Indian Polity for All Competitive Exams (State Level) Part 5

राज्य विधानमंडल
विधान परिषद
अनुच्छेद 171 के तहत विधान परिषदों के गठन का प्रावधान किया गया है। वर्तमान में सात राज्यों (आंध्र प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, कर्नाटक, जम्मू-कश्मीर, तेलंगाना और उत्तर प्रदेश) मे विधान परिषदों का अस्तित्व है।
विधान परिषद एक स्थायी सदन है, इसके सदस्यों का कार्यकाल 6 वर्ष तक रहता है।
अनुच्छेद 171(1) के अनुसार, विधान परिषद वाले राज्य की विधान परिषद के सदस्यों की कुल संख्या उस राज्य की विधानसभा के सदस्यों की कुल संख्या के एक-तिहाई से अधिक नही होगी।
किसी विधान परिषद के सदस्यों की कुल संख्या भी किसी दशा में 40 से कम नही होगी।
जम्मू-कश्मीर राज्य अपवाद है, जिसके विधान परिषद सदस्यों की संख्या 36 है।
उत्तर प्रदेश की विधान परिषद में सर्वाधिक (100) सदस्य हैं।
अनुच्छेद 171(4) के अनुसार, विधान परिषद के सदस्यों का चुनाव अप्रत्यक्ष रुप से आनुपातिक प्रतिनिधित्व पध्दति के तहत एकल संक्रमणीय मत द्वारा होता है।
अनुच्छेद 173 के अनुसार, विधान परिषद सदस्यों की अर्हताएं निहित हैं।
विधान परिषद का सदस्य निर्वाचित होने के लिए 30 वर्ष की आयु आवश्यक है।
अनुच्छेद 192 के अनुसार, विधानमंडल के किसी सदन का कोई सदस्य किसी अयोग्यता से ग्रस्त है या नही, इस प्रश्न का विनिश्चय राज्यपाल, निर्वाचन आयोग के परामर्श से करता है।
विधान परिषद के 5/6 सदस्यों का निर्वाचन होता है तथा शेष 1/6 सदस्य राज्यपाल द्वारा मनोनीत किए जाते हैं।
विधान परिषद अपने सभापति या उपसभापति को साधारण बहुमत से संकल्प पारित कर उनके पद से हटा सकती है।
अनुच्छेद 191 राज्य विधानसभा या विधान परिषद की सदस्यता के लिए निरर्हताएं से संबंधित है।
राज्य विधानमंडल का कोई सदस्य सदन की बैठकों से बिना अनुमति के लगातार 60 दिनों तक अनुपस्थित रहता है, तो उसकी सदस्यता समाप्त की जा सकती है.


विधानसभा (Legislative Assembly)
संविधान के भाग 6 में अनुच्छेद 168-212 तक राज्यों के विधानमंडल के बारे में उल्लेख है।
अनुच्छेद 168 के अनुसार, राज्य विधानमंडल का गठन विधान परिषद, विधानसभा और राज्यपाल को मिलाकर होगा।
प्रत्येक राज्य में विधायी कार्यों के संपादन के लिए विधानसभा का प्रावधान किया गया है।
अनुच्छेद 170 के अनुसार, प्रत्येक राज्य की विधानसभा उस राज्य में प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्रों से प्रत्यक्ष निर्वाचन द्वारा चुने गए अधिक से अधिक 500 और कम से कम 60 सदस्यों से मिलाकर बनेगी।
वर्तमान में सबसे छोटी विधानसभा केन्द्रशासित प्रदेश पुडुचेरी की (30) है, राज्यों मे सिक्किम की (32) है।
सबसे बड़ी विधानसभा उत्तर प्रदेश की (403) है।
अनुच्छेद 169 के अनुसार, विधान परिषद की स्थापना और उन्मूलन का अधिकार संसद को है।
राज्य विधानसभाओं के निर्वाचन का संचालन भारत का निर्वाचन आयोग करता है।
अनुच्छेद 170(2) के अनुसार, किसी राज्य विधानसभा की सदस्य संख्या उस राज्य की जनसंख्या पर निर्भर करती है।
विधानसभा अध्यक्ष यदि किसी प्रश्न पर पक्ष और विपक्ष में बराबर मत आए, तो वह निर्णायक मत का प्रयोग करता है।
सदन तथा राज्यपाल के बीच अध्यक्ष ही संपर्क स्थापित करता है।
अध्यक्ष की अनुपस्थिति में उसके कार्यों का संपादन उपाध्यक्ष करता है।
84वें संवैधानिक संशोधन अधिनियम 2002 के अनुसार, राज्य विधानसभाओं की संख्या वर्ष 2026 तक यही रहेगी।
जम्मू कश्मीर में विधानसभा सदस्यों की कुल संख्या 111 है, जबकि 24 चुनाव क्षेत्र पाकिस्तान द्वारा अधिग्रहित क्षेत्र (POK) में है।
वर्तमान में जम्मू-कश्मीर विधानसभा के कुल निर्वाचित सदस्यों की संख्या 87 है।
दिल्ली तथा पुडुचेरी दो ऐसे संघ शासित प्रदेश है, जहां विधानसभाएं हैं।
अनुच्छेद 173 के तहत विधानसभा की सदस्यता के लिए योग्यताएं हैं – वह भारत का नागरिक हो तथा उसकी आयु कम-से-कम 25 वर्ष हो।
अनुच्छेद 332 के तहत विधानसभाओँ में जनसंख्या के आधार पर अनुसूचित  जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों के लिए स्थानों के आरक्षण का प्रावधान है।
विधानसभा अध्यक्ष के अधिकार तथा कार्य लोक सभा अध्यक्ष के समान ही है.
राज्य में धन विधेयक (Money Bill) केवल विधानसभा में प्रस्तुत किया जा सकता है। संविधान के अनुच्छेद 198(1) के अनुसार, धन विधेयक विधान परिषद में पुरःस्थापित नही किया जाएगा।
अनुच्छेद 168 के अनुसार, राज्यो की विधायिका मे शामिल हैं –
राज्यपाल
विधानसभा, तथा
विधान परिषद, जहां इसका अस्तित्व है।
राज्य के बजट को तैयार करने का कार्य वित्त मंत्री और संबंधित मंत्रालय के अधिकारी करते हैं। मंत्री अपने पद पर नियुक्त होने से पूर्व पद एवं गोपनीयता की शपथ लेता है। यदि बजट विधानमंडल में प्रस्तुत करने से पूर्व खुल जाए तो वित्त मंत्री को व्यक्तिगत जिम्मेदारी लेते हुए पद से त्याग-पत्र  दे देना होगा। अधिकारिक गोपनीय अधिनियम, 1923 मे दंड का प्रावधान दिया गया है।
संविधान के अनु. 207(1) के तहत अनु. 199(1) के भाग (a) से (f) तक के प्रावधानों वाला कोई भी धन विधेयक राज्य विधानसभा में बगैर संबंधित राज्य के राज्यपाल की संस्तुति के पुरःस्थापित नही किया जा सकता है।
संविधान के अनु. 197 के तहत धन विधेयक से भिन्न विधेयक (साधारण विधेयक) को विधान परिषद प्रथम बार में 3 माह तक तथा विधानसभा द्वार पुनः पारित किए जाने पर 1 माह तक (इस प्रकार कुल 4 माह तक) ही रोक सकती है। धन विधेयकों को विधान परिषदों को 14 दिन की अवधि के भीतर लौटाना होता है।
सातवें संविधान संशोधन 1956 के द्वारा मध्यप्रदेश के लिए भी विधान परिषद की व्यवस्था की गई थी, किंतु इसे अस्तित्व में लाया नही जा सका है।


लोक सभा एवं राज्य विधानसभाओं को भंग तो किया जा सकता है, परंतु समाप्त नही किया जा सकता है। राज्य सभा को न तो भंग किया जा सकता है और न ही समाप्त किया जा सकता है। जबकि राज्य विधान परिषदों को यद्यपि भंग नही किया जा सकता तथापि अनु. 169 के तहत इन्हें संसद द्वारा (संबंधित राज्य की विधानसभा द्वारा विशेष बहुमत से प्रस्ताव पारित करने पर) समाप्त किया जा सकता है।
फरवरी, 2015 तक संविधान के अनुच्छेद 168(क) के अनुसार देश के सात राज्यों – आध्र प्रदेश, बिहार, जम्मू व कश्मीर, महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना (2 जून, 2015) और उ.प्र. में द्विसदनात्मक विधायिका (विधानसभा और विधान परिषद) अस्तित्व में है। तमिलनाडु में विधान परिषद की स्थापना संबंधी विधेयक यद्यपि संसद द्वारा वर्ष 2010 में पारित किया गया था, तथापि वर्ष 2012 में इसे वापस ले लिया गया।
अनुच्छेद 171 के प्रावधानों के अनुसार, विधान परिषद के सदस्यों का निर्वाचन निम्न प्रकार से होता है –
एक-तिहाई सदस्य स्थानीय निकायों द्वारा चुने जाते हैं।
1/12 सदस्य 3 वर्ष से स्नातकों द्वारा निर्वाचित किए जाते हैं।
1/12 सदस्यों को 3 वर्ष से अध्यापन कर रहे लोग चुनते हैं, जो माध्यमिक स्तर से निम्न स्तर के नही होने चाहिए।
1/3 सदस्य विधानसभा के सदस्यों द्वारा चुने जाते हैं।
शेष 1/6 सदस्यों का नामांकन राज्यपाल द्वारा किया जाता है जो कला, साहित्य, विज्ञान, सहकारी आंदोलन और समाज सेवा से जुड़े होते हैं।
अनुच्छेद 170- विधानसभाओं की संरचना (अनु. 170(1)) के अनुसार, प्रत्येक राज्य की विधानसभा उस राज्य में प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्रों से प्रत्यक्ष निर्वाचन द्वारा चुने हुए पांच सौ से अनधिक और साठ से अन्यून सदस्यों से मिलकर बनेगी।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 170 में यह प्रावधान है कि राज्य के विधानसभा के गठन में न्यूनतम 60 तथा अधिकतम 500 सदस्य हो सकते हैं। सिक्किम राज्य इसका अपवाद है, यहां विधानसभा सीटों की संख्या 32 है जबकि जम्मू-कश्मीर में 87, हरियाणा में 90 तथा उत्तरांचल (अब उत्तराखंड) में 70 सीटें है।
गोवा भारत का एकमात्र ऐसा राज्य है जहां सामान्य सिविल कोड (Common Civil Code) लागू है। वस्तुतः यहां सभी नागरिकों के लिए 19वीं शताब्दी से ही पुर्तगीज सिविल कोड चला आ रहा है, जिसे परिवर्तित नही किया गया है।
वर्ष 1956 में मात्र 5 राज्यों बिहार, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, जम्मू-कश्मीर तथा कर्नाटक राज्यों में विधान परिषदें थी। वर्तमान में आंध्र प्रदेश और तेलंगाना सहित कुल सात राज्यों में द्विसदनीय विधायिकाएं हैं।
केन्द्र के साथ-साथ राज्यों के वित्तीय लेखों पर नियंत्रण का कार्य भी भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक द्वारा ही किया जाता है।
सुचेता कृपलानी भारत के किसी भी राज्य की मुख्यमंत्री बनने वाली पहली महिला थी। वे 1963 में उ.प्र. राज्य की मुख्यमंत्री बनी थी।
संविधान के अनुच्छेद 167 में उल्लिखित है कि मुख्यमंत्री का कर्तव्य होगा कि वह राज्य के कार्यों के प्रशासन संबंधी और विधान विषयक प्रस्थापनाओं संबंधी मंत्रिपरिषद के सभी विनिश्चय राज्यपाल को संसूचित करे तथा किसी विषय को जिस पर किसी मंत्री ने विनिश्चय कर दिया है किंतु मंत्रिपरिषद ने विचार नही किया है, राज्यपाल द्वारा अपेक्षा किए जाने पर मंत्रिपरिषद के समक्ष विचार के लिए रखे। मुख्यमंत्री का राष्ट्रीय विकास परिषद की बैठक मे भाग लेना संवैधानिक कर्तव्य न होकर प्रशासनिक कर्तव्य है।
जम्मू एवं कश्मीर विधानसभा का कार्यकाल 6 वर्ष होता है और विधानसभा में बहुमत दल का नेता ही मुख्यमंत्री बनता है वह तब तक पद पर रहता है, जब तक उसे विधानसभा में  बहुमत का समर्थन प्राप्त रहता है। अतः मुख्यमंत्री का कार्यकाल निश्चित नही होता परंतु इसे सामान्यतः विधानसभा के कार्यकाल तक माना जा सकता है जो कि 6 वर्ष है।


उच्च न्यायालय
भारतीय संविधान के तहत राज्यों के न्यायिक प्रशासन में उच्च न्यायालय की स्थिति शीर्ष पर होती है।
प्रत्येक राज्य के लिए एक उच्च न्यायालय की व्यवस्था की गई है, लेकिन सातवें संविधान संशोधन अधिनियम, 1956 द्वारा संसद को यह अधिकार दिया गया है कि वह दो या दो से अधिक राज्यों एवं एक संघ राज्य क्षेत्र के लिए एक साझा उच्च न्यायालय की स्थापना कर सकती है।
भारतीय संविधान में राज्यों के लिए उच्च न्यायालय हेतु अनुच्छेद 214 से 231 में प्रावधान किया गया है।
अनुच्छेद 214 के अनुसार, प्रत्येक राज्य के लिए एक उच्च न्यायालय होगा।
अनुच्छेद 215 के अनुसार, उच्च न्यायालय अभिलेख न्यायालय होगा।
अनुच्छेद 216 के अनुसार, प्रत्येक उच्च न्यायालय, मुख्य न्यायमूर्ति और ऐसे अन्य न्यायाधीशों से मिलकर बनेगा, जिन्हें राष्ट्रपति समय-समय पर नियुक्त करना आवश्यक समझे।
अभिलेख न्यायालय होने का तात्पर्य उच्च न्यायालय के निर्णय, आदेश आदि अधीनस्थ न्यायालय के लिए बाध्यकर होंगे।
उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की नियुक्ति राष्ट्रपति करता है।
उच्च न्यायालय के न्यायाधीश 62 वर्ष की आयु तक पद धारण करते हैं।
उच्च न्यायालय के न्यायाधीश, राष्ट्रपति को संबोधित कर अपना पद त्याग सकते हैं।
उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को राष्ट्रपति के आदेश से पद से हटाया जा सकता है। राष्ट्रपति ऐसा आदेश संसद द्वारा सत्र में पारित प्रस्ताव के आधार पर जारी कर सकता है।
उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को भी उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों के समान प्रक्रिया तथा सिध्द कदाचार और अक्षमता के आधार पर हटाया जा सकता है।
उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के लिए वही योग्य हैं जो भारत के नागरिक हैं और –
ऐसे व्यक्ति जो उच्च न्यायालय मे लगातार 10 वर्ष तक अधिकवक्ता रहे हों, या
ऐसे व्यक्ति जो 10 वर्ष तक न्यायिक पद धारण कर चुके हो।
उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों का वेतन राज्य के संचित निधि से दिया जाता है।
अनु. 223 के अनुसार, उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश का पद रिक्त रहने पर या अनुपस्थितरहने पर कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति राष्ट्रपति करते हैं।
अनु. 226 के तहत मूल अधिकारों को प्रवर्तित कराने के लिए रिट जारी करने की शक्ति उच्च न्यायालय को है।
अनुच्छेद 227 के अंतर्गत उच्च न्यायालय उस राज्य के सभी न्यायालयों पर अधीक्षण करने की शक्ति रखता है।
वर्तमान में उच्च न्यायालयों की संख्या 24 है। उनमें से 7 का क्षेत्राधिकार एक से अधिक राज्यों पर है।
दिल्ली एकमात्र केन्द्रशासित प्रदेश है, जिसका अपना उच्च न्यायालय है, जबकि अन्य केन्द्रशासित प्रदेश विभिन्न राज्यों के उच्च न्यायालयों के न्यायिक क्षेत्र में आते हैं।
संसद उच्च न्यायालयों के न्यायिक क्षेत्र में विस्तार कर सकती है।
सर्वप्रथम 1862 ई. में कलकत्ता, बंबई और मद्रास उच्च न्यायालयों की स्थापना की गई थी।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय की स्थापना 1866 ई. में हुई थी।
अनु. 233(1) के अनुसार, किसी राज्य मे जिला न्यायाधीश नियुक्त होने वाले व्यक्तियों की नियुक्ति तथा जिला न्यायाधीश की पद स्थापना और प्रोन्नति उस राज्य का राज्यपाल,ऐसे राज्य के संबंध में अधिकारिता का प्रयोग करने वाले उच्च न्यायालय से परामर्श करके करेगा।


अनु. 235 के तहत उच्च न्यायालय, अधीनस्थ न्यायालयों पर नियंत्रण रखता है।
भारत में निवारक निरोध के अंतर्गत एक व्यक्ति को बिना  मुकदमा चलाए अधिकतम तीन माह बंदी बनाकर रखा जा सकता है।
लोक अदालतों के माध्यम से सामान्य न्यायालयों में लंबित मामलों का दोनों पक्षों के मध्य समझौते के आधार पर निपटारा किया जाता है।
इसमें दीवानी मामलों के साथ-साथ कतिपय आपराधिक मामलो पर भी विचार किया जाता है।
लोक अदालतों में वर्तमान या सेवानिवृत्त न्यायिक अधिकारी अथवा विधिक ज्ञान रखने वाला व्यक्ति पीठासीन अधिकारी होता है।
ग्राम न्यायालय अधिनियम, 2008 के तहत ग्राम न्यायालय को सिविल तथा आपराधिक दोनों ही मामलों की सुनवाई का अधिकार है.
संविधान के अनुच्छेद 202(3)(घ) के अनुसार, उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के वेतन एवं भत्ते राज्य का संचित (समेकित) निधि से दिए जाते हैं, किंतु अनु. 112(3)(घ) के तहत इन्हें पेशन भारत सरकार की संचित निधि से दी जाती है।
उच्च न्यायालय के न्यायामूर्ति की सेवानिवृत्ति की आयु 62 वर्ष है। संविधान के अनुच्छेद 217(1) में 15वें संविधान संशोधन, 1963 (तब 60वर्ष थी) द्वारा यह उम्र सीमा निर्धारित की गई है। उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की सेवानिवृत्ति की आयु 62 वर्ष से बढ़ाकर 65 वर्ष करने हेतु 114वां संविधान संशोधन विधेयक संसद के विचाराधीन है।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने रहमतुल्ला बनाम स्टेट ऑफ यू.पी., 1994 के मामले में यह निर्णय दिया कि यदि विधि के उपबंधों को विफल करने के उद्देश्य से तीन बार तलाक कहकर तलाक लिया जाता है, तो ऐसा तलाक गैर-कानूनी होगा।
अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह पर कोलकाता उच्च न्यायालय का क्षेत्राधिकार है, जिसकी सर्किट बेंच (पीठ) पोर्ट ब्लेयर में है। वर्तमान में 7 उच्च न्यायालय ऐसे हैं जिनकी अधिकारिता एक से अधिक  राज्यों/संघ क्षेत्रों पर है जैसे – मुंबई उच्च न्यायालय, कोलकाता उच्च न्यायालय, गुवाहाटी उच्च न्यायालय, केरल उच्च न्यायालय, मद्रास उच्च न्यायालय और पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय तथा आंध्र प्रदेश एवं तेलंगाना उच्च न्यायालय।
बंबई उच्च न्यायलय का क्षेत्राधिकार महाराष्ट्र, दादरा एवं नगर हवेली गोवा तथा दमन व दीव तक है।
संघ राज्य क्षेत्रों को छोड़ दिया जाए तो 4 ऐसे उच्च न्यायालय हैं, जिनके अधिकारिता क्षेत्र में एक से अधिक राज्य हैं –
गुवाहाटी उच्च न्यायालय – अरुणाचल प्रदेश, असोम, नगालैंड, मिजोरम।
मुंबई उच्च न्यायालय – महाराष्ट्र और गोवा।
पंजाब एवं हरियाणा – पंजाब और  हरियाणा
तेलंगाना एवं आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय – आंध्र प्रदेश एवं तेलंगाना।
मूल अधिकारों का संरक्षण उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालय दोनों की अधिकारिता में आते हैं। अतः इस हेतु उच्चतम न्यायालय को अनुच्छेद 32 के अंतर्गत एवं उच्च न्यायालय को अनुच्छेद 226 के अंतर्गत रिट जारी करने की शक्ति दी गई है।


मैंडमस (परमादेश) का आशय है – हम आदेश देते हैं। इस प्रकार इस याचिका द्वारा कार्यपालिका से उसे कार्य करने के लिए कहा जाता है, जो उसे प्रदत्त शक्तियों के अंतर्गत करना चाहिए।
भारतीय संविधान के अनुसार, परामर्श संबंधी क्षेत्राधिकार अनु. 143 के तहत मात्र सर्वोच्च न्यायालय का है। ज्ञातव्य है कि संघ तथा राज्यें या राज्यों के बीच विवादों के निर्णय का प्रारंभिक एवं एकमेव क्षेत्राधिकार सर्वोच्च न्यायालय के पास है परंतु मूल अधिकारों को लागू करने के संबंध में प्रारंभिक क्षेत्राधिकार उच्च न्यायलयों का भी है (अनु. 226 के तहत)।
उत्प्रेषण एवं प्रतिषेध याचिकाएं अधीनस्थ न्यायालयों की कार्यपध्दति का परीक्षण करती हैं। जब अधीनस्थ न्यायालय अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर किसी विषय पर सुनवाई करता है तो ऊपरी न्यायालय प्रतिषेध याचिका द्वारा मामले को अपने पास मंगा लेता है।
प्रतिषेध (Prohibition) रिट न्यायालय मे कार्यवाही लंबित रहने की दशा में लागू की जाती है। जब निचला न्यायालय अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर किसी विषय पर सुनवाई करता है तो ऊपरी न्यायालय प्रतिषेध रिट जारी करके मामले को अपने पास मंगा लेता है।
जनहित याचिका के माध्यम से नागरिक समाज का कोई व्यक्ति या समूह किसी व्यक्ति, समूह या समाज के हित संबंधी मामलों में न्यायिक उपचार की प्राप्ति हेतु न्यायालय जा सकता है।
केशवानंद भारतीय मामले (1973) के बाद सर्वोच्च न्यायालय द्वारा मूल ढांचे के अवधारणा के तहत किसी भी मामले का पुनरीक्षण किया जा सकता है।
बाबरी मस्जिद/राम जन्मभूमि का विवाद इलाहाबाद उच्च न्यायालय के समक्ष स्वत्वाधिकार मुकदमें (Title suit) के रुप में प्रस्तुत किया गया है, जिसमें दो समुदायों ने  बाबरी मस्जिद/राम जन्म भूमि की जमीन एवं संपत्ति पर अपने-अपने दावे पेश किए हैं।
भारतीय संविधान के भाग VI के अध्याय 6 के अच्छेद 233 में जिला न्यायाधीश शब्द का उल्लेख किया गया है, जिसके अंतर्गत जिला न्यायालयों की नियुक्ति का प्रावधान है।
अनुच्छेद 236(क) के अंतर्गत जिला न्यायाधीश अभिव्यक्ति के अंतर्गत शामिल हैं – नगर सिविल न्यायालय का न्यायाधीश, अपर जिला न्यायाधीश, संयुक्त जिला न्यायाधीश, सहायक जिला न्यायाधीश, लघुवाद न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश, मुख्य प्रेसीडेंसी मजिस्ट्रेट, अपर मुख्य प्रेसीडेंसी मजिस्ट्रेट, सेशन न्यायाधीश, अपर सेशन न्यायाधीश, सहायक सेशन न्यायाधीश।
अनु. 217(1)(ख) में उच्च न्यायालय के किसी न्यायाधीश को उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश को हटाने के लिए अनु. 124 के खण्ड (4) में उपबंधित रीति से उसके पद से राष्ट्रपति द्वारा हटाया जा सकेगा। इन्हें संविधान के अनुच्छेद 124(4) में विहित प्रक्रिया से साबित कदाचार या असमर्थता के आधार पर  संसद द्वारा अधिनियमित न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 के तहत संसद में हटाने संबंधी प्रस्ताव पारित करके हटाया जा सकता है।


अनु. 220 के अनुसार, उच्च न्यायालय का स्थायी न्यायाधीश सेवानिवृत्ति के पश्चात जिस उच्च न्यायालय में वह स्थायी न्यायाधीश रहा हो, उससे भिन्न उच्च न्यायालय या उच्चतम न्यायालय में अभिवचन कार्य कर सकता है, जबकि उच्चतम न्यायालय का सेवानिवृत्ति न्यायाधीश भारत के किसी न्यायालय या प्राधिकारी के समक्ष अभिवचन का कार्य नही कर सकता है। (अनु. 124)
भारत में निवारक निरोध (Preventive Detention) के अंतर्गत एक व्यक्ति को बिना मुकदमा चलाए अधिकतम 3 माह तक (संविधान के अनु. 22(4) के अनुसार) बंदी बनाकर रखा जा सकता है।
आठवें विधि आयोग के अध्यक्ष न्यायाधीश एच.आर. खन्ना ने आयोग की 80वीं रिपोर्ट न्यायाधीशों की नियुक्ति के तरीकें में उपबंध 5(VI) के अंतर्गत उच्च न्यायालय के एत-तिहाई न्यायाधीश दूसरे राज्य से होने की सिफारिश की थी।
लोक अदालतों मे सामान्य न्यायालयों मे लंबित मामलों का दोनों पक्षों के मध्य समझौते के आधार पर निपटारा किया जाता है। इनमें दीवानी मामलों के साथ-साथ कतिपय आपराधिक मामलों पर भी विचार किया जाता है। लोक अदालतों मे वर्तमान या सेवानिवृत्त न्यायिक अधिकारी अथवा विधिक ज्ञान रखने वाला सम्माननीय व्यक्ति पीठासीन अधिकारी होता है तथा सामान्यतः एक वकील एवं एक सामाजिक कार्यकर्ता इसके सदस्य होते हैं।
ग्राम न्यायालय अधिनियम, 2008 के अंतर्गत धारा-11 के अंतर्गत ग्राम न्यायालय को सिविल तथा आपराधिक, दोनों ही मामलों की सुनवाई का अधिकार है। अधिनियम की  धारा-27 के अनुसार, स्थानीय सामाजिक सक्रियतावादियों को मध्यस्थ/सुलहकर्ता के रुप में स्वीकार किया गया है।
केन्द्र-राज्य संबंध
विधायी संबंध
केन्द्र और राज्यों के मध्य बेहतर संबंधों की स्थापना के लिए उनके मध्य विधायी, प्रशासनिक एवं वित्तीय संबंधों का वर्णन संविधान के भाग 11 एवं 12 में किया गया है।
संविधान के भाग XI में अनुच्छेद 245 से 255 तक केन्द्र-राज्य विधायी के प्रावधान उल्लिखित हैं।
अनु. 245(1) के अनुसार, संसद भारत के संपूर्ण राज्य क्षेत्र या उसके किसी  भाग के लिए विधि बना सकेगी और किसी राज्य का विधानमंडल संपूर्ण राज्य या उसके किसी  भाग के लिए विधि बना सकेगा।
अनु. 247 के तहत संसद को अधिकार है कि वह कुछ अतिरिक्त न्यायालयों की स्थापना कर सकती है।
संविधान के अनुच्छेद 248 के अनुसार अवशिष्ट विधायी शक्तियां संघीय संसद को सौंपी गई हैं।
संविधान के अनुच्छेद 246 के तहत केन्द्र एवं राज्यों के विधायी शक्तियों के बंटवारे के लिए तीन सूचियों को संविधान की 7वीं अनुसूची में वर्णित किया गया है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 249 राज्य सूची के विषयों के संबंध में संसद की विधायी शक्तियों की संबंधित है। यदि राज्य सभा ने उपस्थित और मत देने वाले सदस्यों मे से कम-से-कम दो-तिहाई सदस्यों द्वारा समर्थित संकल्प द्वारा घोषित किया है कि राष्ट्रीय हित में यह आवश्यक है कि संसद राज्य सूची के विषय पर विधि बनाए, तो संसद उस विषय पर कानून बना सकती है।
अनु. 250(1) के अनुसार, राष्ट्रपति द्वारा आपातकाल घोषित किए जाने की स्थिति में संसद को राज्य सूची में वर्णित विषयों पर विधि बनाने का अधिकार प्राप्त हो जाता है।
अनु. 251 के अनुसार, यदि संसद द्वारा अनु. 249 और अनु. 250 के अधीन बनाई गई विधियों और राज्यों के विधानमंडलों  द्वारा बनाई गई विधियों में असंगति पाई जाती है, तो संसद द्वारा निर्मित विधि प्रभावी होगी।
अनु. 252 के तहत दो या अधिक राज्यों के लिए उनकी सहमति से विधि बनाने की संसद की शक्ति और ऐसी विधि का किसी अन्य राज्य द्वारा अंगीकार किया जाना उल्लिखित है।
अनु. 253 के तहत संसद को किसी अन्य देश या देशों के साथ की गई किसी संधि, करार या अभिसमय अथवा अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन, संगम या अन्य निकाय में किए गए किसी विनिश्चय के कार्यान्वयन के लिए भारत के संपूर्ण राज्य क्षेत्र या उसके किसी भाग के लिए कोई विधि बनाने की शक्ति है।
संविधान के भाग 11 के अंतर्गत अनु. 256-263 के तहत केन्द्र और राज्यों के मध्य प्रशासनिक संबंधों का उल्लेख किया गया है।


अनु. 256 के तहत प्रत्येक राज्य की कार्यपालिका शक्ति का इस प्रकार प्रयोग किया जाएगा, जिससे संसद द्वारा निर्मित विधियों की सुनिश्चितता बनी रहे।
अनु. 257 के तहत संघ सरकार कुछ दशाओं मे राज्यों पर नियंत्रण रखती है।
अनु. 258 के अनुसार, राष्ट्रपति, किसी राज्य सरकार की सहमति से उस सरकार को या उसके अधिकारियों को ऐसे किसी विषय से संबंधित कृत्य, जिन पर संघ की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार है, सौंप सकेगा।
अनु. 262(j) के अनुसार, संसद विधि द्वारा, किसी अंतरराज्यिक नदी या नदी-दून के या उसमें जल के प्रयोग, वितरण या नियंत्रण के संबंध में किसी विवाद या परिवाद के न्यायनिर्णयन के लिए उपबंध कर सकेगी।
अनु. 263 के अनुसार, राज्यों के बीच विवादों की जांच करने और उन पर सलाह देने तथा कुछ या सभी राज्यों के अथवा संघ और एक या अधिक राज्यों के सामान्य हित से संबंधित विषयों के अन्वेषण और उन पर विचार-विमर्श करने हेतु राष्ट्रपति आदेश द्वारा अंतरराज्य परिषद की स्थापना करेगा।
अनु. 264 से 281 के तहत केन्द्र तथा राज्य सरकारों के मध्य वित्तीय संबंधों का प्रावधान किया गया है।
अनु. 265 के अनुसार, कोई कर विधि के प्राधिकार से ही अधिरोपित या संगृहीत किया जाएगा, अन्यथा नही।
अनु. 266 के तहत भारत और राज्यों की संचित निधियों और लोक लेखे का उल्लेख किया गया है।
अनु. 267(1) के तहत संसद, भारत की आकस्मिकता निधि की स्थापना कर सकेगी।
अनु. 267(2) के तहत राज्य विधानमंडल, विधि द्वारा राज्य की आकस्मिकता निधि की स्थापना कर सकेगी।
अनु. 275 के तहत कुछ राज्यों कों संघ से अनुदान की व्यवस्था की गई है।
अनु. 280(1) के अनुसार, राष्ट्रपति, संविधान के प्रारंभ के दो वर्ष के भीतर और तत्पश्चात  प्रत्येक वर्ष की समाप्ति पर या पूर्वतर समय पर, जिसे राष्ट्रपति आवश्यक समझता है, आदेश द्वारा वित्त आयोग का गठन करेगा।
अनु. 281 के तहत राष्ट्रपति, वित्त आयोग द्वारा की गई प्रत्येक सिफारिश को ,संसद के प्रत्येक सदन के समक्ष रखवाएगा।
केन्द्र-राज्य संबंधों पर विचार करने के लिए न्यायमूर्ति आर.एस. सरकारिया की अध्यक्षता में जून, 1983 में एक आयोग का गठन किया गया था।
बी. शिवरामन तथा एस.आर.सेन इसके अन्य दो सदस्य थे।
इस आयोग ने जनवरी, 1988 में अपनी रिपोर्ट सौंपी थी। केन्द्र-राज्य से संबंधित अन्य आयोगों मे राजमन्नार समिति तथा पुंछी आयोग हैं।
भारत में केन्द्र-राज्य संबंध- संवैधानिक प्रावधानों, परंपराओं और व्यवहारों, न्यायिक व्याख्याओं तथा बातचीत के लिए यंत्र विन्यास इन चारों पर निर्भर करता है।
संघीय राज व्यवस्था में संघ और राज्यों के  बीच संबध, राज्यों के मध्य आपस में संबंध, पारस्परिक समन्वय के लिए तंत्र और विवादों को सुलझाने के लिए तंत्र ये चारों ही सम्मिलित हैं।
संविधान के अनुच्छेद 246 के तहत केन्द्र एवं राज्यों के मध्य विधायी शक्तियों के बंटवारें के लिए तीन सूचियों- संघ सूची, राज्य सूची एवं समवर्ती सूची की व्यवस्था है, जिन्हें संविधान की 7वीं अनुसूची में वर्णित किया गया है।


अनु. 268 के अनुसार, स्टाम्प शुल्क संघ  द्वारा लगाया जाता है। किंतु उसे राज्य सरकार द्वारा संगृहीत और विनियोजित किया जाता है।
नदी बोर्ड्स एक्ट 1956 मे लागू हुआ था।
झारखंड क्षेत्र स्वायत्त परिषद का गठन 8 अगस्त, 1995 को संथाल परगना और छोटानागपुर क्षेत्र के 18 जिलों को शामिल करते हुए किया गया था तथा शिबू सोरेन इस परिषद के अध्यक्ष नामिक किए गए थे।
1956 के संसद के अधिनियम के माध्यम से पांच क्षेत्रीय परिषदों- उत्तर, दक्षिण, केन्द्रीय, पूर्वी और पश्चिमी का गठन किया गया। 1971 छठीं क्षेत्रीय परिषद (उत्तर-पूर्व) का गठन किया गया। गृह मंत्री प्रत्येक क्षेत्रीय परिषद का अध्यक्ष होता है।
क्षेत्रीय परिषद एक सांविधिक (Statutory) निकाय है (न कि संवैधानिक संस्था), जिनका गठन राज्यों की बीच अंतर-राज्य सहयोग और समन्वय बढ़ाने के लिए राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 के तहत किया गया था। इनकी संख्या 5 है। यथा – उत्तरी क्षेत्रीय परिषद, मध्य क्षेत्रीय परिषद, पूर्वी क्षेत्रीय परिषद, पश्चिमी क्षेत्रीय परिषद तथा दक्षिणी क्षेत्रीय परिषद। चंडीगढ़ राज्य ने होते हुए भी उत्तरी क्षेत्रीय परिषद मे शामिल है। इसके अतिरिक्त दिल्ली, दादरा एवं नगर हवेली, दमन व द्वीप  तथा पुडुचेरी संघ राज्य क्षेत्र होते हुए भी क्षेत्रीय परिषद में शामिल किए गए हैं । इन क्षेत्रीय परिषदों का कार्य विभिन्न क्षेत्रों में आपसी हित के मामलों पर चर्चा तथा सिफारिशें करना है। यह  एक परामर्शदात्री संस्था है।
भारतीय संघ मे केन्द्र की स्थिति और भूमिका शक्तिशाली है, इस संबंध में राज्यों पर केन्द्र का वर्चस्व है। यद्यपि वित्तीय विषयों का बंटवारा दोनो के मध्य  किया गया है किंतु वित्तीय स्त्रोतो का आवंटन केन्द्र के पक्ष में अधिक है। राज्यों के पास विकास कार्यों के लिए पर्याप्त संसाधन नही हैं। यही कारण है कि केन्द्र-राज्य संबंधें पर पुनर्विचार की मांगे बढ़ती जा रही हैं। इसलिए आलोचकों ने राज्यों की स्थिति की तुलना नगरपालिकाओं से की है।
सरकारिया आयोग ने रिपोर्ट में स्थायी रुप से अंतर-राज्यीय परिषद की स्थापना का समर्थन किया।
संविधान के अनु. 274 के अनुसार, कृषि आय कर या ऐसे कराधान जिनमें राज्य हितबध्द है, हेतु प्रावधान नियत किए गए हैं।
इन्द्रजीत गुप्ता समिति का गठन वर्ष 1998 में चुनाव सुधार एवं जनप्रतिनिधित्व कानून 1951 में संशोधन के लिए सुझाव देने के लिए किया गया था। इस समिति का मुख्य उद्देश्य चुनाव कार्यों में राज्य की ओर से धन उपलब्ध कराए जाने की व्यवहार्यता का विशेष अध्ययन करना और उस पर  अपना निष्कर्ष देना था।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 270 में कृषि आय के अतिरिक्त अन्य आय पर लगने वाला कर केन्द्र सरकार द्वारा लगाया और वसूला जाता है, लेकिन इससे प्राप्त आय केन्द्र राज्यो के  बीच वितरित की जाती  है।


आपात उपबंध
भारतीय संविधान के भाग 18 में आपात से संबंधित उपबंध निहित हैं।
ये आपातकालीन उपबंध को किसी भी असामान्य स्थिति से प्रभावी तरीके से निपटने में समक्ष बनाते हैं।
संविधान में तीन स्थितियो में आपातकाल की व्यवस्था की गई है –
युध्द, बाह्य आक्रमण और सशस्त्र विद्रोह के कारण
राज्यों में संवैधानिक तंत्र की विफलता के कारण
वित्तीय आपात
आपातकाल के दौरान सभी राज्य केन्द्र के पूर्ण नियंत्रण में आ जाते हैं।
अनुच्छेद 352 के तहत भारत का राष्ट्रपति युध्द, बाह्य  आक्रमण या सशस्त्र विद्रोह की स्थिति उत्तन्न होने पर राष्ट्रीय आपात की घोषणा कर सकता है।
आपातकाल की उद्घोषणा का अनुमोदन संसद के दोनों सदनों द्वारा एक माह के भीतर होना आवश्यक है।
लोक सभा के विघटन की स्थिति में आपातकाल की उद्घोषणा, लोक सभा के पुनर्गठन के बाद पहली बैठक से 30 दिनों तक जारी रहेगी, यदी इस दौरान राज्य सभा द्वारा इसका अनुमोदन कर दिया गया हो।
संसद को दोनों सदनों से अनुमोदन के पश्चात आपातकाल 6 माह तक जारी रहेगा तथा प्रत्येक 6 माह मे संसद के अनुमोदन से इसे आगे भी जारी रखा जा सकता है।
राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान संसद को राज्य सूची में वर्णित विषयों पर कानून बनाने का अधिकार प्राप्त हो जाता है।
आपाताकाल के दौरान संसद द्वारा राज्य सूची के विषयों पर बनाए गए कानून आपातकाल की समाप्ति के बाद 6 माह तक प्रभावी रहते हैं।
आपातकाल के दौरान संसद सत्र न चल रहा हो, तो राष्ट्रपति, राज्य सूची के विषयों पर भी अध्यादेश जारी कर सकता है।
जब वित्तीय आपाताकाल की उद्घोषणा लागू हो तब राष्ट्रपति, केन्द्र तथा राज्यों के मध्य करो के संवैधानिक वितरण को संशोधित कर सकता है।
राष्ट्रीय आपाताकाल की उद्घोषणा के दौरान लोक सभा का कार्यकाल (5 वर्ष), संसद द्वारा विधि बनाकर एक बार में एक वर्ष के लिए बढ़ाया जा सकता है। किंतु आपाताकाल की समाप्ति के बाद 6 माह से ज्यादा नही हो सकता।
संविधान के अनु. 358 तथा 359 राष्ट्रीय आपातकाल का मूल अधिकारों पर प्रभाव का उल्लेख करते हैं।
अनु. 358 के तहत जब राष्ट्रीय आपात की उद्घोषणा की जाती है, तो अनु. 19 द्वारा प्रदत्त स्वतंत्रता के 6 मूल  अधिकार स्वतः ही निलंबित हो जाते हैं। इसके लिए अलग से आदेश जारी करने की आवश्यकता नही होती।
अनु. 359 के तहत अन्य मूल अधिकारों (अनु. 20 एवं 21 को छोड़कर) के निलंबन से संबंधित प्रावधान है। यह राष्ट्रपति को यह शक्ति देता है कि वह मूल अधिकारों के निलंबन को लागू करे।
अनु. 352 के तहत आपातकाल अब तक तीन बार (1962, 1971 और 1975) घोषित किया गया है।
अनु. 356 के अनुसार, राज्यों में संवैधानिक तंत्र की विफलता का राष्ट्रपति शासन की घोषणा की जा सकती है। इस व्यवस्था के तहत राष्ट्रपति को राज्य सरकार की समस्त शक्तियां प्राप्त हो जाती हैं।
राष्ट्रपति, मुख्यमंत्री के नेतृत्व वाली मंत्रिपरिषद को भंग कर देता है। इस दौरान संसद, राज्य के बजट प्रस्ताव को पारित करती है। इस प्रकार की उद्घोषणा जारी ह ने के बाद दो माह के भीतर इसका संसद के दोनों सदनों द्वारा अनुमोदन हो जाना चाहिए।


यदि उद्घोषणा दोनों सदनों द्वारा स्वीकृत हो, तो राष्ट्रपति शासन 6 माह तक चलता है।
प्रत्येक 6 माह पर संसद की स्वीकृति से इसे अधिकतम तीन वर्ष की अवधि तक बढ़ाया जा सकता है।
राष्ट्रपति शासन का प्रस्ताव सदन द्वारा सामान्य बहुमत से पारित किया जा सकता है।
जम्मू-कश्मीर राज्य में राज्यपाल शासन का प्रावधान है।
अनु. 360 के तहत वित्तीय आपात से संबंधित प्रावधान उल्लिखित हैं।
राष्ट्रपति यदि संतुष्ट हो कि ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गई है कि भारत या उसके किसी क्षेत्र की वित्तीय स्थिति खतरे में है तो वह वित्तीय आपात की घोषणा कर सकता है।इस उद्घोषणा, को घोषित तिथि के दो माह  के अंदर संसद के स्वीकृति मिलना अनिवार्य है।
संसद की सामान्य बहुमत से प्राप्त स्वीकृति के उपरांत वित्तीय आपात अनिश्चितता के लिए तब तक प्रभावी रहेगा, जब तक इसे वापन न लिया  जाए।
वित्तीय आपात की अवधि में राज्य के सभी वित्तीय मामलों पर केन्द्र का नियंत्रण हो जाता है। हालांकि अभी तक वित्तीय आपातकाल लागू नही हुआ है।
के.एम. नाम्बियार के अनुसार, राष्ट्रपति का आपातकालीन अधिकार संविधान के साथ धोखा है।
मूल संविधान के अनु. 352 के आंतरिक अशांति के स्थान पर 44वें संविधान संशोधन (1978) से सशस्त्र विद्रोह प्रतिस्थापित किया गया है।
अनु. 355 संघ का यह कर्तव्य है कि बाह्य आक्रमण और आंतरिक अशांति से प्रत्येक राज्य की रक्षा करे।
अनु. 356 राज्य में संवैधानिक तंत्र की विफलता पर राष्ट्रपति शासन का प्रावधान करता है।
किसी राज्य के राज्यपाल को राज्य में संवैधानिक विफलता दिखाई दे तो वह इसके तहत राष्ट्रपति के उस राज्य में राष्ट्रपति शासन की अनुशंसा कर सकता है।
भारतीय संविधान के अनु. 360 के तहत वित्तीय आपातकाल का प्रावधान किया गया है।
भारत में वित्तीय आपातकाल (अनु. 360 के तहत) अब तक लागू नही किया गया है।
संसद द्वारा संकटकाल की घोषणा का अनुमोदन 1 माह की अवधि के  भीतर होना आवश्यक है।
एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघ, 1994 द्वारा उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया है कि अनु. 356 से संबंधित उद्घोषणा का न्यायिक पुनरावलोकन किया जा सकता है तथा उद्घोषणा के साथ ही, राज्य विधानमंडल भंग नही किया जा सकती है, जब तक कि ऐसी उद्घोषणाओ का  संसद के दोनों सदनों द्वारा दो माह के अंदर अनुमोदन नही कर दिया जाता  है। इसमें यह  भी निर्धारित किया गया है  कि संवैधानिक तंभ की विफलता यथार्थ में होनी चाहिए न  कि कल्पित आधारों पर।
अनु. 352 के तहत लगाए गए राष्ट्रीय आपातकाल में लोक सभा की अवधि अनु. 83(2) के परंतुक के अनुसार, संसद विधि द्वारा, ऐसी अवधि के लिए बढ़ा सकेगी, जो एक बार में एक वर्ष से अधिक नही होगी तथा आपात उद्घोषणआ के प्रवर्तन में न रह जाने के पश्चात उसका विस्तार किसी भी दशा में छह माह की अवधि से अधिक नही होगा।
भारतीय संविधान के अनु. 356 के तहत राष्ट्रपति शासन सर्वप्रथम 1951 तत्कालीन पंजाब और पटियाला एवं ईस्ट पंजाब स्टेट यूनियन (PEPSU) राज्य मे लागू किया गया था।
संविधान के अनु. 172(1) के परंतुक के अनुसार आपात उद्घोषणा प्रवर्तन की अवस्था मे संसद विधि द्वारा, किसी राज्य विधानसभा की अवधि एक बार एक वर्ष के लिए बढ़ा सकती है कितु आपात उद्घोषणा के प्रवर्तन की स्थिति में न रह जाने पर किसी भी दशा में उसका विस्तार छः मास की अवधि से अधिक नही होगा।


वित्त आयोग
संविधान का अनुच्छेद 280, राष्ट्रपति द्वारा प्रत्येक पांच वर्ष के अंतराल पर या आवश्यकतानुसार उससे पहले एक वित्त आयोग के गठन का प्रावधान करता है।
यह केन्द्र सरकार के कुल कर संग्रह मे राज्य सरकार की हिस्सेदारी का फैसला करता है।
पहले वित्त आयोग का गठन के.सी. नियोगी की अध्यक्षता में 22 नवंबर, 1951 को किया गया था।
14वें वित्त आयोग के अध्यक्ष श्री. वाई.वी. रेड्डी थे।
14वें वित्त आयोग का कार्यकाल वर्ष 2015 से 2020 तक है।
14वें वित्त आयोग ने केन्द्र के विभाज्य कर पूल मे राज्यों की हिस्सेदारी को वर्तमान के 32 प्रतिशत से बढ़ाकर 42 प्रतिशत करने की अनुशंसा की।
15वें वित्त आयोग का गठन एन. के. सिंह की अध्यक्षता में किया गया है। इसकी सिफारिशें वर्ष 2020 से 2025 कार्यकाल के लिए लागू होंगी।
राज्य वित्त आयोग एक संवैधानिक संस्था है।
संविधान के अनु. 280(1) के तहत वित्त आयोग राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त किए जाने वाले एक अध्यक्ष और चार अन्य सदस्यों से मिलकर बनता है।
संविधान की सातवी अनुसूची मे केन्द्र एवं राज्यों के मध्य शक्तियों के बंटवारे के बारे मे दिया गया है। इसके अंतर्गत तीन सूचियां हैं – संघ सूची, राज्य सूची एवं समवर्ती सूची। शेय़र बाजार तथा फ्यचर्स बाजार में लेन देन पर कर संघ सूची के अंतर्गत आता है। तथापि संविधान के अनु. 268 के तहत ऐसे कर केन्द्र द्वार लगाए जाते हैं, परंतु राज्यों द्वारा संगृहीत और विनियोजित किए जाते  हैं।
संविधान के अनु. 280(3) के अनुसार वित्त आयोग के कार्य हैं –
केन्द्र व राज्यों में राजस्व बंटवारे के लिए मापदण्डों/सिध्दांतों की अनुशंसा करना।
संघ द्वारा राज्यों के दिए जाने वाले सहायता अनुदानों के संबंध में सिध्दांत निश्चित करना।
राज्यों के वित्त आयोगो द्वारा दी गई सिफारिशों के आधार पर पंचायतों के विकास के लिए राज्य की निधि मे वृध्दि के लिए आवश्यक उपाय सुझाना।
कोई अन्य विषय जिसके बारे में राष्ट्रपति आयोग से सिफारिशे करेगा। भारत की संचित निधि से धन निकालने की अनुमति देना संसद का कार्य है। संघ सरकार तथा राज्य सरकारें बजट के प्रावधानों के अनुसार करों की उगाही कर रही हैं या नही इसका देख-रेख करना वित्त मंत्रालय का कार्य है।
भारतीय संविधान के अनु. 280(3) के तहत भारत का वित्त आयोग निम्नलिखित मामलों में सुझाव देता है –
संघ और राज्यों के बीच संघीय करों की प्राप्तियों का वितरण
अनु. 275 के तहत राज्यों के राजस्व में सहायता अनुदान, तथा
अन्य कोई विषय जो  राष्ट्रपति आयोग को निर्दिष्ट करें।
अनु. 270 के तहत भारत में वित्त आयोग की सिफारिशों के आधार पर केन्द्र एवं राज्यों के मध्य आय कर का एवं अनु. 272 के तहत केन्द्रीय उत्पाद शुल्क का विभाजन किया जाना था। ध्यातव्य है कि 80वां संशोधन  अधिनियम, 2000 की धारा 4 द्वारा अनु. 272 को विलोपित कर दिया गया है। साथ ही वित्त आयोग राज्यों को अनु. 275 के तहत सहायतार्थ अनुदान निर्धारण भी करता है। परंतु व्यापार कर राज्यों द्वारा लगाया एवं संगृहीत किया जाता है, जिसका विभाजन वित्त आयोग का कार्य नही है।
केन्द्र और राज्यों के बीच वित्तीय विवादों के निपटारें में वित्त आयोग महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। वह केन्द्र और राज्य के बीच वित्त के न्यायपूर्ण वितरण हेतु उपाय सुझाता है।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 243(1) के तहत यह प्रावधान है कि राज्यपाल, 73वां संविधान संशोधन अधिनियम 1992 के लागू होने के एक वर्ष के अंदर तथा उसके बाद प्रत्येक पांच साल बाद एक वित्त आयोग की स्थापना करेगा। इस प्रकार राज्य वित्त आयोग एक संवैधानिक संस्था है। वही अनु. 280(3)(bb) के तहत संघीय वित्त आयोग, राज्य वित्त आयोग की सिफारिशों के आधार पर राज्यो की पंचायतों को संसाधन की उपलब्धता के लिए राज्य की संचित निधि में वृध्दि के लिए आवश्यक उपाय करेगा।
संघ एवं राज्यों के बीच करों के विभाजन संबंधी अनु. 268 से अनु. 279 तक के प्रावधानों को संविधान के राष्ट्रीय आपात की स्थिति में अनु. 354 (1) के तहत राष्ट्रपति के आदेश के द्वारा निलंबित या उस आदेश में विनिर्दिष्ट उपांतरणों के अधीन प्रभावी किया जा सकता है।


भारतीय संविधान में अनुच्छेद 280 के तहत प्रत्येक 5 वर्ष के बाद वित्त आयोग के गठन का प्रावधान है। 12वें वित्त आयोग की अनुशंसाओं की संदर्भ अवधि वर्ष 2005 से वर्ष 2010 तक की थी। इसका अध्यक्ष रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर डॉ.सी. रंगराजन को बनाया गया था। वित्त आयोग में एक अध्यक्ष के अतिरिक्त चार अन्य सदस्य होते हैं, जिनकी नियुक्ति भारत के राष्ट्रपति के द्वारा की जाती है। 13वें वित्त आयोग के अध्यक्ष विजय केलकर थे। 14वें वित्त आयोग का गठन डॉ. वाई.वी. रेड्डी की अध्यक्षता मे किया गया है। जिसने अपनी रिपोर्ट 15 दिसंबर, 2014 को सौंपी। 15वें वित्त आयोग के गठन की घोषणा 27 नवंबर, 2017 को की गई जिसके अध्यक्ष डॉ. एन. के. सिंह हैं।
राज्य वित्त आयोग एक संवैधानिक संस्था है। इसका गठन राज्यपाल द्वारा अनुच्छेद 243झ के तहत किया  जाता है, जो प्रत्येक पांचवे वर्ष पंचायत की वित्तीय स्थिति का पुनर्विलोकन करता है। अनु. 243(म) के तहत राज्य वित्त आयोग नगरपालिकाओं की वित्तीय स्थिति का  भी पुनर्विलोकन करता  है।
संविधान के अनु. 280(1) के तहत वित्त आयोग राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त किए जाने वाले एक अध्यक्ष और चार अन्य सदस्यों से मिलकर बनता है।
योजना आयोग/नीति आयोग
योजना आयोग एक संविधानेत्तर संस्था थी। इसका संविधान में कोई उल्लेख नही है। इसे परामर्शदात्री संस्था भी कहते हैं।
योजना आयोग का गठन केन्द्रीय मंत्रिमंडल के एक संकल्प द्वारा 15 मार्च, 1950 को किया गया। प्रधानमंत्री इसका पदेन अध्यक्ष होता है।
योजना आयोग के प्रथम उपाध्यक्ष गुलजारी लाल नंदा थे। इसका मुख्य कार्य केन्द्र की पंचवर्षीय योजना का निर्माण करना था।
योजना आयोग को समाप्त कर उसके स्थान पर 1 जनवरी, 2015 को नया संस्थान नीति आयोग अस्तित्व में आया।
नीति (NITI) से आशयः National  Institution for Transforming India है।
वर्तमान में नीति आयोग के उपाध्यक्ष राजीव कुमार हैं, इनसे पहले इस पद पर अरविन्द पनगड़िया थे।
नीति आयोग के उपाध्यक्ष का दर्जा भारत सरकार के कैबिनेट मंत्री के समान है।
नीति आयोग सहकारी संघवाद के सिध्दांत पर आधारित है।
राष्ट्रीय विकास परिषद का गठन 6 अगस्त, 1952 को हुआ था।


प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 15 अगस्त, 2014 को  लाल किले की प्राचीर से स्पष्ट उद्घोषित किया था कि योजना आयोग के स्थान पर नया संस्थान अस्तित्व में आएगा। आब योजना आयोग को समाप्त कर उसके स्थान पर 1 जनवरी, 2015 को नीति  आयोग (NITI: National Institution for transforming India  Aayog) स्थापित कर दिया गया है। वर्तमान में इसके उपाध्यक्ष राजीव कुमार हैं।
योजना आयोग के प्रथम अध्यक्ष तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु थे, क्योकि प्रधानमंत्री इसका पदेन अध्यक्ष होता है। योजना आयोग के स्थान पर स्थापित नवीनतम नीति आयोग के पदेन अध्यक्ष प्रधानमंत्री ही हैं।
डॉ. मनमोहन सिंह 15 जनवरी, 1985 से 31 अगस्त, 1987 तक, प्रमब मुखर्जी 24 जून, 1991 से 15 मई, 1996 तक योजना आयोग के उपाध्यक्ष रहे हैं।
राष्ट्रीय विकास परिषद के प्रमुख कार्य निम्नवत हैं –
राष्ट्रीय योजना निर्माण हेतु दिशा-निर्देश प्रदान करना साथ ही साथ योजना के संसाधनों का मूल्यांकन करना।
योजना आयोग द्वारा बनाई गई राष्ट्रीय योजना पर विचार करना।
राष्ठ्रीय विकास को प्रभावित करने वाले सामाजिक और आर्थिक प्रश्नों पर विचार करना।
समय-समय पर योजना के कार्यों की समीक्षा करना तथा राष्ठ्रीय योजना के उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु सलाह प्रदान करना।
योजना में धन आवंटन सुझाने का कार्य योजना आयोग द्वारा किया जाता है।
राष्ट्रीय विकास परिषद का गठन अगस्त, 1952 में किया गया था। राष्ट्रीय विकास परिषद की रचना में निम्नलिखित सदस्य  होते हैं –
प्रधानमंत्री (इसके अध्यक्ष या प्रमुख के रुप में)
संभी संघीय मंत्रिमंडल के मंत्रिगण
सभी राज्यों के मुख्यमंत्री
सभी केन्द्रशासित राज्यों के मुख्यमंत्री/प्रशासक
योजना आयोग के सदस्य।
पंचवर्षीय योजनाओं के निर्माण में राज्यों की भागीदारी सुनिश्चित करने हेतु राष्ट्रीय विकास परिषद का गठन 6 अगस्त, 1952 को किया गया था। राष्ट्रीय विकास परिषद का अध्यक्ष प्रधानमंत्री होता है तथा सभी राज्यों के मुख्यमंत्री इसके सदस्य हैं। योजना आयोग का सचिव इसका भी पदेन सचिव होता  है। योजना आयोग तथा राज्य सरकारों के बीच समन्वयकर्ता का कार्य राष्ट्रीय विकास परिषद द्वारा किया जाता है।
राष्ट्रीय विकास परिषद एक संविधानेत्तर संस्था है। यह संस्था योजना तैयार करने में राज्यों से सहयोग लेने एवं उनकी राय  जानने के लिए बनाई गई है। पंचवर्षीय योजनाओ को अंतिम स्वीकृति राष्ट्रीय विकास परिषद ही देती है।


लोकपाल और महत्वपूर्ण आयोग
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नागरिकों की शिकायतों के निवारण हेतु बनाई गई संस्था को ओमबुड्समैन के नाम से जाना जाता है। एक स्वतंत्र पर्यवेक्षी एजेंसी के रुप में इसकी स्थापना 1809 ई. में स्वीडन मे हुई थी।
भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था के अंतर्गत, जन शिकायतों के निवारणार्थ ओमबुड्समैन के समकक्ष, केन्द्रीय स्तर पर लोकपाल एवं राज्यों के स्तर पर लोकायुक्त की नियुक्ति का प्रावधान है।
5 जनवरी, 1966 को मोरारजी देसाई की अध्यक्षता में गठित प्रशासनिक सुधार आयोग ने भारत में लोकपाल एवं लोकायुक्त की स्थापना का सुझाव दिया था।
ध्यातव्य है कि बाद में वर्ष 1967 मे के. हनुमन्तैया को इसका अध्यक्ष बनाया गया।
भारतीय संसद में लोकपाल विधेयक सर्वप्रथम वर्ष 1968 में चौथी लोक सभा मे प्रस्तुत किया गया था। परंतु यह विधेयक पारित नही हो सका।
भारत में महाराष्ट्र ऐसा पहला राज्य है, जहां लोकायुक्त कार्यालय की स्थापना (1971) हुई।
ध्यातव्य है कि ओड़िशा पहला ऐसा राज्य था जिसने लोकायुक्त से संबंधित विधेयक पारित किया था मगर वर्ष 1983 तक उस पर आगे कोई कार्यवाही नही हुई।
उत्तर प्रदेश लोक आयुक्त अधिनियम, 1975 के तहत लोकायुक्त अपना प्रतिवेदन राज्यपाल को सौंपता है, जो उसे विधानमंडल के दोनों सदनों में प्रस्तुत करवाता है।
वर्ष 1993 में गठित वोहरा समिति का संबंध राजनेताओं और अपराधियों के बीच गठजोड़ की जांच करने से था।
राजमन्नार आयोग ने भारतीय प्रशासनिक सेवा एवं भारतीय पुलिस सेवा को समाप्त करने की सिफारिश की थी।
वर्ष 1993 में अनु. 123 के तहत अपने अधिकारों का प्रयोग करते हुए तत्कालीन राष्ट्रपति ने मानवाधिकार संरक्षण अध्यादेश जारी किया था।
ध्यातव्य है कि मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम 28 सितंबर 1993 को लागू हुआ था।
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग एक गैर-संवैधानिक निकाय है, इसका गठन 12 अक्टूबर, 1993 को किया गया। इसके अध्यक्ष एवं सदस्यों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष एवं सदस्यों की नियुक्ति के लिए गठित समिति में शामिल हें – प्रधानमंत्री, गृह मंत्री, लोक सभा एवं राज्य सभा में विपक्ष के नेता, लोक सभा अध्यक्ष तथा राज्य सभा उपाध्यक्ष।
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की शक्ति मात्र सलाहकारी प्रकृति की होती है। इसमें एक महिला को सदस्य के रुप में नियुक्त करना अनिवार्य है।
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का अध्यक्ष अनिवार्यतः उच्चतम न्यायलय का सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश होना चाहिए।
राज्य मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष एवं सदस्यों की नियुक्ति संबंधित राज्य के राज्यपाल द्वारा की जाती है।
सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 में वर्णित है कि केन्द्रीय सूचना आयुक्त का कार्यकाल 5 वर्ष या 65 वर्ष की आयु तक होता है।
विंदेश्वरी प्रसाद मंडल की अध्यक्षता में वर्ष 1979 में मंडल आयोग का गठन किया गया था। मंडल आयोग का प्रमुख कार्य था – सामाजिक और शैक्षिक रुप से पिछड़े लोगों की पहचान कराने के लिए  गठित किया गया था।
संविधान के अनु. 315 के द्वारा संघ के लिए एक लोक सेवा आयोग और प्रत्येक राज्य के लिए एक लोक सेवा आयोग की व्यवस्था की गई है।
संघ लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष एवं सदस्यों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है, जबकि राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष एवं सदस्यों की नियुक्ति का प्राधिकार संबंधित राज्य के राज्यपाल के पास सुरक्षित होता है।
संविधान के अनु. 323 के अनुसार, संघ लोक सेवा आयोग अपना वार्षिक प्रतिवेदन राष्ट्रपति को, जबकि राज्य लोक सेवा आयोग अपना वार्षिक प्रतिवेदन राज्यपाल को सौंपता है।
संविधान के अनु. 322 के अनुसार, संघ लोक सेवा आयोग के व्यय भारत की संचित निधि पर, जबकि राज्य लोक सेवा आयोगों के व्यय संबंधित राज्य की संचित निधि पर भारित होते हैं।
संसद मे पहला लोकपाल विधेयक वर्ष 1968 मे चौथी लोक सभा में प्रस्तुत किया गया था जहां यह 1969 में पारित भी हुआ, परंतु राज्य सभा मे लंबित रहने की स्थिति में ही चौथी लोक सभा के विघटित होने के कारण यह विधेयक समाप्त हो गया था।


द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग के द्वारा उच्चतम न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्ति मे कार्यपालिका, विधायिका एवं मुख्य न्यायाधीश की भागीदारी की अनुशंसा की गई है।
लोकसभा मे लोकपाल विधेयक 4 अगस्त, 2011 को संसदीय कार्य मंत्री वी. नारायणसामी द्वारा प्रस्तुत किया गया। तत्पश्चात इसे संसद की कार्मिक, लोक शिकायत तथा विधि एवं न्याय कर स्थायी समिति के पास भेजा गया। सिविल सोसायटी के सदस्यों द्वारा इसे कमजोर माना गया।
उत्तर प्रदेश के लोकायुक्त की पदधारण अवधि वर्तमान में 8 वर्ष है। उत्तर प्रदेश लोकायुक्त और उप-लोकायुक्त अधिनियम, 1975 के तहत लोकायुक्त अथवा उप-लोकायुक्त की पदधारण अवधि, उसके पदधारण करने की तिथि से 6 वर्ष निर्धारित थी। लेकिन वर्ष 2012 में उत्तर प्रदेश लोकायुक्त और उप-लोकायुक्त (संशोधन) अधिनियम, 2012 के द्वारा इसकी पदधारण अवधि को 6 वर्ष से बढ़ाकर 8 वर्ष कर दिया गया।
वर्ष 2011 में 1 नवंबर को लोकायुक्त विधेयक पारित करने वाला प्रथम भारतीय राज्य उत्तराखंड है।
नागरिक समाज की ओर से लोकपाल बिल का मसविदा (आलेख) तैयार करने वाली समिति मे पांच सदस्य थे – अन्ना हजारे, अरविंद केजरीवाल, शांति भूषण, एन. संतोष हेगड़े एवं प्रशांत भूषण।
केन्द्रीय अन्वेषण ब्यूरों की स्थापना वर्ष 1963 में केन्द्रीय सतर्कता आयोग की स्थापना वर्ष 1964 में हुई  थी। जबकि भ्रष्टाचार निरोधक कानून, 1988 में निर्मित हुआ था और प्रवर्तन निदेशालय की स्थापना वर्ष 1956 में हुई थी।
भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) और भारतीय पुलिस सेवा (IPS) को समाप्त करने की सिफारिश राजमन्नार आयोग ने की थी।
सभी प्रकार के सामाजिक विभेद (आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक) का उन्मूलन मानवाधिकार की दूसरी पीढ़ी के अंतर्गत आता है। जबकि पहली पीढ़ी में नागरिक और राजनीतिक स्वतंत्रता का अधिकार तथा तीसरी पीढ़ी में एकजुटता का अधिकार तथा समूह में शामिल होने के अधिकारों आदि का उल्लेख है।
भारत में मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम 28 सितंबर, 1993 को लागू हुआ। इसका उद्देश्य मानव अधिकारों का बेहतर संरक्षण, राष्ठ्रीय मानव अधिकार सुरक्षा आयोग का गठन और राज्य में मानव अधिकार सुऱक्षा आयोग का गठन करना है।
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष एवं सदस्यों की नियुक्ति के लिए एक समिति गठित की जाती है। जिसके सदस्य निम्नवत हैं –
प्रधानमंत्री
गृह मंत्री
लोकसभा में विपक्ष के नेता
राज्य सभा में विपक्ष के नेता
लोक सभा अध्यक्ष
राज्य सभा के उपाध्यक्ष
मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम की धारा 6(1) के अनुसार, अध्यक्ष के रुप में नियुक्त किया गया व्यक्ति  अपने पद ग्रहण करने की तिथि से 5 वर्ष की अवधि तक अथवा 70 वर्ष की आयु (में से जो पहले हो) प्राप्त कर लेने तक अपना पद धारण करेगा। मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 की धारा 3 में राष्ठ्रीय मानवाधिकार  आयोग के गठन का प्रावधान है। इसके अनुसार, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का अध्यक्ष वही व्यक्ति होगा, जो उच्चतम न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश रह चुका हो।


मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 की धारा 2 परिभाषाओं से संबंधित है। धारा 2(M) मे लोक सेवक को परिभाषित किया गया है। इसके अनुसार, आई.पी.सी. की धारा 21 में शामिल लोग सरकारी सेवक माने जाएंगे।
सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के अनुसार, केन्द्रीय सूचना आयुक्त का कार्यकाल 5 वर्ष या 65 वर्ष की आयु तक होता है। उसकी पुनर्नियुक्ति नही हो सकती ।
जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1974 के अनुसार, केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड का एक पूर्णकालिक अध्यक्ष होगा। केन्द्र सरकार द्वारा पर्यावरण से संबंधित मामलों मे विशेष ज्ञान या व्यावहारिक अनुभव वाले व्यक्ति को अथवा पर्यावरण से संबंधित संस्थानों के प्रशासन के ज्ञान और अनुभव वाले व्यक्ति को अध्यक्ष नामित किया जाएगा।
1976 मे कांग्रेस ने सरदार स्वर्ण सिंह की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया। इसे तत्समय संविधान संशोधन समिति के नाम से जाना गया। 42वां संविधान संशोधन, 1976 इसी समिति की सिफारिशों का परिणाम है। इसने भारत के लिए राष्ट्रपतीय प्रणाली पर विचार करते हुए इसे अनुपयुक्त बताया था, तथापि इसने मुख्य रुप से जिस प्रश्न पर विचार किया, वह था – मूल अधिकारों की तुलना में निदेशक तत्वों की अग्रता।
वर्ष 1990 में अनुसूचित जाति एवं जनजाति राष्ट्रीय आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, अनुसूचित जाति एवं जनजाति के अत्याचार का कारण है – भूमि निर्वसन, बंधुआ मजदूरी और ऋणग्रस्तता, जबकि धार्मिक कारण इसमें शामिल नही है।
भारतीय संविधान के अनु. 316(1) के अनुसार, संघ आयोग या संयुक्त आयोग (दो या दो से अधिक राज्यों के लिए) के अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।  जबकि राज्य लोक सेवा  आयोग के अध्यक्ष तथा सदस्यों की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा की जाती है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 310 प्रसाद का सिध्दांत उल्लिखित करता है। इसके तहत प्रत्येक व्यक्ति, जो रक्षा सेवा या संघ की सिविल सेवा का कोई पद अथवा अखिल भारतीय सेवा का सदस्य राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत पद धारण करता है और प्रत्येक व्यक्ति, जो किसी राज्य की सिविल सेवा का सदस्य है अथवा सिविल पद राज्य के प्रसादपर्यंत धारण करता है।
1919 के भारत शासन अधिनियम के अंतर्गत भारत में प्रथम लोक सेवा आयोग, 1926 ई. मे स्थापित किया गया। उस समय इसमें एक अध्यक्ष तथा चार सदस्य थे। 1935 के अधिनियम के द्वारा इसका नाम संघीय लोक सेवा आयोग रखा गया।
श्री मती रोज एम. बैथ्यू संघ लोक सेवा आयोग (Union Public Service Commission) की प्रथम महिला अध्यक्ष थी, जो वर्ष 1992 से 1996 के दौरान इस पद पर रही।