उस समय शोकगीत पढ़ा था |


वर्ष 1904 में दादाभाई ने भारत के लिए स्वशासन या स्वराज की मांग की। वर्ष 1906 में कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में इनकी अध्यक्षता में स्वदेशी आंदोलन, बहिष्कार आंदोलन, राष्ट्रीय शिक्षा और स्वशासन से संबध्द चार प्रस्ताव पारित किया गया।
बाल गंगाधर तिलक की 1 अगस्त, 1920 को हुई मृत्यु के बाद उनकी अर्थी को महात्मा गांधी के साथ मौलाना शौकत अली तथा डॉ. सैफुद्दीन किचलू ने उठाया था। मौलाना हसरत मोहानी ने उस समय शोक गीत पढ़ा था।
1908 में बाल गंगाधर तिलक को केसरी में प्रकाशित लेखों के आधार पर राजद्रोह का मुकदमा चलाकर 6 वर्ष के कारावास के सजा देकर मांडले जेल (बर्मा) भेज दिया गया था।
बंगाल के विभाजन के विरोध मे चलाए गए स्वदेशी आंदोलन के अरविंद घोष प्रमुख नेता थे। इस आंदोलन के अन्य प्रमुख नेता लाला लाजपत राय (पंजाब), बाल गंगाधर तिलक (महाराष्ट्र) तथा बिपिन चन्द्र पाल (बंगाल) थे।
लाला लाजपत राय ने इटली में क्रंतिकारी (राष्ट्रपिता) मैजिनी के जीवनवृत्तांत को पढने के बाद उन्हें अपना राजनीतिक गुरु मानता तथा बाद में उन्होने मैजिनी की उत्कृष्ट रचना द ड्यूटी ऑफ मैन का उर्दू में अनुवाद भी किया।
लाला लाजपत राय शेर–ए–पंजाब के नाम से भी जाने जाते थे। ये भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में गरम दल के नेता तथा पूरे पंजाब के प्रतिनिधि थे। इन्हें पंजाब केसरी भी कहा जाता है।


भारत में क्रांतिकारी आंदोलन

वी. डी. सावरकर (विनायक दामोदर सावरकर) द्वारा 1899 ईस्वी में स्थापित मित्र मेला ही वर्ष 1904 में एक गुप्त सभा अभिनव भारत में परिवर्तित हो गई। अभिनव भारत की शाखाएं महाराष्ट्र के अलावा कर्नाटक और मध्य प्रदेश में भी स्थापित की गई। 27 सितंबर, 1925 को केशव बलिराम हेडगेवार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की थी। इसका मुख्यालय नागपुर (महाराष्ट्र) में स्थित है।
जतींद्रनाथ मुखर्जी (1879-1915 ई.) बंगाल के क्रांतिकारी थे। वे विवेकानंद और अरविंद घोष के निष्ठावान अनुयायी और युगांतर, अनुशीलन समिति तथा गदर पार्टी सरीखी क्रांतिकारी समितियों के सक्रिय सदस्य रहे थे। ये बाघा जतिन के नाम से जाने जाते थे। अनुशीलन समिति की स्थापना मूलतः प्रथम मित्रा (पी. मित्रा) और पुलिन दास द्वारा की गई थी।
बारीन्द्र कुमार घोष तथा भूपेंद्रनाथ दत्त के सहयोग से वर्ष 1907 में कलकत्ता में क्रांतिकारी संगठन के रूप में अनुशीलन समिति का पुनर्गठन किया गया। अरविंद घोष भी इससे जुड़े थे। काम की सरलता के लिए इसका दूसरा कार्यालय ढाका में वर्ष 1908 में खोला गया। चापेकर बंधुओं दामोदर हरि चापेकर, बाल कृष्ण हरी चापेकर एवं वासुदेव हरि चापेकर 1896-97 ईसवी में पूना में व्यायाम मंडल की स्थापना की। इसकी स्थापना विशुध्द राजनीतिक उद्देश्य से की गई थी।
जून, 1897 में चापेकर बंधुओं ने पूना की प्लेग कमेटी के अध्यक्ष रैंड और लेफ्टिनेंट आयर्स्ट की हत्या कर दी थी। इन दोनों के हत्या के आरोप में दामोदर हरि चापेकर को फांसी दे दी गई इनकी गिरफ्तारी द्रविड़ बंधुओं की सूचना पर हुई थी। रैंड की हत्या को लेकर यह आरोप लगाया गया कि तिलक के नेतृत्व में पूना के ब्राह्मणों ने यह साजिश की थी, परंतु अंग्रेज सरकार तिलक के खिलाफ कोई सबूत नहीं जुटा सकी। जुलाई, 1897 में तिलक को भारतीय दंड संहिता की धारा 124-ए के तहत राजद्रोह के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया तथा उन पर मुकदमा चलाकर उन्हें 18 महीने की कैद की सजा दी गई जिसका देश भर में भारी विरोध हुआ।
इस कारण तिलक अखिल भारतीय नेता के रूप में लोकप्रिय हो गए और जनता ने उन्हें लोकमान्य की उपाधि दी। दिसंबर, 1909 में नासिक के जिला मजिस्ट्रेट जैक्सन को कर्वे गुट के अनन्त लक्ष्मण कन्हारे ने गोली मार दी। जैक्शन हत्याकांड में कन्हारे, कृष्ण गोपाल कर्वे और विनायक देश पांडे को गिरफ्तार कर फांसी दे दी गई। बी.डी. सावरकर को लंदन से गिरफ्तार करके नासिक लाया गया। इनके साथ और कई अन्य लोगों पर नासिक षड्यंत्र मुकदमा चला जिसमें सावरकर को आजीवन कारावास की सजा मिली। वर्ष 1908 की बर्रा डकैती का स्थान पूर्वी बंगाल में अवस्थित था। बर्रा डकैती करने वाले क्रांतिकारियों के समूह को पुलिन बिहारी दास ने नेतृत्व प्रदान किया था।
30 अप्रैल 1908 को बिहार के मुजफ्फरपुर में खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी ने किंग्सफोर्ड पर बम फेंका परंतु किंग्सफोर्ड बच गया और दुर्भाग्य से राष्ट्रीय आंदोलन से हमदर्दी रखने वाले मिस्टर केनेडी की पत्नी एवं पुत्री मारी गई। प्रफुल्ल चाकी ने पुलिस से बचने के लिए आत्महत्या कर ली तथा खुदीराम बोस को गिरफ्तार कर फांसी दे दी गई।
अलीपुर षड्यंत्र मामले (1908) में अरविंद घोष और उनके भाई बारींद्र घोष सहित 34 लोग अवैध हथियार रखने के आरोप में गिरफ्तार हुए थे। इस मामले में 15 लोगों को सजा हुई थी परंतु अरविंद घोष रिहा कर दिए गए थे। इस मामले में अरविंद घोष का बचाव एड़ी-चोटी का जोर लगाकर चितरंजन दास ने किया था। अलीपुर षड्यंत्र मामले में ही सरकारी गवाह नरेंद्र गोसाई की कन्हाई लाल दत्त और सत्येंद्र बोस ने जेल में गोली मारकर हत्या कर दी थी, जिसके कारण उन्हें फांसी की सजा हुई थी। देश में उचित ढंग से क्रांतिकारी आंदोलन का संचालन करने के उद्देश्य से अक्टूबर, 1924 में युवा क्रांतिकारियों ने कानपुर में एक सम्मेलन बुलाया था हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन नामक क्रांतिकारी संगठन की स्थापना की।
संस्थापक सचींद्र सान्याल (अध्यक्ष), रामप्रसाद बिस्मिल, जोगेश चंद्र चटर्जी तथा शेखर आजाद।  इस संस्था द्वारा 9 अगस्त 1925 को उत्तर रेलवे के लखनऊ-सहारनपुर संभाग के काकोरी नामक स्थान पर “आठ डाउन सहारनपुर-लखनऊ पैसेंजर ट्रेन” पर डकैती डालकर सरकारी खजाना लूटा गया। यह घटना काकोरी कांड के नाम से प्रसिद्ध हुई। इस कांड में 29 क्रांतिकारियों को गिरफ्तार किया गया, जिसमें राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाकउल्लाह, रोशन लाल तथा राजेंद्र लाहिड़ी को फांसी हुई, जबकि चंद्रशेखर आजाद फरार हो गए। हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के यही एकमात्र सदस्य थे जो कभी पुलिस की गिरफ्त में नहीं आए।
अंत में 27 फरवरी 1931 को इलाहाबाद में अल्फ्रेड पार्क में ये पुलिस मुठभेड़ में मारे गए। अशफाकउल्लाह खां भारतीय स्वतंत्रता के लिए फांसी पाने वाले पहले रिकॉर्डेड मुस्लिम थे, उन्हें काकोरी षड्यंत्र केस में फैजाबाद जेल में 19 दिसंबर 1927 को 27 वर्ष की अवस्था में फांसी दे दी गई थी। प्रसिद्ध क्रांतिकारी पंडित राम प्रसाद बिस्मिल को फांसी से 2 दिन पहले जब दूध पीने हेतु दिया गया तो इन्होंने अस्वीकार कर दिया और कहा “अब मैं केवल अपनी मां का दूध लूंगा”।
वर्ष 1928 में चंद्रशेखर आजाद के नेतृत्व में दिल्ली के फिरोजशाह कोटला मैदान में हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन की स्थापना हुई। इसका उद्देश्य भारत में एक समाजवादी गणतंत्रवादी राज्य की स्थापना करना था। साइमन कमीशन के विरोध के समय लाला लाजपतराय पर लाठियों से प्रहार करने वाले सहायक पुलिस अधीक्षक सांडर्स की 30 अक्टूबर, 1928 को भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद तथा राजगुरु द्वारा की गई हत्या इस संगठन की पहली क्रांतिकारी गतिविधि थी। हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (S.R.A.) के दो सदस्य भगत सिंह तथा बटुकेश्वर दत्त ने 8 अप्रैल 1929 को केंद्रीय विधान सभा में बम फेंका, दोनों को गिरफ्तार कर केंद्रीय एसेंबली बम कांड के अंतर्गत मुकदमा चलाया गया बाद में इस संगठन के अन्य सदस्यों को भी गिरफ्तार कर कुल 16 क्रांतिकारियों के ऊपर लाहौर षड्यंत्र कांड के अंतर्गत मुकदमा चलाया गया।
भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी हुई। 23 मार्च 1931 को इन तीनों को फांसी दी गई। चोरी-छिपे उनका अंतिम संस्कार फिरोजपुर जिले में सतलज नदी के तट पर कर दिया गया। आज उसी स्थान पर शहीद भगत सिंह स्मारक स्थित है, जहां प्रतिवर्ष 23 मार्च को हजारों लोग श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। इंकलाब जिंदाबाद का पहली बार नारे के रूप में प्रयोग भगत सिंह ने किया था। उन्होंने ही इस नारे को चर्चित बनाया। चटगांव शस्त्रागार धावे को मास्टर दा के नाम से प्रसिद्ध सूर्यसेन ने आयोजित किया था। सूर्यसेन ने बंगाल में इंडियन रिपब्लिकन आर्मी की स्थापना की थी। इसके सदस्यों ने अनंत सिंह, अंबिका चक्रवर्ती, लोकी नाथ, प्रीतिलता वाडेडार, गणेश घोष, कल्पना दत्त, आनंद गुप्ता तथा टेगराबल प्रमुख थे।
18 अप्रैल, 1930 को सूर्यसेन ने अंग्रेजो के विरुद्ध युद्ध की घोषणा की। सूर्यसेन के नेतृत्व में आई.आर.ए. के सदस्यों ने चटगांव शास्त्रागार पर आक्रमण कर हथियारों पर कब्जा कर लिया। 22 मई, 1930 को आई.आर.ए. के सदस्यों और सेना के बीच संघर्ष हुआ जिसमें 80 सैनिक और 12 क्रांतिकारी मारे गए। 16 फरवरी, 1933 को सूर्यसेन को गिरफ्तार कर लिया गया। उनके ऊपर मुकदमा चला तथा 12 जनवरी 1934 को उन्हें फांसी दे दी गई। लाहौर षड्यंत्र केस के अंतर्गत गिरफ्तार जतिनदास ने जेल में राजनीतिक बंदी का दर्जा प्राप्त करने के लिए भूख हड़ताल की। 64 दिन की भूख हड़ताल के बाद सितंबर, 1929 में उनकी मृत्यु हो गई। निष्क्रिय विरोध के सिद्धांत का प्रतिपादन अरविंद घोष ने अपनी पुस्तक वंदे मातरम ने किया था। सुभाष चंद्र बोस ने कांग्रेस के अध्यक्ष का पद त्याग करने के बाद 3 मई 1939 को फॉरवर्ड ब्लॉक की स्थापना की। दिसंबर, 1931 में बंगाल की दो स्कूली छात्राओं शांति घोष और सुनीति चौधरी ने एक जिलाधिकारी की गोली मारकर हत्या कर दी। जनवरी 1932 में बीना दास ने दीक्षांत समारोह में उपाधि ग्रहण करने के समय बहुत नजदीक से गवर्नर पर गोली चलाई। भगत सिंह ने कहा था “आलोचना और स्वतंत्र चिंतन एक क्रांतिकारी की दो विशेषताएं हैं।”


अभिनव भारत
स्थापना वर्ष                 – 1904 ई.

स्थान              – नासिक (महाराष्ट्र)

संस्थापक           – वी.डी. सावरकर

वी.डी. सावरकर (विनायक दामोदर सावरकर) द्वारा 1899 ई. में स्थापित मित्र मेला ही 1904 में एक गुप्त सभा अभिनव भारत में परिवर्तित हो गई।

27 सितंबर, 1925 को केशव बलिराम हेडगेवार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की थी। इसका मुख्यालय नागपुर (महाराष्ट्र) में स्थित है।
1908 की बर्रा डकैती का स्थान पूर्वी बंगाल में अवस्थित था। बर्रा डकैती करने वाले क्रांतिकारियों के समूह को पुलिन बिहारी दास ने नेतृत्व प्रदान किया था।
काकोरी कांड मे शामिल भारत के महान क्रांतिकारी नेता राम प्रसाद बिस्मिल ने सरफरोशी की तमन्ना गीत लिखा। काकोरी कांड में इन्हें गोरखपुर में फांसी दी गई।
पहली बार इंकलाब जिंदाबाद का नारे के रुप में प्रयोग भगत सिंह ने किया था। इन्होंने ही इस नारे को चर्चित बनाया।
फिरोजपुर में शहीद भगत सिंह स्मारक स्थित है। जहां प्रतिवर्ष 23 मार्च को हजारों लो श्रध्दांजलि अर्पित करते हैं।
सुखदेव
जन्म – 1907,

फांसी – 1931

फांसी दिए जाने के समय आयु – 24 वर्ष

अशफाकउल्लाह खाँ
जन्म – 1900

फांसी – 1927

फांसी के समय आयु – 27 वर्ष

खुदीराम बोस
जन्म – 3 दिसंबर, 1889

फांसी – 11 अगस्त, 1908

फांसी के समय आयु – 19 वर्ष 8 माह 8 दिन

हेमू कालणी
जन्म – 23 मार्च, 1923

फांसी – 21 जनवरी, 1943

फांसी के समय आयु – 19 वर्ष 9 माह, 28 दिन

संगठन –          संस्थापक/सह–संस्थापक
अभिनव भारत                     –             वी.डी. सावरकर

मित्र मेला                        –             वी.डी. सावरकर

इंडियन रिपब्लिकन आर्मी            –             एस. सेन

हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन         –             एस.एन. सान्याल 

जतिन दास – भूख हड़ताल
चन्द्रशेखर आजाद     –    मुठभेड़ के दौरान

भगत सिंह      –    फांसी

कल्पना दत्त     –    आजीवन कारावास

अभिनव भारत तथा अनुशीलन समिति दोनो क्रंतिकारी संगठन थे। इंडियन पैट्रियाट एसोसिएसन की स्थापना सर सैयद अहमद खां ने 1888 ई. में कांग्रेस के विरोध में की थी।
जनवरी, 1932 में बीना दास ने दीक्षांत समारोह में उपाधि ग्रहण करने के समय बहुत नजदीक से गवर्नर पर गोली चलाई।