Indian Polity for All Competitive Exams (State Level) Part 1

भारत का संवैधानिक विकास
ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के अंतर्गत पारित अधिनियम (1773-1853)
ब्रिटिश ताज के अंतर्गत पारित अधिनियम (1858-1947)
कंपनी के अंतर्गत पारित अधिनियम
1773 का रेग्युलेटिंग एक्ट के द्वारा –
बंगाल के गवर्नर को बंगाल का गवर्नर जनरल पद का नाम दिया  गया एवं उसकी सहायता के लिए एक चार सदस्यीय कार्यकारी परिषद का गठन किया गया।
सपरिषद गवर्नर जनरल को बंगाल में फोर्ट विलियम की प्रेसिडेन्सी के सैनिक एवं असैनिक शासन का अधिकार दिया गया तथा कुछ विशेष मामलों में मद्रास और बम्बई की प्रेसिडेन्सियों का अधीक्षण भी करना था।
इसी एक्ट के तहत कलकत्ता में 1774 ई. में एक उच्चतम न्यायालय की स्थापना की गई, जिसमें मुख्य न्यायाधीश और तीन अन्य न्यायाधीश थे।
कंपनी के कर्मचारियों पर निजी व्यापार करने तथा भारतीयों से उपहार लेने पर प्रतिबंध था।
ब्रिटिश सरकार ने कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स (कंपनी की गवर्निंग बॉडी) के माध्यम से कंपनी पर नियंत्रण स्थापित किया।
पिट्स इंडिया एक्ट, 1784 द्वारा –
कंपनी के राजनीतिक और व्यापारिक कार्यों का पृथक्करण किया गया।
इस एक्ट में निदेशक मंडल को कंपनी के व्यापारिक मामलों के अधीक्षक की अनुमति तो दी गई, परंतु राजनैतिक मामलों के प्रबंधन के लिए नियंत्रण बोर्ड (Board of Control) का गठन किया गया।
1786 के अधिनियम के द्वारा –
गवर्नर जनरल को विशेष पारिस्थितियों में अपने परिषद के निर्णय को निरस्त करने अथवा लागू करने का अधिकार प्रदान किया गया।
गवर्नर जनरल को प्रधान सेनापति की शक्तियां भी प्रदान की गई। ये दोनों अधिकार सर्वप्रथम लॉर्ड कॉर्नवालिस ने प्राप्त किया।
1793 के चार्टर एक्ट के द्वारा –
कंपनी के अधिकारों को 20 वर्ष के लिए बढ़ा दिया गया।
1813 के चार्टर एक्ट द्वारा –
पहली बार भारतीयों की शिक्षा पर प्रति वर्ष 1 लाख रुपये खर्च करने का उपबंध किया गया।
कंपनी के भारतीय व्यापार के एकाधिकार को समाप्त कर दिया गया। यद्यपि चीन के साथ तथा चाय के व्यापार पर एकाधिकार बना रहा।
1833 के चार्टर एक्ट द्वारा –
बंगाल के गवर्नर जनरल को संपूर्ण भारत का गवर्नर जनरल बना दिया गया। देश की शासन प्रणाली का केद्रीकरण कर दिया गया।
लॉर्ड विलियम बैंटिक भारत के प्रथम गवर्नर जनरल थे।
कंपनी के समस्त व्यापारिक कार्य समाप्त कर दिए गए तथा भविष्य में उसे केवल राजनैतिक कार्य ही करने थे।
गवर्नर जनरल की परिषद में एक कानूनी सदस्य (चौथा सदस्य) को सम्मिलित किया गया।
सर्वप्रथम मैकाले को कानूनी सदस्य के रुप में शामिल किया गया।
इस एक्ट के तहत सपरिषद गवर्नर जनरल को पूरे भारत के लिए कानून बनाने का अधिकार प्रदान किया गया था।
इसी एक्ट में नियुक्तियों के लिए योग्यता संबंधी मानदंड अपनाकर भेदभाव को समाप्त किया गया।
1853 के चार्टर द्वारा –
विधायी शक्तियों को कार्यपालिका शक्तियों से पृथक करने की व्यवस्था की गई।
विधि निर्माण हेतु भारतीय (केन्द्रीय) विधान परिषद की स्थापना की गई।
सिविल सेवकों की भर्ती एवं चयन हेतु खुली प्रतियोगिता का शुभारंभ किया गया।
1773 के रेग्युलेटिंग एक्ट में कलकत्ता में सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना का प्रावधान किया गया था। सर एलिजा इम्पे इसके प्रथम मुख्य न्यायाधीश थे।
नियामक अधिनियम (Regulatin Act) 1773 – सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) की स्थापना से संबंधित है।
पिट्स का भारतीय अधिनियम, 1784 – नियंत्रण परिषद की स्थापना से संबंधित है।
चार्टर अधिनियम, 1813 – इंग्लिश मिशनरियों को भारत मे कार्य करने की अनुमति से संबंधित है।
चार्टर अधिनियम, 1833 –  गवर्नर जनरल-परिषद मे कानूनी सदस्य की नियुक्ति से संबंधित है।
चार्टर एक्ट, 1833 की धाराओं में सबसे महत्वपूर्ण धारा संख्या 87 थी, जिसमें यह कहा गया था कि “किसी भी भारतीय अथवा क्राउन की देशज प्रजा को अपने धर्म, जन्म स्थान, वंशानुक्रम, वर्ग अथवा इनमें से किसी एक कारणवश कंपनी के अधीन किसी स्थान, पद अथवा सेवा के अयोग्य नही माना जा सकेगा” कालांतर में राजनैतिक आंदोलन में 1833 एक्ट की यह धारा प्रशासन में भागीदारी हेतु मुख्य आधार बनी।


ब्रिटिश ताज के शासनाधीन पारित अधिनियम
भारत शासन अधिनियम, 1858 के द्वारा –
भारत का शासन ब्रिटिश महारानी विक्टोरिया के अधीन कर दिया गया।
गवर्नर जनरल के पदनाम को बदलकर भारत का वायसराय कर दिया गया, जो ब्रिटिश ताज का प्रत्यक्ष प्रतिनिधि बन गया।
लॉर्ड कैनिंग भारत के प्रथम वायसराय बने।
नियंत्रण बोर्ड और निदेशक बोर्ड को समाप्त कर दिया गया।
इस अधिनियम द्वारा “भारत के राज्य सचिव पद” का सृजन किया गया, जिसमें भारतीय प्रशासन पर संपूर्ण नियंत्रण की शक्ति निहित थी।
भारत परिषद अधिनियम, 1861 द्वारा –
कानून बनाने की प्रक्रिया में भारतीय प्रतिनिधियों को शामिल करने की शुरुआत हुई।
अधिनियम द्वारा मद्रास एवं बंबई प्रेसीडेंसियों को पुनः विधायी शक्तियां देकर विकेन्द्रीकरण की प्रक्रिया की शुरुआत की गई।
इसने वायसराय को आपातकाल में परिषद की संस्तुति के बिना अध्यादेश जारी करने के लिए अधिकृत किया।


भारत परिषद अधिनियम, 1892 के माध्यम से –
केन्द्रीय और प्रांतीय विधान परिषदों में अतिरिक्त (गैर-सरकारी) सदस्यों की संख्या बढ़ा दी गई।
केन्द्रीय विधान परिषद के भारतीय सदस्यों को वार्षिक बजट पर बहस करने तथा सरकार से प्रश्न पूछने का अधिकार भी दिया गया।
निर्वाचन पध्दति का आरंभ किया जाना इस अधिनियम की महत्वपूर्ण विशेषता थी।
भारत परिषद अधिनियम, 1909 को मार्ले-मिंटो सुधार के नाम से भी जानते हैं।
इस अधिनियम द्वारा भारतीयों को विधि निर्माण तथा प्रशासन दोनों में प्रतिनिधित्व प्रदान किया गया।
इस अधिनियम ने केन्द्रीय तथा प्रांतीय विधायिनी शक्ति को बढ़ा दिया।
परिषद के सदस्यों को बजट की विवेचना करने तथा उस पर प्रश्न करने का अधिकार दिया गयाथ।
पृथक निर्वाचन के आधार पर मुस्लिमो के लिए सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व का प्रावधान किया गया था।
भारत शासन अधिनियम, 1919 को मांटेग्यू चेम्सफोर्ड सुधार के नाम से जाना जाता है।
इस अधिनियम द्वारा पहली बार प्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली अपनाई गई।
सांप्रदायिक आधार पर निर्वाचन प्रणाली का विस्तार करते हुए इसमें सिक्खो, ईसाइयों, आंग्ल-भारतीयों तथा यूरोपीय पर भी लागू कर दिया गया।
इस अधिनियम द्वारा पहली बार केन्द्र मे द्ववीसदनीय व्यवस्था स्थापिक की गई।
इस अधिनियम द्वारा सभी विषयों को केन्द्र तथा प्रांतों में  बांट दिया गया।
द्वीसदनीय केन्द्रीय विधानमंडल समस्त ब्रिटिश भारत के लिए कानून बना सकती थी। इस अधिनियम के तहत प्रांतो में द्वैध शासन प्रणाली लागू की गई।
प्रांतीय विषयों को दो भागों – आरक्षित तथा हस्तांतरित विषयों में  बांटा गया।
इस अधिनियम में पहली बार उत्तरदायी शासन शब्द का प्रयोग किया गया। इसके अंतर्गत एक आयोग का गठन किया जाना था, जिसका कार्य दस वर्ष बाद इस अधिनियम की समीक्षा करने के बाद अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करना था।
भारत शासन अधिनियम, 1935 द्वारा –
सर्वप्रथम भारत में संघात्मक सरकार की स्थापना की गई।
इस अधिनियम द्वारा प्रांतो में द्वैध शासन समाप्त करके केन्द्र मे द्वैध शासन प्रणाली लागू की गई।
भारत मुद्रा एवं साख पर नियंत्रण के लिए भारतीय रिजर्व बैंक की स्थापना की गई।
सांप्रदायिक निर्वाचन प्रणाली का विस्तार करते हुए दलित जातियों, महिलाओं और मजदूरों को इसमें सम्मिलित किया गया।
इसी अधिनियम के तहत वर्ष 1937 में संघीय न्यायालय की स्थापना की गई।
इस अधिनियम द्वारा बर्मा को ब्रिटिश भारत से अलग कर दिया गया तथा दो नए प्रांत सिंध और उड़ीसा का निर्माण हुआ।
इसके तहत कुछ प्रांतों मे द्वीसदनात्मक व्यवस्था की गई।
भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 ने 15 अगस्त, 1947 को भारत को स्वतंत्र एवं संप्रभु राष्ट्र घोषित किया।
इसने वायसराय का पद समाप्त कर दोनों डोमिनयन राज्यों में गवर्नर-जनरल का पद सृजित किया।
इसके अंतर्गत शाही उपाधि से भारत का सम्राट शब्द समाप्त कर दिया।
1892 के भारतीय परिषद अधिनियम ने विधान परिषद के कार्यों में वृध्दि की। इसके तहत बजट पर बहस करने की शक्ति दी गई परंतु मतदान का अधिकार नही था। इस अधिनियम के तहत कार्यपालिका से प्रश्न पूछने की अनुमति दी गई।


भारत में संघीय न्यायालय की स्थापना 1 अक्टूबर, 1937 को भारत सरकार अधिनियम, 1935 के अंतर्गत की गई थी। इसके प्रथम मुख्य न्यायाधीश सर मौरिस ग्वेयर थे।
1919 के भारत सरकार अधिनियम द्वारा केन्द्र में द्वीसदनीय विधानपालिका की स्थापना की गई। ऊपरी सदन, राज्य परिषद (Council of State) कहलाता था, जो 5 वर्ष के लिए होता था और उसके 60 सदस्यों मे से 34 निर्वाचित तथा 26 मनोनीत होते थे। निचला सदन केन्द्रीनय विधानसभा (Central Legistaltive Assembly) कहलात था, जो 3 वर्ष  के लिए होता था और उसके 144 सदस्यों मे से 104 निर्वाचित तथा 40 मनोनीत होते थे।
यद्यपि ब्रिटिश भारत में गवर्नर जनरल को 1861 के भारत परिषद अधिनियम से ही विधान परिषद की अनुमति के बिना अध्यादेश जारी करने की शक्ति थी तथापि भारतीय संविधान में राष्ट्रपति की अध्यादेश निर्गत करने की शक्ति (अनु. 123) भारत सरकार अधिनियम, 1935 की धारा 42 से प्रेरित है।
संवैधानिक निरंकुशता का सिध्दांत, भारत सरकार अधिनियम, 1935 द्वारा प्रवृत्त किया गया। यह अधिनियम ब्रिटिश संसद द्वारा सर्वाधिक विस्तृत अधिनियम था। साथ ही यह भारत के लिए तैयार संवैधानिक प्रस्तावों में से सबसे जटिल दस्तावेज था। इसी अधिनियम में भारत संघ की स्थापना, संघीय न्यायपालिका, केन्द्र और राज्यों के मध्य शक्तियों का विभाजन आदि की व्यवस्था की गई थी।
ब्रिटिश शासनकाल के दौरान 1935 का भारत शासन अधिनियम पारित किया गया जिसमें केन्द्र और राज्यों के बीच शक्तियों का बंटवारा किया गया था तथा राज्य में द्वैध शासन समाप्त कर केन्द्र में द्वैध शासन लागू किया गया था। इसमें एक अखिल भारतीय महासंघ स्थापित करने का प्रावधान शामिल किया गया था। इस संघ का निर्माण तत्कालीन ब्रिटिश भारत के प्रांतो, चीफ कमिश्नर प्रांतों एवं देशी रिसायतों से मिलाकर होना था, परंतु यह व्यवस्था लागू नही की जा सकी। 1935 के भारत सरकार अधिनियम द्वारा स्थापित होने वाले संघ में अवशिष्ट शक्तियाँ गवर्नर जनरल को प्रदान की गई थी।
भारत के लिए संविधान का सर्वप्रथम उल्लेख क्रिप्स मिशन में किया गया था।
भारत का वर्तमान संवैधानिक ढांचा बहुत कुछ 1935 के अधिनियम पर आधारित है। 1935 के मुख्य उपबंध इस प्रकार हैं –
संघात्मक सरकार की स्थापना
केन्द्र मे द्वैध शासन की स्थापना
प्रांतो में द्वैध शासन के स्थान पर स्वायत्त शासन की स्थापना
द्वीसदनीय केन्द्रीय विधानमंडल
प्रांतीय शासन की व्यवस्था
प्रांतीय विधानमंडल
केन्द्र एवं प्रांतों में शक्तियों का विभाजन
फेडरल न्यायालय की स्थापना
गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट, 1935 के प्रावधानों के अनुरुप वर्ष 1937 में बर्मा को भारत से अलग किया गया था।


संविधान सभा एवं संविधान निर्माण प्रक्रिया
भारतीयों की ओर से संविधान सभा की सर्वप्रथम मांग मई, 1934 में रांची में गठित स्वराज पार्टी ने की थी। वर्ष 1934 में ही भारत में संविधान सभा के गठन का विचार एम.एन.राय ने दिया।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के स्तर पर पहली बार वर्ष 1935 में संविधान निर्माण के लिए आधिकारिक रुप से संविधान सभा की मांग की गई।
एक निर्वाचित संविधान सभा द्वारा भारत के संविधान का निर्माण करने का प्रस्ताव सर्वप्रथम वर्ष 1942 में क्रिप्स मिशन द्वारा किया गया था।
कैबिनेट मिशन योजना, 1946 द्वारा –
भारतीय संविधान सभा का प्रतिनिधित्व निर्वाचन के आधार पर गठन किया गया था।
कैबिनेट मिशन की रिपोर्ट के अनुसार, संविधान सभा निर्वाचित होनी थी और प्रांतों का प्रतिनिधित्व जनसंख्या के आधार पर होना था।
इसके तहत मोटे तौर पर प्रति दस लाख व्यक्तियों पर एक प्रतिनिधि के निर्वाचन की व्यवस्था प्रस्तावित थी।
संविधान सभा की कुल सदस्य संख्या 389 निर्धारित थी। इनमें से 296 सीटें ब्रिटिश भारत को तथा 93 सींटे देशी रियासतों को आवंटित की जानी थी।
ब्रिटिश भारत को आवंटित 296 सीटो में से 292 सदस्यों का चयन 11 गवर्नरों के प्रांतों और 4 का चयन मुख्य आयुक्तों के प्रांतों (प्रत्येक में से एक) से किया जाना था।
देशी रियासतों के प्रतिनिधित्व का चयन रियासतों के प्रमुखों द्वारा किया जाना था।
संविधान सभा के लिए चुनाव जुलाई-अगस्त, 1946 में संपन्न हुआ।
296 सीटों (ब्रिटिश भारत को आवंटित) में से कांग्रेस को 208, मुस्लिम लीग को 73 तथा छोटे समूह व स्वतंत्र सदस्यों को 15 सीटें मिली।
देशी रियासतों ने संविधान सभा में भाग नहीं लिया। संविधान सभा अप्रत्यक्ष निर्वाचन का परिणाम थी।
राज्यों की विधानसभाओं का उपयोग निर्वाचक मंडल के रुप मे किया गया। यह निर्वचान वयस्क मताधिकार पर आधारित था।


1935 के अधिनियम के अनुसार –
मताधिकार कर, शिक्षा एवं संपत्ति के आधार पर सीमित था।
20 नवंबर, 1946 को वायसराय ने निर्वाचित प्रतिनिधियों को आमंत्रित किया कि वे 9 दिसंबर, 1946 को संविधान सभा की पहली बैठक में उपस्थित हो।
9 दिसंबर, 1946 को सभा की पहली बैठक में कुल 207 सदस्यों ने हिस्सा लिया।
9 दिसंबर, 1946 को संविधान सभा की प्रथम बैठक की अध्यक्षता अस्थायी डॉ. सच्चिदानन्द सिन्हा ने की थी।
11 दिसंबर, 1946 को संविधान सभा ने डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को निर्विरोध संविधान सभा के स्थायी अध्यक्ष के रुप में निर्वाचित किया।
भारतीय संविधान के निर्माण में संविधान सभा को 2 वर्ष 11 माह एवं 18 दिन का समय लगा था।
इसके लिए कुल 11 अधिवेशन (कुल अवधि 165 दिन) हुए थे।
इन 11 अधिवेशनों के अतिरिक्त संविधान सभा पुनः 24 जनवरी, 1950 को समवेत हुई, जब सदस्यों द्वारा भारत के संविधान पर हस्ताक्षर किए गए थे।
भारतीय संविधान के निर्माण के समय बेनेगल नरसिंह राव (बी.एन.राव) को सांविधानिक सलाहकार नियुक्त किया गया था।
26 नवंबर, 1949 को भारत के लोगों द्वारा संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित किया गया।
संविधान पूर्ण रुप से 26 जनवरी, 1950 को लागू हुआ।
संविधान सभा में कुल महिलाओं की संख्या 15 थी। उनके नाम इस प्रकार हैं –
विजयलक्ष्मी पंडित
राजकुमारी अमृत कौर
सरोजिनी नायडू
सुचेता कृपलानी
पूर्णिमा बनर्जी
लीला राय
जी. दुर्गाबाई
हंसा मेहता
कमला चौधरी
रेणुका राय
मालती चौधरी
दक्षयानी
वेलायुदन
बेगम एजाज रसूल
ऐनी मस्करीनी
अम्मु स्वामीनाथन
ग्रेनविले ऑस्टिन ने कहा था कि संविधान सभा कांग्रेस थी और कांग्रेस भारत।
2 सितंबर, 1946 को अंतरिम सरकार का गठन किया गया इसमें मुस्लिम लीग के सदस्य शामिल नही हुए हालांकि उनके शामिल होने के लिए विकल्प खुला रखा गया था। अंतत 26 अक्टूबर, 1946 को जब सरकार का पुनर्गठन किया गया तब मुस्लिम लीग के पांच प्रतिनिधियों को कैबिनेट में शामिल किया गया।


प्रथम अंतरिम कैबिनेट – 1946
विभाग
प्रभारी का नाम
उप सभापति, विदेश एवं राष्ट्रमंडल संबंध
जवाहर लाल नेहरु
गृह, सूचना एवं ब्राडकॉस्टिंग
सरदार वल्लभ भाई पटेल
कृषि एवं खाद्य
राजेन्द्र प्रसाद
कला, शिक्षा एवं स्वास्थ्य
शफात अहमद खान
वाणिज्य
सी.एच.भाभा
रक्षा
बलदेव सिंह
वित्त
जान मथाई
उद्योग एवं आपूर्ति
सी. राजगोपालचारी
श्रम
जगजीवन राम
रेलवे, संचार, डाक एवं वायु परिवहन
आसफ अली
कारखाना, खान एवं विद्युत
शरत चन्द्र बोस


पुनर्गठित अंतरिम कैबिनेट – 1946
विभाग
प्रभारी का नाम
उप सभापति, विदेश मामले एवं राष्ट्रमंडल संबंध
जवाहर लाल नेहरु
कृषि एवं खाद्य
राजेन्द्र प्रसाद
वाणिज्य
इब्राहिम इस्माइल चुंदरीगर
रक्षा
बलदेव सिंह
वित्त
लियाकल अली खान
गृह, सूचना एवं ब्राडकास्टिंग
वल्लभ भाई पटेल
श्रम
जगजीवन राम
रेलवे, संचार, डाक एवं वायु परिवहन कारखाना, खान एवं विद्युत
अब्दुल रब निश्तर


एक निर्वाचित संविधान सभा द्वारा भारत के संविधान का निर्माण करने (द्वितीय विश्व युध्द के समाप्त होने के पश्चात) का प्रस्ताव सर्वप्रथम क्रिप्स मिशन (1942) द्वारा किया गया था।
कैबिनेट मिशन वर्ष 1946 में भारत आया था। मिशन ने अपनी रिपोर्ट में संविधान सभा के गठन का सूत्र प्रस्तुत किया था जिसके आधार पर संविधान सभा निर्वाचित होनी थी और प्रांतों का प्रतिनिधित्व जनसंख्या के आधार पर होना था। इसके तहत मोटे तौर पर प्रति दस लाख व्यक्तियों के ऊपर एक प्रतिनिधि के निर्वाचन की व्यवस्था प्रस्तावित थी।
कैबिनेट मिशन मार्च, 1946 में भारत पहुंचा। इस मिशन के सदस्य स्टैफोर्ड क्रिप्स (अध्यक्ष बोर्ड ऑफ ट्रेड), पेथिक लॉरेंस (भारत सचिव) और ए.बी. अलेक्जेंडर (नौसेना मंत्री) थे।
24 अगस्त, 1946 को अंतरिम राष्ट्रीय सरकार की घोषणा इस व्यवस्था के साथ की गई कि अंतरिम सरकार 2 सितंबर, 1946 को कार्यभार संभालेगी। वायसराय इसमें कार्यपालिका परिषद का पदेन अध्यक्ष था तथा जवाहरलाल नेहरु को उपाध्यक्ष या उपसभापति बनाया गया।
अक्टूबर, 1943 में लॉर्ड लिनलिथगो के स्थान पर बिस्काउंट वेवेल वायसराय तथा गवर्नर जनरल नियुक्त किए गए। वे भारतीय सांविधानिक गतिरोध को दूर करने के उद्देश्य से मई, 1945 में लंदन गए। वहां उन्होंने भारतीय प्रशासन के संबंध में ब्रिटिश सरकार से विस्तार से बात की तथा कुछ प्रस्ताव रखे। जून, 1945 में उन प्रस्तावों को वेवेल योजना के नाम से सार्वजनिक सदस्यों की संख्या हिन्दुओं के  बराबर होना, परिषद में वायसराय तथा कमांडर इन चीफ को  छोड़कर सभी सदस्यों का भारतीय होना, शीघ्र ही शिमला में एक सम्मेलन का बुलाया जाना तथा युध्द समाप्ति के पश्चात भारतीयों के द्वारा खुद का  संविधान बनाया जाना इत्यादि प्रावधान शामिल थे।
वेवेल योजना का उद्देश्य राजनीतिक गतिरोध दूर करना, भारत को पूर्ण स्वशासन की दिशा में आगे बढ़ाना और सांविधानिक गतिरोध दूर करना था। इसका उद्देश्य कही से भी हिंदु-मुस्लिम एकता को दृढ़ करना नही था, जिससे भारत का विभाजन रुक सके।
मई, 1934 में रांची में गठित स्वराज पार्टी ने आत्मनिर्णय के अधिकार की मांग की और एक प्रस्ताव पारित किया जिसमे कहा गया कि वयस्क मताधिकार के आधार पर निर्वाचित भारतीय प्रतिनिधियों की एक संविधान सभा होगी, जो संविधान का निर्माण करेगी। भारतीयों की ओर से संविधान सभा की मांग करने का यह प्रथम अवसर था।
संविधान सभा के सदस्यों का निर्वाचन प्रांतीय विधानसभाओं के सदस्यों द्वारा अप्रत्यक्ष निर्वाचन के द्वारा हुआ था।
भारतीय संविधान सभा की स्थापना 9 दिसंबर, 1946 को उसकी प्रथम बैठक के आरंभ होने के साथ हुई थी।
22 जनवरी, 1947 को संविधान सभा द्वारा भारत को एक संविधान देने का उद्देश्य प्रस्ताव पारित किया गया। उद्देश्य प्रस्ताव को 13 दिसंबर, 1946 को संविधान सभा में जवाहर लाल नेहरु द्वारा पेश किया गया था। आगे चल कर यही उद्देश्य प्रस्ताव का प्रारुप बना।


संविधान सभा के पहले उपाध्यक्ष
एच.सी. मुखर्जी
प्रारुप समिति के मूलतः एकमात्र कांग्रेसी सदस्य
के.एम. मुंशी
राजस्थान की रियासतों का प्रतिनिधित्व करने वाले संविधान सभा के सदस्य
वी.टी. कृष्णमाचारी
संघ-संविधान समिति के अध्यक्ष
जवाहरलाल नेहरु

भारतीय संविधान के निर्माण के समय बेनेगल नरसिंह राव (बी.एन.राव) को सांविधानिक सलाहकार नियुक्त किया गया था।
संविधान सभा के सांविधानिक सलाहकार बी.एन. राव द्वारा संविधान का पहला प्रारुप तैयार किया गया था जिस पर विचार एवं परिर्वतन करके प्रारुप समिति का संविधान सभा के समक्ष संविधान का मसौदा प्रस्तुत किया गया। बी.एन. राव के मूल  प्रारुप में 243 अनुच्छेद और 13 अनुसूचियाँ थी।
संविधान सभा में भारतीय संविधान का तृतीय वाचन 17 नवंबर, 1949 से प्रारंभ हुआ और 26 नवंबर, 1949 तक चला।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन (दिसंबर, 1929) में पूर्ण स्वराज्य की घोषणा की गई तथा 26 जनवरी को स्वतंत्रता दिवस के रुप में मनाए जाने का संकल्प लिया गया और आजादी के पूर्व तक 26 जनवरी को स्वतंत्रता दिवस के रुप में मनाया जाता रहा। परंतु भारत 15 अगस्त, 1947 को स्वतंत्र हो गया और तब से प्रत्येक वर्ष 15 अगस्त को स्वाधीनता  दिवस के रुप में मनाया जाने लगा। जबकि स्वतंत्रता प्राप्त कि पश्चात 26 जनवरी की तिथि को अविस्मरणीय बनाने हेतु भारतीय संविधान को पूर्णतः 26 जनवरी, 1950 को लागू किया गया और तब से प्रत्येक वर्ष 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस के रुप में मनाया जाने लगा।
संविधान सभा के गयारहवें अधिवेशन में 26 नवंबर, 1949 को भारतीय संविधान, संविधान सभा द्वारा अपनाया गया।
वर्ष 1946 में संपन्न संविधान सभा के प्रारंभिक चुनाव में डॉ. भीमराव अम्बेडकर अविभाजित भारत के बंगाल प्रांत के पूर्वी भाग से निर्वाचित हुए थे। बाद में यह क्षेत्र पाकिस्तान मे चले जाने के कारण डॉ. अम्बेडकर भारतीय गणराज्य के बंबई प्रेसीडेंसी के पूना संसदीय क्षेत्र से उपचुनाव में निर्वाचित होकर भारतीय संविधान सभा में सम्मिलित हुए। पूना सीट उनके लिए कांग्रेस के एम. आर. जयकर ने त्यागपत्र देकर रिक्त की थी।
नवंबर-दिसंबर, 1932 में लंदन मे आयोजित तीसरे और अंतिम गोलमेज सम्मेलन में कांग्रेस ने भाग नहीं लिया था। इस सम्मेलन में भारत सरकार अधिनियम, 1935 के लिए एक ठोस योजना को अंतिम रुप में पेश किया गया था। इसमे ब्रिटिश भारत के सूबों और भारतीय रियासतों के एक संघ पर आधारित आल इंडिया फेडरेशन के गठन का प्रावधान किया गया था।
भारत का संविधान देश की आवश्यकताओं की पूर्ति करने में पूर्णतः सक्षम है। तथा भावी आवश्यकताओं के मद्देनजर इसमें संशोधन संबंधी प्रावधान भी हैं। दूसरे ओर इसमें विभिन्न देशों के संविधानों से तथ्य एवं विचार ग्रहण किए गए हैं, अतः इसे एक गृहीत संविधान भी कहा जाता है।
संविधान सभा में वयस्क मताधिकार विषय पर बहस के दौरान मौलाना अबुल कलाम आजाद ने वयस्क मताधिकार को 15 वर्षों के लिए स्थगित करने की वकालत की थी, किंतु डॉ. राजेन्द्र प्रसाद एवं पं. जवाहर लाल नेहरु ने जोरदार ढंग से इसे अपनाने के लिए इसका समर्थन किया था।
भारत की स्वतंत्रता के उपरांत महात्मा गांधी ने यह सुझाव दिया था कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को अब एक राजनैतिक दल के रुप में भंग कर दिया जाना चाहिए।
अपनी राष्ट्रवादी प्रतिक्रिया में भारतीय संविधान के निर्माताओं अल्पसंख्यकों के हितों तथा भावनाओं के महत्व को कम करके आंका है – यह कथन आइवर जोनिंग्स (Ivor Jennings) का है। उनका मानना था कि भारतीय संविधान निर्माताओं ने भारतीय संघ में अल्पसंख्यक हितों और भावनाओं के महत्व को न्यूनतम रखने का प्रयास किया है।
“संविधान सभा कांग्रेस थी और कांग्रेस भारत था” यह वक्तव्य पद्मश्री पुरस्कार प्राप्त इतिहासकार ग्रैनविले ऑस्टिन का था। यह वक्तव्य उनकी पुस्तक द इंडियन कांस्टीट्यूशन (The Indian Constitution) में वर्णित है।
भारतीय संविधान सभा में कुल महिलाओं की संख्या 15 थी।


संविधान सभा की प्रमुख समितियां
संविधान सभा द्वारा अपने विभिन्न कार्यों को संपादित करने के लिए अनेक समितियों का गठन किया गया था।
प्रमुख समितियां एवं उनके अध्यक्ष का विवरण इस प्रकार है –
समिति
अध्यक्ष
संघ संविधान समिति
जवाहर लाल नेहरु
नियम समिति
डॉ. राजेन्द्र प्रसाद
संचालन समिति
डॉ. राजेन्द्र प्रसाद
प्रारुप समिति
डॉ. भीमराव अम्बेडकर
1.  मूल अधिकार उपसमिति
जे.बी. कृपलानी
2.  अल्पसंख्यक उपसमिति
एच.सी. मुखर्जी
संघ शक्ति समिति
जवाहरलाल नेहरु
प्रांतीय संविधान समिति
सरदार वल्लभभाई पटेल
सलाहकार समिति
सरदार बल्लभभाई पटेल

प्रारुप समिति में अध्यक्ष भीमराव अम्बेडकर समेत कुल 7 सदस्य थे।
जिनमें एन. गोपालस्वामी आयंगर, अल्लादि कृष्णास्वामी अय्यर, के.एम. मुंशी, मोहम्मद सादुल्लाह, बी.एल. मित्र एवं डी.पी. खेतान शामिल थे।
बाद में इनमें बी.एल. मित्र के स्थान पर एन. माधव राव तथ डी.पी. खेतान की वर्ष 1948 में मृत्यु हो जाने पर टी.टी. कृष्णामाचारी को इस समिति में शामिल किया गया। तदर्थ झंडा समिति का गठन संविधान निर्मात्री परिषद 23 जून, 1947 को किया था जिसके अध्यक्ष डॉ. राजेन्द्र प्रसाद थे तथा अन्य सदस्य थे – अबुल कलाम आजाद, सरोजिनी नायडू, सी. राजगोपालचारी, के.एम. मुंशी एवं डॉ. बी.आर. अम्बेडकर।
संविधान के प्रारुप पर विचार करने हेतु संविधान सभा द्वारा 29 अगस्त, 1947 को संकल्प पारित करके डॉ. बी.आर. अम्बेडकर की अध्यक्षता में प्रारुप समिति का गठन किया गया था।