History in Hindi for All Competitive Exams (State Level) Part 5

जैन धर्म के मूल संस्थापक या प्रवर्तक प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव या आदिनाथ माने जाते हैं। महावीर स्वामी जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर थे, जिन्होंने छठी शताब्दी ई.पू. के जैन आंदोलन का प्रवर्तन किया।
527 ई.पू. के लगभग 72 वर्ष की आयु में राजगृह (राजगीर) के समीप स्थित पावापुरी नामक स्थान पर महावीर स्वामी ने शरीर त्याग दिया।
तीर्थंकर शब्द जैन धर्म से संबंधित है। जैन धर्म में कुल 24 तीर्थंकर हुए माने जाते हैं, जिन्होने समय-समय पर जैन धर्म का प्रचार-प्रसार किया। जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव थे तथा अंतिम तीर्थंकर महावीर स्वामी थे।
प्रभासगिरि उ.प्र. के कौशांबी में स्थित जैन तीर्थ स्थल है। कौशांबी का प्रभासगिरि स्थल छठवें जैन तीर्थकर पद्मप्रभु से संबंधित है।
जैन धर्म में पूर्ण ज्ञान के लिए कैवल्य शब्द का प्रयोग किया गया है। महावीर स्वामी को 12 वर्षों की कठोर तपस्या तथा साधन के पश्चात जृम्भिक ग्राम के समीप ऋजुपालिका नदी के तट पर एक साल वृक्ष के नीचे कैवल्य (पूर्ण ज्ञान) प्राप्त हुआ था, फलतः वे केवलिन कहलाएं।
जैन धर्म में मोक्ष के लिए तीन साधन आवश्यक बताए गएं हैं – सम्यक धारण, सम्यक चरित्र एवं सम्यक ज्ञान-इन तीनों को जैन धर्म में त्रिरत्न की संज्ञा दी गई है।
जैन धर्म में पंच महाव्रत – अहिंसा, सत्य, ब्रह्मचर्य, अस्तेय एवं अपरिग्रह की व्यवस्था की गई है। जैन धर्म में गृहस्थों क लिए मंच महाव्रत  अणुव्रत के रुप में व्यवह्र्त  हुआ है। क्योकि संसार में रहते हुए इन महाव्रतों का पूर्णतः  पालन  करना संभव नही, इसलिए  आंशिक रुप से इनके पालन के लिए कहा गया –
अहिंसाणुव्रत
सत्याणु व्रत
अस्तेयाणुव्रत
ब्रह्मचर्याणुव्रत
अपरिग्रहाणुव्रत
जैन दर्शन के अनुसार, समस्त विश्व जीव तथा अजीव नामक दो नित्य एवं स्वतंत्र तत्वों से मिलकर बना है। जीव चेतन तत्व है, जबकि अजीव अचेतन जड़ तत्व है। यहां जीवन से तात्पर्य उपनिषदों की सार्वभौमिक आत्मा से न होकर व्यक्तिगत आत्मा से है। जैन मतानुसार, आत्माएं अनेक होती हैं तथा सृष्टि के कण-कण में जीवों का वास है।
अनेकांतवाद जैन धर्म का क्रोड सिध्दांत एवं दर्शन है।
जैन धर्म में ईश्वर की कल्पना नही की गई है। जगत की सृष्टि नही की गई है, उनके अनुसार संसार नित्य और शाश्वत है। इसमें किसी समय प्रलय नही होता है।
अहिंसा जैन धर्म का आधारभूत बिंदु है। जैन धर्म में सम्यक चरित्र के अंतर्गत परिव्राजकों अथवा तापसों के लिए अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य एवं अपरिग्रह नामक पंच महाव्रत की व्यवस्था की गई है।



यापनीय जैन धर्म का एक संप्रदाय था। जिसकी उत्पत्ति यद्यपि दिगंबर संप्रदाय से हुई थी तथापि ये कतिपय श्वेतांबर मान्यताओं का भी पालन करते थे।
चौदह पूर्व प्राचीनतम जैन ग्रंथ हैं। अंतिम नंद राजा के समय में सम्भूतविजय तथा भद्रबाहु जैन संघ के अध्यक्ष थे तथा ये ही महावीर द्वारा प्रदत्त चौदह पूर्वों के विषय मे जानने वाले अंतिम व्यक्ति थे।
प्रायः सभी प्रारंभिक धार्मिक जैन साहित्य प्राकृत की विशिष्ट शाखा अर्ध- मागधी में लिखा गया है। इसके बारह अंग अर्ध-मागधी में ही है। बाद में जैन धर्म ने प्राकृत भाषा को अपनाया। ये ग्रंथ ईसा की छठी शताब्दी में गुजरात में वल्लभी नामक स्थान पर अंतिम रुप से संकलित किए गए। आज जैन साहित्य लगभग सभी भाषाओं मे अनूदित है।
थेरीगाथा बौध्द साहित्य है, इसमें 32 बौध्द कवयित्रियों की कविताएं संकलित है। कुल थेरीगाथाएं 522 हैं। आचारांगसूत्र, सूत्रकृतांग और बृहत्कल्पसूत्र आरंभिक जैन साहित्य के भाग हैं।
मौर्य काल में मगध में अत्यंत भीषण दुर्भिक्ष पड़ा, फलतः वहां रहने वाले जैन संघ के भद्रबाहु श्रुतकेवली अपने अनुयायिंयों को लेकर दक्षिण चले गए। जैन संघ का यह भाग दक्षिण मैसूर के पुण्णाट प्रदेश मे बस गया। अकाल समाप्त होने के बाद भद्रभाहु अपने अनुनायियों के साथ पुनः यहां लौट आए। किंतु जैन संघ के नियमों को लेकर भद्रभाहु और स्थूलभद्र के बीच मत-वैभिन्य हो गया। स्थूलभद्र आकाल के समय मगध में ही रहे और उनके अनुयायी भी वही थे। उन्होने अपने अनुयायिंयों को सफेद वस्त्र धारण करने के लिए निर्देश दिया। इस प्रकार जैन संघ में  दो संप्रदाय विकसित हुए –
श्वेतांबर
दिगंबर


शैव, भागवत धर्म

भागवत धर्म से वैष्णव धर्म का विकास हुआ। परंपरानुसार इसके प्रवर्तक वृष्णि (सात्वत) वंशी कृष्ण थे। छांदोग्य उपनिषद में उन्हें देवकी पुत्र कहा गया है। इन्हें घोर अंगिरस का शिष्य बताया गया है।
ऋग्वेद में विष्णु का उल्लेख आकाश के देवता के रूप में हुआ है | उत्तर वैदिक काल में तीन प्रमुख देवता – प्रजापति , रूद्र व विष्णु थे | विष्णु को लोग पालक व रक्षक मानने लगे | पतंजलि ने वासुदेव को विष्णु का रूप बताया है। विष्णु पुराण में भी वासुदेव को विष्णु का एक नाम बताया गया है | इस प्रकार जब कृष्ण विष्णु का तादात्मय  नारायण से स्थापित हुआ तब वैष्णव धर्म के संज्ञा  ‘ पांचरात्र धर्म ‘ हो गया | भागवत धर्म तथा वासुदेव की पूजा का उल्लेख महर्षि पाणिनि ने किया है | उन्होंने वासुदेव के उपासको को ‘ वासुदेवक ‘ कहा है |  यह धर्म प्रारंभ में मथुरा उसके आसपास के क्षेत्रों में प्रचलित था |यूनानी राजदूत मेगास्थनीज के अनुसार , शूरसेन ( मथुरा )  के लोग ‘ हेराक्लीज ‘  के उपासक थे | हेराक्लीज  से तात्पर्य वासुदेव कृष्ण से ही है | मथुरा से इस धर्म का प्रसार धीरे-धीरे भारत के अन्य भागों में हुआ | भागवत धर्म से संबंध प्रथम उपलब्ध प्रस्तर स्मारक विदिशा ( बेसनगर ) का गरुण स्तंभ है | इससे पता चलता है कि तक्षशिला के यवन राजदूत हेलियोडोरस ने भागवत धर्म ग्रहण किया तथा इस स्तंभ की स्थापना करवाकर पूजा की |  इस पर उत्कीर्ण लेख में हेलिओडोरस को ‘  भागवत ‘ तथा वासुदेव को ‘ देवदेवस ‘ अर्थात्  देवताओं का देवता कहा गया था | महाक्षत्रप शोडासकालीन मोरा ( मथुरा )  पाषाण लेख में पंचवीरों ( संकर्षण ,  वासुदेव , प्रघुम्न , साम्ब तथा अनिरुद्ध ) की पाषाण प्रतिमाओं को मंदिर में स्थापित किए जाने का उल्लेख मिलता है |
कुषाण शासक हुविष्क तथा वासुदेव द्वारा विष्णु पूजा का पता चलता है | गुप्त नरेश वैष्णव मत अनुयायी थे तथा उन्होंने इसे अपना राजधर्म बनाया था | अधिकांश गुप्त शासक ‘ परम भागवत ‘ की उपाधि धारण करते थे | विष्णु का वाहन ‘ गरुड़ ‘ गुप्त शासकों का राजचिन्ह था | मेहरौली स्तंभ लेख में उल्लेख मिलता है कि चंद्रगुप्त द्वितीय ने विष्णुपद पर्वत पर विष्णु ध्वज की स्थापना कराई थी | स्कंद गुप्त के भीतरी स्तंभ लेख में विष्णु की मूर्ति स्थापित किए जाने का उल्लेख है |  अमर सिंह ने अपने ग्रंथ अमरकोश में विष्णु के 39 नामों का उल्लेख किया है | वेंगी के पूर्वी चालुक्य शासक वैष्णव मतानुयाई थे। गुप्तों के समान उनका राजचिन्ह गरुड़ था | राष्ट्रकूट नरेश दंतिदुर्ग ने एलोरा में दशावतार का प्रसिद्ध मंदिर बनवाया था | इस मंदिर में विष्णु के 10 अवतारों की कथा मूर्तियों में अंकित है | क्षेमेंद्र रचित ‘ दशावतार रचित ‘ में विष्णु के 10 अवतारों का वर्णन मिलता है | अलवार संतों द्वारा दक्षिण भारत में वैष्णव धर्म का प्रचार प्रसार किया गया | अलवार शब्द का अर्थ होता है – ज्ञानी व्यक्ति | अलवार संतो की संख्या 12 बताई गई है। इनमें विशेष रूप से उल्लेखनीय है – पोयगई , पूडम , पेय , तिरुमंगई , आण्डाल नम्मालवार आदि |  अलवार संतों में एकमात्र महिला साध्वी आण्डाल  थी | चोल काल में वैष्णव धर्म के प्रचार का कार्य अलवारो के स्थानों पर आचार्यो ने किया | आचार्य परंपरा में प्रथम नाम नाथमुनि का लिया जाता है | इन्हें मधुरकवि का शिष्य बताया जाता है | उन्होंने ‘ न्यायतत्व ‘ की रचना की | पुराणों में विष्णु के 10 अवतारों का विवरण प्राप्त होता है |  वे हैं – मत्स्य , कूर्म अथवा कच्छप , वराह ,  नृसिंह ,  वामन , परशुराम , राम , कृष्ण , बुद्ध व कल्कि ( कलि) | कल्कि अवतार भविष्य में होने वाला है | भगवान विष्णु ने दैत्यराज हिरणाक्ष का वध करने के लिए  वाराह रूप धारण किया था तथा उसके चंगुल से धरती को छुड़ाया था | ऐसी कल्पना की गई है कि भगवान विष्णु हाथ में तलवार लेकर श्वेत अश्व  पर सवार होकर पृथ्वी पर अवतरित होंगे।
·      भागवत अथवा पांचरात्र धर्म में वासुदेव (कृष्ण) की उपासना के साथ ही तीन अन्य व्यक्तियों की उपासना की जाती थी | इनके नाम है –
1.    संकर्षण (बलराम) – वसुदेव और रोहिणी के पुत्र
2.    प्रद्युम्न – कृष्ण और रुक्मणी से उत्पन्न पुत्र
3.    अनिरुद्ध – प्रद्युम्न के पुत्र |
·      इन चारों को ‘ चतुर्व्यूह ‘  की संज्ञा दी जाती है | वायु पुराण में इन चारों के साथ ‘ साम्ब ‘ –  ( कृष्ण और जाम्बवंती से उत्पन्न पुत्र ) को मिलाकर ‘ पंचवीर ‘ कहा गया है | भागवत संप्रदाय में नवधा भक्ति का विशेष महत्व है | वैष्णव धर्म के प्रमुख आचार्य हैं – रामानुज , मध्व ,   वल्लभ व चैतन्य आदि |
वैष्णव धर्म से संबधित प्रमुख मंदिर

मंदिर

स्थान

जगन्नाथ मंदिर

पुरी (ओड़िशा)

दशावतार मंदिर

देवगढ़ (उत्तर प्रदेश)

विष्णु मंदिर

तिगवां (म.प्र.)

विष्णु मंदिर

एरण (म.प्र.)

द्वारिकाधीश मंदिर

मथुरा (उ.प्र.)

द्वारिकाधीश मंदिर

द्वारिका (गुजरात)

शिव से संबंधित धर्म को ‘ शैव ‘ धर्म कहा जाता है | शिव के उपासक को ‘ शैव ‘ कहा जाता है | शैव धर्म भारत का प्राचीनतम धर्म है | इसका संबंध प्रागैतिहासिक युग तक है | सिंधु घाटी के लोग शिव की पूजा करते थे | इसका प्रमाण मोहनजोदड़ो से प्राप्त एक मोहर है जिस पर योगी की आकृति बनी है | योगी के सिर पर एक त्रिशूल जैसा आभूषण है तथा इसके तीन मुख हैं। मार्शल महोदय ने इसे रूद्र शिव से संबोधित किया है |
ऋग्वेद में शिव को रुद्र कहा गया है जो अपनी उग्रता के लिए प्रसिद्ध है | रूद्र को समस्त लोको का स्वामी वाजसनेयी संहिता के शतरुद्रीय मंत्र में कहा गया है | अथर्ववेद में उन्हें पशुपति , भव , भूपति  आदि कहा गया है | पतंजलि के महाभाष्य से पता चलता है कि दूसरी सदी ईसा पूर्व में शिव की मूर्ति बनाकर पूजा की जाती थी | महाभाष्य में शिव के अनेक नामों का उल्लेख मिलता है।यह प्रमुख नाम है – रुद्र, महादेव ,  गिरीश ,  भव , सर्व , त्र्यंबक आदि |
कुषाण शासकों के सिक्कों पर शिव , वृषभ और त्रिशूल की आकृतियां मिलती है | उदयगिरि गुहालेख से पता चलता है कि चंद्रगुप्त द्वितीय का प्रधानमंत्री वीरसेन ने उदयगिरि पहाड़ी पर एक शैव गुफा का निर्माण करवाया था | कुमारगुप्त के समय में खोह तथा करमदंडा में शिवलिंग की स्थापना करवाई गई थी | गुप्तकाल में नचनाकुठार में पार्वती मंदिर तथा भूमरा में शिव मंदिर का निर्माण करवाया गया था | कालिदास ने कुमारसंभवम् में शिव की महिमा का गुणगान किया है | चंदेल शासकों द्वारा खजुराहो का प्रसिद्ध मंदिर कंदारिया महादेव मंदिर निर्मित कराया गया था|
राष्ट्रकूटों के समय में एलोरा का प्रसिद्ध कैलाश मंदिर निर्मित कराया गया था | शैव धर्म का प्रचार-प्रसार दक्षिण भारत में नयनारों द्वारा किया गया था। नयनार संतो की संख्या 63 है | इसमें तिरूज्ञान , सुंदर मूर्ति , सम्बन्दर , अप्पार , मणिक्कवाचगर आदि का नाम उल्लेखनीय है | * दक्षिण भारत में चोल शासक शिव के अनन्य उपासक थे | चोल शासक राजराज प्रथम ने तंजौर में राजराजेश्वर मंदिर निर्मित करवाया था | कुलोतुंग प्रथम एक कट्टर शैव था। इसने शिव के प्रति अतिशय श्रद्धा के कारण चिदंबरम मंदिर में स्थापित विष्णु की मूर्ति को उखाड़कर समुद्र में फेंकवा दिया था | शैव धर्म से संबंधित देश के विभिन्न भागों में स्थित द्वादश ज्योतिर्लिंग है –
सोमनाथ
नागेश्वर ( द्वारका के समीप )
केदारनाथ
विश्वनाथ ( काशी )
वैद्यनाथ
महाकालेश्वर ( उज्जैन)
ओम्कारेश्वर ( मध्य प्रदेश )
भीमेश्वर ( नासिक )
त्र्यम्बेकेश्वर ( नासिक )
घुश्मेश्वर
मल्लिकार्जुन ( आंध्र प्रदेश )
रामेश्वरम।
वामन पुराण में शैव संप्रदाय की संख्या 4 बताई गई है | ये हैं –
शैव
पाशुपत
कापालिक एवं
कालामुख
पाशुपत संप्रदाय की उत्पत्ति ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी में हुई थी। पुराणों के अनुसार , इस संप्रदाय की स्थापना लकुलीश अथवा लकुली नामक ब्रह्मचारी ने की थी। इस संप्रदाय के अनुयायी लकुलीश को शिव का अवतार मानते हैं। कापालिक संप्रदाय के उपासक भैरव को शिव का अवतार मानकर उनकी उपासना करते थे। इस मत के अनुयायी सुरा सुंदरी का सेवन करते थे एवं मांस खाते थे , शरीर पर श्मशान की भस्म लगाते हैं तथा हाथ में नरमुंड धारण करते हैं।
भवभूति के ‘ मालतीमाधव ‘ नाटक से पता चलता है कि ‘ श्रीशैल ‘ नामक स्थान कापालिकों का प्रमुख केंद्र था। कालामुख संप्रदाय अतिमार्गी होने के कारण शिवपुराण में इसके अनुयायियों को महाव्रतधर कहा गया है। शैव धर्म का ही एक संप्रदाय लिंगायत अथवा वीर शैव था। इसका प्रचार बारहवीं शताब्दी में दक्षिण भारत में व्यापक रूप से हुआ। वसव को इस संप्रदाय का संस्थापक माना जाता है | शैव धर्म का एक नया संप्रदाय कश्मीर में विकसित हुआ। यह संप्रदाय शुद्ध रूप से दार्शनिक या ज्ञानमार्गी था। नाथपंथ संप्रदाय दसवी सदी के अंत में मत्स्येन्द्रनाथ ने चलाया।* इसमें शिव को आदिनाथ मानते हुए नौ नाथो को दिव्य पुरुष के रूप में मान्यता प्राप्त की गई है |  बाबा गोरखनाथ ने 10वीं 11वीं शताब्दी में इस मत का अधिकाधिक प्रचार-प्रसार किया |
शैव धर्म से संबंधित प्रमुख मंदिर

मंदिर

स्थान

राजराजेश्वर मंदिर

तंजौर (तमिलनाडु)

शिव मंदिर

भूमरा (म.प्र.)

नटराज मंदिर

चिदंबरम (तमिलनाडु)

विरुपाक्ष मंदिर

हम्पी (कर्नाटक)

विश्वनाथ मंदिर

वाराणसी (उ.प्र.)



शाक्त संप्रदाय के लोग शक्ति को इष्टदेवी मानकर पूजा करते थे। शैव धर्म के साथ शाक्त धर्म का घनिष्ठ संबंध रहा है | शक्त धर्म की प्राचीनता भी शैव धर्म के समान प्रागैतिहासिक युग तक जाती है | सैंधव  सभ्यता में मातृ देवी की उपासना व्यापक रूप से प्रचलित थी | मातृ देवी की बहुसंख्यक मूर्तियां खुदाई में प्राप्त हुई है | वैदिक साहित्य से सरस्वती , अदिती ,  उषा , लक्ष्मी आदि देवियों के विषय में सूचना मिलती है |  देवी महात्मय का विस्तृत वर्णन महाभारत तथा पुराणों से प्राप्त होता है। देवी की उपासना तीन रूपों में की जाती है | यह रूप है – शांत या सौम्य रूप , उग्र या प्रचंड रूप और काम प्रधान रूप |  सौम्य रूप के प्रतीक उमा , पार्वती , लक्ष्मी आदि हैं|
उग्र रूप के प्रतीक चंडी , दुर्गा , भैरवी , कपाली आदि। कापालिक एवं कालमुख संप्रदाय के लोग देवी के उग्र रूप की आराधना करते हैं। वैष्णों देवी का मंदिर देवी के सौम्य रूप का मंदिर है।कोलकाता स्थित काली देवी मंदिर देवी के उग्र रूप का प्रतिनिधित्व करता है। असम का कामाख्या मंदिर देवी के काम प्रधान रूप का प्रतिनिधित्व करता है। प्रतिहार शासक महेन्द्रपाल के लेखों मे दुर्गा की महिषासुरमर्दिनी, कांचनदेवी,अम्बा आदि नामों की स्तुति मिलती है। राष्ट्रकूट शासक अमोघवर्ष महालक्ष्मी का अनन्य भक्त था। संजन लेख से ज्ञात होता है कि उसने एक बार अपने बाएं हाथ की उंगली काटकर देवी को चढ़ा दिया था। श्रीहर्ष ने अपने ग्रंथ ‘ नैषधीयचरित ‘ में सरस्वती मंत्र की महत्ता का प्रतिपादन किया। संप्रति शाक्त उपासना के तीन प्रमुख केंद्र है। ये हैं –
कश्मीर
कांची तथा
असम स्थित कामाख्या असम स्थित कामाख्या कौल मत का प्रसिध्द केन्द्र है।
शाक्त धर्म से संबंधित प्रमुख मंदिर

मंदिर

स्थान

वैष्णों देवी का मंदिर

जम्मू

विंध्यावासिनी देवी का मंदिर

विंध्याचल

चौसठ योगिनी का मंदिर

भेड़ाघाट (म.प्र.)

पार्वती मंदिर

नाचना-कुठार (म.प्र.)

कामाख्या मंदिर

असम

दक्षिणेश्वर काली मंदिर

कोलकाता

प्राचीन भारत की विश्वोत्पत्ति विषयक धारणाओं के अनुसार, चार युगों के चक्र का क्रम इस प्रकार है – कृत (सतयुग), त्रेता, द्वापर एवं कलियुग।
चेदि राजवंश के अभिलेखों में मत्तमयूर नामक शैव संप्रदाय का उल्लेख मिलता है।
वैष्णव धर्म का प्रारंभिक रुप भागवत धर्म के अंतर्गत देवकी-पुत्र भगवान वासुदेव कृष्ण के पूजन में दर्शित होता है, जो संभवतः छठी सदी ई.पू. के पहले स्थापित हो चुका था। वासुदेव, जो कृष्ण का प्रारंभिक नाम था, पाणिनि के युग में प्रचलित था। उस युग में वासुदेव की उपासना करने वाले वासुदेवक (भागवत) कहे जाते थे।
भारतीय सांस्कृतिक परंपरा के अनुरुप कला में हल लिए कृष्ण के भाई बलराम को प्रदर्शित किया गया है। उन्हें हलधर के नाम से जाना जाता है।
भागवत संप्रदाय में मोक्ष के लिए नवधा भक्ति को मान्यता दी गई है।
भागवत धर्म से संबंध्द प्रथम उपलब्ध प्रस्तर स्मारक विदिशा (बेसनगर) का गरुड़ स्तंभ है। इससे पता चलता है कि तक्षशिला के यवन राजदूत हेलियोडोरस ने भागवत धर्म ग्रहण किया तथा इस स्तंभ की स्थापना करवाकर उसकी पूजा की थी। इस पर उत्कीर्ण लेख में हेलियोडोरस को भागवत तथा वासुदेव को देवदेवस अर्थात देवताओं का देवता कहा गया है।
छठी शताब्दी ई.पू. के संदर्भ में आस्तिक संप्रदाय वे होते थे, जो वेदों की प्रमाणिकता को मानते थे तथा नास्तिक संप्रदाय वे थे, जो वेदों की प्रमाणिकता को नही मानते थे।
उपनिषद, ब्रह्मसूत्र और भगवदगीता को वेदांत की प्रस्थानत्रयी कहा जाता है, क्योकि वे वेदांत के सर्वप्रमुख ग्रंथ हैं। इनमें भी उपनिषद मूल प्रस्थान है और शेष दो उन पर आधारित माने जाते हैं। वेदांत के आचार्यों में, जिन्होंने ब्रह्मसूत्र पर भाष्य लिखकर, अपने-अपने वेदांत संप्रदायों की प्रतिष्ठा की है, उनमें शंकराचार्य सबसे प्राचीन हैं।
उ.प्र. के सीतापुर जनपद के नैमिषारण्य में 60000 मुनियों का निवास माना जाता है। यही पर सुत गोस्वामी ने सौनक एवं अन्य मुनियों के समक्ष संपूर्ण महाभारत कथा का वाचन तब किया था जब वे यज्ञ संपन्न पर रहे थे। इसके पूर्व महाभारत कथा का वाचन वैषम्पायन ने राजा जनमेजय के लिए किया था।
रामायण के रचयिता बाल्मीकि थे। संस्कृत भाषा में रचित इस आदि काव्य में कुल 7 कांड (अध्याय) हैं। इसका चौथा कांड किष्किन्धा कांड है जिसमें राम और हनुमान की भेंट तथा बालि-वध एवं सुग्रीव के वानर शासक बनने का वर्णन है।
प्रतिवर्ष आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष में ओड़िशा के पुरी में भगवान जगन्नाथ (कृष्ण), बलराम और सुभद्रा के सम्मान में रथयात्रा निकाली जाती है।
नासिक में प्रत्येक 12 वर्ष के अंतराल पर कुंभ मेला गोदावरी नदी के तट पर लगता है। यह नासिक के अतिरिक्त हरिद्वार में गंगा तट पर, प्रयाग में गंगा और यमुना (एवं विलुप्त सरस्वती) के संगम स्थल पर तथा उज्जैन में क्षिप्रा नदी के तट पर लगता है।
मदीना पश्चिमी सऊदी अरब के हेजाज क्षेत्र में स्थित शहर है। यह मक्का के बाद इस्लाम धर्म का दूसरा पवित्रतम शहर है।


छठी शती ई.पू. – राजनीतिक दशा

बौद्ध ग्रंथ अंगुत्तरनिकाय से ज्ञात होता है कि गौतम बुद्ध के जन्म के पूर्व समस्त उत्तर भारत 16 बड़े राज्यों में विभाजित था | इन्हें ‘ सोलह महाजनपद ‘ कहा गया है | इन 16 महाजनपदों के नाम है –
कौशल
काशी
मगध
अंग
वज्जि
चेदि
मल्ल
वत्स
कुरु
पांचाल
मत्स्य
शूरसेन
कम्बोज
अवंती
अस्सक ( अश्मक )
गांधार |
जैन ग्रंथ ‘ भगवतीसूत्र ‘ में भी इन 16 महाजनपदों के नाम मिलते हैं किंतु, इसमें कुछ नाम भिन्न दिए गए हैं | इसमें प्राप्त 16 महाजनपदों के नाम हैं –
अंग
बंग
मलय
अच्छ
वच्छ (वत्स)
मगह (मगध)
मालव
कोच्छ
लाढ़
मोलि (मल्ल)
कोशल
काशी
पाठ्य
सम्मुतर
अवध
वज्जि
पाणिनी के अष्टाध्यायी में 22 महाजनपदों की उल्लेख मिलता है।उत्तरी बिहार के वर्तमान भागलपुर तथा मुंगेर के जिले अंग महाजनपद के अंतर्गत थे |  इसकी राजधानी चंपा थी | महाभारत तथा पुराणों में इसका प्राचीन नाम ‘ मालिनी ‘ प्राप्त होता है | बुद्ध के समय भारत के 6 महानगरों में चंपा की गणना की जाती थी | महापरिनिर्वाणसूत्र में इन 6 महानगरों के नाम प्राप्त होते हैं | ये है –
चंपा
राजगृह
बनारस
साकेत
कौशांबी
श्रावस्ती
दीर्घनिकाय के अनुसार चंपा नगर निर्माण की योजना वास्तुकार महागोविंद ने की थी | वैशाली के लिच्छवियों ने विश्व का पहला गणतंत्र स्थापित किया था | सुत्तनिपात में वैशाली को ‘ मगधम् पुरम ‘ कहा गया है।
महाजनपद

आधुनिक स्थल

राजधानी

कुरु

मेरठ, दिल्ली और थानेश्वर

इन्द्रप्रस्थ

पांचाल

बरेली, बदांयू तथा फर्रुखाबाद

अहिछत्र तथा कांपिल्य

शूरसेन

मथुरा के आस-पास का क्षेत्र

मथुरा

वत्स

इलाहाबाद तथा  बांदा

कौशांबी

कोशल

अवध का क्षेत्र (फैजाबाद मंडल)

साकेत तथा श्रावस्ती

मल्ल

देवरिया जिला

कुशीनगर और पावा

काशी

 वाराणसी

वाराणसी

अंग

भागलपुर तथा मुंगेर

चम्पा

मगध

दक्षिणी  बिहार (पटना व गया जिला)

गिरिव्रज अथवा राजगृह

वज्जि

मुजफ्फरपुर तथा दरभंगा

मिथिला, वैशाली व जनकपुरी

चेदि

बुंदेलखंड

सोत्थिवती

मत्स्य

जयपुर

विराटनगर

अश्मक

गोवादवरी घाटी (आंध्र प्रदेश)

पोतन/पोटिल

अवंति

पश्चिमी तथा मध्य मालवा क्षेत्र

उज्जयिनी तथा माहिष्मती

गांधार

पेशावर तथा रावलपिंडी (पाकिस्तान)

तक्षशिला

कम्बोज

दक्षिणी पश्चिमी कश्मीर तथा

राजपुर/हाटक अफगानिस्तान का कुछ भाग



वैशाली बुद्ध काल का सबसे बड़ा तथा शक्तिशाली गणराज्य था | पुराणों के अनुसार मगध पर शासन करने वाला पहला राजवंश बृहद्रथ वंश था | इस वंश के पहले राजा बृहद्रथ का पुत्र जरासंध था , जिसने गिरिव्रज (राजगृह) को अपनी राजधानी बनाया | महाभारत के वनपर्व में राजगृह को जरासंध की राजधानी बताया गया है | बौद्ध ग्रंथों के अनुसार , मगध का प्रथम प्रतापी शासक बिंबिसार था | यह हर्यंक से संबंधित था।
सोननंद जातक से पता चलता है कि मगध और कौशल पर काशी का अधिकार था | काशी का सबसे शक्तिशाली शासक ब्रह्मदत्त था |इसने कोशल पर विजय प्राप्त की थी | अंततोगत्वा कोशल के राजा कंस ने काशी को जीतकर अपने राज्य में शामिल कर लिया। प्रसेनजित के समय कोशल का काशी के अतिरिक्त कपिलवस्तु के शाक्य , केसपुत्त के कालाम , रामगाम के कोलिय , पावा और कुशीनारा के मल्ल , पिप्पलिवन के मोरिय आदि गणराज्यों पर भी अधिकार था। संयुक्त निकाय के अनुसार , प्रसेनजित ‘ पांच राजाओं के एकगुट ‘ का नेतृत्व करता था। रामायणकालीन कोशल राज्य की राजधानी अयोध्या थी। कौशल के प्रमुख नगर श्रावस्ती , अयोध्या और साकेत थे। बुद्ध काल में कोशल के दो भाग हो गए थे। उत्तरी भाग की राजधानी साकेत तथा दक्षिणी भाग की राजधानी श्रावस्ती थी।
उत्खननों के आधार पर ज्ञात हुआ है कि प्राचीन श्रावस्ती का नगर विन्यास अर्ध्दचंद्राकार था। * पूर्वी उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले में मल्ल महाजनपद स्थित था | * इसके दो भाग थे – एक की राजधानी पावा ( पडरौना ) तथा दूसरे की कुशीनारा ( कसया ) थी। छठी शताब्दी ई.पू. में आधुनिक बुंदेलखंड के पूर्वी तथा उसके समीपवर्त्ती भागों में चेदि महाजनपद स्थित था। इसकी राजधानी ‘ सोत्थिवती ‘ थी | जिसकी पहचान महाभारत में शुक्तिमती से की जाती है। महाभारत काल में चेदि के शासक शिशुपाल था जिसका वध श्रीकृष्ण द्वारा किया गया था। इलाहाबाद के आस-पास के क्षेत्रों में वत्स महाजनपद स्थित था। * विष्णु पुराण से ज्ञात होता है कि हस्तिनापुर के राजा निचक्षु ने हस्तिनापुर के गंगा के प्रवाह में बह जाने के बाद कौशाम्बी को अपनी राजधानी बनाई थी। बुद्ध काल में यहां पौरव वंश का शासन था। * यहां का शासक उदयन था। * बौद्ध भिक्षु पिण्डोला ने उदयन को बौद्ध मत में दीक्षित किया था। * उदयन-वासवदत्ता की दंतकथा उज्जैन से संबंधित थी। * इस कथा को महाकवि भास ने अपने नाटक स्वपन्नवासवदतम् में वर्णित किया है।
कुरु महाजनपद मेरठ, दिल्ली तथा थानेश्वर के भू-भागों मे स्थित था। महाभारतकालीन हस्तिनापुर नगर इसी राज्य में स्थित था। बुध्द के समय यहां का राजा कोरव्य था। पंचाल महाजनपद आधुनिक रुहेलखंड के बरेली, बदायूं तथा फर्रूखाबाद के जिलों से मिलकर बनता था। प्रारंभ में  इसके दो भाग थे – उत्तरी पंचाल की राजधानी अहिछत्र तथ  दक्षिणी पंचाल की राजधानी काम्पिल्य थी। पंचाल महाजनपद के अंतर्गत कान्यकुब्ज का प्रसिध्द नगर स्थित था। पंचाल जनपद की सीमाएं हिमालय की तलहटी से लेकर दक्षिण मे चंबल नदी तक तथा पूर्व मे कोसल तथा पश्चिम में कुरु जनपद थी। पंचाल मूलतः एक राजतंत्र था,  किंतु ऐसा प्रतीत होता है कि कौटिल्य के समय तक वह एक गणराज्य हो गया था। मत्स्य महाजनपद राजस्थान के जयपुर क्षेत्र में  बसा हुआ था। इसके अंतर्गत वर्तमान अलवर एवं भरतपुर का एक भाग भी सम्मिलित था। इसकी राजधानी विराट की स्थापना विराट नामक राजा द्वारा की गई थी।
शूरसेन महाजनपद आधुनिक ब्रजमंडल क्षेत्र में बसा हुआ था। इसकी राजधानी मथुरा थी। प्राचीन यूनानी लेखक इस राज्य को शूरसेनोई तथा इसकी राजधानी को मेथोरा कहते थे। अश्मक महाजनपद गोदावरी नदी (आंध्र प्रदेश) के तट पर स्थित था। महाजनपदों में केवल अश्मक ही दक्षिण भारत में स्थित था। अवंति महाजनपद पश्चिमी तथा मध्य मालवा के क्षेत्र में बस था। इस महाजनपद के दो भाग थे –
उत्तरी अवंति की राजधानी उज्जयिनी तथा
दक्षिणी अवंति की राजधानी माहिष्मती थी।
बुध्द काल मे अवंति की राजधानी उज्जयिनी थी। गौतम बुध्द के समय यहां का राजा प्रद्योत था।बिंबिसार के समय में मगध के साथ प्रद्योत के संबंध मैत्रीपूर्ण थे।* प्रद्योत को पांडुरोग से ग्रसित हो जाने पर बिंबिसार ने अपने राजवैद्य जीवक को उसके उपचार के लिए भेजा | * बौद्ध पुरोहित महाकच्चायान के प्रभाव से प्रघोत बौद्ध बन गया। प्राचीन भारत के  उत्तरी भाग में, जिसे उत्तरापथ भी कहा जाता था, दो जनपद थे। ये जनपद थे – गंधार और कम्बोज। गंधार महाजनपद वर्तमान पाकिस्तान के पेशावर तथा रावलपिंडी जिलों में स्थित था।* रामायण से ज्ञात होता है कि तक्षशिला नगर की स्थापना भरत के पुत्र तक्ष ने की थी। * गंधार महाजनपद का दूसरा प्रमुख नगर पुष्कलावती था। * कौटिल्य ने कम्बोजो को ‘ वार्ताशास्त्रोपजीवी संघ ‘ अर्थात् पशुपालन , कृषि , वाणिज्य तथा शस्त्र द्वारा जीविका चलाने वाला कहा है। * प्राचीन समय में कम्बोज अपने श्रेष्ठ घोड़ों के लिए विख्यात था। *16 महाजनपदों में से चार – कोशल , मगध , वत्स तथा अवंती अत्यंत शक्तिशाली थे |
16 महाजनपदों में से 8 वर्तमान उत्तर प्रदेश में स्थित है यह महाजनपद है – काशी , कोशल , वत्स , मल्ल , कुरू , पांचाल , शूरसेन तथा चेदी | * बुद्ध काल में गंगा घाटी के कई गणराज्यों के अस्तित्व का प्रमाण मिलता है। ये गणराज्य – कपिलवस्तु के शाक्य , सुमसुमारगिरि के भग्ग , अलकप्प के बुलि , केस पुत्त के कालाम , रगगाम के कोलिय , कुशीनारा के मल्ल , पिपलिवन के मोरिय , वैशाली के लिच्छवि , पावा के मल्ल तथा मिथिला के विदेह | * सिक्को के अध्ययन को ‘ न्यूमिस्मेटिक्स ‘ कहा जाता है। * भारत के प्राचीनतम सिक्कों को आहत सिक्के या पंचमार्क सिक्के कहा जाता है। * से सिक्के छठी शताब्दी ईपू से मौर्यकाल के मध्य प्राप्त होते हैं। * बुद्धधोष की टीका ‘ सुमंगलविलासिनी ‘ से वज्जि संघ की न्याय व्यवस्था के बारे में जानकारी प्राप्त होती है। * इससे ज्ञात होता है कि वज्जि संघ में आठ न्यायालय थे।


मगध की महत्ता का वास्तविक संस्थापक राजा बिंबिसार (लगभग 544-492 ई.पू.) था | * यह हर्यंक वंश से संबंधित था | जैन साहित्य में बिंबिसार को ‘ श्रेणिक ‘ कहा गया है | * महावंश के अनुसार , बिंबिसार 15 वर्ष की आयु में मगध का नरेश बना था | * सर्वप्रथम इसने प्रमुख राजवंशों के साथ वैवाहिक संबंध स्थापित कर अपनी स्थिति सुदृढ़ की | * इसने लिच्छवी गणराज्य के शासक चेटक की पुत्री चेलना ( छलना ) के साथ विवाह किया और मगध की उत्तरी सीमा को सुरक्षित किया | * दूसरा प्रमुख वैवाहिक संबंध कोशल नरेश प्रसेनजीत की बहन महाकोसला के साथ किया | * इस वैवाहिक संबंध से उसे काशी का प्रांत (अथवा उसके कुछ ग्राम) प्राप्त हुए | * अन्य प्रमुख वैवाहिक संबंध मद्र देश की राजकुमारी क्षेमा के साथ करके मद्रो का सहयोग प्राप्त किया | * अंग के शासक ब्रह्मदत्त को पराजित कर अपने राज्य में मिला लिया |
विनयपिटक से ज्ञात होता है कि इसने वेलुवन नामक उद्यान बुद्ध एवं संघ के निमित्त प्रदान कर दिया | * दीघनिकाय से ज्ञात होता है कि बिंबिसार ने चंपा के ब्राह्मण को वहां की संपूर्ण आमदनी दान में दे दिया | * बिंबिसार को अपने पुत्र अजातशत्रु द्वारा बंदी बनाकर कारागार में डालने का उल्लेख बौद्ध  एवं जैन ग्रंथों में मिलता है | * बिंबिसार की मृत्यु 492 ई पू के लगभग हो गई | * बिंबिसार  के पश्चात इसका पुत्र ‘कुणिक ‘ अजातशत्रु ( लगभग 492 – 460 ई पू ) मगध का शासक हुआ। * अपने पिता के समान ही वह साम्राज्यवादी था | * इसके शासन के प्रारंभिक वर्षों में मगध व कोशल के बीच संघर्ष शुरू हो गया | * किंतु बाद में मगध के शासक अजातशत्रु तथा कोशल के शासक प्रसेनजीत के बीच संधि हो गई | * प्रसेनजित ने अपने पुत्री वाजिरा का विवाह अजातशत्रु से कर दिया तथा पुनः काशी के ऊपर उसका अधिकार स्वीकार कर लिया | * पाटलिपुत्र की स्थापना अजातशत्रु के उत्तराधिकारी उदायिन ने गंगा और सोन नदी के संगम पर एक किला बनाकर की थी की | * इसने मगध की  राजधानी राजगृह से पाटलिपुत्र स्थानांतरित की |
शैसुनाग वंश की स्थापना शिशुनाग द्वारा की गई | महावंश टीका में शिशुनाग को एक लिच्छवि राजा की वेश्या पत्नी से उत्पन्न कहा गया है। * पुराणों के अनुसार वह क्षत्रिय था। * अवंति की विजय शिशुनाग के लिए लाभदायक सिद्ध हुई। * इससे मगध साम्राज्य की पश्चिमी सीमा मालवा तक पहुंच गई। इस विजय के पश्चात् शिशुनाग का वत्स के ऊपर भी अधिकार हो गया। क्योंकि वह अवंति के अधीन था। अवंति और वत्स पर अधिकार हो जाने से पश्चिमी विश्व के साथ पाटलिपुत्र को व्यापार – वाणिज्य के लिए एक नया मार्ग प्राप्त हो गया। * शिशुनाग ने गिरिब्रज के अतिरिक्त वैशाली नगर को अपनी दूसरी राजधानी बनाई थी,  जो बाद में उसकी प्रधान राजधानी बन गई।*शिशुनाग ने लगभग 412-394 ई. पू तक शासन किया।
महावंश के अनुसार , शिशुनाग की मृत्यु के पश्चात् उसका पुत्र कालाशोक राजा बना। पुराणों में कालाशोक को ‘काकवर्ण ‘ कहा गया है। कालाशोक ने अपनी राजधानी पुनः पाटलिपुत्र स्थानांतरित कर दिया। * इसके शासनकाल में द्वितीय बौद्ध संगीति का आयोजन वैशाली में हुआ। इस संगीति में बौद्ध संघ दो संप्रदायों स्थविर तथा महासंघिक में विभाजित हो गए। * बाणभट् के हर्षचरित से ज्ञात होता है कि राजधानी के समीप घूमते किसी व्यक्ति ने काकवर्ण की छूरा भोंककर हत्या कर दी। * महाबोधि वंश के अनुसार , कालाशोक के 10 पुत्रों ने सम्मिलित रूप से लगभग 22 वर्षों तक शासन किया। * कालाशोक के उत्तराधिकारियों का शासन 344 ई. पू के लगभग समाप्त हो गया।
शैशुनाग वंश का अंत कर नंद वंश की स्थापना जिस व्यक्ति ने की , वह निम्न वर्ण से संबंधित था। विभिन्न ग्रंथों में उसका नाम भिन्न-भिन्न दिया गया है। पुराण में उसे ‘ महापद्म ‘ जबकि महाबोधिवंश में उसे ‘ उग्रसेन ‘ कहा गया है। * पुराणों के अनुसार , महापदमनंद शैशुनाग वंश का अंतिम राजा महानंदिन की शुद्र स्त्री के गर्भ से उत्पन्न हुआ था। * जैन ग्रंथ परिशिष्टपर्वन् के अनुसार , वह नापित पिता और वैश्या माता का पुत्र था। नंद वंश में कुल 9 राजा होने के कारण उन्हें ‘ नवनंद ‘ कहा जाता है। महाबोधिवंश के अनुसार , इनके नाम है – उग्रसेन , पण्डुक , पण्डुगति , भूतपाल , राष्ट्रपाल , गोविषाणक , दशसिद्धक , कैवर्त तथा धनानंद |


बौध्द साहित्य के अनुसार, बिंबिसार से नंदो तक के राजाओं के शासनकाल

वंश का नाम

राजा का नाम

शासनकाल

हर्यंक वंश (544-412 ई.पू.)

बिंबिसार

544-492 ई.पू.

 
अजातशत्रु

492-460 ई.पू.

 
उदायिन तथा


 
उसके उत्तराधिकारी

460-412 ई.पू.

शैशुनाग वंश (412-344 ई.पू.)

शिशुनाग

काकवर्ण

412-394 ई.पू.

394-366 ई.पू.

 
काकवर्ण के 10 पुत्र

366-344 ई.पू.

नंद वंश (344-323 ई.पू.)

उग्रसेन, महापद्म नंद

344-323 ई.पू.

 
तथा उसके आठ पुत्र


·      महापद्मनंद को ‘ कलि का अंश ‘ सभी क्षत्रियों का नाश करने वाला, दूसरे परशुराम का अवतार कहा गया। उसने एकछत्र शासन की स्थापना की। * तथा ‘ एकराट् ‘ की उपाधि ग्रहण की | * इसके द्वारा उन्मूलित राजवंशो के जो नाम मिलते हैं , वे हैं – इक्ष्वाकु , कलिंग , अश्मक , पांचाल , काशेय , हैहेय ,कुरु , मैथिल , शूरसेन , वीतिहोत्र | * मत्स्यपुराण के अनुसार , इक्ष्वाकु ने 24 वर्ष , कलिंग ने 32 वर्ष , अश्मक ने 25 वर्ष , पांचाल ने 27 वर्ष , काशी ने 24 वर्ष , हैहय ने 28 वर्ष , कुरु ने 36 वर्ष , मैथिल ने 28 वर्ष , शूरसेन ने 23 वर्ष , तथा वीतिहोत्र ने 20 वर्ष तक शासन किया। * खारवेल के हाथी गुम्फा  अभिलेख से उसके कलिंग विजय की सूचना प्राप्त होती है। * नंदवंश का अंतिम राजा धनानंद था जो सिकंदर का समकालीन था। यूनानी लेखकों ने उसे ‘ अग्रमीज ‘ ( अग्रसेन का पुत्र ) कहा है। * जेनोफोन ने इसे बहुत धनाढ्य व्यक्ति बताया है।
·       तमिल और सिंहली ग्रंथों से भी उसकी अतुल संपत्ति की सूचना मिलती है । * भद्यशाल उसका सेनापति था | * धनानंद द्वारा जनता से बलपूर्वक धन वसूलने तथा छोटी-छोटी वस्तुओं पर भारी कर लगाने के कारण जनता उसके विरुद्ध हो गई और चारों ओर घृणा एवं असंतोष का वातावरण व्याप्त हो गया।* इस स्थिति का लाभ उठाकर चंद्रगुप्त मौर्य ने चाणक्य के सहयोग से धनानंद की हत्या कर नंद वंश का अंत किया। * व्याकरणाचार्य पाणिनी महापद्मानंद के मित्र थे। * वर्ष , उपवर्ष , वररूचि , कात्यायन जैसे विद्वानों का जन्म नंद काल में ही हुआ था। * नंद शासक जैन मत के पोषक थे। * कल्पक नामक व्यक्ति जैन था , इसकी सहायता से महापदमानंद ने क्षत्रियों का विनाश किया। * धनांनंद के जैन अमात्य शाकटाल तथा स्थूलभद्र थे। * मुद्राराक्षस से भी नंदो के जैन मतानुयायी होने की सूचना मिलती है।


पुराणों, के अनुसार, बिंबिसार से नंदो तक के राजाओं का शासनकाल

राजा का नाम

शासनकाल (वर्ष में)

शिशुनाग

40

काकवर्ण

26

क्षेमवर्धन

36

क्षेमजित् अथवा क्षत्रोजस

24

बिंबिसार

28

अजातशत्रु

27

दर्शक

24

उदायिन

33

नंदिवर्ध्दन

40

महानंदिन

43

महापद्म तथा उसके आठ पुत्र

100 (कुछ विद्वानों के अनुसार 40 वर्ष)



भारत के प्राचीनतम प्राप्त सिक्के आहत सिक्के या पंचमार्क सिक्के थे, जो चांदी के बने होते थे। इनके ऊपर ठप्पा देकर निशान बनाए जाते थे इसीलिए इन्हें आहत सिक्के या पंचमार्क सिक्के कहा जाता है।
पाली धर्मग्रंथों से पता चलता है कि बुध्दकाल में प्रद्येत अवंति का राजा था। उदयन, वत्स महाजनपद का राजा था। प्रसेनजित कोसल का एवं अजातुशत्रु मगध का शासक था।
खारवेल हाथी गुम्फा अभिलेख से नंद राजा महापद्मनंद की कलिंग विजय सूची होती है। इसके अनुसार, नंद राजा जिनसेन की एक प्रतिमा उठा ले गया तथा उसने कलिंग में एक नहर निर्माण करवाया था।
मध्य प्रदेश के मालवा में स्थित उज्जैन को भारत के प्राचीन ऐतिहासिक नगरो में गिना जाता है। यह पोषश महाजनपदों में से एक अवंति की दो राजधानियों मे से एक थी। इसको अवंतिका भी कहा जाता था।
पाटलिपुत्र की स्थापना अजातशत्रु के उत्तराधिकारी उदयिन ने गंगा और सोन नदी के संगम पर एक किला बनाकर की थी। इसने मगध साम्राज्य की राजधानी राजगृह से पाटलिपुत्र स्थानांतरित की। यह नगर शिशुनाग वंश, नंद वंश और मौर्य वंश की भी राजधानी रहा।
उदयन-वासवदत्ता की दंतकथा उज्जैन सें संबंधित है। इस कथा को महाकवि भास ने अपने नाटक स्वप्नवासवदत्तम में वर्णित किया है। इस नाटक में वत्स नरेश उदयन तथा अवंति नरेश प्रद्योत की पुत्री वासवदत्ता की प्रेम कथा का वर्णन है। ये कथा उस समय की है जब उदयन, उज्जयिनी के कारागार में कैद थे।
प्रथम मगध साम्राज्य का उत्कर्ष ई.पू. छठवी शताब्दी में हुआ था। इस साम्राज्य की महत्ता का वास्तविक संस्थापक राजा बिंबिसार (लगभग 544-492 ई.पू.) था। वह हर्यंक कुल से संबंध्द था।
ईसा पूर्व छठी शताब्दी के प्रारंभ में काशी भारत का सर्वाधिक शक्तिशाली नगर राज्य था। कई जातकों में इसके समकालीन शहरों की अपेक्षा इसकी समृध्दि एवं संपन्नता का साक्ष्य मिलता है। की कोशल, अंग और मगध के साथ लंबी प्रतिद्वंध्तिता थी। इनमें सर्वोच्चता के लिए लंबा संघर्ष चला था।


बुध्दकाल में गंगाघाटी में कई गणराज्यों के अस्तित्व के प्रमाण मिलते हैं, जो इस प्रकार हैं –
कपिलवस्तु के शाक्य
सुमसुमारगिरि के भग्ग
अलकप्प के बुलि
केसपुत्त के कालाम
रामगाम के कोलिय
कुशीनारा के मल्ल
पावा के मल्ल
पिप्पलिवन के मोरिय
वैशाली के लिच्छवि
मिथिला के विदेह
वैशाली के लिच्छवियों ने विश्व का पहला गणतंत्र स्थापित किया था। वैशाली बुध्द काल का सबसे बड़ा तथा शक्तिशाली गणराज्य था। लिच्छवी वज्जि संघ में सर्वप्रमुख थे।
प्रथम मगध साम्राज्य का उत्कर्ष ई.पू. छठवीं शताब्दी मे हुआ था। इस साम्राज्य की महत्ता का वास्तविक संस्थापक राजा बिंबिसार (लगभग 544-492 ई.पू.) था। वह हर्यंक कुल से संबंध्द था।
राजा चेतक, लिच्छवी गणराज्य के राजा थे, इनकी पुत्री चेलना का विवाह मगध नरेश बिंबिसार से हुआ था। लिच्छवी, वज्जि संघ के प्रधान वंशों में से एक था।
बौध्द अंगुत्तर निकाय में छठी शताब्दी ई.पू. के 16 महाजनपदों की सूचना मिलती है, जो इस प्रकार हैं – अंग, मगध, काशी, कोसल, वज्जि, मल्ल, चेदि, वत्स, कुरु, पांचाल, मत्स्य, शूरसेन, अस्मक, अवंति, गंधार, कम्बोज। जैन ग्रंथ भगवती सूत्र में भी 16 महाजनपदों का सूची मिलती है।
पाणिनि संस्कृत भाषा के सबसे बड़े वैयाकरण हुए हैं। इनका जन्म तत्कालीन उत्तर-पश्चिम भारत के गंधार में हुआ था। इनके व्याकरण का नाम अष्टाध्यायी है। अष्टाध्यायी मे आठ अध्याय तथा लगभग 4000 सूत्र है। पाणिनि ने अपने अष्टाध्यायी में 22 जनपदों का उल्लेख किया है। इनमें प्रमुख हैं – मगध अश्मक, कम्बोज, गंधार शूरसेन आदि। बौध्द ग्रंथ अंगुत्तर निकाय और जैन ग्रंथ भगवती सूत्र में 16 महाजनपदों की सूची मिलती है।
उत्तरी बिहार के वर्तमान भागलपुर तथा मुंगेर के जिले अंग महाजनपद के अंतर्गत थे। इसकी राजधानी चंपा थी। महाभारत और पुराणों में चंपा का प्राचीन नाम मालिनी प्राप्त होता है। दीर्घनिकाय के अनुसार, इस नगर निर्माण की योजना वास्तुकार महागोविंद ने की थी।
छठी शताब्दी ई.पू. मे आधुनिक बुंदेलखण्ड के पूर्वी तथा उसके समीपवर्ती भागों में चेदि महाजनपद स्थित था। इसकी राजधानी सोत्थिवती थी। जिसकी पहचान महाभारत के शुक्तिमती से की जाती थी।
बौध्द ग्रंथ अंगुत्तर निकाय तथा जैन ग्रंथ भगवती सूत्र में छठी शताब्दी ई.पू. में वर्णित 16 महाजनपदों अस्मक या अश्मक नर्मदा तथा गोदावरी नदियों के मध्य स्थित था, जिसकी राजधानी पैठन या पोतन अथवा पोटलि (प्राचीन नाम प्रतिष्ठान) थी।
गिरिव्रज या राजगृह और पाटलिपुत्र प्राचीन काल में क्रमशः मगध साम्राज्य की राजधानी रहे थे, जबकि कौशाम्बी पर वत्स राज्य का शासन था। हर्यंक वंश के शासन के दौरान मगध की राजधानी राजगृह से पाटलिपुत्र लाई गई थी।
प्राचीन श्रावस्ती की पहचान अलेक्जेंडर कनिंघम ने 1861 ई. में उ.प्र. के गोंडा के निकट सहेत-महेत (वर्तमान श्रावस्ती) नामक स्थान से की थी। उत्खननों के आधार पर ज्ञात हुआ है कि प्राचीन श्रावस्ती का नगर विन्यास अर्धचन्द्राकार था।