Indian Polity for All Competitive Exams (State Level) Part 2

संविधान का स्रोत
भारतीय संविधान का अधिकांश भाग भारत शासन अधिनियम, 1935 से लिया गया है।
ब्रिटेन के संविधान द्वारा संसदीय शासन पध्दति, विधि का शासन, मंत्रिमंडलीय प्रणाली, एकल नागरिकता, द्विसदनीय प्रणाली, विधायी प्रक्रिया और संसदीय विशेषाधिकार, परमाधिकार लेख आदि उपबंध लिए गए हैं।
अमेरिकी संविधान से उद्देशिका का विचार, न्यायिक पुनर्विलोकन, न्यायपालिका की स्वतंत्रता, मूल अधिकार, उपराष्ट्रपति का पद, राष्ट्रपति पर महाभियोग और उच्चतम न्यायालय तथा उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को हटाए जाने के उपबंध ग्रहण किए जाने हैं।
आयरलैंड के संविधान से प्रेरणा लेकर नीति-निदेशक तत्व, राष्ट्रपति की निर्वाचन पध्दति, राज्य सभा में कुछ सदस्यों का नामांकन सम्मिलित किए गए हैं।
कनाडा के संविधान से सशक्त केन्द्र के साथ संघीय व्यवस्था, केन्द्र द्वारा राज्यपालों की नियुक्ति, उच्चतम न्यायालय का परामर्शी न्याय निर्णयन अवशिष्ट शक्तियों का केन्द्र में निहित होना आदि ग्रहण की गई हैं।
संसद के दोनों सदनों की बैठक, उद्देशिका की भाषा, व्यापार-वाणिज्य और समागम की स्वतंत्रता तथा समवर्ती सूची की व्यवस्था ऑस्ट्रेलिया के संविधान से ग्रहण की गई है।
जर्मनी के संविधान से आपातकालीन उपबंध का (वित्तीय आपात को छोड़कर) प्रावधान किया गया है।
जापान से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया तथा दक्षिण अफ्रीका के संविधान से संविधान संशोधन की व्यवस्था तथा राज्यसभा के सदस्यों का निर्वाचन ग्रहण किया गया।
मूल कर्तव्य तथा प्रस्तावना में न्याय (सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक) के आदर्श को सोवियत संघ के संविधान से लिया गया है।
भारतीय राजनीतिक व्यवस्था में संविधान सर्वोच्च है। यही राजव्यवस्था के स्वरुप और उद्देश्य का निर्धारण करता है एवं विभिन्न इकाइयों के सृजन का प्रावनधान करता है। संविधान से ही शासन के सभी अंग अधिकार एवं शक्ति प्राप्त करते हैं।
भारत में न्यायिक पुनरीक्षण की संकल्पना संयुक्त राज्य अमेरिका के संविधान से ली गई है। इसका आशय है कि सर्वोच्च न्यायालय विधानों एवं आदेशों न्यायिक पुनर्विलोकन कर सकता है तथा उन विधानों एवं आदेशों को शून्य घोषित कर सकता है, जो संविधान के प्रावधानों का उल्लंघन करता है।
भारतीय संविधान में राज्यों का संघ की संकल्पना ब्रिटिश नॉर्थ अमेरिका एक्ट (कनाडा) से प्रेरित हैं। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 1(1) के अनुसार भारत राज्यों का संघ है।
भारतीय संसदीय प्रणाली में न्यायिक पुनर्विलोकन की प्रणाली है, जबकि ब्रिटेन में यह प्रणाली नही लागू है। इस अर्थ में भारतीय संसदीय प्रणाली ब्रिटेन से भिन्न है। इसके अतिरिक्त वास्तविक एवं नाममात्र की कार्यपालिका, सामूहिक उत्तरदायित्व तथा द्विसदनीय विधायिका भारत एवं ब्रिटेन दोनों की संसदीय प्रणालियों में लागू हैं।
अमेरिका के संविधान में संघीय प्रणाली का स्पष्ट उल्लेख है। भारत के संविधान में भारत को राज्यो का संघ बताया गया है, किंतु संविधान के कतिपय प्रावधान राज्यों की अपेक्षा केन्द्र को ज्यादा शक्तिशाली बनाने पर जोर देते हैं। इससे कुछ विद्वान भारत के संविधान को संघात्मक एवं प्रणालियों का मिश्रण मानते हैं, किंतु भारतीय संविधान एकात्मक प्रणाली का लक्षण लिए हुए मूल रुप से संघीय संविधान है, ऐसा मानना ज्यादा उचित है।
भारत के संविधान में समवर्ती सूची को ऑस्ट्रेलिया के संविधान से लिया गया है। इस सूची में ऐसे विषय शामिल हैं, जिन पर केन्द्र एवं राज्य दोनों को कानून बनाने का अधिकार है। दोनों  द्वारा निर्मित कानूनों में टकराव की स्थिति में केन्द्र द्वारा निर्मित कानून की मान्य होगा। इसे सातवीं अनूसूची में शामिल किया गया है।
राज्य के गठन में प्रतिभा, अनुभव एवं सेवा को प्रतिनिधित्व देने में भारतीय संविधान निर्माता आयरिश (आयरलैंड) गणतंत्र से प्रभावित हुए थे।
मूल कर्तव्य (अनु. 51-क) मूलतः अंगीकृत संविधान के भाग नही थे। इन्हें 42वें संविधान संशोधन, 1976 द्वारा सम्मिलित किया गया। ये मूल कर्तव्य पूर्व सोवियत संघ के संविधान से लिए गए हैं।
भारत का संविधान विश्व का सबसे बड़ा संविधान है। इसमें 22 भाग, 395 अनुच्छेद तथा 12 अनुसूचियां हैं। इसमें मौलिक अधिकारों का अध्याय अमेरिका के संविधान के मॉडल से लिया गया है। परंतु मौलिक अधिकार की वजह से ही भारतीय संविधान लंबा नही हुआ।
संयुक्त राज्य अमेरिका का प्रथम पूर्ण लिखित संविधान है। यह विश्व का सबसे छोटा लिखित संविधान है। जिसमें मात्र 7 अनुच्छेद शामिल हैं। वहीं भारत का संविधान विश्व का सबसे बड़ा लिखित संविधान है, जिसमें 395 अनुच्छेद शामिल हैं।


संविधान में अनुच्छेद
भारतीय संविधान में 400 से अधिक आर्टिकिल (अनुच्छेद) हैं तथा आज इनकी संख्या लगभग 450 पहुंच गई है, परंतु यह सभी मूल अनुच्छेदों के साथ उपखंड अर्थात क, ख,  ग आदि के रुप में  जुड़े हुए हैं।
संविधान के मूल पाठ में 22 भाग, 395 अनुच्छेद और 8 अनुसूचियां थी। संशोधनों के द्वारा कुछ नए अनुच्छेद जोड़े गए और कुछ अनुच्छेद निकाले भी गए। नई अनसूचियां भी जोड़ी गई हैं और उनकी संख्या 8 से बढ़कर 12 हो गई है।


विधानतः नए राज्य को शामिल करना – अनुच्छेद 2
नए राज्यों का गठन–भारतीय संविधान का अनुच्छेद 3
विधि के सम्मुख समानता-अनुच्छेद 14
अपृश्यता का अंत-अनुच्छेद 17
गिरफ्तारी और निरोध से संरक्षण -अनुच्छेद 22
नीति निदेशत तत्व-अनुच्छेद 36
भारतीय संविधान में नीति निदेशक तत्वों के तहत समान न्याय और निःशुल्क विधिक सहायता -अनु. 36 A
ग्राम पंचायतों का गठन-अनु. 40
कार्य करने का अधिकार-अनु. 41
कार्य करने के लिए सही और मानवीय स्थितियां-अनु. 42
समान नागरिक संहिता-अनु. 44
बच्चों के लिए मुफ्त तथा अनिवार्य शिक्षा-अनु. 45
कार्यपालिका से न्यायपालिका का पृथक्करण – अनु. 50
कृषि एवं पशुपालन का संगठन-अनु. 48
भारत के राष्ट्रपति का निर्वाचन-अनु. 54
प्रधानमंत्री व मंत्रि परिषद का गठन-अनु. 75
भारत का महान्यायवादी- अनु. 76
राष्ट्रपति को जानकारी देने के संबंध में प्रधानमंत्री के कर्तव्य-अनु. 78
राष्ट्रपति का विधेयक को अनुमति देने का अधिकार -अनु. 111
अनुच्छेद 117 में प्रावधान है कि अनुच्छेद 110(1)(क) में उल्लिखित कर संबंधी प्रावधान अर्थात कर अधिरोपण करने वाले विधेयक या संशोधन राष्ट्रपति की सिफारिश से ही पुनःस्थापित या प्रस्तावित किया जाएगा, अन्यथा नही और ऐसा उपबंध करने वाला विधेयक राज्य सभा में पुनःस्थापित नही किया जाएगा।
अनु. 119 में संसद में वित्तीय कार्य संबंधी प्रक्रिया का विधि द्वारा विनियमन,
अनु. 121 में उच्चतम न्यायालय/उच्च न्यायालय के किसी न्यायाधीश के संबंध में चर्चा निर्बंधन तथा अनु. 123 मे संसद के विश्रांति काल में अध्यादेश प्रख्यापित करने की राष्ट्रपति की शक्ति का उल्लेख है।
अनुच्छेद 125 में सर्वोच्च न्यायालय के गठन का प्रावधान है।
अनुच्छेद 131 – सर्वोच्च न्यायालय का क्षेत्राधिकार
भारत का नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक-अनुच्छेद 148
अनुच्छेद 155- राज्यपाल की नियुक्त
अनुच्छेद-164 मुख्यमंत्रियों एवं मंत्रिपरिषद की नियुक्ति।
राज्य के महाधिवक्ता की नियुक्ति संबंधी प्रावधान अनुच्छेद 165 में है।
राज्य विधानसभाओं की संरचना अनुच्छेद 170 में वर्णित है।
अनु. 215 – उच्च न्यायालय का अभिलेख न्यायालय होना।
अनु. 222- किसी न्यायाधीश का एक उच्च न्यायालय से दूसरे उच्च न्यायालय में अंतरण।
अनु. 226 – विशेष रिट जारी करने की उच्च न्यायालय की शक्ति।
अनु. 227 – सभी न्यायालयों के अधीक्षण की उच्च न्यायालय की शक्ति,
अनुच्छेद – 245 संसद द्वारा और राज्य विधानमंडलों द्वारा बनाई गई विधियों का विस्तार (विधायी शक्तियों का वितरण)
वित्त आयोग – अनुच्छेद 280
अखिल भारतीय सेवाएं – अनु. 312
संघ लोक सेवा आयोग अनुच्छेद – 315
अनुच्छेद 318 में लोक सेवा आयोग के सदस्यों और कर्मचारियों की सेवा की सर्तों के बारे में विनियमन बनाने की शक्ति निहित है।
अनुच्छेद – 320 लोक सेवा आयोग के कार्य
अनुच्छेद 323-A प्रशासनिक अधिकरण
भारतीय संविधान के अनु. 324 में निर्वाचन आयोग के गठन का प्रावधान है।
अनु. 330 लोक सभा के लिए अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति सदस्यों के आरक्षण।
अनुच्छेद 332 राज्यों की विधानसभाओं में अनूसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए स्थानों के आरक्षण से संबंधित है।
अनुच्छेद 351 में हिंदी भाषा के विकास के लिए निर्देश दिए गए हैं।
अनुच्छेद 352 आपात की उद्घोषणा (आकस्मिक प्रावधान)।



अनुच्छेद एक दृष्टि मेः
अनुच्छेद-1             –      संघ का नाम एवं राज्य क्षेत्र।
अनुच्छेद-2             –      नए राज्यों का प्रवेश या स्थापना।
अनुच्छेद-3             –      नए राज्यों का निर्माण और वर्तमान राज्यों के क्षेत्रों, सीमाओं या नामों में परिवर्तन
अनुच्छेद-5             –      संविधान के प्रारंभ के समय नागरिकता।
अनुच्छेद-14            –      विधि के समक्ष समानता का अधिकार।
अनुच्छेद-15            –      धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्म-स्थान के आधार पर विभेद का प्रतिषेध।
अनुच्छेद-16            –      लोक नियोजन के विषयों में अवसर की समानता।


अनुच्छेद-17            –      अस्पृश्यता का अंत।
अनुच्छेद-18            –      उपाधियों का अंत
अनुच्छेद-19            –      वाक्-स्वातंत्र आदि विषयक कुछ अधिकारों का संरक्षण।
अनुच्छेद-20            –      अपराधों के लिए दोष सिध्दि के संबंध में संरक्षण।
अनुच्छेद-21            –      प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का संरक्षण।
अनुच्छेद-21(क)       –      6 से 14 वर्ष तक के सभी बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार।
अनुच्छेद-22            –      कुछ  दशाओं में गिरफ्तारी और निरोध से संरक्षण।
अनुच्छेद-23            –      मानव दुर्व्यापार एवं बलातश्रम का प्रतिषेध।
अनुच्छेद-24            –      कारखानों आदि में  बालकों के नियोजन का प्रतिषेध।
अनुच्छेद-25           –      अंतःकरण की और धर्म के अबाध रुप से मानने, आचरण और प्रचार करने की स्व.
अनुच्छेद-29            –      अल्पसंख्यक वर्गों के हितों का संरक्षण।
अनुच्छेद-32            –      संवैधानिक उपचारों का अधिकार।
अनुच्छेद-39            –      प्रत्येक नागरिक को चाहे वह  स्त्री हो या पुरुष समान कार्य के लिए समान वेतन।
अनुच्छेत-39(क)      –      समान न्याय तथा निःशुल्क विधिक सहायता।
अनुच्छेद-40            –      ग्राम पंचायत की स्थापना का प्रावधान।
अनुच्छेद-41            –      कुछ दशाओं मे काम, शिक्षा और लोक सहायता पाने का अधिकार।
अनुच्छेद-44            –      नागरिकों के लिए एक समान सिविल संहिता का प्रावधान
अनुच्छेद-45            –      छः वर्ष से कम आयु के बच्चों की बाल्यावस्था की देखभाल और शिक्षा के लिए प्राव.
अनुच्छेद-48(क)       –      पर्यावरण का संरक्षण और संवर्धन और वन तथा वन्य जीवों की रक्षा।
अनुच्छेद-50            –      कार्यपालिका से न्यायपालिका का पृथक्करण।
अनुच्छेद-51            –      अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा की अभिवृध्दि।
अनुच्छेद-51(क)       –      मूल कर्तव्य।
अनुच्छेद-52            –      भारत का राष्ट्रपति
अनुच्छेद-55            –      राष्ट्रपति के निर्वाचन की पध्दति।
अनुच्छेद-57            –      पुनर्निर्वाचन के ले पात्रता।


अनुच्छेद-58            –      राष्ट्रपति पद की योग्यता।
अनुच्छेद-60            –      राष्ट्रपति द्वारा शपथ या प्रतिज्ञान।
अनुच्छेद-61            –      राष्ट्रपति पर चलाई जाने वाली महाभियोग की प्रक्रिया।
अनुच्छेद-66            –      उपराष्ट्रपति का निर्वाचन
अनुच्छेद-70            –      अन्य आकस्मिकताओं में राष्ट्रपति के कृत्यों का निर्वहन।
अनुच्छेद-72            –      राष्ट्रपति को क्षमादान  (Pardons) की शक्ति।
अनुच्छेद-74            –      राष्ट्रपति को सहायता और सलाह देने के लिए मंत्रिपरिषद
अनुच्छेद-75(1)       –      प्रधानमंत्री की नियुक्ति राष्ट्रपति करेगा और अन्य मंत्रियों की नियुक्ति राष्ट्रपति
                                    प्रधानमंत्री की सलाह पर करेगा।
अनुच्छेद-76            –      भारत का महान्यायवादी
अनुच्छेद-79            –      संसद के गठन का प्रावधान।
अनुच्छेद-80            –      राज्य सभा की संरचना।
अनुच्छेद-81            –      लोक सभा की संरचना।
अनुच्छेद-83(1)       –      राज्य सभा एक स्थायी सदन।
अनुच्छेद-84            –      संसद की सदस्यता के लिए अर्हता।
अनुच्छेद-85            –      संसद के सत्र, सत्रावसान और विघटन।
अनुच्छेद-100(1)      –      लोक सभा अध्यक्ष द्वारा अपने निर्णायक मत का प्रयोग (पक्ष  एवं विपक्ष के मत
                                    बराबर (Tie) होने पर)
अनुच्छेद-108          –      कुछ दशाओं में दोनों सदनों की संयुक्त बैठक।
अनुच्छेद-109          –      धन विधेयकों के संबंध में विशेष प्रक्रिया।
अनुच्छेद-110          –      धन विधेयक की परिभाषा।
अनुच्छेद-111          –      संसद के सदनों द्वारा पारित विधेयक को राष्ट्रपति की अनुमति।
अनुच्छेद-112          –      वार्षिक वित्तीय, विवरण।
अनुच्छेद-117          –      वित्त विधेयकों के बारे में विशेष उपबंध।
अनुच्छेद-122          –      न्यायालयों द्वारा संसद की कार्यवाहियों की जांच न किया जाना।


अनुच्छेद-123          –      संसद के विश्रांतिकाल में अध्यादेश प्रख्यापित करने की राष्ट्रपति की शक्ति।
अनुच्छेद-124          –      उच्चतम न्यायालय की स्थापना और गठन।
अनुच्छेद-129          –      उच्चतम न्यायालय का अभिलेख न्यायालय होना।
अनुच्छेद-137          –      उच्चतम न्यायालय की पुनर्विलोकन (Review) की शक्ति।
अनुच्छेद-143          –      उच्चतम न्यायालय से परामर्श करने की राष्ट्रपति की शक्ति।
अनुच्छेद-148          –      भारत का नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक।
अनुच्छेद-155          –      राज्यपाल की नियुक्ति।
अनुच्छेद-161          –      क्षमा आदि की और कुछ मामलों में दंडादेश के निलंबन, परिहार या लघुकरण की
                                    राज्यपाल की शक्ति।
अनुच्छेद-164(1)      –      राज्यपाल द्वारा मुख्यमंत्री की नियुक्ति और मुख्यमंत्री की सलाह पर अन्य मंत्रियों
                                    की नियुक्ति।
अनुच्छेद-165          –      राज्य का महाधिवक्ता।
अनुच्छेद-169          –      राज्यों मे विधान परिषदों का उत्सादन या सृजन।
अनुच्छेद-174          –      राज्यपाल द्वारा राज्य विधानमंडल के समय-समय पर सत्र बुलाने, उसका
                                    सत्रावसान करने तथा विधानसभा को विघटित करने का अधिकार।
अनुच्छेद-200          –      राज्यपाल द्वारा विधेयकों पर अनुमति।
अनुच्छेद-201          –      राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित विधेयक।
अनुच्छेद-213          –      विधानमंडल के विश्रांतिकाल में राज्यपाल को अध्यादेश जारी करने की शक्ति।
अनुच्छेद-214          –      राज्यो के लिए उच्च न्यायालय।
अनुच्छेद-215          –      उच्च न्यायालयों का अभिलेख न्यायालय होना।
अनुच्छेद-216          –      उच्च न्यायालयों का गठन
अनुच्छेद-217          –      उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की नियुक्ति और उसके पद की शर्तें।
अनुच्छेद-226          –      उच्च न्यायालय को कुछ रिट (Writs) जारी करने की शक्ति।
अनुच्छेद-231          –      दो या अधिक राज्यों के लिए एक ही उच्च न्यायालय की स्थापना।
अनुच्छेद-233          –      जिलाधीशों की नियुक्ति।


अनुच्छेद-239(क)(क)       –      दिल्ली के संबंध में विशेष उपबंध।
अनुच्छेद-241          –      संघ राज्य क्षेत्रों के लिए उच्च न्यायालय।
अनुच्छेद-243(ख)    –      पंचायतो का गठन।
अनुच्छेद-243(झ)    –      पंचायतों के वित्तीय मामलों पर सिफारिश करने के लिए राज्यों द्वारा वित्त आयोग
                                    गठित करने का प्रावधान।
अनुच्छेद-243(ट)     –      पंचायतों के लिए निर्वाचन।
अनुच्छेद-243(थ)     –      नगरपालिकाओं का गठन
अनुच्छेद-243(य)(क)       –      नगरपालिकाओं के लिए निर्वाचन।
अनुच्छेद-243(य)(घ) –      जिला योजना के लिए समिति।
अनुच्छेद-243(य)(झ)       –      सहकारी समितियों का निगमन।
अनुच्छेद-249          –      राज्य सूची के विषय के संबंध में राष्ट्रीय हित में विधि बनाने की संसद की  शक्ति।
अनुच्छेद-253          –      अंतरराष्ट्रीय करारों को प्रभावी करने के लिए विधान।
अनुच्छेद-262          –      अंतरराज्यिक नदियों के  जल संबंधी विवादों का न्यायनिर्णयन।
अनुच्छेद-263          –      अतंरराज्यपरिषद के संबंध में उपबंध।
अनुच्छेद-266          –      भारत और राज्यों की संचित निधियां और लोक लेखो के बारे में प्रावधान।
अनुच्छेद-267          –      भारत की आकस्मिकता निधि (Contingency Fund)
अनुच्छेद-280          –      वित्त आयोग (Finance Commission)
अनुच्छेद-300(क)     –      विधि के प्राधिकार के बिना व्यक्तियों को संपत्ति से वंचित न किया जाना।
अनुच्छेद-312          –      अखिल भारतीय सेवाएं
अनुच्छेद-315          –      संघ और राज्यों के लिए लोक सेवा आयोग।
अनुच्छेद-324          –      निर्वाचनों के अधीक्षण, निदेशन और नियंत्रण का निर्वाचन आयोग में निहित
                                    होना।
अनुच्छेद-326          –      लोक सभा और राज्यों की विधानसभाओं के लिए निर्वाचनों का वयस्क
                                    मताधिकार के आधार पर होना।
अनुच्छेद-330          –      लोक सभा में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजातियों को लिए  सीटों का
                                    आरक्षण।


अनुच्छेद-331          –      लोक सभा में आंग्ल-भारतीय समुदाय का प्रतिनिधित्व।
अनुच्छेद-332          –      राज्यों की विधानसभाओं में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के
                                    लिए स्थानों का आरक्षण।
अनुच्छेद-333          –      राज्यों की विधानसभाओं मे आंग्ल-भारतीय समुदाय का प्रतिनिधित्व।
अनुच्छेद-338          –      राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग
अनुच्छेद-338(क)     –      राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग।
अनुच्छेद-340          –      राष्ट्रीय पिछड़ा आयोग का गठन।
अनुच्छेद-343          –      संघ की राजभाषा हिंदी और  लिपि देवनागरी घोषित।
अनुच्छेद-344          –      राजभाषा आयोग।
अनुच्छेद-350(क)     –      प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा में शिक्षा की सुविधाएं।
अनुच्छेद-352          –      राष्ट्रीय आपात की घोषणा युध्द या बाह्य आक्रमण या सशस्त्र विद्रोह की स्थिति में।
अनुच्छेद-356          –      राज्यों सांविधानिक तंत्र में विफल हो जाने की दशा मे उपबंध।
अनुच्छेद-360          –      वित्तीय आपातकाल घोषित करने का प्रावधान।
अनुच्छेद-368          –      संसद को संविधान में संशोधन करने का अधिकार
अनुच्छेद-370          –      जम्मू कश्मीर राज्य के संबंध में अस्थायी उपबंध।

अनुसूचियां
भारत के मूल संविधान में 8 अनुसूचियां थी। वर्तमान में 12 अनुसूचियां हैं –
पहली अनुसूची – राज्य व संघ राज्य क्षेत्र।
दूसरी अनुसूची – भारतीय संघ के पदाधिकारियों को मिलने वाले वेतन, भत्ते तथा पेंशन आदि का उल्लेख।
तीसरी अनुसूची – भारतीय संघ के कुछ पदाधिकारियों के शपथ और प्रतिज्ञान के प्रारुप।
चौथी अनुसूची – भारत के राज्यों तथा संघ राज्य क्षेत्रों (दिल्ली व पुडुचेरी) के राज्य सभा में प्रतिनिधित्व का विवरण।
पांचवी अनुसूची – अनुसूचित क्षेत्रों तथा अनुसूचित जनजातियों के प्रशासन व नियंत्रण के बारे में उपबंध।
छठवीं अनुसूची – असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम के जनजातीय क्षेत्रों के प्रशासन के बारे में उपबंध।
सातवीं अनुसूची – केन्द्र व राज्यों के बीच शक्तियों का विभाजन। इसमें तीन सूचियां हैं –
संघ सूची
राज्य सूची
समवर्ती सूची
संघ सूची में कुल 97 विषयों (वर्तमान में 100) का उल्लेख है, जिस पर कानून बनाने का अधिकार केवल संघ को है।
राज्य सूची में कुल 66 विषय (वर्तमान में 61) हैं, जिन पर कानून राज्य  द्वारा बनाई जाती है।
समवर्ती सूची में कुल 47 विषयों (वर्तमान में 52) का उल्लेख है, जिन पर कानून बनाने का अधिकार संघ तथा राज्य दोनों को है।
पुलिस, लोक स्वास्थ्य और स्वच्छता, प्रति व्यक्ति कर, गैस, कृषि, रेलवे पुलिस, कारागार, पंचायती राज एवं भूमि सुधार राज्य सूची के विषय हैं।
रेडियों और टेलीविजन, शेयर बाजार, डाक घर, बचत बैंक, जनगणना, बैंकिंग, बीमा, रक्षा, रेलवे एवं निगमकर संघ सूची के विषय हैं।
आर्तिक योजना, आपराधिक मामले, जनसंख्या नियंत्रण और परिवार नियोजन, शिक्षा, वन, दंड प्रक्रिया, विवाह विच्छेद (तलाक) एवं गोद लेना समवर्ती सूची के विषय हैं।
आठवी अनुसूची – इसमें भारतीय संविधान द्वारा मान्यता प्राप्त 22 भाषाओं का उल्लेख किया गया है। मूलतः इसमें 14 भाषाएं थी।


वर्ष 1967 में सिंधी को 21वें संविधान संशोधन द्वारा 1992 कोकणी, नेपाली तथा मणिपुरी को 71वें संविधान संशोधन द्वारा वर्ष 2004 में संथाली, डोगरी, मैथिली तथा बोडो को 92वें संविधान संशोधन द्वारा आठवीं अनुसूची में शामिल किया गया है।
नौवी अनुसूची – विशिष्ट अधिनियमों और विनियमों का सत्यापन। प्रथम संविधान संशोधन अधिनियम, 1951 द्वारा संविधान में शामिल। वर्तमान में इस अनुसूची में लगभग 284 अधिनियम हैं।
दसवी अनुसूची – दल परिवर्तन के आधार पर निरर्हता के बारे में अपबंध। 52वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1985 द्वारा संविधान में शामिल।
ग्यारहवीं अनूसूची – पंचायतों के अधिकार, प्राधिकार तथ दायित्व आदि के  बारे में उपबंध। 73वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 द्वारा संविधान में शामिल। इस अनुसूची में पंचायती राज सें संबंधी 29 विषय हैं।
बारहवीं अनुसूची – नगरपालिकाओं के अधिकार, प्राधिकार तथ दायित्व आदि। 74वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 द्वारा संविधान में शामिल। इसमें शहरी स्थानीय निकाय से संबंधित 18 विषय हैं।
भारतीय संविधान की तृतीय अनसूची शपथ या प्रतिज्ञान के प्रारुप से संबंधित है। इस अनुसूची में निम्न के द्वारा ली जाने वाली पद तथा गोपनीयता की शपथ का प्रारुप दिया गया है –
संघ के मंत्री
संसद के निर्वाचन के अभ्यर्थी
संसद के सदस्य
उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों और भारत के नियंत्रक महालेखापरीक्षक
किसी राज्य के मंत्री
राज्य विधानमंडल के निर्वाचन के अभ्यर्थी
राज्य विधानमंडल के सदस्य
उच्च न्यायालयों के न्यायाधीश
इस प्रकार तृतीय अनुसूची में कुल 8 प्रारुप दिए गए हैं। भारत के राष्ट्रपति द्वारा शपथ या प्रतिज्ञान का प्रारुप संविधान के अनुच्छेद 60 में  दिया गया है।


राज्य भूमि सुधार अधिनियमों को, संवैधानिक सुरक्षा प्रदान करने हेतु उन्हें प्रथम संविधान संशोधन, 1951 द्वारा संविधान में 9वीं अनुसूची जोड़कर उसके तहत सम्मिलित किया गया है।
समवर्ती सूची की प्रविष्टि संख्या 20 आर्थिक आयोजना का उल्लेख करती है। ध्यातव्य है कि इसी उपबंध के आधार पर भारत सरकार ने योजना आयोग का गठन किया था।
भारतीय संविधान में संघीय ढांचे मजबूती प्रदान करने के लिए विषयों को केन्द्र और राज्यों के लिए निश्चित कर दिया गया है। इन्हें महत्व के आधार पर संघ सूची, राज्य सूची एवं समवर्ती सूची में विभाजित किया गया है। शिक्षा प्रारंभ में राज्य सूची में शामिल थी, किंतु संघ एवं राज्यों दोनों के लिए इसके समन महत्व को देखते हुए, संविधान के 42 वें संशोधन अधिनियम, 1976 की धारा 57 द्वारा इसे समवर्ती सूची में डाल दिया गया।
भातीय संविधान में अनु. 245 से अनु. 248 के अधीन केन्द्र और राज्यों के बीच शक्तियों का विभाजन किया गया है तथा इस संदर्भ में सातवीं अनुसूची में संघीय सूची, राज्य तथा समवर्ती सूची का प्रावधान है। इसमें वन समवर्ती सूची में, जन स्वास्थ्य राज्य सूची में तथा शेयर बाजार एवं डाकघर बचत बैंक संघीय सूची में हैं.
केन्द्र सूची –      जनगणना
राज्य सूची       –      पुलिस और सार्वजनिक व्यवस्था
समवर्ती सूची    –      जनसंख्या नियंत्रण और परिवार नियोजन
अवशिष्ट विषय (केन्द्र के अधीन)      –                      अंतरिक्ष अनुसंधान
संविधान की दसवीं अनुसूची में दल-बदल विरोधी कानून विषयक प्रावधान हैं। यह अनुसूची 52वें संविधान संशोधन, 1985 के द्वारा जोड़ी गई। ध्यातव्य है कि दसवी अनुसूची में 91वें संशोधन, 2003 द्वारा संशोधन किया गया है। इस संशोधन उद्देश्य दल-बदल पर रोक लगाने के साथ-साथ केन्द्र एवं राज्यों मे मंत्रिपरिषद के आकार को सीमित करना था।
संविधान की सातवीं अनुसूची के अंतर्गत राज्य सूची की प्रविष्टि 5 के तहत स्थानीय शासन (पंचायती राज) राज्य सूची का विषय है।
विवाह, विवाह-विच्छेद और गोद लेना संविदान की सातवीं अनुसूची के तहत सची-III समवर्ती सूची (प्रविष्टि 5 के अंतर्गत) में सम्मिलित किए गए हैं।
केन्द्र एवं राज्य सरकारों द्वारा करों एवं शुल्कों के अधिरोपण के संबंध में विभिन्न मदें संविधान की सातवीं अनुसूची के तहत उल्लिखित हैं।
भूमि सुधार राज्य सूची का विषय है। राज्य भूमि सुधार अधिनियमों को संवैधानिक सुऱक्षा प्रदान करने हेतु नवी अनुसूची में प्रावधान किये हैं।


भारतीय संविधान के प्रमुख भाग
भारतीय संविधान को 22 भागों में विभाजित किया गया है।
भारतीय संविधान के प्रमुख भाग एवं संबंधित विषय इस प्रकार हैं –
भाग             विषय
1              –  संघ और उसका राज्य क्षेत्र
2              –  नागरिकता
3              –  मौलिक अधिकार
4              –  राज्य के नीति निदेशक तत्व
4(क)         –  मौलिक कर्तव्य
5              –  संघ सरकार
6              –  राज्य सरकारें
7              –  निरसित
8              –  संघ राज्य क्षेत्र
9              –  पंचायतें
9(क)         –  नगरपालिकाएं
9(ख)        –  सहकारी समितियां
10            –  अनुसूचित एवं जनजातीय क्षेत्र
11            –  संघ एवं राज्यों के  बीच संबंध
12            –  वित्त, संपत्ति, संविदाएं और वाद
13            –  भारत के राज्य क्षेत्र के भीतर व्यापार, वाणिज्य एवं समागम
14            –  संघ और राज्यो के अधीन सेवाएं
14(क)       –  अधिकरण
15            –  निर्वाचन
16            –  कुछ वर्गों के संबंध में विशेष उपबंध
17            –  राजभाषा
18            –  आपात उपबंध
19            –  प्रकीर्ण
20            –  संविधान का संशोधन
21            –  अस्थायी, संक्रमणशील और विशेष उपबंध
22            –  संक्षिप्त नाम, प्रारंभ, हिंदी में प्राधिकृत पाठ और निरसन


नागरिकता संबंधी प्रावधान का भारतीय संविधान के भाग 2 अनुच्छेद 5 से 11 तक उल्लेख है।
संविधान के 73वें संशोधन अधिनियम, 1992 द्वारा 24 अप्रैल, 1993 से अंतः स्थापित संविधान के भाग IX मे तीन सोपानों  में पंचायतें बनाने की परिकल्पना की गई है। इस भाग के अनु. 243  ख के खंड (1) में कहा गया है कि प्रत्येक राज्य में ग्राम, मध्यवर्ती और जिला स्तर पर इस भाग के उपबंधों के अनुसार, पंचायतों का गठन किया जाएगा तथापि इसी अनु. के खंड (2) के अनुसार, मध्यवर्ती स्तर पर पंचायत का उस राज्य में गठन नही किया जा सकेगा जिसकी जनसंख्या बीस लाख से अनधिक है।
भारतीय संविधान के भाग 11 का अध्याय 1 (अनुच्छेद 245-255) संघ और राज्यों के बीच विधायी संबंधों, जबकि अध्याय 2 (अनुच्छेद 256-263) प्रशासनिक संबंधो के बारे में है।
भारतीय संविधान के भाग 9 के अंतर्गत पंचायतों की व्यवस्था की गई है। 74वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 द्वारा संविधान में भाग-9क जोड़ा गया जो कि नगरपालिकाओं से संबंधित है। 97वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2011 के द्वारा संविधान में भाग 9-ख जोड़ा गया, जो सहकारी समितियों से संबंधित है। जबकि संविधान के भाग 10 के अंतर्गत अनुसूचित और अनुसूचित जनजाति क्षेत्र का उल्लेख है। भाग 14-क में अधिकरणों की व्यवस्था है।
उद्देशिका
पं. जवाहर लाल नेहरु द्वारा संविधान सभा में 13 दिसंबर, 1946 को उद्देश्य प्रस्ताव प्रस्तुत किया गया था।
22 जनवरी, 1947 को उद्देश्य प्रस्ताव को ही उद्देशिका के रुप में संविधान सभा द्वारा स्वीकार किया गया।
42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा उद्देशिका में समाजवादी, पंथनिरपेक्ष और अखंडता शब्द जोड़ा गया।
भारतीय संविधान की उद्देशिका ने भारत को संपूर्ण प्रभुत्वसंपन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक, गणराज्य के रुप में घोषित किया है।
संविधान की उद्देशिका अपने नागरिकों को तीन प्रकार के न्याय – सामाजिक, आर्थिक एवं राजनैतिक सुनिश्चित कराती है।
उद्देशिका संविधान के विधिक विर्वचन में सहायका है।
सर अल्लादि कृष्णास्वामी अय्यर के अनुसार, उद्देशिका हमारे स्वप्नों और विचारों का प्रतिनिधित्व करती है।
के.एम. मुंशी के अनुसार, उद्देशिका हमारे प्रभुत्वसंपन्न लोकतंत्रात्मक गणराज्य की जन्म कुंडली है।
बोम्मई बनाम यूनियन ऑफ इंडिया वाद में उच्चतम न्यायालय ने धारण प्रस्तुत की कि उद्देशिका संविधान का भाग है।
प्रस्तावना (उद्देशिका) को संविधान का भाग केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य (1973) वाद में स्वीकार किया गया है।
इससे पूर्व बेरुबारी वाद (1960) में उद्देशिका को संविधान का अंग नही माना गया था।
गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य के प्रकरण में उद्देशिका को संविधान की मूल आत्मा कहा गया है।
उद्देशिका की प्रकृति न्याययोग्य नही है।
प्रस्तावना में विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता की बात की गई है। इसमें प्रतिष्ठा और अवसर की समानता उल्लिखित है।
प्रस्तावना को संविधान की आत्मा कहा जाता है।
बी.आर. अम्बेडकर ने सांविधानिक उपचारों के अधिकार को सांविधान की आत्मा और हृदय माना है।
के.एम. मुंशी ने इसे राजनीतिक जन्मपत्री कहा है।
सुभाष कश्यप ने कहा है कि संविधान शरीर है, तो प्रस्तावना उसकी आत्मा, प्रस्तावना आधारशिला है, तो संविधान उस पर खड़ी अट्टालिका।
बी.आर. अम्बेडकर ने संविधान को एक पवित्र दस्तावेज कहा है।
संविधान में हमारें राष्ट्र का उल्लेख दो नामों भारत तथा  इंडिया के रुप में किया गया है।अनुच्छेद 1 (1) उल्लेख करता है कि भारत अर्थात इंडिया राज्यों का संघ होगा (India, that is Bharat, Shall be a Union of States)


भारत के संविधान के आमुख लक्ष्य उसके सभी नागरिकों को (1) सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय, (2) विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, (3) प्रतिष्ठा (Status) और अवसर की समानता तथा (4) व्यक्ति की गरिमा (dignity) सुनिश्चित करना है।
भारतीय संविधान की प्रस्तावना हम भारत के लोग (We, The People of India) शब्दों से शुरु होती है, अतः भारत में लौकिक सार्वभौमिकता है। इसका अर्थ है – जनता सर्वशक्तिमान है और किसी बाह्य सत्ता के अधीन नही है।
सभी व्यक्ति पूर्णतः और समान रुप से मानव हैं यह सिध्दांत सार्वभौमिकतावाद के नाम से जाना जाता है। इस सिध्दांत के अनुसार, सभी व्यक्तियों को उनके मानव अधिकार समान रुप से बिना किसी विभेद के उपलब्ध होने चाहिए।
भारत के पंथनिरपेक्ष/धर्मनिरपेक्ष राज्य होने का सही भाव यह है कि भारत में राज्य का कोई धर्म नही है, तद्नुसार सभी धर्मों को राज्य द्वारा समान प्रश्रय अपेक्षित है।
भारतीय संविधान की उद्देशिका/प्रस्तावना में लोक कल्याण शब्द का उल्लेख नही है। प्रस्तावना में प्रभुत्वसंपन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य शब्द हैं।
भारतीय संविधान की प्रस्तावना में सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समानता का वर्णन तो है, परंतु आर्थिक स्वतंत्रता का इसमें उल्लेख नही है।
के.एम. मुंशी ने भारतीय संविधान की प्रस्तावना को हमारे संप्रभु, प्रजातांत्रिक गणतंत्र की जन्मकुंडली कहा।
बी.आर. अम्बेडकर ने भारतीय संविधान को एक पवित्र दस्तावेज कहा है। 29 अगस्त, 1947 को संविधान सभा ने बी.आर. अम्बेडकर की अध्यक्षता में 7 सदस्यीय प्रारुप समिति का गठन किया।
केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य (1973) के मामले मे सर्वोच्च न्यायालय ने प्रस्तावना (उद्देशिका) को भारतीय संविधान की मौलिक संरचना का भाग स्वीकार किया। सर्वोच्च न्यायालय के शब्दों में हमारे संविधान का प्रासाद उद्देशिका में वर्णित बुनियादी तत्वों पर खड़ा है। यदि इनमें से किसी  भी तत्व को हटा दिया जाए, तो सारा ढांचा ही ढह जाएगा अर्थात संविधान  वही नही रह  जाएगा अर्थात अपना व्यक्तित्व व पहचान खो देगा।
भारतीय संविधान की प्रस्तावना, संविधान के उद्देश्यों को प्रतिबिंबित करती है। संविधान का मुख्य उद्देश्य भारतीय जनता को सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक न्याय तथा विचार, मत, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता एवं प्रतिष्ठा और अवसर की समानता का अधिकार  दिलाना है। व्यक्ति का उत्कर्ष कहीं संपूर्ण राष्ट्र के उत्कर्ष में बाधक न बन जाए इसलिए संविधान में बंधुत्व की भावना पर भी  बल दिया गया है।
संविधान के अनु. 14-18 के तहत प्रदत्त समता के अधिकार के विभिन्न प्रावधानों के तहत सामाजिक समानता प्रत्याभूत की गई है। प्रस्तावना में भी सामाजिक न्याय प्राप्त कराने की बात कही गई है।
भारतीय संविधान में दिया गया आमुख न्यायालय में प्रवर्तनीय नही है। अर्थात इसे न्यायालय में लागू नहीं किया जा सकता है।


शासन प्रणाली
राज्य तंत्र – यह शासन का प्राचीनतम रुप है, जिसमें शासन की शक्ति एक व्यक्ति में समाहित होती है, जो राजमुकुट धारण करता है। वह आनुवांशिक उत्तराधिकार के आधार पर पद ग्रहण करता है।
कुलीन तंत्र – इसे अरिस्टोक्रेसी भी कहा जाता है। यह शासन का वह रुप है जिसमें राजनीतिक सत्ता का निवास थोड़े से लोगों में होता है तथा वह इसका प्रयोग करते हैं।
तानाशाही – इसे अधिनायक तंत्र (Dictatorship) भी कहा जाता है। यह एक ऐसे शासन का रुप है, जिसमें एक ही व्यक्ति का निरंकुश शासन होता है, जो बल प्रयोग के माध्यम से अपने पद पर आसीन रहता होता है तथा किसी के भी प्रति  उत्तरदायी नही होता है।
प्रजा तंत्र – वर्तमान समय में शासन का सबसे अधिक लोकप्रिय रुप प्रजातंत्र (Democracy) है। ध्यातव्य  है कि प्रजातंत्र वहां विद्यामान होता है, जहां जनता में सत्ता का वास  होता है अर्थात लोगों को संप्रभुता प्राप्त होती है।
प्रजातांत्रिक या लोकतांत्रिक शासन प्रणाली के की रुप हैं, जिनमें प्रमुख हैं – संघात्मक शासन व्यवस्था तथा अध्यक्षीय शासन व्यवस्ता के रुप में जाना जाता है।
राज्य के महत्वपूर्ण तत्व हैं – संप्रभुता, जनसंख्या, भू-भाग तथा सरकार या सत्ता। किसी भी राज्य का अनिवार्य तत्व संप्रभुता होती है, इसके बिना कोई भी राज्य राज्य की श्रेणी में नही आता है।
वर्ष 1947 के पहले एक राज्य के रुप में  हमारा देश भारत संप्रभु नही था, क्योंकि उस समय भारत पर, भारत की जनता का शासन नही था बल्कि ब्रिटिश क्राउन का शासन था।
भारतीय संविधान के अनुसार, देश में संसदीय शासन प्रणाली को अपनाया गया है, जिसमें जनता द्वारा चुने हुए प्रतिनिधि ही शासन व्यवस्था का संचालन करते हैं।
संसदीय शासन प्रणाली को मंत्रिमंडलीय शासन प्रणाली भी कहा जाता है। इस प्रणाली में संसद विधि निर्माण की सर्वोच्च संस्था होती है एवं कार्यपालिका अपने समस्त कृत्यों के लिए संसद के प्रति जवाबदेह होती है।
संसदीय शासन प्रणाली मे कार्यपालिका का अस्तित्व, विधायिका में उसके विश्वास प्राप्ति (बहुमत) तक रहता है।
भारत की राजनीतिक व्यवस्था में संपूर्ण सत्ता को केन्द्र एवं राज्यों में विधिक रुप में बांटा गया है।
यहां सर्वोच्च सत्ता जनता में निहित है और भारतीय प्रशासनिक, राजनीतिक व्यवस्था विशुध्द रुप में एक लोकतांत्रिक गणतंत्र है।
अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली जिसे हम राष्ट्रपतीय शासन प्रणाली के नाम से भी जानते हैं, में समस्त कार्यपालिका शक्ति राष्ट्रपति में निहित होती है। शासन प्रणाली का सर्वोत्तम उदाहरण – अमेरिका की राजनीतिक-प्रशासनिक व्यवस्था है।


अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली में राष्ट्रपति विधायिका को भंग नही कर सकती है।
राष्ट्रपतीय शासन प्रणाली में सत्ता केन्द्रीकृत होती है।
राष्ट्रपति ही कार्यपालिका का प्रमुख होता है।
अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली में, राष्ट्रपति अपने मंत्रियों के चुनाव में स्वतंत्र होता है और मंत्रियों के चयन में व्यवस्थापिका की भूमिका नाम मात्र ही होती है।
भारतीय संविधान की प्रस्तावना में प्रयुक्त वाक्य हम भारत के लोग…….यह स्पष्ट करता है कि, भारत में सत्ता का एकमात्र स्रोत जनता है, जो प्रतिनिधियों का निर्वाचन सत्ता संचालन हेतु करती है। अतः भारतीय लोकतंत्र में जन-प्रतिनिधियों को जनता के सेवक का दर्जा प्राप्त है।
भारतीय संविधान में संघ एवं राज्यों की शक्तियों को विधिक रुप से स्पष्टतः विभाजित किया गया है, इसलिए भारतीय संविधान को परिसंघीय भी कहा जाता है।
ब्रिटिश संसद को संसदों की जननी कहा जाता है।
ब्रिटेन में परंपराओं के अनुरुप आवश्यक कानून बनाते हुए प्रशासनिक व्यवस्था का संचालन किया जाता है, क्योंकि ब्रिटेन में लिखित संविधान का अस्तित्व नही है।
भारतीय संविधान में एकात्मक शासन के प्रमुख लक्षणों में राज्यपाल का पद, अखिल भारतीय सेवाएं, एकल नागरिकता, आपातकालीन प्रावधान तथा राज्य सभा में असमान प्रतिनिधित्व शामिल है।
भारत एक लोकतांत्रिक गणतंत्र है, इसका आशय है कि भारतीय राजनीतिक/प्रशासनिक व्यवस्था का सर्वोच्च पद (राष्ट्रपति) पर निर्वाचित व्यक्ति आसीन होता है।
भारतीय संविधान में संघात्मक एवं एकात्मक दोनों व्यवस्थाओं के तत्व पाए जाते हैं, इसीलिए भारतीय संविधान को अर्ध्द-संघात्मक भी कहा जाता है।
के.सी. व्हीयर ने भारत को अर्ध्द संघात्मक कहा है।
भारतीय संघवाद को सहकारी संघवाद जी. ऑस्टिन ने कहा है।
भारतीय संविधान अधिक कठोर तथा अधिक लचीले के मध्य एक संतुलन स्थापित करता है। यह कथन के.सी. व्हीयर का है।
बी.आर. अम्बेडकर के अनुसार, संविधान को संघात्मकता के तंग ढांचे में नही ढाला गया है।
राज्य के चार आवश्यक तत्व होते हैं – जनसंख्या, भूभाग, सरकार (शासन या सत्ता) और संप्रभुता। राज्य के इन चारों तत्वों मे संप्रभुता सबसे महत्वपूर्ण तत्व  है। संप्रभुता के  बिना कोई राज्य (अन्य तीनों तत्वों के होते हुए भी) अंतरराष्ट्रीय  दृष्टि से राज्य नही कहा जा सकता। जैसा कि वर्ष 1947 से पहले  भारत राज्य नहीं था, क्योंकि भारत संप्रभु नही था (अंग्रेजों का भारत पर आधिपत्य था)।
शासन प्रणाली की सामान्यतः दो पध्दतियां होती हैं – संसदीय और अध्यक्षीय। भारत में ग्रेट ब्रिटेन का अनुसरण करते हुए संसदीय शासन व्यवस्था को अपनाया गया है। संसदीय शासन व्यवस्था में व्यवस्थापिका के सदस्य ही कार्यपालिका का गठन करते हैं तथा कार्यपालिका, व्यवस्थापिका के प्रति उत्तरदायी होती है। संसदात्मक शासन व्यवस्था में कार्यपालिका, विधायिका द्वारा नियंत्रित होती है।
भारत में संसदीय प्रणाली की सरकार है, क्योकि मंत्रिपरिषद लोक सभा के प्रति उत्तरदायी है। (अनु. 75(3)) संसदीय शासन प्रणाली को मंत्रिमंडलीय व्यवस्था भी कहा जाता है। इस शासन व्यवस्था में संसद विधि निर्माण की सर्वोच्च संस्था होती है तथा कार्य़पालिका अपने सभी कार्यों के लिए संसद के प्रति उत्तरदायी होती है। कार्यपालिका के सदस्य संसद के सदस्य होते हैं और कार्यपालिका तभी तक सत्तारुढ़ या कार्यरत रहती है। जब तक उसे संसद (लोकसभा) का विश्वास प्राप्त रहता है।
अनुच्छेद 75(5) मे उल्लेख है कि मंत्री बिना संसद सदस्य बने छः माह से अधिक पद पर नही रहेगा, अर्थात मंत्रिमंडल के सदस्य संसद के सदस्य होते हैं। मंत्रिपरिषद सामूहिक रुप से लोक सभा के प्रति उत्तरदायी होगी। (अनु. 75(3) )।


भारत में विधि का शासन है। यहां गणतंत्र है न कि राजतंत्र। प्रत्येक 5 वर्ष के उपरांत जनता अपने प्रतिनिधियों का निर्वाचन कर संविधान संगत लोकतांत्रिक सरकार का गठन करती है। यहां सत्तावादी सरकार नही है।
हिस्सेदारी, जवाबदेही, पारदर्शिता, कानून का नियम, सर्वसम्मति से निर्णय लेना, दक्षता एवं प्रभावशीलता आदि सुशासन की विशेषताएं हैं।
कल्याणकारी राज्य (Welfare State) का आशय है कि राज्य द्वारा देश की अधिकतम जनसंख्या का अधिकतम कल्याण सुनिश्चित करना। कल्याणकारी राज्य में उदारवाद (स्वतंत्रता) और समाजवाद (समानता) को अंतर्निहित करने का प्रयास किया जाता है। जैसा कि भारत एक कल्याणकारी राज्य है। ध्यातव्य है कि अधिकतम लोगो का अधिकतम कल्याण उपयोगितावाद की विशेषता/लक्षण है। कल्याणकारी राज्य की अवधारणा भारतीय संविधान के भाग-4 में प्रदत्त राज्य के नीति निदेशक तत्वों में निहित है। इसके अनुसार, राज्य लोगों के कल्याण के लिए एक सामाजिक, व्यवस्था का संवर्धन करेगा जिसमें सामाजिक, आर्थिक एवं  राजनैतिक न्याय शामिल हैं।
राज्य हर जगह हैः यह अंतराल शायद ही कोई छोड़ता है यह वक्तव्य कल्याणकारी धारणा की व्याख्या करता है।
भारत में संसदात्मक प्रजातंत्र को अपनाया गया है। संसदात्मक प्रजातंत्र का आशय है शासन की संसदीय प्रणाली वला प्रजातंत्र जिसमें राजसत्ता मूलतः जनता में निहित होती है। संसद में जनता के द्वारा चुने हुए प्रतिनिधि शासन सत्ता का संचालन करते हैं।
गणतंत्र का आशय है कि राष्ट्र का प्रधान निर्वाचित (प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष) होता है। वह वंशानुगत नहीं हो सकता है। भारत में राष्ट्र का प्रधान अर्थात राष्ट्रपति निर्वाचित होता है। इस प्रकार भारत एक गणतंत्र है।
राज्य और केन्द्रीय सरकार को भारत के संविधान से प्राधिकार प्राप्त होता है, क्योंकि भारतीय प्रणाली का स्रोत उसका संविधान है।
कोई राज्य संघात्मक है अथवा एकात्मक, यह संविधान द्वारा संघ और राज्यों के मध्य शक्तियों के विभाजन के आधार पर जाना जाता है। यदि संघ एवं राज्यों के मध्य शक्तियों का विभाजन है, तो उस राज्य को संघीय राज्य कहा जाता है। भारत का संविधान परिसंघीय है, क्योकि केन्द्र और राज्यों के बीच शक्तियों का वितरण किया जाता है।


द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग के प्रतिवेदन संख्या 12 नागरिक केन्द्रित प्रशासनः शासन का केन्द्र बिंदु में भारत में सुशासन की  बाधाओं की पहचान की गई है तथा सुशासन के लिए आवश्यक पूर्व-शर्तो का उल्लेख है।
संवैधानिक सरकार में सरकार की शक्ति का स्रोत संविधान होता है। संवैधानिक सरकार व्यक्ति की स्वतंत्रता के हित में राज्य की सत्ता पर प्रभावकारी प्रतिबंध लगाती है। वस्तुतः राज्य की निरंकुश सत्ता को व्यक्तिगत स्वतंत्रता के हित में सुरक्षित रखने के उद्देश्य से ही ब्रिटेन और अमेरिका में संविधानवाद का उदय हुआ। एक संवैधानिक सरकार में नागरिकों की स्वतंत्रताओं के संरक्षण हेतु संस्थागत क्रियाविधियां भी विद्यमान रहती हैं।
हर्बर्ट ए. साइमन ने मिथकों और कहावतों के रुप में प्रशासन के सिध्दांतों को अस्वीकार किया है, जबकि ड्वाइट वाल्डो, फ्रैंक मेरिनी और एफ. डब्ल्यू. रिग्स ने मिथकों और कहावतों के  रुप में प्रशासन के सिध्दांतों को स्वीकार किया है।
डॉ. बी.आर. अम्बेडकर ने यह स्वीकार किया था कि संविधान को संघात्मकता के ढांचे में नही ढाला गया है तथा  यह  एकीकृत और संघात्मक दोनों ही हैं।
भारतीय संविधान अधिक कठोर तथा अधिक लचीले के मध्य एक अच्छा संतुलन स्थापित करता है – यह कथन के.सी. व्हीयर का है।
भारतीय संविधान की प्रकृति संघात्मक है या एकात्मक , इसके संबंध में विद्वानों में मतभेद है। कुछ विद्वान इसे संघात्मक संविधान की संज्ञा देते हैं, जबकि कुछ विद्वान इस एकात्मक संविधान मानते हैं। जी. आस्टिन के अनुसार, भारत का संविधान परिसंघीय संविधान है, जबकि के.सी. व्हीयर के अनुसार, भारत का संविधान अर्ध्द-संघीय है।
भारतीय संविधान विश्व का सबसे वृहद संविधान है। इसके वृहद होने का प्रमुख कारण यह है कि इसमें संघ एवं राज्यों से संबंधित सारे प्रावधान शामिल कर दिए गए हैं। जबकि सं. राज्य अमेरिका जैसे देशों में राज्यों एवं संघ के अपने-अपने अलग संविधान हैं।




राष्ट्रीय प्रतीक
भारतीय झंडा संहिता में उल्लेख है कि – राष्ट्रीय झंडे के रंगो और उसके मध्य मे चक्र के महत्व का यथेष्ट वर्णन डॉ. राधाकृष्णन द्वारा संविधान सभा में किया गया था। इस संविधान सभा ने सर्वसम्मति से राष्ट्रीय झंडे को स्वीकार किया था।
डॉ. एस. राधाकृष्णन ने स्पष्ट किया है कि भगवा या केसरिया रंग त्याग या निःस्वार्थ भावना का प्रतीक है। हमारे झंडे के मध्य में सफेद रंग हमें सच्चाई के पथ पर चलने और अच्छे आचरण की प्रेरणा देता है। हरा रंग मिट्टी और वनस्पतियों के साथ हमारे संबंधों को उजागर करता है जिन पर सभी प्राणियों का जीवन आश्रित है।
सफेद रंग के मध्य में अशोक चक्र धर्म के राज का प्रतीक है। चक्र प्रगति का प्रतीक है, जड़ता प्राणहीनता का प्रतीक है। चक्र शांतिपूर्ण परिवर्तन की गतिशीलता का प्रतीक है।
भारत की राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा, तीन रंगों की पट्टी में विभाजित आयताकार है। ध्वज की लंबाई और चौड़ाई का अनुपात 3:2 है।
सबसे ऊपरी पट्टी गहरे केसरिया रंग (साहस का प्रदर्शन), बीच मे श्वेत (शांति  और  सच्चाई का प्रदर्शन) और सबसे नीचे हरी पट्टी (उर्वरता तथा समृध्दि का प्रदर्शन) है।
ध्वज के बीच की पट्टी में एक नीला चक्र है। जिसमें 24 तीलियां हैं। जिसका प्रारुप सारनाथ में अशोक के सिंह स्तंभ पर बने चक्र से लिया गया है। यह न्याय का प्रतीक है।
पिंगली वेंकैया द्वारा भारतीय राष्ट्रीय ध्वज को तैयार किया गया।
संविधान सभा द्वारा 22 जुलाई, 1947 को राष्ट्रीय ध्वज का वर्तमान स्वरुप स्वीकृत।
भारत का राजचिन्ह सारनाथ स्थित अशोक के सिंह स्तंभ की अनुकृति है। भार सरकार द्वारा इसे 26 जनवरी, 1950 को अपनाया गया।
इस पर नीचे देवनागरी लिपि में सत्यमेव जयते लिखा है, जो मुंडकोपनिषद से लिया गया है।
भारत का राष्ट्रगान जन गण मन 24 जनवरी, 1950 को संविधान सभा द्वारा आधिकारिक रुप में अंगीकृत किया गया था। इसके गायन की अवधि 52 सेकंड है।
27 दिसंबर, 1911 को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में इसे पहली बार गाया गय था। यह रबीन्द्रनाथ टैगोर द्वार रचित गीतांजलि से लिया गया है।


वंदे मातरम वर्ष 1950 में भारत के राष्ट्रीय गीत के रुप में अंगीकृत किया गया था। राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम बंकिम चन्द्र चटर्जी द्वारा लिखित उपन्यास आनंदमठ से लिया गया है। इसे 1896 ई. में भारती राष्ठ्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में पहली बार गाया गया था।
भारत का राष्ट्रीय कैलेंडर (शक संवत् पर आधारित) 22 मार्च, 1957 को अपनाया गया चैत्र माह से इसकी शुरुआत होती है और अंतिम माह फाल्गुन होता है। इसे ग्रेगोरियन कैलेंडर के साथ अपनाया गया है। सामान्यतः चैत्र माह की शुरुआत 22 मार्च को, जबकि लीप वर्ष में 21 मार्च को होती है।
भारत का राष्ट्रीय पुष्प कमल ((वानस्पतिक नाम नेलम्बो न्यूसिफेरा) है।
भारत का राष्ट्रीय फल आम (वानस्पतिक नाम मैनजीफेरा इंडिका) है।
भारत का राष्ट्रीय वृक्ष बरगद (वैज्ञानिक नाम फिकस बेंगालेंसिस)  है।
भारत का राष्ट्रीय पशु बाघ (वैज्ञानिक नाम पैंथेरा टाइग्रिस) है।
गंगा की डॉल्फिन (वैज्ञानिक नाम प्लैटानिस्ता गैंगेरिका) को भारत के राष्ट्रीय जलीय जीव के रुप में स्वीकार किया गया है।
भारतीय मोर (वैज्ञानिक नाम पावो क्रिस्टेसस) को भारत के राष्ट्रीय पक्षी के रुप में स्वीकार किया  गया है।
वर्ष 2008 में भारत सरकार द्वारा गंगा नदी को राष्ट्रीय नदी घोषित किया गया।
भारत सरकार द्वारा स्वाधीनता दिवस (15 अगस्त), गणतंत्र दिवस (26 जनवरी) और गांधी जयंती ( 2 अक्टूबर) को राष्ट्रीय दिवस के रुप में घोषित किया गया है।
राज्य एवं संघ राज्य क्षेत्र
भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 के द्वारा दो स्वतंत्र एवं पृथक प्रभुत्व वाले देश- भारत तथा पाकिस्तान का निर्माण किया गया।
देशी रियासतों के समक्ष तीन विकल्प प्रस्तुत किए गए – भारत में शामिल हो, पाकिस्तान मे शामिल हो या स्वतंत्र रहें।
भारतीय सीमा के अंतर्गत 552 देशी रियासतें थी। जिनमें से 549 भारत में शामिल हो गई, जबकि शेष तीन (हैदराबाद, जूनागढ़ और कश्मीर) ने भारत में शामिल होने से मना कर दिया। कालांतर में हैदराबाद को पुलिस कार्यवाही द्वारा, जूनागढ़ को जनमत संग्रह के द्वारा तथा कश्मीर को विलय-पत्र के द्वारा भारतीय संघ में शामिल किया गया।
संविधान के तहत भारतीय संघ के राज्यों को चार भागों में वर्गीकृत किया गया था।
भाग क में वे राज्य थे, जहां ब्रिटिश भारत में गवर्नर का शासन था।
भाग ख में 9 राज्य विधानमंडल के साथ शाही शासन।
भाग ग में ब्रिटिश भारत के मुख्य आयुक्त का शासन।
भाग घ में अकेले अंडमान निकोबार द्वीप को रखा गया था।
संविधान के अनुच्छेद 1(1) के अनुसार, भारत अर्थात इंडिया, राज्यों का संघ होगा।
अनुच्छेद 2 के तहत भारतीय संघ में नए राज्यों के प्रवेश या स्थापना का संसद का अधिकार।
अनुच्छेद 3 में नए राज्यो का निर्माण और वर्तमान  राज्यों के क्षेत्रों, सीमाओं या नामों में परिवर्तन करने का संसद का अधिकार।
संसद साधारण बहुमत से ने राज्यों का  निर्माण कर सकती है। भारतीय संविधान संसद को यह अधिकार देता है कि वह नए राज्य बनाने, उसमें परिवर्तन करने, नाम बदलने  या सीमा में परिवर्तन के संबंध में  बिना राज्यों की  अनुमति से कदम कदम उठा सकती है।
इस हेतु संविधान संशोधन को अनु. 368 के तहत संशोधन नही माना जाएगा। वर्तमान में भारतीय संघ में 29 राज्य और 7 केन्द्रशासित प्रदेश हैं।


स्वतंत्रता के पश्चात नए राज्यों के निर्माण के लिए फजल अली की अध्यक्षता में एक राज्य पुनर्गठन आयोग का गठन 1953 में हुआ। इस आयोग के दो अन्य सदस्य थे – के.एम. पानिक्कर  एवं एच.एन. कुजरु। इसी आयोग की कुछ अनुशंसा को राज्य पुनर्गठन  अधिनियम, 1956 में लागू किया गया।
संसद, संविधान मे संशोधन करके किसी भारतीय भू-भाग को किसी अन्य देश को सौंप सकती है।
जून, 1948 में भारत सरकार ने एस.के. धर की अध्यक्षता में भाषायी प्रांत आयोग की नियुक्ति की। इस आयोग ने अपनी रिपोर्ट दिसंबर, 1948 में पेश की। आयोग ने राज्यों का पुनर्गठन भाषायी आधार की बजाए प्रशासनिक सुविधा के अनुसार किए जाने की सिफारिश की।
दिसंबर, 1948 में कांग्रेस द्वारा एस.के. धर कमीशन की अनुशंसाओं का अध्ययन करने हेतु जेवीपी समिति का गठन किया गया। इसमें जवाहर लाल नेहरु, वल्लभभाई पटेल  और पट्टाभि सीतारमैया शामिल थे।
अप्रैल 1949 में प्रस्तुत अपनी रिपोर्ट में इस समिति ने औपचारिक रुप से स्वीकार किया कि, राज्यों के पुनर्गठन का आधार भाषा होनी चाहिए। हालांकि पोट्टी श्रीरामुलु की 56 दिनों की भूख हड़ताल के बाद मृत्यु के कारण अक्टूबर, 1953 में भारत सरकार को भाषा के आधार पर आंध्र प्रदेश राज्य का गठन करना पड़ा।
आंध्र प्रदेश, भाषा के आधार पर गठित होने वाला देश का पहला राज्य है।

नए राज्यो का गठन
क्र.सं.
राज्य
गठन वर्ष
1. 
आंध्र प्रदेश
1 अक्टूबर, 1953
2. 
गुजरात
1 मई, 1960
3. 
नगालैंड
1 दिसंबर, 1963
4. 
हरियाणा
1 नवंबर, 1966
5. 
हिमाचल प्रदेश
25 जनवरी, 1971
6. 
मेघालय
21 जनवरी, 1972
7. 
मणिपुर
21 जनवरी, 1972
8. 
त्रिपुरा
21 जनवरी, 1972
9. 
सिक्किम
16 मई, 1975
10.                         
मिजोरम
20 फरवरी, 1987
11.                         
अरुणाचल प्रदेश
20 फरवरी, 1987
12.                         
गोवा
30  मई, 1987
13.                         
छत्तीसगढ़
1 नवंबर, 2000
14.                         
उत्तराखंड
9 नवंबर, 2000
15.                         
झारखंड
15 नवंबर, 2000
16.                         
तेलंगाना
2 जून, 2014