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Wednesday, 30 October 2019

History in Hindi for All Competitive Exams (State Level) Part 7

गीत गोविंद के रचयिता, जयदेव बंगाल के अंतिम सेन शासक लक्ष्मण सेन के आश्रित महाकवि थे। लक्ष्मणसेन के एक शिलालेख पर 1116 ई की तिथि है। अतः जयदेव ने इसी समय के आसपास गीतगोविंद की रचना की होगी। इसे गीत काव्य कहना उचित होगा | इसमें 12 सर्ग है तथा प्रत्येक सर्ग गीतों से समन्वित है।
प्राचीन भारतीय पुस्तक पंचतंत्र ( मूलतः संस्कृत में रचित ) का 15 भारतीय और 40 विदेशी भाषाओं में अनुवाद हुआ है | इसके मूल लेखक विष्णु शर्मा माने जाते हैं | रुडगर्टन (1924) के अनुसार , पंचतंत्र के 50 से अधिक भाषाओं में 200 से अधिक स्वरूप उपलब्ध हैं | यह भारत की सर्वाधिक बार अनुवादित साहित्यिक पुस्तक मानी जाती है | मुगल काल में पंचतंत्र का फारसी अनुवाद ‘ अनवारे सुहैली ‘ शीर्षक के तहत कराया गया था|
आचार्य सर्ववर्मा ( acharya sarvverma ) ने  पांच खंडों में कातंत्र व्याकरम ( katantra vyakaram ) नामक पुस्तक हिंदी एवं संस्कृत में लिखी थी | 12 वीं शताब्दी के गणितज्ञ भास्कर ( भास्कर II या भास्कराचार्य ) ने बीज गणित के क्षेत्र में विशेष योगदान दिया | इनकी प्रसिद्ध पुस्तक ‘ सिद्धांत शिरोमणि ‘ चार भागों – लीलावती , बीजगणित , ग्रहगणित और गोलाध्याय में विभाजित है | 12वीं शताब्दी में ‘ मिताक्षरा ‘ ( mitakshara ) की रचना विज्ञानेश्वर ने की थी | इसका पहला  अंग्रेजी अनुवाद हेनरी टॉमस कोलब्रुक के द्वारा 19वीं शताब्दी में किया गया | इसमें हिंदू नियमों का उल्लेख है |
‘मत विलास प्रहसन ‘ एक संस्कृत नाटक है | इसके लेखक पल्लव नरेश महेंद्र वर्मन है | यह एक परिहास नाटक है , जिसमें धार्मिक आडंबर के ऊपर कटाक्ष किया गया है | दण्डी  ने ‘ दशकुमारचरित ‘ एवं ‘ काव्यादर्श ‘ की रचना की | ‘ मनुस्मृति ‘ जिसमें कुल 18 स्मृतियां सम्मिलित हैं की रचना मनु द्वारा की गई मानी जाती है।| मनुस्मृति प्राचीन भारतीय समाज व्यवस्था तथा हिंदू विधि से संबंधित है | मनु को प्राचीन भारत का प्रथम एवं महान विधि निर्माता माना जाता है | शूद्रक ने प्रसिद्ध नाटक मृच्छकटिकम  की रचना की | इस नाटक में ब्राह्मण चारुदत्त तथा उज्जयिनी की प्रसिद्ध गणिका बसंतसेना के आदर्श प्रेम की कहानी वर्णित है |
शून्य का अविष्कार ईसा  पूर्व दूसरी सदी में किसी अज्ञात भारतीय ने किया था |  अरबों ने  इसे भारत से सीखा और यूरोप में फैलाया | अरब देश में शून्य का प्रयोग सबसे पहले 873 ई में पाया जाता है | प्रमुख रचनाकारों की प्रमुख रचनाएं हैं – सूरदास – सूरसागर ,  सूर सारावली , साहित्य लहरी | तुलसीदास – रामचरितमानस , विनय पत्रिका , कवितावली , गीतावली | * राजशेखर – काव्यमीमांसा , बाल रामायण , बाल भारत , विद्वशालभांजिका |


अमर सिंह द्वारा रचित अमरकोश, वात्स्यायन कृत काम सूत्र, कालिदास कृत मेघदूत तथा विशाखदत्त कृत मुद्रारक्षस- ये चारों रचनाएं गुप्तकालीन हैं।
भारवि द्वारा रचित रचना किरातार्जुनीयम महाकाव्य है, जिसकी कथावस्तु महाभारत से ली गई है। इसमें अर्जुन तथा किरात वेशधारी शिव के बीच युध्द का वर्णन है। नैषधीचरित महाकाव्य श्री हर्ष की कीर्ति का स्थायी स्मारक है। इसमें 22 सर्ग हैं। महाभारत का नपोपाख्यान इस महाकाव्य का मूल आधार है। शिशुपाल वध महाकवि माघ द्वारा रचित संस्कृत महाकाव्य है। इसमें कृष्ण द्वारा शिशुपाल के वध की कथा का वर्णन है, जो महाभारत से ली गई है। किरातार्जुनीयम, शिशुपालवध और नैषधीयचरितम वृहत्त्रयी कहलाते हैं।
वराहमिहिर की पंचसिध्दांतिका यूनानी ज्योर्तिविद्या पर आधारित है।
अमीर खुसरो अलाउद्दीन खिलजी के दरबारी कवि थे। उनकी प्रमुख रचनाएँ तारीखे अलाई, किरान उस सादेन, आशिका, मिफ्ता-उल-फुतूह आदि हैं।
राजतरंगिणी के लेखक कल्हण के समय कश्मीर का शासकक जयसिंह (1128-1154 ई.) था। उसी के शासनकाल के दौरान 1148-1149 ई. में कल्हण ने अपनी महान कृति राजतरंगिणी को पूरा किया। राजतरंगिणी में कुल 8 तरंग तथा 800 श्लोक हैं। प्रथम तीन तरंगों में अत्यंत प्राचीनकाल का कश्मीर का परंपरागत इतिहास है। चौथे से छठे तरंगों में कार्कोट तथा उत्पल वंशों का इतिहास है। सातवें और आठवें तरंगों में लोहारवंश का इतिहास अंकित है।
वृहतसंहिता गुप्तकाल वाराहमिहिर द्वारा संस्कृत में रचित एक विश्व कोष है।
कालिदास द्वारा रचित मालविकाग्निमित्र पांच अंको का नाटक है, जिसमें मालविका और अग्निमित्र की प्रणय कथा वर्णित है। अग्निमित्र शुंग शासक, पुष्यमित्र शुंग का पुत्र था।
महाकवि भास के नाम से 13 नाटक उपलब्ध हुए हैं, जिन्हें वर्ष 1909 में टी. गणपति शास्त्री ने ट्रावनकोर राज्य से प्राप्त किया था। स्वप्नवासवदत्ता और चारुदत महाकवि भास की प्रमुख रचना हैं।
अष्टांग-संग्रह आयुर्विज्ञान से, दशरुपक नाट्यकला से, लीलावती गणित से एवं महाभाष्य व्याकरण से संबंधित ग्रंथ है.
कर्म सिध्दांत पर विशेष बल देते हुए गीता मे श्री कृष्ण ने कहा है कि तुम्हारा अधिकार सिर्फ कर्म करने पर है, फल की प्राप्ति नही। (कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन्….)
सही सुमेलन है –


लेखक                 ग्रंथ

सर्ववर्मा        कातंत्र

शूद्रक         मृच्छकटिकम

विज्ञानेश्वर     मिताक्षरा

कल्हण        राजतरंगिणी

आर्यभठ्ठ (चौथी-पांचवी शताब्दी ई.) प्राचीन भारत के प्रसिध्द गणितज्ञ एवं खगोलशास्त्री थे। उन्होने अपनी पुस्तक आर्यभठ्ठीय में बताया कि सूर्य स्थित है, पृथ्वी घूमती है।
द नैचुरल हिस्ट्री प्लिनी द एल्डर (Pliny the Elder) नामक रोमन लेखक की रचना है।


पूर्व मध्यकाल (800-1200 ई.)

विग्रहराज चतुर्थ (1153-1163 ई.) की सबसे प्रमुख विजय दिल्ली की थी। इसने परमभठ्ठारक, परमेश्वर, महाराजाधिराज जैसी उपाधियां धारण की। जयानक उसे कविबान्धव तथा सोमदेव ने उसे विद्वानों में सर्वप्रथम कहा है। सोमदेव ने ललित विग्रहराज नामक ग्रंथ की रचना की। अजमेर का शासक पृथ्वीराज तृतीय (1177-1192 ई.) ही पृथ्वीराज चौहान के नाम से प्रसिध्द है, जिसने 1191 ई. में तराइन के प्रथम युध्द में मुहम्मद  गोरी को पराजित किया था। परंतु 1192 ई. में तराइन के द्वितीय युध्द में उसकी पराजय हुई थी।
पाल वंश का संस्थापक गोपाल था | धर्मपाल के खालीमपुर लेख में कहा गया है कि ‘ मत्स्यन्याय ‘ से छुटकारा पाने के लिए प्रकृतियों ( सामान्य जनता ) ने गोपाल को लक्ष्मी की बांह ग्रहण कराई। नालंदा में इसने एक विहार का निर्माण कराया था। धर्मपाल ( 770-810 ई.) एक उत्साही बौद्ध था। उसके लेखों में उसे ‘ परमसौगत ‘ कहा गया है। उसने विक्रमशिला तथा सोमपुरी ( पहाड़पुर ) में प्रसिद्ध विहारों की स्थापना की |
1203 ई. में बख्तियार खिलजी ने विक्रमशिला विश्वविद्यालय को नष्ट कर दिया। पालवंशी शासक देवपाल (810-850 ई) बौद्ध मतानुयायी थे। उसने जावा के शैलेंद्रवंशी शासक बालपुत्रदेव के अनुरोध पर उसे नालंदा में एक बौद्ध विहार बनवाने के लिए पांच गांव दान में दिए थे।
गोविंदचंद्र गहड़वाल की रानी बौद्ध मतानुयायी थी | उन्होंने सारनाथ में धर्म चक्र -जिन विहार बनवाया था | गोविंद चंद का मंत्री लक्ष्मीधर ने ‘ कृत्यकल्पतरु ‘ नामक ग्रंथ की रचना की | इसमें 14 अध्याय हैं | * गहड़वाल वंश का अंतिम शासक जयचंद्र था |
हम्मीर महाकाव्य में चौहानों को सूर्यवंशी बताया गया है | हम्मीर महाकाव्य और पृथ्वीराज विजय के अनुसार , चौहान सूर्य के पुत्र चाहमान नामक अपने पूर्वज के वंशज थे | वे चार अग्निकुलों में से एक थे | इस वंश के प्रारंभिक शासको में वासुदेव एवं गूवक का नाम उल्लेखनीय है |
आल्हा -ऊदल महोबा के संबंधित थे। ये चंदेल शासक परमार्दिदेव (परमल)(1165-1203) के सेनानायक थे जो 1182 ई में पृथ्वीराज चौहान का डटकर सामना करने के बाद वीरगति को प्राप्त हुए | चंदेलों एवं चौहानों के इस संघर्ष का वर्णन चंदबरदाई कृत ‘ पृथ्वीराजरासों ‘ एंव ‘ परमाल रासो ‘ तथा जगनिक कृत ‘ आल्हाखंड में मिलता है |
जेजाकभुक्ति बुंदेलखंड का प्राचीन नाम था। चंदेल वंश के संस्थापक नन्नुक के पौत्र जय सिंह या जेजा के नाम पर यह प्रदेश जेजाकभुक्ति कहलाया। खजुराहो लेख में शासक हर्ष को ‘ परमभट्टारक ‘ कहा गया है। शासक धंग ने ‘ महाराजाधिराज ‘ की उपाधि धारण की। उसने प्रयाग के संगम में जल समाधि द्वारा प्राण त्याग दिया।
प्राचीन काल में पुंड्रवर्धन भुक्ति उत्तर बंगाल के क्षेत्र में अवस्थित थी। पाल , चंद्र , एवं सेन राजवंशों के युग में इसके क्षेत्राधिकार का विस्तार उत्तर बंगाल के बाहर भी था।
गुर्जर-प्रतिहार वंश का संस्थापक नागभट्ट प्रथम (730-750ई.) था। इस वंश के शासक नागभठ्ठ द्वितीय ने ‘परमभट्टारक महाराजधिराज परमेश्वर ‘ की उपाधि धारण की। मिहिरभोज प्रथम वैष्णव धर्मानुयायी था। इसने ‘आदिवाराह ‘ तथा प्रमास जैसी उपाधियां धारण की। प्रतिहार वंश का महानतम शासक मिहिरभोज था। इसका शासनकाल 836-885 ई. तक रहा। इसके बाद महेंद्रपाल प्रतिहार शासक हुआ , इसका शासनकाल 885-910 ई. तक रहा।
महान जैन विद्वान हेमचंद्र ( 1089-1172 ई) ने सोलंकी वंश के जयसिंह सिद्धराज के समय में प्रमुखता प्राप्त की थी। * तथापि वे उसके उत्तराधिकारी कुमारपाल (1143-1173 ई) के सलाहकार के रूप में उसकी सभा को अलंकृत करते थे।
सेनवंश के लेखो से ज्ञात होता है कि वे चंद्रवंशी क्षत्रिय थे तथा उनका आदि पुरूष वीरसेन था। सेनवंश के शासक बल्लालसेन ने परमभट्टारक , महाराजधिराज , परमेश्वर , परममाहेश्वर , नि:शंक शंकर आदि उपाधियां धारण की। इसने दानसागर नामक ग्रंथ की रचना की। लक्ष्मण सेन (1178-1206 ) सेन वंश के चौथे शासक थे। इन्होंने 28 वर्षों तक शासन किया। इनके द्वारा एक नए संवत् ‘ लक्ष्मण संवत् ‘ का प्रारंभ किया गया।


विज्ञानेश्वर , हिमाद्रि एवं जीमूतवाहन मध्यकालीन भारत के प्रसिद्ध विधिवेत्ता थे। विज्ञानेश्वर ने याज्ञवल्क्य स्मृति पर ‘ मिताक्षरा ‘ शीर्षक से टीकांग्रथ लिखा। जीमूतवाहन ने ‘ दायभाग’ नामक ग्रंथ की रचना की।
गुजरात का चालुक्य शासक जयसिंह सिद्धाराज एक धर्म सहिष्णु शासक था। मुस्लिम लेखक मुहम्मद औफी का कहना है कि खम्भात में कुछ मस्जिदों हेतू उसने 1 लाख बालोम (मुद्राएं ) दान में दी थी।
परमार शासक मुंज ने ‘ मुंजसागर ‘ नामक तालाब बनवाया था। उसने श्रीवल्लभ , पृथ्वीवल्लभ ,अमोघवर्ष आदि उपाधि धारण की | उसके छोटे भाई सिंधुराज ने कुमारनारायण , तथा साहसांक जैसी उपाधियां धारण की। राजा भोज परमार शासक था परमारों का पहले शासन केंद्र उज्जैन था। तत्पश्चात राजधानी धार में स्थानांतरित कर दी गई। राजा भोज ने धार से शासन किया। इनके द्वारा कृत्रिम वैज्ञानिक उपकरणों पर लिखी गई प्रसिद्ध पुस्तक ‘ समरांगण सूत्राधार ‘ है।
‘ सरस्वती कण्ठाभरण ‘ , ‘ सिद्धांत संग्रह ‘ , योग सूत्र वृत्ति, राजमार्तंड ‘ विद्या विनोद ‘ युक्त कल्पतरु , तथा ‘ चारुचर्या ‘ आदि इनकी प्रसिद्ध रचनाएं है। भोजशाला मंदिर मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित है। यहां पर भगवती सरस्वती देवी अधिष्ठात्री ( स्थापित ) है। भोजशाला का निर्माण परमार शासक राजा भोज ने 1035 ई में संस्कृत पाठशाला के रूप में कराया था। अब भोजशाला कमाल मौला मस्जिद परिसर में स्थित है। गौडवहो कन्नौज के राजा यशोवर्मन के राजाश्रित कवि वाक्पति की रचना है।
गोविंदचन्द्र गहड़वाल की रानी कुमारदेवी बौध्द मतानुयाई थी। उन्होने सारनाथ में धर्मचक्रम-जिन विहार बनवाया था।
चौहानवंशी शासक पृथ्वीराज III (रायपिथौरा) के दरबारी कवि चंदबरदाई ने पृथ्वीराज  रासों की रचना की। इसमें चौहानों को अग्निकुण्ड से उत्पन्न बताया गया है।
पृथ्वीराज विजय के लेखक जयानक हैं।
हमीर रासों की रचना सारंगदेव ने की थी।
आठवीं शताब्दी में दिलिका (देहली) शहर की स्थापना तोमर वंश के अनंगपाल ने की। चंदबरदाई की रचना पृथ्वीराज रासों में तोमर वंश के राजा अनंगपाल को दिल्ली का संस्थापक बताया गया है। बाद में चौहान शासको ने दिल्ली को अपने अधिकार मे ले लिया.
जेजाभुक्ति बुंदेलखंड का प्राचीन नाम था। चंदेल वंश के संस्थापक नन्नुक के पौत्र जय सिंह या जेजा के नाम पर यह प्रदेश जेजाकभुक्ति कहलाया।
जेजाकभुक्ति के चंदेलों में धंगदेव सबसे प्रसिध्द एवं शक्तिशाली राजा हुआ।  उसके लंबे राज्यकाल में खजुराहों के दो प्रसिध्द मंदिर विश्वनाथ  तथा पार्श्वनाथ बने। कंदरिया महादेव मंदिर का निर्माण धंगदेव द्वारा 999 ई. में किया गया। धंग ने प्रयाग के संगम में शिव की अराधना करते हुए शरीर का त्याग किया।
ओदंतपुर जिसे उदनापुर भी कहा जाता है, प्राचीन काल में एक प्रमुख शिक्षा केन्द्र था। यह बिहार राज्य मे स्थित था। इसकी स्थापना पाल वंश के प्रथम शासक गोपाल ने की थी।
वर्तमान पाकिस्तान के रावलपिंडी जिले में स्थित तक्षशिला प्राचीन समय में गांधार राज्य की राजधानी थी। तक्षशिला की इतिहास में प्रसिध्दि का कारण उसका ख्याति प्राप्त शिक्षा केन्द्र होता था। यहां अध्ययन के लिए  दूर-दूर से  विद्यार्थी आते थे जिनमें राजा तथा सामान्यजन दोनों की सम्मिलित थे। कोशल के राजा प्रसेनजित, बिम्बिसार का राजवैद्य जीवक, कनिष्क का राजवैद्य चरक, बौध्द विद्वान वसुबंधु, चाणक्य आदि ने यही शिक्षा प्राप्त की थी।
राष्ट्रकूट वंश का स्थापना 736र ई. मे दंतिदुर्ग ने की। दंतिदुर्ग के संबंध में कहा जाता है कि उज्जयिनी में उसने हिरण्यगर्भ (महादान) यज्ञ करवाया था।
राष्ट्रकूट राजा अमोघवर्ष प्रथम का जन्म 800 ई. में नर्मदा नदी के किनारे श्रीभावन नामक स्थान पर सैनिक छावनी में हुआ था। इस समय इसके पिता राष्ट्रकूट राजा गोविंद तृतीय, उत्तर भारत के सफल अभियानों के बाद वापस लौट रहे  थे।
प्रतिहार वंश का संस्थापक नागभठ्ठ को माना जाता है, किंतु वास्तविक संस्थापक वत्सराज था। प्रतिहार वंश का सर्वाधिक महत्वपूर्ण शासक मिहिरभोज था। प्रतिहारों की राजधानी कन्नौज थी। चोल साम्राज्य की स्थापना विजयालय (850-887 ई.) ने की थी। तंजौर चोलो की राजधानी थी। परमार वंश का वास्तविकत संस्थापक सीयक द्वीतीय था। परमारों की राजधानी धारा थी। चालुक्य अथवा सोलंकी अग्निकुलीन  राजपूत थे। इस वंश का संस्थापक मूलराज प्रथम था।  सोलंकियों की राजधानी अन्हिलवाड़ थी।



गुजरात का चालुक्य शासक जयसिंह सिध्दराज एक धर्म सहिष्णु शासक था। मुस्लिम लेखक मुहम्मद औफी का कहना है कि खंभात मे कुछ मस्जिदों हेतु उसने एक लाख बालोम (मुद्राएं) दान मे दी थी।
परमार वंश की स्थापना दसवीं शताब्दी ईस्वी में प्रथम चरण में उपेन्द्र अथवा कृष्णराज नामक व्यक्ति ने की थी। धारा नामक नगरी परमार वंश की राजधानी थी।
गांगेयदेव कलचुरी वंश का एक शक्तिशाली शासक था, जिसने विक्रमादित्य की उपाधि धारण की। पूर्व मध्यकाल मे स्वर्ण सिक्कों के विलुप्त हो जाने के पश्चात उन्होंने सर्वप्रथम इसे प्रारंभ करवाया। उपेन्द्र, मुंज एवं  उदयादित्य ये सभी परमारवंशीय शासक थे।
गौडवहों कन्नौज के राजा यशोवर्मन के राजाश्रित कवि वाक्पति की रचना है।
मध्यकाल में अरघट्टा भूमि की सिंचाई के लिए प्रयुक्त जलचक्र (वाटर ह्वील) था।
कर्नाट वंश के संस्थापक नान्यदेव (1097-98 ई.) थे। वे एक महान योध्दा थे। नान्यदेव ने कर्नाट की राजधानी सिमरावगढ़ को बनाया। कर्नाट वंश का शासनकाल (1097-98-1378 ई.) मिथिला का स्वर्ण युग कहलाता है।
कर्नाट वंश का अंतिम शासक हरिसिंह देव थे। ये कला और साहित्य के महान संरक्षक थे। इन्होने पंजी व्यवस्था की शुरुआत की थी।























भारत पर मुस्लिम आक्रमण

·      मक्का सऊदी अरब में स्थित है , यहीं पर 570 ई में इस्लाम धर्म के प्रवर्तक हजरत मुहम्मद का जन्म हुआ था। इसी कारण यह स्थान मुस्लिम अनुयायियों का पवित्र तीर्थ स्थल है। इनकी मृत्यु 632 ई. में हुई थी। ऋग्वेद में उल्लिखित ‘भरत ‘ कबीले के नाम पर इस देश का नाम भारत पड़ा।
·      परंपरानुसार दुष्यंत के पुत्र भरत के नाम पर हमारे देश का नाम भारत पड़ा है। कुछ विद्वानों के अनुसार ऋषभदेव के ज्येष्ठ पुत्र भरत के नाम पर इस देश का नाम भारत पड़ा | ईरानियों ‘ ने इस देश को ‘ हिंदुस्तान ‘ कहकर संबोधित किया है तथा यूनानियों ने इसे इंडिया कहा है। हिंद (भारत) की जनता के संदर्भ में ‘ हिंदू ‘ शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग अरबों द्वारा किया गया था। भारत पर पहला मुस्लिम आक्रमण 711 ईसवी में अरब आक्रमणकारी मोहम्मद बिन कासिम के नेतृत्व में हुआ था |
·      मोहम्मद बिन कासिम से पूर्व 711 ईसवी में ही उबैदुल्लाह के नेतृत्व में एक अभियान दल भेजा गया परंतु वह पराजित हुआ और मारा गया | दूसरा अभियान बुदैल ने किया किंतु वह भी असफल रहा | इन परिस्थितियों में इराक के हाकिम अल हज्जाज ने मोहम्मद बिन कासिम के नेतृत्व में अरबों को सिंध पर आक्रमण करने के लिए भेजा| भारी संघर्ष के बाद अरबों ने 712 ई में सिंध  पर विजय प्राप्त कर ली | उस समय सिंध पर चच के पुत्र दाहिर का शासन था। फारसी ग्रंथ ‘ चचनामा ‘ से अरबों द्वारा सिंध पर विजय की जानकारी मिलती है।
नोटः भारत पर प्रथम मुस्लिम आक्रमण के वर्ष के बारे में मतभेद है। बी.डी. महाजन के अनुसार यह तिथि 711 ई. है, जबकि हरिश्चन्द्र वर्मा के अनुसार यह तिथि 712  ई. है।

गजनी वंश का संस्थापक अल्पतगीन था | गजनी वंश का अन्य नाम यामीनी वंश भी है | अल्पतगीन ने  गजनी को अपनी राजधानी बनाया | 998 ई में महमूद गजनी का शासक बना | सर हेनरी इलियट के अनुसार,  महमूद ने भारत पर 17 बार आक्रमण किए | भीमदेव प्रथम ( 1022-64 ई.) के शासनकाल में महमूद गजनवी ने सोमनाथ के मंदिर को लूटा |
महमूद गजनवी का चंदेलों पर प्रथम आक्रमण 1019-20 ई में हुआ | उस समय चंदेल वंश का शासक विद्याधर था जो अपने वंश का सर्वाधिक शक्तिशाली शासक था | यह अकेला ऐसा हिंदू शासक था जिसने मुसलमानों का सफलतापूर्वक प्रतिरोध किया |
1000-1026 ई. के बीच महमूद गजनी (या गजनवी) ने भारत पर 17 बार आक्रमण किए परंतु इन आक्रमणों का उद्देश्य भारत में स्थायी मुस्लिम शासन की स्थापना करना नही था, बल्कि मात्र लूटपाट करना था। बगदाद के खलीफा अल-कादिर-बिल्लाह ने महमूद गजनवी को ‘ यामीन-उद्-दौला’ तथा ‘आमीन-उल-मिल्लाह ‘ की उपाधियां प्रदान की।
महमूद गजनवी शिक्षित एवं सुसभ्य था। | वह विद्वानों एवं कलाकारों का सम्मान करता था | उसने अपने समय के महान विद्वानों को गजनी में एकत्रित किया था। उसका दरबारी इतिहासकार उल्बी था | उसने किताब-उल-यामिनी तथा तारीख-ए-यामिनी नामक ग्रंथों की रचना की | इसके अतिरिक्त उसके दरबार में दर्शन , ज्योतिष और संस्कृत के उच्च कोटि का विद्वान अलबरूनी , ‘ तारीख-ए-सुबुक्तगीन ‘ का लेखक बैहाकी जिसे इतिहासकार लेनपूल ने ‘ पूर्वी पेप्स ‘  की उपाधि दी थी , फारस का कवि उजारी , खुरासानी विद्वान तुसी एवं उन्सुरी , विद्वान अस्जदी और फार्रुखी प्रमुख व्यक्ति थे।
शाहनामा का लेखक फिरदौसी है | यह महमूद गजनवी के दरबार का प्रसिद्ध विद्वान कवि था | इसे पूर्व के होमर की उपाधि दी जाती है | फरिश्ता (1560 से 1620 ईसवी ) ने तारीख- ए- फरिश्ता या गुलशन ए इब्राहिमी नामक किताब लिखी है | इसका पूरा नाम मुहम्मद कासिमश हिंदू शाह था | इसकी पुस्तक तारीख – ए – फरिश्ता बीजापुर के शासक इब्राहिम आदिल शाह को समर्पित थी|
महमूद गजनी के साथ प्रसिद्ध इतिहासकार अलबरूनी 11 वीं सदी में भारत आया था | उसकी पुस्तक “किताब- उल- हिंद” से तत्कालीन भारत की सामाजिक-सांस्कृतिक स्थिति की जानकारी मिलती है | पुराणों का अध्ययन करने वाला प्रथम मुसलमान अलबरूनी था | उसका जन्म 973 ईस्वी में हुआ था | वह खीवा (प्राचीन ख्वारिज्म) देश का रहने वाला था | वह महमूद गजनवी के साथ भारत आया था | अलबरूनी मात्र इतिहासकार ही नहीं था , उसके ज्ञान और रुचियों की व्याप्ति जीवन के अन्य क्षेत्रों तक थी | जैसे खगोल विज्ञान , भूगोल , तर्कशास्त्र , औषधि विज्ञान ,  गणित तथा धर्म और धर्म शास्त्र | उसने संस्कृत का अध्ययन किया और अनेक संस्कृत रचनाओं का उपयोग किया | जिसमें ब्रह्मगुप्त , बलभद्र तथा वाराह मिहिर की रचनाएं विशेष रूप से उल्लेखनीय है | उसने जगह-जगह भगवद गीता , विष्णु पुराण तथा वायु पुराण को उदृधत किया है | अलबरुनी ने अरबी भाषा में तहकीक- ए- हिंद की रचना की थी | सर्वप्रथम साचाऊ ने  अरबी भाषा से इस ग्रंथ का अनुवाद अंग्रेजी भाषा में किया। इसका अनुवाद हिंदी में रजनीकांत शर्मा द्वारा किया गया|
संस्कृत मुद्रालेख के साथ चांदी के सिक्के महमूद गजनवी ने जारी किए थे। महमूद गजनवी द्वारा चांदी के सिक्कों के दोनों तरफ दो अलग अलग भाषाओं में मुद्रालेख अंकित थे। ऊपरी भाग पर अंकित मुद्रालेख अरबी भाषा में था तथा दूसरी तरफ अंकित  लेख संस्कृत भाषा ( देवनागरी लिपि ) में था। सिक्के के मध्य भाग में संस्कृत भाषा में लिखा था।  “अवयक्तमेकम मुहम्मद अवतार नुरुपति महमूद।”
मध्य एशिया के शासक शिहाबुद्दीन मुहम्मद गौरी ने 1192 ईस्वी में उत्तर भारत को जीता | शिहाबुद्दीन मुहम्मद गौरी का प्रथम आक्रमण 1175 ईस्वी में मुल्तान पर हुआ और 1205 ईसवी तक वह बराबर साम्राज्य विस्तार अथवा पूर्वविजित राज्य की रक्षा के लिए भारत पर चढ़ाई करता रहा |


1178 ई. में मुहम्मद गोरी ने गुजरात पर आक्रमण किया किंतु मूलराज द्वितीय या भीम द्वितीय ने अपनी योग्य एवं साहसी विधवा मां नायिका देवी के नेतृत्व में आबू पर्वत के निकट गौरी का मुकाबला किया और उसे परास्त कर दिया| यह गौरी की भारत में पहली पराजय थी| 1191 ई. में पृथ्वीराज चौहान और गौरी के मध्य तराइन का प्रथम युद्ध हुआ| इस युद्ध में शिहाबुद्दीन की सेना के दोनों पार्श्व परास्त हो गए| 1192 ईस्वी में तराइन के द्वितीय युद्ध में मोहम्मद गोरी द्वारा पृथ्वीराज चौहान की पराजय के बाद भारत में मुस्लिम शक्ति की स्थापना हुई | गोरी की सजगता और श्रेष्ठ युद्ध प्रणाली के कारण मुसलमानों की जीत हुई |
पृथ्वीराज चौहान ने हताश होकर घोड़े पर बैठकर भागने का प्रयत्न किया, किंतु सुरसती (आधुनिक सिरसा , हरियाणा राज्य में) के निकट उसे बंदी बना लिया गया। पृथ्वीराज चौहान की मृत्यु के बारे में विभिन्न मत प्रकट किए गए हैं, किंतु उनमें हसन निजामी का मत ही स्वीकार किया जाता है कि पृथ्वीराज चौहान गोरी के साथ अजमेर गया था और उसने गोरी की अधीनता स्वीकार कर ली थी।परंतु जब उसने विद्रोह करने का षड्यंत्र किया तो उसे मृत्यु दंड दे  दिया गया। यह युद्ध भारतीय इतिहास में अत्यधिक महत्वपूर्ण था। 1194 ई. में चंदावर के युद्ध में मुहम्मद गोरी ने कनौज के गहड़वाल राजा जयचंद को पराजित किया था।चंदावर,वर्तमान फिरोजाबाद जिले में यमुना तट पर स्थित है।मुहम्मद गोरी के सिक्कों पर देवी  लक्ष्मी की आकृती बनी है और दूसरे तरफ कलमा (अरबी में) खुदा हुआ है।
गौरी की विजयों के बाद शीघ्र ही उत्तर भारत में अक्ता प्रथा स्थापित हो गई | गोर के मोहम्मद साम (मोहम्मद गौरी) ने कुतुबुद्दीन ऐबक को 1191 ईसवी में हांसी में नियुक्त किया | 1192 ईस्वी में तराइन के द्वितीय युद्ध में उसने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई | उसके कार्यों से प्रसन्न होकर गौरी ने उसे क्रमशः कुहराम और समाना का प्रशासक नियुक्त किया | वस्तुतः 1192- से 1206 ईस्वी तक उसने गौरी के प्रतिनिधि के रूप में उत्तरी भारत के विजित भागों का प्रशासन संभाला | इस अवधि में ऐबक ने उत्तरी भारत में तुर्की शक्ति का विस्तार भी किया |
बिहार और उत्तरी बंगाल की विजय के बारे में गौरी अथवा ऐबक ने सोचा भी ना था | इस कार्य को गौरी के एक साधारण दास मोहम्मद इख्तियारुद्दीन बिन बख्तियार खिलजी ने किया | उसने 1202 ई. तक बिहार की विजय की तथा नालंदा एवं विक्रमशिला को तहस-नहस कर राजधानी उदंतपुर पर कब्जा कर लिया | उसने 1204-1205 ईसवी में बंगाल पर आक्रमण किया | उस समय वहां का शासक लक्ष्मण सेन था | वह बिना युद्ध किए ही भाग निकला | तुर्की सेना ने राजधानी नदिया में प्रवेश कर बुरी तरह लूट-पाट की | राजा की अनुपस्थिति में नगर ने आत्मसमर्पण कर दिया | लक्ष्मण सेन ने भागकर दक्षिण बंगाल में शरण ली और वहीं कुछ समय तक शासन करता रहा |
·      इख्तियारुद्दीन ने भी संपूर्ण बंगाल को जीतने का प्रयत्न नहीं किया | इख्तियारुद्दीन ने लखनौती को अपनी राजधानी बनाया | प्रोफेशर हबीब के अनुसार , तुर्कों द्वारा उत्तर पश्चिम की विजय ने क्रमशः“शहरी क्रांति” और “ग्रामीण क्रांति” को जन्म दिया  |
मुहम्मद बिन कासिम एक अरबी था। वह इराक के राजा अल-हज्जाज का भतीजा और दामाद दोनों था। जिस समय उसने सिंध पर आक्रमण किया उसकी आयु मात्र 17 वर्ष थी।
गजनी वंश का संस्थापक अल्पतगीन था। गजनी वंश का अन्य नाम यामीनी वंश भी है। अल्पतगीन ने गजनी को अपनी राजधानी बनाया। इस समय उत्तर-पश्चिम भारत में हिंदूशाही राजवंश का राज्य था, जिसका विस्तार हिंदुकुश पर्वतमाला तक था।
संस्कृत मुद्रालेख के साथ चांदी के सिक्के महमूद गजनवी ने जारी किए थे। महमूद गजनवी द्वारा जारी चांदी के सिक्कों के दोनो तरफ दो अलग-अलग भाषाओं में मुद्रालेख थे। ऊपरी भाग पर अंकित मुद्रालेख अरबी भाषा में तथा दूसरी तरफ अंकित लेख संस्कृत भाषा (देवनागरी लिपि) में था। सिक्के के मध्य भाग में संस्कृत भाषा में लिखा था – अवयक्तमेकम मुहम्मद अवतार नुरुपति महमूद। इस लेख के चारों तरफ अंकित लेख था – अवयक्तिया नाम अयाम टनकम हतो महमूदपुर सवंतो चांदी के इस सिक्के (दिरहम) का वजन 3.0 ग्राम था।
1192 ई. में तराइन के द्वीतीय युध्द में मोहम्मद गोरी द्वारा पृथ्वीराज चौहान की पराजय के बाद भारत में मुस्लिम शक्ति की स्थापना हुई। गोरी की सजगता और श्रेष्ठ युध्द प्रणाली के कारण मुसलमानों की जीत हुई। पृथ्वीराज चौहान ने हताश होकर घोडे पर बैठकर भागने का प्रयत्न किया किंतु सुरसती (आधुनिक सिरसा, हरियाणा राज्य में) के निकट उसे बंदी बना लिया गया। पृथ्वीराज चौहान की मृत्यु के बारे में विभिन्न मत प्रकट किए गए हैं, कितु उनमें हसन निजामी का मत ही स्वीकार किया जाता है। कि पृथ्वीराज चौहान गोरी के साथ अजमेर गया था और उसने गोरी की अधीनता स्वीकार कर ली थी। परंतु जब उसने विद्रोह करने का षड्यंत्र किया तो उसे मृत्युदंड दे दिया गया। यह युध्द भारतीय इतिहास में अत्यधिक महत्वपूर्ण था।
मुहम्मद गोरी के सिक्कों पर देवी लक्ष्मी की आकृति बनी है और दूसरे तरफ कलमा (अरबी में) खुदा हुआ है।


































दिल्ली सल्तनत-गुलाम वंश

·      1206 से 1290 ई० तक दिल्ली सल्तनत के सुल्तान गुलाम वंश के सुल्तानों के नाम से विख्यात हुए, जिसका संस्थापक कुतुबुद्दीन ऐबक था। यद्यपि वे एक वंश के नहीं थे, वे सभी तुर्क थे तथा उनके वंश पृथक-पृथक थे। साथ ही, वे स्वतंत्र माता-पिता की संतान थे ।अतःइन सुल्तानों को गुलाम वंश के सुल्तान कहने के स्थान पर प्रारंभिक तुर्क सुल्तान या दिल्ली के ममलूक सुल्तान कहना अधिक उपयुक्त है।
·      भारत में गुलाम वंश का प्रथम शासक कुतुबुद्दीन ऐबक ( 1206-10 )ईस्वी था |  वह ऐबक नामक तुर्क जनजाति का था| बचपन में उसे निशापुर के काजी फखरुद्दीन अब्दुल अजीज कुकी ने  एक दास के रूप में खरीदा था |  बचपन से ही अति सुरीले स्वर में कुरान पढ़ता था | जिस कारण वह कुरान-ख्वां ( कुरान का पाठ करने वाला)  के नाम से प्रसिद्ध हो गया | बाद में वह निशापुर से गजनी लाया गया जहां उसे गौरी ने खरीद लिया | अपनी प्रतिभा, लगन और ईमानदारी के बल पर शीघ्र ही ऐबक  ने गौरी का विश्वास प्राप्त कर लिया | गौरी ने उसे अमीर-ए-आखूर के पद पर प्रोन्नत कर दिया | उसने अपना राज्यअभिषेक गौरी की मृत्यु के 3 माह पश्चात जून , 1206 ईस्वी में कराया था | ऐबक की राजधानी लाहौर थी |
·      ऐबक ने कभी सुल्तान की उपाधि धारण नहीं की | उसने केवल मलिक और “सिपहसालार” की पदवियों से ही अपने को संतुष्ट रखा | गौरी के अधिकारी गियासुद्दीन महमूद से मुक्ति पत्र प्राप्त करने के बाद 1208 ईस्वी में ऐबक को दासता से मुक्ति मिली।
·      अपनी उदारता के कारण कुतुबुद्दीन ऐबक इतना अधिक दान करता था कि उसे  “लाख-बख्श” (लाखों को देने वाला) के नाम से पुकारा गया | ऐबक  ने दिल्ली में कुवत उल इस्लाम और अजमेर में “ढाई दिन का झोपड़ा” नामक मस्जिद का निर्माण कराया था | उसने दिल्ली में स्थित कुतुब मीनार का निर्माण कार्य प्रारंभ किया | जिसे इल्तुतमिश ने पूरा कराया |
·      फिरोजशाह तुगलक के शासन काल में इसकी चौथी मंजिल को काफी हानि पहुंची थी, जिस पर फिरोज ने चौथी मंजिल के स्थान पर दो और मंजिलों का भी निर्माण करवाया | सुल्तान कुतुबुद्दीन ऐबक की मृत्यु चौगान के खेल (आधुनिक पोलो की भांति का एक खेल)  में घोड़े से गिरने के दौरान 1210 ईस्वी में हुई थी | उसे लाहौर में दफनाया गया |
·      दिल्ली का पहला सुल्तान इल्तुतमिश था |  उसने सुल्तान के पद की स्वीकृति गोर के किसी शासक से नहीं अपितु खलीफा से प्राप्त की | खलीफा ने इल्तुतमिश के शासन की पुष्टि उस सारे क्षेत्र में कर दी, जो उसने विजित किया और उसे “सुल्तान- ए- आज़म” की उपाधि प्रदान की |
·      “गुलाम का गुलाम” इल्तुतमिश को कहा जाता था | इल्तुतमिश “इल्बरी” जनजाति का तुर्क था | सुल्तान बनने से पहले वह बदायूं का सूबेदार था | 1205-1206 ईस्वी में खोक्खर जाति के विद्रोह को दबाने के लिए गए अभियान में वह मोहम्मद गोरी और ऐबक के साथ था | युद्ध में उसने साहस और कौशल का परिचय दिया | जिससे प्रभावित होकर गोरी ने ऐबक को उसकी दासता से मुक्त कराने का आदेश दिया।
·      मंगोल नेता चंगेज खां भारत की उत्तर-पश्चिम सीमा पर इल्तुतमिश के शासनकाल में आया था | चंगेज खां के प्रकोप से रक्षार्थ ख्वारिज्म शाह का पुत्र जलालुद्दीन मंगबरनी सिंधु घाटी पहुंचा | संभवतः चंगेज खां ने इल्तुतमिश के पास अपने दूत भेजे थे कि वह मंगबरनी की सहायता न करें, अतः इल्तुतमिश ने उसकी कोई सहायता न की और जब   मंगबरनी 1224 ईस्वी में भारत से चला गया तो इस समस्या का समाधान हो गया |


1225 ईस्वी में इल्तुतमिश ने बिहार शरीफ एवं बाढ़ पर अधिकार कर राजमहल की पहाड़ियों में तेलियागढ़ी के समीप हिसामुद्दीन ऐवाज को पराजित किया | ऐवाज ने इल्तुतमिश की अधीनता स्वीकार कर ली | इल्तुतमिश ने ऐवाज के स्थान पर मलिक जानी को बिहार का सूबेदार नियुक्त किया |
इल्तुतमिश ने हीं भारत में सल्तनत काल में सर्वप्रथम शुद्ध अरबी सिक्के चलाए थे | सल्तनत युग के दो महत्वपूर्ण सिक्के चांदी का टंका (175 ग्रेन) और तांबे का जीतल उसी ने आरंभ किए तथा सिक्कों पर टकसाल का नाम लिखवाने की परंपरा शुरू की | 1229 ई मे इल्तुतमिश को बगदाद के खलीफा से “खिलअत” का प्रमाण पत्र प्राप्त हुआ जिससे इल्तुतमिश वैध सुल्तान और दिल्ली सल्तनत स्वतंत्र राज्य बन गया |
इब्नबतूता के वर्णन से ज्ञात होता है कि इल्तुतमिश ने अपने महल के सामने संगमरमर की दो शेरों की मूर्तियां स्थापित कराई थी | जिनके गले में 2 घंटियां लटकी हुई थी, जिनको बजाकर कोई भी व्यक्ति सुल्तान से न्याय की मांग कर सकता था | इल्तुतमिश ने सभी शहरों में काजी और अमीरदाद नामक अधिकारी नियुक्त किए थे | डॉक्टर आर.पी. त्रिपाठी के अनुसार भारत में मुस्लिम संप्रभुता का इतिहास इल्तुतमिश से आरंभ होता है| सर वूल्जले हेग के अनुसार इल्तुतमिश गुलाम शासकों में सबसे महान था | डॉ ईश्वरी प्रसाद के अनुसार इल्तुतमिश , निस्संदेह गुलाम वंश का वास्तविक संस्थापक था |
मध्यकालीन भारत की प्रथम महिला शासिका रजिया सुल्तान (1236-40) थी | व्यक्तिगत दृष्टि से उसने भारत में पहली बार स्त्री के संबंध में इस्लाम की परंपराओं का उल्लंघन किया और राजनीतिक दृष्टि से उसने राज्य की शक्ति को सरदारों अथवा सूबेदारों में विभाजित करने के स्थान पर सुल्तान के हाथों में केंद्रित करने पर बल दिया तथा इस प्रकार उसने इल्तुतमिश के संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न राष्ट्र के सिद्धांत का समर्थन किया जो उस समय की परिस्थितियों में तुर्की राज्य के हित में था | रजिया बेगम को सत्ताच्युत करने में तुर्कों का हाथ था | उन्होंने भटिंडा के गवर्नर मलिक अल्तूनिया के नेतृत्व में रजिया के विरुद्ध विद्रोह कर उसे सत्ता से हटाया था |
सुल्तान बलबन का पूरा नाम गयासुद्दीन बलबन था। बलबन ने 1266 से 1287 ई. तक सुल्तान के रूप में सल्तनत की बागडोर संभाली। उसे उलुग खां के नाम से भी जाना जाता है | उसका वास्तविक नाम बहाउद्दीन था | इल्तुतमिश की भांति वह भी इल्बरी तुर्क था | उसने एक नवीन राजवंश बलबनी वंश की नींव डाली | बलबन बचपन में  ही मंगोलों  द्वारा पकड़ लिया गया था | जिन्होंने उसे गजनी में बसरा के निवासी ख्वाजा जमालुद्दीन के हाथों बेच दिया | अनंतर 1232 ईसवी में उसे दिल्ली लाया गया जहां इल्तुतमिश ने 1233 ईसवी में ग्वालियर विजय के पश्चात उसे खरीदा | उसकी योग्यता से प्रभावित होकर इल्तुतमिश ने उसे खसदार का पद दिया |
रजिया के काल में वह अमीर-ए-शिकार के पद पर पहुंच गया | रजिया के विरुद्ध षड्यंत्र में उसने तुर्की सरदारों का साथ दिया, फलस्वरूप बहराम शाह के सुल्तान बनने के बाद उसे अमीर-ए-आखूर का पद मिला | बदरुद्दीन रूमी की कृपा से उसे रेवाड़ी की जागीर मिली | महमूद शाह को सुल्तान बनाने में उसने तुर्की अमीरों का साथ दिया ,  जिसके फलस्वरूप उसे हांसी की सूबेदारी दी गई | 1249 ईस्वी में बलबन ने अपनी पुत्री का विवाह सुल्तान नसिरुद्दीन से किया | इस अवसर पर उसे “उलुग खां”  की उपाधि और “नायाब-ए-ममलिकात”  का पद दिया गया | 1266 ई. में बलबन दिल्ली की राजगद्दी पर आसीन हुआ था |
बलबन के विषय में कहा गया है कि उसने ‘ रक्त और लौह ‘ की नीति अपनाई थी | बलबन के राजत्व सिद्धांत की दो मुख्य विशेषताएं थी – प्रथम, सुल्तान का पद ईश्वर के द्वारा प्रदत्त होता है और द्वितीय , सुल्तान का निरंकुश होना आवश्यक है |


बलबन ने फारस के लोक प्रचलित वीरों से प्रेरणा लेकर अपना राजनीतिक आदर्श निर्मित किया था |उनका अनुकरण करते हुए उसने राजत्व की प्रतिष्ठा को उच्च सम्मान दिलाने का प्रयास किया | राजा को धरती पर ईश्वर का प्रतिनिधि ‘ नियामत-ए- खुदाई ‘ माना गया | उसके अनुसार मान मर्यादा में वह केवल पैगंबर के बाद है | राजा ‘ जिले अल्लाह ‘ या ‘ जिल्ले इलाही ‘ अर्थात ‘ ईश्वर का प्रतिबिंब ‘ है | यह दिल्ली का प्रथम सुल्तान था , जिसने राजत्व संबंधी सिद्धांतों की स्थापना की | उसने पुत्र बुगरा खाँ से कहा था – ‘ सुल्तान का पद निरंकुशता का सजीव प्रतीक है ” |
बलबन ने ईरानी बादशाहों के कई परंपराओं को अपने दरबार में आरंभ किया | उसने सिजदा ( भूमि पर लेट कर अभिवादन करना) और पाबोस ( सुल्तान के चरणों को चूमना ) की रीतियां आरंभ की | उसने अपने दरबार में प्रतिवर्ष फारसी त्यौहार ‘ नौरोज ‘ बड़ी शानो-शौकत के साथ मनाने की प्रथा प्रारंभ की।
·      मंगोलो से मुकाबला करने के लिए बलबन ने एक सैन्य विभाग दीवान-ए-अर्ज की स्थापना की थी। बलबन ने अपना सेना मंत्री (दीवान-ए-अर्ज) इमाद-उल-मुल्क को बनाया था, जो अत्यंत ईमानदार और परिश्रमी व्यक्ति था। बलबन ने उसे वजीर के आर्थिक नियंत्रण से मुक्त रखा ताकि उसे धन की कमी न हो।


कुतुबमीनार का निर्माण कुतुबुद्दीन ऐबक ने आरंभ किया और इसका निर्माण कार्य इल्तुतमिश के काल में पूरा हुआ। फिरोजशाह तुगलक के शासनकाल में इसकी चौथी मंजिल को काफी हानि पहुंची थी, जिस पर फिरोज ने चौथी मंजिल के स्थान पर दो और मंजिलो का भी निर्माण करवाया ग्यासुद्दीन तुगलक ने इसके निर्माण में कोई योगदान नही दिया था।
मुहम्मद गौरी की मृत्यु (1206) के बाद लाहौर के विशिष्ट जनों एवं अमीरों ने कुतुबुद्दीन ऐबक को सार्वभौम शक्तियाँ ग्रहण करने के लिए आमंत्रित किया। अतः उसने लाहौर जाकर सत्ता ग्रहण की तथा 24 जून, 1206 को औपचारिक रुप से सिंहासनारुढ़ हुआ। ऐबक की राजधानी लाहौर थी। गद्दी पर बैठने के बाद ऐबक के सामने सबसे बड़ी कठिनाई गोरी के दास और उसके राज्य के उत्तराधिकारी ताजुद्दीन यल्दौज और नासिरुद्दीन कुबाचा की तरफ से थी। ऐबक ने अपनी बहन की शादी कुबाचा से कर उसे अपने पक्ष में कर लिया, किंतु यल्दौज की तरफ से खतरा बना रहा। यही कारण था कि ऐबक सदा लाहौर में ही रहा। उसे दिल्ली आने का कभी अवसर नही मिला।
वस्तुतः दिल्ली का पहला सुल्तान इल्तुतमिश था। उसने सुल्तान के पद की स्वीकृति गोर के किसी शासक से नही अपितु खलीफा से प्राप्त की। खलीफा ने इल्तुतमिश के  शासन की पुष्टि उस सारे क्षेत्र में कर दी जो उसने विजित किया और उसे सुल्तान-ए-आजम की उपाधि प्रदान की। इस प्रकार वह कानूनी तरीके से दिल्ली का प्रथम स्वतंत्र सुल्तान था। व्यावहारिक दृष्टि से उसने दिल्ली की गद्दी के दावेदार ताजुद्दीन यल्दौज और नासिरुद्दीन कुबाचा को समाप्त किया, भारत मे तुर्की राज्य को संगठित किया, मंगोल आक्रमण से बचाया, राजपूतों की शक्ति को तोड़ने का प्रयत्न किया, सुल्तान के पद को वंशानुगत बनाया, दिल्ली को तुर्की राज्य की राजधानी के अनुरुप वैभवपूर्ण बनाया और अपने नाम के सिक्के चलाए।
गुलाम का गुलाम इल्तुतमिश को कहा जाता है। मो. गोरी के गुलाम कुतुबुद्दीन ऐबक ने इल्तुतमिश को खरीदा था। ऐबक ने आरंभ से ही इसे सर–ए–जहांदार (अंगरक्षकों का प्रधान) का महत्वपूर्ण पद दिया। ऐबक ने अपनी पुत्री का विवाह इल्तुतमिश से किया था।
चंगेज खान एक मंगोल शासक था जिसने मंगोल साम्राज्य के विस्तार में एक अहम भूमिका निभाई। चंगेज खान का वास्तविक या प्रारंभिक नाम तेमुजिन (या तेमुचिन) था।
बलबन ने गढ़मुक्तेश्वर के मस्जिद के दीवारों पर उत्कीर्ण शिलालेख पर स्वयं को खलीफा का सहायक कहा है।


खिलजी वंश

जलालुद्दीन खिलजी ने 1290 ई में खिलजी वंश की स्थापना की | इसने अपना राज्याभिषेक 1290 ई में कैकुबाद द्वारा बनवाए गए अपूर्ण किलोखरी ( कीलूगढ़ी ) के महल में करवाया था। डॉक्टर ए. एल. श्रीवास्तव के अनुसार , जलालुद्दीन दिल्ली का प्रथम तुर्की सुल्तान था जिसने उदार निरंकुशवाद के आदर्श को अपने सामने रखा |
जलालुद्दीन जब दिल्ली का सुल्तान बना तब उसने अलाउद्दीन को ‘ अमीर-ए-तुजुक ‘ का पद दिया तथा अपनी पुत्री का विवाह अलाउद्दीन से किया | मलिक छज्जू के विद्रोह को दबाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के कारण अलाउद्दीन खिलजी को कड़ा-मानिकपुर की सूबेदारी प्राप्त हुई |
अलाउद्दीन खिलजी दिल्ली का पहला सुल्तान था , जिसने धर्म पर राज्य का नियंत्रण स्थापित किया | उसने अपने आपको ‘ यामिन-उल-खिलाफत नासिरी अमीर-उल-मुमनिन ‘  बताया | वह उलेमा  वर्ग के प्रभाव से मुक्त रहा|अलाउद्दीन खिलजी एक महत्वाकांक्षी सुल्तान था। उसने ‘ सिकंदर द्वितीय सानी ‘ की उपाधि धारण की और उसे अपने सिक्कों पर अंकित करवाया | अलाउद्दीन का प्रसिद्ध सेनापति जफर खां मंगोलो के विरुद्ध लड़ता हुआ मारा गया जो अपने समय का श्रेष्ठ और साहसी सेनापति था|
जफर खां के शौर्य और भारतीय सेना की दृढ़ता से मंगोल इतने प्रभावित हुए कि उसी रात को 30 कोस पीछे हट गए और वापस चले गए | पद्मिनी , राणा रतन सिंह की पत्नी थी , अलाउद्दीन खिलजी के मेवाढ़ की राजधानी चित्तौड़ पर आक्रमण के दौरान राणा रतन सिंह की मृत्यु हो जाने के कारण रानी पद्मिनी ने जौहर कर लिया था। पद्मिनी की कहानी का आधार 1540 ई में मलिक मुहम्मद जायसी द्वारा लिखित काव्य-पुस्तक ‘ पद्मावत ‘ है।
अलाउद्दीन के शासनकाल के प्रारंभ में कुछ विद्रोह हुए | इन विद्रोह के कारणों पर विचार करके अलाउद्दीन खिलजी ने इसे समाप्त करने के लिए चार अध्यादेश जारी किए | पहले अध्यादेश के द्वारा उपहार , पेंशन , दान में प्राप्त भूमि आदि व्यक्तियों से वापस ले ली गई तथा सरकारी अधिकारियों को सभी व्यक्तियों से अधिकाधिक कर लेने का आदेश दिए गए | दूसरे अध्यादेश के अनुसार , गुप्तचर विभाग का गठन किया गया | तीसरे अध्यादेश के अनुसार , मादक द्रव्यों ( शराब , भांग आदि ) का प्रयोग तथा जुआ खेलने पर रोक लगा दी गई | चौथे अध्यादेश द्वारा सरदारों , अमीरों की दावतों , विवाह संबंधों पर प्रतिबंध लगा दिया गया |
अलाउद्दीन के आक्रमण के समय देवगिरि का शासक रामचंद्रदेव था। 1296 ई में देवगिरि के शासक रामचंद्रदेव ने अलाउद्दीन के सफल आक्रमण से बाध्य होकर उसे प्रतिवर्ष एलिचपुर की आय भेजने का वायदा किया था। परंतु 1305 ई अथवा 1306 ई में उसने उस कर को दिल्ली नहीं भेजा | जिस कारण 1307 ई में अलाउद्दीन ने मलिक काफूर के नेतृत्व में एक सेना देवगिरि पर आक्रमण करने के लिए भेजी | राजा रामचंद्रदेव युद्ध में पराजित हुआ और उसने आत्मसमर्पण कर दिया | अलाउद्दीन ने रामचंद्रदेव के प्रति सम्मानपूर्ण व्यवहार किया तथा उसे ‘ राय रायन ‘ की उपाधि दी | छह माह पश्चात् उसे एक लाख सोने का टंका और नवसारी का जिला देकर उसे उसके राज्य को वापस भेज दिया गया | 1312  ई में मलिक काफूर ने  रामचंद्रदेव के पुत्र शंकरदेव के विरुद्ध भी एक अभियान का नेतृत्व किया था।
मलिक काफूर को अलाउद्दीन ने अपने गुजरात विजय के द्वारा दौरान प्राप्त किया था | इसे ‘ हजार दीनारी ‘ भी कहा जाता था |
अलाउद्दीन पहला सुल्तान था , जिसने भूमि की पैमाइश करा कर लगान वसूल करना प्रारंभ किया | अपनी व्यवस्था को लागू करने के लिए अलाउद्दीन ने एक पृथक विभाग ‘ दीवान-ए-मुस्तखराज ‘ की स्थापना की | * अलाउद्दीन ने परंपरागत लगान अधिकारियों ( खुत्त , मुकद्दम एवं चौधरी ) से लगान वसूल करने का अधिकार छीन लिया था। उनके सारे विशेषाधिकार समाप्त कर दिए गए | उनकी भूमि पर से कर लिया जाने लगा और बाकी अन्य सभी कर भी लिए गए जिसके कारण खुत्त (जमींदार) और बलाहार ( साधारण किसान ) में कोई अंतर नही रहा |
अलाउद्दीन की राजस्व और लगान व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य एक शक्तिशाली और निरंकुश राज्य की स्थापना करना था | उसने उन सभी व्यक्तियों से भूमि छीन ली , जिन्हें वह मिल्क ( राज्य द्वारा प्रदत्त संपत्ति , ईनाम तथा पेंशन ) तथा वक्फ ( धर्मार्थ से प्राप्त हुई भूमि ) आदि के रूप में मिली थी , फलतः खालिसा भूमि अधिक पैमाने पर विकसित हुई | * अलाउद्दीन खिलजी ने उपज का 50% भूमिकर (खराज) के रूप में निश्चित किया | अलाउद्दीन खिलजी भारत का प्रथम मुस्लिम शासक था जिसने भूमि की वास्तविक आय पर राजस्व  सुनिश्चित किया |
अलाउद्दीन ने बाजार नियंत्रण या मूल्य नियंत्रण की नीति लागू की | अलाउद्दीन ने अपने बाजार नियंत्रण की सफलता के लिए कुशल कर्मचारी नियुक्त किए। उसने मलिक कबूल को शहना या बाजार का अधीक्षक नियुक्त किया |  बरनी इन बाजार सुधारों का उद्देश्य मंगोलों के विरुद्ध एक विशाल सेना तैयार करना तथा हिंदुओं में विद्रोह के विचार न पनपने देना बताता है |
सल्तनत कालीन शासक अलाउद्दीन खिलजी ने “सार्वजनिक वितरण प्रणाली” प्रारंभ की थी | अलाउद्दीन खिलजी द्वारा लगाए गए दो नवीन कर  थे । ” घरी कर” जो कि घरों एवं झोपड़ियों पर लगाया जाता था तथा “चराई कर” जो की दुधारू पशुओं पर लगाया जाता था |
1306 ई० के बाद अलाउद्दीन खिलजी के समय में दिल्ली सल्तनत एवं मंगोलो के बीच सीमा सिंधु नदी थी | सुल्तान गयासुद्दीन तुगलक के समय में सिर्फ मुगल के नेतृत्व में (1325ईसवी) मंगोल सेना ने सिंधु को अवश्य पार किया था | लेकिन समाना के सूबेदार मलिक शादी ने उन्हें हरा दिया था |
मुबारक खिलजी ने स्वयं को खलीफा घोषित किया तथा “अल-इमाम” , “उल- इमाम” , “खलाफत-उल-लह” आदि उपाधियाँ धारण की जिनका वह सर्वथा अयोग्य था  | नसिरुद्दीन खुसरवशाह (15 अप्रैल से 7 सितंबर 1320) हिंदू से परिवर्तित मुसलमान था | इसने अपने नाम का खुतबा पढ़वाया तथा “पैगंबर का सेनापति”  की उपाधि ग्रहण की |  इसके विरोधियों ने इसे “इस्लाम का शत्रु” और “इस्लाम खतरे में है” का नारा दिया|


जब उसने राजत्व प्राप्त किया, तो वह शरियत के नियमों और आदेशों से पूर्णतया स्वतंत्र था। बरनी ने यह कथन अलाउद्दीन खिलजी के लिए कहा है। अलाउद्दीन दिल्ली का पहला सुल्तान था, जिसने धर्म पर राज्य का नियंत्रण स्थापित किया। इस संदर्भ में अपनी नीति की व्याख्या करते हुए वह स्वयं कहता है कि – मैं नही जानता कि कानून की दृष्टि से क्या  उचित है और क्या अनुचित? मैं राज्य की भलाई अथवा अवसर विशेष के लिए  जो उपयुक्त समझता हूँ, उसी को करने की आज्ञा देत हूँ, अंतिम न्याय के दिन मेरा  क्या होगा, मैं नही जानता। अलाउद्दीन ने राजपद के विषय में बलबन के विचार को पुनः जीवित किया। वह राजा की सार्वभौमिकता में विश्वास रखता था, जो पृथ्वी पर ईश्वर का प्रतिनिधि मात्र है। उसने अपनी शक्ति की वृध्दि के विषय मे खलीफा की अनुमति लेना आवश्यक नही समझा। इसलिए उसने खलीफा से अपने पद की मान्यता प्राप्त करने के संबंध में कोई याचना नही की।
अलाउद्दीन खिलजी एक महत्वकांक्षी सुल्तान था। उसने सिकंदर द्वीतीय सानी की उपाधि धारण की और उसे अपने सिक्कों पर अंकित करवाया। वह संपूर्ण विश्व को जीतने की अभिलाषा रखता था। और साथ ही एक नवीन धर्म की भी, किंतु अपने वफादार मित्र एवं कोतवाल अलाउल-मुल्क की सलाह पर उसने अपना विचार त्याग दिया।
डॉ. के. एस. लाल ने लिखा है कि “धन के लालच और गौरव की लालसा ने अलाउद्दीन को भी दक्षिण के सभी राज्यों पर एक के बाद एक आक्रमण करने की प्रेरणा दी।” दक्षिण भारत के इन राज्यों पर आक्रमण करने का अलाउद्दीन का उद्देश्य धन और विजय की लालसा ही  थी,  उनकी आंतरिक नीति में हस्तक्षेप नही था। वह इन दक्षिणी राज्यों को अपने कब्जे में नही करना चाहता था।


तुगलक वंश

अलाउद्दीन के सेनापतियों में गयासुद्दीन तुगलक या गाजी मलिक तुगलक वंश का प्रथम शासक था| उसने तुगलक वंश की स्थापना की थी | उसकी माता हिंदू जाट महिला थी तथा पिता एक करौना  तुर्क था, ,जो बलबन का दास था | गयासुद्दीन तुगलक अलाउद्दीन खिलजी के शासन काल में  कई महत्वपूर्ण अभियानों का अध्यक्ष था तथा उसे दीपालपुर का राज्यपाल नियुक्त किया गया था | 29 अवसरों पर उसने मंगोलो के विरुद्ध युद्ध किया | उन्हें भारत से बाहर खदेड़ा |  इसलिए वह मलिक-उल-गाजी के नाम से प्रसिद्ध हुआ | खुसरो शाह को समाप्त करके उसने दिल्ली के सिंहासन पर अधिकार कर लिया तथा 8 सितंबर 1320 ई. को सुल्तान बना | इसका एक नाम गाजी बेग तुगलक या गाजी तुगलक भी था | इसी कारण इतिहास में उसके उत्तराधिकारियों को तुगलक पुकारा जाने लगा और उसका वंश तुगलक वंश कहलाया |
गयासुद्दीन तुगलक के समय में लगान किसानों से पहले की तरह पैदावार का 1/5 से 1/3 भाग वसूल किया जाने लगा | आवश्यकतानुसार अकाल की स्थिति में भूमि कर को माफ किया जा सकेगा |राजस्व वसूली में सरकारी कर्मचारियों को हिस्सा ना देकर मुक्त जागीरें दी गई |  गयासुद्दीन तुगलक के समय “नस्ल”  एवं “बटाई” की प्रथा प्रचलन में रही | अलाउद्दीन के समय की कठोर दंड व्यवस्था समाप्त कर दी गई  परंतु कर न देने वालों ,सरकारी धन की बेईमानी करने वालों और चोरों को कठोर दंड  दिए गए | बरनी के अनुसार तुगलक शाह के न्याय से भेड़िए को भी इस बात का साहस नहीं होता था कि वह किसी  भेड़ की ओर देखें |
दिल्ली सल्तनत के सभी सुल्तानों में मोहम्मद बिन तुगलक (1325 से 1351) सर्वाधिक विद्वान एवं शिक्षित शासक था | वह खगोल शास्त्र , गणित एवं आयुर्विज्ञान सहित अनेक विधाओं में निपुण था |
मोहम्मद बिन तुगलक ने कृषि की उन्नति के लिए एक नई विभाग “दीवान- ए –अमीर-ए- कोही” की स्थापना की | इस विभाग का मुख्य कार्य कृषकों को प्रत्यक्ष सहायता देकर अधिक भूमि कृषि कार्य के अधीन लाना था | 60 वर्ग मील की भूमि का एक लंबा टुकड़ा इस कार्य के लिए चुना गया | भूमि पर कृषि सुधार किए गए और फसल चक्र के अनुरूप हेरफेर के साथ विभिन्न फसलों की खेती की गई |
मुहम्मद तुगलक के प्रयोगों में एक सबसे महत्वपूर्ण था | राजधानी दिल्ली से दौलताबाद (देवगिरि) ले जाना | इब्नबतूता के अनुसार सुल्तान को दिल्ली के नागरिक सम्मान पूर्ण पत्र लिखते थे इसलिए उन्हें दंड देने के लिए उसने देवगिरी को राजधानी बनाने का निर्णय लिया | डॉक्टर के.ए. निजामी के अनुसार , सुल्तान कुतुबुद्दीन मुबारक खिलजी ने देवगिरि का नाम कुतबाबाद रखा तथा मुहम्मद तुगलक ने दौलताबाद | देवगिरी को कुव्वत-उल इस्लाम भी कहा गया |
·      मोहम्मद बिन तुगलक ने अपने सिक्कों पर “अल सुल्तान जिल्ली अल्लाह” (सुल्तान ईश्वर की छाया है), ईश्वर सुल्तान का समर्थक है , आदि वाक्य अंकित करवाया | मुहम्मद बिन तुगलक के द्वारा जारी स्वर्ण सिक्कों को इब्नबतूता द्वारा दी नार की संज्ञा दी गई थी | बरनी मोहम्मद तुगलक की पांच मुख्य  योजनाओं का विशेष रूप से उल्लेख करता है – .
1.    दोआब में कर की वृद्धि
2.    देवगिरी को राजधानी बनाना
3.    सांकेतिक मुद्रा जारी करना
4.    खुरासन पर आक्रमण और
5.    कराचिल की ओर अभियान |
·      इब्नबतूता (1333-1347) मोरक्को मूल का अफ्रीकी यात्री था | यह मोहम्मद बिन तुगलक के कार्यकाल  (1325-51) में भारत आया | मोहम्मद बिन तुगलक ने इसे दिल्ली का काजी नियुक्त किया था | बाद में 1342 ईसवी में उसे सुल्तान का राजदूत बनाकर चीन भेजा गया | इब्नबतूता ने किताब-उल-रेहला नामक अपनी पुस्तक में अपनी यात्रा का विवरण प्रस्तुत किया है|  सल्तनत काल में डाक व्यवस्था का विस्तृत विवरण हमें इब्नबतूता की यात्रा वृतांत द्वारा प्राप्त होता है|


दिल्ली के सुल्तानों में मोहम्मद बिन तुगलक प्रथम सुल्तान था, जो हिंदुओं के त्यौहारों, मुख्यतया होली में भाग लेता था | उसने गैर-तुर्कों  और भारतीय मुसलमानों को भी सरकारी पदों पर नियुक्त किया था |  जिसके कारण बरनी ने उसकी कटु आलोचना की और ऐसे व्यक्तियों को छिछोरा, माली, जुलाहा , नाई, रसोईया आदि कहा | 20 मार्च 1351 को मोहम्मद बिन तुगलक की मृत्यु हो गई | उसके निधन पर बदायूंनी ने लिखा है, सुल्तान को उसकी प्रजा से और प्रजा को अपने सुल्तान से मुक्ति मिल गई |  फिरोजशाह तुगलक ने सामान्य लोगों की भलाई के लिए कुछ उपकार के कार्य किए | नियुक्ति के लिए एक दफ्तर (रोजगार दफ्तर) खोलकर तथा प्रत्येक मनुष्य के गुण एवं योग्यता की पूरी जांच पड़ताल के बाद यथासंभव अधिक से अधिक लोगों को नियुक्ति देकर उसने बेकारी की समस्या को हल करने का प्रयास किया | फिरोजशाह तुगलक संतों एवं धार्मिक व्यक्तियों को जागीर एवं संपत्ति दान करता था | उसने एक विभाग “दीवान ए खैरात” स्थापित किया था जो गरीब मुसलमानों , अनाथ स्त्रियों एवं विधवाओं को आर्थिक सहायता देता था और निर्धन मुसलमान लड़कियों के विवाह की व्यवस्था करता था | राज्य के खर्च पर हज की व्यवस्था करने वाला पहला भारतीय शासक फिरोज तुगलक था | उसने दारुल-शफा नामक एक खैराती अस्पताल की स्थापना भी की और उसमें कुशल हकीम रखें | फिरोजशाह तुगलक को दासों का बहुत शौक था | उसके दासों की संख्या संभवत 180000 तक पहुंच गई थी | उनकी देखभाल के लिए एक पृथक विभाग (दीवान-ए-बंदगान)  का गठन किया गया था|
सल्तनत काल में सर्वप्रथम फिरोजशाह तुगलक ने ही लोक निर्माण विभाग की स्थापना की थी |कहा जाता है कि फिरोज ने 300 नवीन नगरों का निर्माण कराया | उसके द्वारा बसाए नगरों में फतेहाबाद , हिसार, फिरोजपुर,  जौनपुर और फिरोजाबाद प्रमुख थे | फरिश्ता के अनुसार फिरोज ने 40 मस्जिदें , 30 विद्यालय , 20 महल , 100 सराय , 200 नगर अस्पताल , 5 मकबरे, 100 सार्वजनिक स्नानगृह, 10 स्तंभ , 150 पुलों का निर्माण कराया था | अपने बंगाल अभियान के दौरान उसने इकदला का नया नाम आजादपुर तथा पंडुवा का नया नाम फिरोजाबाद रखा | उसके राज्य का मुख्य वास्तुकार  मलिक गाजी शहना था | प्रत्येक भवन की योजना को उसके व्यय अनुमान के साथ “दीवान-ए- वीजारत” के सम्मुख रखा जाता था | तभी उस पर धन स्वीकार किया जा सकता था |
फिरोज तुगलक का शासनकाल भारत में नहरों के सबसे बड़े जाल का निर्माण करने के कारण प्रसिद्ध रहा | सिंचाई की सुविधा के लिए उसने पांच बड़ी नहरों का निर्माण कराया :-
प्रथम नहर 150 मील लंबी थी जो यमुना नदी का पानी हिसार तक ले जाती थी
2.    दूसरी 96 मील लंबी थी जो सतलज से घाघरा तक जाती थी |
3.    तीसरी सिरमौर की पहाड़ियों से निकलकर हांसी तक जाती थी |
4.    चौथी घाघरा से फिरोजाबाद तक थी
5.    पांचवी यमुना नदी से फिरोजाबाद तक थी|
फिरोज तुगलक ने सिंचाई और यात्रियों की सुविधा के लिए 150 कुएं भी खुदवाए | फरिश्ता के अनुसार फिरोज ने सिंचाई की सुविधा के लिए विभिन्न स्थानों पर 50 बांधों और 30 झीलों अथवा जल को संग्रह करने के लिए तालाबों का निर्माण करवाया | फिरोज तुगलक उलेमा वर्ग की स्वीकृति के पश्चात “हक्क-ए-शर्ब” नामक सिंचाई कर लगाने वाला दिल्ली का प्रथम सुल्तान था | उन किसानों को , जो सिंचाई के लिए शाही नहरों का पानी प्रयोग में लाते थे , अपनी पैदावार का 1/10 भाग सरकार को देना पड़ता था |


फिरोज तुगलक द्वारा ब्राह्मणों पर जजिया लगाया गया था | उल्लेखनीय है कि उस समय तक ब्राह्मण इस कर से मुक्त रखे गए थे | फिरोजशाह तुगलक ने बागवानी में अपनी अभिरुचि के कारण दिल्ली के निकट 1200 नए फलों के बाग लगाए तथा अलाउद्दीन के 30 पुराने बागों को फिर से लगवाया | उसने अपने बागों में फलों की गुणवत्ता सुधारने के लिए भी उपाय किए थे |
फिरोजशाह तुगलक द्वारा अशोक के दो स्तंभों को मेरठ एवं टोपरा (अब अंबाला जिले में) से दिल्ली लाया गया| टोपरा वाले स्तंभ को महल तथा फिरोजाबाद की मस्जिद के निकट पुनः स्थापित कराया गया | मेरठ वाले स्तंभ को दिल्ली के वर्तमान बाड़ा हिंदू राव अस्पताल के निकट एक टीले कश्के – शिकार या आखेट- स्थान के पास पुनः स्थापित कराया गया |
दिल्ली के सुल्तान फिरोज तुगलक ने इस उद्देश्य से एक “अनुवाद विभाग”  की स्थापना की थी कि उससे हिंदू एवं मुस्लिम दोनों संप्रदायों के लोगों में एक दूसरे के विचारों की समझ बेहतर हो सके | उसने कुछ संस्कृत ग्रंथों का फारसी में अनुवाद भी करवाया |
नसीरुद्दीन महमूद (1394 से 1412 ईसवी ) तुगलक वंश का अंतिम शासक था | इसके शासनकाल में ख्वाजा जहाँ ने जौनपुर के स्वतंत्र राज्य की स्थापना की | पंजाब का सूबेदार खिज्र खां स्वतंत्र होकर दिल्ली को प्राप्त करने के लिए प्रयत्न करने लगा |फिरोज के एक अन्य पुत्र नुसरत शाह ने नासिरूदीन को चुनौती दी। फलस्वरूप तुगलक वंश दो भागों में विभाजित हो गया और दोनों शासकों ने एक ही साथ दिल्ली के छोटे से राज्य पर शासन किया | नासिरुद्दीन दिल्ली में रहा और नुसरत शाह फिरोजाबाद में |
नसीरुद्दीन महमूद के शासनकाल में मध्य एशिया के महान मंगोल सेनानायक तैमूर ने भारत पर आक्रमण (1398 ईसवी) में किया | यह कथन इसी शासक के लिए प्रचलित था- शाहंशाह की सल्तनत दिल्ली से पालम तक फैली हुई है | तैमूर के आक्रमण (1398 ईसवी ) ने दिल्ली सल्तनत एवं तुगलक वंश दोनों को ही नष्ट कर दिया | 1412 ईस्वी में नसीरुद्दीन महमूद की मृत्यु के साथ ही तुगलक वंश का अंत हो गया | 1413 ईसवी में सरदारों ने दौलत खां को दिल्ली का  सुल्तान चुना | परंतु उसे खिज्र खान ने पराजित कर दिया | वह तैमूर द्वारा नियुक्त लाहौर का सूबेदार था | तैमूर के आक्रमण के बाद 1414 ईसवी में उसने दिल्ली पर अधिकार कर एक नए वंश सैयद वंश की नींव डाली |


मुहम्मद बिन तुगलक के द्वारा जारी स्वर्ण के सिक्कों को इब्नबतूता द्वारा दीनार की संज्ञा दी गई थी। मुहम्मद बिन तुगलक अपनी सैन्य शक्ति में अभिवृध्दि के लिए स्वर्ण सिक्कों की टोकन मुद्रा जारी करना चाहता था। न कि पश्चिम एशियाई  देशों तथा उत्तरी अफ्रीकी देशों के साथ व्यापार करने के लिए।
दिल्ली के सुल्तानों में मुहम्मद बिन तुगलक प्रथम सुल्तान था, जो हिंदुओ के त्यौहारों, मुख्यतया होली में भाग लेता था।
रुकनुद्दीन – 1236 ई.
मुबारक खान              – 1316-1320 ई.

फिरोज  शाह तुगलक  – 1351-1388 ई.

आलमशाह               – 1445-1451 ई.

रुक्नुद्दीन 1236 ई. में इल्तुतमिश की मृत्यु के बाद  शासक बना, जबकि  इल्तुतमिश ने रजिया को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया था। मुबारक खान 1316 ई. में मुबारक खिलजी के नाम से दिल्ली का सुल्तान बना, फिरोज शाह तुगलक 1351-1388 ई. तक दिल्ली का सुल्तान रहा तथा सैयद वंशी शासक आलमशाह 1445-1451 ई. तक दिल्ली का सुल्तान रहा।



लोदी वंश

लोदी वंश की स्थापना बहलोल लोदी ने 1451 ई. में की। वह बहलोलशाह गाजी के नाम से सिंहासन पर बैठा तथा अपने नाम का खुतबा पढ़वाया। इसकी सबसे महत्वपूर्ण विजय जौनपुर की थी। बहलोल लोदी ने हिंदुओं के प्रति धार्मिक कट्टरता का व्यवहार नही किया।
·      उसके दरबार में कई प्रतिष्ठित हिंदू सरदार थे-राय करन सिंह, राय प्रताप सिंह,  राय नरसिंह, राय त्रिलोक चंद्र और राय दांदू | उसने बहलोल सिक्का चलाया जो उत्तर भारत में अकबर से पूर्व विनिमय का मुख्य साधन था। “बहलोल लोदी”ने अपनी मृत्यु के पहले ही अपने तीसरे पुत्र निजाम खां को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त कर दिया था, किंतु कुछ सरदारों ने इसका विरोध किया जिसका मुख्य कारण यह था कि निजाम खाँ की माँ जैबंद एक सुनार की पुत्री थी। कुछ शक्तिशाली सरदारों ने निजाम खां का साथ दिया और 17 जुलाई 1489 ईस्वी को निजाम खां सुल्तान सिकंदरशाह के नाम से सिंहासन पर बैठा | वह लोदी वंश का महानतम शासक था |
·      1504 ई. में सिकंदर लोदी ने राजस्थान के शासकों पर नियंत्रण के ध्येय से यमुना नदी के किनारे आगरा नामक नवीन नगर बसाया और इसे अपनी राजधानी बनाया | सिकंदर शाह अत्यधिक परिश्रमी, उदार एवं न्याय प्रिय शासक था | उसने कृषि और व्यापार की उन्नति के लिए प्रयत्न किया | नाप का पैमाना “गज- ए- सिकंदरी” उसी के समय में आरंभ किया गया | उसने निर्धनों के लिए मुफ्त भोजन की व्यवस्था की | उसने मोहर्रम में ताजिए निकालना बंद कर दिया तथा पीरों और संतों की मजारों पर मुस्लिम स्त्रियों को जाने से रोका था | उसके समय में योग्य व्यक्तियों की एक सूची बनाकर प्रत्येक 6 माह  पश्चात उसके सामने प्रस्तुत की जाती थी |
·      वह शिक्षित और विद्वान था | उसके स्वयं के आदेश से एक आयुर्वेदिक ग्रंथ का फारसी में अनुवाद किया गया जिसका नाम “फरहंगे सिकंदरी”  रखा गया | उसके समय में गायन विद्या के एक श्रेष्ठ ग्रंथ लज्जत-ए-सिकंदरशाही की रचना हुई| सिकंदर लोदी शहनाई सुनने का बहुत शौकीन था | वह ” गुलरूखी ” उपनाम से कविताएं लिखता था | सुल्तान सिकंदर ने अनाज से जकात (आयकर) समाप्त कर दिया|
·      1518 ईस्वी में महाराणा सांगा और इब्राहिम लोदी के मध्य खातोली का युद्ध हुआ | इस युद्ध में इब्राहिम लोदी पराजित हुआ था | पानीपत का प्रथम युद्ध 12 अप्रैल 1526 को बाबर और इब्राहिम लोदी के मध्य हुआ था | बाबर के योग्य सेनापतित्व, श्रेष्ठ युद्ध नीति और तोप खाने के कारण इब्राहिम की पराजय हुई और युद्ध स्थल में मारा गया |
·      फरिश्ता के अनुसार वह मृत्यु पर्यंत लड़ा और एक सैनिक की भांति मारा गया | नआमतउल्ला (नियामतउल्ला)  के अनुसार, सुल्तान इब्राहीम के अतिरिक्त भारत का अन्य कोई सुल्तान युद्ध स्थल में नहीं मारा गया |
दिल्ली सल्तनत में लोदी वंश के शासक अफगान मूल के थे। लोदी वंश की स्थापना बहलोल लोदी ने 1451 ई. में किया था। इस वंश का शासनकाल 1451-1526 ई. तक रहा। अंतिम लोदी शासक इब्राहिम लोदी था जिसको 1526 ई. में पानीपत के युध्द में पराजित करके बाबर ने मुगल वंश की स्थापना किया था।
1518 ई. में महाराणा सांगा और इब्राहिम लोदी के मध्य खातोली का युध्द हुआ। इस युध्द मे इब्राहिम लोदी पराजित हुआ था।
1206-90 ई. के मध्य दिल्ली सल्तनत के सुल्तान गुलाम वंश के सुल्तानों के नाम से विख्यात हुए। इस दौरान कुतुबुद्दीन ऐबक (1206-10 ई.) इल्तुतमिश (1210-36 ई.) तथा बलबन (1266-87 ई.) जैसे महान शासकों ने शासन किया, जबकि इब्राहिम लोदी, लोदी वंश का शासक था। इसने 1517-26 ई. तक दिल्ली पर शासन किया।


विजयनगर साम्राज्य

विजयनगर साम्राज्य की स्थापना हरिहर तथा बुक्का ने 1336 ई. में की थी | उनके पिता संगम के नाम पर उनका वंश संगम वंश कहलाया | हरिहर और बुक्का काम्पिली राज्य में मंत्री थे | मोहम्मद तुगलक ने जब काम्पिली को विजित किया तब हरिहर और बुक्का को बंदी बना लिया | इन्होंने इस्लाम धर्म स्वीकार कर लिया | बाद में उन्हें दक्षिण के विद्रोह को शांत करने के लिए भेजा गया | वे उस कार्य में सफल नहीं हुए और अंत में एक संत विद्यारण्य के प्रभाव में आकर पुनः हिंदू बन गए |
विजय नगर को संस्थापित करने के लिए हरिहर एवं बुक्का ने अपने गुरु विद्यारण्य तथा वेदों के प्रसिद्ध भाष्यकार सायण से शिक्षा ली थी | इस साम्राज्य के चार राजवंशों :-संगम वंश (1336-1485) , सालुव वंश (1485-1505), तुलुव वंश (1505-1570), अरावीडु वंश (1570-1650)ने लगभग 300 वर्षों तक शासन किया।  विजयनगर साम्राज्य की राजधानियां क्रमश: _-  अनेगोंडी , विजयनगर , वेनुगोंडा  तथा  चंद्रगिरि  थी।
1352-53 ई. में हरिहर प्रथम ने मदुरा विजय हेतु दो सेनाएं भेजी – एक कुमार सवल के नेतृत्व में तथा दूसरी कुमार कंपन के नेतृत्व में | कुमार कंपन अड्यार ने मदुरा को जीतकर उसे विजय नगर में शामिल कर लिया | उसकी पत्नी गंगा देवी ने अपने पति की विजय का अपने ग्रंथ मदुरा विजयम में सजीव वर्णन किया है |
कुमार कंपन बुक्का राय प्रथम का पुत्र था। 1377 ईस्वी में बुक्का की मृत्यु के बाद उसका पुत्र हरिहर द्वितीय (1377-1404 ई.) सिंहासन पर बैठा उसने महाराजाधिराज की उपाधि धारण की | उसने कनारा, मैसूर, त्रिचनापल्ली, कांची आदि प्रदेशों को जीता और श्रीलंका के राजा से राजस्व वसूल किया | हरिहर द्वितीय की सबसे बड़ी सफलता पश्चिम में बहमनी राज्य से बेलगांव और गोवा छीनना था। वह शिव के विरुपाक्ष रूप का उपासक था |
चंद्रगिरि के सामंत नरसिंह सालुव ने संगम वंश के अंतिम शासक विरुपाक्ष द्वितीय को पदच्युत करके 1485 ईस्वी में सिंहासन पर अधिकार कर लिया एवं एक नवीन राजवंश “सालुव वंश” की स्थापना की | वीर नरसिंह ने नरसिंह सालुव के पुत्र ( इम्माड़ि नरसिंह, सालुव वंश का अंतिम शासक) को पदच्युत करके सिंहासन पर अधिकार कर लिया एवं तुलुव वंश की नींव डाली | 1509 ईस्वी में उसकी मृत्यु के बाद उसका अनुज कृष्णदेव राय (1509-29 ईस्वी)  सिंहासनासीन हुआ | कृष्ण देव राय का उत्तराधिकारी उसका भाई अच्युत देव राय हुआ, जिसने 1529 से 1542 ईसवी तक शासन किया |
विजयनगर के राजा कृष्णदेव राय ने गोलकुंडा का युद्ध गोलकुंडा के सुल्तान कुली कुतुब शाह के साथ लड़ा था। जिसमें कुतुबशाही सेना पराजित हुई| कृष्णदेव राय का शासनकाल विजय नगर में साहित्य का क्लासिकी युग माना जाता है| उसके दरबार को तेलुगु के 8 महान विद्वान एवं कवि ( जिन्हें अष्ट दिग्गज  कहा जाता है )  सुशोभित करते थे | इसलिए इसके शासनकाल को तेलुगु साहित्य का स्वर्ण युग भी कहा जाता है |
कृष्णदेव राय ने “आंध्र भोज” की उपाधि धारण की थी | कृष्णदेव राय स्वयं एक उत्कृष्ट कवि और लेखक थे। उनकी प्रमुख रचना “अमुक्तमाल्यद“ थी जो तेलुगु भाषा के पांच महाकाव्य में से एक है | उसने नागलपुर नामक नगर की स्थापना की |उसने हजारा एवं विट्ठल स्वामी नामक मंदिर का निर्माण भी करवाया था | उसके समय में पुर्तगाली यात्री “डोमिन्गो पायस” ने विजयनगर साम्राज्य की यात्रा की |
बाबर ने अपनी आत्मकथा में कृष्ण देवराय को भारत का सबसे शक्तिशाली शासक बताया है | फारसी राजदूत अब्दुल रज्जाक संगम वंश के सबसे प्रतापी शासक देवराय द्वितीय के शासनकाल में विजयनगर आया था |
महाभारत के तेलुगु अनुवाद का कार्य 11 वीं शताब्दी में नन्नय ने प्रारंभ किया था , जिसे 13वीं शताब्दी में टिक्कन द्वारा तथा फिर 14वीं शताब्दी में येररन द्वारा पूरा किया गया | ये तीनों तेलुगु साहित्य के कवित्रय के रूप में विख्यात हैं | वैदिक ग्रंथों के भाष्यकार सायण को विजय नगर राजाओं का आश्रय मिला |
1565 में तालीकोटा के प्रसिद्ध युद्ध में बहमनी राज्यों की संयुक्त सेना ने विजयनगर को पराजित किया | इस संयुक्त सेना में केवल बरार शामिल नहीं था | फरिश्ता के अनुसार यह युद्ध तालीकोटा में लड़ा गया | किंतु युद्ध का वास्तविक क्षेत्र राक्षसी एवं तगड़ी नामक 2 ग्रामों के बीच स्थित था | तालीकोटा के युद्ध के समय विजयनगर का शासक सदाशिव राय (1542-1572 ई० ) था किंतु वास्तविक शक्ति उसके मंत्री रामराय के हाथों में थी | तालीकोटा के इसी युद्ध में हुसैन निजाम शाह ने अपने हाथ से रामराय का वध कर दिया |


अरावीडु वंश (1570-1650 ई ) की स्थापना 1570 के लगभग तिरुमल ने सदाशिव को अपदस्थ कर पेनुकोंडा में की थी| उसका उत्तराधिकारी रंग प्रथम हुआ | रंग प्रथम के बाद वेंकट द्वितीय शासक हुआ | उसने चंद्रगिरी को अपना मुख्यालय बनाया | विजय नगर के महान शासकों की श्रृंखला में यह अंतिम वंश था |
वेंकट द्वितीय राजा वोडियार का समकालीन था, जिन्होंने 1612 ईसवी में मैसूर राज्य की स्थापना की | विजयनगर राज्य में राजस्व का सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्रोत भूमि कर था | भूमि का भली-भांति सर्वेक्षण किया जाता था और उपज का 1/6 भाग भूमि कर के रूप में वसूल किया जाता था | “शिष्ट” नामक कर राज्य की आय का प्रमुख स्रोत था | केंद्रीय राजस्व विभाग को “अठावने” (अस्थवन या अथवन ) कहा जाता था |
होयसल राजवंश की राजधानी द्वारसमुद्र का वर्तमान नाम हलेबिड है जो कर्नाटक के हासन जिले में है | इसकी ख्याति इसकी स्थापत्य की विरासत के कारण है | हलेविड के वर्तमान मंदिरों में होयसलेश्वर का प्राचीन मंदिर विख्यात है | यह मंदिर 12-13 वी सदी का है |
होयसल नरेश नरसिंह प्रथम के समय लोक निर्माण विभाग के मुख्य अधिकारी केतमल्ल की देखरेख में शिल्पकार केदरोज ने इस मंदिर का निर्माण कराया था | होयसल काल में निर्मित चेन्ना केशव मंदिर बेलूर में अवस्थित है | इस मंदिर का निर्माण होयसल वंश के शासक विष्णु वर्धन ने करवाया था |
हंपी के खंडहर (वर्तमान उत्तरी कर्नाटक में अवस्थित) विजयनगर साम्राज्य की प्राचीन राजधानी का प्रतिनिधित्व करते हैं | विजय नगर काल में बना विरुपाक्ष मंदिर यहीं पर अवस्थित है | हम्पी यूनेस्को की विश्व विरासत स्थलों की सूची में भी सम्मिलित है | विठ्ठल मंदिर (हंपी) का निर्माण विजयनगर साम्राज्य के तुलुव वंश के प्रतापी राजा कृष्णदेव राय (1509-29 ई.) ने करवाया था | इस मंदिर में स्थित 56 तक्षित स्तंभ संगीतमय स्वर निकालते हैं |
हरिहर प्रथम ने कृष्णा नदी की सहायक नदी (तुंगभद्रा) के दक्षिणी तट पर एक नए नगर (विजयनगर) की स्थापना की और उस देवता के प्रतिनिधि के रुप में अपने इस नए राज्य पर शासन करने का दायित्व लिया जिसके बारे में माना जाता था कि कृष्णा नदी से दक्षिण की समस्त भूमि उस देवता (भगवान विरुपाक्ष) की है।


दिल्ली सल्तनतः प्रशासन

·      गुलाम वंश के सुल्तानों ने 1206 से 1290 ई. तक शासन किया | खिलजी वंश ने 1290 से 1320 ई. तक शासन किया | तुगलक वंश के शासकों ने 1320 से 1414 ईसवी तक शासन किया | लोदी वंश के शासकों ने 1450 से 1526 ई. तक शासन किया | इसमें तुगलक वंश का शासन सबसे  दीर्घकालिक था |
·      सल्तनत काल के अधिकांश अमीर एवं सुल्तान तुर्क वर्ग के थे | सुल्तान केंद्रीय शासन का प्रधान था | इसी तरह सल्तनत काल में प्रायः सभी प्रभावशाली पदों पर नियुक्त व्यक्तियों को अमीर की संज्ञा दी जाती थी | इन अमीरों का प्रभाव उस समय अधिक होता था जब सुल्तान अयोग्य और निर्बल अथवा अल्प वयस्क होता था |
प्रशासनिक विभाग एवं इसे प्रारंभ करने वाले शासक निम्न हैं –
दीवान-ए-मुस्तखराज (राजस्व विभाग) – अलाउद्दीन खिलजी
दीवान-ए-रियासत (बाजार नियंत्रण विभाग – अलाउद्दीन खिलजी
दीवान-ए-अमीरकोही (कृषि विभाग) – मुहम्मद बिन तुगलक
दीवान-ए-खैरात (दान विभाग) –       फिरोज तुगलक
दीवान-ए-बंदगान – फिरोज तुगलक
विभाग एवं उनकी कार्यविधियां निम्न हैं –
दीवाने अर्ज – सेना विभाग से संबंधित
दीवाने रिसालत – धार्मिक मुद्दों से संबंधित
दीवाने इन्शा – सरकारी पत्रव्यवहार से संबंधित
दीवाने वजारत – वित्तीय मामलात से संबंधित
·      विजारत एक ऐसी संस्था थी, जिसे इस्लामी संविधान में मान्यता दी गई थी | जिन गैर-अरबी संस्थाओं को अंतर्मुक्त किया गया तथा मुस्लिम सम्राटों के अधीन मंत्रिपरिषद के लिए जो नाम व्यवहार में लाए गए थे उन्हें विजारत की संज्ञा दी गई थी | विजारत को एक संस्था के रूप में अपनाने की प्रेरणा अब्बासी खलीफाओं ने फारस से ली थी |  महमूद गजनवी के राज्य काल में अब्बास फजल बिन अहमद प्रथम वजीर हुए जो शासन व्यवस्था चलाने में निपुण थे |
·      राज्य का प्रधानमंत्री वजीर कहलाता था | वजीर मुख्यतया राजस्व विभाग (दीवान-ए-वजारत) का प्रधान होता था | इस दृष्टि से वह लगान, कर व्यवस्था, दान तथा सैनिक व्यय आदि सभी की देखभाल करता था | तुगलक काल मुस्लिम भारतीय विजारत का स्वर्ण काल था | फिरोज तुगलक के समय वजीर का पद अपने चरमोत्कर्ष पर जा पहुंचा |
दशमलव प्रणाली के आधार पर सेना का संगठन और पदों का विभाजन किया गया था | घुड़सवारों की टुकड़ी का प्रधान “सरेखेल” कहलाता था | 10 “सरेखेल” के ऊपर एक “सिपहसालार”, 10 “सिपहसालारों” के ऊपर एक “अमीर”, 10 “अमीरों”  के ऊपर एक “मलिक” और 10 मालिकों के ऊपर एक “खान” होता था |
सुल्तान सेना का मुख्य सेनापति होता था | फिरोज तुगलक ने कुरान के नियमों को दृष्टि में रखकर कर निर्धारण किया | उसने कुरान में अनुमोदित चार कर लगाने की अनुमति दी :-
खराज
जजिया
खुम्स एवं
जकात
खुम्स लूट का धन था | जो युद्ध में शत्रु राज्य की जनता से लूट में प्राप्त होता था | इस लूट का 4/5 भाग सैनिकों में बांट दिया जाता था और शेष 1/5 भाग राजकोष में जमा होता था | किंतु अलाउद्दीन खिलजी और मोहम्मद तुगलक ने 4/5 भाग राजकोष में रखा और 1/5 भाग सैनिकों में बांटा |
सिकंदर लोदी ने गड़े हुए खजाने से कोई हिस्सा नहीं लिया | सल्तनत काल में शासन की सबसे छोटी इकाई ग्राम थी | जो स्वशासन तथा पैतृक अधिकारियों की व्यवस्था के अंतर्गत थी | ग्राम स्तर पर चौधरी भू राजस्व का सर्वोच्च अधिकारी था |


सल्तनत कालीन दो प्रमुख मुद्राएं है :- जीतल एवं टंका | इल्तुतमिश पहला तुर्क शासक था जिसने शुद्ध अरबी के सिक्के चलाए | उसी ने दो प्रमुख सिक्के अर्थात् चांदी का टंका और तांबे का जीतल प्रचलित किया | जीतल एवं टंका का अनुपात 48 : 1 था| अलाउद्दीन मसूद शाह (1242-46 ई.) के सिक्के पर सर्वप्रथम बगदाद के अंतिम खलीफा का नाम अंकित हुआ था | बगदाद के अंतिम खलीफा-अल-मुस्तसीम थे।|
यह 1242-58 ई. तक खलीफा रहे | इल्तुतमिश के सिक्के पर खलीफा अल मुस्तनसीर का नाम उल्लिखित था जो 1226-42 ई. तक खलीफा रहे | हदीस एक इस्लामिक कानून है जबकि जवाबित्त राज्य कानून से संबंधित है |
इतिहासकार बरनी ने दिल्ली के सुल्तानों के अधीन भारत में शासन को वास्तव में इस्लामी नही माना है, क्योकि सल्तनत काल में अधिकतर आबादी इस्लाम का अनुसरण नही करती थी।
दीवान-ए-आरिज अथवा आरिज-ए-मुमालिक सल्तनत काल में सैन्य विभाग का प्रमुख अधिकारी होता था और आरिज-ए-मुमालिक का विभाग ही दीवान-ए-अर्ज कहलाता था। इस विभाग की स्थापना बलबन ने की थी।
भारत में इक्ता व्यवस्था की शुरुआत इल्तुतमिश ने की थी। यह हस्तांतरणीय लगान अधिन्यास था। यह भूमि का एक विशेष खंड होता था, जो सैनिक या सैनिक अधिकारियों को प्रदान किया जाता था। किंतु वे इस भूभाग के मालिक नही होते थे। वे केवल लगान का ही उपभोग कर सकते थे।
सल्तनत कालीन प्रशासनिक शब्दावली में जवाबित का संबंध राज्य के कानून से है।
हदीस एक इस्लामिक कानून है। इस्लाम धर्म के मूल स्रोत कुरान के बाद दूसरा स्रोत हदीस है। दोनो को मिलाकर इस्लाम धर्मि की संपूर्ण व्याख्या और इस्लामी अरीअत की संरचना होती है।
सल्तनत काल में फवाजिल या फाजिल शब्द से आशय इक्तादारों द्वारा सरकारी खजाने में जमा की जाने वाली अतिरिक्त राशि से है।


दिल्ली सल्तनतः कला एवं स्थापत्य

·      कुतुबद्दीन ऐबक ने अजमेर में “ढाई दिन का झोपड़ा” मस्जिद तथा दिल्ली में रायपिथौरा के किले के निकट “कुव्वात–उल–इस्लाम“  मस्जिद बनवाया |  दिल्ली में कुतुबमीनार का निर्माण प्रारंभ करवाया जिसे इल्तुतमिश ने  पूरा किया।  इल्तुतमिश  ने सुल्तानगढ़ी , हौज-ए-शम्सी , शम्सी ईदगाह , बदायूं की जामा  मस्जिद अतरकीन का दरवाजा (नागौर) बनवाया था।
·      “अलाई दरवाजा” का निर्माण सुल्तान अलाउदीन खिलजी ने “कुतुबमीनार” के निकट करवाया था। इसका निर्माण लाल पत्थरों तथा संगमरमर के द्वारा हुआ। यह 1311 ई. मे  बनकर तैयार  हुआ।  अलाउदीन खिलजी ने निजामुद्दीन  औलिया की दरगाह में जमैयतखाना  मस्जिद ,  हजार सितून , हौज-ए-अलाई का निर्माण करवाया था।  सुल्तान मुबारकशाह खिलजी  ने राजपूताना मे उखा मस्जिद  का निर्माण करवाया था।
·      भारत में विशुद्ध इस्लामी शैली में निर्मित प्रथम मकबरा सुल्तान बलबन द्वारा दिल्ली में किला  रायपिथौरा के समीप बनवाया गया स्वयं का मकबरा था।
·      गयासुद्दीन तुगलक (1320-25 ई० ) ने तुगलक वंश की स्थापना के  बाद दिल्ली में एक  तृतीय नगर  की स्थापना की और उसका नाम “तुगलकाबाद”  रखा।  मोठ  मस्जिद का निर्माण सिकंदर लोदी के शासनकाल में हुआ था।  सिकंदर लोदी के मकबरे  का निर्माण सुल्तान इब्राहिम लोदी ने करवाया था।
·      मालवा विजय के उपलक्ष्य में मेवाड़ के राणा कुंभा ने कीर्ति स्तंभ का निर्माण कराया था।  कीर्ति स्तंभ का निर्माण जैता ने किया था।  जबकि  कीर्ति स्तंभ के प्रशस्तिकार अभि और महेश थे।




बलबन का मकबरा किला-ए-रायपिथौरा के दक्षिण-पूर्व में स्थित है। मकबरे का कक्ष वर्गाकार है। सर्वप्रथम इस मकबरे में मेहराब का वास्तविक रुप दिखाई पड़ता है।
स्थापत्य और उनसे संबंधित स्थल –
स्थल          स्थापत्य

दिल्ली         कुवल-अल-इस्लाम

जौनपुर        अटाला मस्जिद

मालवा        जहाज महल

गुलबर्गा        जामा मस्जिद

सही सुमेलित हैं –
वास्तु शैली                                 संबंध्द राजवंश

मेहराब की निचली सतह पर कमलकलि की झालर     खिलजी

अष्टभुजीय मकबरों का उदय                   तुगलक

स्तंभों में बोदिगोई का प्रयोग                    विजयनगर

झुकी हुई दीवारों के साथ विशाल मुख्य द्वार            शर्की



दिल्ली सल्तनतः साहित्य

·      अबुल हसन यामिनुद्दीन खुसरो जिसे प्रायः अमीर खुसरो के नाम से जाना जाता है , का जन्म 1253 ईस्वी (651 हिजरी) में उत्तर प्रदेश के वर्तमान कासगंज (कांशीराम नगर) जिले के पटियाली नामक स्थान पर हुआ था |खुसरो ने स्वयं को तूती- ए- हिंद कहा है | वह 8 वर्ष की आयु में ही कविता रचने लगा था | ऐतिहासिक विषय को लेकर उसकी पहली मनसवी किरान- उस- सादेन है | उसकी अन्य रचनाओं में मिफता-उल-फुतूह ,  तारीख-ए-दिल्ली , खजाइन-उल-फुतूह (तारीख- ए- अलाई) ,  आशिका नूह सीपिहर तथा तुगलकनामा प्रमुख हैं |
·      तुगलकनामा अमीर खुसरो की अंतिम ऐतिहासिक मसनवी है | खुसरो पहला मुसलमान था जिसने भारतीय होने का दावा किया था | अमीर खुसरो स्वयं कहता है- मैं तुर्की ,भारतीय और हिंदी बोलता हूं | भारत में कव्वाली नामक संगीत शैली के प्रारंभिक रूप के आरंभकर्ता अमीर खुसरो थे |
·      नई फारसी काव्य शैली सबक-ए- हिंदी या “हिंदुस्तानी शैली का जन्मदाता अमीर खुसरो को माना जाता है | उसका कहना था– ना तफ्जे हिंदी अस्त्र आज फारसी कम , अर्थात हिंदी का शब्द फारसी से कम नहीं है| संगीत यंत्रों “तबला” तथा “सितार” का प्रचलन 13वीं शताब्दी में अमीर खुसरो ने ही किया था | भारत में फारसी साहित्य का विकास मुस्लिम विजेताओं के आगमन से प्रारंभ हुआ | यहां इसे एक नवीन रूप प्रदान किया गया | दिल्ली सल्तनत की स्थापना के बाद फारसी को राजभाषा का स्थान प्रदान किया गया|
·      तबकात–ए-नासिरी मिनहाज -उस-सिराज  का ग्रंथ है जो सुल्तान नसीरुद्दीन को समर्पित किया गया था | जियाउद्दीन बरनी ने फारसी में तारीख ए फिरोजशाही की रचना की थी ताजुल मासिर को सदरुद्दीन मोहम्मद हसन निजामी ने लिखा था। याहिया बिन अहमद ने सैयद शासक मुबारक शाह के संरक्षण में तारीख ए मुबारक शाही लिखी जो सैयद शासकों के इतिहास को जानने का एकमात्र साधन है। शम्स –ए-सिराज अफीक ने तारीख-ए-फिरोजशाही की तथा ख्वाजा अबू मलिक इसामी ने फुतूह-उस-सलातीन की रचना की।
·      राणा कुंभा संगीत के साथ साथ साहित्य एवं कला का भी  पोषक था | उसने संगीत शास्त्र पर संगीत मीमांसा , संगीत राज , संगीत रत्नाकर आदि ग्रंथों का प्रणयन किया | तुगलक वंशीय शासक फिरोजशाह तुगलक ने अपने संस्मरण  “फुतुहात– ए– फिरोजशाही” के नाम से लिखा है |


किताब-उल-हिंद की रचना अलबरुनी ने की थी। अरब से आने वाले यात्रियों में अलबरूनी प्रमुख था, इसका वास्तविक नाम अबू रेहान था।  उसकी महत्वपूर्ण कृति तहकीके-हिंद अथवा किताब-उल-हिंद से तत्कालीन  भारतीय सामाजिक-सांस्कृतिक व्यवस्था पर विशेष विवरण प्राप्त होता है।
अमीर खुसरों एवं शेख निजामुद्दीन औलिया दोनों ने ही सात सुल्तानों का शासनकाल देखा था।
अमीर खुसरो आरंभ में बलबन के सबसे बड़े पुत्र महमूद की सेवा में रहा। मंगोलों के साथ एक मुकाबले में महमूद मारा गया। मंगोलों ने अमीर  खुसरों को बंदी बना लिया। किंतु किसी तरह वह जेल से भागने मे सफल रहा और बलबन के राजदरबार मे संबंध्द हो गया। अमीर खुसरो बलबन, कैकुबाद, जलालुद्दीन खिलजी, मुबारकशाह, गयासुद्दीन तुगलक  तथा मुहम्मद बिन तुगलक  के शासन के अंतर्गत रहा। 1325 ई. में मुहम्मद बिन तुगलक के सत्ता संभालने के वर्ष में ही  अमीर खुसरों की मृत्यु हो गई। वह सूफी  संत निजामुद्दीन औलिया का शिष्य  था।
खड़ी बोली हिंदी के प्रवर्तकों में से एक अमीर खुसरो एक कवि, इतिहासकार एवं संगीतज्ञ तीनों थे। उन्हें तूती-ए-हिन्द का उपनाम दिया गया था।






दिल्ली सल्तनतः विविध

भारत में पोलो खेल का प्रचलन तुर्कों ने किया था। ज्ञातव्य है कि कुतुबुद्दीन ऐबक पोलो (चौगान) का शौकीन था। इसी खेल के दौरान घोड़े से गिर जाने के कारण 1210 ई में उसकी मृत्यु हो गई थी।
सल्तनत काल में ऊंचे धार्मिक और न्यायिक पदों पर बैठे व्यक्तियों (उलेमा) को सामूहिक रूप से ‘ दस्तार बन्दान ‘(पगड़ी पहनने वाले) कहा जाता था क्योंकि वे सिर पर अधिकारिक रूप से पहने जाने वाली पगड़ी धारण करते थे। राजपूतों द्वारा मुस्लिम आक्रमणकारियों से स्त्रियों की रक्षा के लिए जौहर प्रथा का प्रचलन हुआ।


राजधानी में आर्थिक मामलों के देखभाल के लिए दीवान-ए-रियासत विभाग की स्थापना अलाउद्दीन खिलजी ने की थी। फिरोज तुगलक ने 5 बड़ी नहरों का निर्माण कराया था। फारसी त्यौहार नौरोज को बलबन ने दिल्ली दरबार में प्रचलित किया था। अंग्रेज सर थामस रो मुगल शासक जहांगीर के काल में भारत आया था।
चुंबकीय दिशासूचक का भारतीय महासागरों में प्रयोग की प्रारंभिक सूचना 1232-33 ई. में सदरुद्दीन मुहम्मद अल औफी द्वारा की गई। इनकी पुस्तक का नाम लुबाब-उल-अल्बाब तथा जवामी-उल-हिकायत थी। जवामी-उल-हिकायत में ही इन्होंने दिशासूचक यंत्र के बारे में संदर्भित किया था।
शासक शासनकाल
रजिया सुल्तान       1236-1240

अलाउद्दीन खिलजी   1296-1316

शेरशाह             1540-1545

अकबर             1556-1605

चांद बीबी अहमदनगर के तीसरे शासक हुसैन निजामशाह प्रथम की पुत्री थी जिनका संबंध अवध राज्य से नही, बल्कि अहमदनगर व बीजापुर से था। जबकि बहादुरशाह का संबंध गुजरात से, रजिया सुल्तान का संबंध दिल्ली से तथा बाज बहादुर का संबंध मालवा से था।
कुतुबमीनार का निर्माण 1210 ई., फिरोज तुगलक की मृत्यु सितंबर, 1388 ई. में पुर्तगालियों का भारत आगमन 1498 ई. (वास्कोडीगामा के नेतृत्व में) तथा कृष्णदेव राय का शासनकाल 1509-1529 ई. है।
हेमचन्द्र सूरी मध्यकालीन विद्वान/लेखकों में जैन धर्म का अनुयायी था। वह जयसिंह सिध्दराज के दरबार को सुशोभित करता था। उसी से प्रभावित होकर जयसिंह सिध्दराज ने आबू पर्वत पर एक मंडप का निर्माण करवाया था और उसमें जैन तीर्थंकरों की मूर्तियाँ स्थापित करवाई थी, जो अनंतर एक जैन तीर्थ के नाम से जाना जाता था।



प्लासी का युध्द – 23 जून, 1757 को बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला तथा ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच हुआ था। नवाब की सेना का नेतृत्व राजद्रोही-मीर जाफर, यार लतीफ तथा राय दुर्लभ ने किया, जिनके विश्वासघात के कारण नवाब की हार हुई।
कलिंग का युध्द – अशोक ने 261 ई.पू. में कलिंग पर आक्रमण किया। इस युध्द में एक लाख लोग मारे गए तथा पचास हजार बंदी बनाए गए। इसी युध्द के बाद अशोक ने बौध्द धर्म अपना लिया। कलिंग युध्द तथा उसके परिणामों के बारे में तरहवें शिलालेख से विस्तृत जानकारी मिलती है।
हल्दीघाटी का युध्द – 1576 ई. मे मुगल सम्राट अकबर तथा महाराणा प्रताप के बीच लड़ा गया जिसमें अकबर विजयी हुआ।
तराईन का द्वीतीय युध्द (1192 ई.) – पृथ्वीराज चौहान और मुहम्मद गोरी के बीच हुआ था, जिसमें गोरी की सजगता और श्रेष्ठ युध्द प्रणाली के कारण उसकी जीत हुई।
शेरशाह द्वारा निर्मित सड़कों में विशेष उल्लेखनीय सड़क लाहौर से लेकर सोनारगांव (बंगाल तक जाती थी जो सबसे लंबी थी तथा सड़क-ए-आजम के नाम से जानी जाती थी। प्रतीक मुद्रा मुहम्मद तुगलक ने जारी की थी। आइन-ए-अकबरी पध्दति का संबंध अकबर की भू-राजस्व व्यवस्था से हैं। चहलगानी अमीर (तुर्क-ए-चहलगानी) दल का गठन इल्तुतमिश ने किया था।
कृषि भारतीयों की जीविका का मुख्य आधार था। भारत की अधिकांश जनसंख्या कृषक ही थी। उर्वर भूमि एवं सिंचाई के साधनों की व्यवस्था के कारण यहां उपज बहुत अधिक होती थी। देश के विभिन्न क्षेत्रों में भिन्न-भिन्न फसलें बोई जाती थी। 13-14 वीं शताब्दी में भारतीय कृषक गेंहूँ, जौ, चावल, कपास और चना आदि की खेती करते थे परंतु वे मक्के की खेती नही करते थे। इब्नबतूता के अनुसार किसान साल में तीन फसलें काटते थे। धान, गेंहूं, ईख और कपास की खेती बड़े पैमाने पर होती थी। दक्षिण भारत में विभिन्न मसाले उपजाए जाते थे।
भारतीय राजनीति एसोसिएशन (Indian Political Science Association) के जनवरी-मार्च, 2004 अंक ( 65, No. 1) में विलेज एडमिनिस्ट्रेशन इन एनशिएंट इंडिया (Village Administration in Ancient India) शीर्षक के अंतर्गत प्रकाशित लेख के अनुसार, प्राचीन समय में (600 एवं 1200 AD के मध्य) भारत में प्रशासन का केन्द्र-बिंदु गांव था। वैदिक साहित्य के अनुसार गांव का मुखिया ग्रामिणी (Gramini) कहलाता था। उत्तर भारत में उसे ग्रामिका (Gramika) या ग्रामेयाका (Grameyaka) कहा जाता था। महाराष्ट्र में उसे ग्रामाकुत (Gramakuta) या पट्टकिल (Pattakila), कर्नाटक में गवुंद (Gavunda) तथा उत्तर प्रदेश में महत्तक (Mahattaka) कहा जाता था। Indian Epigraphical Glossary (लेखकः– दिनेश चन्द्र सरकार) में भी महत्तक (Mahattaka) गांव के मुखिया या पंचायत बोर्ड के सदस्य के रुप में परिभाषित किया गया है। यह उल्लेख कर देना भी समुचित है कि डॉ. हरिश्चन्द्र वर्मा ने अपनी संपादित पुस्तक मध्यकालीन भारत का इतिहास प्रथम खंड में महत्तर का इस प्रकार उल्लेख किया है – शिल्पकारों की श्रेणियों का उल्लेख अभिलेखों में भी मिलता है। इनके प्रधान महत्तर कहे जाते थे।
उत्तर  भारत एवं दक्कन के प्रांतीय राजवंश

जौनपुर की स्थापना फिरोज तुगलक ने अपने चचेरे भाई जौना खां ( मुहम्मद बिन तुगलक ) की स्मृति में की थी। सुल्तान मुहम्मद शाह द्वितीय के शासनकाल ( 1394 ई ) में जौनपुर एक स्वतंत्र राज्य बना। इसका संस्थापक मलिक सरवर था। जिसने स्वतंत्र शर्की राज्य की स्थापना की। मलिक सरवर मुहम्मद शाह द्वितीय का दास था।
सुल्तान ने उसे मलिक-उश-शर्क ( पूर्व का स्वामी ) तथा ख्वाजा-ए-जहां की उपाधि प्रदान की। शर्की शासकों ने लगभग 85 वर्षों तक जौनपुर की स्वतंत्रता को स्थापित रखा। किंतु 1479 ई में बहलोल लोदी ने इसके अंतिम शासक हुसैन शाह शर्की को पराजित कर जौनपुर को पुनः दिल्ली सल्तनत का अंग बना लिया।
इब्राहिम शाह शर्की ( 1402-1436 ई ) जौनपुर के शर्की वंश का सबसे महान शासक था | * उसके शासनकाल में एक नवीन प्रकार की शैली , जिसे ‘शर्की शैली ‘ कहते हैं , का उदय हुआ | उसने स्वयं ‘ सिराज-ए-हिंद ‘ की उपाधि धारण की | उसके समय में जौनपुर की सांस्कृतिक ख्याति चारों तरफ फैल गई और जौनपुर ‘ भारत का सिराज ‘ नाम से विख्यात हो गया | विद्यापति ने ‘  कीर्तिलता काव्य ‘  में जौनपुर और इब्राहिम शाह  का सुंदर वर्णन किया है |
1420 ई में अली शाह का भाई शाही खाँ जैन-अल-आबेदीन के नाम से कश्मीर के सिंहासन पर बैठा | वह कश्मीर का सबसे महान शासक हुआ। उसकी धार्मिक उदारता के कारण उसकी तुलना मुगल बादशाह अकबर से की जाती है | उसने जजिया कर हटा दिया तथा गोहत्या को निषिद्ध कर दिया।वूलर झील में ” जैना लंका ” नामक द्वीप का निर्माण जैन-उल-आबेदीन ने ही करवाया था।
जैन-उल-आबेदीन (1420-70 ई.) को धार्मिक सहिष्णुता तथा अच्छे कार्य के कारण ‘ कश्मीर का अकबर ‘ कहा जाता है | 1407 ई में सुल्तान मुजफ्फर शाह के नाम से जफर खान ने स्वयं को गुजरात का सुल्तान घोषित किया | * इसमें मालवा के शासक हुसंगशाह को पराजित कर उसकी राजधानी धार पर अधिकार कर लिया किंतु बाद में  उसने उसका राज्य वापस कर दिया |
1458 ई में फतह खां सिंहासन पर बैठा | उसने ‘ अबुल फतह महमूद ‘ की उपाधि धारण की परंतु इतिहास में वह महमूद बेगड़ा के नाम से विख्यात हुआ | इसकी मुख्य विजय चंपानेर और गिरनार के दृढ़ किलों की थी। दक्कन के अमीरान-ए-सादाह के विद्रोह के परिणामस्वरूप मोहम्मद बिन तुगलक के शासन काल के अंतिम दिनों में बहमनी साम्राज्य की स्थापना हुई | जफर खाँ ( हसन गंगू 1347-1358 ई ) नामक एक सरदार ‘ अलाउद्दीन हसन बहमन शाह ‘ की उपाधि धारण करके 1347 ईस्वी में सिंहासनारूढ़ हुआ  और बहमनी साम्राज्य की नींव डाली | उसने गुलबर्गा को अपने नव संस्थापित साम्राज्य की राजधानी बनाया तथा उसका नाम ‘ अहसानाबाद ‘ रखा। अपने साम्राज्य के शासन के लिए उसने इसे चारों तरफों अथवा प्रांतों में विभाजित किया –  गुलबर्गा , दौलताबाद , बरार और बीदर |
          बहमनी राज्य से स्वतंत्र हुए राज्य हैं –

राज्य

संस्थापक

राजवंश

बरार

फतेहउल्ला इमादशाह

इमादशाही वंश

बीजापुर

यूसुफ आदिलशाह

आदिलशाही वंश

अहमदनगर

मलिक अहमद

निजामशाही वंश

गोलकुंडा

कुली कुतुबशाह

कुतुबशाही वंश

बीदर

अमीर अली बरीद

बरीदशाही वंश



·      बीजापुर का शासक इब्राहिम आदिलशाह द्वितीय एक महान विद्याप्रेमी तथा विद्या का संरक्षक था। उसकी प्रजा उसके उदार दृष्टिकोण के कारण उसे ‘ जगतगुरू ‘ की उपाधि से संबोधित करती थी। गरीबों की सहायता करने के कारण उसे ‘ अबलाबाबा ‘ या ‘ निर्धनों का मित्र ‘ भी कहा जाता था। इब्राहिम आदिलशाह ने हिंदी संगीत संग्रह ‘ किताब-ए-नौरस ‘ की रचना की। इब्राहिम ने नौरसपुर नगर की स्थापना की  तथा उसे अपनी राजधानी बनाया।
·      बीजापुर के मोहम्मद आदिल शाह का मकबरा ‘ गोल गुंबद ‘ के नाम से विख्यात है। यह भारत के ऐतिहासिक भवनों में शामिल हैं तथा विश्व के विशालतम गुंबदों में से एक है। गूजरी महल राजा मानसिंह तोमर ने 15वी शताब्दी में बनवाया था। इस पर अकबरकालीन शैली की छाप पड़ी है।
सिकंदर बुतशिकन द्वारा श्रीनगर में जामा मस्जिद का निर्माण करवाया गया था। जिसके बाद जैन-उल-आबेदीन द्वारा और विस्तारित करवाया गया था। मस्जिद की विशेषताओं मे बुर्ज, फारसी शैली तथा बौध्द पगोडाओं से समानता, ये सभी शामिल हैं।
जैन विद्वान मुनि जिन विजय सूरी अकबर के दरबार से संबंधित थे। जबकि मुनि सुंदर सूरी, नाथा तथा टिल्ला भठ्ठ कुम्भा के दरबार से संबंध थे।
मध्यकालीनि भारतीय राज्यों में चंपक (चंबा) तथा कुल्लू (कुल्लू) का संबंध हिमाचल प्रदेश से है। दुर्गर जम्मू में स्थित था। चंपक, दुर्गर और कुलूत राजपूतों से संबंधित हैं, जो तत्कालीन पंजाब के भाग थे।
बीजापुर का शासक इब्राहिम आदिलशाह द्वीतीय एक महान विद्या प्रेमी तथा विद्या का संरक्षक था। उसकी प्रजा उदार दृष्टिकोण के कारण उसे जगतगुरु की उपाधि से संबोधित करती थी। गरीबों की सहायता करने के कारण उसे अबलाबाबा या निर्धनों का मित्र भी कहा जाता था।
शाहजहाँ ने छल-बल से अहमदनगर पर अधिकार किया तथा निजामशाही सुल्तान हुसैन निजाम शाह को बंदी बनाकर ग्वालियर के किले में भेज दिया। ध्यातव्य है कि 1632 ई. में शाहजहाँ ने महावत खां के नेतृत्व में दौलताबाद दुर्ग को जीतने के लिए एक सेना भेजी तथा अहमदनगर के वजीर फतेह खां को दस लाख पचास हजार रुपया घूस देकर दौलताबाद दुर्ग प्राप्त कर लिया। दौलताबाद दुर्ग का पतन अहमदनगर राज्य का पतन था। सुल्तान हुसैन को बंदी बनाकर अहमदनगर राज्य को मुगल साम्राज्य मे मिला लिया गया।
दक्षिण भारत मे हैदराबाद से सात मील पश्चिम में, बहमनी वंश की राजधानी गोलकुंडा के विस्तृत खंडहर फैले हुए हैं। यह देवगिरि के यादवों तथा वारंगल के काकतीय नरेशों के अधिकार में भी रहा था। मुगल काल में औरंगजेब ने गोलकुंडा के कुतुबशाही वंश का अंत करके उसे अपने साम्राज्य में मिला लिया। उस युग में यह हीरों के लिए प्रसिध्द था।
होयसल वंश की राजधानी द्वारसमुद्र थी, जबकि काकतीय वंश की राजधानी वारंगल तथा यादव वंश की राजधानी देवगिरी में थी। पाण्ड्य वंश की प्रारंभिक राजधानी कोरकई में अवस्थित थी जिसे बाद में मथुरा स्थानांतरित कर दिया गया।
हलेबिड (Halebidu) कर्नाटक राज्य के हासन जिले में स्थित है। इसे पूर्व में द्वारसमुद्र के नाम से जाना जाता था। यह होयसल राजवंश की राजधानी थी।



स्मारक शासक
दोहरा गुंबद              सिकंदर लोदी

अष्टभुज मकबरा          शेरशाह

सत्य मेहराबीय मकबरा बलबन

गोल गुंबद               मुहम्मद आदिल शाह

मांडू में जहाज महल एक लोकप्रिय स्मारकीय इमारत है। इस महल का निर्माण सुल्तान ग्यासुद्दीन खिलजी के शासनकाल में किया गया। मांडू में कोई जंतर महल नही है बल्कि जहाज महल है।
गूजरी महल राजा मानसिंह तोमर ने 15वीं शताब्दी में बनवाया था। स्थापत्य के क्षेत्र में यह एक अद्भुत नमूना है। इस पर अकबरकालीन शैलियों की सुंदर छाप पड़ी है। राजा मानसिंह एक महान विजेता भी था।
पोलिगार एक सामंतवादी उपाधि थी जो दक्षिण भारत के नायक शासकों द्वारा 16वीं से 18वीं शताब्दी के दौरान नियुक्त किए गए क्षेत्रीय प्रशासकीय और सैन्य नियंत्रकों के एक वर्ग को प्रदान की गई थी।


भक्ति और सूफी आंदोलन

भक्ति आंदोलन का उदय सर्वप्रथम द्रविड़ देश में हुआ तथा वहां से उसका प्रचार उत्तर में किया गया | भागवत पुराण में कहा गया है कि भक्ति द्रविड़ देश में जन्मी , कर्नाटक में विकसित हुई और कुछ काल तक महाराष्ट्र में रहने के बाद गुजरात में पहुंचकर जीर्ण हो गई |
भक्ति आंदोलन का सूत्रपात दक्षिण में 8 वीं सदी में महान दार्शनिक शंकराचार्य के उदय के साथ हुआ था जिन्होंने विशुद्ध अद्वैतवाद का प्रचार किया |भक्ति आंदोलन को दक्षिण के वैष्णव अलवार संतों और शैव नयनार संतों ने प्रसारित किया था | भक्ति आंदोलन का पुनर्जन्म 15वी-16वी सदी ई में हुआ जब इसके नेतृत्व की बागडोर कबीर , नानक , तुलसी , सूर एवं मीराबाई ने संभाली |
मध्यकालीन भारत में सूफियों के उद्भव से समाज में समरसता फैलाने में मदद मिली | यह सूफी ध्यान साधना और कठोर श्वास-नियमन , जटिल यौगिक क्रियाओं को किया करते थे | वे एकांत में कठोर यौगिक व्यायाम करते थे तथा समाज में एकता और सौहार्द्र फैलाने तथा श्रोताओं में आध्यात्मिक हर्षोन्माद उत्पन्न करने के लिए गीत और संगीत का सहारा लेते थे |
कामरूप जो असम राज्य में स्थित है , वहां पर वैष्णव धर्म को लोकप्रिय बनाने का कार्य शंकर देव ने किया था| एकेशवरवाद उनके धर्म का मूल उद्देश्य था | वे विष्णु या उनके अवतार कृष्ण को अपना अभीष्ट मानते थे | उन्होंने एकशरण संप्रदाय की स्थापना की | वे कर्मकांड व मूर्ति पूजा दोनों के विरोधी थे | वे असम के चैतन्य के रूप में प्रसिद्ध थे|
श्री वल्लभाचार्य , सोमयाजी कुल के तैलंग ब्राह्मण  श्री लक्ष्मणभट्ट  के पुत्र थे | परंपरानुसार इन्होंने रुद्र संप्रदाय के प्रवर्तक विष्णुस्वामी के मत का अनुसरण तथा विकास करके अपना शुद्धादैत मत ( शुद्ध अद्वैतवाद ) या पुष्टीमार्ग प्रतिष्ठित किया। ये   अग्नि के अवतार माने जाते हैं |
वल्लभाचार्य जी द्वारा रचित महत्वपूर्ण ग्रंथ-ब्रह्मसूत्र का ‘ अणु-भाष्य’ और ‘ वृहद-भाष्य ‘ , भागवत की ‘ सुबोधिनी’ टीका , भागवत तत्वदीप निबंध , पूर्व मीमांसा भाष्य  , गायत्री भाष्य पत्रावलंवन , दशम स्कंध अनुक्रमणिका, त्रिविध नामावली आती है |
द्वैतवाद के प्रवर्तक मध्वाचार्य हैं। विशिष्ट द्वैतवाद के रामानुजाचार्य और द्वैताद्वैतवाद के प्रवर्तक निम्बार्काचार्य है जो कि सनक संप्रदाय से संबंधित हैं। उत्तर भारत में रामानंद भक्ति आंदोलन के प्रथम प्रवर्तक थे , जिनका जन्म 1299 ईसवी में प्रयाग के कान्यकुब्ज ब्राह्मण परिवार में हुआ था | यह सगुण ईश्वर में विश्वास करते थे | उन्होंने सर्वप्रथम अपने संदेश का प्रचार हिंदी भाषा में किया | कबीर (1398-1518) रामानंद के 12 शिष्यों में से प्रमुख थे |
लोक परंपरा के अनुसार उनका जन्म किसी विधवा ब्राह्मणी के गर्भ से वाराणसी के समीप हुआ था तथा उनका पालन-पोषण एक जुलाहा दंपति नीरू और नीमा ने किया था | ‘ बीजक’  संत कबीर के उपदेशों का संकलन है जो कबीरपंथी संप्रदाय के मानने वालों का पवित्र ग्रंथ है | ‘ सबद’ , ‘साखी ‘ एवं ‘ रमैनी ‘ कबीर की रचनाएं हैं परंतु धर्मदास के साथ उनके संवादों का संकलन ‘अमरमूल ‘ शीर्षक के अंतर्गत प्राप्त होता है |
संत मलूकदास का जन्म लाला सुंदरदास खत्री के घर में 1574 ई में कड़ा ( वर्तमान कौशांबी जिले ) में हुआ था | गुरु घासीदास का जन्म दिसंबर , 1756 ई में रायपुर जिले के गिरौदपुरी गांव में हुआ था | उनके पिता महंगूदास और माता अमरौतीन बाई थी | भगवान शिव की प्रतिष्ठा में भारत के विभिन्न भागों में 12 ज्योतिर्लिंगों की स्थापना की गई है | यह है –
केदारनाथ
विश्वनाथ
वैद्यनाथ
महाकालेश्वर
ओमकारेश्वर
नागेश्वर
सोमनाथ
त्रयंबकेश्वर
घृष्णेश्वर
भीम शंकर
मल्लिकार्जुनस्वामी और
रामेश्वरम |
गुरु नानक का जन्म 1469 ई में तलवंडी नामक स्थान पर हुआ था। अब यह ‘ ननकाना साहब ‘ कहलाता है | यह पश्चिमी पंजाब ( पाकिस्तान ) के शेखपुरा जिले में स्थित है। गुरु नानक की मृत्यु 1539 ईसवी में डेराबाबा नामक स्थान पर हुई थी | गुरु नानक ( 1469-1539 ई )  ने सिख धर्म की स्थापना  सिकंदर लोदी ( 1489-1517 ई ) के समय में की थी | नानक एकेश्वरवाद में विश्वास करते थे तथा निर्गुण ब्रह्म की उपासना पर बल देते थे |
गुरु नानक का कहना है – ” ईश्वर व्यक्ति के गुणों को जानता है , पर वह उसकी जाति के बारे में नहीं पूछता क्योंकि दूसरे लोक में कोई जाति नहीं है | ” गुरु नानक ने गुरु का लंगर नाम से मुक्त सामुदायिक रसोई की शुरुआत की | उनके अनुयाई किसी की भी जाति पर ध्यान दिए बिना एक साथ भोजन करते थे |
मीराबाई मेड़ता के रतन सिंह राठौड़ की इकलौती पुत्री थी | इनका जन्म 1498 ई में मेड़ता के कुदकी नामक ग्राम में हुआ था | इनका विवाह उदयपुर के प्रसिद्ध शासक राणा सांगा के पुत्र युवराज भोजराज से हुआ था। महाराष्ट्र में भक्ति आंदोलन को लोकप्रिय बनाने में नामदेव की महत्वपूर्ण भूमिका थी। इनका जन्म 1270 ईसवी में पंढरपुर में हुआ था| इनके गुरू ज्ञानेश्वर थे। नामदेव वारकरी  संप्रदाय से संबंधित थे।
बिठोबा खेचड़ अथवा खेचर नाथ नामक एक नाथपंथी कनफटे ने इन्हें रहस्यवादी जीवन की दीक्षा दी तथा ईश्वर के सर्वव्यापी स्वरूप से परिचय कराया। नामदेव ने कहा था – ” एक पत्थर की पूजा होती है , तो दूसरे को पैरों तले रोंदा जाता है यदि एक भगवान है तो दूसरा भी भगवान है ” | इनके कुछ गीतात्मक पद्य गुरु ग्रंथ साहिब में संकलित है |
तुकाराम का काल 1608 से 1649 ई के मध्य माना जाता है | ऐसी मान्यता है कि 1608 इसवी में जन्मे संत तुकाराम 1649 ई में अदृश्य हो गए | यह वारकरी संप्रदाय से संबंधित थे।
दादू दयाल का समय 1544 ई से 1603 ई के मध्य था | त्याग राज का समय 1767 ई से 1847 ई तक था | यह भक्ति मार्गी कवि एवं कर्नाटक संगीत के महान संगीतज्ञ थे। भक्ति आंदोलन के प्रसिद्ध संत महाप्रभु चैतन्य ( 1486-1534 ई ) का जन्म बंगाल के नदिया जिले में एक संभ्रात ब्राह्मण परिवार में हुआ था | उनके पिता का नाम जगन्नाथ मिश्र तथा माता का नाम शची देवी था | चैतन्य के बचपन का नाम निमाई था | चैतन्य ने कृष्ण को अपना आराध्य बनाया तथा उन्हीं की भक्ति का प्रचार किया |
सुप्रसिद्ध भक्त/संत कवि गोस्वामी तुलसीदास अकबर तथा जहांगीर के समकालीन थे | तुलसीदास ने लगभग 25 ग्रंथ लिखे जिनमें ‘ रामचरितमानस ‘ तथा ‘ विनय पत्रिका ‘ सर्वोत्तम है | रामचरितमानस की रचना गोस्वामी तुलसीदास (1532-1623 ई)  ने अवधी भाषा में की थी |
चिश्तिया सूफी मत की स्थापना अफगानिस्तान के चिश्त में अबू इस्हाक सामी और उनके शिष्य ख्वाजा अबू अब्दाल चिश्ती ने की थी, किंतु भारत में सर्वप्रथम इसका प्रचार ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती के द्वारा हुआ था | वे 1192 ई में मोहम्मद गोरी की सेना के साथ भारत आए थे। उन्होंने अजमेर में अपना निवास स्थान बनाया| 1236 ई में उनकी मृत्यु हो गई |
कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी इनके प्रमुख शिष्य थे | निशापुर के हारोन में ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती , ख्वाजा उस्मान चिश्ती हारुनी के शिष्य बने | शेख फरीदुदीन -गंज-ए-शकर चिश्ती सिलसिले के सूफी संत थे, जो बाबा फरीद के नाम से प्रसिद्ध थे। इन्हीं के प्रयत्नों के फलस्वरूप चिश्तियां सिलसिले को भारत में लोकप्रियता मिली | इनका सबसे महत्वपूर्ण योगदान वे रचनाएं है जो गुरु ग्रंथ साहिब में संकलित है | ये बलबन के दामाद थे | 
शेख निजामुद्दीन औलिया के आध्यात्मिक गुरु हजरत बाबा फरीदुद्दीन गंज शकर ( hazarat baba fariduddin masood ganjshakar ) थे जिन्हें बाबा फरीद के नाम से भी जाना जाता है | इनका जन्म वर्तमान पाकिस्तान के मुल्तान जिले के कोठवाल गांव में हुआ था | इनके अन्य प्रमुख शिष्य अलाउद्दीन साबिर कलियारी और नसीरुद्दीन चिराग-ए-देहलवी थे | शेख निजामुद्दीन औलिया की दरगाह दिल्ली में स्थित है | 1325 ई में निजामुद्दीन औलिया की मृत्यु हुई | उन्हें गियासपुर ( दिल्ली ) में दफनाया गया था |
शेख निजामुद्दीन औलिया ने सात सुल्तानों का राज्य देखा , जो कि एक के बाद एक सत्तासीन होते रहे , किंतु वह कभी भी किसी के दरबार में नहीं गए | जब अलाउद्दीन ने उनसे मिलने की आज्ञा मांगी तो शेख ने उत्तर दिया कि ‘ मेरे मकान के 2 दरवाजे हैं यदि सुल्तान एक के द्वारा आएगा तो मैं दूसरों के द्वारा बाहर चला जाऊंगा | ‘ इस प्रकार उन्होंने अलाउद्दीन से मिलने के इनकार कर दिया था | वह महबूब-ए-इलाही और ‘ सुल्तान-उल-औलिया ‘ ( संतों का राजा ) के नाम से प्रसिद्ध थे।
चिश्ती शाखा के अंतिम सूचियों में शेख सलीम चिश्ती का नाम विशेष उल्लेखनीय है | इनके पिता का नाम शेख बहाउद्दीन था | ये बहुत दिनों तक अरब में रहे और वहां उन्हें ‘ शेख-उल-हिंद ‘ की उपाधि से विभूषित किया गया | तत्पश्चात वे भारत लौट आए और आगरा से 12 कोस की दूरी पर स्थित सीकरी नामक स्थान पर रहने लगे, जिसे अकबर ने अपना प्रसिद्ध नगर फतेहपुर सीकरी का रूप प्रदान किया | कहा जाता है कि जहांगीर का जन्म शेख सलीम चिश्ती  के आशीर्वाद से हुआ था | चिश्ती सिलसिले का प्रभाव क्षेत्र दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों में था जबकि सुहरावर्दी सिलसिले का प्रभाव क्षेत्र सिंध के क्षेत्र में था |
फिरदौसी सिलसिला चिश्ती सिलसिले का ही भाग था जिसका प्रभाव क्षेत्र बिहार में था। कादरी शाखा के सर्वप्रथम संस्थापक बगदाद के शेख मुहीउद्दीन कादिर जिलानी थे , जिनकी गणना इस्लाम के महान संतों में की जाती है। शेख अब्दुल कादिर जिलानी की प्रमुख उपाधियां थी – महबूब-ए-सुमानी ( ईश्वर का प्रेमी ) , ‘ पीरान-ए-पीर’ ( संतो के प्रधान ) , ‘ पीर-ए-दस्तगीर ‘ ( मददगार संत )। भारत में सर्वप्रथम इस शाखा का प्रचार शाह नियामतुल्ला और मखदूम जिलानी ने 15वीं सदी में किया था| मखदूम जिलानी ने उच्छ को अपना शिक्षा केंद्र बनाया था |
नक्शबंदी सिलसिले की स्थापना चौदहवी सदी में ख्वाजा बहाउद्दीन नक्शबंद ने की थी | ख्वाजा ख्वांद महमूद इस शाखा के एक प्रमुख संत थे जो भारत आए और कश्मीर को अपना केंद्र बनाया किंतु भारत में इस शाखा का मुख्यतः प्रचार 17वी सदी के लगभग ख्वाजा बकी बिल्लाह द्वारा हुआ , जो अपने गुरु की आज्ञा से काबुल से आए थे | शेख अहमद सरहिंदी इनके प्रमुख शिष्य थे जो ‘ मुजद्दिद ‘ अर्थात्  इस्लाम धर्म के सुधारक के नाम से भी प्रख्यात हैं। उन्होंने ‘ वजहत-उल-शुहूद ‘ ‘ प्रत्यक्षवादी दर्शन ‘ का प्रतिपादन किया | यह सिलसिला समा ( संगीत ) के विरुद्ध था।
सूफियों में यह सबसे अधिक कट्टरवादी सिलसिला था | इन्होंने अकबर की उदार नीतियों का विरोध किया | औरंगजेब इसी सिलसिले का अनुयाई था | सूफी संत शाह मोहम्मद गौस ने कृष्ण को औलिया के रूप में स्वीकार किया है | वह सत्तारी सिलसिले के सबसे प्रसिद्ध संत थे | मुगल बादशाह हुमायूं तथा तानसेन से उनका घनिष्ठ संबंध था | मुहम्मद गौस की प्रसिद्ध रचना ‘ जवाहिर-ए-खम्स’ है जिसमें उन्होंने अपनी अध्यात्मिक खोज को अभिव्यक्त किया है। उन्होंने हठ-योग की एक पुस्तक ‘ अमृतकुंड ‘ का अनुवाद ‘ बहर-उल-हयात’ के नाम से किया।* सूफी  संतो के निवास स्थान को ‘ खानकाह ‘ कहते हैं |  ‘ समा ‘ एक सूफी समारोह का नाम है |  ‘शेख ‘सूफीवाद में शिक्षण और मार्गदर्शन के लिए अतिरिक्त व्यक्ति को कहते हैं | इस्लाम के धार्मिक कानूनों के विद्वानों को ‘ उलेमा ‘ कहा जाता है |
‘प्रेम वाटिका ‘ काव्य ग्रंथ की रचना रसखान ने की थी| इसमें उन्होंने कृष्ण के जीवन को पंक्तिबंद्ध किया है | ‘ सुजान रसखान ‘ भी इनकी प्रसिद्ध रचना है | रसखान की भाषा विशुद्ध ब्रज भाषा है |
‘ बारहमासा ‘ की रचना मलिक मोहम्मद जायसी ने की थी | जायसी की ‘ पद्मावत ‘ ‘ अखरावट ‘ तथा ‘ आखिरी कलाम ‘ में से  पद्मावत का हिंदी साहित्य में महत्वपूर्ण स्थान है |  ‘ बारहमासा ‘ पद्मावत का ही एक भाग है |
उत्तर प्रदेश के बाराबंकी से लगभग 12 किलोमीटर दूर स्थित देवा शरीफ के प्रसिद्ध सूफी संत हाजी वारिस अली शाह की मजार स्थित है | ईसा मसीह (जीसस क्राइस्ट) का जन्म 4 ईसा पूर्व में यहूदी प्रांत बेथलेहम नामक नगर में हुआ था।| ईसाई मान्यता के अनुसार , ईसा मसीह सूली पर चढ़ाए जाने के तीसरे दिन पुनर्जीवित हुए थे, इसी की याद में ईस्टर त्योहार मनाया जाता है | ‘ गुड फ्राइडे ‘ ईसा मसीह की शहीदी दिवस के रूप में मनाया जाता है | बाइबिल के अनुसार , ईसा मसीह को शुक्रवार के दिन ही फांसी दी गई थी |असीसी के संत फ्रांसिस ( 1181-1226 ई ) ऐसे ईसाई संत है जो पशु पक्षियों से प्रेम के लिए विख्यात हैं |
वेटिकन इटली में स्थित स्थलरुद्ध संप्रभु देश हैं जिसका कुल क्षेत्रफल मात्र 44 हेक्टेयर है, जो विश्व का सबसे छोटा ( जनसंख्या और क्षेत्रफल दोनों में ) स्वतंत्र देश है | यह रोम के पादरी ( bishop of rome ) जिन्हें पोप भी कहा जाता है के द्वारा शासित है | इसे रोमन कैथोलिक चर्च की राजधानी के रूप में भी जाना जाता है | मदीना पश्चिमी सऊदी अरब के हेजाज क्षेत्र में स्थित शहर है | यह मक्का के बाद इस्लाम धर्म का दूसरा पवित्रतम शहर है |
बुध्द और मीराबाई के जीवन दर्शन में मुख्य साम्य यह था कि दोनों ने संसार को दुःखपूर्ण माना। दुःख बौध्द धर्म के चार आर्य सत्यों मे प्रथम है।
भक्ति आंदोलन के संतों का आचार बहुत ऊंचा था। उसमें से बहुतों ने देश का भ्रमण किया और वे कई प्रकार के लोगों से मिले जिनके विचार विभिन्न थे। उन संतो ने साधारण लोगो की भाषाओं को उन्नत करने में अपना योगदान दिया। उन्होने हिंदी, पंजाबी, बंगला, तेलुगू, कन्नड़, तमिल इत्यादि भाषाओं की उन्नति में बहुत योगदान दिया। भक्ति आंदोलन के संत अपने उपदेश क्षेत्रीय एवं स्थानीय भाषाओं में देते थे ताकि वहां के लोग उनके उपदेश आसानी से सुन और समझ सकें। इस कारण क्षेत्रीय भाषाओ का विकास हुआ।
कामरुप जो असम राज्य में स्थित है, वहां पर वैष्णव धर्म को लोकप्रिय बनाने का कार्य शंकरदेव ने किया था। एखेश्वरवाद उनके धर्म का मूल उद्देश्य था। वे विष्णु या उनके अवतार कृष्ण को अपना अभीष्ट मानते थे।
असम एवं कूच बिहार में वैष्णव धर्म का प्रवर्तन शंकरदेव ने किया था।
मध्यकालीन संत शंकरदेव वैष्णव संप्रदाय से संबंधित थे।
वैष्णव आचार्य रामानुज भक्ति आंदोलन के प्राचीनतम प्रचारक थे, इन्होने सगुण ईश्वर की उपासना पर बल दिया। उनके मत को विशिष्टाद्वैत कहा जाता है। जिसका अर्थ है – ब्रह्म अर्थात ईश्वर अद्वैत होते हुए भी जीव तथा जगत की शक्तियों द्वारा विशिष्ट है।
भक्तिकालीन सगुणधारा की कृष्ण भक्ति शाखा के आधार स्तंभ एवं पुष्टिमार्ग के प्रणेता श्री वल्लभाचार्य का जन्म विक्रम संवत् 1535, वैशाख कृष्ण एकादशी को दक्षिण भारत के कांकरवाड ग्रामवासी तैलंग ब्राह्मण श्री लक्ष्मण भठ्ठ जी की पत्नी इलम्मागारू के गर्भ से वर्तमान छत्तीसगढ़ राज्य के रायपुर के निकट  चम्पारण मे हुआ। उन्हें वैश्वानरावतार (अग्नि का अवतार) कहा गया है।
कबीरपंथी संप्रदाय के अनुयायियों का मुख्य धार्मिक ग्रंथ सुप्रसिध्द बीजक है जो कि कबीर के दोहों का संकलन है।
सबद, साखी एवं रमैनी कबीर की रचनाएँ हैं परंतु धरमदास के साथ उनके संवादों का संकलन अमरमूल शीर्षक के अंतर्गत प्राप्त होता है।
संत मूलकदास का जन्म लाला सुंदरदास खत्री के घर में 1574 ई. में कड़ा (वर्तमान कौशांबी जिला) में हुआ था।



शंकराचार्य का काल 788-820 ई. तक, रामानुज काल 1017-1137 ई. तथा चैतन्य का काल 1486-1534 ई. तक था।
भक्ति आंदोलन के प्रचारक प्रसिध्द वैष्णव आचार्य रामानुज ने सगुण ईश्वर की उपासना पर बल दिया। उनका मत विशिष्टाद्वैत कहा जाता है। उनके अनुयायी वैष्णव कहलाए।
व्यक्ति कालानुक्रम
कबीर              1398-1518

गुरुनानक           1469-1539

चैतन्य             1486-1534

मीराबाई            1498-1557

मीराबाई हिंदू आध्यात्मिक कवयित्री थी, जिनके भगवान श्रीकृष्ण के प्रति समर्पित भजन उत्तर मानव में लोकप्रिय हैं। इन्होने चार ग्रंथों की रचना की थी। ये ग्रंथ हैं – बरसी का मायरा, गीत गोविंद टीका, राग-गोविंद और राग सोरठ। इसके अतिरिक्त उनके गीतों का संकलन मीराबाई की पदावली नामक ग्रंथ में किया गया है।
सही सुमेलित हैं –
नामदेव   –    दर्जी

कबीर     –    जुलाहा

रविदास   –    मोची

सेना      –    नाई

चैतन्य के बचपन का नाम निमाई था। चैतन्य ने कृष्ण को अपना आराध्य बनाया तथा उन्हीं की भक्ति का प्रचार किया। बहुत दिनों तक उन्होंने वृंदावन में भी निवास किया। नदिया आकर उन्होने कीर्तन-जुलूसों का आयोजन किया तथा वे गलियों में घूम-घूम कर कृष्ण लीलाओं का कीर्तन किया करते थे।
रामचरित मानस की रचना गोस्वामी तुलसीदास (1532-1623) ने अवधी भाषा में की थी।
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित 12 ग्रंथ प्रसिध्द हैं जिसमें 5 बड़े तथा 7 छोटे ग्रंथ हैं। बड़े ग्रंथों में दोहावली, गीतावली, कवितावली, रामचरित मानस, विनय पत्रिका हैं। इसके अलावा पार्वती मंगल, जानकी मंगल, बरवै रामायण, वैराग्य संदीपनी, कृष्णगीतावली आदि छोटे ग्रंथ हैं। साहित्य रत्न गोस्वामी तुलसी की रचना नही है।
वरकरी संप्रदाय के रुप में विचारधारा की गौरवशाली परंपरा की स्थापना में नामदेव की मुख्य भूमिका रही। बिसोवा खेचड़ ने उन्हें रहस्यवादी जीवन की दीक्षा दी तथा ईश्वर के सर्वव्यापी स्वरुप से परिचित करवाया।



तुकाराम, त्यागराज एवं वल्लभाचार्य मध्यकालीन भक्ति आंदोलन से संबंधित हैं, जबकि नागार्जुन ईसा की प्रारंभिक शताब्दियों में शून्यवाद के संस्थापक थे।
ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती का जन्म अफगानिस्तान के दक्षिणी प्रांत साजिस्तान (सिस्तान) में 1142 ई. में हुआ था। बाद में अपने माता-पिता के साथ वे खुरासान प्रांत मे बस गए। निशापुर के हारेन मे ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती, ख्वाजा उस्मान चिश्ती हरुनी के शिष्य बने।
अजमेर में ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर नजर (भेंट) भेजने वाले प्रथम मराठा सरदार राजा साहू, शिवाजी के पौत्र थे।
चिश्ती संप्रदाय की स्थापना अबू इस्हाक सामी चिश्ती ने की थी, वे अली की नवीं पीढ़ी थे। वे एशिया माइनर से प्रवासित होकर खुरासान में स्थित चिश्त में जाकर बस गए थे, इसीलिए वे चिश्ती कहलाए। परंतु भारतवर्ष में चिश्ती विचारधारा का प्रचार सर्वप्रथम ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती ने किया था।
शेख अब्दुल जिलानी का संबंध कादरिया सिलसिले से था। जबकि ख्वाजा कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी, शेख मुइनुद्दीन व शेख निजामुद्दीन औलिया का संबंध चिश्तिया शाखा से था। भारत में सर्वप्रथम चिश्ती सिलसिले का प्रचार ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती के द्वारा हुआ।
अमीर हसन-ए-देहलवी को उसकी उच्च गजलों के कारण उसे भारत का सादी कहा गया है।
शेख फरीद के शिष्य शेख निजामुद्दीन औलिया ने दिल्ली के सात सुल्तानों का शासन देखा। शेख निजामुद्दीन औलिया को महबूब-ए-इलाही (ईश्वर का प्रिय) और सुल्तान-उल-औलिया (संतो का राजा) भी कहा जाता है।
सही सुमेलित हैं –
ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती        चिश्तियां

शेख अहमद सरहिन्दी      नक्शबंदिया

दारा शिकोह              कादिरिया

शेख शहाबुद्दीन          सुहरावर्दिया





प्रेमवाटिका काव्यग्रंथ की रचना रसखान ने की थी। इसमें इन्होने कृष्ण के जीवन को पंक्तिबध्द किया है। सुजान रसखान भी इनकी प्रसिध्द रचना है। रसखान की भाषा विशुध्द ब्रजभाषा है।
अमीर खुसरों का पूरा नाम अबुल हसन यामिनुद्दीन खुसरो था। अमीर खुसरो अपने समय का एक महान विद्वान और कवि था। वह भक्ति आंदोलन से संबंधित नही था। चैतन्य महाप्रभु ने मध्य गौड़ीय संप्रदाय की स्थापना की। वल्लभाचार्य वैष्णव धर्म की कृष्णमार्गी शाखा के दूसरे महान संत थे। गुरुनानक का जन्म पंजाब मे एक खत्री परिवार में हुआ था। उन्होने निराकार  ईश्वर की कल्पना की और इस निराकार ईश्वर को उन्होने अकाल पुरुष की संज्ञा दी।
बारहमासा की रचना मलिक मोहम्मद जायसी ने की। जायसी की पद्मावत, अखरावट तथा आखिरी कलाम में से पद्मावत का हिंदी साहित्य में महत्वपूर्ण स्थान है। बारहमासा, पद्मावत का ही एक भाग है।
उत्तर प्रदेश में बाराबंकी से लगभग 12 किमी दूर स्थित देवा शरीफ में प्रसिध्द सूफी संत हाजी वारिस अली शाह की मजार स्थित है।
ईसा मसीह (जीसस क्राइस्ट) का जन्म 4 ई.पू. में यहूदिया प्रांत के बेथलेहम नामक नगर में हुआ था।
ईसाई मान्यता के अनुसार, ईसा मसीह सूली पर चढ़ाए जाने के तीसरे दिन पुनर्जीवित हुए थे, इसी की याद में ईस्टर त्यौहार मनाया जाता है।
असीसी के संत (फ्रांसिस (1181-1226 ई.) ऐसे ईसाई संत हैं, जो पशु-पक्षियों से प्रेम के लिए विख्यात हैं।
गुडफ्राइडे ईसा मसीह के शहीदी दिवस के रुप में ईसाइयों द्वारा मनाया जाता है। बाइबिल के अनुसार ईसा मसीह को शुक्रवार के दिन ही फांसी दी गई थी।
मुगल वंशः बाबर

मुगल शासक वास्तव में तुर्कों की चगताई नामक शाखा के थे। इस शाखा का नाम प्रसिद्ध मंगोल नेता चंगेज खां के द्वितीय पुत्र के नाम पर पड़ा था , जिसके अधिकार में मध्य एशिया तथा तुर्कों का देश तुर्किस्तान थे।
बाबर का पूरा नाम जहीरूदीन मोहम्मद बाबर था , इसका जन्म 14 फरवरी , 1483 ई को फरगना में उमर शेख मिर्जा एवं कुतलुग निगारखानम के घर हुआ था। पिता की मृत्यु के बाद लगभग बारह वर्ष की अल्पायु में 1495 ई में वह फरगना के सिंहासन पर बैठा |
शैबानी खाँ ने 1501 ई में सर-ए-पुल के युद्ध में बाबर को पराजित कर मध्य एशिया से खदेड़ दिया। इस युद्ध में उजबेगों की युद्ध नीति ‘ तुलगमा ‘ पद्धति का प्रयोग शैबानी खाँ ने बाबर के विरुद्ध किया था। 1504 ई में काबुल विजय के उपरांत बाबर ने अपने पूर्वजों द्वारा धारण की गई उपाधि ‘ मिर्जा ‘ का त्याग कर नई उपाधि ‘ पादशाह ‘ धारण की। *
आलम खां , इब्राहिम लोदी का चाचा था। उसने दिल्ली के राजसिंहासन पर अपना अधिकार जताते हुए बाबर को भारत पर आक्रमण के लिए आमंत्रित किया। 1524 ई में बाबर के चौथी बार भारत अभियान के दौरान दिल्ली के सुल्तान इब्राहिम लोदी तथा पंजाब के गर्वनर दौलत खां के मध्य कटु संबंध हो गए थे। सुल्तान इब्राहिम लोदी ने दौलत खां को राजधानी आने का आदेश दिया था, जिसका दौलत खाँ ने उल्लंघन किया था। दौलत खाँ ने अपने पुत्र दिलावर खां को बाबर के पास इस संदेश के साथ भेजा कि वह सुल्तान इब्राहिम लोदी को दिल्ली के सिंहासन से अपदस्थ कर उसके स्थान पर उसके चाचा आलम खां को पदस्थ करने में सहायता करें। बाबर के लिए यह स्वर्णिम अवसर था क्योंकि उसे मेवाड़ के राजा राणा संगा का भी निमंत्रण प्राप्त हो चुका था। अतः बाबर को यह विश्वास हो गया कि भारत-विजय का अवसर आ गया है।
पानीपत का प्रथम युद्ध 21 अप्रैल , 1526 को बाबर तथा इब्राहिम लोदी के बीच हुआ। बाबर के पास विशिष्ट सुविधाएं थी। उसके तोपखाने ने इस युद्ध में आश्चर्यजनक कार्य किया। इब्राहिम लोदी की सेना संख्या में अधिक होते हुए भी पराजित हुई और वह रण क्षेत्र में मारा गया। फलस्वरूप दिल्ली और आगरा पर बाबर का अधिकार हो गया।
27 अप्रैल , 1526 को बाबर ने अपने आपको बादशाह घोषित कर भारत में मुगल साम्राज्य की नींव डाली। बाबर ने तुलगमा युद्ध नीति का प्रयोग पानीपत के प्रथम युद्ध में ही किया था। इस युद्ध में बाबर की सफलता का सबसे मुख्य कारण उसका विशाल तोपखाना था। जिसका नेतृत्व उस्ताद अली कुली नामक व्यक्ति कर रहा था। बंदूकचियों का नेतृत्व मुस्तफा कर रहा था।
बाबर की उदारता के कारण लोगों ने उसे ‘ कलंदर ‘ की उपाधि प्रदान की। भारत में सर्वप्रथम पानीपत की पहली लड़ाई में तोपों का प्रयोग किया। बाबर ने खानवा के युद्ध में जेहाद की घोषणा की थी। खानवा का युद्ध 17 मार्च , 1527 को बाबर और राणा सांगा के बीच हुआ था। इस युद्ध में राणा सांगा पराजित हुआ | इसी युद्ध में विजयश्री मिलने के उपरांत बाबर ने ‘ गाजी ‘ ( काफिरों को मारने वाला ) की उपाधि धारण की।
1528 ई में बाबर ने चंदेरी के किले पर अधिकार कर लिया। युद्ध में मेदनीराय मारा गया। घाघरा का युद्ध 5 मई , 1529 को बाबर और महमूद लोदी के मध्य हुआ। इस युद्ध में बाबर विजयी हुआ। बाबर का यह अंतिम युद्ध था। बाबर के साम्राज्य में काबुल , पंजाब एवं आधुनिक उत्तर प्रदेश का क्षेत्र सम्मिलित था | अपने इस विशाल साम्राज्य की शासन व्यवस्था को सही ढंग से चलाने के लिए बाबर ने एक प्रदेश से दूसरे प्रदेश में अलग अलग व्यवस्था की थी |
भारत से बाहर बदख्शां का शासन हुमायूं , मीर फख्र अली , हिंदाल तथा मिर्जा सुलेमान को प्रदान किया गया | मीर युसूफ अली को पंजाब का गवर्नर नियुक्त किया गया जिसके नियंत्रण में – भीरा , लाहौर , दीपालपुर , सियालकोट , सरहिंद तथा हिसार-फिरोजा सम्मिलित थे | हिसार-फिरोजा से लेकर बलिया तक के प्रदेश तथा बयाना , चंदेरी एवं ग्वालियर तक के प्रदेशों में बाबर ने एक नवीन शासन व्यवस्था कार्यान्वित की | इस प्रकार बाबर का साम्राज्य बदख्शां से बिहार तक फैला किंतु आधुनिक राजस्थान का क्षेत्र उसके साम्राज्य में सम्मिलित नहीं था | यह क्षेत्र उस समय विभिन्न राजपूत शासकों के शासनांतर्गत था।
मुगल साम्राज्य की आधारशिला रखने वाले जहीरुद्दीन मोहम्मद बाबर ने अपने जीवन संबंधी घटनाओं को एक ग्रंथ में स्वयं ही लिखा। इसे ‘ तुजुक-ए-बाबरी ‘ या ‘ बाबारनामा ‘ कहते हैं | बाबर ने अपनी आत्मकथा में जिन दो हिंदू राज्यों का उल्लेख किया है उनमें एक विजय नगर है तथा दूसरा मेवाड़।
तुर्की भाषा में बाबर द्वारा लिखित यह ग्रंथ संसार की श्रेष्ठतम आत्मकथाओं में स्थान रखता है | अकबर ने अब्दुल रहीम खानखाना द्वारा बाबरनामा का फारसी में रूपांतरण करवाया | इसके अतिरिक्त बाबर द्वारा पद्य रचनाओं का संकलन ‘ दीवान ‘ में किया गया जो तुर्की पद्य में श्रेष्ठ स्थान रखता है | पद्य में उसने एक नवीन शैली में ‘ मुबइयान ‘ लिखा जो मुस्लिम कानून की पुस्तक है | बाबर की एक रचना ‘ रिसाल-ए-उसज ‘ ( खत-ए-बाबरी ) थी जिसकी शैली नवीन मानी गई थी | मुगल बादशाह बाबर के सेनानायक मीर बाकी ने अयोध्या में बाबरी मस्जिद का निर्माण कराया था |


बाबर ने खानवा के युध्द में जेहाद की घोषणा की थी। खानवा का युध्द 17 मार्च, 1527 को बाबर और राणा सांगा के बीच हुआ था। इस युध्द में राणा सांगा पराजित हुआ। इसी युध्द में विजयश्री मिलने के उपरांत बाबर ने गाजी की उपाधि धारण की।
बाबर के साम्राज्य में काबुल, पंजाब एवं आधुनिक उत्तर प्रदेश का क्षेत्र सम्मिलित था। किंतु आधुनिक राजस्थान का क्षेत्र उसके साम्राज्य में सम्मिलित नही था। यह क्षेत्र उस समय विभिन्न राजपूत शासकों के शासनांतर्गत था।
जहीरुद्दीन मोहम्मद बाबर के जीवन से धैर्य व संकल्प से सफलता की शिक्षा मिलती है। बाल्यावस्था मे ही पिता का साया छिन जाने के बावजूद बाबर ने कभी हिम्मत नही हारी। उसके साहस एवं धैर्य का ही प्रतिफल था, कि उसने भारत मे मुगल साम्राज्य की नींव डाली। उसने अपने पुत्र हुमांयू को सलाह  दी थी कि “संसार उसका है जो परिश्रम करता है। किसी भी आपत्ति का मुकाबला करने से मत चूकना। परिश्रमहीनता और आराम बादशाह के लिए  हानिकारक है।
बाबर ने अपनी आत्मकथा में जिन दो हिंदू राज्यों का उल्लेख किया है – उनमें से एक विजयनगर है तथा दूसरा मेवाड़। बाबर लिखता है कि – “जब हम लोग काबुल में ही थे तो राणा सांगा (मेवाड़ का शासक) ने उपस्थित होकर उसकी ओर से निष्ठा प्रदर्शित की थी और यह निश्चय किय था कि सम्मानित बादशाह इस ओर स देहली के समीप पहुंच जाए तो मैं  (राणा सांगा) इस ओर से आगरा पर आक्रमण कर दूंगा। तुर्की भाषा में बाबर द्वारा लिखित  यह ग्रंथ संसार की श्रेष्ठतम आत्मकथाओं मे स्थान रखता है।
ऐसी मान्यता है कि मुगल बादशाह बाबर के सेनानायक मीर बाकी ने अयोध्या में बाबरी मस्जिद का निर्माण कराया था।






हुमायूँ और शेरशाह

कामरान , अस्करी एवं हिंदाल बाबर के पुत्र तथा हुमायु के भाई थे | हुमायूं बाबर का जेष्ठ पुत्र था | हुमायूं 1508 ई में काबुल में पैदा हुआ था | उसकी मां माहम बेगम शिया संप्रदाय से संबंधित थी। कामरान और अस्करी की मां गुलरूख बेगम तथा  हिंदाल की मां दिलदार बेगम थी |
हुमायूं ने चुनार दुर्ग पर प्रथम बार आक्रमण 1532 ई में किया। इस किले को उसने 4 महीने तक घेरे रखा जिसके बाद शेर खां ने हुमायूं  की अधीनता स्वीकार कर ली | इसके अतिरिक्त 1531 ई में उसने कालिंजर पर आक्रमण किया और 1532 ई  में रायसीन के महत्वपूर्ण किले को जीत लिया |
हुमायूं द्वारा लड़े गए चार प्रमुख युद्धों का काम इस प्रकार है – देवरा , चौसा ,कन्नौज एवं सरहिंद | 1532 ईस्वी में उसने गोमती के तट पर स्थित देवरा नामक स्थान पर अफगान  विद्रोहियों को पराजित किया | 26 जून , 1539 को चौसा के युद्ध में हुमायूं को शेरशाह से पराजित होना पड़ा | इसी युद्ध में निजाम नामक भिश्ती ने हुमायूं की जान बचाई। हुमायु के विरुद्ध चौसा की इस विजय से शेर खां ( शेरशाह )  की शक्ति और प्रतिष्ठा दोनों में वृद्धि हुई। उसने ‘ शेरशाह ‘ की पदवी धारण कर अपने नाम का खुतबा पढ़ाया तथा सिक्के पर भी अंकित करवाया | 17 मई 1540 को कन्नौज या बिलग्राम के युद्ध में भी हिमायूं को शेरशाह से पराजित होना पड़ा और विवश होकर एक निर्वासित की भांति इधर-उधर भटकना पड़ा | 22 जून 1555 को सिरहिंद  युद्ध की विजय ने हुमायूं को एक बार पुनः उसका खोया राज्य वापस दिला दिया|
फरीद जो बाद में शेर शाह सूरी बना, ने अपनी शिक्षा जौनपुर से प्राप्त की थी | 1494 ई में फरीद ने घर छोड़ दिया तथा विद्याध्ययन के लिए जौनपुर चला गया जो ‘ पूर्व के सिराज ‘ नाम से प्रसिद्ध था |
शेरशाह सूरी द्वारा किए गए सुधारों में राजस्व सुधार , प्रशासनिक सुधार , सैनिक सुधार , करेंसी प्रणाली में सुधार सम्मिलित थे। शेरशाह ने बंगाल को सरकारों ( जिलों ) में बांट दिया इनमें से प्रत्येक को एक छोटी सी सेना के साथ शिकदारों के नियंत्रण में दे दिया गया |  ‘ आमीन- ए-बांग्ला ‘ अथवा ‘ अमीर-ए-बंगाल ‘ नामक असैनिक अधिकारी को शिकदारों की देखभाल के लिए नियुक्त किया गया |सर्वप्रथम काजी फजीलात नामक व्यक्ति को इस पद पर नियुक्त किया गया |
शेरशाह ने पुराने घिसे-पिटे सिक्कों के स्थान पर शुद्ध सोने , चांदी , तांबे के सिक्कों का प्रचलन किया| उसने शुद्ध चांदी का रुपया ( 180 ग्रेन ) तथा तांबे का दाम ( 380 ग्रेन ) चलाया |  रुपया और दाम की विनिमय में 1:64 थी। इसके समय में 23 टकसाले थी |
दिल्ली सल्तनत के पराभव के उपरांत हुमायूं द्वारा सर्वप्रथम स्वर्ण मुद्रा का प्रचलन किया गया था | हाजी बेगम ने अपने पति हुमायु के मकबरे का निर्माण दिल्ली( दीन पनाह ) में 1564 ईसवी में करवाया था | इस मकबरे का नक्शा मीरक मिर्ज़ा गियास ( इरानी वास्तुकार )  ने तैयार किया था | श्वेत संगमरमर से बना यह भारत का प्रथम गुंबद वाला मकबरा है |
कालिंजर विजय ( 1545 ई ) के दौरान जब शेरशाह के सैनिक हुक्के (गोले) फेंकने में व्यस्त थे, तो बारूद से भरा हुआ गोला दुर्ग की दीवार से टकराकर गिरा जहां बारूद से भरे हुए बहुत से गोले रखे हुए थे जिससे गोलों में आग लग गई और वे फट-फट कर सभी दिशाओं में विध्वंस करने लगे | शेरशाह वहा  से अधजला बाहर निकला | यद्यपि दुर्ग जीत लिया गया किंतु यही जीत शेरशाह के लिए अंतिम हो गई |
22 मई 1545 ईसवी को 60 वर्ष की आयु में वह ( कालिंजर में ही ) मर गया। कालिंजर का अभियान शेरशाह का अंतिम अभियान था | उस समय वहां का राजा कीरत सिंह था। शेरशाह सूरी मारवाड़ के युद्ध में राजपूतों के शौर्य से प्रभावित होकर कहा कि ” मात्र एक मुट्ठी बाजरे के चक्कर में मैंने अपना साम्राज्य खो दिया होता ” | शेरशाह का मकबरा , बिहार के शाहाबाद के सासाराम नामक स्थान पर एक तालाब के बीच ऊंचे चबूतरे पर बना है। दिल्ली स्थित पुराना किला के भवनों का निर्माण शेरशाह ने करवाया था। यहां किला-ए-कुहना मस्जिद , शेर मंडल आदि भवन शेरशाह द्वारा बनवाए गए थे।
कृषकों की मदद के लिए शेरशाह ने ‘ पट्टा ‘ एवं ‘ कबूलियत ‘ की व्यवस्था प्रारंभ की थी। किसानों को सरकार की ओर से ‘ पट्टे ‘ दिए जाते थे , जिनमें स्पष्ट किया गया होता था कि उस वर्ष उन्हें कितना लगान देना है | किसान ‘ कबूलियत पत्र ‘ के द्वारा इन्हें स्वीकार करते थे।


हुमायूं द्वारा लड़े गए चार प्रमुख युध्दों का क्रम इस प्रकार है – देवरा (1532 ई.), चौसा (1539 ई.), कन्नौज (1540 ई.) एवं सरहिंद (1555 ई.)
शेरशाह सूरी ने जौनपुर में औपचारिक शिक्षा प्राप्त किया था, जो उस समय उच्च शिक्षा का महत्वपूर्ण केन्द्र था।
1529 ई. मे बंगाल के शासक नुसरत शाह को पराजित करके शेर खां (शेरशाह सूरी) ने हजरते आला की उपाधि धारण की। 1539 ई. में चौसा के युध्द में हुमायूं को पराजित करके उसने शेरशाह की उपाधि धारण की तथा अपने नाम का खुतबा पढ़वाया और सिक्का चलवाया।
शेरशाह सूरी का मध्ययुगीन भारत में एक महत्वपूर्ण स्थान है। साम्राज्य निर्माता एवं प्रशासक के रुप में उसे अकबर का पूर्वगामी माना जाता है।
राजस्व सुधार – शेरशाह का विश्वास था कि साम्राज्य को स्थायित्व प्रदान करने के लिए कृषकों का सुखी एवं संतुष्ट होना आवश्यक है। उसकी यह भी धारणा थी कि भू-राजस्व के रुप में कृषकों पर भारी धनराशि बकाया रह जाती है जिससे राजकोष को काफी हानि उठानी पड़ती है। अतः भू-राजस्व की धनराशि बकाया नही रहनी चाहिए। इस उद्देश्य से शेरशाह ने भूमि व्यवस्था में अनेक सुधार किए। उसकी लगान व्यवस्था मुख्य रुप से रैयतवाड़ी थी जिसमें किसानों से प्रत्यक्ष संपर्क स्थापित किया गया था।
प्रशासनिक सुधार – शेरशाह ने सर्वप्रथम अपने पिता की जागीर के प्रबंधक के रुप में प्रशासन की जानकारी प्राप्त की थी। मुगल सेवा में रहने के कारण उस मुगलों के प्रशासन, सैनिक संगठन एवं वित्तीय व्यवस्था का पूर्ण ज्ञान था।यही कारण है कि शेरशाह ने अपने पांच वर्षों के अल्प शासनकाल में जो प्रशासन कार्य दिखाया उसके कारण उसकी गणना दिल्ली के सर्वश्रेष्ठ सुल्तानों में की  जाती है। शेरशाह का प्रशासन अत्यंत केन्द्रीकृत था। शासक स्वयं शासन का प्रधान होता था और संपूर्ण शक्तियाँ उसी में केन्द्रित थी। शेरशाह ने अपने संपूर्ण साम्राज्य को 47 सरकारों में विभाजित किया था। शेरशाह ने बंगाल सूबे के लिए एक अलग प्रकार की व्यवस्था की थी। संपूर्ण सूबे को उसने 19 सरकारों में बांट दिया था तथा प्रत्येक सरकार को एक सैनिक अधिकारी (शिकदार) के नियंत्रण मे छोड़ दिया था। उसकी सहायता के लिए एक असैनिक अधिकारी अमीर-ए-बंगाल की नियुक्ति होती थी। यह प्रबंध की आशंका को समाप्त करने के लिए किया गया था।
सैनिक सुधार प्रणाली – अपने साम्राज्य को सुदृढ़ करने के लिए शेरशाह ने सैनिक संगठन के क्षेत्र में अनेक सुधार किए। वह सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी के सुधारों से बहुत प्रभावित था। बेईमानी को रोकने के लिए उसने घोड़ों को दागने की प्रथा तथा सैनिकों का हुलिया लिखने की प्रथा को अपनाया था।
करेंसी प्रणाली में सुधार – शेरशाह का शासनकाल भारतीय मुद्राओं के इतिहास में एक परीक्षण का का काल था। उसके मुद्रा सुधार के बारे में स्मित ने लिखा है कि – यह रुपया वर्तमान ब्रिटिश मुद्र प्रणाली का आधार है। शेरशाह ने पुराने घिसे-पिटे सिक्कों के स्थान पर शुध्द सोने, चांदी के सिक्कों का प्रचलन किया। उसने शुध्द चांदी का रुपया (180 ग्रेन) तथा तांबे का दाम (380 ग्रेन) चलाया।
हाजी बेगम ने अपने हुमायूँ के मकबरे का निर्माण दिल्ली (दीन पनाह) में 1564 ई. में करवाया था। इस मकबरे का नक्शा मीरक मिर्जा गियास (ईरानी वास्तुकार) ने तैयार किया था। श्वेत संगमरमर से बना यह भारत का प्रथम गुंबद वाला मकबरा है। इस मकबरे के परितः एक बाग की रचना हुई है।
दिल्ली का पुराना किला के वर्तमान स्वरुप का निर्माण शेरशाह सूरी ने अपने शासनकाल में 1540 से 1545 के बीच करवाया था। यह किला नई दिल्ली में यमुना नदी के किनारे स्थित प्राचीन दीन-पनाह नगर का आंतरिक किला है।


अकबर

अकबर का जन्म 15 अक्टूबर , 1542 को अमरकोट के राजा वीरसाल के यहां हुआ था। 14 फरवरी , 1556 को पंजाब में गुरदासपुर जिले के निकट कलानौर नामक स्थान पर बादशाह घोषित किया गया | इस समय उसकी आयु 14 वर्ष से कम थी | शाह अब्दुल माली ने अकबर के राज्याभिषेक में सम्मिलित होने से इनकार कर दिया था | हुमायूं इसे फर्जंद ( पुत्र ) पुकारता था |
बैरम खाँ अकबर का संरक्षक था | अकबर ने उसे अपना वकील ( वजीर ) नियुक्त किया तथा उसे ‘ खान-ए-खाना ‘ की उपाधि से विभूषित किया | अकबर ने सर्वप्रथम कछवाहा राजपूतों से वैवाहिक संबंध स्थापित किए थे| जिस समय अकबर ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह की यात्रा हेतु जा रहा था, तो सांगानेर नामक स्थान पर 20 जनवरी 1562 को आमेर के राजा बिहारीमल ( भारमल ) बादशाह की सेवा में उपस्थित हुआ, उसने अकबर की अधीनता स्वीकार की तथा उससे अपनी ज्येष्ठ पुत्री हरखा बाई (लोक प्रचलित नाम- जोधाबाई)  का विवाह करने की इच्छा भी व्यक्ति की | अकबर ने राजा का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया तथा अजमेर से लौटते समय सांभर में 6 फरवरी 1562  को उसने राजा बिहारीमल की  पुत्री से विवाह किया, यह अकबर का प्रथम राजपूत कन्या से विवाह था। इस प्रकार बिहारीमल पहला राजपूत राजा था, जिसमें स्वेच्छा से अकबर की अधीनता स्वीकार की | इसी राजपूत राजकुमारी से शहजादे सलीम ( जहांगीर ) का जन्म हुआ |
अकबर ने सूफी मत में अपनी आस्था जताते हुए चिश्तिया संप्रदाय को समर्थन दिया था | वह ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की अजमेर स्थित दरगाह पर दर्शन हेतु अक्सर जाता था | अपनी उदार धार्मिक नीति के अंतर्गत उसने 1562 ई में दास प्रथा , 1563 ई में तीर्थ यात्रा कर , तथा 1564 ई में जजिया कर को समाप्त कर दिया। अपने सामाजिक सुधार के अंतर्गत उसने बाल विवाह और सती प्रथा रोकने का प्रयत्न किया। उसने यह आज्ञा दी थी कि आदमी को एक ही स्त्री से विवाह करना चाहिए और वह दूसरा विवाह तब कर सकता है जब उसकी पहली पत्नी बन्ध्या हो।
माहम अनगा के पुत्र आधम खां को 1562 ई में अकबर ने स्वयं मारा था क्योंकि उसने अकबर के प्रधानमंत्री अतगां खां की हत्या कर दी थी।
दुर्गावती गोंडवाना कें हिंदू राज्य की योग्य शासिका थी , अकबर के आक्रमण ( 1564 ई ) के फलस्वरूप शत्रु से घिर जाने पर इस वीर रानी ने आत्महत्या कर ली थी।
1565 ईस्वी में मारवाड़ के शासक राव चंद्रसेन ने भाद्राजूण में मुगल सेनाओं का सामना किया लेकिन चारों तरफ से घिर जाने के कारण उसे सिवाना जाना पड़ा | राव चंद्रसेन ने 1579 ई में सोजन पर अधिकार कर लिया | अतः अकबर ने पुनः सेनाएं भेजकर उस पर आक्रमण करवाया लेकिन वह पहाड़ी क्षेत्र में चला गया और 1581 ईसवी में उसकी मृत्यु हो गई।
हल्दी घाटी युद्ध के पीछे अकबर का मुख्य उद्देश्य राणा प्रताप को अपने अधीन लाना था | अकबर ने अप्रैल 1576 ईस्वी में मानसिंह के नेतृत्व में 5000 सैनिकों को राणा प्रताप के विरुद्ध भेजा | मानसिंह मंडलगढ़ के मार्ग से होता हुआ गोगुंडा गढ़ से 14 मील दूर हल्दी घाटी दर्रे के निकट पहुंचा, राणा प्रताप भी मुगल सेना का सामना करने के लिए पहाड़ियों से उतर आया| फलतः जो युद्ध हुआ , वह हल्दीघाटी युद्ध के नाम से प्रसिद्ध है, जिसमें राणा पराजित हुआ और उसे अरावली की पहाड़ियों में शरण लेनी पड़ी।
मेवाड़ राज्य ने अकबर की संप्रभुता स्वंय स्वीकार नहीं की थी। राणा प्रताप ने लंबे समय तक मुगलों से युद्ध लड़ा। राणा प्रताप की मृत्यु के बाद उनके पुत्र राणा अमर सिंह ने 1615 ई में जहांगीर से संधि की थी।
जब शाहजादा सलीम ने विद्रोह कर इलाहाबाद में स्वतंत्र शासक की तरह व्यवहार करना आरंभ कर दिया था, तब अकबर ने 1602 ई में दक्षिण से अपने मित्र अबुल फजल को बुलाया | उसी समय सलीम के इशारे से ओरछा के बुंदेला सरदार वीरसिंह देव ने मार्ग में अबुल फजल की हत्या कर दी थी।
अकबर पहला मुस्लिम शासक था जिसने इस बात का अनुभव किया कि मुगल साम्राज्य की सुदृढ़ता के लिए भारत की बहुसंख्यक हिंदू जनता का सहयोग प्राप्त करना नितांत आवश्यक है | उसने हिंदू मुस्लिम समुदायों को राष्ट्रीय एकता के सूत्र में बांधने का प्रयास किया |
मुगल शासन व्यवस्था को स्थापित करने का श्रेय अकबर को ही है | उसकी केंद्रीय शासन व्यवस्था तथा बादशाह के पद और अधिकारों एवं कर्तव्यों की व्याख्या , उसका प्रांतीय शासन , उसकी लगान व्यवस्था , उसकी मुद्रा व्यवस्था , उसकी मनसबदारी व्यवस्था आदि सभी को उसके समय में सफलता प्राप्त हुई और वह उसके उत्तराधिकारियों के लिए आधार स्वरूप बनी |
अकबर एक महान शासक था जिसका साम्राज्य अफगानिस्तान कश्मीर से लेकर गोदावरी नदी के किनारे तक विस्तृत था | वह एक धर्मनिरपेक्ष शासक था | संपूर्ण सत्ता उसी में निहित थी , एतएव वह प्रशा के फ्रेडरिक महान और इंग्लैंड की रानी एलिजाबेथ की तरह प्रबुद्ध निरंकुश शासक कहा जाता है, जिसके शासनकाल में कानून की दृष्टि में सभी सामान थे | *
अकबर के शासन काल में पुर्नगठित केंद्रीय प्रशासन तंत्र के अंतर्गत मीर बक्शी मुख्यतः सैन्य विभाग का प्रमुख था। उसका कार्य सैनिकों का वेतन और सैनिक संगठन से संबंधित था। अकबर ने 1573 ई. में घोड़ो को दागने की प्रथा का पुनः प्रचलन किया जिससे सेनापति अपने घोड़े न बदल सके अथवा एक घोड़े को दो बार न प्रस्तुत कर सके।
1575 ई में अकबर ने मनसबदारी व्यवस्था के आधार पर सैनिक संगठित किया | ‘मनसब ‘ शब्द का अर्थ ‘श्रेणी ‘ या ‘ पद ‘ है तथा ‘ मनसबदार ‘ का अर्थ उस अधिकारी से था , जिसे शाही सेना में एक पद या श्रेणी प्राप्त थी | अकबर की मनसबदारी व्यवस्था दशमलव प्रणाली पर आधारित थी |
दीवान शब्द फारसी भाषा का है और खलीफा उमर के काल में मुसलमानों ने इसे अपनाया था | वे इसका प्रयोग खजाना विभाग के लिए करते थे | अकबर के शासन काल के 9 वें से लेकर 30 वर्ष तक दीवान पद मुजफ्फर खां तुरबती ,  राजा टोडरमल एवं ख्वाजा शाह मंसूर के हाथों आता जाता रहा |दीवान आर्थिक मामलों एवं राजस्व का सर्वोच्च अधिकारी होता था |
मुगल मनसबदारी प्रणाली मध्य एशिया से ली गई थी | इस प्रकार का सैन्य विभाजन चंगेज खान के नेतृत्व में मंगोल सेना में किया गया था |
मुगल बादशाह अकबर ने मनसबदारी व्यवस्था अपने शासनकाल के 11वें वर्ष में प्रारंभ किया। मनसब प्राप्तकर्ता तीन वर्गों में विभक्त थे – 10 से 500 तक उमरा , 500 से 2500 तक अमीर तथा 2500 से ऊपर अमीर-ए-आजम कहलाते थे। इसके अलावा जात और सवार की दृष्टि से भी तीन श्रेणियों में बाटा गया था।
अकबर के शासन काल में भू राजस्व वसूली के लिए जाब्ती प्रणाली का प्रचलन हुआ , जो भूमि सर्वेक्षण , भू राजस्व निर्धारण के लिए दस्तूर-उल-अमल तथा जाबती खासरे की तैयारी पर आधारित थी |टोडरमल ने भू राजस्व के क्षेत्र में ख्याति अर्जित की थी | अकबर ने अपने शासन के 24 वर्ष (1580 ई.) में आईने दहसाला ( टोडरमल बंदोबस्त ) नामक नई कर प्रणाली को शुरू करके मुगलकालीन व्यवस्था को स्थाई स्वरुप प्रदान किया |
इस प्रणाली का वास्तविक प्रणेता टोडरमाल था। इसी कारण इसे टोडरमल बंदोबस्त भी कहते हैं | उस समय टोडरमल अर्थ मंत्री था और उसका मुख्य सहायक ख्वाजा शाह मंसूर था | इस प्रणाली के अंतर्गत अलग-अलग फसलों के पिछले 10 वर्ष के उत्पादन और उसी समय के उनके प्रचलित मूल्यों का औसत निकाल कर उस औसत का एक तिहाई हिस्सा राजस्व के रूप में वसूला जाता था | अकबर कालीन भू-राजस्व व्यवस्था की दहसाला पध्दति को बंदोबस्त व्यवस्था के नाम से जाना जाता है।
जहांगीर के समकालीन मोहसिन फानी ने अपनी रचना ‘ दबिस्तान-ए-मजाहिब ‘ में पहली बार ‘ दीन ए इलाही ‘ को एक स्वतंत्र धर्म के रूप में उल्लेख किया था |
अकबर ने आगरा से 36 किलोमीटर दूर फतेहपुर सीकरी में 1572 ई. में एक राज महल-सह-किले  का निर्माण आरंभ किया | यह 8 वर्षों में बनकर तैयार हुआ | इनमें जोधाबाई महल , पंचमहल , स्वर्ण महल अथवा सुनहला मकान, दीवाने आम , दीवाने खास , मरियम की कोठी , तुर्की सुल्तान की कोठी , बीरबल कोठी आदि प्रमुख है |
तुर्की सुल्तान का महल इतना सुंदर है कि पर्सी ब्राउन ने उसे ‘ स्थापत्य कला का मोती ‘ कहा है | पंचमहल पिरामिड के आकार का पांच महलों का भवन था और भारतीय बौद्ध विहारों के अनुरूप था |
अकबर ने गुजरात विजय 1572-73 ई में की थी और फतेहपुर सीकरी नामक नगर की स्थापना कराई थी। एक वर्ग के इतिहासकारों का मत है कि गुजरात विजय के उपलक्ष्य में सम्राट अकबर ने सीकरी के बुलंद दरवाजा का निर्माण विजय स्तंभ के रुप में कराया था, जबकि पर्सी ब्राउन ने इसका निर्माण दक्षिण विजय (1601 ई) के उपलक्ष्य में बताया है।
अकबर ने 1582 ईसवी में ‘ तौहीद-ए-इलाही ‘ या ‘ दीन ए इलाही ‘ की स्थापना की | इसके अंतर्गत अकबर ने सभी धर्मों के मूल सिद्धांतों को सम्मिलित कर इसे सर्वमान्य बनाने का प्रयास किया | दीन ए इलाही वास्तव में सूफीवाद पर आधारित एक विचार पद्धति थी | इस नवीन संप्रदाय का प्रधान पुरोहित अबुल फजल था | हिंदुओं में केवल बीरबल ने इसे स्वीकार किया था।
अकबर का मकबरा सिकंदरा नामक गांव में स्थित है , जिसे सुल्तान सिंकदर लोदी ने इसे अपने नाम पर बसाया था। अकबर ने इसका नाम ‘ बहिश्ताबाद’ रखा था | इसके निर्माण की योजना अकबर ने बनवाई थी किंतु निर्माण जहांगीर ने 1613 ई में करवाया था | यह मकबरा 5 मंजिला है। इसकी विशेषता इसका गुंबद विहीन होना है |
अकबर ने अपने राज कवि फैजी की अध्यक्षता में अनुवाद विभाग की स्थापना की थी| अकबर के आदेश से महाभारत के विभिन्न भागों का ‘ रज्जनामा ‘ नाम से फारसी में अनुवाद – नकीब खां , बदायूंनी तथा फैजी आदि विभिन्न विद्वानों के सम्मिलित प्रयत्नों से किया गया | इसके अतिरिक्त बदायूंनी ने रामायण का , फैजी ने ‘ लीलावती ‘ का तथा अबुल फजल ने ‘ कालियादमन ‘ का फारसी में अनुवाद किया।


·      अकबर के दरबार के प्रसिद्ध ग्रंथकर्ताओं में सबसे प्रमुख कश्मीर का मोहम्मद हुसैन था, जिसे अकबर ने “जरी कलम” की उपाधि प्रदान की थी | हरि विजय सूरी वह जैन साधु था जो अकबर के दरबार में कुछ वर्षों तक रहा एवं जिसे जगतगुरु की उपाधि से सम्मानित किया गया | मुगल दरबार में एक अन्य विद्वान जिन चंद्र सूरी भी रहते थे जिन्हें ” युग प्रधान” की उपाधि प्रदान की गई थी |
·      इंग्लैंड की रानी एलिजाबेथ प्रथम का समकालीन भारतीय राजा अकबर था | दिसंबर 1600 ई० में ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना के समय इंग्लैंड की रानी एलिजाबेथ थी | भारत में उस समय अकबर (1556-1605 ईसवी) तक का शासन था | एलिजाबेथ प्रथम का काल (1533से 1603 )था | मुगलकालीन विद्वान अबुल फजल ने अमेरिका की खोज का उल्लेख किया है|
·      रॉल्फ़ फिंच  (1583-91 ईसवी)  तक फतेहपुर सीकरी और आगरा पहुंचने वाला पहला अंग्रेज व्यापारी था |
·      अकबर ने फतेहपुर सीकरी में 1575 ई० में इबादतखाने  की स्थापना की जिसका उद्देश्य दार्शनिक एवं धार्मिक विषयों पर वाद विवाद करना था |
·      1578 ई० में इसने सभी धर्मावलंबियों के लिए इबादतखाना का द्वार खोल दिया | अकबर ने समस्त धार्मिक मामलों को अपने हाथों में लेने के लिए 1579 ईसवी में “महजरनामा”  की घोषणा की | यह महजरनामा अबुल फजल के पिता शेख मुबारक ने तैयार किया था। मजहर को स्मिथ और वूल्जले हेग ने अचूक आज्ञा पत्र कहा है | मजहर जारी करने के बाद अकबर ने सुल्तान-ए-आदिल की उपाधि धारण की |
·      अकबर स्वयं बसंत , होली , दिवाली जैसे त्योहारों/उत्सवों में भाग लेता था | उसने तुलादान , झरोखा दर्शन आदि हिंदू त्योहारों को भी स्वीकार कर लिया था | लेनपूल के अनुसार, हिंदू राजाओं को एकजुट कर लेना अकबर के समय की सबसे स्पष्ट विशेषता थी | डॉ आरपी त्रिपाठी के अनुसार अकबर अपने युग की संतान और पिता दोनों था |
माहम अनगा के पुत्र अधम खां को 1562 ई. में अकबर ने स्वयं मारा था। क्योंकि उसने अकबर ने प्रधानमंत्री अतगा खां की हत्या कर दी थी।
अकबर अपनी धार्मिक कट्टरता के लिए नही अपितु धार्मिक उदारता एवं धार्मिक सहिष्णुता के लिए जगप्रसिध्द है। उसके द्वारा प्रतिपादित सुलह-ए-कुल की नीति इसका सबल प्रमाण है।
अकबर के शासनकाल में पुनर्गठित केन्द्रीय प्रशासन तंत्र के अंतर्गत मीर बख्शी मुख्यतः सैन्य विभाग का प्रमुख था किंतु उसे प्रधान सेनापति नही कहा जा सकता। उसका कार्य सैनिकों के वेतन एवं सैनिक संगठन से संबंधित था। वह मनसबदारों की सूची रखता था। उसे बादशाह अकबर के समक्ष प्रस्तुत करना था। सैनिको की भर्ती, उनके शस्त्रों की व्यवस्था, सैनिकों का निरीक्षण आदि कार्यों के अंतर्गत था।
अकबर के काल में, हर दस घुड़सवार सैनिकों के लिए मनसबदारों को बीस घोड़े रखने होते थे। इसका मूल कारण यह था कि लंबी यात्रा के दौरान घोड़ों को आराम देना आवश्यक था और युध्द में उन्हें बदलने की आवश्यकता भी पड़ती थी।
अकबर कालीन भू-राजस्व व्यवस्था की दहसाला पध्दति को बंदोबस्त व्यवस्था के नाम से भी जाना जाता है।
1580 मे जौनपुर के एक धर्म गुरु ने सभी मुस्लिमों को अकबर के विरुध्द विद्रोह करने के लिए फतवा जारी किया था।
हुमायूं का मकबरा दिल्ली में स्थित है, जो हुमायूं की पत्नी के संरक्षण में निर्मित हुआ तथा मीरक मिर्जा गियास के द्वारा इसका डिजाइन किय गया। यह मकबरा भारतीय-फारसी वास्तुकला शैली का उदाहरण है।
मुगल कालीन विद्वान अबुल फजल ने अमेरिका की खोज का उल्लेख किया है।
1572 ई. में सुलेमान करारानी की मृत्यु के बाद उसका पुत्र दाऊद खां गद्दी पर बैठा। दाऊद खाँ ने अपने को स्वतंत्र घोषित कर पटना के मुगल किले पर आक्रमण किया। अकबर ने मुनीम खाँ को दाऊद पर आक्रमण करने तथा बिहार को जीतने का आदेश दिया। मुनीम खाँ ने दाऊद को एक युध्द में पराजित किया तथा 1574 ई. में बिहार पर मुगलों का आधिपत्य हो गया। पराजित होने के बाद दाऊद बंगाल भाग गया। किंतु 12 मार्च, 1576 को टोडरमल खाँ एवं हुसैन कुली खां ने मिलकर दाऊद को पूर्णतः पराजित किया। इस प्रकार 1576 ई. में बंगाल तथा बिहार को पूर्ण रुप से मुगल साम्राज्य में मिला लिया गया।
अकबर के दरबार में प्रसिध्द ग्रंथकर्ताओं (जिनकी एक सूची आइने अकबरी में मिलती है) मे सबसे प्रमुख कश्मीर का मुहम्मद हुसैन था, जिसे अकबर ने जरी कलम की उपाधि प्रदान की थी।
हरिविजय सूरि ही वह जैन साधु थ , जो अकबर के दरबार में कुछ वर्ष तक रहा एवं जिसे जगद्गुरु की उपाधि से सम्मानित किया गया। 1582 ई. में अकबर ने उक्त जैनाचार्य को जैन सिध्दांतों को समझने की इच्छा से आहूत किया था। इनकी विद्वता एवं चिंतन तथा विनम्रता से प्रभावित होकर अकबर ने कुछ दिनों के लिए मांस भक्षण बंद कर दिया था एवं पशु-पक्षियों के वध पर भी रोक लगा दी थी। मुगल दरबार में एक अन्य विद्वान जिन चन्द्र सूरी भी रहते थे  जिन्हें युग प्रधान की उपाधि प्रदान की गई थी।
जहांगीर

जहांगीर का जन्म अगस्त, 1569 ई. में हुआ था। इसका पहला विवाह अम्बर (जयपुर) के राजा भगवानदास की पुत्री और राजा मानसिंह की बहन  मानबाई से 1585 ई. में हुआ था। खुसरो मान बाई की संतान था। 1586 ई. में सलीम का दूसरा विवाह उदयसिंह की पुत्री जगतगोसाई से हुआ था। शाहजादा खुर्रम इसी का पुत्र था।
आगरा के किले में 1605 ई. में जहांगीर का राज्याभिषेक हुआ और उसने नूरुद्दीन मुहम्मद  जहांगीर बादशाह  गाजी की उपाधि धारण की जहांगीर ने अपने पक्ष के सरदारों को उच्च पद प्रदान किए जिनमें से एक अबुल फजल का हत्यारा राजा वीर सिंह  बुंदेला भी था। अकबर की परंपरा को स्थापित रखते हुए जहांगीर ने अपना शासन उदारता से आरंभ किया और गद्दी पर  बैठते ही उसने विभिन्न लोकहितकारी आदेश दिए।
दो अस्पा एवं सिह-अस्पा प्रथा जहांगीर ने चलाई थी। इसके अंतर्गत बिना जात पाद बढ़ाए ही मनसबदारों को अधिक सेना रखनी पड़ती थी।
दो अस्पा – इसमें मनसबदारों को अपने सवार पद के दोगुने घोड़े रखने पड़ते थे।
सिंह अस्पा – इसमें मनसबदारों को अपने सवार पद के तीन गुने घोड़े रखने होते थे।
1615 ई. में राणा अमर सिंह तथा मुगल बादशाह जहांगीर के मध्य चित्तौड़गढ़ की संधि हुई। इसमें राणा ने मुगल बादशाह की अधीनता स्वीकार  कर ली तथा बादशाह जहांगीर ने राणा को चित्तौड़ (दुर्ग की किलाबंदी न करने की शर्त के साथ) समेत समस्त भू-भाग वापस कर दिया  जो अकबर के समय से मुगल  आधिपत्य में था।
जहांगीर से विवाह के बाद नूरजहां ने नूरजहां गुट का निर्माण किया। इस गुट के प्रमुख सदस्य थे – एत्मामुद्दौला या मिर्जा गियास बेग (नूरजहां का पिता), अस्मत बेगम (नूरजहां की मां) आसफ खां (नूरजहां का भाई) एवं शाहजादा खुर्ऱम (बाद  में शाहजहां)। इस गुट का प्रभाव 1627 ई. तक रहा। नूरजहां से प्रभावित जहांगीर के शासनकाल को दो भागों मे बांटा जा सकता है – 1611-1622 ई. तक और 1622-1627 ई. तक। प्रथम काल में खुर्रम नूरजहाँ गुट का सदस्य था लेकिन दूसरे काल में खुर्रम इस गुट से अलग हो गया था।
विलियम हांकिंस (1608-1611) जहांगीर के दरबार में भेजा जाने वाला ब्रिटिश् राजा जेम्स प्रथम का अंग्रेज राजदूत तथा मुगल दरबार में उपस्थित होने वाला पहला अंग्रेज था। जहांगीर ने हाकिंस को इंग्लिश खां की उपाधि देकर आर्मीनिया की एक स्त्री से उसका विवाह कर दिया। जहांगीर के दरबार में आने वाले दूसरे शिष्टमंडल का नेतृत्वकर्ता सर थामस रो थे। सर थामस रो (1615-1619 ई.) ब्रिटेन के राजा जेम्स प्रथम के दूत के रुप में 18 सितंबर , 1615 को सूरत पहुंचा। जनवरी, 1616 ई. में वह अजमेर में  जहांगीर के दरबार में उपस्थित हुआ। उसे बादशाह के साथ मांडू अहमदाबाद तथा अजमेर जैसे अनेक स्थानों पर जाने का अवसर मिला। वह बादशाह के साथ शिकार खेलने भी गया। वह आगरा में एक वर्ष तक रहा था।
पीटर मुंडी इटली का यात्री था, जो शाहजहाँ के समय आया था। फ्रांसिस्कों पेलसर्ट डच पर्यटक था, जो  जहांगीर के समय भारत आया, इसने अपनी पुस्तक रिमान्स्ट्री में जहांगीर के समय का अद्भुत विवरण छोड़ा है।


मुगल चित्रकला जहांगीर के शासनकाल में अपनी पराकाष्ठा पर पहुंच गई। पहले चित्रकारी हस्तलिखित ग्रंथ  की विषय-वस्तु में संबंध्द होती थी। जहांगीर ने उसे इस  बंधन से मुक्त कर दिया। जहांगीर के समय के सर्वोत्कृष्ट चित्रकार उस्ताद मंसूर और अबुल हसन थे। सम्राट जहांगीर ने उन दोनों को क्रमशः नादिर-उल-अस्त्र (उस्ताद मंसूर) तथा नादिर-उद-जमा (अबुल हसन) की उपाधि प्रदान की थी। उस्ताद मंसूर प्रसिध्द पक्षी विशेषज्ञ चित्रकार था। जबकि अबुल हसन को व्यक्ति चित्र में महारत हासिल थी।
जहांगीर एक उच्चकोटि का लेखक तथा समालोचक था। उसने अपनी आत्मकथा फारसी भाषा में लिखी और उसका नाम तुजुक-ए-जहांगीरी रखा।
जहांगीर के सबसे बड़े पुत्र खुसरो ने जहांगीर के गद्दी पर बैठने के शीघ्र बाद विद्रोह किया था, जो कि 1606 में पराजित हुआ। 1623 ई. में शहजादे खुर्रम के विद्रोह का महाबत खाँ के नेतृत्व वाली मुगल सेना ने दमन किया था। 1626 ई. में महाबात खाँ ने जहांगीर के विरुध्द विद्रोह किया था।
मुगल बादशाह बाबर एवं जहांगीर के मकबरे क्रमशः काबुल एवं शाहदरा (लाहौर) में स्थिति है। ये क्रमशः अफगानिस्तान एवं पाकिस्तान में स्थित है। एत्मादुद्दौला का मकबरा नूरजहाँ ने 1622-1628 ई. के मध्य अपने पिता की मृत्यु के बाद  बनवाया। यह पहली कृति है, जो पूर्णतया संगमरमर में  बनाई गई। इसमें गुदाई एवं संगमरमर के अलावा  पित्रादुरा का प्रयोग सजावट हेतु पहली  बार किया गया।
गोविंद महल मध्य प्रदेश के दतिया में स्थित 17 मंजिला महल  है। इसका निर्माण 1614 ई. में राजा बीर सिंह देव  द्वारा पत्थरों से करवाया गया था।
दो अस्पा एवं सिंह-अस्पा प्रथा जहांगीर ने चलाई थी। इसके अंतर्गत बिना जात पद बढ़ाए ही मनसबदारों को अधिक सेना रखनी पड़ी थी।
मुगल शासक बाबर एवं जहांगीर के मकबरे क्रमशः काबुल एवं शाहदरा (लाहौर) में स्थित हैं। ये क्रमशः अफगानिस्तान एवं पाकिस्तान में स्थित हैं।
शेख निजामुद्दीन औलिया का मकबरा अजमेर में नही बल्कि दिल्ली में है। 1325 ई. में निजामुद्दीन औलिया की मृत्यु हई। इन्हें गियासपुर (दिल्ली) मे दफनाया गया। इनके शिष्यों ने अमीर खुसरों और ह सन अहमद देहलवी प्रमुख थे।


शाहजहां

5 जनवरी, 1592 को लाहौर में शाहजादा खुर्रम का जन्म हुआ था। उसकी माता मारवाड़ के शासक उदयसिंह की पुत्री जगतगोसाई थी। 1612 ई. में आसफ खां की पुत्री अर्जुमंद बानो बेगम से उसका विवाह हुआ, जो बाद में इतिहास में मुमताज महल के नाम से विख्यात हुई।
24 फरवरी, 1628 को शाहजहाँ अबुल मुजफ्फर शहाबुद्दीन मुहम्मद साहिब किरन-ए-सानी की उपाधि धारण कर गद्दी पर बैठा। आगरा में उसका राज्याभिषेक हुआ। इसी ने राजधानी आगरा से दिल्ली स्थानांतरित की।
अहमदनगर को 1633 ई. में मुगल साम्राज्य में सम्मिलित कर लिया गया। यहां के अंतिम शासक हुसैन शाह को ग्वालियर के किले में कैद कर दिया गया। निजामशाही सरदार शाहजी भोसले ने एक बच्चे (मुर्तजा तृतीय) के नाम से मुगलों से संघर्ष जारी रखा। अंत में 1636 में. मुगलों द्वारा शाहजी को चुनार किले में घेर लिया गया। शाहजी ने बहुत से किले तथा मुर्तजा तृतीय को मुगलों को सौंप दिया। मुर्तजा तृतीय को भी ग्वालियर के किले में कैद कर लिया गया तथा शाहजी ने बीजापुर राज्य की सेवा स्वीकार कर ली। शाहजहाँ के समय  गोलकुंडा और बीजापुर ने मुगलों से संधि कर ली।
शाहजहाँ के शासनकाल में औरंगजेब पहले 1636-44 ई. तक दक्कन का सूबेदार रहा था तथा 1652 ई. में उसे पुनः इस पद पर नियुक्त किया गया था। जिस पर वह उत्तराधिकार के युध्द मे विजय और मुगल बादशाह  बनने तक रहा।
कंधार राज्य ईरान के शाह और मुगलों के  बीच संघर्ष की जड़ था क्योंकि कंधार को अपने हाथों में रखना मुगल शासक तथा ईरान के शाह के लिए प्रतिष्ठा का विषय बन गया था। शाहजहाँ के शासनकाल में 1649 ई. में कंधार पर पुनः ईरानी अधिकार हो जाने से मुगल साम्राज्य को सामरिक महत्व के केन्द्र के दृष्टिकोण से एक बड़ा धक्का पहुंचा क्योंकि कंधार के बिना  उत्तर-पश्चिमी सीमा पर मुगलों की स्थिति अपेक्षाकृत दुर्बल थी। शाहजहाँ के समय मे कंधार अंतिम रुप से मुगलों के अधिकार से निकल गया।
शाहजहाँ के बल्ख अभियान का उद्देश्य काबुल की सीमा से चटे बल्ख और बदख्शां में एक मित्र शासक को लाना था। ताकि वे ईरान और मुगल साम्राज्य के बीच बफर राज्य बन सके।
शाहजहाँ का काल मुगल काल का स्वर्ण काल माना जाता है। इसके समय में कला, साहित्य, शिक्षा क्षेत्र में पर्याप्त विकास हुआ। साहित्य के क्षेत्र में शाहजहाँ के शासनकाल में विशेष उन्नति हुई। इस काल में फारसी भाषा में दो शैलियाँ प्रचलित थी। प्रथम भारतीय फारसी तथा दूसरी ईरानी फारसी। भारतीय फारसी शैली का उत्कृष्ट प्रवर्तक अबुल फजल था। इस शैली के विद्वानों में  अब्दुल हमीद लाहौरी, मोहम्मद वारिस व चंद्रभान ब्राह्मण आदि थे। ईरानी फारसी शैली का इस समय काफी बोलबाला  था। शाहजहाँ ने ईरानी  फारसी पद्य शैली के कवि कलीम को राजकवि भी नियुक्त किया। कलीम के अतिरिक्त फारसी कवियों में सईदाई गीलानी, कुदसी, मीरमुहम्मद काशी, साएगा,  सलीम मसीह, रफी, फारुख, मुनीर, शोदा, चंद्रभस ब्राह्मण हाजिक, दिलेरी आदि थे।
कवींद्राचार्य शाहजहाँ के आश्रित कवि थे, इनकी भाषा में ब्रज एवं अवधी का अनुपम समन्वय है। कवींद्र कल्पलता उन्होंने शाहजहाँ की प्रशस्ति में प्रणीत की थी। सरस्वती उपाधि धारक यह विद्वान संस्कृत का मर्मज्ञ था, इसने बादशाह से निवेदन कर तीर्थयात्रा कर समाप्त करवा दिया था।
ताजमहल के निर्माण के लिए शाहजहाँ ने भारत, ईरान एवं मध्य एशिया से डिजाइनरों, इंजीनियरों एवं वास्तुकारों को एकत्र किया था। ताजमहल की वास्तुकला में भारतीय,  ईरानी एवं मध्य एशियाई वास्तुकला का संतुलित समन्वय  दिखाई पड़ता है।
दिल्ली की जामा मस्जिद का निर्माण शाहजहाँ ने करवाया था। शाहजहाँ द्वारा निर्मित इमारतों में – दीवाने आम, दीवाने खास, शीशमहल, मोती मस्जिद, खास महल, मुसम्मन  बुर्ज, नगीना मस्जिद, जामा मस्जिद, ताजमहल तथा लाल किला प्रमुख हैं।
अकबर के फतेहपुर सीकरी की भांति शाहजहाँ ने दिल्ली में अपने नाम पर शाहजहाँनाबाद नामक एक नगर की स्थापना 1648 ई. में की तथा वहां अनेक सुंदर एवं वैभवपूर्ण भवनों का निर्माण कर उसे सुसज्जित करने का प्रयास किया।
शाहजहांनाबाद के भवनों मे लाल किला प्रमुख है। इसका निर्माण कार्य 1648 ई. में पूर्ण हुआ। इस किले के  पश्चिमी द्वार का नाम- लाहौरी दरवाजा एवं दक्षिणी द्वारा का नाम दिल्ली  दरवाजा है। यह सुंदरता तथा शोभा में अनोखा है।
उपनिषदों का फारसी अनुवाद शाहजहाँ के शासनकाल में शहजादे दारा शिकोह ने सिर्र-ए-अकबर शीर्षक के तहत किया। इसमें 52 उपनिषदों का अनुवाद किया गया है। दारा को उसकी सहिष्णुता एवं उदारता के लिए लेनपूल ने  लघु अकबर की संज्ञा  दी है। यही नही शाहजहाँ ने भी दारा को शाह बुलंद इकबाल की उपाधि प्रदान की थी। मज्म-उल-बहरीन दारा की  मूल रचना है।
शाहजहाँ के चारों पुत्रों में ज्येष्ठ दारा शिकोह सर्वाधिक सुशिक्षित, अध्येता तथा लेखक था। उसने अनेक  हिंदू धर्म ग्रंथों का अध्ययन किया एवं उपनिषदों, योग वशिष्ठ, भगवतगीता आदि हिंदू धर्म ग्रंथों का फारसी में अनुवाद कराया।
मुगल बादशाह शाहजहाँ ने बलबन द्वारा प्रारंभ ईरानी दरबारी रिवाज सिजदा समाप्त कर दिय था। 1636-37 ई. में सिजदा प्रथा का अंत कर दिया गया।  जमीनबोस की प्रथा भी खत्म कर दी गई और पगड़ी में बादशाह की तस्वीर पहनने की मनाही कर दी गई।
डॉ. ए.एल. श्रीवास्तव ने अपनी पुस्तक मुगलकालीन भारत में लिखा है कि शाहजहाँ का शासनकाल भारत में मध्यकालीन इतिहास में स्वर्ण युग के नाम से प्रसिध्द है। तथापि यह केवल कला और कला में भी वास्तुकला की दृष्टि से ही सत्य माना जा सकता है। एल्फिन्सटन ने शाहजहाँ के काल के बारे में लिखा है कि शाहजहाँ का काल भारतीय इतिहास में सर्वाधिक समृध्दि का काल था।
आसफ खां की पुत्री अर्जुमंद बानो बेगम का विवाह मुगल बादशाह जहांगीर के पुत्र शहजादे खुर्रम (शाहजहां) के साथ हुआ। भविष्य में अर्जुमंद बानो बेगम मुमताज महल के नाम से प्रसिध्द हुई।
24 फरवरी, 1628 को शाहजहाँ अबुल मुजफ्फर शहाबुद्दीन मुहम्मद साहिब किरन-ए-सानी की उपाधि धारण कर गद्दी पर बैठा। आगरा में उसका राज्याभिषेक हुआ। इसी ने राजधानी आगरा से दिल्ली स्थानांतरित की।
स्मारक निर्माता
अलाई दरवाजा                अलाउद्दीन खिलजी

बुलंद दरवाजा, फतेहपुर सीकरी    अकबर

मोती मस्जिद, आगरा          शाहजहाँ

मोती मस्जिद, दिल्ली          औरंगजेब

मीर जुमला का वास्तविक नाम मोहम्मद सईद था। यह मूल रुप से आर्दिस्तान का रहने वाला था। वह व्यापार-व्यवसाय करने के उद्देश्य से गोलकुंडा चला आया और प्रारंभ में यह हीरे का व्यापार करता था। बाद में वह गोलकुंडा के सुल्तान अब्दुल्ला कुतुबशाह (1626-1672) की सेवा में जाकर वजीर का पद प्राप्त किया। बादशाह शाहजहां ने मीर जुमला को पांच हजार का मनसब तथा उसके पुत्र मोहम्मद अमीन को दो हजार का मनसब प्रदान किया। इससे खिन्न होकर गोलकुंडा के सुल्तान अब्दुल्ला कुतुबशाह ने मीर जुमला के परिवार तथा संपत्ति को जब्त कर लिया। इससे क्रोधित होकर शाहजहाँ ने  औरंगजेब को गोलकुंडा से युध्द करने के लिए भेजा पर दोनों में संधि हो गई। यहां मीर जुमला भी औरंगजेब से आ मिला। शाहजहाँ ने मीर जुमला को आगरा वापस बुलाया और उसे मुअज्जम खां की पदवी से सम्मानित किय़ा। इस अवसर  पर मीर जुमला अपने साथ बादशाह के लिए अमूल्य भेंट लेकर आया। इसी अवसर पर उसने शाहजहाँ को कोहिनूर हीरे की भेंट दी, जो मूल्य तथा सौंदर्य़ में संसार में अद्वीतीय समझा जाता है।


औरंगजेब

मुगल गद्दी पर शाहजहाँ का उत्तराधिकारी औरंगजेब हुआ, किंतु ज्येष्ठ पुत्र उत्तराधिकार के नियम से नही अपितु तलवार के बल से। मुगलकाल में तलवार ही सत्ता का प्रतीक थी। तलवार के बल पर ही उत्तराधिकार का निर्णय होता था।
मुगल बादशाह औरंगजेब का राज्याभिषेक दो बार हुआ। उसका पहला राज्याभिषेक दिल्ली में 31 जुलाई, 1658 को  हुआ था। उसका दूसरा राज्याभिषेक खजवा एवं देवराई के युध्द में सफल होने के बाद दिल्ली मे ही 15 जून, 1659 को हुआ तथा अब्दुल मुजफ्फर मुहीउद्दीन मुहम्मद औरंगजेब बहादुर आलमगीर पादशाह गाजी की उपाधि धारण  कर वह मुगल शाहजहाँ के सिंहासन पर आसीन हुआ।
मध्य प्रदेश मे स्थित उज्जैन के निकट धरमत नामक स्थान पर 15 अप्रैल, 1658 को औरंगजेब तथा दारा शिकोह के मध्य हुआ था। इस युध्द में  जोधपुर के राजा जसवंत सिंह ने दारा शिकोह की तरफ से तथा मुराद  ने औरंगजेब  की तरफ से भाग लिया था।
सामूगढ़ का युध्द 29 मई, 1658 को औरंगजेब और मुराद की संयुक्त सेनाओं एवं दारा शिकोह के मध्य हुआ था जिसमें दारा शिकोह पराजित हुआ था।
उत्तराधिकार के युध्द मे औरंगजेब से पराजित दारा शिकोह के पुत्र शहजादे सुलेमान शिकोह ने श्रीनगर गढ़वाल के शासक पृथ्वीसिंह के यहाँ शरण ली थी। किंतु उसके उत्तराधिकारी मेदिनीसिंह ने उसे औरंगजेब को सौंप दिया। सुलेमान शिकोह को ग्वालियर के किले में बंद कर दिया गया और वहां उसको अफीम खिलाकर मार डाला गया।
1665 ई. के आरंभ में औरंगजेब के राजा जयसिंह के नेतृत्व में विशाल सेना शिवाजी का दमन करने के लिए भेजी। जयसिंह कछवाहा शासक थे जो कि युध्द और शांति,  दोनों कलाओं मे निपुण थे। वह चतुर कूटनीतिज्ञ थे और उसने समझ लिया कि बीजापुर को जीतने के लिए शिवाजी से मैत्री करना आवश्यक है। अतः पुरंदर के किले पर मुगलों की विजय और राजगढ़ की घेराबंदी के बावजूद उन्होंने शिवाजी से संधि की। पुरंदर की यह संधि जून, 1665 ई. में हुई।
औरंगजेब के पुत्र मुहम्मद अकबर ने 1681 ई. में विद्रोह करके राजपूतों के विरुध्द अपने पिता की स्थिति दुर्बल  कर दी थी। अकबर राजपूतों के विरुध्द लड़ जाने वाले युध्द से निराश हो गया था। उसे अपने पिता धर्मांधता की नीति की सफलता में विश्वास न था। तथा विचारों से वह उदार था। उसी अवसर पर मेवाड़ के राजा जयसिंह और राठौर नेता मारवाड़  के दुर्गादास ने उसके सामने प्रस्ताव रखा कि यदि वह अपने को भारत का बादशाह घोषित कर दे तो मेवाड़ और मारवाड़ दोनो की सेनाएं उसकी सहायता करेंगी।
औरंगजेब जो कुछ दूसरों पर लागू करना चाहता था। उसका वह स्वयं अभ्यास करता था उसके व्यक्तिगत जीवन का नैतिक स्तर ऊंचा था तथा वह अपने युग के प्रचलित पापों से दृढ़तापूर्वक अलग रहता था। इस प्रकार उसके समकालीन उसे शाही दरवेश समझते थे तथा सुमलमान उसे जिंदा पीर के रुप में मानते थे।
1652 ई. में जब औरंगजेब दूसरी बार दक्षिण का सूबेदार नियुक्त किया गया तो उसने गोलकुंडा एवं बीजापुर के विरुध्द आक्रामक नीति अपनाई थी, संभवतः उसने इन दोनों राज्यों को विध्वंस भी कर दिया होता, किंतु दारा शिकोह के परामर्श पर शाहजहाँ द्वारा भेजे  आदेश के अनुसार 1656 ई.में गोलकुंडा एवं 1657 ई. में बीजापुर के विरुध्द उसे युध्द स्थागित कर संधि करनी पड़ी थी।
बादशाह बनने के बाद उसने अपनी इस अधूरी योजना को पूरा किया और बीजापुर (1686) एवं गोलकुंडा (1687) पर आधिपत्य स्थापित किया। औरंगजेब के शासनकाल के दौरान मुगल सेना मे सर्वाधिक हिंदू सेनापति थे। उसके शासनकाल में कुल सेनापतियों में 33 प्रतिशत  हिंदू थे। जिसमें मराठों की संख्या आधे से आधिक थी। अकबर के काल मे यह अनुपात 16 प्रतिशत तथा शाहजहाँ के काल में 24 प्रतिशत था।
अकबर महान ने अपने साम्राज्य से जजिया कर समाप्ति की घोषणा की थी, किंतु औरंगजेब ने उसे 1679 ई. में पुनर्जीवित कर दिया। इस कर के लिए हिंदुओं को तीन वर्गों में बांटा गया  –
जिनकी आय 200 दिरहम प्रतिवर्ष से कम थी, उनको 12 दिरहम प्रतिवर्ष देना था।
जिनकी आय 200 से 10000 दिरहम प्रतिवर्ष थी, उनको 24 दिरहम प्रतिवर्ष देना था।
जिनकी आय 10000 दिरहम प्रतिवर्ष के ऊपर थी, उनको 48 दिरहम प्रतिवर्ष देना पड़ता था।
स्त्रियाँ, गुलाम, 14 वर्ष की आयु से कम के बच्चे, भिखारी और आय रहित व्यक्ति इस कर से मुक्त थे। अधीनस्थ हिंदू राजाओं एवं ब्राह्मणों को भी इसे देने के लिए बाध्य किया गया।
औरंगजेब सर्वोपरि एक उत्साही सुन्नी मुसलमान था। उसकी धार्मिक नीति सांसारिक लाभ के किसी विचार से प्रभावित नही थी। उदार दारा के विरुध्द सुन्नी कट्टरता के समर्थक के रुप में राजसिंहासन प्राप्त करने वाले की हैसियत से उसने कुरान के कानून को कठोरता से लागू करने का प्रयत्न किया। इस कानून के अनुसार  प्रत्येक धार्मिक मुसलमान को अल्लाह की राह में मेहनत करनी चाहिए। या दूसरे शब्दों में तब तक गैर-मुसलमानी देशों (दारूल-हर्ब) के विरुध्द धर्म-युध्द (जिहाद) करना चाहिए, जब तक कि वे इस्लाम के राज्य (दारुल-इस्लाम) के रुप में परिवर्तित नही हो जाते हैं।
औरंगजेब ने सिक्कों पर कलमा खुदवाना, नौरोज का त्योहार मनाना, तुलादान तथा झरोखा दर्शन बंद कर दिया। उसने अकबर द्वारा प्रारंभ हिंदू, राजाओं के माथे पर अपने हाथ से तिलक लगाना बंद कर दिया। वेश्याओं को शादी करने अथवा देश छोड़ने का आदेश दिया। दरबार में बसंत, होली, दीवाली आदि त्योहार मनाने बंद कर दिए।
औरंगजेब ने औरंगाबाद में अपनी प्रिय पत्नी राबिया-उद-दौरानी के मकबरे का निर्माण 1678 ई. में कराया था। इसे बीबी का मकबरा भी कहा जाता है। इसकी स्थापत्य कला शैली सुप्रसिध्द ताजमहल पर आधारित थी। अतः इसे द्वितीय ताजमहल भी कहा जाता है। दिल्ली के लाल किले में औरंगजेब ने मोती मस्जिद का निर्माण किया था।
मेहरुन्निसा औरंगजेब की पुत्री थी, इसके अतिरिक्त जहांआरा रोशन आरा तथा गौहर आरा औरंगजेब की  बहन तथा शाहजहाँ की पुत्रियाँ थी। औरंगजेब की अन्य़ पुत्रियाँ थी – जेबुन्निसा, जीनतुन्निसा, बदरुन्निसा तथा  जुबदतुन्निसा। औरंगजेब ने जहाँआरा को साहिबात –अज-जमानी की उपाधि प्रदान की थी।
संत अथवा समर्थ रामदास महाराष्ट्र के महान संत थे। इनका जन्म 1608 ई. में जबकि मृत्यु 1682 ई. में हुई थी। यह मुगल शासक औरंगजेब के समकालीन थे।



अकबर महान अपने साम्राज्य से जजिया कर की समाप्ति की घोषणा की थी, किंतु औरंगजेब ने उसे 1679 ई. में पुनर्जीवित कर दिया।
औरंगजेब ने जहां आरा को साहिबात-उज-जमानी उपाधि प्रदान की थी। जहां आरा बेगम सम्राट और महारानी मुमताज महल की सबसे बड़ी बेटी थी। वह अपने पिता के उत्तराधिकारी और छठें मुगल सम्राट औरंगजेब की बड़ी बहन भी थी।
दिल्ली के लाल किले के अंदर औरंगजेब ने संगमरमर की एक मस्जिद (मोती मस्जिद) का निर्माण करवाया क्योंकि शाहजहाँ ने अपनी योजना के अनुसार, किले के अंदर मस्जिद का निर्माण न करवा कर किले के बाहर जामा मस्जिद का निर्माण करवाया था। अतः औरंगजेब ने किले के अंदर मस्जिद की आवश्यकता का अनुभव कर मोती मस्जिद का निर्माण करवाया।


मुगलकालीन प्रशासन

मुगल प्रशासन के दौरान जिले को सरकार के नाम से जाना जाता था। शासन की सुविधा के लिए प्रत्येक सूबा (प्रांत) कई सरकारों (जिलों) मे  बंटा होता था। सरकार को पुनः परगना या महल में विभाजित किया गया था। प्रत्येक सरकार के प्रमुख अधिकारी-फौजदार, अमलगुजार, काजी कोतवाल, बितिक्ची और खजानदार होते थे।
मुगलकाल मे मीर बख्शी सैन्य विभाग का प्रधान था। वह सरखत नामक प्रमाण-पत्र पर हस्ताक्षर करके सैनिकों का मासिक वेतन भी निर्धारित करता था। इसके अतिरिक्त प्रांतों मे भी बख्शी होते थे, जो मीर बख्शी के नियंत्रण मे कार्य करते थे।
मुगल शासन में मीर बख्शी भू-राजस्व अधिकारियों का पर्य़वेक्षण करता था तथा साथ ही सैन्य विभाग के वेतन के लिए भी उत्तरदायी था। सर जदुनाथ सरकार ने मीर बख्शी को वेतनाधिकारी कहा है। किंतु वेतनाधिकारी का कार्य मीर बख्शी का नियमित एवं स्थायी कार्य नही था। वेतनाधिकारी का कार्य दीवान-ए-तन करता था।
मुगलकाल में मनसबदारों के सैनिकों के अतिरिक्त दो प्रकार के और घुड़सवार सैनिक थे। जो अहदी तथा दाखिली कहलाते थे। अहदी सैनिक बादशाह द्वारा नियुक्त किए जाते थे। तथा उसके अंगरक्षक के रुप मे कार्य करते थे। दाखिली सैनिक की भर्ती बादशाह द्वारा की जाती थी। यद्यपि इनको मनसबदारों की सेवा मे रखा जाता था।
मुगल प्रशासन में मुहतसिब जन आचरण के निरीक्षण विभाग का प्रधान था। उसका कार्य सार्वजनिक आचरण को उच्च बनाए रखना था। वेश्याओं को नगर से निष्कासित कर एक नए स्थान पर बसाया गया और उसका नाम शैतानपुरी रखा गय़ा।
मनसबदारी व्यवस्था के अंतर्गत 33 वर्ग थे। उन्हें मशरुत अथवा सशर्त पद प्राप्त होते थे। अकबर ने 40वें वर्ष में जात एवं सवार  जैसे दोहरी व्यवस्था लागू की। जिस मनसबदार से अपने जात या व्यक्तिगत दर्जे के अनुरूप सवार रखने की अपेक्षा की जाती थी उसके दर्जे की पहली कोटि में, जिससे आधे  सवार रखना आपेक्षित था, उसे दूसरी कोटि में और जिससे आधे से भी कम सवार रखना अपेक्षित था उसे तीसरी कोटि में रखा जाता था। सवार पद ,जात पद से कभी ऊपर नही हो सकता था। इस व्यवस्था में सैनिक और असैनिक अधिकारियों का एक ही सेवा-संवर्ग था।
मुगल प्रशासनिकत शब्दावली में माल शब्द भू-राजस्व से संबंधित था। पुर्तगालियों द्वारा 1605 ई. में तंबाकू भारत लाया गया, इसके बाद ही तंबाकू भारत के जनसामान्य में बहुत लोकप्रिय हो गया। कुछ ही वर्षों मे तंबाकू पीने की आदत लोगों में इतनी अधिक प्रचलित हो गई कि इस नुकसानदेह आदत से बचने के लिए 1617 ई. में जहांगीर को निषेध जारी करना पड़ा।
मुगल प्रशासन में विद्वानों एवं धार्मिक लोगों की दी जाने वाली राजस्व मुक्त अनुदान भूमि को मदद-ए-माश कहा जाता था। इसे सयूरगल भी कहा जाता था। दान दी जाने वाली समस्त भूमि का निरिक्षण सद्र करता था तथा सद्र का यह भी दायित्व था कि इन अनुदानों का दुरुपयोग न होने पाए। यह भूमि स्थानांतिरत नही होती थी। और अनुदान ग्राही के पास वंशानुगत रुप से रहती थी।
मुगलकाल मे टकसाल के अधिकारी को दरोगा कहा जाता था। टकसालों मे सोने, चांदी और तांबे के सिक्के ढाले जाते थे। अकबर दवारा रामसीता की आकृतियों और रामसीय देवनागरी लेख से युक्त सिक्के चलाए गए थे। चांदी का सिक्का रुपया कहलाता था। दाम अकबर द्वारा चलाया गया तांबे का सिक्का था। जो रुपये में 40 वें भाग के बराबर होता था। जहांगीर ने अपने सिक्कों पर आपनी आकृति अंकित करायी थी। और कुछ सिक्कों पर उसके साथ नूरजहाँ का नाम अंकित था। इसके कुछ सिक्कों पर हाथ मे शराब का प्याला लिए हुए आकृति अंकित थी।
मध्यकाल मे बंटाई शब्द का तात्पर्य लगान निर्धारण की एक पध्दति थी जिसमें वास्तविक उपज का बंटवारा राज्य और कृषक के बीच होता था।


निकोलाओ मनूची (1653-1708 ई.) को मुगल सेना में चिकित्सक नियुक्त किया गया था। वह एक इतालवी यात्री था। इसने भारत आकर दारा शिकोह की सेना में तोपची के रुप में नौकरी की। 1659 ई. में दारा शिकोह की मृत्यु के बाद इसने चिकित्सक का पेशा अपना लिया।
बाबर ने चांदी और तांबे का सिक्का चलाया था। चांदी के सिक्के को शाहरुख कहा जाता था।
मध्यकाल मे बंटाई शब्द का तात्पर्य लगान निर्धारण की एक पध्दति थी जिसमें वास्तविक उपज का बंटवारा राज्य और कृषक के बीच होता था। शेरशाह सूरी ने लगान निर्धारण के के लिए तीन प्रणालियाँ  अपनाई थी –
नश्क या मुक्ताई अथवा कनकूत
नकदी अथवा जब्ती
गल्ला बख्शी या बंटाई।
बंटाई तीन प्रकार की होत थी –
खेत बंटाई
लंक बंटाई
रास बंटाई


मुगलकालीन संगीत एवं चित्रकला

मुगल चित्रों में युध्द-दृश्य पशु-पक्षी और प्राकृतिक दृश्य दरबारी चित्रण विषयों से संबंधित चित्रों का अंकन किया गया है।
चित्रकला के क्षेत्र में मुगल शैली का प्रारंभ हुंमायूं ने किया था। मुगल चित्रकला की नींव हुमायूं के शासनकाल में ही पड़ी। अपने फारस एवं अफगानिस्तान में निर्वासन काल में उसने मीर सैयद अली और अब्दुलस्समद नामक दो पारसी  चित्रकारों की सेवाएं प्राप्त की जिनके द्वारा ही मुगल चित्रकला की शुरुआत की गई  थी।
अकबर ने अनेक ग्रंथों को चित्रित करवाया था। इसमें सर्वप्रथम दास्तान–ए–अमीर हम्जा है। पहले सैयद अली तथा बाद में अब्दुलस्समद की देखरेख में प्रायः 50 चित्रकारों ने इसे तैयार करने में हिस्सा लिया। इसमें करीब 1375 चित्र हैं। यह ग्रंथ फारसी नायक अमीर हम्जा (मुहम्मद साहब के चाचा) के वीरतापूर्ण कारनामों का उल्लेख करता है।
मुगल चित्रकला जहांगीर के काल में अपने शिखर पर पहुंच गई थी। जहांगीर चित्रकला का बड़ा कुशल पारखी था।
जहांगीर के दरबार के सुप्रसिध्द चित्रकारों में अबुल हसन (नादिर-उद-जमा की उपाधि), उस्ताद मंसूर (नादिर-उल-अस्त्र), फार्रुख बेग, बिशनदास, अका रिजा, मोहम्मद नादिर, मोहम्मद मुराद, मनोहर, माधव, गोवर्धन इत्यादि उल्लेखनीय हैं। अबुल हसन ने जहांगीर के सिंहासनारोहण का एक चित्र बनाया था जिसे जहांगीर की आत्मकथा तुजुक-ए-जहांगीरी के मुख्य पृष्ठ पर लगा  दिया गया। इस प्रकार जहांगीर के काल को मुगल चित्रकला का स्वर्णयुग कहा जाता है।
पहाड़ी स्कूल, राजपूत स्कूल, मुगल स्कूल और कांगड़ा स्कूल मध्यकालीन चित्रकला की विभिन्न शैलियां हैं।
औरंगजेब ने संगीत को इस्लाम विरोधी मानकर उस पर पाबंदी लगा दी परंतु उसी के काल में फारसी भाषा में भारतीय शास्त्रीय संगीत पर सर्वाधिक पुस्तकें लिखी गई। औरंगजेब संगीत विरोधी होने के बावजूद स्वयं एक कुशल वीणावादक था।
तोड़ी राग प्रातः कालीन गाया जाने वाला राग है। यह राजदरबारों में भाटों एवं चारणों द्वारा गाया जाता था।
हरिदास संप्रदाय के संगीत अर्चना केन्द्रों की संख्या 5 थी। केन्द्र क्रमशः थे – बांके बिहारी का मंदिर, निधि वन, गोरे लाला का मंदिर, श्री रसिक बिहारी एवं थट्टी खान।
अकबर के शासनकाल के दौरान तानसेन और स्वामी हरिदास प्रमुख ध्रुपद गायक थे। तानसेन अकबर के दरबार का प्रसिध्द संगीतज्ञ था।
तानसेन का मूल नाम रामतनु पांडेय था। वह अकबर के नवरत्नों में से एक था। अकबर के दरबार में आने से पहले तानसेन रीवा के राजा रामचन्द्र के दरबार मे था। जहां से अकबर ने उसे अपने दरबार में बुलवाया और बहुत उच्च स्थान प्रदान किया। अकबर के तानसेन को कंठाभरणवाणीविलास की उपाधि प्रदान की थी। विलास खां जहांगीर के दरबार का प्रमुख संगीतज्ञ था।
शाहजहां के दरबार के प्रमुख गायक थे – जगन्नाथ, रामदास, सुखसेन, सूरसेन, लालखां, दुरंगखां आदि। मुहम्मदशाह रंगीला के समय ख्याल गायन लोकप्रिय हुआ।
राजस्थान की प्रसिध्द शैली किशनगढ़ शैली चित्रकला से संबंधित है। यह शैली अपनी श्रृंगारिक चित्रों के लिए संपूर्ण भारत में जानी जाती है। किशनगढ़ के राजा सामंत सिंह श्रृंगार प्रिय व अच्छे साहित्यकार थे, जो नागरीदास के नाम से प्रसिध्द हुए। इनकी प्रेमिका बनी-ठनी राधा का सौन्दर्य इनके काव्य पर आधारित है। इस शैली के प्रमुख कलाकार अमीरचंद, छोटू, भवानीदास, निहालचंद, सीताराम आदि हैं। बनी-ठनी का प्रसिध्द चित्र निहालचंद ने बनाया था, जो किशनगढ़ शैली में है।


उस्ताद मंसूर पशु-पक्षी एवं प्राकृतिक दृश्यों का चित्रण करने में दक्ष था।
दसवंत और वसावन अकबर कालीन चित्रकार थे। दसवंत, जो एक कहार का बेटा था के काम से अकबर इतना प्रभावित हुआ था कि उसने इसे अपने समय के अग्रणी चित्रकार बनने में सहयोग दिया। किंतु बाद में यह महान चित्रकार मानसिक रुप से विक्षिप्त हो गया और 1584 ई. में इसने आत्महत्या कर ली। अकबर कालीन चित्रकारों के नाम अबुल फजल ने अपनी पुस्तक आइने-अकबरी में गिनाए हैं – दसवंत, वसावन, केशव लाल, मुकुंद, मिस्किन, फारुख, कलमक, माधू, जगन, महेश, खेमकरण, तारा, सांवल और हरिवंश आदि।
अबुल हसन, उस्ताद मसूर, फार्रुख बेग, बिशनदास, अका रिजा, मोहम्मद नादिर, मोहम्मद मुराद, मनोहर, माधव तथा गोवर्धन जहांगीर के समय के प्रमुख चित्रकार थे। मीर सैयद अली और अब्दुस्समद ने हुमायूं के समय में मुगल चित्रकला की आधारशिलात रखी थी।
राजस्थान की प्रसिध्द शैली किशनगढ़ शैली चित्रकला से संबंधित है। यह शैली अपनी श्रृंगारिक चित्रों के लिए संपूर्ण भारत में मानी जाती है।
औरंगजेब ने संगीत को इस्लाम विरोधी मानकर उस पर पाबंदी लगा दी। परंतु उसी के काल में फारसी भाषा में भारतीय शास्त्रीय संगीत पर सर्वाधिक पुस्तकें लिखी गई। औरंगजेब संगीत विरोधी होने के बावजूद स्वयं एक कुशल वीणावादक था।
तोड़ी राग प्रातःकालीन गाया जाने वाला राग है। यह राजदरबारों में भाटों एवं चरणों द्वारा गाया जाता था।
अकबर के शासनकाल के दौरान तानसेन और स्वामी हरिदास प्रमुख ध्रुपद गायक थे। विलास खां जहांगीर के दरबार का प्रमुख संगीतज्ञ था।
मुगल शासक अकबर नगाड़ा बजाने में प्रवीण था। इसने लाला कलावंत से हिंदू संगीत की शिक्षा ली।


मुगलकालीन साहित्य

ü गुलबदन बेगम बाबर की पुत्री थी। उसका जन्म 1523 ई. में तथा मृत्यु 1603 ई. में हुई थी। उसने अपनी प्रसिध्द रचना हुमायूंनामा में ऐतिहासिक विवरण लिखे। अकबर उसका बहुत सम्मान करता था। गुलबदन बेगम ने स्वयं लिखा है कि अकबर के आदेश पर बाबर और हुमायूं का इतिहास अपनी स्मृति से लिखा था। गुलबदन बेगम ने अपनी इस रचना मे हुमायूं और कामरान के मध्य युध्द का वर्णन भी किया है।
ü माहम अनगा ने दिल्ली के पुराने किले में खैरुल मनजिल अथवा खैर–उल मनजिल नामक मदरसे की स्थापना कराई थी,  जिसे मदरसा–ए–बेगम भी कहा जाता था।
ü अकबर के शासनकाल में हितोपदेश का फारसी भाषा में अनुवाद मुफर्रीह–उल–कुलूब के नाम से ताजुल माली द्वारा किया गया था।


मुगल कालीन लेखक एवं उनकी पुस्तकें हैं –

लेखक

पुस्तक

निजामुद्दीन अहमद

तबकाते अकबरी

अब्बास खां शरवानी

तारीखे शेरशाही

हसन निजामी

ताजुल मासिर

ख्वांदमीर

हुमायूंनामा

भीसेन

नुश्खा-ए-दिलकुशा

मिर्जा मोहम्मद काजिम

आलमगीर नामा

गुलाम हुसैन

सिदरुल मुतखारीन

मुहम्मद सालेह

आलमे सालेह

इनायक खां

शाहजहांनामा

चन्द्र भान ब्रहमन

चहार चमन

मुअतमद खां

इकबाल नामा  जहांगीरी

ü अब्दुल हमीद लाहौरी शाहजहां के शासनकाल का एक राजकीय इतिहासकार था। उसने अपनी पुस्तक पादशाह नामा (Padshah Nama) में शाहजहाँ कालीन  इतिहास का वर्णन किया है।
ü अकबर द्वारा स्थापित अनुवाद विभाग मे संस्कृत, अरबी तुर्की एवं ग्रीक भाषाओं की अनेक कृतियों का अनुवाद फारसी भाषा में किया गया। इसी के शासनकाल में अबुल फजल ने संस्कृत ग्रंथ पंचतंत्र का फारसी में अनुवाद कर उसका नाम अनवार–ए–सुलेही रखा। अकबरनामा अकबर के नवरत्नों में से एक अबुल फजल द्वारा वर्ष 1590 से 1596 ई. के  बीच उसके शासनकाल के आधिकारिक वृत्तांत के रुप में लिखा गया था। कुछ पुस्तकों में अकबरनामा पूर्ण करने का वर्ष 7 से अधिक भी (12 या 13 वर्ष) बताया गया है।
ü फारसी मुगलों में राजभाषा थी। राजकाज से संबंधित सभी कार्य फारसी में ही संपन्न होते थे। सर्वप्रथम भारत में लाहौर फारसी साहित्य के विकास का केन्द्र रहा।
ü नस्तालीक एक फारसी लिपि है,  जो मध्यकालीन भारत में प्रयुक्त होती थी। मुगल बादशाह औरंगजेब नस्तालीक तथा शिकस्त लिखने में निपुण था।
ü अजमेर की किशनगढ़ रियासत के राजा सावंत सिंह (17वीं-18वीं शती) का वैष्णव उपनाम नागरीदास (राधा का सेवक) था। इन्होने ही कृष्ण की प्रशंसा में अनेक छंद लिखे। किशनगढ़ के शासकों ने निम्बार्क संप्रदाय को संरक्षण प्रदान किया था। रामचन्द्रिका एवं रसिकप्रिया हिंदी कविता के रीतिकालीन कवि केशवदास (1555-1617 ई.) की रचनाएँ हैं।


अकबर का शासनकाल मे हितोपदेश का फारसी भाषा में अनुवाद मुफर्रीह-उल-कुलूब के नाम ताजुल माली द्वारा किया गया था।
ख्वाजा निजामुद्दीन अहमद ने तबकात-ए-अकबरी की रचना की, जिसे तारीख-ए-निजामी भी कहते हैं।
शाहजहांनामा पुस्तक के लेखक मुहम्मद ताहिर हैं, जिसे इनायत खां के नाम से भी जाना जाता है।
अकबर ने अपने राजकवि फैजी की अध्यक्षता में अनुवाद विभाग की स्थापना की थी। इसी के शासनकाल में अबुल फजल ने संस्कृत ग्रंथ पंचतंत्र का फारसी में अनुवाद कर उसका नाम अनवार-ए-सुहाइली रखा।
नस्तालीक एक फारसी लिपि है, जो मध्यकालीन भारत में प्रयुक्त होती थी। मुगल बादशाह औरंगजेब नस्तालीक तथा शिकस्त लिखने में निपुण था।
रामचन्द्रिका एवं रसिकप्रिया हिंदी कविता के रीतिकालीन कवि केशवदास (1555-1617) की रचनाएँ हैं।


मुगल कालः विविध

मध्यकाल में प्रचलित पाठ्यक्रम को ध्यान मे रखते हुए मुल्ला निजामुद्दीन ने 18वीं शताब्दी में दर्श-ए-निजामी निश्चित किया तथा उनके अनुसार यह पाठ्यक्रम भारत में मुसलमानों के शासन के आरंभ से प्रचलित था। इस पाठ्यक्रम के अंर्तगत ग्यारह विषय थे तथा प्रत्येक विषय के लिए अलग-अलग पुस्तकें थी।
मुगलकाल में शाह वली उल्ला के मदरसा मे हदीस (परंपराओं) तथा तफसीर (टीकाओं) पर और लखनऊ के फिरंगीमहल में फिक (न्याय शास्त्र) के अध्ययन पर विशेष बल दिया जाता था। धर्मशास्त्र के विशेषज्ञ को आलिम तथा साहित्य के विशेषज्ञ को काबिल की उपाधियों से विभूषित किया जाता था।
हेमू अथवा हेमराज मध्ययुग के इतिहास में एक विशेष स्थान रखता है। तत्कालीन स्रोतों के अनुसार हेमू वैश्य था और रेवाड़ी के बाजार में नमक बेचता था। इस्लामशाह ने उसे अपनी सेवा में लिया था। और आदिलशाह के समय में उसका सम्मान और पद बढ़ा। आदिलशाह ने उसी सैनिक प्रतिभा से संतुष्ट होकर उसे अपना वजीर और सेनापति  बना लिया। आदिलशाह की तरफ से उसने 24 युध्दों मे भाग लिया जिनमे से उसने 22 युध्दों में सफलता प्राप्त की। दिल्ली पर अधिकार करने के पश्चात उसने विक्रमादित्य के नाम से अपने को स्वतंत्र शासक  घोषित किया था।
विजयनगर मे नायकों को राजा वेतन के बदले या उनकी अधीनस्थ सेवा के रख-रखाव के लिए विशेष भूखंड देता था, जो अमरण कहलाते थे। मराठा शासन मे चौथ की आय का 66 प्रतिशत मराठा सरदारों को घुड़सवार रखने के लिए दिया  जाता था, जिसे मोकासा कहते थे।
मुगल काल में गुजरात स्थित सूरत बंदरगाह से होकर ही हज यात्री मक्का के लिए प्रस्थान करते थे। इसीलिए सूरत बंदरगाह को काबुल मक्का या मक्का द्वार कहा जाता था।
नवरोज का त्यौहार ईरान (फारस) से लिया गया था। यह एक राष्ट्रीय त्यौहार था। य़ह उन्नीस दिनों तक मनाया जाता था।
भारतीय व्यापिरक जहाजों पर मौल्लिम एक कमर्चारी था। मौल्लिम जहाज पर एक गोलाकार यंत्र के साथ बैठता था। इस यंत्र की सहायता से वह तारों तथा सूर्य की स्थिति का पता लगाता था तथा इससे उसे अपने जहाज की सही स्थिति मे होने का पता चलता था।
फ्रंसीसी यात्री ट्रेवर्नियर ने शाहजहाँ के शासनकाल में अपनी यात्रा प्रारंभ की। यह पेशे से जौहरी था। 1638-1663 ई. के बीच इसने छः बार भारत की यात्रा की। अपनी यात्रा का विवरण इसने ट्रेवेल्स इन इंडिया नामक पुस्तक मे किया है।
मनूची (1653-1708 ई.) इतालवी यात्री था। 14 वर्ष की अल्पायु में ही अपने गृह नगर वेनिस से भागकर एशिया माइनर और फारस की यात्रा करते हुए भारत पहुंचा। इसने शहजादा दारा शिकोह की सेवा में तोपची के रुप में नौकरी की। बाद में चिकित्सक का पेशा अपना लिया। स्टोरियो दो मोगोर नामक संस्करण लिखा। जिसे 17वीं शताब्दी के भारत का दर्पण कहा जाता है।


सर थॉमस रो (1616-1619 ई.) जहांगीर काल में मुगल दरबार में आया था। वह जगांगीर के साथ शिकार खेलने भी गया था।
कालानुक्रम –
हॉकिन्स       – 1608-1611

टामस रो       – 1615-1619

मनुची                 – 1653-1708

राल्फ फिश     – 1585-1586

जहांगीर का शासनकाल 1605-1628 ई. तक और मुहम्मद शाह का शासनकाल 1719-1748 ई. तक था। जबकि अहमद शाह अब्दाली पानीपत की तृतीय लड़ाई (14 जनवरी, 1761) में अफगान दल का नेता था। बहादुर शाह द्वीतीय जफर का कार्यकाल 1837-57 ई. था।
घटनाओ का सुमेलन –
तराइन का दूसरा युध्द      – 1192

औरंगजेब की मृत्यु                – 1707

पानीपत का तृतीय युध्द         – 1761

अकबर की मृत्यु          – 1605

युध्द एवं शासक
हल्दी घाटी का युध्द        – अकबर (राणा प्रताप के विरुध्द)

बिलग्राम का युध्द             – हुमायूं (शेरशाह के विरुध्द)

खुसरो का विद्रोह          – जहांगीर

खानवा का युध्द          – बाबर (राणा सांगा के विरुध्द)

अलाई दरवाजा (दिल्ली) का अलाउद्दीन खिलजी ने, बुलंद दरवाजा (फतेहपुर सीकरी) का अकबर ने, मोती मस्जिद (आगरा) का शाहजहाँ ने तथा मोती मस्जिद (दिल्ली) का औरंगजेब ने निर्माण कराया था।
बल्ख का युध्द 1646 ई. में शाहजहाँ के काल में हुआ था।
मुगल काल में गुजरात स्थित सूरत बंदरगाह से होकर ही हज यात्री मक्का के लिए प्रस्थान करते थे, इसीलिए सूरत बंदरगाह को बाबुल मक्का या मक्का द्वार कहा जाता था।




सिख संप्रदाय

सिख संप्रदाय के प्रवर्तक और सिक्खों के प्रथम गुरु गुरुनानक थे। सिक्खों के कुल 10 गुरु हुए। ये हैं –
गुरुनानक
गुरु अंगद
अमरदास
रामदास
अर्जुन देव
हरगोविन्द
हरराय
हरकिशन
तेगबहादुर
गुरु गोविंद सिंह
लहना, गुरु अंगद के नाम से सिक्खों के दूसरे गुरु बने। इन्हें गुरुमुखी लिपि का जन्मदाता माना जाता है। चौथे गुरु रामदास के समय में मुगल बादशाह अकबर ने उन्हें 500 बीघा भूमि दान दी जिसमें एक प्राकृतिक तालाब भी था। उनको और उनकी पत्नी बीबी भानी को अकबर द्वारा प्रदान की गई भूमि पर अमृतसर शहर बना।
सिक्खों के पांचवे गुरु अर्जुन देव ने 1604 ई. मे सिक्खों के पवित्र ग्रंथ आदि ग्रंथ का संकलन किया। राजकुमार खुसरो की सहायता करने के कारण जहांगीर ने इन्हें फांसी पर चढ़वा दिया। गुरु अमरदास ने धार्मिक साम्राज्य को 22 मनजियों अथवा भागों में बांटा था। प्रत्येक मनजी एक सिख के अधिकार मे रखी गई। गुरु अर्जुन देव ने अमृतसर तालाब के मध्य में हरमिंदर का निर्माण करवाया। इन्होने तरनतारन और करतारपुर नामक नगर बसाए तथा मनसद प्रथा चलाई,  जिसके अनुसार सिक्खों को अपनी आय का दसवां भाग गुरु को देना पड़ता था।


सिख संप्रदाय के आदि ग्रंथ अथवा गुरु ग्रंथ साहेब में सिक्खों के पांच गुरुओं, 18 हिंदू भक्तों तथा कबीर, बाबा फरीद, नामदेव और रैदास के उपदेश समाहित हैं। आदि ग्रंथ मे सबसे पहले की रचनाओं में बंगाल के वैष्णव कवि जयदेव की रचनाएं हैं और अंतिम रचनाएँ सिख गुरु तेग बहादुर की हैं।  गुरु अर्जुन देव तथा  गुरु तेग बहादुर को तत्कालीन शासकों-जहांगीर और औरंगजेब द्वारा मृत्युदंड दिया गया था।
सिक्खों के दसवें एवं अंतिम गुरु गोविंद सिंह ने सिक्खों को एक सैनिक-संप्रदाय खालसा पंथ में परिवर्तित कर दिया। इसकी स्थापना इन्होने 13 अप्रैल, 1699 को बैसाखी के दिन आनंदपुर साहिब मे की थी। उन्होने संपूर्ण सिख समुदाय को खालसा पुकारा प्रत्येक सिख को अपने नाम के आगे सिंह उपाधि लगाने के लिए कहा तथा प्रत्येक को केश, कंघा, कृपाण, कच्छा और कड़ा रखने के आदेश दिए। गुरु गोविंद सिंह की नांदेड़ (महाराष्ट्र) में एक अफगान सरदार द्वारा हत्या कर दी गई थी। वहां पर उनके समाधि स्थल पर नांदेड़ गुरुद्वारा स्थित है।
बंदा बहादुर का मूल नाम लक्ष्मण देव (Lachman Dev) अथवा लच्छन देव था। लक्ष्मण देव को यह नाम सिख गुरु गोविंद सिंह ने दिया था।
गुरुनानक का जन्म 1469 ई. में तलवंडी, पंजाब में हुआ था। ये सिखों के पहले गुरु थे। इन्होने नानक पंथ चलाया। अपने शिष्य लहना को उत्तराधिकारी नियुक्ति किया। लहना, गुरु अंगद के नाम से सिक्खों के दूसरे गुरु बने।
पंजाब के सिख साम्राज्य के अंतिम शासक दलीप सिंह थे। 1849 ई. में द्वीतीय आंग्ल-सिख युध्द की समाप्ति पर अंग्रेजों द्वारा पंजाब का विलय कर लिया गया तथा दलीप सिंह को पेंशन देकर बाद में ब्रिटेन भेज दिया गया।
गुरु तेग बहादुर (1664-1675 ई.) – सिक्खों के नवें गुरु थे। औरंगजेब से शत्रुता इन्हें विरासत में मिली थी। औरंगजेब ने इनके साथ जो व्यवहार किया उसके कई कारण बताए जाते हैं। बनर्जी के अनुसार, गुरु की हत्या राजनैतिक कारणों से नही अपितु धार्मिक कारणों से हुई। औरंगजेब की बहुचर्चित कठमुल्लावादी विचारधारा और धार्मिक कट्टरपन को सिक्खों का बगावत का एक कारण माना जाता है। 1675 ई. में गुरु तेग बहादुर को औरंगजेब द्वारा मृत्युदंड इसी कारण से दिया गया था।




मराठा राज्य और संघ

शिवाजी का जन्म 1627 ई. में शिवनेर के दुर्ग मे हुआ था। शिवाजी ने 1674 ई. में राज्याभिषेक के बाद छत्रपति की उपाधि धारण की। रायगढ़ को अपनी राजधानी बनाया। उस युग के महान विद्वान बनारस के  पंडित विश्वेश्वर उर्फ गंगाभठ्ठ ने उन्हें क्षत्रिय घोषित करते हुए उनका राज्याभिषेक कराया। 53 वर्ष की आयु में 1680 ई. में शिवाजी की मृत्यु हो गई।
मराठा शक्ति का उत्कर्ष किसी एक व्यक्ति या विशेष समूह का कार्य न था और किसी विशेष समय में उत्पन्न हुई अस्थायी परिस्थितियों का ही परिणाम था। मराठा शक्ति के उदय का आधार महाराष्ट्र के संपूर्ण निवासी थे। जिन्होंने जाति, भाषा, धर्म, साहित्य और निवास-स्थान की एकता के आधार पर राष्ट्रीयता का भावना को जन्म दिया। और उस राष्ट्रीयता को संगठित करने के लिए एक स्वतंत्र राज्य की स्थापना की इच्छा व्यक्त की। महाराष्ट्र की भौगोलिक परिस्थितियां भी मराठा शक्ति के उत्कर्ष में सहायक थी। शिवाजी और अन्य नेताओं की उच्च नेतृत्व क्षमता भी इसमें भागीदार थी।
बीजापुर के सुल्तान ने 1659 ई. में अफजल खाँ नामक अनुभवी एवं विश्वस्त सेनानायक को शिवाजी की महत्वाकांक्षाओं पर अंकुश लगाने के लिए भेजा था, किंतु कूटनीतिज्ञ शिवाजी ने उसका वध कर दिया।
1665 ई. में शिवाजी और जय सिंह के मध्य पुरंदर की संधि हुई। शिवाजी मुगलों की कैद से भागने के समय आगरा नगर के जयपुर भवन में कैद (नरजरबंद) थे। शिवाजी को औंरगजेब ने आगरा में 1666 ई. में कैद कर दिया था।
शिवाजी ने राज्य के प्रशासन के लिए केन्द्रीय स्तर पर अष्ट प्रधान की व्यवस्था की थी। जिसके अंतर्गत आठ मंत्रियों को नियुक्त किया गया था।
इसमें पेशवा, अमात्य, मंत्री , सचिव सुमंत, सेनापति, पंडित राव एवं न्यायाधीश शामिल थे। ये निम्न प्रकार थे –
पेशवा – राजा का प्रधान मंत्री।
अमात्य – वित्त एवं राजस्व मंत्री
वाकिया नवीस या मंत्री – राजा के दैनिक तथा दरबार की प्रतिदिन की कार्यवाहियों का विवरण रखता था।
सचिव – राजकीय पत्र-व्यवहार का कार्य देखना।
सुमंत या दबीर – विदेश मंत्री
सेनापति या सर-ए-नौबत – सेना की भर्ती, संगठन रसद आदि का प्रबंध करना।
पडित राव – विद्वानों और धार्मिक कार्यों के लिए अनुदानों का दायित्व निभाना।
न्यायाधीश – मुख्य न्यायाधीश
राजाराम 1689-1700 ई. तक शाहू के प्रतिनिधि के रुप में मराठों के नेतृत्व करता रहा है। राजाराम की मृत्यु के बाद उसकी विधवा पत्नी ताराबाई ने अपने चार वर्षीय पुत्र की शिवाजी द्वितीय के नाम से गद्दी पर बैठाया और मुगलों से स्वतंत्रता संघर्ष  जारी रखा।  औरंगजेब की मृत्यु के मसय मराठा नेतृत्व ताराबाई के ही हाथों में था।
शंभाजी के बाद मराठा शासन का पेशवा बालाजी विश्वनाथ ने सरल एवं कारगर बनाया। मराठा क्षत्रपति शाहू ने बालाजी को पेशवा के पद पर नियुक्त किया। 17 नवंबर, 1713 ई. का दिन केवल बालाजी तथा उसके परिवार के लिए ही नही अपितु संपूर्ण मराठा जाति के लिए भी महत्वपूर्ण था, क्योकि इस दिन से सत्ता क्षत्रपति के हाथों से निकलकर पेशवा के  हाथों में स्थानांतरित हो गई।
बालाजी विश्वनाथ का शासनकाल 1713 से 1720 ई. के बीच है। 1720 ई. में शाह ने बालाजी विश्वनाथ के बड़े पुत्र बाजीराव प्रथम को पेशवा नियुक्त किया। बाजीराव प्रथम का कार्यकाल 1720 से 1740 ई. तक था।  बालाजी बाजीराव 1740 ई. बाजीराव के मृत्यु के पश्चात पेशवा बने  तथा 1761 ई. तक पेशवा रहे। माधवराव का शासनकाल 1761 से 1772 ई. है। 1772 ई. में माधवराव की मृत्यु के पश्चात उसका भाई  नारायणराव अपने चाचा रघुनाथराव, जो पेशवा बनना चाहता था, के षड़यंत्रों का शिकार बन गया।



बालाजी बाजीराव के समय तक पेशवा पद पैतृक बन गया था। इससे पूर्व ही शक्ति क्षत्रपति के  हाथों मे केन्द्रित न रहकर पेशवा के हाथो में आ चुकी थी। 1750 ई. में होने वाली संगोला की संधि के अनुसार संवैधानिक क्रांति द्वारा यह प्रक्रिया पूरी हो गई। इसके पश्चात मराठा क्षत्रपति केवल नाममात्र के राजा रह गए और महलों के महापौर  बन गए। मराठा संगठन का वास्तविक नेता पेशवा बन गया।


मराठा काल में सरंजामी प्रथा भू-राजस्व प्रशासन से संबंधित थी। इस काल में मराठा जागीरदारों को सरंजामी भूमि उनके निर्वहन के लिए प्रदान की जाती थी।


जनवरी 1757 ई. में अहमदशाह अब्दाली दिल्ली में प्रवेश कर गया  और उसने मथुरा तथा आगरा तट लूटमार की।  अपनी वापसी से पहले अब्दाली भारत में आलमगीर द्वितीय को सम्राट, इमादुलमुल्क को वजीर और रुहेला सरदार नजीबुद्दौला (नजीब खान) को साम्राज्य का मीर बख्शी और अपना मुख्य एजेंट बना कर वापस चला गया।
पानीपत की तीसरी लड़ाई 14 जनवरी, 1761 को सदाशिव भाऊ के नेतृत्व में मराठा सेना और अहमदशाह अब्दाली के नेतृत्व मे अफगान सेना के बीच हुई। जिसमें मराठे बुरी तरह पराजित हुए। काशीराज पंडित इस युध्द के प्रत्याक्षदर्शी थे, उनके अनुसार, पानीपत का तीसरा युध्द मराठों के लिए प्रलयकारी सिध्द हुआ। इसी युध्द में मराठों की हार की सूचना बालाजी बाजीराव को एक व्यापारी द्वारा कूट संदेश के रुप में पहुंचाई गई, जिसमें कहा गया कि दो मोती विलीन हो गए बाईस सोने की मुहरें लुप्त हो गई और चांदी तथा तांबे के सिक्कों की तो पूरी गणना ही नही की जा सकती है। पानीपत की लड़ाई का तात्कालिक कारण यह था कि अहमद शाब अब्दाली अपने वायसराय तैमूर शाह के मराठों द्वारा लाहौर से निष्कासन का बदला लेना था।
अहिल्याबाई मराठों के होल्कर वंश की शासिका थी। होल्कर वंश इंदौर पर काबिज था।
शिवाजी जी के गुरु रामदास थे। इन्हें समर्थ रामदास कहा जाता है। इन्होने 12 वर्ष तक पूरे भारत का भ्रमण किया। इनकी महत्वपूर्ण रचना दासबोध में आध्यात्मिक जीवन के समन्वयवादी सिध्दांत का वर्णन मिलता है। शिवाजी एवं मराठा साम्राज्य के उत्थान में महाराष्ट्र के संतों का उल्लेखनीय योगदान रहा है।
सही कालानुक्रम –
सम्भाजी – (1680-1689) – (छत्रपति शिवाजी के ज्येष्ठ पुत्र)

राजाराम – (1689-1700) – (शिवाजी के द्वीतीय पुत्र)

शिवाजी-II- (1700-1708) – (राजाराम के पुत्र)

छत्रपति शाहूजी – (1708-1749) (शम्भाजी के पुत्र)

मोडी लिपि का प्रयोग मराठा विलेखों (प्रपत्रों) में किया जाता था।


मुगल साम्राज्य का विघटन

1707 ई. में औरंगजेब की मृत्यु के बाद उसके 63 वर्षीय पुत्र मुअज्जम (शाह आलम) ने बहादुर शाह (प्रथम) के नाम से सत्ता संभाली। उसने 1707-1712 ई. की अवधि मे शासन किया। खफी खां द्वारा इसे शाहे बेखबर की उपाधि दी गई थी।
जहांदार शाह मुगल राजवंश मे ऐसा प्रथम बादशाह था, जो शासन कार्य के नितांत अयोग्य सिध्द हुआ। उसने तत्कालीन शक्तिशाली अमीर जुल्फिकार खां की सहायता से गद्दी  प्राप्त की थी। वह एक युध्द में अपने भतीजे फर्रुखसियर द्वारा पराजित हुआ और 1713 ई. में उसकी हत्या कर दी गई। 1717 ई. में फर्रुखसियर ने एक फरमान जारी किया जिसमें अंग्रेजों को तीन हजार वार्षिक  कर देकर बंगाल मे  बिना अतिरिक्त  चुंगी दिए व्यापार करने के अधिकार की पुष्टि की गई।
शाहजहाँ द्वारा बनाए गए प्रसिध्द मयूर सिंहासन पर  बैठने वाला अंतिम मुगल शासक मुहम्मद शाह (1719-1748 ई.) था। इसके काल में ही नादिर शाह ने 1739 ई. में भारत पर आक्रमण किया और करनाल युध्द में मुगल सेना को पराजित किया था। समकालीन लेखक आनंद राम मुखलिस के अनुसार नादिरशाह अपने साथ साठ हजार रुपये, कई हजार अशर्फियां, एक करोड़ रुपये का सोना, पचास करोड़ के जवाहरात, कोहिनूर तथा तख्तेताउस (मयूर सिंहासन) भी ईरान ले गया।
मुहम्मद शाह (1719-48) अपना अधिकार समय पशु युध्दों को देखने में व्यतीत करता था। उसकी प्रशासन के प्रति उदासीनता तथा मदिरा और सुंदरी के प्रति रुचि के कारण लोग उसे रंगीला कहा करते थे। उसके शासनकाल मे मुगल दरबार में हिजड़ों तथा महिलाओं के एक वर्ग का प्रभुत्व स्थापित हो गया था।
शाह आलम द्वितीय का कार्यकाल 1759 से 1806 ई. तक था। उसका वास्तविक नाम अली  गौहर था। उसे वजीर गाजीउद्दीन ने दिल्ली में दाखिल नही होने दिया था। शाह आलम द्वीतीय के समय मे ही दिल्ली पर अंग्रेजों का अधिकार (1803 ई.) हो गया।
अंतिम मुगल सम्राट बहादुर शाह द्वितीय अथवा बहादुर शाह जफर (1837-57 ई.) के पिता का नाम अकबर द्वितीय (1806-1837 ई.) था। वह बिना साम्राज्य का सम्राट था। इब्राहिम जौक और असद उल्लाह खां  गालिब उसके  कविता के शिक्षक थे। हसन अस्करी उसके आध्यात्मिक निर्देशक थे। बहादुर शाह जफर को ईस्ट इंडिया कंपनी की ओर से प्रतिमाह 1 लाख रु. पेंशन 15 लाख रु. उनकी अन्य संपत्तियों के लिए किराए के तौर पर और एक हजार रु. पारिवारिक खर्च के तौर पर मिलते थे। 1862 ई. में उसकी मृत्यु हो गई थी।
हैदराबाद के स्वतंत्र राज्य की स्थापना 1724 ई. में चिनकिलिच खां उर्फ निजामुलमुल्क ने की थी। अक्टूबर, 1724 में शकूरखेड़ा के युध्द में दक्कन के मुगल गवर्नर मुबारिज खां के मारे जाने के बाद निजामुलमुल्क दक्कन का वास्तविक शासक बन गया था।
18वीं शताब्दी का सबसे श्रेष्ठ राजपूत राजा आमेर का सवाई जयसिंह था। उसने जयपुर शहर की स्थापना की तथा उस विज्ञान और कला का केन्द्र बनाया। जयसिंह एक महान खगोलशास्त्री भी था। उसने दिल्ली, जयपुर,  उज्जैन, बनारस और मथुरा में आधुनिक उपकरणों से युक्त पर्य़वेक्षण शालाएं बनवाई। लोगो को खगोलशास्त्र संबंधी पर्यवेक्षण में सहायता देने के लिए जयसिंह ने जिज मुहम्मदशाही नामक सारणियों का सेट तैयार किया था। उसने यूक्लिड की कृति रेखागणित के तत्व का संस्कृत में अनुवाद कराया था। जयसिंह ने अपने शासनकाल मे दो अश्वमेध यज्ञ कराए थे।











यूरोपीय कंपनियों का आगमन

वास्कोडिगामा गुजराती पथ-प्रदर्शक अब्दुल मजीद की सहायता से भारत के पश्चिमी तट पर स्थित बंदरगाह कालीकट पर 20 मई 1498 ई. को पहुंचा | उसने यहां पहुंचकर भारत के नए समुद्री मार्ग की खोज की | कालीकट के तत्कालीन शासक जमोरिन ने वास्कोडिगामा का स्वागत किया| वास्कोडिगामा के भारत आगमन से पुर्तगालियों एवं भारत के मध्य व्यापार के क्षेत्र में एक नए युग का शुभारंभ हुआ |वास्कोडिगामा ने काली मिर्च के व्यापार से 60 गुना अधिक मुनाफा कमाया, जिससे अन्य पुर्तगाली व्यापारियों को भी प्रोत्साहन मिला|
1505 ईस्वी में फ्रांसिस्को द अल्मीडा भारत में प्रथम पुर्तगाली वायसराय एवं गवर्नर बनकर आया। व्यापारिक हितों के परिप्रेक्ष्य में हिंद महासागर में प्रभुत्व स्थापित करने के लिए अल्मीडा ने ब्लू वाटर पॉलिसी (Blue Water Policy) नीति का प्रतिपादन किया | अल्मीडा के बाद अल्फांसो द अल्बुकर्क 1509 ई.में गवर्नर बनकर आया | उसने 1510 ई. में बीजापुरी शासक यूसूफ आदिलशाह से गोवा छीनकर अपने अधिकार में कर लिया | इसे भारत में पुर्तगीज शक्ति का वास्तविक संस्थापक माना जाता है |
अल्बूकर्क ने 1511 ई. में दक्षिण-पूर्वी एशिया की महत्वपूर्ण मंडी मलक्का एवं 1515 ई. में फारस की खाड़ी के मुहाने पर स्थित हरमुज पर अधिकार कर लिया | अल्बूकर्क के बाद प्रमुख गवर्नरों में से एक नीनो डी कुन्हा एक था। यह वर्ष 1529 से 1538 तक गवर्नर था | पुर्तगाली यात्री वास्कोडिगामा ने भारत के मार्ग की, स्पेनी यात्री कोलंबस ने अमेरिका की, ब्रिटेन के कैप्टन कुक ने ऑस्ट्रेलिया की तथा हॉलैंड के तस्मान ने वान डीमंस लैंड (वर्तमान तस्मानिया) तथा न्यूजीलैंड की खोज की थी |
पुर्तगालियों के भारत में प्रथम दुर्ग (भारत में यूरोपीय दुर्ग भी) का निर्माण अल्फांसो द अल्बुकर्क( इस समय वायसराय नहीं था) द्वारा 1503 ई. में कोचीन में कराया गया था | अञ्जीदीव एवं कन्नानोर में पुर्तगाली दुर्गों का निर्माण फ्रांसिस्को द अल्मीडा द्वारा 1505 ई. में कराया गया था| मध्यकाल में सर्वप्रथम भारत से व्यापार संबंध स्थापित करने वाले पुर्तगाली थे। भारत में यूरोपीय व्यापारिक कंपनियों के आगमन का क्रम है – पुर्तगीज , डच ,अंग्रेज डेन, फ्रांसीसी|
भारत में पुर्तगाली सबसे पहले 1498 ईस्वी में आए तथा सबसे अंत में 1961 ईस्वी वापस गए| 1961 में गोवा का पुर्तगाली गवर्नर जनरल मैनुएल एंटोनिओ वस्सालो ए सिल्वा (1958-1961) था |भारत के स्वतंत्रता प्राप्ति के दौरान गोवा का गवर्नर जनरल जोसे फेरेइरा बोसा था | यूरोपीय शक्तियों में सर्वप्रथम पुर्तगाली व्यापारियों में भारत में सामुदायिक व्यापारिक केंद्र स्थापित किए |पुर्तगालियोंने 1503 ईस्वी में कोचीन में पहली फैक्ट्री तथा 1505 ईसवी में कन्नूर में अपनी दूसरी फैक्ट्री स्थापित की ।
1534 ईस्वी में पुर्तगालियों ने बंगाल के शासक गियासुद्दीन महमूदशाह से सतगांव और चटगांव में अपनी फैक्ट्री स्थापित करने की अनुमति प्राप्त कर ली |पुर्तगालियों द्वारा हुगली को बंगाल की खाड़ी में समुद्री लूटपाट के लिए अड्डे के रूप में इस्तेमाल किया जाता था |1632 ईसवी में मुगल बादशाह शाहजहां ने हुगली में पुर्तगाली बस्तियों को पूरी तरह नष्ट कर दिया और 1000 से अधिक पुर्तगाली निवासियों को बंदी बना लिया।
कासिम बाजार की फैक्ट्री के प्रमुख जॉब चारनॉक ने अंग्रेजों के व्यापार केंद्र के लिए हुगली के स्थान पर सुतानूती अथवा सुतनौती (कलकत्ता का स्थल) को चुना और इस तरह 1690 ई. में उसने अंग्रेज बस्ती के रूप में कलकत्ता की स्थापना की |भारत के साथ व्यापार के लिए सर्वप्रथम संयुक्त पूंजी कंपनी डचो ने आरंभ की|
1602 ईस्वी मे डच (हालैंड) संसद द्वारा पारित प्रस्ताव से एक संयुक्त डच ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना हुई |इसकी कुल प्रारंभिक पूंजी 6500,000 गिल्डर थी। इस कंपनी को डच संसद द्वारा 21 वर्षों के लिए भारत और पूर्वी देशों के साथ व्यापार करने आक्रमण और विजय करने के संबंध में एकाधिकार दिया गया। इसका पूर्वी केंद्र बटेविया (वर्तमान जकार्ता) में स्थित था । डच पूर्वी साम्राज्य का संचालन एवं प्रशासन संयुक्त कंपनी के माध्यम से किया जाता था । इसके साझेदार एक निजी गुट के रूप में कार्य करते थे।
डचों ने पुर्तगालियों को पराजित कर आधुनिक कोच्चि में 1663 फोर्ट विलियम्स का निर्माण करवाया था। कोच्चि 1814 ईस्वी में ब्रिटिश उपनिवेश के तहत शामिल हुआ। 1599 ईस्वी में इंग्लैंड में एक मर्चेंट एडवेंचर्स नामक दल ने अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी अथवा ‘दि गर्वनर एंड कंपनी ऑफ मर्चेंट्स ट्रेडिंग इन टू द ईस्ट इंडीज ‘की स्थापना की। |
दिसंबर 1600 ईस्वी में ब्रिटेन की महारानी एलिजाबेथ ने इसे पूर्व के साथ व्यापार के लिए 15 वर्षों के लिए अधिकार पत्र प्रदान किया था | इस दौरान भारत का बादशाह अकबर (1556-1605 ईस्वी ) था |
लीवेंट कंपनी को 1593 में स्थल मार्ग से भारत में व्यापार करने का अधिकार प्राप्त हुआ था | जहांगीर के शासनकाल में इंग्लिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने सर्वप्रथम 1611 ईसवी में मसूलीपट्टनम अथवा मछलीपट्टनम में एक अस्थाई कारखाना स्थापित किया था |
वर्ष 1613 ईसवी में सूरत में स्थापित कारखाना अंग्रेजों का प्रथम स्थायी कारखाना था | सूरत में डचो द्वारा फैक्ट्री 1616 में, जबकि फ्रांसीसियों द्वारा 1668 ईसवी में स्थापित की गई थी। थॉमस बेस्ट नामक अंग्रेज अधिकारी ने पुर्तगालियों को स्वाल्ली के स्थान पर हराया था। 1661 ई. में इंग्लैंड के सम्राट चार्ल्स द्वितीय का विवाह पुर्तगाल की राजकुमारी कैथरीन से होने पर चार्ल्स को बंबई उपहार के रूप में प्राप्त हुआ था जिसे उन्होंने 1668 ईसवी में 10 पौंड वार्षिक किराए पर ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी को दे दिया था| बंबई के अंग्रेज गवर्नर जॉन चाइल्ड ने 1688 में बंबई और पश्चिमी समुद्र तट के मुगल बंदरगाहों का घेरा डाला तथा मक्का जानेवाले हज यात्रियों को बंदी बनाने का प्रयास किया | फलस्वरूप उसे औरंगजेब ने भारत से निष्कासित करने का आदेश दिया था |
कर्नाटक का प्रथम युद्ध (1746-48 ई.) ऑस्ट्रिया के उत्तराधिकार युद्ध जो 1740 ईसवी में आरंभ हुआ था का विस्तार मात्र था | गृह सरकारों की आज्ञा के विरुध्द ही दोनों दलों (अंग्रेज एवं फ्रांसीसी) में 1746 ईस्वी में युद्ध प्रारंभ हो गया। अंग्रेज कैप्टन बर्नेट के नेतृत्व में अंग्रेजी सेना द्वारा कुछ फ्रांसीसी जहाजों पर अधिकार कर लेना युद्ध का तत्कालिक कारण था |
प्रथम कर्नाटक युद्ध के समय ही कर्नाटक के नवाब अनवरुद्दीन ने महफूज खान के नेतृत्व में 10,000 भारतीय सेना को फ्रांसीसियों पर आक्रमण करने के लिए भेजा कैप्टन पैराडाइज के नेतृत्व में फ्रांसीसीसेना ने अडयार नदी पर स्थित सेंट थोमे नामक स्थान पर नवाब को पराजित किया यूरोप में युद्ध बंद होते ही कर्नाटक का प्रथम युद्ध समाप्त हो गया।

*     ए ला शापल की संधि (1748 ईस्वी ) से ऑस्ट्रिया के उत्तराधिकार का युद्ध समाप्त हो गया तथा मद्रास अंग्रेजों को पुनः प्राप्त हो गया।
*     डूप्ले ने पहली बार वे हथकंडे प्रयोग किए जो भारत को जीतने के लिए अंग्रेजों के मार्गदर्शक बने | यह डूप्ले ही था , जिसने पहली बार यूरोपीय हितो के लिए भारतीय राजनीति में हस्तक्षेप किया तथा भारत में यूरोपीय साम्राज्य की नींव रखी।
*     लुई चौदहवें के मंत्री कॉल्बर्ट द्वारा 1664 ईसवी में फ्रेंच ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना हुई ,जिसे ‘कंपनी देस इंदेस ओरियंटलेस’ कहा गया| फ्रांसीसी कंपनी का निर्माण राज्य द्वारा हुआ और राज्य इसका सारा खर्चा देता था। 1667 ईसवी में फ्रांसिस कैरो के नेतृत्व में एक अभियान दल भारत के लिए रवाना हुआ जिसने 1668 में सूरत में अपने पहले व्यापारिक कारखाने की स्थापना की| मर्कारा, गोलकुंडा के सुल्तान से एक अधिकार-पत्र प्राप्त कर ,1669 में मसूलीपट्टनम में दूसरी फ्रांसीसी कोठी स्थापित की गई |
*     डचो ने अपनी प्रथम फैक्ट्री की स्थापना मसूलीपट्टनम में की थी। डचों की बंगालमें पहली कंपनी पीपली में 1627  में स्थापित हुई |इसके कुछ ही दिनों बाद डच पीपली से बालासोर चले आए ,परंतु बंगाल में डचो का व्यापार सही ढंग से 1653 ई. में शुरू हुआ जब उन्होंने चिनसुरा में अपनी कंपनी स्थापित की। चिनसुरा के डच किले को गुस्तावुस फोर्ट के नाम से जानते थे। यूरोपवासियों को सर्वोत्तम शोरा और अफीम बिहार से प्राप्त होता था |अंग्रेजी शासनकाल में बिहार अफीम उत्पादन हेतु प्रसिद्ध था।

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