History in Hindi for All Competitive Exams (State Level) Part 3

पाषाण काल

जिस काल का कोई लिखित साक्ष्य नही मिलता है, उसे “प्रागैतिहासिक काल” कहते हैं। ‘आद्य-ऐतिहासिक काल” में लिपि के साक्ष्य तो हैं किंतु उनके अपठ्य या दुर्बोध होने के कारण उनसे कोई निष्कर्ष नही निकलता। जब से लिखित विवरण मिलते हैं वह “ऐतिहासिक काल” है।
प्रागैतिहास के अंतर्गत पाषाण कालीन सभ्यता तथा आद्य-इतिहास के अंतर्गत सिंधु घाटी सभ्यता एवं वैदिक सभ्यता आती है, जबकि छठी शताब्दी ईसा पूर्व से ऐतिहासिक काल का आरंभ होता है। सर्वप्रथम 1863 ई. में भारत में पाषाण कालीन सभ्यता का अनुसंधान  प्रारंभ हुआ।
उपकरणों की भिन्नता के आधार पर संपूर्ण पाषाण युगीन संस्कृति को तीन मुख्य चरणों में विभाजित किया गया। ये हैं –
पुरापाषाण काल
मध्यपाषाण काल
नवपाषाण काल
उपकरणों की भिन्नता के आधार पर पुरापाषाण काल को तीन कालों में विभाजित किया जात है –
पूर्व पुरापाषाण काल – कोड उपकरण (हस्तकुठार खंडक विदारिणी)
मध्य पुरापाषाण काल – फलक उपकरण
उच्च पुरापाषाण काल – तक्षिणी एवं खुरचनी उपकरण
सर्वप्रथम पंजाब की सोहन नदी घाटी (पाकिस्तान) से चापर-चापिंग पेबुल संस्कृति के उपकरण प्राप्त हुए। सर्वप्रथम मद्रास के समीप बदमदुरै तथा आत्तिरपक्कम से हैंडऐक्स संस्कृति के उपकरण प्राप्त किए गए। इस संस्कृति के  अन्य उपकरण क्लीवर, स्क्रेपर आदि हैं।
रॉबर्ट ब्रूस फुट ब्रिटिश भूगर्भ- वैज्ञानिक और पुरातत्वविद थे। 1863 ई. में रॉबर्ट ब्रूस फुट ने मद्रास के पास पल्लवरम नामक स्थान से पहला हैंडऐक्स प्राप्त किया था। उनके मित्र किंग ने अत्तिरमपक्कम से पूर्व पाषाण काल के उपकरण खोज निकाले।
वर्ष 1935 में डी. टेरा के नेतृत्व में एल कैम्ब्रिज अभियान दल ने सोहन घाटी में सबसे महत्वपूर्ण अनुसंधान किए। बेलन घाटी में इलाहाबाद विश्वविद्यालय के जी.आर. वर्मा के निर्देशन में अनुसंधान किया गया। पूर्व पुरापाषाण काल से संबंधित यहां 44 पुरास्थल प्राप्त हुए हैं।
उपकरणों के अतिरिक्त बेलन के लोंहदा नाला क्षेत्र से इस काल की अस्थि निर्मित मातृदेवी की एक प्रतिमा मिली है, जो संप्रति कौशाम्ब संग्रहालय में सुरक्षित है। फलकों की अधिकता के कारण मध्य पुरापाषाण काल को फलक संस्कृति भी कहा जाता है। इन उपकरणों का निर्माण क्वार्टजाइट पत्थरों से किया गया है।
पुरापाषाण कालीन मानव का जीवन पूर्णतया प्राकृतिक था। वे प्रधानतः शिकार पर निर्भर रहते थे तथा उनका भोजन मांस अथवा कंदमूल हुआ करता था। अग्नि के प्रयोग से अपरिचित रहने के कारण वे मांस कच्चा खाते ते। इस युग का मानव शिकारी एवं खाद्य संग्राहक था। इस काल के मानव को पशुपालन तथा कृषि का ज्ञान नहीं था।
भारत में मध्यपाषाण काल के विषय में जानकारी सर्वप्रथम 1867 ई . में हुई जब सी.एल. कार्लाइल ने विंध्य क्षेत्र से लघु पाषाणोपकरण खोज निकाले। मध्यपाषाण काल के विशिष्ट औजार सूक्ष्म पाषाण का पत्थर के बहुत छोटे औजार हैं।
भारत में मानव अस्थि पंजर सर्वप्रथम मध्यपाषाण काल से ही प्राप्त होने लगता है।  गुजरात स्थित लंघनाज सबसे महत्वपूर्ण पुरास्थल है। यहां से लघु पाषाणोपकरणों के अतिरिक्त पशुओं की हड्डियां, कब्रिस्तान तथा कुछ मिट्टी के बर्तन भी प्राप्त हुए हैं। यहां से 14 मानव कंकाल भी मिले हैं।
मध्यपाषाण कालीन महदहा (प्रतापगढ़, उ.प्र.) से हड्डी एवं सींग निर्मित उपकरण प्राप्त हुए हैं। जी.आर. शर्मा ने महदहा के तीन क्षेत्रों का उल्लेख किया है, जो झील क्षेत्र, बूचड़खाना संकुल क्षेत्र एवं कब्रिस्तान निवास क्षेत्र में बंटा था। बूचड़खाना संकुल क्षेत्र से ही हड्डी एवं सींग निर्मित उपकरण एवं आभूषण बड़े पैमाने पर पाए गए हैं।
डॉ. जयनारायण पाण्डेय द्वारा लिखित पुस्तक पुरातत्व विमर्श में महदहा, सराय नाहर राय एवं दमदमा तीनों ही स्थलों से हड्डी के उपकरण एवं आभूषण पाए जाने का उल्लेख है। दमदमा में किए गए उत्खनन के फलस्वरुप पश्चिमी तथा मध्यवर्ती क्षेत्रों में कुल मिलाकर 41 मानव शवाघान ज्ञात हुए हैं। इन शवाघानों में से 5 शवाघान युग्म-शवाघान हैं और एक शवाघान में 3 मानव कंकाल एक साथ दफनाए हुए मिले हैं। शेष शवाघानों में एक-एक कंकाल मिले हैं।
सराय नाहर राय से ऐसी समाधि मिली है जिसमें चार मानव कंकाल एक साथ दफनाए गए थे। वहां की कब्रें (समाधियां) आवास क्षेत्र के अंदर स्थित थी। कब्रें छिछली तथा अंडाकार थी। विंध्य क्षेत्र के लेखहिया के शिलाश्रय संख्या 1 से मध्य पाषाणिक लघु पाषाण उपकरणों के अतिरिक्त सत्रह मानव कंकाल प्राप्त हुए हैं जिनमें से कुछ सुरक्षित हालत में हैं तथा अधिकांश क्षत-विक्षत हैं।
अमेरिका के ओरेगॉन विश्वविद्यालय के जॉन आर. लुकास के अनुसार, लेखहिया में कुल 27 मानव कंकालों की अस्थियाँ मिली हैं। पशुपालन का प्रारंभ मध्यपाषाण काल में हुआ। पशुपालन के साक्ष्य भारत में आदमगढ़ (होशंगाबाद, म.प्र.) तथा बागोर (भीलवाड़ा, राजस्थान) से प्राप्त हुए हैं। मध्यपाषाण काल के मानव शिकार करके, मछली पकड़कर और खाद्य वस्तुओं का संग्रह कर पेट भरते थे।
मध्य प्रदेश के रायसेन जिले में स्थित भीमबेटका प्रागैतिहासिक शैल चित्रकला का श्रेष्ठ उदाहरण है। भारत मे यही से चित्रकारी से युक्त सर्वाधिक 500 शिलाश्रय प्राप्त हुए हैं। यूनस्कों ने भीमबेटका शैलचित्रों को विश्व विरासत सूची में सम्मिलित किया है।


सर्वप्रथम खाद्यान्नों का उत्पादन नवपाषाण काल में प्रारंभ हुआ। इसी काल में गेहूँ की कृषि प्रारंभ हुई। नवीनतम खोजों के आधार पर भारतीय उपमहाद्वीप में प्राचीनतम कृषि साक्ष्य वाला स्थल उत्तर प्रदेश के संत कबीर नगर जिले में स्थित लहुरादेव है। यहाँ से 9000 ई.पू. से 8000 ई.पू. मध्य के चाल के साक्ष्य प्राप्त हुए हैं।
उल्लेखनीय है कि इस नवीनतम खोज के पूर्व भारतीय उपमहाद्वीप का प्राचीनतम कृषि साक्ष्य वाला स्थल मेहरगढ़ (पाकिस्तान के बलूचिस्तान में स्थित, यहां से 7000 ई.पू. में गेहूं के साक्ष्य मिले हैं), जबकि प्राचीनतम चावल के साक्ष्य वाला स्थल कोलहिहवा (इलाहाबाद जिलमें बेलन नदी के तट पर स्थित, यहां से 6500 ई.पू. के चावल की भूसी के साक्ष्य मिले हैं) माना जाता था।
चीन याग्त्जी नगी घाटी क्षेत्र में लगभग 7000 ई.पू. चावल उगाया गया। मक्का (लगभग 6000 ई.पू.) का प्रथम साक्ष्य मेक्सिको में पाया गया। बाजरा 5500 ई.पू. चीन में, सोरघम 5000 ई.पू. पूर्वी अफ्रीका में, राई 5000 ई.पू. में दक्षिण-पूर्व एशिया में तथा जई 2300 ई.पू. में यूरोप में सर्वप्रथम उगाया गया।
मेहरगढ़ से पाषाण संस्कृति से लेकर हड़प्पा सभ्यता तक के सांस्कृतिक अवशेष प्राप्त हुए हैं। मानव कंकाल के साथ कुत्ते का कंकाल बुर्जहोम (जम्मू-कश्मीर) से प्राप्त हुआ। गर्त आवास के साक्ष्य भी यही से प्राप्त हुए। इस पुरास्थल की खोज वर्ष 1935 में डी-टेरा एवं पीटरसन ने की थी।
गुफकराल कश्मीर में स्थित नवपाषाणिक स्थल है। गुफकराल का अर्थ होता है – कुलाल अर्थात कुम्हार की गुहा। यहां के लोग कृषि एवं पशुपालन का कार्य करते थे। चिरांद बिहार के सारण जिले में स्थित है। यहां से नवपाषाणिक अवशेष प्राप्त हुए हैं।
बुर्जहोम (जम्मू-कश्मीर) के पश्चात चिरांद से सर्वाधिक मात्रा में नवपाषाणिक उपकरण प्राप्त हुए हैं। यहां से हड्डी के अनेक उपकरण प्राप्त हुए हैं। यहां से प्राप्त उपकरण हिरण के सींगों से निर्मित हैं। नवपाषाण युगीन दक्षिण भारत में मृतक को दफनाने के स्थल के रुप में वृहत्पाषाण स्मारकों की पहचान की गई।
नवपाषाण कालीन पुरास्थल से राख के टीले कर्नाटक में मैसूर के पास वेल्लारी जनपद में स्थित संगनकल्लू नामक स्थान से प्राप्त हुए। पिकलीहल में भी राख के टीले मिले हैं। ये राख के टीले नवपाषाण युगीन पशुपालक समुदायों के मौसमी शिविरों के जले अवशेष हैं। आग का उपयोग नवपाषाण काल की महत्वपूर्ण उपलब्धि थी।
धातुओ मे सबसे पहले तांबे का प्रयोग हुआ। इस चरण में पत्थर एवं तांबे के उपकरणों का साथ-साथ प्रयोग जारी रहा। इसी कारण इसे ताम्रपाषाणिक संस्कृति (कैल्कोलिथिक कल्चर) कहा जाता है। ताम्रपाषाणिक का अर्थ है – पत्थर एवं तांबे के प्रायोग की अवस्था।
भारत में ताम्रपाषाण युग की बस्तियां दक्षिण-पूवी राजस्थान, पश्चिमी मध्य प्रदेश, पश्चिमी महाराष्ट्र तथा दक्षिण-पूर्वी भारत में पाई जाती हैं।
दक्षिण-पूर्वी राजस्थान में दो पुरास्थलों की खुदाई हुई है, ये हैं – अहाड़ एवं लिलुंद। ये पुरास्थल बनास घाटी में स्थित हैं। बनास घाटी में स्थित होने के कारण इस बनास संस्कृति भी कहते हैं।
अहाड़ का प्राचीन नाम तांबवती अर्थात तांबा वाली जगह है। यहां के मकान पत्थर की चहारदीवारी से घिरे मिले हैं। अहाड़ के पास गिलुंद में मिट्टी की  इमारत बनी है, पर कहीं-कहीं पक्की ईंट भी लगी है। गिलुंद में तांबे के टुकड़े  मिलते हैं। अहाड़ संस्कृति अन्य ताम्रपाषाणिक संस्कृतियों से भिन्न है क्योंकि जहां दूसरें केन्द्रों पर लाल व काले लेप के मृदभांड बने हैं, वहीं यहां पर इस लेप के ऊपर सफेद रंग से चित्रकारी की गई है।
पश्चिमी मध्य प्रदेश में मालवा, कायथा, एरण और नवदाटोली प्रमुख स्थल हैं। नवदाटोली, मध्य प्रदेश का एक महत्वपूर्ण ताम्रपाषाणिक पुरास्थल है, जो इंदौर के निकट स्थित है। इसका उत्खनन एच.डी. संकालिया ने कराया था। यहां से मिट्टी, बांस एवं फूस के बने चौकोर एवं वृत्ताकार घर मिले हैं। यहां के मूल मृदभांड लाल-काले रंग के हैं जिन पर ज्यामितीय आरेख उत्कीर्ण हैं।
कायथा संस्कृति, जो हड़प्पा संस्कृति की कनिष्ठ समकालीन है। इसके मृदभांडो में कुछ प्राक् हड़प्पीय लक्षण हैं, पर साथ ही इस पर हड़प्पाई प्रभाव भी दिखाई देता है। इस संस्कृति की लगभग 40 बस्तियां मालवा क्षेत्र से प्राप्त हुई हैं, जो अत्यंत छोटी-छोटी हैं।


मालवा संस्कृति अपनी मृदभांडो की उत्कृष्टता के लिए मानी जाती है। मध्य प्रदेश में कायथा और एरण की तथा पश्चिमी महाराष्ट्र में इनामगांव की बस्तियां किलाबंद हैं। पश्चिमी महाराष्ट्र के प्रमुख पुरास्थल हैं – अहमदनगर जिले में जोर्वे, नेवासा और दैमाबाद, पुणे जिले में चंदोली, सोनगांव, इनामगांव, प्रकाश और नासिक।
ये सभी पुरास्थल जोर्वे संस्कृति के हैं। अब तक ज्ञात 200 जोर्वे स्थलों में गोदावरी का दैमाबाद सबसे बड़ा है। यह लगभग 20 हेक्टेयर मे फैला है जिसमें लगभग 4000 लोग रह सकते थे। नेवासा (जोर्वे संस्कृति स्थल) से पटसन का साक्ष्य प्राप्त हुआ है।
महाराष्ट्र की ताम्रपाषाण कालीन संस्कृति (जोर्वे संस्कृति) ने नेवासा, दैमाबाद, चंदोली, इनामगांव आदि पुरास्थलों में घरों में मृतकों को अस्थि कलश में रखकर उत्तर से दक्षिण दिशा में घरों के फर्श के नीचे दफनाए जाने का साक्ष्य प्राप्त हुए हैं। आरंभिक ताम्रपाषाण अवस्था के इनामगांव स्थल पर चूल्हों-सहित बड़े-बड़े कच्ची मिट्टी के मकान और गोलाकार गड्डों वाले मकान मिले हैं। पश्चात की अवस्था (1300-1000 ई.पू.) में  पांच कमरों वाला एक मकान मिला है, जिसमें चार कमरे आयताकार हैं  और एक वृत्ताकार। इनामगांव में सौ से अधिक घर और अनेक कब्रें पाई गई हैं। यह बस्ती किलाबंद है और खाई से घिरी हुई है। यहां शिल्पी या पंसारी लोग पश्चिम छोर पर रहते थे, जबकि सरदार प्रायः केन्द्र स्थल पर रहता था।
पूर्वी भारत में गंगातटवर्ती चिरांद के अलावा, बर्दमान जिले के पांडु राजार ढिबि और पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले में बहिषदल उल्लेखनीय ताम्रकालीन स्थल है। कुछ अन्य पुरास्थल जहां खुदाई हुई, वे हैं – बिहार में सेनुवार, सोनपुर और ताराडीह तथा पूर्वी उत्तर प्रदेश में खैराडीह और नरहन।
बिहार, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में रहने वाले लोग टोंटी वाले जलपात्र, गोड़ीदार पश्तरियां और गोड़ीदार कटोरे बनाते थे।
दक्षिण-पूर्वी राजस्थान, पश्चिमी मध्य प्रदेश, पश्चिमी महाराष्ट्र और अन्यत्र रहने वाले ताम्रपाषाण युग के लोग मवेशी पालते और खेती करते थे। वे गाय, भेड़, बकरी और भैंस रखते थे और हिरण का शिकार भी करते थे। ऊंट के भी अवशेष मिले हैं। मुख्य अनाज गेहूँ और चावल के अतिरिक्त वे बाजरे की भी खेती करते थे।
ताम्रपाषाण युग के लोग शिल्प-कर्म में निःसंदेह बड़े दक्ष थे और पत्थर का काम भी अच्छा करते थे। वे कार्नेलियन, स्टेटाइट और क्वार्ट्ज क्रिस्टल जैसे अच्छे पत्थरों के मनके या गुटिकाएं भी बनाते थे। वे लोग कताई और बुनाई जानते थे क्योंकि मालवा में चरखे और तकलियां मिली हैं।
महाराष्ट्र में कपास, सन और सेमल की रुई के बने धागे भी मिले हैं। इनामगांव में कुंभकार, धातुकार, हाथी-दांत के शिल्पी, चूना बनाने वाले और खिलौने की मिट्टी की मूर्ति (टेराकोटा) बनाने वाले कारीगर भी दिखाई देते हैं। इनामगांव में मातृ-देवी की प्रतिमा मिली है, जो पश्चिमी एशिया में पाई जाने वाली ऐसी प्रतिमा से मिलती है। मालवा और रास्थान में मिली रूढ़ शैली में बनी मिट्टी की वृषभ-मूर्तिकाएँ यह सूचित करती हैं कि वृषभ (सांड) धार्मिक पंथ का प्रतीक था।
पश्चिमी महाराष्ठ्र की चंदोली और नेवासा बस्तियों में कुछ बच्चें के गलो में तांबे के मनकों का हार पहनाकर उन्हें दफनाया गया है, जबकि अन्य बच्चों की कब्रों में समान के तौर पर कुछ बर्तन मात्र हैं। महाराष्ट्र में मृतक को उत्तर-दक्षिण की दिशा में रखा जाता था किंतु दक्षिण भारत में पूर्व-पश्चिम की दिशा में। पश्चिमी भारत में लगभग संपूर्ण (एक्सटेंडेड बरिअल) शवाधान प्रचलित था, जबकि पूर्वी भारत में आंशिक शवाधान (फ्रैक्शनल बरिअल) चलता था। सबसे बड़ी निधि मध्य प्रदेश के गुंगेरिया से प्राप्त हुई है। इसमें  424 तांबे के औजार एवं हथियार तथा 102 चांदी के पतले पत्तर हैं।
कायथा के एक घर में तांबे के 29 कंगन और दो अद्वितीय ढंग की कुल्हाड़ियां पाई गई हैं। इसी स्थान में स्टेटाइट और कार्नेलियन जैसे कीमती पत्थरों की गोलियों के हार पात्रों में जमा पाए गए हैं। गणेश्वर स्थल राजस्थान में खेत्री ताम्र-पट्टी के सीकर-झुंझनू क्षेत्र के तांबे की समृध्द खानों के निकट पड़ता है। दक्षिण भारत में ब्रह्मगिरि, पिकलीहल, संगलकल्लू, मस्की, हल्लूर आदि से ताम्रपाषाण युगीन बस्तियों के साक्ष्य मिले  हैं। दक्षिण भारत में कृषक की अपेक्षा चरवाहा संस्कृति क  अधिक प्रमाण मिला है।
भारत में सर्वप्रथम 1861 ई. में अलेक्जेंडर कनिंघम को पुरातत्व सर्वेक्षक के रुप में नियुक्त किया गया था। 1871  ई. में पुरातत्व सर्वेक्षण को सरकार के एक विभाग के रुप में गठित किया गया था। लॉर्ड कर्जन के समय वर्ष 1902 में इसे भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के रुप में केन्द्रीकृत कर जॉन मार्शल को इसका प्रथम महानिदेशक बनाया गया था।
इनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिया के अनुसार, रॉबर्ट ब्रूस फुट ब्रिटिश भूगर्भ-वैज्ञानिक और पुरतत्वविद् थे। जियोलॉजिकल सर्वे से संबंध्द रॉबर्ट ब्रूस फुट ने 1863 ई. में भारत में पाषाणकालीन बस्तियों के अन्वेषण की शुरुआत की।


डेनमार्क के कोपेनहेगन संग्रहालय की सामग्री के आधार पर पाषाण, कांस्य और लौह युग का त्रियुगीन विभाजन 1820 ई. में पुरातात्विक क्रिश्चियन जर्गेनसन थॉमसन ने किया था।
मध्यपाषाण के अंतिम चरण में पशुपालन के साक्ष्य प्राप्त होने लगते हैं। ऐसे पशुपालन के साक्ष्य भारत में आदमगढ़ (होशंगाबाद, म.प्र.) तथा बागोर (भीलवाड़ा, राजस्थान) से मिले है।
मध्यपाषाण कालीन महदहा (उ.प्र. के प्रतापगढ़ जिले में स्थित) से बड़ी मात्रा मे हड्डी एवं सींग निर्मित उपकरण प्राप्त हुए हैं। जी.आर. शर्मा महदहा में तीन क्षेत्रों का उल्लेख करते हैं, जो झील क्षेत्र, बूचड़खाना संकुल क्षेत्र का कब्रिस्तान निवास क्षेत्र में बंचा था। बूचड़खाना संकुल क्षेत्र से ही हड्डी एवं सींग निर्मित उपकरण एवं आभूषण बड़े पैमाने पर पाए गए हैं।


मध्य गंगा घाटी के प्रतापगढ़ जिले में स्थित सराय नाहर राय, महदहा तथा दमदमा का उत्खनन हुआ है। दमदमा मे लगातार पांच वर्षों तक किए गए उत्खनन के फलस्वरुप पश्चिमी तथा मध्यवर्ती क्षेत्रों से कुल मिलाकर 41 मानव शवाधान ज्ञात हुए हैं। इन शवाधानों मे से 5 शवाधान युग्म-शवाधान हैं और एक शवाधान में 3 मानव कंकाल एक साथ दफनाए हुए मिले हैं। शेष शवाधानों मे एक-एक कंकाल मिले हैं।
खाद्यान्नों का उत्पादन सर्वप्रथम नवपाषाण काल में हुआ। यही वह समय है, जब मनुष्य कृषि कर्म से परिचित हुआ।
भारत में मानव का सर्वप्रथम साक्ष्य मध्य प्रदेश में पश्चिमी नर्मदा क्षेत्र में मिला है। इसकी खोज वर्ष 1982 में की गई थी।
आधुनिक मानव समाज द्वारा मुख्य रुप से 8 खाद्य अनाजों का उपभोग किया गया है – जौ, गेहूँ, चावल, मक्का, बाजरा सोरघम, राई एवं जई। अनाजों के पौधे विभिन्न क्षेत्रों में जंगली घासे के रुप में विद्यमान थे जिन्हें बीजों के रुप में मानव ने उगाया, अलग-अलग क्षेत्र में, अलग-अलग समय पर। वैश्विक दृष्टि से देखा जाए, तो सर्वप्रथम जौ 8000 ई.पू. में निकट पूर्व (Near-East भूमध्य सागर एवं ईरान के मध्य स्थित पश्चिमी एशिया के देश) में मानव द्वारा उगाया गया। बाद में लगभग इन्हीं क्षेत्रों में 8000 ई.पू. के आस-पास ही गेहूँ मानव द्वारा उगाया जाने लगा।


नवीनतम खोजों के आधार पर भारतीय उपमहाद्वीप में प्राचीनतम कृषि साक्ष्य वाला स्थल उत्तर प्रदेश के संत कबीर नगर जिले में स्थित लहुरादेव है। यहां से 8000 ई.पू. से 9000 ई.पू. मध्य के चावल के साक्ष्य प्राप्त हुए हैं। उल्लेखनीय है कि इस नवीनतम खोज के पूर्व भारतीय उपमहाद्वीप का प्राचीनतम कृषि साक्ष्य वाला स्थल मेहरगढ़ (पाकिस्तान के बलूचिस्तान में स्थित, यहां से 7000 ई.पू. के गेहूँ के साक्ष्य स्थल कोलडिहवा ( इलाहाबाद जिले में बेलन नदी तट पर स्थित, यहां से 6500 ई.पू. के चावल की भूसी के साक्ष्य मिले हैं) माना जाता था।
ताम्रपाषाण युग को चालकोलिथिक युग भी कहा जाता है।
बलूचिस्तान (पाकिस्तान) में स्थित पुरास्थल मेहरगढ़ से पाषाण संस्कृति से लेकर हड़प्पा सभ्यता तक को सांस्कृतिक अवशेष प्राप्त हुए हैं।
नवदाटोली (मध्य प्रदेश) का उत्खनन दक्कन कॉलेज, पूना के प्रोफेसर एच.डी. सांकलिया ने कराया था। ये स्थल इस महाद्पीव का सबसे विस्तृत उत्खनित ताम्रपाषाणिक ग्राम स्थल है जिसकी तिथि ई.पू. 1600 से 1300 के बीच निर्धारित की गई है।
नवपाषाणयुगीन दक्षिण भारत में शवों को विभिन्न प्रकार की समाधियों में दफनाने की परंपरा रही है। इन समाधियों को जो विशाल पाषाण खंडों से निर्मित हैं बृहत्पाषाण या मेगालिथ (Megalith) के नाम से जना जाता है। इनके विभिन्न प्रकार हैं, जैसे – सिस्ट-समाधि, पिट सर्किल, कैर्न-सर्किल, डोल्मेन, अंब्रेला-स्टोन, हुड-स्टोन, कंदराएं, मेहिर। ये वृहत्पाषाण स्मारक मृतकों की समाधियां थी।
कर्नाटक में मैंसूर के पास वेल्लारी जनपद मे स्थित संकलनकल्लू नामक नवपाषाण कालीन पुरास्थल से राख के टीले प्राप्त हुए हैं।
मध्य प्रदेश रायसेन जिले में स्थित भीमबेटका प्रागैतिहासिक शैल चित्रकला का श्रेष्ठ उदाहरण है। इन गुफाओं में जीवन के विविध रंगो को पेंटिंग के रुप में उकेरा गया, जिनमें हाथी, सांभर, हिरन आदि के चित्र हैं। अब तक लगभग 700 शरणस्थलियों की पहचान की जा चुकी है, इनमें 243 भीमबेटका समूह में तथा 178 लाखा जुआर समूह मे स्थित है।
म.प्र. के पाषाणकालीन स्थल भीमबेटका से चित्रकारी से युक्त 500 शिलाश्रय प्राप्त हुए हैं।
गंगा-यमुना दोआब की सांस्कृतिक परंपरा संभवतः उस संस्कृति के साथ शुरु होती है जिसे अपने अत्यंत मृद्भांड के नमूने के कारण गेरुवर्णी गैरिक मृद्भांड संस्कृति कहा गया है। इसके साक्ष्य विशेषतः हस्तिनापुर एवं अतरंजीखेड़ा से प्राप्त होते हैं।
महाराष्ट्र की ताम्रपाषाण कालीन संस्कृति (जोर्वे संस्कृति) के नेवासा, दायमाबाद, कौठे, चंदोली, इनामगांव आदि पुरास्थलों में घरों से मृतकों को अस्थिकलश में रखकर उत्तर से दक्षिण स्थिति में घरों के फर्श के नीचे दफनाए जाने के साक्ष्य मिले हैं। कब्र में मिट्टी की हंडियाँ और तांबे की कुछ वस्तुएं भी रखी जाती थी।


जम्मू एवं कश्मीर में श्रीनगर के निकट उत्तर-पश्चिम में स्थित बुर्जहोम से नव पाषाणिक अवस्था में मानव कंकाल के साथ कुत्ते का कंकाल भी शवाधान से प्राप्त हुआ है। गर्तावास (गड्डो वाले घर) भी यहां की प्रमुख विशेषता है।
अलेक्जेंडर कनिंघम (1814-1893 ई.) को एक ब्रिटिश सेनाधिकारी की रुप में बंगाल इंजीनियर्स के साथ काम करने के लिए तैनात किया गया था। उन्हें ही भारतीय पुरातत्व के जनक के रुप में जाना जाता है। 1861 ई. में सेना से सेवानिवृत्ति के पश्चात उन्हें भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण का पहला महानिदेशक नियुक्त किया गया था।
राष्ट्रीय मानव संग्रहालय, जिसका नाम बदलकर इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय कर दिया गया है, भोपाल (म.प्र.) में स्थित है। यह भारत सरकार के संस्कृति विभाग के अंतर्गत स्वायत्तकारी संगठन है।
सैंधव सभ्यता एवं संस्कृति

सैंधव सभ्यता के लिए साधारणतः तीन नामों का प्रयोग होता है –
सिंधु-सभ्यता
सिंधु-घाटी सभ्यता
हड़प्पा सभ्यता
हड़प्पा सभ्यता की खोज वर्ष 1921 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के महानिदेशक सर जॉन मार्शल के निर्देशन में रायबहादुर दयाराम साहनी ने किया था।
हड़प्पा पाकिस्तान के पंजाब के प्रांत के मांटगोमरी जिले (वर्तमान शाहीवाल) में स्थित है, जबकि मोहनजोदड़ों सिंध के लरकाना जिले में स्थित है। पिग्गट महोदय ने हड़प्पा और मोहनजोदड़ों को एक विस्तृत साम्राज्य की जुड़वां राजधानियां कहा है। हड़प्पा रावी नदी के बाएं तट पर जबकि मोहनजोदड़ों सिंधु नदी के दाहिने तट पर स्थित है। जॉन मार्शल ने सर्वप्रथम इस सभ्यता को सिंधु सभ्यता का नाम दिया।
रेडियो कार्बन-14 (C-14) जैसी नवीन विश्लेषण पध्दति के द्वारा हड़प्पा सभ्यता की तिथि 2500 ई.पू.-1700 ई.पू. मानी गई है, जो सर्वाधिक मान्य है। लगभग 2300 ई.पू. से 2000 ई.पू. तक यह सभ्यता अपने विकास की पराकाष्ठा पर थी। यह सभ्यता मेसोपोटामिया तथा मिस्त्र की सभ्यताओं की समकालीन थी।
विभिन्न विद्वानों ने सैंधव सभ्यता की तिथि का निर्धारण निम्नवत किया है –
विद्वान

निर्धारित तिथि

जॉन मार्शल

3250 ई.पू.-2750 ई.पू.

अर्नेस्ट मैके

2800 ई.पू.-2500  ई.पू.

माधवस्वरुप वत्स

2700 ई.पू.-2500 ई.पू. सी.जे.

गैड

2350 ई.पू.-1700 ई.पू.

मार्टीमर  ह्वीलर

2500 ई.पू.-1700 ई.पू.

फेयर सर्विस

2000 ई.पू.-1500 ई.पू.





अब तक इस सभ्यता के अवशेष पाकिस्तान में पंजाब, सिंध, बलूचिस्तान और भारत में पंजाब, गुजरात, राजस्थान, हरियाणा, पश्चिमी उ.प्र., जम्मू कश्मीर, पश्चिमी महाराष्ट्र के भागों में पाए जा चुके हैं। इस सभ्यता का सर्वाधिक पश्चिमी पुरास्थल सुत्कागेनडोर (बलूचिस्तान), पूर्वी पुरास्थल आलमगीर पुर (पश्चिमी उ.प्र.), उत्तरी पुरास्थल मांडा (जम्मू-कश्मीर) तथा दक्षिणी पुरास्थल दायमाबाद (महाराष्ट्र) है। इसका आकार त्रिभुजाकार है तथा वर्तमान में लगभग 13 लाख वर्ग किमी. क्षेत्रफल में है।
प्राप्त साक्ष्यों से पता चलता है कि मोहनजोदड़ों की जनसंख्या एक मिश्रित प्रजाति की थी जिसमें कम-से-कम चार प्रजातियां थी –
प्रोटो ऑस्ट्रेलायड (काकेशियन)
भूमध्य सागरीय
अल्पाइन
मंगोलायड
मोहनजोदड़ों के निवासी अधिकांशतः भूमध्य सागरीय थे।
सिंधु सभ्यता के संस्थापकों के संबंध में विभिन्न विद्वानों के विचार –
विद्वान

सिंधु सभ्यता के निर्माता

डॉ. लक्ष्मण स्वरुप

आर्य और रामचन्द्र

गार्डन चाइल्ड एवं ह्वीलर

सुमेरियन

राखालदास बनर्जी

द्रविड़



सिंधु घाटी के जिन नगरों की खुदाई की गई है उन्हें निम्नलिखित वर्गों में वर्गीकृत किया जा सकता है –
केन्द्रीय नगर
तटीय नगर और पत्तन
अन्य नगर एवं कस्बें
सिंधु सभ्यता के तीन केन्द्रीय नगर हड़प्पा, मोहनजोदड़ों और धौलावीरा समकालीन बड़ी बस्तियाँ था।
हड़प्पा की टीले या ध्वंसावशेषों के विषय में सर्वप्रथम जानकारी 1826 ई. में चार्ल्स मेसन ने दी। वर्ष 1921 में दयाराम साहनी ने पंजाब (पाकिस्तान) ते तत्कालीन मांटगोमरी सम्प्रति शाहीवाल जिले में रावी नदी के बाएं तट पर स्थित हड़प्पा का सर्वेक्षण किया और वर्ष 1923 से इसका नियमित उत्खनन आरंभ हुआ। वर्ष 1926 में माधवस्वरुप वत्स ने तथा वर्ष 1946 में मार्टीमर ह्वीलर ने व्यापक स्तर पर उत्खनन कराया।
हड़प्पा से प्राप्त दो टीलों में पूर्वी टीले को नगर टीला तथा पश्चिमी टीले को दुर्ग टीला के नाम से संबोधित किया गया है। यहां पर 6-6 कक्षों की दो पंक्तियों में निर्मित कुल बारह कक्षों वाले एक अन्नागार के अवशेष प्राप्त हैं। हड़प्पा के सामान्य आवास क्षेत्र के दक्षिण में एक ऐसा कब्रिस्तान है जिसे समाधि R-37 नाम दिया गया है।
सिंधु सभ्यता में अभिलेख युक्त मुहरें सर्वाधिक हड़प्पा से मिले हैं। नगर की रक्षा के लिए पश्चिम की ओर स्थित दुर्ग टीले को ह्वीलर ने माउंड A-B की संज्ञा दी है। इसके अतिरिक्त यहां से प्राप्त कुछ अन्य महत्वपूर्ण अवशेषों में एक बर्तन पर बना मछुवारे का चित्र, शंख का बना बैल, स्त्री के गर्भ से निकला हुआ पौधा (जिसे उर्वरता की देवी माना गया है), पीतल का बना इक्का, ईंटों के वृत्ताकार चबुतरे, गेहूँ तथा जौ के दानों के अवशेष प्रमुख हैं।
सिंधी भाषा में मोहनजोदड़ो का शाब्दिक अर्थ ‘ मृतकों का टीला ‘ है | सिंध प्रांत के लरकाना  जिले में सिंधु नदी के दाहिने तट पर स्थित मोहनजोदड़ो की सर्वप्रथम खोज राखालदास बनर्जी ने वर्ष 1922 में किया था। मोहनजोदड़ो का सर्वाधिक उल्लेखनीय स्मारक वृहत स्नानागार है। इसकी लंबाई उत्तर से दक्षिण की और लगभग 55 मीटर और चौड़ाई पूर्व से पश्चिम दिशा की ओर लगभग 33 मीटर है | इसके मध्य निर्मित स्नानकुंड की लंबाई 8 मीटर चौड़ाई , 7.01  मीटर और गहराई 2.43 मीटर है | यह विशाल स्नानागार धर्मानुष्ठान के लिए था | मार्शल ने इसे तत्कालीन विश्व का एक आश्चर्यजनक निर्माण कहा है |


मोहनजोदड़ो की सबसे बड़ी इमारत विशाल अन्नागार है जो 72 मीटर लंबा तथा 22.86 मीटर चौड़ा है। स्नानागार के उत्तर-पूर्व में 70.1´23.77 मीटर के आकार का एक विशाल भवन के अवशेष मिले हैं | संभवतः यह पुरोहितवास था तथा यहां पुरोहितों का विद्यालय स्थित रहा हो | मोहनजोदड़ो की प्रमुख विशेषता उसकी सड़के थी। मुख्य सड़क 9.15 मी चौड़ी थी जिसे राजपथ कहा जाता था | सड़के सीधी  दिशा में एक दूसरे को समकोण पर काटती हुई नगर को अनेक वर्गाकार अथवा चतुर्भुज आकार खंडों में विभाजित करती थी | सड़कों के एक दूसरे को समकोण पर काटने को ऑक्सफोर्ड सर्कस नाम दिया गया है | मोहनजोदड़ो के पश्चिमी भाग में स्थित दुर्ग जिले को ‘ स्तूपटीला ‘ भी कहा जाता है क्योंकि  यहां पर कुषाण शासकों ने स्तूप का निर्माण कराया था | मोहनजोदड़ो से  प्राप्त अन्य अवशेषों  में कांसे की नृत्यरत नारी की मूर्ति , पुजारी (योगी) की मूर्ति , मुद्रा पर अंकित पशुपतिनाथ (शिव) की मूर्ति  ,  कुंभकारों के छः भठ्ठे, सूती कपड़े , हाथी का कपाल खंड, गले हुए तांबे के ढेर , सीपी  की बनी हुई पटरी, अंतिम स्तर पर बिखरे हुए कुएं से प्राप्त नर कंकाल, घोड़े के दांत एवं गीली मिट्टी पर कपड़े के साक्ष्य मिले हैं |
मोहनजोदड़ो से 130 किलोमीटर दक्षिण पूर्व में स्थित चन्हूदड़ों की सर्वप्रथम खोज वर्ष 1931 में एम जी. मजूमदार ने की थी | वर्ष 1935 में इसका उत्खनन मैके ने किया | यहां सैंधव संस्कृति के अतिरिक्त  प्राक् हड़प्पा संस्कृति जिसे झूकर और झांगर संस्कृति कहते हैं , के अवशेष मिले हैं |  संभवतः यह एक औद्योगिक केंद्र था  जहां माणिकारी , मुहर बनाने , भार-माप के बटखरे बनाने का काम होता था। मैके को यहां से मनके बनाने  का कारखाना (bead factory) तथा भट्ठी प्राप्त हुई थी। यहां से प्राप्त अवशेषों में प्रमुख है – अलंकृत हाथी , खिलौना एवं कुत्ते बिल्ली का पीछे करते पदचिन्ह सैंदर्य प्रसाधनों में प्रयुक्त लिपस्टिक आदि।  चन्हूदड़ों एकमात्र पुरास्थल है जहाँ से व्रकाकार ईंटें मिली है। यहां किसी दुर्ग का अवशेष नहीं मिला है
गुजरात में अहमदाबाद जिले में भोगवा नदी के तट पर स्थित लोथल की खोज सर्वप्रथम डॉ. एस. आर. राव ने वर्ष 1954 में की थी। सागर तट पर स्थित यह स्थल पश्चिमी एशिया से व्यापार का एक प्रमुख बंदरगाह था। लोथल नगर योजना तथा अन्य भौतिक वस्तुओं के आधार पर एक ‘ लघु हड़प्पा ‘ या ‘ लघु मोहनजोदड़ों ‘ नगर प्रतीत होता है। यहां से फारस की मुद्रा/सील और पक्के रंग में रंगे हुए पात्र प्राप्त हुए हैं। लोथल में गढ़ी तथा नगर दोनों एक रक्षा प्राचीर से घिरे हैं। लोथल की सबसे प्रमुख विशेषता ‘ जहाजों की गोदी (डॉक-यार्ड) ‘ है। यहाँ से प्राप्त अन्य महत्वपूर्ण अवशेष है- धान (चावल) और बाजरे का साक्ष्य , फारस की मुहर  , घोड़े की लघु मृण्मूर्ति , तीन युगल समाधियां आदि।


कालीबंगा राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले में स्थित है। इस स्थल की खोज अमलानंद घोष ने की थी। यहां पर पश्चिम दिशा में स्थित दुर्ग वाले टीले पर सैंधव सभ्यता के नीचे प्राक-सैंधव संस्कृति के पुरावशेष मिले हैं। मोहनजोदड़ों के भवन पक्की ईटों के बने थे , जबकि कालीबंगा के भवन कच्ची ईटों के बने थे। पक्की इटों का प्रयोग केवल नालियों , कुंओ एवं स्नानागार बनाने में ही किया गया है। यहां से जुते हुए खेत के साक्ष्य मिले हैं। जिसकी जुताई आड़ी-तिरछी की गई है। मोहनजोदड़ों एवं हड़प्पा के समान यहां से दो टीले मिले हैं , जो सुरक्षा दीवारों से घिरे हैं। पूर्व की ओर स्थित टीला बड़ा जबकि पश्चिम की तरफ स्थित टीला छोटा था। पश्चिमी टीले को ‘ कालीबंगा प्रथम ‘ नाम दिया गया है।  यहां से भूकंप का साक्ष्य मिला है। दुर्ग या गढ़ी वाले टीले के दक्षिणी अर्धभाग में पांच या छः कच्ची ईटों के चबूतरे बने थे। एक चबूतरे पर अग्निकुंड , कुंआ तथा पक्की ईटों का बना एक आयातकार गर्त था। जिसमें पशुओं की हड्डियां थी। दूसरे चबूतरे पर सात  अग्निकुंड या वेदिकाएं एक पंक्ति में बनी थी। यहां से सेलखड़ी तथा मिट्टी की मुहरें एवं मृदभांड के टुकड़े मिले हैं।
धौलावीरा गुजरात के कच्छ के रन में अवस्थित है। सर्वप्रथम वर्ष 1967 -1968 में इसकी खोज जे पी जोशी ने की। वर्ष 1990-1991 के दौरान आर एस बिष्ट द्वारा व्यापक पैमाने पर उत्खनन कार्य प्रारंभ किया गया। यह नगर आयातकार बना था।  इस  नगर को तीन भागों – किला, मध्य नगर तथा निचला नगर में विभाजित किया गया था। यहां से एक विशाल जलाशय मिला है जिसका आकार 4 ´12 मीटर और गहराई 7.5 मीटर थी। यहां के निवासी एक उन्नत जल प्रबंधन व्यवस्था से परिचित थे।  यहां पर हड़प्पा लिपि के बड़े आकार के 10 चिन्हों वाला एक शिलालेख मिला है।
सुरकोटडा गुजरात के कच्छ जिले में स्थित है। अन्य नगरों के विपरीत यह नगर दो दुर्गीकृत भागों-गढ़ी तथा आवास क्षेत्र में विभाजित था। यहां के कब्रिस्तान से कलश शवाधान के साक्ष्य मिले हैं। यहां घोड़े की कुछ हड्डियों के साक्ष्य मिले हैं।
दैमाबाद महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले में प्रवर नदी के बाएं किनारे पर स्थित है। यह सैंधव सभ्यता का सबसे दक्षिणी स्थल है। यहाँ से रथ चलाते हुए मनुष्य, सांड, गैंडे की आकृतियाँ प्राप्त हुई हैं। यहाँ से कुछ मृदभांड, सैंधव लिपि की मुहर, तश्तरी, प्याले आदि के साक्ष्य प्राप्त हुए हैं। राखीगढ़ी हरियाणा के हिसार जिले में घग्गर नदी के किनारे स्थित है। इस स्थल की खोज वर्ष 1969 में सूरजभान ने की थी। यह 224 हेक्टेयर में  है, जो भारत का सबसे बड़ा सैंधव स्थल है।
रोपड़ (पंजाब) सतलज नदी के बाएं तट पर स्थित है। इसका आधुनिक नाम रूपनगर है। वर्ष 1950 में इसकी खोज बी.बी. लाल ने तथा वर्ष 1953-55 के दौरान यज्ञदत्त शर्मा ने इसकी खुदाई करवाई। यहाँ से मृदभांड , सेलखड़ी की मुहर , चर्ट के बटखरे , एक छुरा , तांबे के बाणाग्र , तथा कुल्हाड़ी आदि प्राप्त हुए हैं। यहां से मनुष्य के साथ पालतू कुत्ता के दफनाए जाने के साक्ष्य मिला हैं।
रंगपुर गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र में है | यहां पर प्राक्- हड़प्पा, हड़प्पा और उत्तर हड़प्पा कालीन सभ्यता के साक्ष्य मिले हैं | यहां से प्राप्त वनस्पति अवशेष के आधार पर कहा जा सकता है कि वे लोग चावल, बाजरा और ज्वार की खेती करते थे |
सैंधव  सभ्यता के प्रमुख स्थल एवं उनसे संबंधित नदी

स्थल

नदी

हड़प्पा

रावी

मोहनजोदड़ो

सिंधु

कालीबंगा

घग्गर

लोथल

भोगवा

रोपड़

सतलज

माण्डा

चेनाब

दैमाबाद

प्रवरा

आलमगीरपुर

हिंडन

सुत्कागेनडोर

दाश्त

भगवानपुरा

सरस्वती