History in Hindi for All Competitive Exams (State Level) Part 6

मगध का शासक अजातशत्रु (492-460 ई.पू.) अपने पिता हर्यंक वंश के संस्थापक बिंबिसार की हत्या कर राजगद्दी पर बैठा था। इसकी हत्या भी इसके पुत्र उदयिन (कौशांबी के वत्स राजा उदयन से भिन्न) ने कर दी थी।
पुराणों के अनुसार, मगध नरेश शिशुनाग ने अवंति नरेश प्रद्येत को पराजित कर अवंति (मालवा) को मगध साम्राज्य में मिला लिया।
मगध पर शिशुनाग वंश के पश्चात नंद वंश का वर्चस्व स्थापित हुआ। नंद वंश का संस्थापक महापद्मनंद अथवा उग्रसेन था। पुराणों में महापद्मनंद को सर्वक्षत्रांतक और अपरोपरशुराम कहा गया है।
कलिंग के चेदि वंश का सबसे प्रतापी शासक खारवेल था। इसके विषय में जानकारी का प्रमुख स्रोत इसका हाथीगुम्फा अभिलेख है। नंद वंशीय शासक महापद्मनंद द्वारा कलिंग में नहर खुदवाए जाने का उल्लेख इस अभिलेख मे किया गया है अर्थात् यह नहरों की जानकारी देने वाला प्रथम अभिलेखीय साक्ष्य है।
राजवंशों का क्रम –
हर्यंक वंश  – 544 ई.पू. से 412 ई.पू.

नंद वंश   – 344 ई.पू. से 323 ई.पू.

मौर्य वंश   – 323 ई.पू. से 184 ई.पू.

शुंग वंश   – 184 ई.पू. से 75 ई.पू.

गौतम बुध्द के समय का प्रसिध्द वैद्य जीवक बिंबिसार के दरबार से संबंधित था। बिंबिसार ने अपने राजवैद्य जीवक को अवंति नरेश चंड प्रद्योत के राज्य में चिकित्सा सेवा के लिए भेजा था।
काल्पी नगर उत्तर प्रदेश के जालौन जिले में स्थित एक नगर (स्थान) है। यह यमुना नदी के तट पर स्थित है। प्राचीनकाल में यह कालप्रिया के नाम से विख्यात थी, समय के साथ नाम संक्षिप्त होकर काल्पी हो गया। चौथी सदी में राजा वसुदेव द्वारा बसाया गया था।


यूनानी आक्रमण

·      छठी शताब्दी ई. पू. के मध्य ईरान में कुरुष अथवा साइरस द्वितीय (558-529 ईपू ) नामक महत्वाकांक्षी व्यक्ति ने हखामनी साम्राज्य की स्थापना की |
·      बेहिस्तून , पर्सिपोलिस तथा नक्श – ए-रुस्तम अभिलेख दारा प्रथम (522-486 ई पू) के शासनकाल का है। इस अभिलेख से भारत-पारसिक संबंधों के विषय में महत्वपूर्ण सूचना प्राप्त होती है। दारा प्रथम के साम्राज्य के 23 प्रांतो का उल्लेख उसके बेहिस्तून अभिलेख में हुआ है।
·      हेरोडोटस के विवरण से ज्ञात होता है कि भारत दारा के साम्राज्य का 20वां प्रांत था। दारा को इस प्रांत से 360 टैलेण्ट स्वर्ण धूलि की आय प्राप्त होती थी। टेसियस , अर्तजरक्सीन का राजवैद्य था। पारसिक संपर्क के परिणामस्वरूप भारत के पश्चिमोत्तर प्रदेशों में खरोष्ठी नामक नई लिपि का जन्म हुआ , जो ईरानी अरामेइक लिपि से उत्पन्न हुई थी। फारसी स्वर्ण मुद्रा ‘ डेरिक ‘ तथा रजत मुद्रा ‘ सिग्लोई ‘ कहलाती थी। ईरानी सिक्के सिग्लोई पश्चिमोत्तर प्रांतो में प्रचलित थे।


महापद्मनंद के उत्तराधिकारियों की संख्या पुराणों तथा बौद्ध ग्रंथों में 8 मिलती है। इस वंश का अंतिम शासक धनांनद था। जो सिकंदर का समकालीन था। उसे यूनानी लेखकों ने अग्रमीज कहा है। जेनोफोन उसे ‘ बहुत धनाड्य व्यक्ति ‘ बताता है। भद्दशाल उसका सेनापति था।
सिकंदर मैसीडोन का क्षत्रप फिलीप द्वितीय का पुत्र था। बचपन से उसकी इच्छा विश्व सम्राट बनने की थी। हखामनी साम्राज्य को ध्वस्त करने के पश्चात 327 ई पू के बसंत के अंत में एक विशाल सेना के साथ सिकंदर भारतीय विजय के लिए चला | लगभग दो वर्ष के अभियान के पश्चात 325 ई पू के सितंबर माह में सिकंदर ने पाटल से यूनान को प्रस्थान वापस किया। डॉ हेमचंद्र रायचौधरी ने 28 स्वतंत्र शक्तियों का उल्लेख किया है , जो उस समय पंजाब तथा सिंध के प्रदेशों में विद्यमान थी।
सिकंदर के आक्रमण के समय अश्वक एक सीमांत गणराज्य था। जिसकी राजधानी मस्सग थी। यूनानी लेखकों के अनुसार , सिकंदर के विरुद्ध हुए युद्ध में बड़ी संख्या में पुरुष सैनिकों के मारे जाने के पश्चात् यहां की स्त्रियों ने शस्त्र धारण किया। इसी विवरण से पता चलता है कि सिकंदर ने इस नगर की समस्त स्त्रियों को मौत के घाट उतार दिया था। पुरु ( पोरस ) का राज्य झेलम और चिनाब नदी के बीच बसा हुआ था।
सिकंदर ने झेलम के तट पर पुरू को पराजित किया। परंतु उसकी वीरता से प्रभावित होकर सिकंदर ने उसे अपना मित्र बना लिया तथा उसे अपना राज्य और कुछ अन्य इलाके प्रदान किए |सिकंदर ने दो नगरों ‘ निकैया ‘ और ‘ बडकेफला ‘ की स्थापना की |  व्यास नदी सिकंदर के उत्कर्ष का चरम बिंदु सिद्ध हुई | 
इसके सैनिकों द्वारा आगे बढ़ने से इंकार के पश्चात उसने स्वदेश लौटने का फैसला किया | 323 ई पू के लगभग सिकंदर की मृत्यु हो गई। सिंकदर के आक्रमण के परिणामस्वरूप पश्चिमोत्तर भारत में अनेक यूनानी उपनिवेश ( निकैया , बाउकेफला , सिकंदरिया ) स्थापित हो गए। व्यापारिक संपर्क के फलस्वरूप यूनानी मुद्राओं के अनुकरण पर भारत में ‘ उलूक ‘ शैली के सिक्के ढाले गए।


नंद वंश का अंतिम शासक घनानंद था, जो सिकंदर का समकालीन था। उसे यूनानी लेखकों ने अग्रमीज कहा है। जेनोफोन उसे बहुत धनाढ्य व्यक्ति बताता है। भद्दशाल उसका सेनापति था।
हखामनी साम्राज्य को ध्वस्त करने के पश्चात 327 ई.पू. के बसंत के अंत में एक विशाल सेना के साथ सिकंदर भारतीय विजय के लिए चला। लगभग दो वर्ष के अभियान के पश्चात 325 ई.पू. के सितंबर माह में सिकंदर ने पाटल से यूनान को प्रस्थान वापस किया, किंतु वह चन्द्रगुप्त मौर्य से पराजित नही हुआ था।
सिकंदर के आक्रमण के समय अश्वक एक सीमांत गणराज्य था। जिसकी राजधानी मस्सग थी। यूनानी लेखकों के अनुसार सिकंदर के विरुध्द हुए युध्द में बड़ी संख्या में पुरुष सैनिकों के बारे मारे जाने के पश्चात यहां की स्त्रियों ने शस्त्र धारण किया था।
सिकंदर झेलम नदी के तट पर पुरु को पराजित किया, परंतु उसकी वीरता से प्रभावित होकर सिकंदर ने उस अपना मित्र बना लिया यथा उसे अपना राज्य और कुछ नए इलाके प्रदान किए।
डाइमेकस सिकंदर के साथ भारत नही आया था। स्ट्रैबो के अनुसार, सीरिया के राजा एंटियोकस ने डाइमेकस नामक अपना एक राजदूत बिंदुसार की राज्य सभा में भेजा था।


मौर्य साम्राज्य

मौर्य राजवंश की स्थापना चंद्रगुप्त मौर्य ने की थी। वह भारत का प्रथम ऐतिहासिक सम्राट था। वह ऐसा पहला सम्राट था, जिसने वृहत्तर भारत पर अपना शासन स्थापित किया और जिसका विस्तार ब्रिटिश साम्राज्य से बड़ा था। * उसके साम्राज्य की सीमा ईरान से मिलती थी। उसने ही भारत को सर्वप्रथम राजनीतिक रूप से एकबद्ध किया।
विशाखदत्त कृत ‘ मुद्राराक्षस ‘ में चंद्रगुप्त को नंदराज का पुत्र माना गया है। मुद्राराक्षस में चंद्रगुप्त को ‘ वृषल ‘ तथा ‘ कुलहीन ‘ भी कहा गया है। धुंडिराज ने मुद्राराक्षस पर टीका लिखी थी। मुद्राराक्षस के अतिरिक्त विशाखदत्त के नाम से दो अन्य रचनाओं का भी उल्लेख प्राप्त होता है – (1) देवी चंद्रगुप्तम तथा (2) अभिसारिका वंचितक या अभिसारिका बंधितक ( अप्राप्य ) |
क्षेमेंद्र कृत ‘ बृहत्कथामंजरी ‘ तथा सोमदेव कृत ‘ कथासरित्सागर ‘ में चंद्रगुप्त के शुद्र उत्पत्ति के विषय में विवरण मिलता है। बौद्धग्रंथ का महाबोधिवंश के अनुसार , चंद्रगुप्त राजकुल से संबंधित था तथा वह मोरिय नगर में उत्पन्न हुआ था। हेमचंद्र के ‘ परिशिष्टपर्वन ‘ में चंद्रगुप्त को ‘ मयूर पोषकों के ग्राम के मुखिया के पुत्री का पुत्र ‘ बताया गया है।
विलियम जोंस पहले विद्वान थे , जिन्होने ‘ सैंड्रोकोट्स ‘ की पहचान मौर्य शासक चंद्रगुप्त मौर्य से की। * एरियन तथा प्लूटार्क ने चंद्रगुप्त मौर्य को एंड्रोकोट्स के रूप में वर्णित किया है। जस्टिन ने ‘ सैंड्रोकोट्स ‘ ( चंद्रगुप्त मौर्य ) और सिंकदर महान की भेंट का उल्लेख किया है।
ऋषि चानक ने अपने पुत्र का नाम चाणक्य रखा था। ‘ अर्थशास्त्र ‘ के लेखक के रूप में इसी पुस्तक में उल्लिखित ‘ कौटिल्य ‘ तथा एक पद्खंड में उल्लेखित ‘ विष्णुगुप्त ‘ नाम की साम्यता चाणक्य से की जाती है। अंशुल , अंशु , अंगुल , वात्सायन , कात्यायन आदि नाम भी इन्ही में से हैं। पुराणों में इसे ‘ द्विजर्षभ ‘ ( श्रेष्ठ ब्राह्मण ) कहा गया है। कौटिल्य (चाणक्य) द्वारा मौर्य काल में रचित अर्थशास्त्र शासन के सिद्धांतों की पुस्तक है। * इसमें राज्य के सप्तांग सिद्धांत – राजा , अमात्य , जनपद , दुर्ग , कोष , दंड एवं मित्र की सर्वप्रथम व्याख्या मिलती है। कौटिल्य का अर्थशास्त्र ऐतिहासिक ग्रंथ नही अपितु राजनीतिशास्त्र की अद्वितीय ग्रंथ है। इसकी तुलना ‘ मैक्यावेली ‘ के ‘ प्रिंस ‘ से की जाती है।
चंद्रगुप्त मौर्य ने दक्षिण भारत की विजय प्राप्त की थी। जैन एवं तमिल साक्ष्य भी चन्द्रगुप्त मौर्य की दक्षिण विजय की पुष्टि करते हैं।
राजनैतिक तौर पर समस्त भारत का एकीकरण चंद्रगुप्त मौर्य के नेतृत्व में संभव हुआ। प्रारंभिक विजयों के फलस्वरूप चंद्रगुप्त का साम्राज्य व्यास नदी से लेकर सिंधु नदी तक के प्रदेशों पर हो गया। रूद्रदामन के अभिलेख से पश्चिमी भारत पर उसका अधिकार प्रमाणित होता है। जैन ग्रंथों के अनुसार , सौराष्ट्र के साथ-साथ अवंति पर भी चंद्रगुप्त मौर्य का अधिकार था। उसकी मृत्यु के समय उसके साम्राज्य का विस्तार पश्चिम में हिंदुकुश पर्वत से पूरब मे बंगाल की खाड़ी तक तथा उत्तर में हिमालय की श्रृंखलाओं से दक्षिण में मैसूर तक था।
150 ई के रूद्रदामन के जूनागढ़ शिलालेख में आनर्त और सौराष्ट्र ( गुजरात ) प्रदेश में चंद्रगुप्त मौर्य के प्रांतीय राज्यपाल ‘ पुष्यगत ‘ द्वारा सिंचाई के बांध के निर्माण का उल्लेख मिलता है। जिससे यह सिद्ध होता है कि पश्चिम भारत का यह भाग मौर्य साम्राज्य में शामिल था। चंद्रगुप्त मौर्य ने सिंकदर के साम्राज्य के पूर्वी भाग के शासक सेल्यूक्स की आक्रमणकारी सेना को 305 ई. पू. में परास्त किया था।
यूनानी लेखक ने बिंदुसार को अमित्रचेट कहा है ,  विद्वानों के अनुसार अमित्रचेट का संस्कृत रूप है अमित्रघात या अमित्रखाद ( शत्रु का नाश करने वाला ) | जैन ग्रंथों में उसे  ‘ सिंहसेन ‘ कहते हैं | जैन ग्रंथ में बिंदुसार की माता का नाम ‘ दुर्धरा ‘  मिलता है | दिव्यावदान के अनुसार , बिंदुसार के समय में तक्षशिला में विद्रोह हुआ था जिसको दबाने के लिए उसने अपने पुत्र अशोक को भेजा था |
स्ट्रैबो के अनुसार , बिंदुसार के समय में मिस्र के राजा एंटीओकस ने डाइमेक्स नामक राजदूत भेजा | प्लिनी के अनुसार मौर्य राजदरबार में मिस्र के राजा टालमी द्वितीय फिलाडेल्फ्स ने डायनोसिस नामक राजदूत भेजा | बिंदुसार ने सीरिया के शासक एंटियोकस से 3 वस्तुओं की मांग की थी | ये वस्तुएं थी – मीठी मदिरा , सूखी अंजीर तथा दार्शनिक |
एंटियोकस ने दार्शनिक को छोड़कर शेष सभी वस्तुएं बिंदुसार के पास भेजवा दी। बौद्ध साक्ष्यों के अनुसार , अशोक अपने पिता के शासनकाल में अवंति ( उज्जयिनी) का उपराजा ( वाइसराय ) था। असम और सुदूर दक्षिण को छोड़कर संपूर्ण भारतवर्ष अशोक के साम्राज्य के अंतर्गत था। अशोक ने अपनी प्रजा के विशाल समूह को ध्यान में रखकर एक ऐसे व्यवहारिक धम्म की प्रतिपादन किया, जिसका पालन आसानी से सब कर सके।* सहिष्णुता , उदारता एवं करुणा उनके त्रिविध आयाम थे। अशोक 269 ई पू के लगभग मगध के राजसिंघाहसन पर बैठा। उसके अभिलेखों में सर्वत्र उसे ‘ देवनामप्रिय ‘ , ‘ देवानां प्रियदसि ‘ कहा गया है जिसका अर्थ है – देवताओं का प्रिय या देखने में सुंदर | पुराणों में उसे ‘ अशोकवर्द्धन ‘ कहा गया है। दशरथ भी अशोक की तरह ‘ देवानामप्रिय ‘ की उपाधि धारण करता था।


सिंहली अनुश्रुतियों – दीपवंश तथा महावंश के अनुसार , अशोक के राज्यकाल में ‘ पाटलिपुत्र ‘ में बौद्ध धर्म की तृतीय संगीति हुई। इसकी अध्यक्षता ‘ मोग्गलिपुत्त तिस्स ‘ नामक प्रसिद्ध बौद्ध भिक्षु ने की थी।
दीपवंश एवं महावंश के अनुसार , अशोक को उसके शासन के चौथे वर्ष ‘ निग्रोध ‘ नामक भिक्षु ने बौद्ध मत में दीक्षित किया। तत्पश्चात मोग्गलिपुत्र तिस्स के प्रभाव में आकर वह पूर्ण रूपेण बौद्ध हो गया। * दिव्यावदान के अनुसार , अशोक को उपगुप्त नामक बौद्ध भिक्षु ने बौद्ध धर्म में दीक्षित किया। मौर्य शासकों अशोक और उसका पौत्र दशरथ बौद्ध धर्म के अनुयायी थे।
अशोक के अभिलेखों में ‘ रज्जुक ‘ नामक अधिकारी का उल्लेख मिलता है |  रज्जुकों की स्थिति आधुनिक जिलाधिकारी जैसी थी , जिसे राजस्व तथा न्याय दोनों क्षेत्रों में अधिकार प्राप्त थे |  अग्रोनोमोई जिले के अधिकारी को कहा जाता था | मौर्य काल में व्यापारिक काफिलों ( कारवां ) को सार्थवाह की संज्ञा दी गई थी |  बौद्ध धर्म ग्रहण करने के उपरांत अशोक ने आखेट तथा विहार यात्रा रोक दी और उनके स्थान पर धर्म यात्राएं प्रारंभ की |
सर्वप्रथम उसने बोधगया की यात्रा की थी | उसकी यात्राओं का क्रम इस प्रकार है – गया , कुशीनगर , लुंबिनी , कपिलवस्तु , सारनाथ तथा श्रावस्ती | अशोक ने अपने राज्याभिषेक के दसवें वर्ष बोधगया की यात्रा की | 20वें वर्ष लुंबिनी की यात्रा की तथा वहां एक शिलास्तंभ स्थापित किया | बुद्ध की जन्म भूमि होने के कारण लुंबिनी ग्राम का धार्मिक कर माफ कर दिया गया तथा भू राजस्व 1/ 6 से घटाकर 1 / 8 कर दिया गया |
कालसी, गिरनार और मेरठ के अभिलेख ब्राह्मी लिपि में है | अशोक का इतिहास हमें मुख्यतः अभिलेखों से की ज्ञात होता है। उसके अभिलेखों का विभाजन 3 वर्ग में किया जा सकता है –
शिलालेख
स्तंभलेख
गुहालेख |
शिलालेख 14 विभिन्न लेखों का एक समूह है जो 8 भिन्न-भिन्न स्थानों से प्राप्त किए गए हैं , ये स्थान हैं –
शाहबाजगढ़ी
मानसेहरा
कालसी
गिरनार
धौली
जौगड़
एर्रागुडी
सोपारा |
अशोक के अधिकांश अभिलेख प्राकृत भाषा एवं ब्राह्मी लिपि में लिखे गए हैं केवल दो अभिलेख – शाहबाजगढ़ी , मानसेहरा की लिपि ब्राह्मी  ना होकर खरोष्ठी है | तक्षशिला से आरमेइक लिपि में लिखा गया एक भग्न अभिलेख , शरेकुना नामक स्थान से यूनानी तथा आरमेइक लिपियों में लिखा गया द्विभाषीय यूनानी एवं सीरियाई भाषा अभिलेख तथा लंघमान नामक स्थान से आरमेइक लिपि में लिखा गया अशोक की अभिलेख प्राप्त हुआ है। 
ब्राह्मी लिपि का प्रथम उद्धवाचन पत्थर की पट्टियों ( शिलालेखों ) पर उत्कीर्ण अक्षरों से किया गया था। इस कार्य को संपादित करने वाले प्रथम विद्वान सर जेम्स प्रिंसेप थे जिन्होने अशोक के अभिलेखों को पढ़ने का श्रेय हासिल किया | डीआर भंडारकर ने मात्र अभिलेखों के आधार पर अशोक का इतिहास लिखने का प्रयास किया है | प्राक् अशोक ब्राह्मी लिपि का पता श्रीलंका स्थित अनुराधापुर से चला। कुछ और स्थानों के अभिलेखों से इस प्रकार की लिपि का साक्ष्य मिला है जिसके नाम इस प्रकार है – पिपरहवां , सोहगौरा और महास्थान | प्राचीन भारत में खरोष्ठी लिपि दाएं से बाएं लिखी जाती थी। इसे पढ़ने का श्रेय मैसन , प्रिंसेप , नोरिस , लैसेन , कनिंधम , आदि विद्वानों को है। यह मुख्यतः उत्तर-पश्चिम भारत की लिपि थी | अशोक का नामोल्लेख करने वाला गुर्जरा लघु शिलालेख मध्य प्रदेश के दतिया जिले में स्थित है | मस्की , नेत्तूर एंव उड़ेगोलम के लेखों में भी अशोक का व्यक्तिगत नाम मिलता है।


भाब्रू ( बैराट ) स्तंभ लेख में अशोक ने स्वमं को मगध का सम्राट बताया है। (पियदसि लाजा मागधं संघं अभिवादेतूनं आहा अपाबा धतं च……)। यही अभिलेख अशोक को बौध्द धर्मावलंबी प्रमाणित करता है। अशोक के प्रथम शिलालेख में पशुबलि के निषेध के बारे में लेख इस प्रकार है – ” यहां कोई जीव मारकर बलि न दिया जाए और न कोई उत्सव किया जाए। पहले प्रियदर्शी राजा की पाकशाला में प्रतिदिन सैकड़ो जीव मांस के लिए मारे जाते थे, लेकिन अब इस अभिलेख के लिखे जाने तक सिर्फ तीन पशु प्रतिदिन मारे जाते थे – दो मोर एवं एक मृग, इसमें भी मृग हमेशा नही मारा जाता। ये तीनों भी भविष्य में नही मारे जाएंगे। * पांचवे स्तंभ लेख में भी अशोक द्वारा राज्याभिषेक के 26वें वर्ष बाद विभिन्न प्रकार के प्राणियों को वध को वर्जित करने का स्पष्ट उल्लेख है।
अशोक के राज्यकाल की पहली बड़ी घटना कलिंग युद्ध और इसमें अशोक की विजय थी। * अशोक के तेरहवें (XIII) शिलालेख से इस युद्ध के संदर्भ में स्पष्ट साक्ष्य मिलते हैं। * यह घटना अशोक के शासनकाल के आठवें वर्ष अर्थात् 261 ई पू में घटित हुई। इस शिलालेख में उसने कलिंग युद्ध से हुई पीड़ा पर अपना दुःख और पश्चाताप व्यक्त किया है।
अशोक के दीर्घ शिलालेख XII में सभी संप्रदायों के सार की वृद्धि होने की कामना की गई है तथा धार्मिक सहिष्णुता हेतु पालनीय उपाय बताए गए हैं। अशोक के दूसरे (II) एवं तेरहवें (XIII) शिलालेख में संगम राज्यों – चोल , पांड्या , सतियपुत्त एवं केरलपुत्त सहित ताम्रपर्णी ( श्रीलंका ) की सूचना मिलती है। मौर्य शासक अशोक के तेरहवें शिलालेख से यह ज्ञात होता है कि अशोक के पांच यवन राजाओं के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध थे- जिनमें अंतियोक ( एंटियोकस II थियोस – सीरिया का शासक ) , तुरमय या तुरमाय ( टालेमी II फिलाडेल्फ्स – मिस्र का राजा ) , अंतकिनी या एनिकीनी ( एंटीगोन्स गोनातास – मेसीडोनिया या मकदूनिया का राजा ) , मग , मकमास या मेगारस ( साइरीन का शासक ) , अलिक सुंदर या एलिरू संट्रो ( एलेक्जेंडर-एपाइरस – एपीरस का राजा) |
गोरखपुर जिले से प्राप्त सोहगौरा ताम्रपत्र अभिलेख और बोगरा जिले ( बांग्लादेश ) से प्राप्त महास्थान अभिलेख की रचना अशोक कालीन प्राकृत भाषा में हुई और उन्हें ईसा पूर्व तीसरी सदी की ब्राह्मी लिपि में लिखा गया। ये अभिलेख अकाल के समय किए जाने वाले राहत कार्यों के संबंध में हैं। इस अकाल की पुष्टि जैन स्रोतों से होती है।
मौर्य काल में न्यायालय मुख्यतः दो प्रकार के थे – धर्मस्थनीय तथा कंटकशोधन | धर्मस्थनीय ‘दीवानी ‘ तथा केंटकशोधन ‘ फौजदारी न्यायलय थे।गुप्तचरों को अर्थशास्त्र में ‘ गूढ़ पुरुष ‘ कहा गया है। अर्थशास्त्र में दो प्रकार के गुप्तचरों का उल्लेख मिलता है – ‘संस्था ‘ अर्थात् एक ही स्थान पर रहने वाले तथा ‘ संचरा ‘ अर्थात् प्रत्येक स्थान पर भ्रमण करने वाले |
मेगास्थनीज की ‘ इंडिका ‘ में पाटलिपुत्र के नगर प्रशासन का वर्णन मिलता है | इसके अनुसार पाटलिपुत्र नगर का प्रशासन 30 सदस्यों की विभिन्न समितियों द्वारा होता था। इसकी कुल 6 समितियां होती थी तथा प्रत्येक समिति में 5 सदस्य होते थे। तीसरी समिति जनगणना का हिसाब रखती थी | वर्तमान में भी यह कार्य नगरपालिका प्रशासन द्वारा किया जाता है | छठी समिति का कार्य बिक्री कर वसूल करना था। विक्रय कर मूल्य का दसवें भाग के रूप में वसूला जाता था। करों की चोरी करने वालो को मृत्युदंड दिया जाता था। वह नगर के पदाधिकारियों को एस्टिनोमोई कहता है।
मेगस्थनीज सेल्यूक्स निकेटर द्वारा चंद्रगुप्त मौर्य की राजसभा में भेजा गया यूनानी राजदूत था। * मौर्य युग में नगरों का प्रशासन नगरपालिकाओं द्वारा चलाया जाता था , जिसका प्रमुख ‘ नागरक ‘ या ‘पुरमुख्य ‘ था। * मेगास्थनीज ने तत्कालीन भारतीय समाज को सात श्रेणियों में विभाजित किया | जो इस प्रकार है –
1.    दार्शनिक
2.    कृषक
3.    पशुपालक
4.    कारीगर
5.    योद्धा
6.    निरीक्षक
7.    मंत्री |
·      मेगास्थनीज भारतीय समाज में दास प्रथा के प्रचलित होने का उल्लेख नहीं करता है। उसके अनुसार , मौर्य काल में कोई व्यक्ति न तो अपनी जाति से बाहर विवाह कर सकता था और न ही उससे भिन्न पेशा अपना सकता था।
इतिहासकार स्मिथ के अनुसार, हिंदुकुश पर्वत भारत की वैज्ञानिक सीमा थी। अशोक के अभिलेखों में मौर्य साम्राज्य के 5 प्रांतों के नाम मिलते हैं –
प्रांत

राजधानी

उत्तरापथ

तक्षशिला

अवंतिरट्ठ

उज्जयिनी

कलिंग

तोसली

दक्षिणापथ

सुवर्णगिरी

प्राच्य या पूर्वी प्रदेश

पाटलिपुत्र



भाग एवं बलि प्राचीन भारत में राजस्व के स्रोत थे | अर्थशास्त्र से ज्ञात होता है कि राजा भूमि का मालिक होता था, वह भूमि से उत्पन्न उत्पादन के एक भाग का अधिकारी था | इस कर को ‘ भाग ‘ कहते थे | इसी प्रकार ‘ बलि ‘ भी राजस्व का स्त्रोत था।
मौर्य मंत्रिपरिषद में राजस्व एकत्रित करने का काम समाहर्ता के द्वारा किया जाता था | अंतपाल सीमारक्षक या सीमावर्ती दुर्गों की देखभाल करता था जबकि प्रदेष्टा विषयों या कमिश्नरियों का प्रशासक था।
उपर्युक्त पदाधिकारियों के अतिरिक्त अन्य पदाधिकारी हैं –
पण्याध्यक्ष (वाणिज्य का अध्यक्ष)
सुराध्यक्ष , सूनाध्यक्ष (बूचड़खाने का अध्यक्ष)
गणिकाध्यक्ष (वेश्याओं का निरीक्षक)
सीताध्यक्ष (राजकीय कृषि विभाग का अध्यक्ष)
अकाराध्यक्ष (खानों का अध्यक्ष)
लक्षणाध्यक्ष (छापे खाने का अध्यक्ष)
लोहाध्यक्ष (धातु विभाग का अध्यक्ष)
नवाध्यक्ष (जहाजरानी का अध्यक्ष)
पतनाध्यक्ष (बंदरगाहों का अध्यक्ष)
गांवों के शासन को स्वायत्तशासी पंचायतों के माध्यम से संचालित करने की व्यवस्था का सूत्रपात मौर्यों ने किया | इस काल में ग्राम सभा गाँव से संबंधित किसी भी मुद्दे पर निर्णय देने के लिए स्वतंत्र थी।


अर्थशास्त्र में पति द्वारा परित्यक्त पत्नी के लिए विवाह विच्छेद की अनुमति दी गई है। मौर्यकालीन समाज में तलाक की प्रथा थी | पति के बहुत समय तक विदेश में रहने या उसके शरीर में दोष होने पर पत्नी उसका त्याग कर सकती है। इसी प्रकार पत्नी के व्यभिचारिणी होने या बन्ध्या होने पर पति उसका त्याग कर सकने का अधिकारी था।
मनुस्मृति के 38वें खंड में स्पष्ट उल्लेख है कि वह व्यक्ति जिसकी पत्नी मर गई हो वह पुनर्विवाह कर सकता है लेकिन विधवा (जिस स्त्री का पति मर गया हो अर्थात् Widow) को पुनर्विवाह की अनुमति नही है। विदेशियों को भारतीय समाज में मनु द्वारा व्रात्य क्षत्रिय ( fallen kshatriyas ) का सामाजिक स्तर दिया गया था। सारनाथ स्तंभ का निर्माण अशोक ने कराया था। इस स्तंभ के शीर्ष में सिंह की आकृति बनी है , जो शक्ति का प्रतीक है | इस प्रतिकृति को भारत सरकार ने अपने प्रतीक चिह्न के रूप में लिया है। * मौर्ययुगीन सभी स्तंभ चुनार के बलुए पत्थरों से निर्मित है।
स्थापत्य कला के दृष्टिकोण से सांची के स्तूप को सर्वश्रेष्ठ माना गया है। सांची मध्य प्रदेश के रायसेन जिले में स्थित है | इसका निर्माण अशोक ने कराया था। * इस स्तूप का आरंभिक काल तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व था | जबकि भरहुत का स्तूप म.प्र. के सतना जिले में स्थित है जिसकी तिथि दूसरी शताब्दी ई.पू. के लगभग है। सांची तथा भरहुत क स्तूपों की खोज एल्जेंडर कनिंघम ने की थी। अमरावाती का स्तूप आंध्र प्रदेश के गुंटूर जिले में कृष्णा नदी के दाहिने तट पर स्थित है, कर्नल कॉलिन मैकेंजी ने 1797 ई. में इस स्तूप का पता लगाया था। सारनाथ का धमेख स्तूप गुप्तकालीन है, जो बिना आधार के समतल भूमि पर बनाया गया है।
बिहार में पटना (पाटलिपुत्र) के समीप बुलंदीबाग एवं कुम्रहार में की गई खुदाई से मौर्य काल के लकड़ी के विशाल भवनों के अवशेष प्रकाश में आए है | * इन्हें प्रकाश में लाने का श्रेय स्पूनर महोदय को है। * बुलंदीबाग से नगर के परकोटे के अवशेष तथा कुम्रहार से राजप्रासाद के अवशेष प्राप्त हुए हैं। बुलंदीबाग, पाटलिपुत्र का प्राचीन स्थान था।* जिस महत्वाकांक्षी व्यक्ति ने 184 ई. पू. में अंतिम मौर्य शासक बृहद्रथ की हत्या करके शुंग राजवंश की स्थापना की वह इतिहास में पुष्यमित्र शुंग के नाम से विख्यात है। * शुंग वंश का अंतिम राजा देवभूति अत्यंत विलासी था , वह अपने अमात्य वासुदेव के षडयंत्रो द्वारा मारा गया | * वायु पुराण के अनुसार , अंतिम कण्व शासक सुशर्मा अपने आंध्र जातीय भृत्य सिमुक ( सिंधुक ) द्वारा मार डाला गया।
ई. पू. की कुछ शताब्दियों में चंद्रगुप्त मौर्य एवं अशोक ने गिरनार क्षेत्र में जल संसाधन व्यवस्था की ओर ध्यान दिया। उस क्षेत्र में चंद्रगुप्त मौर्य ने सुदर्शन झील खुदवाई तथा अशोक ने ईपू तीसरी शताब्दी में इससे नहरें निकाली | * शक क्षत्रप रूद्रदामन के जूनागढ़ अभिलेख में इन दोनों के कार्यों का वर्णन है। * जूनागढ़ के शासक रूद्रदामन ने इस झील की मरम्मत कराई थी |


चन्द्रगुप्त मौर्य की गणना भारत के महान शासकों में होती है। वह भारत का प्रथम ऐतिहासिक सम्राट था। वह ऐसा पहला सम्राट था, जिसने वृहत्तर भारत पर अपना शासन स्थापित किया और जिसका विस्तार ब्रिटिश साम्राज्य से बड़ा था। उसके साम्राज्य की सीमा ईरान से मिलती थी। उसने ही भारत को सर्वप्रथम राजनीतिक रुप से एकबध्द किया।
मौर्य राजवंश की स्थापना चंद्रगुप्त मौर्य ने की थी। इसके बाद कुषाण वंश, गुप्त राजवंश (319-550 ई.) और वर्धन राजवंश ने प्राचीन भारत पर शासन किया।
विशाखादत्त कृत मुद्राराक्षस से चन्द्रगुप्त मौर्य के विषय में विस्तृत सूचना प्राप्त होती है। इस ग्रंथ में चन्द्रगुप्त को नंदराज का पुत्र माना गया है। मुद्राराक्षस में चन्द्रगुप्त को वृषल तथा कुलहीन भी कहा गया है।
विलियम जोंस पहले विद्वान थे, जिन्होंने सैंड्रोकोट्स की पहचान मौर्य शासक चन्द्रगुप्त मौर्य से की। एरियन तथा प्लूटार्क ने चंद्रगुप्त मौर्य को एंड्रोकोट्स के रुप में वर्णित किया है, जबकि जस्टिन ने सैंड्रोकोट्स (चंद्रगुप्त मौर्य) और सिकंदर महान की भेंट का उल्लेख किया है।
कौटिल्य इतिहास में विष्णुगुप्त तथा चाणक्य इन दो नामों से भी विख्यात थे। जब मौर्य भारत का एकछत्र सम्राट बना तो कौटिल्य प्रधानमंत्री, महामंत्री तथा प्रधान पुरोहित के पद पर आसीन हुए। उन्होंने राजनीति शास्त्र पर अर्थशास्त्र नामक प्रसिध्द ग्रंथ की रचना की थी। यह भारत में राजशासन के ऊपर उपलब्ध प्राचीनतम रचना है।
ऋषि चानक ने अपने पुत्र का नाम चाणक्य रखा था। अर्थशास्त्र के लेखक के रुप में इसी पुस्तक में उल्लिखित कौटिल्य तथा एक पद्यखंड मे उल्लिखित विष्णुगुप्त नाम की चाणक्य से की जाती है। चाणक्य के अन्य अनेक नाम भी प्रचलित हैं। अंशुल, अंशु, अंकुल, वात्सायन, कात्यायन आदि नाम इन्ही में से हैं। पुराणों में उसे द्वीजर्षभ (श्रेष्ठ ब्राह्मण) कहा गया है।
सुह्रद (मित्र) राज्य के सप्तांग सिध्दांत के अनुसार, राज्य का सातवां अंग है। सुह्रद (मित्र) राज्य के कान हैं। राजा के मित्र शांति एवं युध्दकाल दोनों में ही उसकी सहायता करते हैं। इस संबंध में कौटिल्य सहज (आदर्श) तथा कृत्रिम मित्र में भेद करते हैं। सहज मित्र, कृत्रिम मित्र से अधिक श्रेष्ठ होता है। जिस राजा के मित्र लोभी, कामी तथा कायर होते हैं, उसका विनाश अवश्यंभावी है।
कौटिल्य क अर्थशास्त्र द्वारा चन्द्रगुप्त मौर्य के शासनकाल की बहुत-सी बातों का ज्ञान प्राप्त होता है। यह वस्तुतः ऐतिहासिक ग्रंथ नही है अपितु राजनीति शास्त्र का एक अद्वीतीय ग्रंथ है। इसमें मुख्यतः राजनीतिक नीतियों पर प्रकाश डाला गया है।
बिहार में पटना (पाटलिपुत्र) के समीप बुलंदीबाग एवं कुम्रहार मे की गई खुदाई से मौर्य काल के लकड़ी के विशाल भवनों के अवशेष प्रकाश में आए हैं। उन्हें प्रकाश में लाने का श्रेय स्पूनर महोदय को है। बुलंदीबाग से नगर के परकोटे के अवशेष तथा कुम्रहार के राजप्रसाद के अवशेष प्राप्त हुए हैं।
150 ई. के रुद्रदामन के जूनागढ़ शिलालेख में आनर्त और सौराष्ट्र (गुजरात) प्रदेश में चन्द्रगुप्त मौर्य के प्रांतीय राज्यपाल पुष्यगुप्त द्वारा सिंचाई के बांध के निर्माण का उल्लेख मिलता है, जिससे यह सिध्द होता है कि पश्चिम भारत का यह मौर्य साम्राज्य मे शामिल था।
मौर्य वंश के संस्थापक चन्द्रगुप्त मौर्य ने सिकंदर के साम्राज्य के पूर्वी भाग के शासक सेल्यूकस की आक्रमणकारी सेना को 305 ई.पू. में परास्त किया था।
अशोक ने अपनी प्रजा के विशाल समूह को ध्यान में रखकर ही एक ऐसे व्यावहारिक धम्म का प्रतिपादन किया, जिसका पालन आसानी से सब कर सके। अशोक का धम्म सदाचार का धर्म था, ये एक ऐसे नैतिक नियम थे, जिनका संप्रदाय विशेष से कोई संबंध नही था और  जो मानवता के कल्याण के लिए घोषित किए गए थे। सहिष्णुता, उदारता एवं करुणा उसके त्रिविध आयाम थे।
श्रीलंका अशोक के साम्राज्य में स्थित नही था। अशोक के द्वीतीय शिलालेख से स्पष्ट होता है कि भारत मे अशोक का अधिकार चोल पाण्ड्य, सत्तियपुत्त, केरलपुत्त एवं ताम्रपर्णी (श्रीलंका) को छोड़कर सर्वत्र था, क्योंकि इन राज्यों प्रत्यंत या सीमावर्ती राज्य कहा गया है।
अशोक के अभिलेखों को तीन वर्गों में विभाजित किया गया है – 1. शिलालेख स्तंभ लेख एवं 3. गुहालेख। अशोक के द्वीतीय वृहद् शिलालेख मे चोल, पाण्ड्य, सतियपुत्त, केरलपुत्त आदि दक्षिण भारतीय राज्यों का उल्लेख मिलता है।



अशोक 269 ई.पू. के लगभग मगध के राजसिंहासन पर बैठा। उसके अभिलेखों में सर्वत्र उसे देवनामप्रिय देवानां प्रियदसि कहा गया है। जिसका अर्थ है – देवताओं का प्रिय या देखने में सुंदर। इससे उसकी हिंदू धर्म मे आस्था के संकेत मिलते हैं।
सिंहली अनुश्रुतियों- दीपवंश तथा महावंश के अनुसार, अशोक के राज्यकाल में पाटलिपुत्र, में बौध्द धर्म की तृतीय संगीति हुई। इसकी अध्यक्षता मोग्गलिपुत्त तिस्स नामक प्रसिध्द बौध्द भिक्षु ने की थी।
मौर्य शासकों अशोक और उसका पौत्र दशरथ बौध्द धर्म के अनुयायी थे। दशरथ भी अशोक की तरह देवानांपिय की उपाधि धारण करता था।
अशोक के अभिलेखों में रज्जुक नामक अधिकारी का उल्लेख मिलता है। अपने चौथे स्तंभ लेख में अशोक रज्जुकों में पूर्ण विश्वास प्रकट करते हुए कहता है – जिस प्रकार माता-पिता योग्य धात्री के हाथों में बच्चे को सौंप कर आश्वस्त हो जाते हैं, उसी प्रकार मैंने ग्रामीण जनता के सुख के लिए रज्जुकों की नियुक्ति की  है। रज्जुकों की स्थिति आधुनिक जिलाधिकारी जैसी थी, जिसे राजस्व तथा न्याय दोनों क्षेत्रों में अधिकार प्राप्त थे।
मौर्यकाल में व्यापारिक काफिलों (कारवां) को सार्थवाह की संज्ञा दी गई थी। इसका उल्लेख कौटिल्य कृत अर्थशास्त्र से भी प्राप्त होता है।
अशोक के लेखों में उसके प्रशासन के कुछ महत्वपूर्ण पदाधिकारियों के नाम मिलते हैं। अशोक के तृतीय शिलालेख में तीन पदाधिकारियों के नाम मिलते हैं। ये तीनों पदाधिकारी हैं –
युक्त – ये जिले के अधिकारी होते थे, जो राजस्व वसूल करते थे।
राजुक – ये भूमि का पैमाइश करने वाला अधिकारी था। ये आज-कल के बंदोबस्त अधिकारी की भांति होते थे।
प्रादेशिक – यह मंडल का प्रदान अधिकारी था। यह वर्तमान में संभागीय आयुक्त की तरह था इस न्याय का भी कार्य करना पड़ता था।
ब्राह्मी लिपि का प्रथम उद्वाचन पत्थर की पट्टियों (शिलालेखों) पर उत्कीर्ण अक्षरों से किया गया था। इस कार्य को संपादित करने वाले प्रथम विद्वान सर जेम्स प्रिसेंप थे जिन्होंने अशोक के अभिलेखों को पढ़ने का श्रेय हासिल किया।
प्राचीन भारत में खरोष्ठी लिपि दाएँ से बाएँ लिखी जाती थी। इसे पढ़ने का श्रेय मैसन, प्रिंसेप, नोरिस, लैसेन, कनिंघम आदि विद्वानों को है। यह मुख्यतः उत्तर-पश्चिम भारत की लिपि थी।
अशोक के प्रस्तर स्तंभ स्थापत्य संरचना के भाग नही हैं बल्कि ये पृथक रचनाएँ हैं।
अशोक का इतिहास हमें मुख्यतः उसके अभिलेखों से ही ज्ञात होता है। उसके अभी तक 40 से अधिक अभिलेख प्राप्त हो चुके हैं। मास्की, गुर्जरा, नेत्तूर एवं उडेगोलम के लेखों मे अशोक का व्यक्तिगत नाम भी मिलता है।
अशोक ने अपने राज्याभिषेक के बीसवें वर्ष लुंबिनी की यात्रा की तथा वहां एक शिलास्तंभ स्थापित किया। बुध्द की जन्मभूमि होने के कारण लुंबिनी ग्राम का धार्मिक कर माफ कर दिया तथा भू-राजस्व 1/6 से घटाकर 1/8 कर दिया।

अशोक के दूसरे (II) एवं तेरहवें (XIII) शिलालेख मे सगम राज्यों-चोल, पाण्डय, सतियपुत्त एवं केरलपुत्त सहित ताम्रपर्णी (श्रीलंका) की सूचना मिलती है।
अशोक के प्रथम शिलालेख में पशु बलि निषेध के संदर्भ में लेख इस प्रकार हैं – यहां कोई जीव मारकर बलि न दिया जाए और न कोई उत्सव किया जाए। पहले प्रियदर्शी राजा की पाकशाला में प्रतिदिन सैंकड़ों जीव मांस के लिए मारे जाते थे, लेकिन अब इश अभिलेख के लिखे जाने तक सिर्फ तीन पशु प्रतिदिन मारे जाते हैं – दो मोर एवं एक मृग, इसमें भी मृग स्तंभ लेख में  भी अशोक द्वारा राज्याभिषेक के 26वें वर्ष बाद विभिन्न प्रकार के प्राणियों के वध को वर्जित करने का स्पष्ट उल्लेख है।
गोरखपुर जिले से प्राप्त सोहगौरा ताम्रपत्र अभिलेख और बोगरा जिले (बांग्लादेश) से प्राप्त महास्थान अभिलेख की रचा अशोक कालीन प्राकृत भाषा में हुई और उन्हें ईसा पूर्व तीसरी सदी की ब्राह्मी लिपि मे लिखा गया। ये अभिलेख अकाल के समय किए जाने वाले राहत कार्यों के संबंध मे हैं। इस अकाल की पुष्टि जैन स्रोतों से होती है।
अशोक ने अपने राज्याभिषेक के 8वें वर्ष कलिंग पर विजय प्राप्त कर उसे मौर्य साम्राज्य में शामिल कर लिया था। दक्षिण के साथ सीधे संपर्क के लिए समुद्री तथा स्थल मार्ग पर मौर्य का नियंत्रण आवश्यक था। यदि कलिंग स्वतंत्र देश रहता, तो समुद्री और स्थल मार्ग से होने वाले व्यापार में रुकावट पड़ सकती थी, अतः कलिग को मगध साम्राज्य में मिलाना आवश्यकत था।
धार्मिक आधार पर भूमिदान का प्रथम साक्ष्य मौर्योत्तर युगीन राजवंश सातवाहन के समय के एक अभिलेख से प्राप्त होता है। मौर्यकालीन शासकों ने धार्मिक आधार पर कोई भूमि दानस्वरुप नही दी थी। भूमिदान के विरुध्द कृषकों के विद्रोह का कोई वर्णन नही प्राप्त होता है।
भाग एवं बलि प्राचीन भारत में राजस्व के स्रोत थे। अर्थशास्त्र से ज्ञात होता है कि राजा भूमि का मालिक होता था, वह भूमि से उत्पन्न उत्पादन के एक भाग का अधिकारी था। इस कर को भाग कहते थे। इसी प्रकार बलि भी राजस्व का स्रोत था।
मौर्य काल में सीताध्यक्ष कृषि भूमि का अध्यक्ष था, वही भूमि कर वसूलने का कार्य करता था, जबकि अग्रोनोमोई जिले के अधिकारियों को कहा जाता था, शुल्काध्यक्ष विभिन्न प्रकार के व्यवसाय एवं व्यापार कर वसूलता था तथा अक्राध्यक्ष खानों का नियंत्रण करता था।
मौर्य मंत्रिपरिषद में राजस्व एकत्र करने का कार्य समाहर्ता के द्वारा किया जाता था। अंतपाल सीमा रक्षक या सीमावर्ती दुर्गों की देखभाल करता था, जबकि प्रदेष्टा विषयों या कमिश्नरियों का प्रशासक था।
मौर्ययुगीन अधिकारी पौतवाध्यक्ष तौल-मान का प्रभारी था। पण्याध्यक्ष वाणिज्य विभाग तथा सूनाध्यक्ष बूचड़खाने के प्रभारी थे।
पंकोदकसन्निरोधे मौर्य प्रशासन में सड़क पर जल और कीचड़ इकठ्ठा करने या कीचड़ फेंकने के कारण लिया जाने वाला जुर्माना था।
भारत में सांस्कृतिक इतिहास मे संदर्भ में इतिवृत्तों इतिहासों तथा वीरगाथाओं को कंठस्थ करने का व्यवसाय मगध एवं सूत वर्गों का था।
गांवो के शासन को स्वायत्तशासी पंचायतों के माध्यम से संचालित करने की व्यवस्था का सूत्रपात मौर्यों ने किया। यह व्यवस्था उस समय गांवों के प्रशासन का आधार की। मौर्य काल में ग्राम सभा, गांव से संबंधित किसी भी मुद्दे पर निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र थी।
अर्थशास्त्र में पति द्वारा परित्यक्त पत्नी के लिए विवाह विच्छेद की अनुमति दी गई है। मौर्यकालीन समाज में तलाक की प्रथा थी। पति के बहुत समय तक विदेश में रहने या उसके शरीर में दोष होने पर पत्नी उसका त्याग कर सकती थी। इसी प्रकार पत्नी के व्यभिचारिणी होने या बन्ध्या होने जैसी दशाओँ में पति उसका त्याग कर सकने का अधिकारी था।
मनुस्मृति के 38वें खंड मे स्पष्ट उल्लेख है कि वह व्यक्ति, जिसकी पत्नी मर गई हो (विधुर) पुनर्विवाह कर सकता है लेकिन विधवा (जिस स्त्री का पति मर गया हो अर्थात् विडो) को पुनर्विवाह की अनुमति नही है।
विदेशियों को भारतीय समाज में मनु द्वारा व्रात्य क्षत्रिय का सामाजिक स्तर दिया गया था।
जस्टिन आदि यूनानी लेखकों ने चन्द्रगुप्त मौर्य को सैंड्रोकोट्स कहा है। विलियम जोंस ने सर्वप्रथम सैंड्रोकोट्स की पहचान भारतीय ग्रंथों के चन्द्रगुप्त मौर्य से की थी। यूनानी लेखकों ने बिंदुसार को अमित्रचेट कहा है, विद्वानों के अनुसार, अमित्रचेट का संस्कृत रुप है अमित्रघात या अमित्रखाद (शत्रुओ का नाश करने वाला) मौर्य सम्राट अशोक को पियदसि संबोधित किय गया है,  जबकि चन्द्रगुप्त मौर्य के प्रधानमंत्री चाणक्य का एक नाम विष्णुगुप्त था।
अंतिम मौर्य शासक बृहद्रथ था। बृहद्रथ की हत्या इसके सेनापति पुष्यमित्र शुंगे के द्वारा 184 ई.पू. में की गई।
दक्षिणी बिहार के गया जिले में स्थित बराबर नामक पहाड़ी पर कुल चार गुफाएँ स्थित हैं, जिनमें से तीन गुफाओं की दीवारों पर अशोक के लेख उत्कीर्ण मिले हैं। इनमें अशोक द्वारा आजीवक सम्प्रदाय के साधुओं के निवास के लिए गुफा दान में दिए जाने का विवरण सुरक्षित है। चट्टानों को काटकर बनाई गई इन गुफाओं का संबंध मौर्यकाल (322-185 ई.पू.) से है। इन गुफाओं में उत्कीर्ण अभिलेख तीसरी सदी ई.पू. से संबंधित हैं।


मौर्योत्तर काल

रुद्रदामन ( 130-150 ई. ) का जूनागढ़ अभिलेख गुजरात में गिरनार पर्वत पर प्राप्त हुआ है | ब्राह्मी लिपि में उत्कीर्ण संस्कृत भाषा का यह अभिलेख अब तक प्राप्त संस्कृत अभिलेखों में सर्वाधिक प्राचीन है | इस अभिलेख में संस्कृत काव्य शैली का प्राचीनतम नमूना प्राप्त होता है | इसमें रुद्रदामन की वंशावली , विजयों , शासन , व्यक्तित्व आदि पर सुंदर प्रकाश डाला गया है | इस अभिलेख का मुख्य उद्देश्य सुदर्शन झील के बांध  के पुनर्निर्माण का विवरण सुरक्षित रखना था|
कुजुल कडफिसेस ने भारत में सर्वप्रथम पश्चिमोत्तर प्रदेश पर अधिकार कर लिया | इसने केवल तांबे के सिक्के जारी किए | विम कडफिसेस ने स्वर्ण एवं तांबे के सिक्के चलाए थे | शिव , त्रिशूल तथा नंदी की आकृति इसके सिक्कों पर मिलती है |इसने ‘ महेश्वर ‘नामक  उपाधि धारण की थी।
उत्तर पश्चिम भारत में स्वर्ण सिक्कों का प्रचलन इंडो – ग्रीक ( हिंद यवन ) राजाओं ने करवाया था जबकि इन्हें नियमित एवं पूर्णरूप से प्रचलित करवाने का श्रेय कुषाण शासकों को जाता है | * कुषाण शासकों ने स्वर्ण एवं ताम्र दोनों ही प्रकार के सिक्को को व्यापक पैमाने पर प्रचलित किया था।
कुषाण शासकों में विम कडफिसेस ने सर्वप्रथम सोने के सिक्के जारी किए थे| कुषाण शासक कनिष्क के सिक्कों पर बुद्ध का अंकन मिलता है।
यौधेयों का प्रमाण पुराण , अष्टाध्यायी तथा वृह्त्संहिता इत्यादि ग्रंथों से प्राप्त होता है। इनका साम्राज्य दक्षिण-पूर्वी पंजाब तथा राजस्थान के बीच था। इनके सिक्कों पर कार्तिकेय का अंकन मिलता है।
* कनिष्क के सारनाथ बौद्ध अभिलेख की तिथि 81 ई है। यह प्रतिमा मथुरा से लाकर कनिष्क के राज्यारोहण (78 ई) के तीसरे वर्ष सारनाथ में स्थापित की गई थी। * कनिष्क के रबतक अभिलेख में 4 शहरों के नाम का उल्लेख मिलता है|  यह है – साकेत , कौशांबी , पाटलिपुत्र तथा चंपा |

जैन ग्रंथों के अनुसार , विक्रमादित्य ( 57 ईपू ) के उत्तराधिकारी को 135 विक्रम संवत मे शको ने पराजित कर उसके उपलक्ष्य में शक संवत चलाया था | * इस प्रकार इसकी प्रारंभिक तिथि 135 – 57 = 78 ईसवी  आती है | * अधिकांश इतिहासकारों ने कुषाण शासक कनिष्क को इसका प्रवर्तक माना है |
वर्तमान में तिथि एवं वर्ष के लिए ग्रेगोरियन कैलेंडर का प्रयोग किया जाता है जो कि विश्वव्यापी है | वर्तमान कैलेंडर से 57 जोड़ देने पर विक्रम संवत तथा 78 घटा देने पर शक संवत प्राप्त होता है | चैत्र भारतीय राष्ट्रीय पंचांग का प्रथम माह होता है | विक्रम संवत के दो अन्य नाम भी मिलते हैं – कृत संवत् तथा मालव संवत् | भारत में राष्ट्रीय कैलेंडर के रूप में शक संवत को अपनाया गया है |


अश्वघोष कनिष्क के राजकवि थे। सौंदरानंद , बुद्ध चरित तथा सारिपुत्रप्रकरण उनकी प्रमुख रचनाएं हैं | * वसुमित्र भी कनिष्क के आश्रित विद्वान थे , इन्होंने चतुर्थ बौद्ध संगीति की अध्यक्षता भी की थी | * अश्वघोष , नागार्जुन , पार्श्व तथा चरक यह चारों ही कनिष्क के दरबार से संबंधित थे | *  पतंजलि ने पाणिनी की अष्टाध्यायी पर महाभाष्य की रचना की थी |* महर्षि पतंजलि शुंगकालीन विद्वान थे तथा उन्होंने ऐसे लोगों को शिष्य बनाया था जो बिना किसी अध्ययन के ही संस्कृत बोल लेते थे |
कुषाण वंश के साम्राज्य की सीमाएं भारतीय उपमहाद्वीप पर बाहर तक फैली थी | * इस वंश का महान शासक कनिष्क था , जिसकी सीमाएं उत्तर में चीन के तुरफान एवं कश्मीर से लेकर दक्षिण में विंध्य पर्वत तथा पश्चिम में उत्तरी अफगानिस्तान से लेकर पूर्व में पूर्वी उत्तर प्रदेश व बिहार तक विस्तृत थी।
पेरीप्लस ऑफ द एरीथ्रियन सी और अरिकामेडु में हुई खुदाई से ऐसे अनेक बंदरगाह और व्यापारिक केंद्रों की उपस्थिति के साक्ष्य मिले हैं जिनसे यह स्पष्ट होता है कि कुषाणों का व्यापार पश्चिमी विश्व से फारस की खाड़ी और लाल सागर के जल मार्ग से होता था | * इन सभी साक्ष्यों में किसी में भी कुषाण की सशक्त नौसेना की उपस्थिति का उल्लेख नहीं मिलता है |
कुषाण शासक कनिष्क के काल में कला क्षेत्र में दो स्वतंत्र शैलियों का विकास हुआ –
गांधार शैली
मथुरा शैली |
भारतीय और यूनानी आकृति की सम्मिश्रण शैली गांधार शैली है | इस कला शैली के प्रमुख संरक्षक शक एवं कुषाण थे। इस कला का विषय मात्र बौद्ध होने के कारण इसे ‘ यूनानी – बौद्ध ‘ ( greeco-buddhist ) , इंडो ग्रीक ( indo-greece ) , ग्रीको रोमन ( greeco roman ) भी कहा जाता है |  गांधार कला में सदैव हरित स्तरित या शिष्ट चट्टान  का प्रयोग ही मूर्तियां बनाने के लिए किया जाता था | अफगानिस्तान का बामियान , पहाड़ियों को काटकर बनवाई गई बुद्ध प्रतिमाओं के लिए प्रसिद्ध था लेकिन अफगानिस्तान में तालिबान शासन ने इन बुद्ध प्रतिमाओं को नष्ट करवा दिया |
कुषाणकाल (प्रथम शती ई) में बाल विवाह की प्रथा प्रारंभ हुई थी | स्त्रियों में उपनयन की समाप्ति तथा बाल विवाह में प्रचलन से उन्हें समाज में अत्यंत निम्न स्थिति में ला दिया |
भारत में ब्राह्य आक्रमकों के कालो का सही कालानुक्रम है – यूनानी (326 ई पू सिंकदर महान), शक ( सीथियन – ceythian ) , कुषाण ( पहली शताब्दी ई ) |
ईरानी शासक डेरियस प्रथम (522-486 ई पू) ने सर्वप्रथम भारत के कुछ भागों को अपने अधीन किया था | हेरोडोटस के अनुसार , डेरियस प्रथम के साम्राज्य में संपूर्ण सिंधु घाटी का प्रदेश शामिल था। तथा पूर्व की ओर इसका विस्तार राजपूताना के रेगिस्तान तक था |
मेनाण्डर तथा उसके पुत्र स्ट्रेटों प्रथम के सिक्के मथुरा से मिले हैं | बौद्ध भिक्षु नागसेन के प्रभाव में मेनासुर ने बौद्ध धर्म ग्रहण कर लिया। स्ट्रैटो II ने सीसे के सिक्के जारी किए थे | इस हिंद-यवन शासक का शासन 25 ई पू से 10 ईस्वी तक माना जाता है।
184 ई पू में पुष्यमित्र शुंग ने अंतिम मौर्य शासक बृहद्रथ की हत्या करके शुंग राजवंश की स्थापना की |पुराणों के अनुसार पुष्यमित्र शुंग ने 36 वर्षों तक शासन किया | महर्षि पाणिनि ने ‘शुंगवंश ‘ को ‘ भारद्वाज गोत्र ‘ का ब्राह्मण बताया है | अय़ोध्या के लेख से ज्ञात होता है कि पुष्यमित्र ने दो अश्वमेघ यज्ञ किए थे। पतंजलि पुष्यमित्र शुंग के पुरोहित थे। शुंग वंश का 9वां शासक भागवत अथवा भागभद्र था | इसके शासनकाल में तक्षशिला के यवन नरेश एंटियालकीड्स का राजदूत हेलिओडोरस उसके विदिशा राज दरबार में उपस्थित हुआ था | हेलिओडोरस ने भागवत धर्म ग्रहण किया तथा विदिशा (बेसनगर) में गरुड़ स्तंभ की स्थापना कर भगवान विष्णु की पूजा की | शुंग वंश के अंतिम राजा देवभूति अपने अमात्य वासुदेव के षड्यंत्रों द्वारा मार डाला गया | वासुदेव ने जिस नवीन राजवंश की स्थापना की वह ‘कण्व ‘ या ‘कण्वायन ‘ के नाम से जाना जाता है |
मौर्यों के बाद दक्षिण भारत में सबसे प्रभावशाली राज्य सातवाहनों का था। * पुराणों में इस वंश के संस्थापक का नाम सिंधुक, सिमुक या शिप्रक दिया गया है, जिसने कण्व वंश के राजा सुशर्मा का वध करके अपना शासन स्थापित किया था।


पुराणों में कुल तीस सातवाहन राजाओं के नाम मिलते हैं |जिनमें से सबसे लंबी सूची मत्स्य पुराण में 19 राजाओं की मिलती है | ये हैं –
पूर्णोत्संग
स्कंधस्तंभि
शातकर्णि
लंबोदर
अपीलक
मेघस्वाति
स्वाति
स्कंधस्वाति
मृगेंदु
कुंतलस्वाति
स्वातिकर्ण
पुलुमावि-I
गौर कृष्ण
हाल
मंदूलक
पुरींद्रसेन
सुंदर स्वातिकीर्ति
चकोर स्वातिकीर्ति
शिव स्वाति |
सातवाहनों की वास्तविक राजधानी प्रतिष्ठान या पैठन में अवस्थित थी। * पुराणों में इस राजवंश को आंध्रभृत्य या आंध्र जातीय कहा गया है। * उनकी आरंभिक राजधानी अमरावती मानी जाती है। * पुराणों के अनुसार , कृष्ण का पुत्र एवं उत्तराधिकारी शातकर्णी प्रथम सातवाहन वंश का सातकर्णि उपाधि धारण करने वाला प्रथम राजा था। * इसके शासन के बारे में हमें नागनिका के नानाघाट अभिलेख से महत्वपूर्ण जानकारी मिलती है।
सातवाहन शासक गौतमीपुत्र सतकर्णी ने कहा है कि उसने विछिन्न होते चातुर्वर्ण्य ( चार वर्णों वाली व्यवस्था ) को फिर से स्थापित किया और वर्णसंकर ( वर्णों और जातियों के सम्मिश्रण) को रोका | * इसी कारण इसे वर्ण व्यवस्था का रक्षक कहा जाता है।* गौतमीपुत्र शातकर्णी को नासिक अभिलेख में ‘ अद्वितीय ब्राह्मण ‘ ( एक ब्राह्मण ) तथा ‘ वेदों का आश्रय ‘ कहा गया है | * वशिष्ठि पुत्र पुलुमावी को दक्षिणापथेश्वर कहा गया है | * दो पतवारों वाले जहाज का चित्र उसके कुछ सिक्कों पर बना हुआ है | इस वंश का अंतिम शासक यज्ञश्री शातकर्णि था |
कलिंग के चेदि वंश का संस्थापक महामेघवाहन था | कलिंग का चेदि वंश के शासक खारवेल प्राचीन भारतीय इतिहास के महानतम सम्राटों में से एक था | उड़ीसा प्रांत के भुवनेश्वर से 3 मील की दूरी पर स्थित उदयगिरी पहाड़ी की ‘ हाथी गुम्फा ‘  से उसका एक बिना तिथि का अभिलेख प्राप्त हुआ है | * इसमें खारवेल के बचपन , शिक्षा , राज्य अभिषेक तथा राजा बनने के 13 वर्षों तक के शासनकाल की घटनाओं का विवरण दिया हुआ है | *  यह अभिलेख खारवेल का इतिहास जानने का एकमात्र स्रोत है | * इस अभिलेख से पता चलता है कि खारवेल ने दक्षिण के तीनों राज्यों चोल , चेर एवं पाण्ड्यों को पराजित किया था। * पाण्ड्य शासक से उसने गधे से हल चलवाया था। * इसका जैन धर्म के प्रति भारी झुकाव था।
पूर्वी रोमन शासक जस्टिनियन को सर्वाधिक प्रसिद्धि उसके न्याय संबंधी सुधारों से मिली | * जस्टिनियन रोमन कानून के संपूर्ण संसाधन के लिए उत्तरदायी था।
स्ट्रैटो II ने सीसे के सिक्के जारी किए थे। इस हिंद-यवन शासक का शासन 25 ईसा पूर्व से 10 ईसवी तक माना जाता है।
बिंबिसार (544-492 ई.पू.) मगध साम्राज्य की महत्ता का वास्तविक संस्थापक था। वह हर्यंक कुल से संबंधित था। प्रसेनजित कोसल महाजनपद का राजा था। वह महात्मा बुध्द का समकालीन था। गौतम बुध्द (563-482 ई.पू.) ने बोध्द धर्म का प्रवर्तन किया। मिनांडर, जिसे मिलिंद के नाम से जाना से भ जाना जाता है, उत्तर  भारत में इंडो-ग्रीक राजा था। इसका समय 155 अथवा 150 से 130 ई.पू. था। इस प्रकार बिंबिसार, गौतम बुध्द एवं प्रसेनजित तीनों समकालीन थे, जबकि मिलिंद इनका समसामायिक नही था।
रुद्रदामन (130-150 ई.) का जूनागढ़ अभिलेख गुजरात में गिरनार पर्वत पर प्राप्त हुआ है। ब्राह्मी लिपि में उत्कीर्ण संस्कृत भाषा का यह अभिलेख अब तक प्राप्त संस्कृत अभिलेखों में सर्वाधिक प्राचीन है। इस अभिलेख में संस्कृत काव्य शैली का प्राचीनतम नमूना प्राप्त होता है।
जूनागढ़ अभिलेख से पता चलता है कि 170 ई. में रुद्रदामन ने गिरनार के निकट सुदर्शन झील की मरम्मत बिना बेगार लिए ही करवाई थी, जो कि मौर्य वंश के शासक चन्द्रगुप्त मौर्य के आदेश पर बनवाई गई थी।
उत्तर-पश्चिम भारत में स्वर्ण सिक्को का प्रचलन इंडो-ग्रीक (हिंद यवन राजाओं ने करवाया था। जबकि इन्हें नियमित एवं पूर्णरुप से प्रचलित करवाने का श्रेय कुषाण शासकों को जाता है। कुषाण शासकों ने स्वर्ण एवं ताम्र दोनो ही प्रकार के सिक्को को व्यापक पैमाने पर प्रचलित किया था।
कुषाण शासक कनिष्क के सिक्कों पर बुध्द का अंकन मिलता है।
कुषाण शासकों में विम कडफिसेस ने सर्वप्रथम सोने के सिक्के जारी किये थे।
औधेयों का प्रमाण पुराण, अष्टाध्यायी तथा वृहत्संहिता इत्यादि ग्रंथों से प्राप्त होता है। इनका साम्राज्य दक्षिण-पूर्वी पंजाब तथा राजस्थान के बीच था। इनके सिक्कों पर कार्तिकेय का अंकन मिलता है।
कनिष्क के सारनाथ बौध्द अभिलेख की तिथि 81 ई. सन है। यह प्रतिमा मथुरा से लाकर कनिष्क के राज्यारोहण (78 ई. सन) के तीसरे वर्ष सारनाथ में स्थापित की गई थी।
कनिष्क के राज्याभिषेक की तिथि अत्यंत विवादास्पद है। इस समस्या पर विचार करने के लिए 1913 तथा 1960 ई. मे लंदन में दो अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किए गए। द्वीतीय सम्मेलन में आम सहमति 78 ई. के पक्ष में ही बनी। इसी समय से शक संवत् का प्रारंभ माना गया है।
चैत्र भारतीय राष्ट्रीय पंचांग का प्रथम माह होता है। राष्ट्रीय कैलेंडर की तिथियाँ ग्रेगोरियन कैलेंडर की तिथियों से स्थायी रुप से मिलती-जुलती है। सामान्यतः 1 चैत्र 22 मार्च को होता है और लीप वर्ष में 21 मार्च को।
विक्रम संवत के दो अन्य नाम भी मिलते है – कृत संवत् तथा मानव संवत्। जैन साहित्य में महावीर के निर्वाण तथा विक्रम संवत् के बीच 470 वर्षों का अंतर पाया जाता है। महावीर की निर्वाण तिथि 527 ई.पू. मानी  जाती है। तद्नुसार विक्रम संवत् के  प्रारंभ की तिथि 527-470ई. = 57 ई.पू. निर्धारित होती है।

अश्वघोष कनिष्क के राजकवि थे। वसुमित्र भी कनिष्क के आश्रित विद्वान थे, इन्होने चतुर्थ बौध्द संगीति की अध्यक्षता भी की थी। कालिदास गुप्तकाल में हुए थे, जबकि कंबन 12वीं शताब्दी के थे।
अश्वघोष, नागार्जुन, पार्श्व तथा चरक ये चारों ही कनिष्क के दरबार से संबंधित थे, जबकि पतंजलि कनिष्क के दरबार से संबंधित नही थे। पतंजलि ने पाणिनि की अष्टाध्यायी पर महाभाष्य की रचना की थी। महर्षि पतंजलि शुंगकालीन विद्वान थे।
रबतक अभिलेख में शुर्ख कोटल के निकट रबतक नामक स्थान से वर्ष 1933 में प्राप्त किए गए। ये यूनानी लिपि तथा वैक्ट्रियन भाषा में लिखे गए हैं। ये कुषाण वंश के शासक कनिष्क से संबंधित हैं। इस अभिलेख में चार शहरों के नाम का उल्लेख है। जो हैं – साकेत, कौशांबी, पटलिपुत्र, तथा चम्पा।
शुंग वंश का अंतिम राजा देवभूति अपने अमात्य वासुदेव के षडयंत्रों द्वारा मार डाला गया। वासुदेव ने जिस नवीन राजवंश की नींव डाली, वह कण्व या कण्वायन नाम से जाना जाता है। शुंगो के समान यह भी ब्राह्मण वंश था।
सातवाहन शासक गौतमीपुत्र शतकर्णी ने कहा है कि उसने विछिन्न होते चातुर्वर्ण्य (चार वर्णों वाली व्यवस्था) को फिर से स्थापित किया और वर्णसंकर (वर्णों और जातियों के सम्मिश्रण) को रोका। इसी कारण इसे वर्ण-व्यवस्था का रक्षक कहा जाता था।
मौर्यों के बाद दक्षिण भारत में सबसे प्रभावशाली राज्य सातवाहनों का था। पुराणों में इस वंश के संस्थापक का नाम सिंधुक, सिमुक या शिप्रक दिया गया है। जिसने कण्व वंश के राजा सुशर्मा का वध करके अपना शासन स्थापित किया था।
कुषाणकाल (प्रथम शती ई.) में बाल विवाह की प्रथा प्रारंभ हुई थी। स्त्रियों में उपनयन समाप्ति तथा बाल विवाह के प्रचलन ने उसे समाज में अत्यंत निम्न स्थिति में ला दिया। इस युग में विवाह की आयु और कम करते आठ से लेकर दस वर्ष की आयु की कन्या को विवाह के लिए उपयुक्त माना गया।



कुषाण शासक कनिष्क के काल में कला क्षेत्र में दो स्वतंत्र शैलियो का विकास हुआ – 1. गंधार शैली मथुरा शैली
कुषाणों ने सर्वाधिक शुध्द स्वर्ण के सिक्के चलवाए थे। यद्यपि भारत में सर्वप्रथम हिंद-यवन शासको ने स्वर्ण सिक्के चलाए थे। स्वर्ण के अतिरिक्त कुषाणों ने ताम्र एवं रजत सिक्के चलवाए। गुप्तों ने स्वर्ण एवं रजत के तथा कलचुरि शासको ने स्वर्ण, रजत एवं ताम्र के सिक्के चलवाए थे। सातवाहन शासको ने स्वर्ण सिक्के नही चलवाए थे। उन्होने चांदी, तांबा, तथा सीसे व पोटीन के सिक्के जारी किए थे।
अफगानिस्तान का बामियान पहाड़ियों को काटकर बनवाई गई बुध्द प्रतिमाओं के लिए प्रसिध्द था, लेकिन अफगानिस्तान में तालिबान शासन ने इन बुध्द प्रतिमाओं को नष्ट करवा दिया।
भारतीय और यूनानी आकृति की सम्मिश्रण शैली गांधार शैली है। इस कला शैली के प्रमुख संरक्षक शक एवं कुषाण थे। इस कला का विषय मात्र बौध्द होने के कारण इसे यूनानी-बौध्द , इंडो-ग्रीक या ग्रीको-रोमन भी कहा जाता है।
गांधार कला में सदैव हरित स्तरित या शिस्ट चट्टान का प्रयोग ही मूर्तियाँ बनाने के लिए किया जाता था। यद्यपि मथुरा कला में भी इसी के अनुसरण पर शिस्ट का प्रयोग किया गया था।
भारत मे बाह्य आक्रामकों के कालों का सही कालानुक्रम – यूनानी (326 ई.पू. सिकंदर महान), शक (सीथियन)-(प्रथम शताब्दी ई.पू.), कुषाण (पहली शताब्दी ई.)
ईरानी शासक डेरियस प्रथम (522-486 ई.पू.) ने सर्वप्रथम भारत के कुछ भाग को अपने अधीन किया था। हेरोडोटस के अनुसार, डेरियस प्रथम के साम्राज्य में संपूर्ण सिंधु घाटी का प्रदेश शामिल था तथा पूर्व की ओर उसका विस्तार राजपूताना के रेगिस्तान तक था। पर्सिपोलिस एवं नक्शेरुस्तम के शिलालेखों के अनुसार, पंजाब भी उसके साम्राज्य में शामिल था।
पुराणो में कुल तीस सातवाहन राजाओ के नाम मिलते हैं, जिनमें से सबसे लंबी सूची मत्स्य पुराण में 19 राजाओं की मिलती है।
सातवाहनों की वास्तविक राजधानी प्रतिष्ठान या पैठन में अवस्थित थी। पुराणों में इस राजवंश को आंध्रभृत्य या आंध्र जातीय कहा गया है। उनकी आरंभिक राजधानी अमरावती मानी जाती है। इस वंश की स्थापना सिमुक नामक व्यक्ति ने लगभग 60 ई.पू. में कण्व वंशीय शासक सुशर्मा की हत्या करके की थी।
सातवाहन शासक गौतमीपुत्र शातकर्णी को नासिक अभिलेख में एका ब्राह्मण कहा गया है, जिसका तात्पर्य है अद्वीतीय ब्राह्मण अथवा ब्राह्मणों का एकमात्र रक्षक।
कलिंग का चेदि राजवंश का संस्थापक महामेघवाहन नामक व्यक्ति था। अतः इस वंश का नाम महामेघवाहन वंश भी पड़ गया। इस वंश का सर्वाधिक शक्तिशाली शासक खारवेल हुआ।
पूर्वी रोमन शासक जस्टिनियन को सर्वाधिक प्रसिध्दि उसके न्याय संबंधी सुधारों मे मिली। जस्टिनियन रोमन कानून के संपूर्ण संशोधन के लिए  उत्तरदायी था।


गुप्त एवं गुप्तोत्तर युग

गुप्त वंश ने 275-550 ई. तक शासन किया | इस वंश की स्थापना लगभग 275 ई. में महाराज श्रीगुप्त द्वारा की गई थी किंतु गुप्त वंश का प्रथम शक्तिशाली शासक चंद्रगुप्त प्रथम था | जिसने 319-335 ई तक शासन किया | इसने अपनी महत्ता सूचित करने के लिए अपने पूर्वजों के विपरीत ‘ महाराजाधिराज ‘ की उपाधि धारण की | गुप्त संवत का प्रवर्तक चंद्रगुप्त प्रथम था। इसकी तिथि  319 ई है |


इतिहासकार विसेंट स्मिथ ने अपनी रचना ‘ अर्ली हिस्ट्री ऑफ इंडिया ‘ में समुद्रगुप्त की वीरता एवं विजयों पर मुग्ध होकर उसे ‘ भारतीय नेपोलियन ‘ की संज्ञा दी है।
इलाहाबाद का अशोक स्तंभ अभिलेख समुद्रगुप्त ( 335-375 ई ) के शासन के बारे में सूचना प्रदान करता है | इस स्तंभ पर समुद्रगुप्त के संधि विग्रहिक हरिषेण ने संस्कृत भाषा में प्रशंसात्मक वर्णन प्रस्तुत किया है | जिसे ‘ प्रयाग प्रशस्ति ‘ कहा गया है | इसमें समुद्रगुप्त की विजयों का उल्लेख है | इस प्रशस्ति में समुद्रगुप्त के कुछ प्रशासनिक पदाधिकारियों के नाम मिलते हैं वे हैं  – संधिविग्रहिक , खाद्यटपाकिक , कुमारामात्य , तथा महादण्डनायक | अशोक निर्मित यह स्तंभ मूलतः कौशांबी में स्थित था जिसे अकबर ने इलाहाबाद में स्थापित करवाया था | इस स्तंभ पर जहांगीर तथा बीरबल का भी उल्लेख है |
गुप्त शासक चंद्रगुप्त द्वितीय ‘ विक्रमादित्य ‘ का एक अन्य नाम देवगुप्त मिलता है इसका प्रमाण सांची एंव वाकाटक अभिलेखों से मिलता है | उसके अन्य नाम देवराज तथा देवश्री भी मिलते हैं | चंद्रगुप्त द्वितीय ‘ विक्रमादित्य ‘ वह प्रथम गुप्त शासक था जिसने ‘ परम भागवत ‘ की उपाधि धारण की। मेहरौली लेख के अनुसार , उसने विष्णुपद पर्वत पर विष्णुध्वज की स्थापना कराई थी। दिल्ली में मेहरौली नामक स्थान से ‘ मेहरौली लौह स्तंभ लेख ‘ प्राप्त हुआ है।जो वर्तमान में कुतुब मीनार के समीप है | इसमें चंद्र नामक किसी राजा की उपलब्धियों का वर्णन किया गया है |  जिसका समीकरण गुप्त वंश के शासक चंद्रगुप्त द्वितीय से किया जाता है | गुप्त सम्राट चंद्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य को शक विजेता कहा गया है| पश्चिम भारत के अंतिम शक राजा रूद्र सिंह तृतीय को चंद्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य ने 5 वीं सदी के प्रथम दशक में परास्त कर पश्चिमी भारत में शक सत्ता का उन्मूलन किया था |  शकों को हराने के कारण चंद्रगुप्त विक्रमादित्य की एक अन्य उपाधि “शकारि” भी है | उसने इस उपलक्ष्य में चांदी के सिक्के भी चलाएं | जिसको गुप्तकाल में “रुप्यक” (रूपक) कहा जाता था |
चंद्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य के कुशल शासन की प्रशंसा चीनी यात्री फाह्यान ने भी की है | इन के नवरत्नों की प्रसिद्धि सर्वकालिक रही है | नवरत्नों में सर्वोत्कृष्ट “महाकवि कालिदास” थे | अगले क्रम पर महान चिकित्सक (GREAT PHYSICIAN) धनवंतरी थे |  तीसरे खगोल विज्ञानी वराहमिहिर थे  | चौथे कोशकार अमरसिंह ,पांचवें वास्तुकार शंकु तथा छठवें रत्न फलित ज्योतिषी क्षपणक थे | इसी प्रकार सातवें विद्वान वैयाकरणज्ञ (GRAMMARIAN)    वररुचि , आठवें जादूगर वेताल भट्ट तथा नौवें घटकर्पर  महान कूटनीतिज्ञ थे|


·      कुमारगुप्त प्रथम “महेंद्रादित्य” (लगभग 415 से 455 ईसवी) चंद्रगुप्त द्वितीय की पत्नी ध्रुव देवी से उत्पन्न बड़ा पुत्र था | इसके समय के गुप्तकालीन सर्वाधिक अभिलेख प्राप्त हुए हैं, जिनकी संख्या लगभग 18 है | विलसद अभिलेख में कुमार गुप्त प्रथम तक गुप्तों की वंशावली प्राप्त होती है | बंगाल के तीन स्थानों से कुमार गुप्त कालीन ताम्रपत्र प्राप्त होते हैं | यह हैं धनदैह ताम्रपत्र , दामोदरपुर ताम्रपत्र तथा वैग्राम ताम्रपत्र तथा कुमारगुप्त की स्वर्ण रजत तथा ताम्र मुद्राएं प्राप्त होती है |   मुद्राओं पर उसकी उपाधियां महेंद्रादित्य, श्रीमहेंद्र, महेंद्र सिंह , अश्वमेध  महेन्द्र आदि उत्कीर्ण मिलती है|
स्कंद गुप्त “क्रमादित्य” द्वितीय (लगभग 455 से 467 ) ईसवी के स्वर्ण सिक्कों के मुख्य भाग पर धनुष बाण लिए हुए राजा की आकृति तथा पृष्ठ भाग पर पदासन में विराजमान लक्ष्मी के साथ साथ “श्री स्कंद” गुप्त उत्तीर्ण है | कुछ सिक्कों के ऊपर गरुड़ध्वज तथा उसकी उपाधि क्रम आदित्य अंकित है | भीतरी स्तंभ लेख में पुष्यमित्र और हूणों के साथ स्कंद गुप्त के युद्ध का वर्णन मिलता है | हूणों का पहला भारतीय आक्रमण गुप्त सम्राट स्कंद गुप्त के शासनकाल में (455 ईसवी में) हुआ तथा स्कंद गुप्त के हाथों में वे बुरी तरह परास्त हुए |
ईसा की तीसरी सदी से जब हूण आक्रमण से रोमन साम्राज्य का पतन हो गया, तो भारतीय दक्षिण पूर्व एशियाई व्यापार पर अधिक निर्भर हो गए|
तोरमाण भारत पर दूसरे हूण आक्रमण का नेता था | मध्य भारत के एरण नामक स्थान से वाराह प्रतिमा पर खुदा हुआ उसका लेख मिला है |जिससे पता चलता है कि धन्यविष्णु उसके शासनकाल के प्रथम वर्ष में उसका सामंत था। मिहिरकुल हूण शासक तोरमाण का पुत्र तथा उत्तराधिकारी था। मिहिरकुल अत्यंत क्रूर एवं अत्याचारी शासक था। चीनी यात्री ह्वेनसांग तथा मंदसौर लेख के साक्ष्य से ज्ञात होता है कि सवर्प्रथम गुप्त नरेश बालादित्य पत्पश्चात मालव नरेश यशोवर्धन द्वारा मिहिरकुल को बुरी तरह पराजित किया गया था।
गुप्तकाल में बंगाल में ताम्रालीप्ति एक प्रमुख बंदरगाह था  ,जहां से उत्तर भारतीय व्यापार एवं साथ ही दक्षिण पूर्व एशिया , चीन , लंका ,  जावा , सुमात्रा आदि देशों के साथ व्यापार होता था |  पश्चिमी भारत का प्रमुख बंदरगTह भृगुकच्छ  (भड़ौच)   था |  जहाँ  से पश्चिमी देशों के साथ समुद्री  व्यापार होता था|   ताम्रलिप्ति  आधुनिक पश्चिमी  बंगाल के  मिदना  पुर जिले के तामलुक नामक स्थान  को कहते थे जो कि  कोलकाता  से लगभग  33 मील दक्षिण पश्चिम में रुप नारायण नदी के  पश्चिमी  किनारे पर  स्थित है।


प्राचीन भारत की अर्थव्यवस्था में श्रेणियों का विशेष महत्व था। ये संगठन व्यापारियों के द्वारा उनके व्यापार के समुचित संचालन के लिए स्थापित किए जाते थे। श्रेणियों का अपने सदस्यों पर न्यायिक अधिकार होता था | तथा श्रेणियों के द्वारा ही सदस्यों के वेतन, काम करने के नियमों, मानकों एवं कीमतों का निर्धारण किया जाता था। प्रत्येक श्रेणी का अपना एक प्रमुख होता था। राजा का श्रेणियों के संचालन में कोई हस्तक्षेप नहीं होता था, श्रेणियां अपने नियम स्वयं बनाती थीं।
गुप्तकाल में गुजरात, बंगाल, दक्कन एवं तमिलनाडु वस्त्र उत्पादन के लिए प्रसिद्ध थे। वस्त्रोद्योग, गुप्काल का प्रमुख उद्योग था | गुप्तकाल में अंतरराष्ट्रीय व्यापार के प्रमुख केन्द्र थे – ताम्रलिप्ति , भृगुकच्छ, आरिकामेडु , कावेरीपतनम, मुजीरिस, प्रतिष्ठान, सोपारा, बारबेरिकम |
आयुर्वेद तथा चिकित्सा के क्षेत्र में प्राचीन भारत की चरम परिणति चरक एवं सुश्रुत में मिलती है। गुप्तकालीन सुश्रुत संहिता में चिकित्सक के ज्ञान एवं कार्य-कुशलता को समान रूप से महत्व दिया गया है | धन्वंतरि चंद्रगुप्त ii विक्रमादित्य के नवरत्नों में से एक थे। ये आयुर्वेद शास्त्र के प्रकांड पंडित थे। चरक एवं सुश्रुत भी आयुर्वेद के विख्यात विद्वान थे। चरक कनिष्क के राजवैद्य थे, जिन्होंने चरक संहिता” की रचना की थी। जबकि भास्कराचार्य प्रख्यात खगोलज्ञ एवंगणितज्ञ थे। उन्होंने (सिद्धांत शिरोमणि ” तथा “लीलावती”  नामक ग्रंथों की रचना की। इन ग्रंथों में गणित तथा खगोल विज्ञान संबंधी विषयों पर प्रकाश डाला गया है।
·      5वीं शती ई. तक भारत में त्रिकोणमिति में ज्या (sine) ,  कोज्या (cosine) ,  और उत्क्रम ज्या (inverse sine)  ,  के सिद्धांत ज्ञात हो चुके थे। सूर्य सिद्धांत और आर्यभटीय में इनका उल्लेख है। सातवीं शती ई में ब्रह्मगुप्त द्वारा चक्रीय चतुर्भुज के सिद्धांत का वर्णन मिलता है।
समुद्रगुप्त की कुल 6 प्रकार की स्वर्ण मुद्राएं हमें प्राप्त होती हैं। ये हैं- गरुड़ ,  धनुर्धारी ,  परशु, अश्वमेध ,  व्याघ्र हनन तथा वीणावादन प्रकार। गुप्तकाल में स्वर्ण मुद्रा को दीनार कहा जाता था। चीनी यात्री फाह्यान के अनुसार, लोग दैनिक क्रय-विक्रय में कौड़ियों का प्रयोग करते थे। गुप्त शासकों के सिक्के उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल, मध्य प्रदेश, राजस्थान और उड़िसा में पाए गए हैं। सिक्कों का सबसे प्रसिद्ध प्राप्ति स्थल राजस्थान का भरतपुर (बयाना) है। इनके द्वारा जारी किए गए चांदी के सिक्के  रुपक कहलाते थे । तथा स्वर्ण मुद्राओं को दीनार कहा जाता था। गुप्त शासकों में चंद्रगुप्त प्रथम द्वारा सर्वप्रथम सिक्के जारी किए गए।
·      सती प्रथा का प्रथम अभिलेखिक साक्ष्य एरण से प्राप्त हुआ है |  यह अभिलेख 510 ई० का है, जिसमें गोपराज नामक सेनापति की स्त्री के सती होने का उल्लेख है।
गुप्त साम्राज्य के पतन के कारण थे- हूण आक्रमण, प्रशासन का सामंतीय ढांचा, उत्तरवर्ती गुप्तों का बौद्ध धर्म स्वीकार करना। गुप्तकाल में नगर क्रमिक पतन की ओर  अग्रसर हुए। संपूर्ण गंगा घाटी में जो शहर पहले अत्यंत समृद्ध अवस्था में थे, उनमें से अधिकांश को गुप्तकाल में या तो त्याग दिया गया था या वहां के आवसन में पर्याप्त विघटन हुआ। पाटलिपुत्र जैसा प्रमुख नगर ह्वेनसांग के आगमन तक गांवबन गया था। मथुरा जैसे प्रमुख नगर एवं कुम्रहार, सोनपुर, सोहगौरा और उत्तर प्रदेश में गंगा घाटी के अनेक महत्वपूर्ण केन्द्र इस काल में ह्रास के ही प्रमाण प्रस्तुत करते हैं।


गुप्तकाल में कला एवं साहित्य में हुई प्रगति के आधार पर इस काल को प्राचीन भारत का”स्वर्ण युग”कहा जाता है।अजंता की तीन गुफाएँ(16वीं , 17वींतथा19वीं) गुप्त कालीन मानी जाती हैं।इनमें 16वीं तथा 17वीं गुफाएँ विहार तथा उन्नीसवीं चैत्य है।
गुप्त वंश के शासकों ने मंदिरों एवं ब्राह्मणों को सबसे अधिक ग्राम अनुदान में दिए थे। गुप्तकाल में जो लोग राजकीय भूमि पर कृषि करते थे उन्हें अपनी अपज का एक भाग राजा को कर के रुप में देना पड़ता था, जो सामान्यतः षष्ठांश तक होत था। गुप्त अभिलेखों में भूमि कर को उद्रंग तथा  भाग कर कहा गया है। प्रायः सभी धर्मशास्त्रों में भू राजस्व की दर 1/6 (उप का छठां भाग) थी। प्राचीन भारत में  सिंचाई कर को बिदकभागम अथवा उदकभाग कहा गया है। हिरण्य मौर्यकाल में लिया जाने वाला नकद कर था।गुप्त एवं गुप्तोत्तर काल में रेशम के लिए कौशेय शब्द का प्रयोग होता था।तीसरी शताब्दी में वारंगल लोह के यंत्रों उपकरणों हेतु प्रसिद्ध था। वारंगल में अगरिया लोग बड़ी संख्या में रहते थे।अगरिया लोगों का  प्राचीन काल से वर्तमान समय तक लोहे के यंत्र एवं उपकरण बनाना परंपरागत व्यवसाय रहा है।
डॉ. के. पी. जायसवाल ने विशाखदत्त को चंद्रगुप्त मौर्य का समकालीन बताया है।उनके नाटक मुद्राराक्षस से चंद्रगुप्त मौर्य के कृत्यों पर प्रकाश पड़ता है।इसमें चंद्रगुप्त मौर्य के समय में राज दरबार की दुरभिसंधियों का वर्णन किया गया है।गुप्तकाल में लिखित संस्कृत नाटकों में स्त्री और शूद्र प्राकृत भाषा बोलते थे , जबकि उच्च वर्ण के लोग संस्कृत भाषा बोलते थे | शूद्रककृत  “मृच्छकटिकम”  नामक रचना से गुप्तकालीन शासन व्यवस्था एवं नगर जीवन के विषय में रोचक सामाग्री मिलती है। इस ग्रंथ में चारुदत्त नामक ब्राह्मण सार्थवाह एवं एक गणिका की पुत्री वसंत सेना की प्रेम – गाथा को,शब्दों का रूप दिया गया है।
गुप्त साम्राज्य की शासन व्यवस्था राजतंत्रात्मक थी। मौर्य शासकों के विपरीत गुप्तवंशी शासक अपनी दैवी उत्पत्ति में विश्वास.करते थे। गुप्त शासकों ने भूमिदान की परंपरा को विस्तारित किया। गुप्त प्रशासन का स्वरूप केंद्रीकृत न होकर संघात्मक था, गुप्त राजा अनेक “छोटे राजाओं का राजा” होता था। सामंत तथा प्रांतीय शासक अपने अपने क्षेत्रों में नितांत स्वतंत्रता का अनुभव करते थे।
·      शतरंज का खेल भारत में गुप्त काल के दौरान उद्भूत हुआ था जहां इसे “चतुरंग” के नाम से जाना जाता था |  भारत से यह ईरान तथा तत्पश्चात यूरोप में पहुंचा|
·      प्रवरसेन प्रथम (275 से 335 ईसवी) वाकाटक वंश का एकमात्र शासक जिसने “सम्राट” की उपाधि धारण की थी|  वाकाटक शासक प्रवर सेन  प्रथम ने चार अश्वमेध यज्ञों का संपादन किया | इसके साथ ही उसने अनेक वैदिक यज्ञ भी किए|  इसी वंश के शासक प्रवर सेन द्वितीय की रुचि साहित्य में थी , उन्होंने “सेतुबंध” नामक ग्रंथ की रचना की |
·      महर्षि कपिल ने सांख्य दर्शन का प्रतिपादन किया था |  सांख्य  पुनर्जन्म अथवा आत्मा के आवागमन के सिद्धांत को स्वीकार करता है | सांख्य दर्शन में अज्ञानता को ही दुखों का कारण तथा विवेक ज्ञान को उनसे मुक्ति का एकमात्र उपाय बताया गया है | महर्षि पतंजलि को योग दर्शन का प्रतिस्थापक आचार्य माना जाता है | सर्वप्रथम महर्षि पतंजलि ने ही सुसंबंध दार्शनिक सिद्धांत के रूप में योग का विवेचन किया | इसलिए इसे “पतंजलि दर्शन” भी कहा जाता है|
·      नव्य- न्याय संप्रदाय का प्रवर्तन मिथिला के आचार्य गंगेश उपाध्याय की युग प्रवर्तक कृति “तत्व चिंतामणि” से हुआ एवं इसके संवर्धन के लिए बंगाल के नवदीप के नैयायिक वासुदेव सार्वभौम,  दीधितिकार  रघुनाथ शिरोमणि तथा मथुरानाथ , जगदीश एवं गदाधर भट्टाचार्य सुप्रसिद्ध है | भारतीय दर्शन में चार्वाक दर्शन जड़वादी या भौतिकवादी विचारधारा का पोषक है|  इस दर्शन का आदर्श है– “जब तक जीवित रहे सुख से जीवित रहे, उधार लेकर घी पियें, क्योंकि देश देह के भस्म हो जाने के बाद पुनर्जन्म नहीं होता” –
‘यावज्जीवेत् सुखं जीवेत् ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत्।

भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुतः।’

न्याय दर्शन का प्रवर्तन गौतम ने किया जिन्हें अक्षपाद भी कहा जाता है | न्याय का शाब्दिक अर्थ तर्क या  निर्णय होता है |  न्याय दर्शन में 16 पदार्थों या तत्वों का अस्तित्व स्वीकार किया गया है | न्याय दर्शन का मूल ग्रंथ गौतम कृत “न्याय सूत्र” है |


कर्म का सिद्धांत भी मीमांसा दर्शन से संबंधित है| इसे पूर्व मीमांसा ,  कर्म मीमांसा या धर्म मीमांसा भी कहते हैं |  जैमिनी ने पूर्व मीमांसा का प्रतिपादन किया था |  मीमांसा के प्रखर एवं उद्भव आचार्य कुमारिल भट्ट को , जिनकी गणना भारतीय दर्शन के मूर्धन्य आचार्यों में की जाती है | और जिन्होंने अपने प्रमुख तर्कों से बहुत धर्म तथा दर्शन का खंडन करके वैदिक धर्म तथा दर्शन की पुनः प्रतिष्ठा की |
पूर्व मीमांसा और वेदांत के बीच की श्रृंखला माना जा सकता है |  मीमांसा दर्शन वेद को शाश्वत सत्य मानता है |  पूर्व मीमांसा दर्शन में वेद के कर्मकांड भाग पर विचार किया गया है और उत्तर मीमांसा में वेद के ज्ञान कांड भाग पर विचार किया गया है |  मीमांसा और वेदांत , “न्याय और वैशेषिक” तथा सांख्य और योग” भारतीय षड्दर्शन के भाग हैं | वेदों को मान्यता देने के कारण ही सांख्य ,  योग,  न्याय , वैशेषिक ,  मीमांसा और वेदांत षडदर्शन आस्तिक दर्शन कहे जाते हैं | इन के प्रणेता क्रमशः कपिल ,  पतंजलि ,गौतम , कणाद , जैमिनी  तथा बादरायण थे जबकि लोकायत और कापालिक भारतीय षड्दर्शन के भाग नहीं है |
वेदांत दर्शन को भारतीय विचारधारा की पराकाष्ठा माना जाता है | वेदांत का शाब्दिक अर्थ है :- वेद का अंत या वैदिक विचारधारा की पराकाष्ठा  | वेदांत दर्शन के तीन आधार है:- उपनिषद ,  ब्रह्मसूत्र ,और भगवत गीता |इन्हें वेदांत दर्शन की “प्रस्थानत्रयी” कहा जाता है | कई सूक्ष्म भेदों के आधार पर इसकी कई उपसंप्रदाय एवं इसके प्रवर्तक हैं,  जैसे शंकराचार्य का अद्वैतवाद , रामानुज का विशिष्टद्वैत ,  माधवाचार्य का द्वैतवाद|
पुराणों के अनुसार चंद्रवंश या सोमवंशी क्षत्रिय वर्ण के 3 मूल वंशों (अन्य दो सूर्यवंश एवं अग्नि वंश) में से एक था |चंद्र वंशीय शासकों का मूल स्थान त्रेतायुग में प्रयाग था परंतु प्रलय के पश्चात द्वापर युग में चंद्रवंशीय संवारन ने प्रतिष्ठानपुर (वर्तमान झूसी, इलाहाबाद) में राजधानी की स्थापना की थी।
अग्निकुल के राजपूतों का सर्वाधिक प्रसिद्ध प्रतिहार वंश था। गुर्जरों की शाखा से संबंधित होने के कारण इतिहास में इसे गुर्जर- प्रतिहार वंश के नाम से जाना जाता है। गुर्जर – जाति का प्रथम उल्लेख पुलकेशिन द्वितीय के ऐहोल लेख में हुआ है। |  बाण भदृ के हर्षचरित में भी गुर्जरों का उल्लेख मिलता है। गुर्जर प्रतिहार वंश का संस्थापक नागभट्ट प्रथम (730-756 ई०) था।  ग्वालियर अभिलेख से पता.चलता है कि उसने म्लेच्छ शासक की विशाल सेना को नष्ट कर दिया था , जो संभवतः सिंध का अरब शासक था। इस प्रकार नागभट्ट ने अरबों के.आक्रमण से पश्चिम भारत की रक्षा भी की थी।
राष्ट्रकूट वंश की स्थापना 736 ईसा पूर्व में दंतीदुर्ग ने की | उसने मान्यखेत को अपनी राजधानी बनाई | दंती दुर्ग के संबंध में कहा जाता है कि उज्जैनी में उसने हिरण्यगर्भ (महादान) यज्ञ करवाया था | राष्ट्रकूट राजा अमोधवर्ष I  का जन्म 800 ईसा पूर्व में नर्मदा नदी के किनारे श्री भावन नामक स्थान पर सैनिक छावनी में हुआ था | इस समय इसके पिता राष्ट्रकूट राजा गोविंद तृतीय उत्तर भारत के सफल अभियानों के बाद वापस लौट रहे थे |
मौखरि गुप्तों के सामंत थे, जो मूलतः गया के निवासी थे । मौखरि वंश के शासकों ने अपनी राजधानी कन्नौज को बनाई | इस वंश के प्रमुख शासक हरि वर्मा , आदित्य वर्मा , ईशान वर्मा,  सर्ववर्मा एवं गृहवर्मा थे |
हर्ष के समय की विस्तृत सूचना इस के दरबारी कवि बाणभट्ट की कृति हर्ष रचित से प्राप्त होती है | इससे जुड़ी कुछ सूचनाएं कल्हण कृति राज तरंगिणी में भी मिलती है | चीनी स्रोतों से पता चलता है कि हर्ष एवं राज्यश्री दोनों साथ कन्नौज के राज सिंहासन पर बैठते थे | हर्ष ने अपनी राजधानी थानेश्वर से कन्नौज स्थानांतरित की ताकि वह राज्यश्री को प्रशासनिक कार्य में पूरी सहायता प्रदान कर सकें | अन्य धर्मों से महायान की उत्कृष्टता सिध्द करने के लिए हर्ष ने कन्नौज में विभिन्न धर्मों एवं संप्रदायों के आचार्यों की एक विशाल सभा बुलवाई | चीनी साक्ष्यों के अनुसार इस सभा में 20 देशों के राजा अपने देशों के प्रसिद्ध ब्राह्मणों , श्रमणों,  सैनिकों , राजपुरुषों शादी के साथ उपस्थित हुए थे |  इस सभा की अध्यक्षता ह्वेनसांग ने की | साथ ही हर्ष के समय प्रति पांचवी वर्ष प्रयाग संगम क्षेत्र में एक समारोह का आयोजन किया जाता था जिसे “महामोक्ष परिषद” कहा गया है | ह्वेनसांग स्वयं समारोह में उपस्थित था | इसमें 18 देशों के राजा सम्मिलित हुए थे|
हर्ष की विजयों के फलस्वरूप उसके राज्य की पश्चिमी सीमा नर्मदा नदी तक पहुंच गई | इधर पुलकेशिन द्वितीय भी उत्तर की ओर राज्य का विस्तार करना चाहता था ऐसी स्थिति में दोनों के बीच युद्ध अवश्यंभावी हो गया | फलत: नर्मदा के तट पर दोनों के बीच युद्ध हुआ जिसमें पुलकेशिन द्वितीय ने हर्ष को पराजित किया | पुलकेशिन द्वितीय की ऐहोल प्रशस्ति एवं ह्वेनसांग का विवरण इस युद्ध के साक्ष्य हैं |


औरंगाबाद बिहार के आधिकारिक वेबसाइट पर बाणभट्ट का जन्म औरंगाबाद जिले (वर्तमान बिहार) के हिरण्यवाहु नदी के किनारे अवस्थित प्रीथिकूट पर्वत के समीप पीरु गांव में हुआ था | (कुछ अन्य वेबसाइटों पर इनका जन्म स्थान छपरा जिला दिखाया गया है) | इनके पिता का नाम चित्रभानु तथा माता का नाम राज देवी था |
हर्षवर्धन के समय की सर्व प्रमुख घटना चीनी यात्री ह्वेनसांग के भारत आगमन की है | उसमें तांग शासकों की राजधानी चंगन से भारत वर्ष के लिए 629 ईसवी में प्रस्थान किया | अपनी भारत यात्रा के ऊपर उसने एक ग्रंथ लिखा जिसे “सी – यू – की” कहा जाता है | इसमें भीनमाल की यात्रा की थी | इसे “यात्रियों का राजकुमार” कहा जाता है | ह्वेनसांग के अनुसार सड़कों पर आवागमन पूर्णतया सुरक्षित नहीं था | अपराध अथवा निर्दोष सिद्ध करने के लिए अग्नि जल वर्षा जी द्वारा दिव्य परीक्षाएं ली जाती थी | उसके अनुसार व्यापारिक मार्ग , घाटों , बिक्री की वस्तु आदि पर भी कर लगते थे जिससे राज्य को पर्याप्त धन प्राप्त होता था | ह्वेनसांग चीन के तांग वंशी शासक ताई सुंग का समकालीन तथा इसी के राज्य का नागरिक था |
ह्वेनसांग ने अपनी यात्रा अनुभवों को पुस्तक “ए रिकॉर्ड ऑफ द वेस्टर्न रीजन्स“ में संकलित किया था | 637 ईसवी में ह्वेनसांग नालंदा विश्वविद्यालय गया। इस समय यहां के कुलपति आचार्य शीलभद्र थे | ह्वेनसांग के अनुसार मथुरा उस समय सूती वस्त्रों के लिए प्रसिद्ध था। , जबकि वाराणसी रेशमी वस्त्रों के लिए प्रसिद्ध था।  ह्वेनसांग बताता है कि थानेश्वर की समृद्धि का प्रधान कारण वहां का व्यापार ही था | बाण ने थानेश्वर नगरी को अतिथियों के लिए चिंता मणि भूमि तथा व्यापारियों के लिए लाल भूमि बताया है |
·      हर्ष की मृत्यु के बाद कन्नौज विभिन्न शक्तियों के आकर्षण का केंद्र बन गया | इसे महोदय,  महोदयाश्री ,  आदि नामों सेअभिव्यक्त किया गया है। अतः इस पर अधिकार करने के लिए आठवीं सदी की तीन बड़ी शक्तियों :- पाल , गुर्जर– प्रतिहार तथा राष्ट्रकूट के बीच त्रिकोणीय संघर्ष प्रारंभ हो गया | जो आठवीं नवीं शताब्दी के उत्तर भारत के इतिहास का सर्वाधिक महत्वपूर्ण घटनाक्रम है | इस संघर्ष में अंततः प्रतिहारों को सफलता मिली|
·      चीनी यात्री इत्सिंग ने 671 या 672 ई.में जब वह युवक था , अपने 37 बौद्ध सहयोगियों के साथ बौद्धधर्म के अवशेषों को देखने की इच्छा से पाश्चात्य  विश्व का भ्रमण करने का निश्च्य किया। वह दक्षिण के समुद्री मार्ग से होकर भारत आया। 693-94 ई० के लगभग सुमात्रा होता हुआ वह चीन वापस लौट गया।
प्राचीनकालीन चीनी लेखकों ने भारत का उल्लेख यिन तु (yin-tu) तथा “थिआन-तु” नाम से किया है।

नालंदा विश्वविद्यालय बख्तियार खिलजी के अधीन तुर्क मुस्लिम आक्रमणकारियों द्वारा 1193 ई० में नष्ट किया गया था | यह भारत में बौद्ध मत के पतन के लिए अंतिम प्रहार के रूप में देखा जाता है |  विक्रमशिला के प्राचीन बौद्ध विश्वविद्यालय की स्थापना बंगाल के  पाल वंशीय शासक धर्मपाल (783-820 ई० )  द्वारा की गई थी |  शंकराचार्य को शंकर ,श्री शंकराचार्य आदि नामों से भी जाना जाता है। 8वीं शताब्दी में इनका जन्म केरल के एक छोटे से गांव कलाड़ी में हुआ था। उनके दर्शन को अद्वैत वेदांत के नाम से जाना जाता है।शंकराचार्य द्वारा स्थापित चार मठ वर्तमान में भी हिंदू धर्म के पथ-प्रदर्शक माने जाते हैं। इनका विवरण इस प्रकार है –
श्रृंगेरी (कर्नाटक) – दक्षिण में
द्वारिका (गुजरात) – पश्चिम में
पुरी (ओड़िशा) – पूर्व में तथा
ज्योर्तिमठ (जोशीमठ, उत्तराखंड) – उत्तर में
चारधाम में –
बद्रीनाथ
द्वारिका
पुरी
रामेश्वरम
आते  हैं जबकि छोटा चाऱधाम में उत्तराखंड मे स्थित  गंगोत्री, यमुनोत्री, केदारनाथ तथा बद्रीनाथ आते हैं।



गुप्त वंश ने 275-550 ई. तक शासन किया। इस वंश की स्थापना लगभग 275 ई. में महाराज श्रीगुप्त द्वारा की गई थी, किंतु गुप्त वंश का प्रथम शक्तिशाली शाक चन्द्रगुप्त प्रथम था, जिसने 319-335 ई. तक शासन किया। इसने अपनी महत्ता सूचित करने के लिए अपने पूर्वजों के विपरीत महाराजाधिराज की उपाधि धारण की।
वाकाटक शासक प्रवरसेन प्रथम ने चार अश्वमेध यज्ञों का संपादन किया। इसके साथ ही उसने अनेक वैदिक यज्ञ भी किए। इसी वंश के शासक प्रवरसेन द्वीतीय की रुचि साहित्य मे थी, उन्होने सेतबंध नामक ग्रंथ की रचना की।
इतिहासकार विंसेट स्मिथ ने अपनी रचना अर्ली हिस्ट्री ऑफ इंडिया में समुद्रगुप्त विंसेंट स्मिथ ने अपनी रचना अर्ली हिस्ट्री ऑफ इंडिया में समुद्रगुप्त की वीरता एवं विजयों पर मुग्ध होकर उसे भारतीय नेपोलियन की संज्ञा दी है।
गुप्त शासक चन्द्रगुप्त द्वीतीय विक्रमादित्य का एक अन्य नाम देवगुप्त मिलता है। इसका प्रमाण सांची एवं वाकाटक अभिलेखों से मिलता है। उसके अन्य नाम देवराज तथा देवश्री भी मिलते हैं.
चन्द्रगुप्त द्वीतीय विक्रमादित्य वह प्रथम गुप्त शासक था, जिसने परम भागवत की उपाधि धारण की थी। मेहरौली लेख के अनुसार, उसने विष्णुपद पर्वत पर विष्णुध्वज की स्थापना कराई थी।
इलाहाबाद का अशोक स्तंभ अभिलेख समुद्रगुप्त (335-375 ई.) के शासन के बारे मे सूचना प्रदान करता है। इस स्तंभ पर समुद्रगुप्त के संधि विग्रहिक हरिषेण ने संस्कृत भाषा में प्रशंसात्मक वर्णन प्रस्तुत किया है, जिसे प्रयाग प्रशस्ति कहा गया है। इसमें समुद्रगुप्त की विजयों का उल्लेख है।
इतिहासकार तेज रामशर्मा ने अपनी पुस्तक ए पॉलिटिकल हिस्ट्री ऑफ द इंपीरियल गुप्ताज में उल्लेख किया है कि समुद्रगुप्त ने अश्वमेघ यज्ञ किया जिसके बाद उसने पृथिव्यामा प्रतिरथ की उपाधि ग्रहण की जिसका अर्थ है – ऐसा व्यक्ति  जिसका पृथ्वी पर कोई प्रतिद्वंधी न हो (पृथ्वी का प्रथम वीर)।
हूणों का पहला भारतीय आक्रमण गुप्त सम्राट स्कंदगुप्त के शासनकालत में (455 ई. में) हुआ तथा स्कंदगुप्त के हाथों वे बुरी तरह परास्त हुए। यह आक्रमण एक धावा मात्र रहा और देश के ऊपर इसका कोई तात्कालिक प्रभाव नही  पड़ा किंतु परोक्ष रुप से इसने गुप्त साम्राज्य के पतन की गति को तेज कर दिया। स्कंदगुप्त की मृत्यु के बाद 5वं शताब्दी ई. के अंत तथा 6वीं शताब्दी ई. के प्रारंभ में उत्तर-पश्चिम के कई क्षेत्रों पर हूणों ने कब्जा कर  लिया था।
उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले में सैदनपुर तहसील मे भितरी नामक स्थान से भितरी स्तंभ-लेख मिलता है। इसमें पुष्यमित्रों और हूणों के साथ स्कंदगुप्त के युध्द का वर्णन मिलता है। उल्लेखनीय है कि हूणों का पहला भारतीय आक्रमण गुप्त सम्राट स्कंदगुप्त के शासनकाल में (455 ई.में) हुआ जिसमें वे स्कंदगुप्त से बुरी तरह पराजित हुए।
ईसा की तीसरी सदी से जब हूण आक्रमण से रोमन साम्राज्य का पतन हो गया, तो भारतीय दक्षिण-पूर्व एशियाई व्यापार पर अधिक निर्भर हो गए।
गुप्तकाल में बंगाल में ताम्रलिप्ति एक प्रमुख बंदरगाह था, जहां से उत्तर भारतीय व्यापार एवं साथ ही दक्षिण-पूर्व एशिया, चीन, लंका, जावा, सुमात्रा आदि देशों के साथ व्यापार होता था। पश्चिमी भारत का प्रमुख बंदरगाह भृगुकच्छ (भड़ौच) था। जहां से पश्चिमी देशों के साथ समुद्री व्यापार होता था।
भारत ने दक्षिण-पूर्वी एशिया के साथ अपने आरंभिक सांस्कृतिक संपर्क तथा व्यापारिक संबंध बंगाल की खाड़ी के पार बना रखे थे। इसका प्रमुख कारण बंगाल की खाड़ी में चलने वाली मानसूनी हवाओं के द्वारा समुद्री यात्रा का सुगम होना था।
चन्द्रगुप्त द्वीतीय विक्रमादित्य के कुशल शासन की प्रशंसा चीनी यात्री फाह्यान ने भी की है। इनके नवरत्नों की प्रसिध्दि सर्वकालिक रही है। नवरत्नों में सर्वोत्कृष्ट महाकवि कालिदास थे। जबकि क्षणपक रत्न फलित ज्योतिषी थे।
गुप्तकाल में स्वर्ण मुद्रा को दीनार कहा जाता था। चीनी यात्री फाह्यान के अनुसार, लोग दैनिक क्रय-विक्रय में कौडियों का प्रयोग करते थे।
गुप्त शासकों के सिक्के उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल, मध्य प्रदेश, राजस्थान और उड़ीसा (ओडिशा) में पाए गए हैं। सिक्कों का सबसे प्रसिध्द प्राप्ति स्थल राजस्थान का भरतपुर (बयाना) है। इनके द्वारा जारी किए गए चांदी के सिक्के रुपक कहलाते थे तथा स्वर्ण मुद्राओं को दीनार कहा जाता था।
गुप्तकाल में लिखित संस्कृत नाटकों में स्त्री और शूद्र प्राकृत भाषा बोलते थे, जबकि उच्च वर्ण के लोग संस्कृत भाषा बोलते थे।



सती प्रथा का प्रथम अभिलेखिक साक्ष्य एरण से प्राप्त हुआ है। यह अभिलेख 510 ई. का है। जिसमें गोपराज नामक सेनापति की स्त्री के सती होने का उल्लेख है।
गुप्त संवत का प्रवर्तक चन्द्र गुप्त प्रथम था। इसकी तिथि 319 ई. है।
गुप्त वंश के शासकों ने मंदिरों एवं ब्राह्मणों को सबसे अधिक ग्राम अनुदान में दिए थे। गुप्त लेखों मे जिन भूमिदानों का उल्लेख किया गया है उससे यह स्पष्ट होता है कि भूमिदान के साथ-साथ गांव की भूमि से उत्पन्न होने वाली आय भी ग्रहीता को सौंप दी जाती थी।
गुप्तकाल मे कला एवं साहित्य मे हुई प्रगति के आधार पर इस काल को प्राचीन भारत का स्वर्ण युग कहा जाता है।
गुप्तकाल में जो लोग राजकीय भूमि पर कृषि करते थे, उन्हें अपनी उपज का एक भाग राजा को कर के रुप में देना पड़ता था, जो सामान्यतः षष्ठांश तक होता था। गुप्त अभिलेखों में भूमि कर को उद्रंग तथा भागकर कहा गया है।
प्रायः सभी धर्मशास्त्रों में भू-राजस्व की दर 1/6 (उपज का छठां भाग) थी।
वह भूमि जिस पर खेती न की गई हो, अप्रहत भूमि कहा जाता था। यह गुप्तकालीन राजस्व  व्यवस्था का एक पद है।
चीनी यात्री सुंगयुन 518 ई. में भारत आया। इसने अपने तीन वर्षों की यात्रा में बौध्द धर्म की प्रतियाँ एकत्रित की थी।
सांख्य दर्शन भारतीय दर्शन के प्राचीनतम संप्रदायों मे परिगणित है। महर्षि कपिल को सांख्य दर्शन का प्रतिष्ठापक आचार्य माना जता है। कहा जाता है कि उन्होने सांख्य-सूत्र एवं तत्वसमास नामक ग्रंथों की रचना की थी।
महाभाष्य के लेखक पतंजलि शुंग वंश के संस्थापक शासक पुष्यमित्र शुंग (185-149 ई.पू.) के समकालीन थे।
हर्षचरित ग्रंथ की रचना सुप्रसिध्द लेखक बाणभठ्ठ ने की थी। यह वर्ध्दन वंश के इतिहास का प्रमुख स्रोत है। यह एक आख्यायिका है, जिसमें लेखक अपने समकालीन शासक तथा उसके पूर्वजों के जीवनवृत्त का वर्णन प्रस्तुत करता है।
बाणभठ्ठ का जन्म औरंगाबाद जिले के (वर्तमान शहर) सोन नदी के किनारे अवस्थित प्रीथिकूटा नामक गांव में हुआ था। इनके पिता का नाम चित्रभानु तथा माता का नाम राजदेवी था।
गुप्त एवं गुप्तोत्तर काल में रेशम के लिए कौशेय शब्द का प्रयोग होता था।
हरिषेण प्रयाग-प्रशस्ति का रचयिता तथ समुद्रगुप्त का संधिविग्रहिका सचिव था, जबकि हर्ष का दरबारी कवि बाणभठ्ठ था।
अमीर खुसरो अलाउद्दीन खिलजी का दरबारी कवि था। कालिदास चन्द्रगुप्त द्वीतीय के दरबारी कवि एवं नवरत्नों में से एक थे।


प्राचीन भारत में स्थापत्य कला

मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में स्थित खजुराहो में चंदेल राजाओं द्वारा निर्मित मंदिर आज भी चंदेल स्थापत्य की उत्कृष्टता का बखान कर रहे हैं | इन मंदिरों का निर्माण 950-1050 ई के बीच कराया गया था | यहां के मंदिरों में कंदरिया महादेव मंदिर सर्वोत्तम है | खजुराहो में 85 मंदिर के निर्माण का उल्लेख मिलता है वर्तमान में इनमें से 30 मंदिर ही शेष है |
यह मंदिर वैष्णव , शैव , शाक्त एवं जैन धर्म से संबंधित है | यहां का मांतगेश्वर मंदिर भगवान शिव को समर्पित है | यह मंदिर संभवत: राजा धंग के काल में निर्मित हुआ | इन मंदिरों के निर्माण शैली नागर है। जैन मंदिरों में ‘ पार्श्वनाथ मंदिर ‘ प्रसिद्ध है | यहां के अन्य मंदिर है – चौसठ योगिनी , ब्रह्मा , लालगुंआ महादेव , लक्ष्मण , विश्वनाथ मंदिर आदि| यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थल सूची में शामिल मध्य प्रदेश के ऐतिहासिक स्थलों में खजुराहो का मंदिर , भीमबेटका की गुफाएं एंव सांची का स्तूप शामिल है |
दशावतार मंदिर देवगढ़ (झांसी) में स्थित है तथा यह मंदिर गुप्तकालीन है | प्राचीन भारत में गुप्त काल से संबंधित गुफा चित्रांकन के केवल दो उदाहरण उपलब्ध है | इनमें से एक अजंता की गुफाओं में किया गया चित्रांकन है | दूसरा उदाहरण बाघ की गुफाएं हैं जिनकी तिथि गुप्तकालीन है | इन गुफाओं के चित्र लोक जीवन से संबंधित हैं तथा अजंता गुफाओं के चित्र बौद्ध धर्म से संबंधित है |
महाराष्ट्र में मुंबई से लगभग 200 मील उत्तर मे कन्हेरी नामक गुफाओं का एक विशाल समूह स्थित है | अनेक वर्षों तक इन गुफाओं में बौद्ध भिक्षुओं का निवास रहा | ये गुफाएं आठवी व नौवीं सदी की है |
माउंट आबू के दिलवाड़ा जैन मंदिर संगमरमर के बने हैं , जिनका निर्माण गुजरात के चालुक्य ( सोलंकी ) शासक भीमदेव प्रथम के सामंत विमल शाह ने करवाया था | यह जैन मंदिर अपनी नक्काशी सुंदर मीनाकारी के लिए प्रसिद्ध है | पालीताणा का पवित्र जैन मंदिर गुजरात के भावनगर जिले की शत्रुंजय पहाड़ियों पर स्थित है |
ऐलीफेंटा ( मुंबई से समुद्र में 7 मील उत्तर-पूर्व स्थित द्वीप ) के प्रसिद्ध मंदिरों का निर्माण राष्ट्रकूट शासकों द्वारा कराया गया था |  यहां से 5 गुफा मंदिर प्राप्त हुए हैं जिनमें हिंदू धर्म ( मुख्यतः शिव )  से संबंधित मूर्तियां हैं | साथ ही यहां दो बौद्ध गुफाएं भी हैं |  इन गुफाओं का निर्माण काल पांचवी से आठवीं सदी के बीच माना जाता है |  यहां पर प्रसिद्ध त्रिमूर्ति शिव की प्रतिमा प्राप्त हुई है |
एलोरा महाराष्ट्र के औरंगाबाद से लगभग 25 किमी पश्चिमोत्तर में स्थित है। यह शैलकृत गुफा मंदिरों के लिए जग प्रसिद्ध है। यहां कुल 34 शैलकृत गुफाएं हैं। ये गुफाएं विभिन्न कालों में बनी है तथा इनमें गुफा सं० 1 से 12 तक बौद्धों तथा 13 से 29 तक हिंदुओं और 30 से 34 तक जैनियों से संबंधित हैं। जो थोडे-थोड़े अंतर बर बनी हैं। एलोरा का कैलाश मंदिर शैलकृत स्थापत्य का उदाहरण है। द्रविड़ शैली के इस विश्व प्रसिद्ध मंदिर का निर्माण राष्ट्रकूट शासक कृष्ण प्रथम ने करवाया था।
पश्चिमी भारत में प्राचीनतम शैलकृत गुफाएं नासिक , एलोरा एवं अजंता में है | * ये तीनों स्थल महाराष्ट्र में स्थित हैं| नासिक की बौद्ध गुफाएं सुविख्यात हैं , उन्हें ‘ पांडुलेण ‘  कहा जाता है
राष्ट्रकूट शासकों के समय वैसे तो ब्राह्मण धर्म का महत्व था किंतु ब्राह्मण धर्म की तुलना में जैन धर्म का अधिक प्रचार प्रसार था तथा इसे राजकीय संरक्षण भी प्राप्त था | * राष्ट्रकूट शासक अमोघवर्ष का गुरु जैनाचार्य जिनसेन था जिसने आदि पुराण की रचना थी | उस समय शासकों तथा सामंतों के साथ-साथ सेनापति पदों पर भी अनेक जैन धर्मानुयायियों की नियुक्ति की जाती थी |
अजंता की गुफाएं वाकाटकों के अधीन राजसी संरक्षण और जागीरदारों द्वारा निर्मित करवाई गई थी | * अजंता की गुफा संख्या 16 में उत्कीर्ण ‘ मरणासन्न राजकुमारी का चित्र ‘ प्रशंसनीय है | * इस चित्र की प्रशंसा करते हुए ग्रिफिथ , वर्गेस एवं फर्गुसन ने कहा ‘ करुणा , भाव एवं अपनी कथा को स्पष्ट ढंग से कहने की दृष्टि से यह चित्रकला के इतिहास में अनतिक्रमणीय है।
गुफा संख्या 16 को वाकाटक शासक हरिषेण ( 475-500 ई. ) के मंत्री वराहदेव ने बौद्ध संघ को दान में दिया था। * अजंता के चित्र तकनीकी दृष्टि से विश्व में प्रथम स्थान रखते हैं। * इन गुफाओं में अनेक प्रकार के फूल – पत्तियों , वृक्षों तथा पशु आकृति की सजावट तथा बुद्ध एवं बोधिसत्वों की प्रतिमाओं के चित्रण में जातक ग्रंथों से ली गई कहानियों का वर्णनात्मक दृश्य के रूप में प्रयोग हुआ है। * ये चित्र अधिकतर जातक कथाओं को दर्शाते है।
पुरी स्थित कोणार्क का विशाल सूर्य देव का मंदिर नरसिंह देववर्मन प्रथम चोडगंग ने बनवाया था | * यह मंदिर 13वीं शताब्दी का है तथा यह अपनी विशिष्ट शैली के लिए प्रसिद्ध है | * इस मंदिर का आधार एक विशाल चबूतरा है | * इसके चारों ओर पत्थर के तराशे हुए 12 पहिए लगे हुए हैं और सूर्य के रथ का पूरा आभास देने के लिए चबूतरे के सामने जो सीढ़ियां है उनसे सात अश्वों की स्वतंत्र मूर्तियां लगी है , मानो के सातों घोड़े रथ को खींच रहे हो | * कोणार्क के सूर्य मंदिर को ‘ काला पैगोडा (Black Pagoda) ‘ भी कहा जाता है |


लिंगराज मंदिर उड़ीसा के भुवनेश्वर में स्थित है। इस मंदिर की शैली नागर है | * यह आर्य नागर शैली का सर्वोत्तम मंदिर है | * लिंगराज मंदिर का सबसे आकर्षक भाग है इसका शिखर है जिसकी ऊंचाई 180 फीट है | * जगन्नाथ मंदिर उड़ीसा राज्य के पुरी जिले में स्थित है। यह मंदिर नागर शैली में बना है | * मोढ़ेरा का सूर्य मंदिर गुजरात में स्थित है | * इसका निर्माण सोलंकी वंश के राजा भीमदेव द्वारा 1026 ईस्वी में कराया गया था |
अंकोरवाट मंदिर समूह का निर्माण कंपूचिया ( वर्तमान कंबोडिया ) के शासक सूर्यवर्मन II द्वारा 12वी शताब्दी के प्रारंभ में अपनी राजधानी यशोधरपुर ( वर्तमान-अंगकोर ) में कराया गया था। * विष्णु को समर्पित द्रविड़ शैली का यह मंदिर विश्व का सबसे बड़ा हिंदू मंदिर समूह है। * बोरोबुदुर का प्रख्यात स्तूप इंडोनेशिया के जावा द्वीप पर स्थित है | * यह एक यूनेस्को द्वारा मान्य ‘ विश्व विरासत स्थल ‘ ( world heritage site ) है।
पाण्ड्यो के राज्यकाल में द्रविड़ शैली में मंदिरों का निर्माण हुआ | * इस काल में मंदिर छोटे होते थे किंतु उनके प्रांगण के चारों ओर अनेक प्राचीर बनाए जाते थे। ये प्राचीर तो सामान्य होते थे किंतु इनके प्रवेश द्वार जिन्हें ‘ गोपुरम ‘ कहा जाता था। * भव्य एवं विशाल और प्रचुर मात्रा में शिल्पकारिता से अलंकृत होते थे।
मामल्ल शैली (640-674 ई.) का विकास नरसिंह वर्मा प्रथम महामल्ल के काल में हुआ। * इसके अंतर्गत दो प्रकार के स्मारक बने – मण्डप तथा एकाश्मक मंदिर जिन्हें रथ कहा गया है। * पल्लव कला की राजसिंह शैली , जिसका प्रारंभ नरसिंह वर्मन द्वितीय ‘ राजसिंह ‘ ने किया था , के तीन मंदिर महाबलीपुरम से प्राप्त होते हैं। – शोर मंदिर (तटीय शिव मंदिर) , ईश्वर मंदिर तथा मुकुंद मंदिर | * शोर मंदिर इस शैली का प्रथम उदाहरण है |* महाबलीपुरम में रथ मंदिरों का निर्माण पल्लव शासक द्वारा करवाया गया था | * यह मंदिर एकाश्म पत्थर से निर्मित है | * पल्लव कालीन मामल्ल शैली से बने रथों या एकाश्म  मंदिरों में द्रौपदी रथ सबसे छोटा है इसमें किसी प्रकार का अलंकरण नहीं मिलता | * तथा यह सिंह एवं हाथी जैसे पशुओं के आधार पर टिका हुआ है |
श्रीनिवासननल्लूर का कोरंगनाथ मंदिर चोल शासक परांतक प्रथम के काल में निर्मित हुआ था | * तंजौर में राजराजेश्वर मंदिर अथवा बृहदीश्वर मंदिर का निर्माण राजराज प्रथम के काल में निर्मित हुआ था | * इसके निर्माण में ग्रेनाइट पत्थरों का प्रयोग हुआ |
राजराज के पुत्र राजेंद्र चोल के शासनकाल में गंगेकोंडचोलपुरम में मंदिर का निर्माण हुआ | * राजराज द्वितीय द्वारा दारासुरम का ऐरावतेश्वर का मंदिर तथा कुलोतुंग तृतीय द्वारा त्रिभुवनम् का कम्पहरेश्वर मंदिर बनवाए गए | * कम्पहरेश्वर को त्रिभुवनेश्वर भी कहा जाता है | * इसकी योजना भी ऐरावतेश्वर मंदिर के ही समान है | * इसमें मूर्तिकारी की अधिकता है | * नीलकंठ शास्त्री ने इसे ‘ मूर्ति दीर्घा ‘ कहा है |


तक्षशिला की स्थापना सातवीं अथवा छठवीं शताब्दी ईसा पूर्व में की गई थी | * जिस पहाड़ी पर तक्षशिला के सबसे पहले कस्बें की स्थापना की गई थी वह सिंधु नदी क्षेत्र में तामरा नाला के समीप स्थित है | * यह वर्तमान इस्लामाबाद से 30 किलोमीटर उत्तर -पश्चिम में स्थित है ,जो सिंधु व झेलम नदियों के मध्य का क्षेत्र है | * तक्षशिला हिंदूज राज्य ( or indus country ) की राजधानी थी और प्रमुख सांस्कृतिक केंद्र के रूप में प्रसिद्ध थी |
सोनगिरि दतिया (मध्य प्रदेश ) से 15 किलोमीटर दूरी पर स्थित है | * यह दिगंबर जैनियों का पवित्र स्थल है | * सोनगिरी के चारो और सफेद जैन मंदिर स्थापित है | * वर्तमान में यहां 77 जैन मंदिर पहाड़ी पर और 26 गांव में स्थित है | * इस प्रकार इनकी कुल संख्या 103 है | * पहाड़ी पर स्थित 57वां मंदिर मुख्य मंदिर है , जो भगवान चंद्रप्रभु से संबंधित है
विरुपाक्ष मंदिर कर्नाटक राज्य के बेंगलुरु शहर से 350 किलोमीटर दूर हम्पी ( hampi ) में स्थित है | * यह मंदिर भगवान शिव के नाम अर्पित है , जो यहां विरुपाक्ष के नाम से जाने जाते हैं |
नागर, द्रविड़ तथा बेसर भारतीय मंदिर वास्तु के तीन मुख्य शैलियां है | * नागर शैली समस्त उतरी भारत में प्रचलित है | * उड़ीसा के मंदिर शुद्ध रूप से इसी शैली के हैं | * द्रविड़ शैली का प्रसार दक्षिण भारत विशेषकर कृष्णा नदी एवं कुमारी अंतरीप के मध्य ( तमिलनाडु ) में था | * बेसर शैली का विकास , नागर एवं द्रविड़ शैली के मिश्रण से हुआ है | * कन्नड़ प्रदेश के अंतिम चालुक्य शासकों के द्वारा प्रयुक्त होने के कारण इस शैली को चालुक्य शैली भी कहते हैं। *
पंचायतन शब्द मंदिर रचना -शैली को निर्दिष्ट करता है | * बद्रीनाथ कूपर द्वारा रचित ‘ बृहत् प्रमाणिक हिंदी कोष ‘ के अनुसार , पंचायतन एक पुलिंग शब्द है जो किसी देवता और उसके साथ के 4 देवताओं की मूर्ति के समूह के लिए प्रयुक्त होता है जैसे – शिव पंचायतन , राम पंचायतन आदि |
बद्रीनाथ मंदिर में पांच मूर्तियां है , जो बद्री पंचायतन के नाम से प्रसिद्ध है | * राजस्थान के उदयपुर में स्थित जगदीश मंदिर शिल्प कला की दृष्टि से अनोखा है | * यह मंदिर पंचायतन शैली का है। चार लघु मंदिरों से परिवृत्त होने के कारण इसे पंचायतन कहा गया है।
प्रसिद्ध नैमिषारण्य तीर्थ उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले में स्थित है | * यहां महर्षि दधीचि ने देवताओं को अपनी अस्थियां दान की थी, जिससे निर्मित वज्र द्वारा देवराज इंद्र ने दैत्यों का वध किया था।


मध्य प्रदेश में छतरपुर जिले में स्थित खजुराहों में चंदेल राजाओं द्वारा निर्मित आज भी चंदेल स्थापत्य की उत्कृष्टता का बखान कर रहे हैं। इन मंदिरों का निर्माण 950-1050 ई. के बीच कराया गया था। यहां के मंदिरों में कंदरिया महादेव मंदिर सर्वोत्तम है।
खजुराहों में 85 मंदिरों के निर्माण का उल्लेख मिलता है। ये मंदिर चंदेल शासकों द्वारा बनवाए गए। वर्तमान में इनमे से 30 मंदिर ही शेष हैं। ये मंदिर वैष्णव, शैव,  शाक्त एवं जैन धर्म से संबंधित हैं।
खजुराहों का मातंगेश्वर मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। यह मंदिर संभवतः राजा धंग के काल में निर्मित हुआ। इन मंदिरों की निर्माण शैली नागर है।
दशावतार मंदिर (झांसी) में स्थित है तथा यह मंदिर गुप्तकालीन है।
यूनेस्कों की विश्व धरोहर स्थल सूची में शामिल म.प्र. के ऐतिहासिक स्थलों में खजुराहों का मंदिर, भीमबेटका की गुफाएं एवं सांची का स्तूप शामिल हैं।
ग्वालियर के तेली मंदिर का शिखर द्रविड़ शैली मे बना है। जबकि नक्काशियां एवं मूर्तियां उत्तर भारतीय शैली में बनी है। इसकी वास्तु शैली में हिंदू और बौध्द वास्तुकला का मिश्रण है।
महाराष्ट्र में मुंबई से लगभग 200 मील उत्तर में कन्हेरी नामक गुफाओं का एक विशाल समूह स्थित है। अनेक वर्षों तक इन गुफाओं मे बौध्द भिक्षुओं का निवास रहा। ये गुफाएँ 8वीं-9वी शताब्दी की हैं.
आबू के दिलवाड़ा जैन मंदिर संगमरमर के बने हैं, जिनका निर्माण गुजरात के चालुक्य (सोलंकी) शासक भीमदेव प्रथम के सामंत विमलशाह ने करवाया था।
पालिताणा का पवित्र जैन मंदिर  गुजरात के भावनगर  जिल की शत्रुंजय पहाड़ियों पर अवस्थित है। यह मंदिर जैन तीर्थंकर आदिनाथ को समर्पित है।
गुप्तकाल में चित्रांकन का दूसरा उदाहरण बाघ की गुफाएं हैं जिनकी तिथि गुप्तकालीन है। इन गुफाओं के चित्र लोक जीवन से संबंधित हैं तथा अजंता गुफाओं के चित्र बौध्द धर्म से संबंधित हैं। जबकि लोमस ऋषि गुफा मौर्यकालीन है, जो कि बराबर की पहाड़ियों मे स्थित है, जो बिहार  के जहानाबाद जिले में है। नासिक गुफाएँ सातवाहन काल की हैं।
एलोरा महाराष्ट्र के औरंगाबाद से लगभग 30 किमी. पश्चिमोत्तर मे स्थित है। यह शैलकृत गुफा मंदिरों के लिए जग-प्रसिध्द है। यहां कुल 34 शैलकृत गुफाएँ हैं। ये  गुफाएं विभिन्न कालों में बनी है और इनमें गुफा  सं. 1 से 12 तक बौध्दो तथा 13 से 29 तक हिंदुओं  और 30 से  34 तक जैनियों से संबंधित हैं, जो थोडे-थोड़े अंतर पर बनी है।


दक्षिण भारत (चोल, चालुक्य, पल्लव एवं संगम युग)

संगम कालीन साहित्य में कोन, को एवं मन्नन शब्द को राजा के लिए प्रयुक्त किया जाता था। संगम का तात्पर्य कवियों की गोष्ठी से है। इन  गोष्ठियों (संगमों) में कवियों द्वारा रचा गया साहित्य संगम साहित्य कहलाता है। संगम युग में दक्षिण भारत में पाण्ड्य राजाओं के संरक्षण में तीन संगम आयोजित किए गए थे –
प्रथम संगम

स्थान

मदुरई



अध्यक्षता

अगस्त्य ऋषि

द्वीतीय संगम

स्थान

कपाटपुरम (अलैवाई)



अध्यक्षता

अगस्त्य ऋषि

तृतीय संगम

स्थान

मदुरई

 
अध्यक्षता

नक्कीरर



दक्षिण भारत के आर्यकरण का श्रेय अगस्त्य ऋषि को जाता है | इन्हें तमिल साहित्य के जनक के रूप में जाना जाता है | तोल्काप्पियम द्वितीय संगम का एकमात्र अवशिष्ट ही नहीं प्रत्युत अद्यतन  उपलब्ध तमिल साहित्य का प्राचीनतम ग्रंथ है | इसके प्रणायनकर्ता तोल्काप्पियर ऋषि अगस्त्य के 12 योग्य शिक्षकों में से एक थे | * यह एक व्याकरण ग्रंथ है | * इसकी रचना सूत्र शैली में की गई है। * व्याकरण के साथ-साथ यह काव्य शास्त्र का भी एक उच्चकोटि का ग्रंथ है |
शिलप्पादिकारम ‘ का लेखक इलंगो आडिगल था | * यह संगम साहित्य का महत्वपूर्ण काव्य है | * इसका लेखक चोल नरेश करिकाल का पौत्र था | *इस ग्रंथ में पुहार या कावेरीपट्टनम के एक धनाड्य व्यापारी के पुत्र कोवलन एवं उसकी अति सुंदर किंतु दुर्भाग्यशालिनी पत्नी कन्नगी से संबंधित दुःखद एवं मार्मिक कथा का वर्णन है। * तिरुक्कुरल तमिल भाषा में रचित काव्य रचना है। जिसमें नीतिशास्त्र का वर्णन है। * इसके रचयिता तिरुवल्लुर हैं। *
तोल्काप्पियन तमिल भाषा के व्याकरण की पुस्तक हैं।* कुरल तमिल साहित्य का बाइबिल तथा लघुवेद माना जाता है। * इसे मुप्पाल भी कहा जाता है। * इसकी रचना सुप्रसिद्ध कवि तिरुवल्लुवर ने की थी। * अनुश्रुतियों के अनुसार , तिरुवल्लुवर ब्रह्मा के अवतार थे।
पल्लव शासक सिंहविष्णु ( 575-600 ई ) ने ‘ अवनिसिंह ‘ की उपाधि धारण की थी। * कशाकुडी दानपात्र से ज्ञात होता है कि सिंहविष्णु ने चोल , पाण्ड्य , सिंहल तथा कलम्र के राजाओं को पराजित किया | * नरसिंहवर्मन प्रथम ( 630-638 ई ) ने ‘ महामल्ल ‘ की उपाधि धारण की थी। * परमेश्वरवर्मन प्रथम ( 670-700 ई ) ने लोकादित्य , एकमल्ल , रणंजय , अत्यंतकाम , उग्रदंड , गुणभाजन आदि उपाधियां ग्रहण की। * महेंद्रवर्मन प्रथम ( 600-630 ई ) ने ‘ मत्तविलासप्रहसन ‘ नामक हास्य ग्रंथ की रचना की थी।
संगम साहित्य में केवल चोल , चेर , पाण्ड्य राजाओं के उद्भव और विकास का विवरण प्राप्त होता है। * चोल स्थापत्य के उत्कृष्ट नमूने तंजौर के शैव मंदिर , जो राजराजेश्वर या बृहदीश्वर नाम से प्रसिद्ध हैं , का निर्माण राजराज प्रथम के काल में हुआ था। * भारत के मंदिरों में सबसे बड़ा तथा लंबा यह मंदिर द्रविड़ शैली का  सर्वोत्तम नमूना माना जा सकता है। * इस मंदिर के बहिर्भाग में नंदी की एकाश्म विशाल मूर्ति बनी है जिसे भारत की विशालतम नंदी मूर्ति माना जाता है।
कृष्णा तथा तुंगभद्रा नदियों से लेकर कुमारी अंतरीप तक का विस्तृत भूभाग प्राचीन काल में तमिल प्रदेश का निर्माण करता था। * इसमें कोरोमंडल तट तथा दक्कन के कुछ भाग यथा -उरैयूर , कावेरीपट्टनम , तंजावुर आदि चोलो के अधिकार में थे।
परांतक – I के अंतिम दिनों में राष्ट्रकूट शासक कृष्णा III ने पश्चिमी गंगों ( बुत्तुग – II ) की सहायता से तक्कोलम के युद्ध में चोलों को परास्त किया और तंजौर पर अधिकार कर लिया। * कृष्णा III  ने इस उपलक्ष्य में ‘तंजैयुकोंड ‘ की उपाधि धारण की थी।
चोलों की राजधानी तंजौर थी। * इसके अतिरिक्त गंगैकोंडचोलपुरम भी चोलों की राजधानी थी। * संगम काल में चोलों की राजधानी उरैयूर थी। * द्रविड़ देश में चोल अधिपत्य की स्थापना वस्तुतः परांतक प्रथम ने की थी। * उसने मदुरा के पाण्ड्य राजा को हराकर ‘ मदुरैकोंड उपाधि ‘ धारण की थी। * राजराज I ने सर्वप्रथम चेरों की नौसेना को कंडलूर में परास्त किया। * राजराज प्रथम एंव उसके पुत्र  राजेंद्र I ने दक्षिणी – पूर्वी एशिया के शैलेन्द्र साम्राज्य के विरुद्ध सैन्य चढ़ाई की तथा कुछ क्षेत्रों को जीत लिया।
चोल शासक राजराज प्रथम ने सिंहल ( श्रीलंका ) पर आक्रमण करके उत्तरी सिंहल को जीतकर अपने राज्य में मिला लिया | * विजित क्षेत्र में राजराज ने अनुराधापुर को नष्ट कर पोलोन्नरूवा को इस क्षेत्र की राजधानी बनाया और इसका नाम ‘ जननाथ मंगलम् ‘ रखा।

राजराज प्रथम की मृत्यु के बाद उसका योग्यतम् पुत्र राजेंद्र प्रथम सम्राट बना। * उसने अपने पिता की साम्राज्यवादी नीति को आगे बढ़ाया | * राजेंद्र प्रथम का काल चोल शक्ति का चरमोत्कर्ष काल था। * उसने ‘ बंगाल की खाड़ी ‘ को ‘ चोल झील ‘ का स्वरूप प्रदान कर दिया था। * 1017 ई में उसने संपूर्ण सिंहल द्वीप ( श्रीलंका ) की जीत लिया तथा वह सिंहल राजा महेंद्र पंचम को बंदी बनाकर चोल राज्य ले आया। * उसने पवित्र गंगाजल लाने के उद्देश्य से उत्तर पूर्वी भारत ( गंगा घाटी ) पर आक्रमण किया तथा पाल शासक महीपाल को पराजित किया।
इस विजय के उपलक्ष्य  में उसने  गंगैकोंड  की उपाधि   ग्रहण की तथा गंगैकोंडचोलपुरम  नामक नई  राजधानी की स्थापना की  |  नवीन राजधानी  के निकट ही   उसने सिंचाई  के लिए  चोलगंगम  नामक विशाल  तालाब का भी  निर्माण करवाया।  कुलोत्तुंग  प्रथम के समय में श्रीलंका के  राजा विजयबाहु  ने अपनी स्वतंत्रता घोषित की।  किंतु कुलोत्तुंग  प्रथम ने श्रीलंका  में चोल  प्रभाव की   समाप्ति के प्रति  किसी कटुता का   प्रदर्शन  नही किया  तथा  उसने अपनी   पुत्री का  विवाह  श्रीलंका के  राजकुमार वीरप्पेरूमाल के साथ कर  दिया।
चोल शासक कुलोत्तुंग -1 के शासनकाल में  1077 ई०  में  72  सौदागरों का  एक चोल  दूत मंडल  चीन भेजा  गया था | कुलो्तुंग   प्रथम को   चोल लेख  में “शुंगम   तविर्त ”  अर्थात् करो  को हटाने  वाला कहा गया  है। 
·      चोल साम्राज्य को प्रशासन की सुविधा के लिए छः प्रांतों में विभाजित किया गया था।प्रांत को “मंडलम”   कहा जाता था।प्रांत का विभाजन “कोट्टम”  अथवा “वलनाडु”  में हुआ था।यह कमिश्नरियों की तरह था।   प्रत्येक कोट्टम में कई नाडु होते हैं   |  जिले को नाडु कहा जाता था।नाडु की सभा को नाट्टार कहा जाता था।ग्राम संघ को कुर्रम कहा जाता था। व्यापारित   नगरों में  नगरम  नामक  व्यापारियों  की सभा  होती थी होती थी। प्रशासन  की सबसे  छोटी  इकाई  ग्राम-सभा   होती थी।  चोलों के  अधीन  ग्राम प्रशासन  में ग्राम सभा की कार्यकारिणी  समितियों की कार्यप्रणाली  का विस्तृत  विवरण  हम उत्तर मेरुर से प्राप्त  लेखों  के माध्यम  से प्राप्त  करते हैं  |
·       चोल कालीन  गांवों के  गतिविधियों  की देख-रेख   एक  कार्यकारिणी  समिति  करती थी  जिसे वारियम्  कहा जाता  था | उद्यान  प्रशासन  का कार्य  देखने  वाली  समिति  को टोट्ट  वारियम  कहा जाता है,  जबकि संवत्सर  वारियम्  वार्षिक  समिति ,  एरि  वारियम तालाब समिति  तथा पोनवारियम्  स्वर्ण समिति  थी।|
चोल कलाकारों ने तक्षण कला में भी सफलता प्राप्त की है | उन्होंने पत्थर तथा धातु की बहुसंख्यक मूर्तियों का निर्माण किया | पाषाण मूर्तियों से भी अधिक धातु (कांस्य ) मूर्तियों का निर्माण हुआ | सर्वाधिक सुंदर मूर्तियां नटराज शिव की है ,  जो बड़ी संख्या में मिली है |  इन्हीं विश्व की श्रेष्ठतम प्रतिमा रचनाओं में शामिल किया जाता है | यह मूर्तियां प्रायः चतुर्भुज है |  शिव की दक्षिणामूर्ति प्रतिमा उन्हें गुरु (शिक्षक) के रूप में प्रदर्शित करती है | इस रूप में शिव अपने भक्तों को सभी प्रकार का ज्ञान प्रदान करते हुए माने गए हैं | इस रूप में शिव की दक्षिण दिशा में मुख किए हुए प्रतिमा स्थापित की गई है |

चोल राजाओं ने एक विशाल संगठित सेना का निर्माण किया था | चोल सेना में कुल सैनिकों की संख्या लगभग 150000 थी | चोलों के पास अश्व , गज एवं पैदल सैनिकों के साथ ही साथ एक अत्यंत शक्तिशाली नौसेना भी थी | इसी नौसेना की सहायता से उन्होंने श्री विजय , सिंघल  , मालदीव आदि दीपों की विजय की थी | चोल काल के सम्राट प्रायः अपने जीवनकाल में ही युवराज का चुनाव कर लेते थे, जो उसके बाद उसका उत्तराधिकारी बनता था |
·      चोल साम्राज्य को अंततः अलाउद्दीन खिलजी के सेनानायक मलिक काफूर ने अपनी दक्षिण विजय के दौरान समाप्त किया था | इसका स्पष्ट विवरण अमीर खुसरो की प्रसिद्ध कृति “खजाइन-उल-फुतूह”   में प्राप्त होता है |
·      तगर प्राचीन भारत का एक महत्वपूर्ण व्यापारिक केंद्र था, यह कल्याण तथा वेंगी के मध्य स्थित था | बीजापुर (कर्नाटक) जिले के वातापी नामक प्राचीन नगर का आधुनिक नाम बादामी है | छठी – सातवीं शताब्दी ईस्वी में यह चालुक्यों की राजधानी थी | वातापी के चालुक्य राजवंश का वास्तविक संस्थापक पुलकेशिन प्रथम था |
·      पुलकेशिन द्वितीय चालुक्य वंश के शासकों में सर्वाधिक योग्य तथा शक्तिशाली था | उसने 609 ईसवी से 642 ईसवी तक शासन किया |  उसकी उपलब्धियों का विवरण हमें ऐहोल अभिलेख से प्राप्त होता है |  इस लेख की रचना रविकीर्ति ने की थी | चालुक्यों के शासनकाल में  प्रायः महिलाओं को उच्च पदों पर नियुक्त किया जाता था | विजयादित्य प्रथम के भाई चंद्रादित्य की रानी विजय भट्टारिका ने अपने नाम से दो ताम्रपत्र लिखवाए थे | मात्वालिन नामक चीनी यात्री ने  चालुक्यों के शासन काल में चीन एवं भारत के संबंधों का विवरण दिया है |
भारतीय काली मिर्च यूनानी एवं रोम वासियों को बहुत प्रिय थी इसलिए प्राचीन संस्कृत ग्रंथों में इसे “यवनप्रिय” कहा गया है| अरिकामेडु पूर्वी तट पर पांडिचेरी (पुडुचेरी) से 3 किलोमीटर दक्षिण में उष्णकटिबंधीय कोरोमंडल तट पर स्थित है | पेरिप्लस में इसे “पोड़के” कहा गया है| यहां ईसा की प्रारंभिक शताब्दियों में रोमन बस्ती की अवस्थिति मानी जाती है।  यहां से प्राप्त अवशेषों में कई रोमन वस्तुएँ प्राप्त हुई है | जिनमें शराब के दो हत्थे कलश,  रोमन लैम्प,  रोमन ग्लास  आदि प्रमुख  हैं।
·      एम्फोरा जार  एक लंबी एवं संकीर्ण गर्दन वाला और दोनों तरफ हत्येदार जार है प्राचीन काल में इसका प्रयोग तेल या शराब को रखने के लिए किया जाता था।
कंबन ने 12वीं शती ई० में तमिल रामायणम या रामावतारम की रचना तमिल भाषा में की थी।
दक्षिण भारत में नगरों में व्यापारियों के विभिन्न संगठन थे। जैसे मणिग्रामम् , वलंजीयर आदि।  इनका कार्य व्यापार-व्यवसाय को प्रोत्साहन देना था।
·      तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली में कावेरी नदी के तट पर अवस्थित “उरैयूर”  संगम  कालीन महत्वपूर्ण नगर था। यह कारी एवं वाराणम नामों से भी प्रसिद्ध था।  संगम युग में उरैयूर  सूती वस्त्रों का बहुत बड़ा केन्द्र था।  इसका विवरण  “पेरिप्लस ऑफ वी एरीथ्रियन स्री” में मिलता है।
·      पाण्ड्य राज्य की जीवन रेखा वेंगी नदी थी।यह नदी कंडन “मणि कन्यूर”  (पश्चिमी घाट) में मदुरै के समीप (तमिलनाडु) से निकलती है |  पाण्ड्य राज्य कावेरी के दक्षिण में स्थित था | इसमें आधुनिक मदुरा तथा तिन्नेवेल्ली के जिले और त्रावणकोर का कुछ भाग शामिल था | इसकी राजधानी मदुरा थी | वेंगी नदी वाला प्रदेश अपनी उर्वरता के लिए अत्यधिक प्रसिद्ध था |
·      चेर राज्य पर विजय के उपलक्ष्य में पांडय शासक जयंत बर्मन ने “वानवन” की उपाधि धारण की | पल्लवों के विरुद्ध सफलता के उपलक्ष्य में पाण्ड्य शासक मारवर्मन राजसिंह प्रथम ने “पल्लव भंजन” की उपाधि धारण की |
·      दक्षिण भारत के पांड्य वंश के राजा ने रोम राज्य में एक दूत 26 ई०पू  में भेजा था |  मीनाक्षी मंदिर का निर्माण पांडवों ने अपनी राजधानी मदुरई में करवाया था |
·      एक अज्ञात ग्रीक नाविक द्वारा रचित प्रसिद्ध पुस्तक”पेरिप्लस ऑफ वी एरीथ्रियन स्री” में प्राचीन काल के विभिन्न बंदरगाहों की सूची मिलती है |  इसमें नौरा , तोंडी , मुशिरी और नेलिसंडा पश्चिमी तट के प्रमुख  बंदरगाह थे।
·      कदंब राजाओं की राजधानी  वनवासी थी | इस  राज वंश की स्थापना मयूरशर्मन ने  की थी | कदंब  राज्य को पुलकेशिन द्वितीय ने अपने राज्य में मिला लिया था |
चोल साम्राज्य की स्थपाना विजयालय ने की, जो आरंभ में पल्लवों का एक सामंती सरदार था। उसने 850 ई. में तंजौर को अपने अधिकार मे कर लिया। इस समय पल्लवों एवं पाण्डयों में निरंतर संघर्ष चल रहा था। पण्डयों की निर्बल स्थित का लाभ उठाकर विजयालय ने तंजौर पर अधिकार जमा लिया तथा वहां उसने दुर्गा देवी का मंदिर बनवाया। विजयालय ने लगभग 871 ई. तक राज किया।
चोल स्थापत्य के उत्कृष्ट नमूने तंजौर के शैव मंदिर, जो राजराजेश्वर या वृहदीश्वर नाम से प्रसिध्द हैं, का निर्माण राजराज प्रथम के काल में हुआ था। भारत के मंदिरों में सबसे बड़ा तथा लंबा यह मंदिर द्रविड़ शैली का सर्वोत्तम नमूना माना जा सकता है। इसका विशाल प्रांगण 500×250 के आकार का है। मंदिर के प्रवेश पर दोनों ओर दो द्वारपालों की मूर्तियाँ बनी हैं। इस मंदिर के बहिर्भाग में नंदी की एकाश्म विशाल मूर्ति बनी है जिसे भारत की विशालतम नंदी मूर्ति माना जाता है।
कृष्णा तथा तुंगभद्रा नदियों से लेकर कुमारी अंतरीप तक का विस्तृत भू-भाग प्राचीन काल में तमिल प्रदेश का निर्माण करता था। इसमें कोरोमंडल तट तथा दक्कन के कुछ भाग यथा – उरैयूर, कावेरीपट्टनम, तंजावुर आदि चोलों के अधिकार में थे।
चोल शासन की सबसे उल्लेखनीय विशेषता वह असाधारण शक्ति तथा क्षमता है, जो स्वायत्तशासी ग्रामीण संस्थाओं के संचालन में परिलक्षित होती है। वस्तुतः इस काल मे स्वायत्त शासन पूर्णतया ग्रामो में ही क्रियान्वित किया गया ।
चोलो के अधीन ग्राम प्रशासन में ग्राम सभा की कार्यकारिणी समितियों की कार्यप्राणाली का विस्तृत विवरण हम उत्तर मेरूर से प्राप्त लेखों के माध्यम से करते हैं। प्रत्येक ग्राम में अपनी सभा होती थी, जो प्रायः केन्द्रीय नियंत्रण से मुक्त होकर स्वतंत्र रुप से ग्राम शासन का संचालन करती थी।
चोल साम्राज्य की महत्ता का वास्तविक संस्थापकत परांतक द्वीतीय (सुंदर चोल) का पुत्र अरिमोलिवर्मन था, जो 985 ई. में राजराज के नाम से गद्दी पर बैठा यह विजेता के साथ-साथ कुशल प्रशासक तथा महान निर्माता भी था। राजराज ने प्रथम एक स्थायी  सेना तथा विशाल नौसेना का गठन किया। उसने समस्त भूमि की नाप कराई तथा सोने,  चांदी एवं तांबे के सिक्कों का प्रचलनि करवाया।



एरिपत्ति चोल प्रशासन के अंतर्गत वह भूमि होती थी जिससे मिलने वाला राजस्व अलग से ग्राम जलाशय के रख-रखाव के लिए निर्धारित कर दिया जाता था। 7वीं. 8वीं सदी में दक्षिण भारत में घटिका प्रायः मंदिरों के साथ संबध्द विद्यालय थे। चोल कालीन स्थानीय प्रशासन में बड़े नगरो में अलग कुर्रम (ग्राम संघ)  गठित किए जाते थे जिन्हें तनियूर अथवा तकुर्रम कहा जाता था।
तगर प्राचीन भारत का एक महत्वपूर्ण व्यापारिक केन्द्र था, यह कल्याण तथा वेंगी के मध्य स्थित था।
चालुक्यों के शासनकाल में प्रायः महिलाओं को उच्च पदों पर नियुक्त किया जाता था। विजयादित्य प्रथम के भाई चंद्रादित्य की रानी विजय भठ्ठारिका ने अपने नाम से दो ताम्रपत्र लिखवाएं थे। वह एक अच्छी कवयित्री भी थी। विजयादित्य ने अपनी छोटी बहन कुमकुम देवी के कहने पर एक विद्वान ब्राह्मण को एक गांव दान मे दिया था। कीर्तिवर्मन द्वीतीय की महारानी महादेवी के उसके साथ रक्तपुर के स्कंधावार में उपस्थित रहने का उल्लेख मिलता है। इस वंश की विजय भठ्ठारिका ने कुशलतापूर्वक शासन संचालित किया था।
ऐहोल प्रशस्ति बादामी के शासक पुलेकेशिन-II के इतिहास को जानने का एक शक्त माध्यम है। इस लेख की भाषा संस्कृत तथा लिपि दक्षिण ब्राह्मी है। इस लेख की रचना रविकीर्ति ने की थी, प्रशस्ति के अंत में लेखक ने यह दावा किया है कि उसने लिखकर कालिदास तथा भारवि के समान यश प्राप्त किया है। अतः इस अभिलेख में कालिदास के नाम का उल्लेख हुआ है।
तोल्काप्पियम के प्रणयनकर्ता तोल्काप्पियर ऋषि अगस्त्य के बारह योग्य शिष्यों में से एक थे। यह एक व्याकरण ग्रंथ है। इसकी रचना सूत्र शैली में की गई है।
शिलप्पादिकारम का लेखक इलंगो आडिगल था। यह संगम साहित्य का महत्वपूर्ण महाकाव्य है। इसका लेखक चोल नरेश कारिकाल का पौत्र था।
अरिकामेडु पूर्वी तट पर पांडिचेरी (पुडुचेरी) से 3 किमी. दक्षिण में उष्णकटिबंधीय कोरोमंडल तट पर स्थित है। पेरीप्लस में इसे पोडुके कहा गया है। यहां ईसा की प्रारंभिक शताब्दियों में रोमन बस्ती की अवस्थिति मानी जाती है। यहां से प्राप्त अवशेषों में कई रोमन वस्तुएं प्राप्त हुई हैं, जिनमें शराब के दो हत्थे कलश, रोमन लैम्प ग्लास आदि हैं। यहां से न केवल भारतीय माल यथा – मणियां, मोती, मलमल, सुगंधित पदार्थ, इत्र, मसाले और रेशम लादा  जाता था। अपितु रोमवासियों की रुचि एवं नमूनों के अनुसार भी माल निर्माण कर रोम भेजा जात था।
एम्फोरा जार एक लंबी एवं संकीर्ण गर्दन वाला और दोनों तरफ हत्थेदार जार है। प्राचीन काल में, इसका प्रयोग तेल या शराब को रखने के लिए किया जाता था। अरिकामेडु के उत्खनन से रोम आयातित इस  जार के अवशेष मिले  हैं।
कंबन 12वीं शती ई. में तमिल रामायणम या रामावतारम की रचना तमिल भाषा में की थी।
तमिल क्षेत्र के सिध्द (सित्तर) एकेश्वरवादी थे तथा मूर्तिपूजा की निंदा करते थे। लिंगायतों ने जाति की अवधारणा तथा कुछ समुदायों के दूषित होने की ब्राह्मणीय अवधारणा का विरोध किया। इनका विश्वास था कि मृत्युपरांत भक्त शिव में लीन हो जायेंगे तथा इस संसार में पुनः नही  लौटेगे। इन्होने पुनर्जन्म के सिध्दांत को नकार दिया था।
दक्षिण भारत में नगरों में व्यापारियों के विभिन्न संगठन थे, जैसे – मणिग्रामम्, वलंजीयर आदि। इनका कार्य व्यापार-व्यवसाय को प्रोत्साहन देना था।
संगम कालीन साहित्य मे कोन, को एवं मन्न शब्द को राजा के लिए प्रयुक्त किया जाता था।
मीनाक्षी मंदिर का निर्माण पाण्डयों ने अपनी राजधानी मदुराई में करवाया था। महाकाल मंदिर उज्जैन में तथा वेंकटेश्वर मंदिर तिरुमाल (आंध्र प्रदेश) में स्थित है। बेलूर मठ मे रामकृष्ण मिशन की स्थापना 1897 ई. में कोलकाता (प.बंगाल) में स्वामी विवेकानन्द द्वारा की गई थी।


प्राचीन साहित्य एवं साहित्यकार

यूनानी लेखक हेरोडोटस (5वीं शती ई.पू.) को इतिहास का पिता कहा जाता है। हिस्टोरिका उसकी प्रसिध्द पुस्तक है, जिसमें 5वीं शती ई.पू. के भारत-फारस संबंधों का विवरण (अनुश्रुतियों के आधार पर) मिलता है।
मुद्राराक्षस की रचना विशाखदत्त ने की थी। इस ग्रंथ से मौर्य इतिहास, मुख्यतः चन्द्रगुप्त मौर्य के जीवन पर प्रकाश पड़ता है। इसमें चन्द्रगुप्त मौर्य को वृषल तथा कुलहीन कहा गया है। धुंडिराज ने मुद्राराक्षस पर टीका लिखी है।
व्याकरणाचार्य पाणिनि नंद शासक महापद्मनंद के मित्र थे, अष्टाध्यायी उनकी प्रसिध्द कृति है।
वाराहमिहिर गुप्तयुगीन खगोलशास्त्री थे। वृहज्जातक, पंचसिध्दांतिका, , वृहत्संहिता आदि इन के प्रमुख ग्रंथ हैं | इनकी पंचसिद्धांतिका यूनानी ज्योतिर्विद्या पर आधारित है | ब्रह्मगुप्त प्रसिद्ध गणितज्ञ थे , उन्होंने ‘ ब्रह्मस्फुट सिद्धांत ‘ में क्षेत्र व्यवहार , वृतक्षेत्र , चक्रीय चतुर्भुज आदि विषयों की विवेचना की है।
आर्यभट्ट ( चौथी- पांचवी शताब्दी ईसा ) प्राचीन भारत के प्रसिद्ध गणितज्ञ और खगोलशास्त्री थे | उन्होंने अपनी पुस्तक ‘ आर्यभट्टीय ‘ में बताया है कि सूर्य स्थिर है , पृथ्वी घूमती है |उन्होंने चंद्र ग्रहण एंव सूर्य ग्रहण के कारणों तथा पृथ्वी की परिधि का भी पता लगाया है | उन्हें त्रिकोणमिति का जन्मदाता भी माना जाता है | उन्होंने दशमलव स्थानिक मान की खोज की |
पाली भाषा में, बौद्ध भिक्षु नागसेन द्वारा लिखित मिलिंदपन्हो में नागसेन एवं हिंद यवन शासक मिनेण्डर के बीच वार्तालाप का वर्णन है |
कालिदास चंद्रगुप्त द्वितीय के दरबारी कवि थे | इन्होंने मालविकाग्निमित्रम्, ऋतुसंहार , मेघदूत , रघुवंश , कुमारसंभव , अभिज्ञानशा-कुंतलम आदि की रचना की | इनके द्वारा रचित ‘ मालविकाग्निमित्रम् ‘ पांच अंकों का नाटक है जिसमें मालविका और अग्निमित्र की प्रणय कथा वर्णित है | अग्निमित्र शुंग शासक पुष्यमित्र शुंग का पुत्र था|
कश्मीर के हिंदू राज्य का इतिहास हमें कल्हण की राजतरंगिणी पर ज्ञात होता है | इस ग्रंथ की रचना कल्हण ने राजा जयसिंह (1127-1159 ई) के शासनकाल में की थी। कश्मीर के शासक जैनुल आबदीन द्वारा संरक्षित दो विद्वानों जोनराज एवं उनके शिष्य श्रीवर ने कल्हण की राजतरंगिणी का आगे विस्तार किया।
अश्वघोष कुषाण शासक कनिष्क के राजकवि थे | इनकी तुलना मिल्टन , गेटे , कांट तथा वाल्टेयर से की जाती है। उनकी रचनाओं में तीन प्रमुख हैं –
बुद्धचरित
सौंदरानंद
सारिपुत्र प्रकरण |
इनमें प्रथम दो महाकाव्य तथा अंतिम नाटक ग्रंथ है। सौंदरानंद में बुद्ध के सौतेले भाई सुंदर नंद के बौद्ध धर्म ग्रहण करने का वर्णन है। इसमें 18 सर्ग है।
हर्ष को संस्कृत के 3 नाटक ग्रंथों का रचयिता माना जाता है – प्रियदर्शिका , रत्नावली तथा नागानंद | प्रियदर्शिका 4 अंकों का नाटक है , जिसमें वत्सराज उदयन के अंत:पुर की प्रणय कथा का वर्णन हुआ है | रत्नावली में भी 4 अंक है तथा यह नाटक वत्सराज उदयन और उसकी रानी वासवदत्ता की परिचारिका नागरिका की प्रणय कथा का बड़ा ही रोचक वर्णन करता है। नागांनद बौद्ध धर्म से प्रभावित रचना है , इसमें पांच अंक हैं | जयदेव ने हर्ष को भास , कालिदास , बाण , मयूर आदि कवियों की समकक्षता में रखते हुए उसे कविताकामिनी का साक्षात हर्ष निरूपित किया है।
महाकवि भास के नाम से 13 नाटक उपलब्ध हुए हैं , जिन्हें वर्ष 1909 में टी. गणपति शास्त्री ने ट्रावनकोर राज्य से प्राप्त किया था। इन नाटकों के नाम हैं –
प्रतिज्ञायौगंधरायण
स्वपनवासवदत्ता
उरूभंग
दूतवाक्य
पंचरात्र
बालचरित
दूतघटोत्कच
कर्णभार
मध्यमव्यायोग
प्रतिमा नाटक
अभिषेक नाटक
अविमारक
चारूदत्त|