Indian Polity for All Competitive Exams (State Level) Part 3

संविधान के अनुच्छेद 239(1) के अनुसार, संसद द्वारा बनाई गई विधि द्वारा यथा अन्यथा उपबंधित के सिवाय प्रत्येक राज्य क्षेत्र का प्रशासन राष्ट्रपति द्वारा किया जाता है।
भारतीय संघ के अंतर्गत किसी राज्य को मिलाने का अधिकार संसद को है। अनुच्छेद 2 अनुसार, वह नए राज्यो का भारतीय संघ मे प्रवेश कर सकती है।
संविधान के अनु. 81 (31वें संशोधन, 1973 तथा गोवा, दमन एवं दीव पुनर्गठन अधिनियम, 1987 द्वारा यथा संशोधित) के अनुसार, लोक सभा के अधिकतम 530 सदस्य राज्यों के निर्वाचन क्षेत्रों से तथा अधिकतम 20 सदस्य केन्द्रशासित प्रदेशों से निर्वाचित हो सकते हैं। इसके अतिरिक्त अनु. 331 के अधीन राष्ट्रपति आंग्ल-भारतीय समुदाय का लो सभा में समुचित प्रतिनिधित्व न होने पर दो सदस्यों का मनोनयन कर सकता है। इस प्रकार लोक सभा की सदस्य संख्या 552 (530+20+2) हो सकती है। वर्तमान में केन्द्रशासित प्रदेशों की लोक सभा सीटों की संख्या 13 (दिल्ली 7, अंडमान-निकोबार-1, चंडीगढ़-1, दादरा व नगर हवेली-1, दमन व दीव-1, लक्षद्वीप-1 तथा पुडुचेरी-1) है। जबकि राज्य सभा में यह संख्या 4 (दिल्ली-3, पुडुचेरी-1) है।
स्वतंत्रता के पश्चात नए राज्यों के निर्माण के लिए फजल अली की अध्यक्षता में एक राज्य पुनर्गठन आयोग का गठन हुआ, जिसकी सिफारिश पर 14 राज्य एवं 6 केन्द्रशासित प्रदेश स्थापित किये गए। आंध्र प्रदेश, स्वतंत्रता के पश्चात भाषा के आधार पर गठित (1 अक्टूबर, 1953)प्रथम राज्य है।
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद आंध्र प्रदेश की राजधानी हैदराबाद का नाम अभी तक नही बदला गया है, हालांकि तेलंगाना राज्य के निर्माण के बाद अगले 10 वर्षों तक हैदराबाद, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना की संयुक्त राजधानी होगी, इसके बाद आंध्र प्रदेश की नई राजधानी अमरावाती होगी, जबकि तमिलनाडु की राजधानी मद्रास का अद्यतन नाम चेन्नई, पश्चिम बंगाल की राजधानी कलकत्ता का अद्यतन नाम कोलकाता एवं केरल की राजधानी त्रिवेन्द्रम का अद्यतन नाम तिरुवनंतपुरम हो गया है।
69 वां संविधान संशोधन अधिनियम, 1991 के द्वारा देश की राजधानी दिल्ली को संघ राज्य की श्रेणी में कायम रखते हुए इसके लिए एक विधान सभा और मंत्रिपरिषद का उपबंध किया गया। साथ ही (संविधान की अनुच्छेद 239 (क, क) में) संघ राज्य क्षेत्र दिल्ली को राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) का दर्जा दिया गया।
दादरा और नगर हवेली वर्ष 1954 तक पुर्तगाली शासन के अधीन थे न कि फ्रांसीसी। अंतरराष्ट्रीय न्यायालय के भारत के पक्ष में निर्णय के पश्चात दादरा और नगर हवेली को भारत में मिला लिया गया था।
35वें संशोधन, 1974 के द्वारा सिक्किम को भारत में सहयुक्त राज्य के रुप में शामिल किया गया था। 36वें संविधान संशोधन, 1975 द्वारा सिक्किम को (22वां राज्य) पूर्ण राज्य का दर्जा प्रदान किया गया।
निम्नलिखित राज्यो के Province और State बनने की सूची –
राज्य                Province                         State
पश्चिम बंगाल    15 अगस्त, 1947       26 जनवरी, 1950
असम               15 अगस्त, 1947       26 जनवरी, 1950
पंजाब                15 अगस्त, 1947       26 जनवरी, 1950 
हिमाचल प्रदेश   15 अप्रैल, 1948         25 जनवरी, 1971
मैसूर राज्य (नाम परिवर्तन) अधिनियम, 1973 के द्वारा इसका नाम कर्नाटक किया गया। गोवा, दमन और दीव पुनर्गठन अधिनियम, 1987 के द्वारा गोवा को अलग किया गया, बंबई पुनर्गठन अधिनियम, 1960 के द्वारा बंबई को गुजरात एवं महाराष्ट्र में विभाजित किया गया तथा हिमालच प्रदेश अधिनियम, 1970 के द्वारा हिमाचल प्रदेश को राज्य का दर्जा दिया गया।
उल्फा (ULFA) उग्रवादी संगठन असम राज्य से संबंधित है। इसका पुरा नाम यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम है। इस संगठन का उद्देश्य सैन्य संघर्ष के जरिए संप्रभु समाजवादी असम स्थापित करना है। परेश  बरुआ तथा अन्य  द्वारा वर्ष 1979 में इसकी स्थापना की गई थी।
पीपुल्स वार ग्रुप (PWG) नामक आतंकवादी संगठन की स्थापना 22 अप्रैल, 1980 को आंध्र प्रदेश में कोंडापाली सीतारमैया नामक नक्सली नेता ने की थी।
कावेरी जल विवाद के अंतर्गत कर्नाटक-तमिलनाडु-पुडुचेरी-केरल राज्य शामिल हैं।
भाषायी आधार पर राज्य पुनर्गठन आयोग की स्थापना 29 दिसंबर, 1953 की की गई, जिसने अपनी रिपोर्ट 30 दिसंबर, 1955 को दी। आयोग के अध्यक्ष फजल अली थे तथा अन्य दो सदस्य थे –  हृदयनाथ कुंजरु और के.एम. पणिक्कर।



नागरिकता
भारतीय संविधान के भाग 2 के अंतर्गत अनुच्छेद 5 से 11 तक नागरिकता का उल्लेख किया गया है।
भारत में ब्रिटेन के समान एकल नागरिकता का प्रावधान किया गया है।
अनुच्छेद 11 के अंतर्गत संसद को नागरिकता के संबंध में विधि बनाने की शक्ति दी गई है।
संसद द्वारा भारतीय नागरिकता अधिनियम, 1955 पारित किया गया है।
भारतीय नागरिकता पांच प्रकार से प्राप्त की जा सकती है –
जन्म से (By Birth)
वंश परंपरा से (By Descent)
पंजीकरण से (Registration)
देशीकरण से (By Naturalisation)
भूमि के अर्जन द्वारा (By Acquisition of Land)


भारतीय नागरिकता का अंत (लोप) तीन प्रकार से हो सकता है –
किसी अन्य देश की  नागरिकता ग्रहण करने पर
नागरिकता त्यागने पर
सरकार द्वारा वंचित करने पर
अनुच्छेद 6 में पाकिस्तान से भारत को प्रव्रजन करने वाले कुछ व्यक्तियों के नागरिकता के अधिकार के बार में उपबंध है।
अनुच्छेद 7 में पाकिस्तान को प्रव्रजन करने वाले कुछ व्यक्तियों की नागरिकता के अधिकार के बारे में उपबंध है।
अनुच्छेद 8 में भारत के बाहर रहने वाले भारतीय उद्भव के कुछ व्यक्तियों के नागरिकता के अधिकार के बारे  में उपबंध है।
अनुच्छेद 9 के अनुसार, जब कोई व्यक्ति स्वेच्छा से किसी विदेशी राज्य का नागरिक हो जाता है, तो उसकी भारतीय नागरिकता स्वतः समाप्त हो जाती है।
प्रवासी के रुप में रहने वाले विदेशी व्यक्ति के लिए देशीकरण के आधार पर नागरिकता प्राप्त करने के लिए 10 वर्षों तक निवास करना अनिवार्य है।
नागरिकता अधिनियम, 1955 की धारा 5(1)(a) के तहत पंजीकरण द्वारा भारतीय नागरिकता प्राप्त करने के लिए भारतीय मूल के व्यक्ति को भारत में सात वर्ष बिताने होंगे।
संसद, नागरिकता के अर्जन हेतु शर्तों को नियत करने के लिए सक्षम हैं।
जम्मू और कश्मीर, भारत का एकमात्र राज्य है जिसके नागरिकों को दोहरी नागरिकता प्राप्त है।
वर्ष 2015 के ने संशोधित अधिनियम में व्यवस्था की गई की पाकिस्तान एवं बांग्लादेश के नागरिकों को छोड़कर सभी देशों के नागरिकों को दोहरी नागरिकता दी गई है।
नागरिकता अधिनियम, 2015 के अंतर्गत भारतीय कार्डधारक प्रवासी नागरिक के रुप में पंजीकृत होने के लिए निम्नलिखित लोग अर्ह हैं –
एक वयस्क बच्चा जिसके माता-पिता में से दोनों या कोई एक भारतीय नागरिक हैं,
भारतीय नागरिक की विदेशी मूल की पत्नी अथवा भारतीय कार्ड धारक विदेशी नागरिक की विदेशी मूल की पत्नी तथा
एक व्यक्ति का परपोत/परपोती, जो दूसरे देश का नागरिक है किंतु पितामह/पितामही, मातामह/मातामही संविधान लागू होने के समय अथवा बाद में किसी समय भारतीय नागरिक थे।
एक व्यक्ति का एक अवयस्क बच्चा कुछ शर्तों (खंड क में उल्लेखित) के साथ। इसके अलावा पाकिस्तान, बांग्लादेश तथा अन्य देशों (जिसे केन्द्र सरकार निर्धारित करें) के नागरिकों को इससे वंचित रखा गया है।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 371 A से लेकर 371 I में नगालैंड (371 A), असम (371 B), मणिपुर (371 C), आंध्र प्रदेश (371 D), सिक्किम (371F), मिजोरम (371 G), अरुणाचल प्रदेश (371 H) तथा गोवा (371 I) राज्यों के संबंध मे विशेष उपबंध अंतर्विष्ट किए गए हैं।
दोहरी नागरिकता का सिध्दांत संयुक्त राज्य अमेरिका में स्वीकार किया गया है। वहां प्रत्येक नागरिक दोहरी नागरिकता प्राप्त करता है। प्रथम, संयुक्त राज्य अमेरिका की और दूसरी उस राज्य की जहां वह निवास करता है। इसके विपरीत भारत में एकल नागरिकता की व्यवस्था की गई है।


मूल अधिकार
नेहरु रिपोर्ट (1928) द्वारा मूल अधिकारों को भारत के संविधान मे सम्मिलित करने की आकांक्षा प्रकट की गई थी।
भारतीय संविधान में भाग 3 के अंतर्गत अनुच्छेद 12-35 में मौलिक अधिकारों का वर्णन किया गया है, जो निम्नलिखित हैं –
समानता का अधिकार
स्वतंत्रता का अधिकार
शोषण के विरुध्द अधिकार
धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार
संस्कृति और शिक्षा संबंधी अधिकार
संवैधानिक उपचारों का अधिकार।
भारतीय संविधान में मौलिक अधिकारों को राज्य के कृत्यों के विरुध्द एक गारंटी के रुप में मौलिक अधिकारों को राज्य के कृत्यों के विरुध्द एक गारंटी के रुप में स्थान दिया गया है।
मौलिक अधिकार पूर्णतया नैसर्गिक एवं अप्रतिदेय की श्रेणी में आते हैं।
आपातकालीन स्थिति में ही अनुच्छेद 358 एवं 359 के प्रावधानों के अंतर्गत ही मूल अधिकारों का निलंबन किया जा सकता है।
मौलिक अधिकारों को न्याय योग्य (वाद योग्य) के रुप में संविधान मे रखा गया है।
वर्तमान में कुल 6 मौलिक अधिकार प्रदान किए गए हैं, जबकि मूल संविधान में 7 मौलिक अधिकार थे।
भारतीय संविधान में दिए गए मौलिक अधिकारों की तुलना अमेरिका के अधिकार बिल से की जाती है।
भारतीय संविधान मे मौलिक अधिकारों के संरक्षण का दायित्व न्यायपालिका के पास है।
संविधान का अनुच्छेद 14 यह सुनिश्चित करता है कि किसी भी व्यक्ति को विधि के समक्ष समता से या विधियों के समान संरक्षण से वंचित नही किया जाएगा। इस रुप में अनुच्छेद 14  विधायन सत्ता पर पूर्ण नियंत्रण लगाता है।
भारतीय संविधान में समानता के अधिकार को अनुच्छेद 14 से 18 तक कुल पांच अनुच्छेदों में वर्णित किया गया है, जो कि अग्रलिखित है –
विधि के समक्ष समता – अनुच्छेद 14
धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, जन्मस्थान के आधार पर विभेद का प्रतिषेध – अनुच्छेद 15
लोक नियोजन के विषयों में अवसर की समता – अनच्छेद 16
अपृश्यता (छुआछूत) का अंत – अनुच्छेद 17
उपाधियों का अंत – अनुच्छेद 18
अनुच्छेद 19 से 22 तक स्वतंत्रता के अधिकार वर्णित हैं।
अनुच्छेद 19 के अंतर्गत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सहित कुल 6 प्रकार की स्वतंत्रताएं प्रदान की गई हैं।
अनुच्छेद 19(1)(क) में निहित वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अंतर्गत ही समाचार-पत्रों की स्वतंत्रता भी निहित मानी जाती है।
संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ख) में शांतिपूर्वक एवं निरायुध सम्मेलन की स्वतंत्रता, अनुच्छेद 19(1)(ग) में संगम क्षेत्र में सर्वत्र अबाध संचरण की स्वतंत्रता, अनुच्छेद 19(1)(ङ) के तहत भारत के राज्यक्षेत्र के किसी भाग में निवास करने और बस जाने की स्वतंत्रता तथा अनुच्छेद 19(1)(छ) के तहत कोई वृत्ति, व्यापार या कारोबार करने की स्वतंत्रता का प्रावधान किया गया है।
अनुच्छेद 20 का संबंध अपराधों के लिए दोषसिध्दि के संबंध में संरक्षण से, अनुच्छेद 21 का संबंध प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता के संरक्षण से एवं अनुच्छेद 21(क) का संबंध प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता के संरक्षण से एवं अनुच्छेद 21(क) शिक्षा के अधिकार से संबंधित है।
अनुच्छेद 22 में गिरफ्तारी और निरोध (कुछ दशाओं) से संरक्षण का प्रावधान किया गया है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 24, चौदह वर्ष से कम आयु के बालकों को कारखानों, खनन इत्यादि परिसंकटमय क्षेत्रों में नियोजन को निषिध्द करता  है, जबकि अनुच्छेद 23 मानव के दुर्व्यावहार और बलातश्रम का प्रतिषेध करता है।
भारतीय संसद द्वारा निर्मित सिविल अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1955 के अंतर्गत भारतीय समाज मे अपृश्यता को दंडनीय अपराध घोषित किया गया है।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 में प्रयुक्त दैहिक स्वतंत्रता शब्दावली में संचरण अर्थात कहीं भी जाने का अधिकार यानी विदेश भ्रमण भी शामिल है।
धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार (अनु. 25) के अंतर्गत, प्रत्येक व्यक्ति को अपने धर्म का प्रचार करने, सिक्खो को कृपाण धारण करने एवं रखने का अधिकार समाहित है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 26 धार्मिक कार्यों के प्रबंध की स्वतंत्रता से संबँधित, जबकि अनुच्छेद 29 का संबंध अल्पसंख्यक वर्ग के हितों के संरक्षण से व अनुच्छेद 30 अल्पसंख्यकों को शिक्षा संस्थाओं की स्थापना एवं प्रशासन से संबंधित है।


भारतीय संविधान के 44वें संशोधन अधिनियम (1978) द्वारा संपत्ति के अधिकार को मूल अधिकार के श्रेणी से हटाकर अनुच्छेद 300(क) विधिक अधिकार की श्रेणी में डाल दिया गया।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 32 के अंतर्गत संवैधानिक उपचारों का अधिकार उल्लिखित है।
मूल अधिकारों के न्यायिक संरक्षण हेतु 32 के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय तथा अनुच्छेद 226 के तहत उच्च न्यायालयों को शक्ति प्रदान की गई है।
सर्वोच्च अथवा उच्च न्यायालय कई प्रकार के विशेष आदेश जारी करते हैं जिन्हें प्रादेश या रिट कहते हैं।
बंदी प्रत्यक्षीकरण – इसके द्वारा न्यायालय किसी गिरफ्तार व्यक्ति को न्यायालय के सामने प्रस्तुत करने का आदेश देता है। यदि गिरफ्तारी का तरीका या कारण गैर कानूनी या असंतोषजनक हो, तो न्यायालय बंदी को छोड़ने का आदेश दे सकता है।
परमादेश – यह आदेश तब जारी किया जाता है जब न्यायालय को लगता है कि कोई सार्वजनिक पदाधिकारी अपने कानूनी और संवैधानिक दायित्वों का पालन नही कर रहा है और इससे किसी व्यक्ति का मौलिक अधिकार प्रभावित हो रहा है।
निषेध – जब कोई निचली अदालत अपने अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण करके किसी मुकदमें की सुनवाई करती है तो ऊपर की अदालतें (उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायलय) उसे ऐसे करने से रोकने के लिए निषेध आदेश जारी करती है।
अधिकार पृच्छा- जब न्यायालय को लगता है कि कोई व्यक्ति ऐसे पद पर नियुक्त हो गया है जिस पर उसका कोई कानूनी हक नही है तब न्यायालय अधिकार पृच्छा आदेश के द्वारा उस पद पर कार्य करने से रोक दिया जाता है।
उत्प्रेषण – जब कोई निचली अदालत या सरकारी अधिकारी बिना अधिकार के कोई कार्य करता है, तो न्यायालय उसके समक्ष विचाराधीन मामले को उससे लेकर उत्प्रेषण द्वारा उसे ऊपर की अदालत या अधिकारी को हस्तांतरित कर देता है।


संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत राष्ट्रपति द्वारा आपातकाल की उद्घोषणा किए जाने पर अनुच्छेद 358 के तहत अनुच्छेद 19 में वर्णित मूल अधिकार स्वतः ही निलंबित हो जाते हैं।
अनुच्छेद 20 एवं 21 को छोड़कर अन्य मूल अधिकारों को निलंबित करने की शक्ति राष्ट्रपति को अनुच्छेद 359 के तहत प्राप्त है।
भारतीय संविधान में 44वें सशोधन के पश्चात अनुच्छेद 20 एवं 21 के अंतर्गत प्राप्त मूल अधिकारों को निलंबित नही किया जा सकता है।
बच्चन सिंह बनाम पंजाब राज्य के मामले में उच्चतम न्यायालय के बहुमत के निर्णय से यह अभिनिर्धारित किया है कि मृत्युकारिता करने के लिए मृत्युदंड का वैकल्पिक दंड अनुच्छेद 14, 19 और 21 का अतिक्रमण नही करता है और सांविधानिक है।
उच्चतम न्यायालय एवं उच्च न्यायालय विधानमंडलों द्वारा पारित ऐसे किसी भी अधिनियम को असंवैधानिक घोषित कर सकते हैं, जो संविधान के भाग तीन (मूल अधिकार) मे दिए किसी भी उपबंध की असंगति में  है।
भारतीय संविधान में सामाजिक-आर्थिक एजेंडे को साकारित करने के लिए वाद योग्य और अ-वाद दोनों तरह की व्यवस्थाएं समाहित हैं। जिसमें मौलिक अधिकार वाद योग्य हैं और नीति-निदेशक तत्व अ-वाद योग्य हैं।
मौलिक अधिकार नैसर्गिक एवं अप्रतिदेय अधिकार हैं, जो राज्य कृत्य के विरुध्द एक गारंटी के रुप मे हैं। इन्हें केवल आपातकालीन स्थिति में ही निलंबित किया जा सकता है। अनुच्छेद 358 एवं 359 के मूल अधिकारों के निलंबन संबंधी प्रावधानों का वर्णन किया गया है।
भारतीय संविधान के भाग 3 में अनुच्छेद 12 से 35 तक मौलिक अधिकारों का वर्णन किया गया है। वर्तमान में कुल 6 मौलिक अधिकार प्रदान किए गए हैं।
संविधान का अनुच्छेद 14 विधायन सत्ता पर पूर्ण नियंत्रण लगाता है। यह अपबंध कहता है कि किसी व्यक्ति को विधि के समक्ष समता से या विधियों के समान संरक्षण से वंचित किया जाएगा।
आई.सी.सी.पी.आर. (यानी इंटरनेशनल कन्वेनैंट ऑन सिविल एंड पॉलिटिकल राइट्स) के अनुच्छेद 24 द्वारा बाल अधिकार को सुरक्षित किया गया है। उल्लेखनीय है कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 24 के द्वारा भी बाल अधिकार का संरक्षण किया गया  है।
अर्नेस्ट बार्कर का कथन है कि अधिकार बिना कर्तव्य के उसी प्रकार है जैसे मनुष्य बिना परछाई के।
बंधुआ मजदूर (उन्मूलन) अधिनियम संसद में 1976 मे पारित किया जिसका उद्देश्य (अनुच्छेद 23 के परिप्रेक्ष्य में) केवल बंधुआ श्रमिकों को मुक्त करना नही अपितु उनके पुनर्वास की व्यवस्था भी करना है।
अधिकार मानव व्यक्ति के समग्र विकास की अनिवार्य अपेक्षाएं हैं। इनके अभाव में मानव का बौध्दिक, नैतिक आध्यात्मिक तथा लौकिक उत्थान बाधित हो जाएगा एवं मानव जीवन पशुवत हो जाएगा। अधिकार, राज्य शक्ति पर सीमाएं हैं। यह राज्य कार्यवाही के विरुध्द प्रत्याभूति है। अतः अधिकार राज्य के विरुध्द नागरिकों के दावें हैं।
सेवा के अधिकार की अवधारणा वर्ष 1991 में ग्रेट ब्रिटेन ( यूनाइटेड किंगडम) मे प्रारंभ हुई। इसका तात्पर्य उस अधिकार से है जिसके तहत राज्य एक निश्चित अवधि के अंदर लोक सेवाएं देने की गारंटी देता है। इसे सिटिजन चार्टर भी कहा जाता है। भारत में केन्द्रीय स्तर ऐसा कानून बनाने का प्रयास  द राइट ऑफ सिटिजन फॉर टाइम बाउंड डिलीवरी ऑफ गुड्स एंड सर्विसेज एंड रिड्रेसल ऑफ देयर ग्रीवान्सेज बिल, 2011 के माध्यम से किया गया, किंतु वह पारित नही हो सका। हालांकि मध्य प्रदेश सेवा का अधिकार अधिनियम लागू करने वाला देश का पहल राज्य बना। इसने यह कानून 18 अगस्त, 2010 को लागू किया। दूसरा स्थान बिहार राज्य का है जहां यह 25 जुलाई, 2011 को लागू किया गया।


राज्य की नीति के निदेशक तत्व
भारतीय संविधान के भाग 4 (अनुच्छेद 36-51) के तहत राज्य की नीति निदेशक तत्व का प्रावधान किया गया है।
भारतीय संविधान में नीति निदेशक तत्व आयरलैंड के संविधान से प्रेरित हैं।
नीति निदेशक तत्वों की प्रकृति अनुच्छेद 37 से स्पष्ट होती है। इसके मुख्य पक्ष निम्नलिखित हैं –
नीति निदेशक तत्वो के उपबंध न्यायालयों द्वारा लागू (Enforceable) नही हैं।
तथापि इसके सिध्दांत देश के संचालन में मूलभूत (Fundamental) हैं,
राज्य का यह कर्तव्य है कि वह इन सिध्दांतों को कानून बनाकर लागू करे।
अनुच्छेद 38 के अनुसार, राज्य, लोक कल्याण की अभिवृध्दि के लिए सामाजिक व्यवस्था बनाएगा।
अनुच्छेद 39 में राज्य द्वारा अनुसरणीय कुछ नीति निदेशक तत्व हैं, जैसे पुरुष और स्त्री को समान रुप से आजीविका प्राप्त हो, भौतिक संसाधनों का वितरणकारी न्याय उपलब्ध हो, आर्थिक विकेन्द्रीकरण हो, पुरुष और स्त्री को समान कार्य के लिए समान वेतन हो, बालकों हेतु कल्याणपरक कार्य आदि।
अनुच्छेद 39 क में समान न्याय तथा निःशुल्क विधिक सहायता का प्रावधान है। इसे 42वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा जोड़ा गया।
अनुच्छेद 40 के अनुसार, राज्य ग्राम पंचायतों के गठन का प्रयास करेगा।
अनुच्छेद 41 के अनुसार, राज्य कुछ दशाओं में काम, शिक्षा तथा लोक सहायता पाने के अधिकार को प्राप्त कराने का प्रभावी उपबंध करेगा।
अनुच्छेद 42 के अनुसार, राज्य की न्यायसंगत और मानवोचित दशाओं का तथा प्रसूति सहायता के लिए प्रावधान करेगा।
अनुच्छेद 43 के अनुसार, राज्य कर्मकारों को उचित मजदूरी तथा कुटीर उद्योगों के संवर्धन करने का प्रयास करेगा।
अनुच्छेद 43 क के अनुसार, राज्य, उद्योगों के प्रबंधन के कर्मकारों की भागीदारी सुनिश्चित करेगा।
अनुच्छेद 44 के अनुसार, राज्य, भारत के संपूर्ण राज्य क्षेत्र मे नागरिकों के लिए एक समान सिविल संहिता लागू करने का प्रयास करेगा।
अनुच्छेद 45 के अनुसार, राज्य, छह वर्ष से कम आयु के बालको के लिए प्रारंभिक बाल्यावस्था देख-रेख और शिक्षा का प्रबंध करेगा।
अनुच्छेद 46 के अंतर्गत, राज्य, अनूसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों तथा अन्य दुर्बल वर्गों हेतु शिक्षा तथा आर्थिक हितों में वृध्दि के लिए प्रयास करेगा।
अनुच्छेद 47 के अंतर्गत राज्य, लोगो के पोषाहार स्तर, जीवन स्तर ऊंचा करने तथा लोक स्वास्थ्य आदि सुधारने का प्रयास करेगा।
अनुच्छेद 48 के अंतर्गत राज्य, कृषि और पशुपालन को आधुनिक तथा वैज्ञानिक ढंग से संगठित करने का प्रयास करेगा  और गाय, बछड़ों तथा अन्य दुधारु और वाहक मवेशियों के वध का प्रतिषेध करने के लिए प्रयास करेगा।
अनुच्छेद 48 क के अनुसार, राज्य, देश के पर्यावरण के संरक्षण और संवर्धन का तथा वन एवं अन्य जीवों की रक्षा करने का प्रयास करेगा।
अनुच्छेद 49 के अंतर्गत राज्य, राष्ट्रीय महत्व के संस्मारकों, स्थानों तथ वस्तुओं को संरक्षण प्रदान करेगा।
अनुच्छेद 50 के अंतर्गत राज्य की लोक सेवाओ में, न्यायपालिका को कार्यपालिका से अलग करने के लिए राज्य प्रयास करेगा।
अनुच्छेद 51 के अनुसार, राज्य, अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा की अभिवृध्दि का प्रयास करेगा।


मौलिक अधिकार एवं नीति निदेशक तत्व में अंतर
मौलिक अधिकार
नीति निदेशक तत्व
भारतीय संविधान के भाग 3 में उल्लिखित।
भारतीय संविधान के भाग 4 में उल्लिखित।
अमेरिका के संविधान से प्रेरित।
आयरलैंड के संविधान से प्रेरित।
इसकी प्रवृत्ति नकारात्मक है।
इसकी प्रवृत्ति सकारात्मक है।
यह न्यायोचित है, इसके उल्लंघन पर न्यायालय द्वारा इसे लागू कराया जाना।
यह गैर-न्यायोचित है, इसे न्यायालय द्वारा लागू नहीं कराया जा सकता।
कानूनी रुप से मान्य
नैतिक एवं राजनीतिक मान्यता।
उद्देश्य-देश मे लोकतांत्रिक राजनीतिक व्यवस्था स्थापित करना।
उद्देश्य-देश में सामाजिक एवं आर्थिक लोकतंत्र की स्थापना करना।
लागू करने के लिए विधान की आवश्यकता नही
लागू करने के लिए विधान  बनाने की आवश्यकता।
व्यक्तिगत कल्याण को प्रोत्साहन
सामाजिक एवं आर्थिक कल्याण के लिए।
नागरिकों को स्वतः प्राप्त
सरकार द्वारा लागू करने के  बाद ही नागरिकों को प्राप्त।

भारतीय संविधान मे सम्मिलित नीति निदेशक तत्वों की प्रेरणा हमें वर्ष 1937 के आयरलैंड के संविधान से प्राप्त हुई। आयरलैंड के संविधान से अनुसरणीय इस भाग पर फेबियनवाद, समाजवाद, उदार लोकतांत्रिक विचारधाराओं, गांधीवाद, मानवाधिकारों की सार्वत्रिक घोषणाओं आदि का व्यापक प्रभाव पड़ा है।
समान कार्य के लिए समान वेतन भारत के संविधान मे सुनिश्चित किया गया राज्य के नीति निदेशक सिध्दांतों का एक अंग है। अनुच्छेद 39(घ) यह प्रावधान करता है कि पुरुष और स्त्री दोनों का समान कार्य के लिए समान वेतन होना चाहिए। ज्ञातव्य है कि संविधान के अनुच्छेद 39(घ) के अनुसरण मे संसद ने वर्ष 1976 मे समान पारिश्रमिक अधिनियम पारित किया है।
महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) भारत में लागू एक रोजगार गारंटी योजना है, जिसे वर्ष 2005 में लोक सभा द्वारा अधिनियमित किया गया। यह योजना प्रत्येक वित्तीय वर्ष में किसी भी ग्रामीण परिवार के उन वयस्क सदस्यों को 100 दिन का रोजगार उपलब्ध कराती है, जो सांविधिक न्यूनतम मजदूरी पर सार्वजनिक कार्य-संबंधित अकुशल मजदूरी करने के लिए तैयार है। यह काम पाने का अधिकार के तहत भाग-IV के अनुच्छेद 41 के अंतर्गत है।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51 के अंतर्गत राज्य के नीति निदेशक तत्वों में अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा की अभिवृध्दि का उल्लेख है। इसके अनुसार राज्य –
अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा की अभिवृध्दि का
राष्ट्रों के बीच न्यायसंगत और सम्मानपूर्ण संबंधों को बनाए रखने का
संगठित लोगों के एक-दूसरे से व्यवहारों मे अंतरराष्ट्रीय विधि और संधि बाध्यताओं के प्रति आदर बढ़ाने का और
अंतरराष्ट्रीय विवादों के माध्यम (Arbitration) द्वारा निपटारे के लिए प्रोत्साहन देने का प्रयास करेगा।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 43 (क) अर्थात उद्योगों के प्रबंधन में सहभागिता 42वें संविधान संशोधन, 1976 द्वारा जोड़ा गया। अनुच्छेद 43 (क) के अनुसार, राज्य किसी उद्योग में लगे हुए उपक्रमों, स्थापनों या अन्य संगठनों के प्रबंध में कर्मकारों का भाग लेना सुनिश्चित करने के लिए उपयुक्त विधान द्वारा या किसी अन्य रीती से कदम उठाएगा।
संविधान में बच्चों, स्त्रियों एवं जनाजातियों के शोषण के विरुध्द अधिकार को स्वीकृति प्रदान की गई है, जबकि दलित शब्द का संविधान में उल्लेख नही है।
राज्य के नीति निदेशक सिध्दांत मौलिक अधिकारों से भिन्न हैं, क्योकि निदेशक सिध्दांत प्रवर्तनीय नही है, जबकि मौलिक अधिकार न्यायलय द्वारा प्रवर्तनीय हैं। निदेशक सिध्दांत संविधान के भाग 4 में वर्णित हैं और 3 में वर्णित मौलिक अधिकार व्यक्तियों को राज्य कृत के विरुध्द दिए गए सुरक्षा की गारंटी है।
नीति निदेशक तत्वों के अंतर्गत अनुच्छेद, 47 के तहत मादक पेयों और स्वास्थ्य के लिए हानिकर औषधियों के, औषधीय प्रयोजनों से भिन्न उपभोग का प्रतिषेध किया गया है। मानव के दुर्व्यापार और बालातश्रम का प्रतिषेध मूलाधिकारों के अंतर्गत अनुच्छेद 23(1) के तहत किया गया है।
भारतीय संविधान में सामाजिक आर्थिक एजेंडे को साकारित करने के लिए वाद योग्य और अ-वाद योग्य दोनों तरह की व्यस्थाएं समाहित हैं। जिसमें मौलिक अधिकार वाद योग्य और नीति निदेशक तत्व अ-वाद योग्य हैं।
के.टी. शाह ने कहा था कि राज्य के नीति निदेशक सिध्दांत एक ऐसा चेक है, जो  बैंक की सुविधानुसार अदा किया जाता है।


15 अगस्त, 1995 से प्रारंभ राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम संविधान में प्रदत्त राज्य के नीति निदेशक तत्वों अर्थात राज्य कें संवैधानिक लक्ष्यों (विशेषकर अनुच्छेद 41 के तहत बेरोजगारी, वृध्दावस्था आदि की स्थिति में लोक सहायता संबंधी निदेश) की प्राप्ति की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। प्रारंभ में इस कार्यक्रम के तहत शामिल थे – राष्ट्रीय वृध्दावस्था पेंशन योजना (NOAPS), राष्ट्रीय परिवार लाभ योजना (NFBS) एवं राष्ट्रीय मातृत्व लाभ योजना (NMBS)। 1 अप्रैल, 2001 से NMBS को जनसंख्या स्थिरीकरण कार्यक्रम का भाग  बना दिया गया है।
अनुच्छेद 350(क) – प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा में शिक्षा देने का विशेष निर्देश देता है।


मूल कर्तव्य
भारतीय संविधान में मूल कर्तव्य, पूर्व सोवियत संघ के संविधान से लिए गए हैं।
इन्हें सरदार स्वर्ण सिंह समिति की संस्तुति के आधार पर 42वें संविधान संशोधन, 1976 द्वारा जोड़ा गया है।
वर्तमान में अनुच्छेद 51(क) के तहत मौलिक कर्तव्यों की कुल संख्या 11 है। जबकि मूल संविधान में इनकी संख्या 10 थी।
11वां मूल कर्तव्य, 86वें संविधान संशोधन (2002) द्वारा जोड़ा गया।
मौलिक कर्तव्यों को प्रभावी बनाने के लिए वर्ष 1999 में जे.एस. वर्मा समिति का गठन किया गया।
51(क) मूल कर्तव्य – भारत के प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य होगा कि वह –
– संविधान का पालन करे और उसके आदर्शों, संस्थाओं, राष्ट्र ध्वज और राष्ट्रगान का आदर करें।
– स्वतंत्रता के लिए हमारे राष्ट्रीय आंदोलन को प्रेरित करने वाले उच्च आदर्शों को हृदय में संजोए रखे और उनका पालन करें।
– भारत की प्रभुता, एकता और अखंडता की रक्षा करे उसे अक्षुण्ण रखे।
– देश की रक्षा करें और आह्वान किए जाने पर राष्ट्र की सेवा करें।
– भारत के सभी लोगों में समरसता और समान भ्रातृत्व की भावना का निर्माण करे जो धर्म, भाषा और प्रदेश या वर्ग पर आधारित सभी भेदभाव से परे हो, ऐसी प्रथाओं का त्याग करे जो स्त्रियों के सम्मान के विरुध्द है।
– हमारी सामासिक संस्कृति की गौरवशाली परंपरा का महत्व समझे और उसका परिरक्षण करें।
– प्राकृतिक पर्यावरण की, जिसके अंतर्गत वन, झील, नदी और वन्य जीव हैं, रक्षा करें और उसका संवर्धन करे तथा प्राणि मात्र के प्रति दयाभाव रखे।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानववाद और ज्ञानार्जन तथा सुधार की भावना का विकास करें।
सार्वजनिक सम्पत्ति को सुरक्षित रखे और हिंसा से दूर रहे।
व्यक्तिगत और सामूहिक गतिविधियों के सभी क्षेत्रो में उत्कर्ष की ओर बढ़ने का सतत प्रयास करे जिससे राष्ट्र निरंतर बढ़ते हुए प्रयत्न और उपलब्धि की नई ऊंचाइयों को छू ले।
यदि माता-पिता या संरक्षक है, छह वर्ष से चौदह वर्ष तक की आयु वाले अपने, यथावस्थित, बालक या प्रतिपात्य के लिए शिक्षा के अवसर प्रदान करे।
भारत की प्रभुता, एकता और अखंडता की रक्षा करने और अक्षुण्ण रखने के मूल कर्तव्य को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51(क) के तीसरे स्थान पर रखा गया है।
मौलिक कर्तव्यों को परमादेश द्वारा प्रभावी नही बनाया जा सकता है। परमादेश एक रिट है जिसे न्यायालय मूल अधिकारों का उल्लंघन होने पर जारी करता है। मौलिक कर्तव्य लोगो पर नैतिक जिम्मेदारी आरोपित करते हैं। प्रशासन इसके लिए जिम्मेदार नही हो सकता है, जबकि रिटें प्रशासनिक अधिकारी के विरुध्द जारी की जाती है।
भारत के प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य होगा – प्राकृतिक पर्यावरण का संरक्षण एवं सुधार यह संविधान में मौलिक कर्तव्यों मे शामिल किया गया है। जिसका वर्णन अनुच्छेद 51 क(छ) में किया गया है।
वैज्ञानिक प्रवृत्ति विकसित करना अनु. 51-क (ज) के तहत, सार्वजनिक सम्पत्ति की सुरक्षा करना अनु.-क (झ) के तहत तथा संविधान के प्रति निष्ठावान रहना और उसके आदर्शों का सम्मान करना अनु.-51- (क) के तहत मूल कर्तव्यों में शामिल है।


राष्ट्रपति
भारत का राष्ट्रपति देश का प्रथम नागरिक होता है।
अनुच्छेद 52 के अनुसार, भारत का राष्ट्रपति होगा।
अनुच्छेद 53 के तहत संघ की समस्त कार्यपालिका शक्ति राष्ट्रपति में निहित है। इस शक्ति का प्रयोग वह संविधान के अनुसार, स्वतः या अपने अधीनस्थ अधिकारियों द्वारा करेगा।
अनुच्छेद 54 – के अनुसार, राष्ट्रपति का निर्वाचन एक निर्वाचक मंडल द्वारा होता है। राष्ट्रपति के निर्वाचक मंडल मे संसद के दोनों सदनों (राज्य सभा एवं लोक सभा) के निर्वाचित सदस्य और राज्य विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्य शामिल होते हैं।
70वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 द्वारा दिल्ली और पुडुचेरी विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्यों को भी निर्वाचक मंडल मे शामिल किया गया।
राष्ट्रपति के चुनाव में मनोनीत सदस्य एवं विधान परिषद के सदस्य भाग नही लेते हैं।
राष्ट्रपति का चुनाव आनुपातिक प्रतिनिधित्व के अनुसार, एकल संक्रमणीय मत और गुप्त मतदान द्वारा होता है।
राष्ट्रपति चुनाव से संबंधित सभी विवादों की जांच व फैसले उच्चतम न्यायालय में होते हैं तथा उसका फैसला अंतिम होता है।
राष्ट्रपति के चुनाव को इस आधार पर चुनौती नही दी जा सकती है कि निर्वाचक मंडल अपूर्ण है।
अनुच्छेद 58 में राष्ट्रपति निर्वाचित होने के लिए अर्हताएं (भारत का नागरिक हो, 35 वर्ष की आयु पूरा कर चुका हो तथा लोक सभा का सदस्य निर्वाचित होने की योग्यता) बताई गई है।
राष्ट्रपति के चुनाव में नामांकन के लिए उम्मीदवार के कम-से-कम 50 प्रस्तावक व 50 अनुमोदक होने चाहिए।
जमानत राशि के रुप में 15000 रु. जमा करना होगा।
यदि उम्मीदवार कुल डाले गए मतो का 1/6 भाग प्राप्त करने में असमर्थ रहता है तो जमानत राशि जब्त कर ली जाती है।
अनुच्छेद 56 में राष्ट्रपति की पदावधि (पद ग्रहण की तारीख से 5 वर्ष तक) का उल्लेख है।
अनुचछेद 56(1)(क) के अनुसार, भारत का राष्ट्रपति अपना त्याग-पत्र उपराष्ट्रपति को संबोधित करके देता है। उपराष्ट्रपति इसकी सूचना लोक सभा अध्यक्ष को तुरंत देता है (अनु. 56(2)।
भारतीय संविधान का अनु. 57 राष्ट्रपति पद के लिए किसी व्यक्ति को पुनः निर्वाचन की पात्रता निर्धारित करता है।
42वें संविधान संशोधन अधिनियम 1976 के अनुसार, राष्ट्रपति के निर्वाचन मे जनसंख्या से तात्पर्य वर्ष 1971 की जनगणना द्वारा निर्धारित जनसंख्या से है।
84वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2001 द्वारा इसे वर्ष 2026 तक के लिए निर्धारित किया गया है।
अनुच्छेद 59(1) के अनुसार, यदि संसद के किसी सदन का या किसी राज्य के विधानमंडल के किसी सदन को कोई सदस्य राष्ट्रपति निर्वाचित हो जाता है, तो यह समझ जाएगा कि उसने उस सदन में अपना स्थान राष्ट्रपति के रुप में अपने पद ग्रहण की तारीख से रिक्त कर दिया है।
अनुच्छेद 60 के तहत भारत के राष्ट्रपति को शपथ भारत का मुख्य न्यायाधीश दिलाता है।
वर्तमान में राष्ट्रपति का वेतन 5 लाख रुपये है। राष्ट्रपति का वेतन भारत की संचित निधि से दिया जाता है।
अनुच्छेद 56(1)(ख) के अनुसार, राष्ट्रपति पर महाभियोग संविधान के अतिक्रमण के आधार पर चलाया जा सकता है।


अनुच्छेद 61 मे राष्ट्रपति पर महाभियोग की प्रक्रिया का उल्लेख है।
अनु. 61(2) के अनुसार, महाभियोग का आरोप तब तक नही लगाया जाएगा, जब तक कि ऐसा आरोप लगाने की प्रस्थापना किसी ऐसे संकल्प में अंतर्विष्ट नही है, जो कम-से-कम 14 दिन की ऐसी लिखित सूचना को दिए जाने का प्रस्ताव  प्रस्तावित न किया गया हो।
इस प्रकार 14 दिन की अग्रिम सूचना के साथ ही संकल्प पर सदन की कुल सदस्य संख्या के कम-से-कम एक-चौथाई सदस्यों के हस्ताक्षर भी होने चाहिए।
अनुच्छेद 62(2) के अनुसार, यदि राष्ट्रपति पद की रिक्ति राष्ट्रपति की मृत्यु, पदत्याग या पद से हटाए जाने के कारण हुई है तो पद रिक्ति को भरने के लिए निर्वाचन, रिक्ति होने की तारीख के पश्चात यथाशीघ्र और प्रत्येक दशा में 6 माह बीतने से पहले किया जाएगा।
यदि मृत्यु त्याग-पत्र अथवा हटाए जाने की स्थिति में राष्ट्रपति का पद रिक्त हो, तो पद का कार्यभार उपराष्ट्रपति संभालेगा।
यदि किन्ही कारणों से उपराष्ट्रपति भी उपलब्ध नही हो, तो उच्चतम न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश या उसके न रहने पर वरिष्ठतम न्यायाधीश राष्ट्रपति के कार्यों को संपादिक करेगा।
अनुच्छेद 77 के अनुसार, भारत सरकार के समस्त कार्यपालिका कृत्य राष्ट्रपति के नाम से किए जाते हैं।
अनुच्छेद 78 के तहत राष्ट्रपति को प्रधानमंत्री से सूचना प्राप्त करने का अधिकार प्राप्त है।
अनुच्छेद 108 के तहत राष्ट्रपति संसद के दोनों सदनों का संयुक्त अधिवेशन बुला सकता है।
अनुच्छेद 111 को तहत प्रावधान है कि राष्ट्रपति संसद के दोनों सदनों द्वारा पारित विधेयक पर स्वीकृति प्रदान करेगा या अपनी स्वीकृति रोक लेगा अथवा विधेयक (धन विधेयक के अलावा) को पुनर्विचार हेतु सदन को लौटा सकेगा।
यदि विधेयक सदनों द्वारा संशोधन सहित या उसके बिना फिर से पारित कर दिया जाता है और राष्ट्रपति के समक्ष पुनः प्रस्तुत किया जाता है, तो राष्ट्रपति उस पर स्वीकृति नही रोकेगा।
राष्ट्रपति धन विधेयक को पुनर्विचार हेतु नही लौटा सकता। वस्तुतः धन विधेयक सदन में राष्ट्रपति की पूर्व अनुमति से ही प्रस्तुत किए जाते हैं।
राष्ट्रपति की स्वीकृति के बाद ही विधेयक कानून बनते हैं।
अनुच्छेद 123 के तहत राष्ट्रपति को अध्यादेश जारी करने की क्षमादान की शक्ति प्रदान की गई है।
अनुच्छेद 72 के तहत भारत के राष्ट्रपति को क्षमादान की शक्ति प्रदान की गई है।
अनुच्छेद 143 के तहत राष्ट्रपति को उच्चतम न्यायालय से परामर्श का अधिकार दिया गया है।
भारत का राष्ट्रपति तीनों सेनाओं (थल सेना, वायु सेना तथा नौसेना) का प्रधान सेनापति होता है।
राष्ट्रपति राष्ट्र का प्रतिनिधित्व करता है परंतु राष्ट्र का नेतृत्व नही करती है।
किसी भौगोलिक क्षेत्र को अनूसूचित क्षेत्र घोषित करने का संवैधानिक अधिकार राष्ट्रपति के पास है।



भारत के राष्ट्रपति
नाम
पद धारण
अवधि
कार्यकाल अनुसार क्रम
व्यक्ति अनुसार क्रम
डॉ. राजेन्द्र प्रसाद
26 जनवरी, 1950-13 मई, 1962
1-3
1
डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन
13 मई, 1962-13मई, 1967
4
2
डॉ. जाकिर हुसैन
13 मई, 1967-3 मई, 1969
5
3
वराहगिरी वेंकट गिरि (कार्यवाहक)
3 मई, 1969-20 जुलाई, 1969


न्यायमूर्ति मुहम्मद हिदायतुल्लाह (कार्यवाहक)
20 जुलाई, 1969-24 अगस्त, 1969


वराहगिरि वेंकट गिरि
24 अगस्त, 1969-24 अगस्त, 1974
6
4
डॉ. फखरुद्दीन अली अहमद
24 अगस्त, 1974-11 फरवरी, 1977
7
5
बी.डी. जत्ती (कार्यवाहक)
11 फरवरी, 1977-25 जुलाई, 1977


नीलम संजीव रेड्डी
25 जुलाई, 1977-25 जुलाई, 1982
8
6
ज्ञानी जैल सिंह
25 जुलाई, 1982-25 जुलाई 1987
9
7
आर. वेंकटरमण
25 जुलाई, 1987-25 जुलाई, 1992
10
8
डॉ. शंकर दयाल शर्मा
25 जुलाई, 1992-25 जुलाई, 1997
11
9
डॉ. के.आर. नारायणन
25 जुलाई, 1997 -25 जुलाई, 2002
12
10
डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम
25 जुलाई, 2002-25 जुलाई, 2007
13
11
प्रतिभा पाटिल
25 जुलाई, 2007-25 जुलाई, 2012
14
12
प्रणब मुखर्जी
25 जुलाई, 2012-25 जुलाई, 2017
15
13
रामनाथ कोविंद
25 जुलाई, 2017 – अब तक
16
14

राष्ट्रपति के चुनाव का तरीका (सूत्र) अनुच्छेद 55 में वर्णित है।
विधानसभ के निर्वाचित सदस्य के मत का मूल्यांकन = राज्य की जनसंख्या / राज्य की विधानसभा में निर्वाचित सदस्यों की संख्या  ´ 100

संसद के निर्वाचित सदस्य के मत का मूल्य  = सभी निर्वाचित विधानसभा सदस्यों के मतो का कुल मान / निर्वाचित संसद सदस्यों की कुल संख्या
टिप्पणी – उपर्युक्त सूत्र में यदि शेषफल आधे से कम है तो नही गिना जएगा और यदि ज्यादा है तो उस एक गिना जाएगा। 12वें राष्ट्रपति चुनाव में (तथा जुलाई 2012 में संपन्न 14वें राष्ट्रपति चुनाव में भी) 4896 मतदाता थे।
अनुच्छेद 54 के अनुसार, राष्ट्रपति के चुनाव मे राज्य विधानमंडल के उच्च सदन अर्थात विधान परिषद के सदस्य नहीं कर सकते हैं अतः यदि मुख्यमंत्री इस सदन का सदस्य है, तो वह राष्ट्रपति के चुनाव में मतदान करने के लिए पात्र नही होता है।
अगर भारत के राष्ट्रपति के चुनाव में कोई विवाद है तो उस विवाद को अनुच्छेद 71(1) के अनुसार, भारत के सर्वोच्च न्यायालय को सौंपा जाएगा और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा किया गया वनिश्चय अंतिम होगा।
अनुच्छेद 56(1) के अनुसार, राष्ट्रपति अपने पद ग्रहण के दिन से 5 वर्ष की अवधि तक पद धारण करता है।
अनुच्छेद 65 के अनुसार, यदि मृत्यु, त्याग-पत्र अथवा हटाए जाने की स्थिति में राष्ट्रपति का पद रिक्त हो तो पद का कार्यभार उपराष्ट्रपति संभालेगा तथा यदि किन्हीं कारणों से उपराष्ट्रपति भी उपलब्ध नही है तो उच्चतम न्यायलय का मुख्य न्यायाधीश या उसके न रहने पर उसी न्यायालय का वरिष्ठतम न्यायाधीश, जो उस समय उपलब्ध है, राष्ट्रपति के कृत्यों को सम्पादित करेगा (राष्ट्रपति उत्तराधिकार अधिनियम, 1969)
अनुच्छेद 53(1) के अनुसार संघ की कार्यपालिका शक्ति राष्ट्रपति में निहित होगी, जिसका प्रयोग वह इस संविधान के अनुसार स्वयं या अपने अधीनस्थ अधिकारियों के द्वारा करेगा। इस प्रकार भारतीय संघ का कार्य़पालिका अध्यक्ष राष्ट्रपति होता है।
अनुच्छेद 74(1) के तहत प्रधानमंत्री मंत्रिपरिषद का प्रधान होता है। अनुच्छेद 75(1) के अनुसार प्रधानमंत्री की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा होती है। कोई भी व्यक्ति यदि संसद सदस्य नही है तो भी वह प्रधानमंत्री बन सकता है या मंत्रिपरिषद में सम्मिलित हो सकता है लेकिन छः माह के भीतर उसे सदन की सदस्यता अवश्य लेनी होगी।
भारत एक गणराज्य है। इसका तात्पर्य़ है कि भारत का राष्ट्राध्यक्ष निर्वाचित होगा न कि वंशानुगत। अतः भारतीय गणतंत्र का प्रमुख या राष्ट्राध्यक्ष होता है जिसका चुनाव अप्रत्यक्ष निर्वाचन प्रणाली द्वारा किया जाता है।


44वें संविधान संशोधन, 1978 द्वारा अनुच्छेद 74(1) में एक परांतक जोड़ा गया, जिसके तहत राष्ट्रपति को कोई भी मामला मंत्रिपरिषद द्वारा  पुनर्विचार किए जाने के लिए  वापस भेजने का अधिकार दिया गया।
अनुच्छेद 85(2) (ख) के अनुसार राष्ट्रपति लोक सभा भंग कर सकता है, किंतु राष्ट्रपति की यह शक्ति अनुच्छेद 74(1) के अधीन है अर्थात वह ऐसा केन्द्रीय मंत्रिमंडल की अनुशंसा पर ही कर सकता है। उल्लेखनीय है कि मंत्रिमंडल में कैबिनेट स्तर के मंत्री शामिल होते हैं, जबकि मंत्रिपरिषद में सभी (कैबिनेट, राज्य, उपमंत्री) मंत्री शामिल होते हैं।
संविधान के अनु. 108 के तहत किसी विधेयक पर दोनों सदनों के मध्य गतिरोध की स्थिति मे लोक सभा और राज्य सभा की संयुक्त बैठक राष्ट्रपति द्वारा आहूत की जा सकती है। अनु. 118 (4) के तहत दोनों सदनों की संयुक्त बैठक की अध्यक्षता लोक सभा अध्यक्ष द्वारा की जाती है।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 79 के अंतर्गत भारत का राष्ट्रपति संसद का एक संघटक भाग है, वह प्रत्येक वर्ष दोनों सदनों की संयुक्त बैठक को संबोधित करता है तथा वह संविधान के अनु. 123 के तहत विशेष पारिस्थितियों मे अध्यादेश जारी कर सकता है परंतु वह दोनों सदनों में चर्चा में भाग नही लेता है।
पेप्सू विनियोग विधेयक के मामले में 1954 में राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने आत्यांतिक वीटो का प्रयोग किया था, जबकि 1986 में राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह ने भारतीय डाक घर (संशोधन) विधेयक पर पॉकेट वीटो का प्रयोग किया। आत्यांतिक वीटो मंत्रिमंडल की इच्छाधीन होता है, अतः पॉकट वीटो ही स्वेच्छा से किया गया माना जाएगा।
वर्ष 1986 में भारत के राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह ने भारतीय पोस्ट ऑफिस संशोधन अधिनियम के संबंध में जेबी निषेधाधिकार का प्रयोग किया था। उल्लेखनीय है कि जब राष्ट्रपति दोनों सदनों द्वारा पारित बिल को अपने पास असीमित समय-सीमा के लिए लंबित रखता है अर्थात वह इस पर सहमति नही देता और न ही इसे पुनर्विचार के लिए लौटाता है, तो इसे संविधानिक शब्दावली में जेबी निषेधाधिकार कहा जाता है।
अनुच्छेद 123 राष्ट्रपति की अध्यादेश जारी करने संबंधी शक्तियों का वर्णन करता है।
अनुच्छेद 280(1) के अनुसार, वित्त आयोग के अध्यक्ष की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है। अनुच्छेद 239 क (5) के तहत संघ राज्य क्षेत्र के मुख्यमंत्री की नियुक्ति राष्ट्रपति करता है तथा अन्य मंत्रियों की नियुक्ति राष्ट्रपति, मुख्यमंत्री की सलाह पर करेगा तथा मंत्री राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत पद धारण करेंगे। योजना आयोग के उपाध्यक्ष की नियुक्ति प्रधानमंत्री  द्वारा की जाती  है।
राष्ट्रपति संविधान के अनुच्छेद 76 के अनुसार महान्यायवादी, अनुच्छेद 148 के अनुसार नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक तथा अनुच्छेद 155 के अनुसार राज्यों के राज्यपाल की नियुक्ति करता है।
संविधान के अनु. 160 के अनुसार राष्ट्रपति आकस्मिक या असाधारण परिस्थितियों में राज्यपाल के कृत्यों के निर्वहन हेतु उपबंध कर सकता है।
अनुच्छेद 164(1) के अनुसार, राज्यो के मुख्यमंत्री की नियुक्ति का अधिकार राज्यों के राज्यपाल को है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 143 राष्ट्रपति को विधि या तथ्य के व्यापक महत्व के प्रश्न के संदर्भ में उच्चतम न्यायालय से परामर्श की शक्ति प्रदान करता है।
संसद के सदनों को संदेश भेजना अनुच्छेद 86 के अंतर्गत राष्ट्रपति का अधिकार है, जबकि अनुच्छेद 72 क्षमादान की राष्ट्रपति की शक्ति, अनुच्छेद 123 अध्यादेश निर्गत करने की राष्ट्रपति की शक्ति और अनुच्छेद 143 उच्चतम न्यायालय से परामर्श करने की राष्ट्रपति की शक्ति शब्दशः शक्ति के रुप में उल्लेखन करते हैं।
अनुच्छेद 124 के खंड (4) के अनुसार, सर्वोच्च न्यायालय के किसी न्यायाधीश को उसके पद से तब तक नही हटाया जाएगा, जब तब साबित कदाचार या असमर्थता के आधार पर ऐसे हटाए जाने के लिए  संसद के प्रत्येक सदन  द्वारा अपनी कुल सदस्य संख्या के बहुमत द्वारा तथा उपस्थित और मत देने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई बहुमत द्वारा समर्थित समावेदन, राष्ट्रपति के समक्ष उसी सत्र मे रखे जाने पर राष्ट्रपति ने उसे हटाने का आदेश नही दे दिया  है।
भारत के राष्ट्रपति को संविधान के तहत प्राप्त प्राधिकार औपचारिक एवं विधिक तथा संवैधानिक और नाममात्र हैं।


संघ वित्त आयोग, राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग की स्थापना और नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है। जबकि लोक लेखा समिति की स्थापना लोक सभा और राज्य सभा के सदस्यों को मिलाकर की जाती है। इसके अध्यक्ष की नियुक्ति लोक सभा अध्यक्ष के द्वारा की जाती है। राष्ट्रपति द्वारा संघ वित्त आयोग की सिफारिशों, नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक के प्रतिवेदन तथा राष्ट्री अनूसूचित जाति आयोग के प्रतिवेदन को क्रमशः संविधान के अनु. 281, 151(1) एवं 338(6) के तहत संसद के पटल पर रखवाया जाता है।
संसद के लिए राष्ट्रपति का अभिभाषण केन्द्रीय मंत्रिमंडल तैयार करता है, क्योंकि वास्तविक कार्यपालिका शक्ति केन्द्रीय मंत्रिमंडल मे निहित है।
स्वतंत्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद थे। वह संविधान सभा के अध्यक्ष भी थे। डॉ. राजेन्द्र प्रसाद बिहार राज्य से थे।
भारत के व्यक्ति अनुसार, चौथे राष्ट्रपति श्री वी.वी. गिरि थे तथापि कार्यकाल-अनुसार उनका क्रम डॉ. राजेन्द्र प्रसाद (तीन बार), डॉ. एस. राधाकृष्णन एवं डॉ. जाकिर हुसैन के बाद छठां  है।
डॉ. राजेन्द्र प्रसाद लगातार तीन अवधि तक (1950-1952, 1952-1957 तथा 1957-1962) भारत के राष्ट्रपति रहे थे। जिसमें से 26 जनवरी, 1950 को वे संविधान के अध्यक्ष होने के कारण भारत के राष्ट्रपति बने थे तथा 1952 एवं 1957 मे वे क्रमशः प्रथम एवं द्वितीय राष्ट्रपति चुनावों में राष्ट्रपति निर्वाचित हुए थे।
एन. संजीव रेड्डी सर्वसम्मति से (निर्विरोध) भारत के राष्ट्रपति चुने जाने वाले एकमात्र व्यक्ति हैं। उनका कार्यकाल वर्ष 1977-82 था।
भारत के दूसरे राष्ट्रपति (13 मई, 1962 से 13 मई, 1967) डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन को दार्शनिक राजा तथा दार्शनिक शासक के रुप में जाना जाता है।
भारत के चौथे राष्ट्रपति वी.वी. गिरि (1969-1974) ट्रेड यूनियन आंदोलन से संबध्द रहे थे। वे दो बार अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस के भी अध्यक्ष रहे थे।
भारत के व्यक्ति के अनुसार 11वें राष्ट्रपति (2002-2007) डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम को मिसाइल मैन की संज्ञा दी जाती है क्योंकि उन्हीं के निर्देशन मे प्रारंभ एकीकृत निर्देशित मिसाइल विकास कार्यक्रम (IGMDP) के द्वारा इस क्षेत्र में आत्मनिर्भर बन सका है।
जस्टिस एम. हिदायतुल्ला ने 20 जुलाई, 1969 से 24 अगस्त 1969 के दौरान कार्यवाहक राष्ट्रपति के रुप में कार्य किया था।
19 जुलाई, 2007 को भारतीय गणतंत्र के 13वें राष्ट्रपतीय चुनाव संपन्न हुए थे। 25 जुलाई, 2007 को प्रतिभा पाटिल ने व्यक्ति के अनुसार, देश के 12वें राष्ट्रपति के रुप में शपथ ग्रहण किया तथापि कार्यकाल-अनुसार उनका क्रम 14वां था। प्रतिभा पाटिल ने राष्ट्रीय लोकतांत्रिक मोर्चा के प्रत्याशी भैरो सिंह शेखावत को पराजित किया। वे भारत की प्रथम महिला राष्ट्रपति थी।


संविधान की पांचवी अनुसूची के पैराग्राफ 6 में अनूसूचित क्षेत्रों से संबंधित निम्न प्रावधान है –
राष्ट्रपति के आदेश द्वारा किसी भौगोलिक क्षेत्र को अनुसूचित क्षेत्र घोषित अथवा विस्तारित किया जा सकता है।
किसी भी समय राष्ट्रपति के आदेश अनुसूचित क्षेत्र के संपूर्ण अथवा किसी विशिष्ट भाग को प्राप्त किया जा सकता है।
राज्य के राज्यपाल की सहमति से राज्य के अनुसूचित क्षेत्र के क्षेत्रफल को बढ़ाया जा सकता है।
डॉ. जाकिर हुसैन 6 जुलाई, 1957 से 11 मई, 1962 तक बिहार के राज्यपाल, 13 मई, 1962 से 12 मई, 1967 तक भारत के उपराष्ट्रपति और 13 मई, 1967 से 3 मई, 1969 (जब उनकी मृत्यु हुई) तक भारत के राष्ट्रपति रहे थे।
राष्ट्रपति वी.वी. गिरि, राष्ट्रपति निर्वाचन में भ्रष्ट आचरण के आरोप में विवाद की सुनवाई के समय सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश एस. एम. सीकरी की अध्यक्षता वाली पीठ के सम्मुख उपस्थित हुए थे। ध्यातव्य है कि 1969 के राष्ट्रपतीय चुनाव में वी.वी. गिरि स्वतंत्र उम्मीदवार तथा नीलम संजीव रेड्डी कांग्रेस पार्टी के घोषित उम्मीदवार थे। वी.वी. गिरि के निर्वाचन के समय दूसरे चक्र की मतगणना भी की गई थी, जिसमें वी.वी. गिरी ने विजय प्राप्त की थी।
ब्रिटिश वास्तुकार एडविन ल्यूटियन्स द्वारा राष्ट्रपति भवन को डिजाइन किया गया था। यह भवन भारत के राष्ट्रपति का सरकारी आवास है। वर्ष 1950 तक इसे वाइसरॉय हाउस कहा जाता था।