Indian Polity for All Competitive Exams (State Level) Part 4

उपराष्ट्रपति
भारत में उपराष्ट्रपति का पद अमेरिका के उपराष्ट्रपति की तर्ज पर बनाया गया है।
आधिकारिक क्रम में यह पद राष्ट्रपति के बाद आता है।
संविधान के अनुच्छेद 63 के अनुसार भारत का एक उपराष्ट्रपति होगा।
अनुच्छेद 64 के तहत उपराष्ट्रपति राज्य सभा का पदेन सभापति (Ex-Officio Chairman) होता है।
जिस अवधि के दौरान उपराष्ट्रपति, अनु. 65 के अधीन राष्ट्रपति के कृत्यों का निर्वहन करता है, उस दौरान वह राज्य सभा के सभापति के पद के कर्तव्यों का पालन नही करेगा तथा अनु. 97 के अधीन सभापति के वेतन –भत्ते का हकदार नही होगा।
भारत के उपराष्ट्रपति का चुनाव संसद के दोनों सदनों के निर्वाचित और मनोनीत दोनों सदस्यों द्वारा किया जाता है।
अनु. 66(1) के अनुसार, उपराष्ट्रपति का निर्वाचन आनुपातिक प्रतिनिधित्व पध्दति के अनुसार एकल संक्रमणीय मत द्वारा होता है तथा ऐसे निर्वाचन में मतदान गुप्त होता है।
अनुच्छेद 66(3) के तहत उपराष्ट्रपति पद के लिए योग्यता (भारत का नागरिक हो, 35 वर्ष की आयु पूरी कर चुका हो तथा राज्य सभा सदस्य निर्वाचित होने की योग्यता) का उल्लेख किया गया है।
भारत के उपराष्ट्रपति को राज्य सभा के सभापति पद के लिए 4 लाख रुपये प्रतिमाह वेतन दिया जाता है।
उपराष्ट्रपति को, उपराष्ट्रपति पद के लिए वेतन नही प्राप्त होता है, बल्कि राज्य सभा के सभापति के रुप में प्राप्त होता है।
अनुच्छेद 67 (क) के अनुसार, उपराष्ट्रपति का कार्यकाल 5 वर्ष है।
अनुच्छेद 67(ख) के अनुसार उपराष्ट्रपति राज्य सभा के ऐसे संकल्प द्वारा अपने पद से हटाया जा सकेगा, जिसे राज्य सभा के तत्कालीन समस्त सदस्यों के बहुमत ने पारित किया है और जिससे लोक सभा सहमत है।


भारत के उपराष्ट्रपति एवं उनका कार्यकाल इस प्रकार है –
डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन –      1952-1962
डॉ. जाकिर हुसैन –      1962-1967
वी.वी. गिरि –      1967-1969
गोपाल स्वरुप पाठक –      1969-1974
बी.डी. जत्ती –      1974-1979
एम. हिदायतुल्ला –      1979-1984
आर. वेंकट रमण –      1984-1987
शंकर दयाल शर्मा –      1987-1992
के.आर. नारायणन –      1992-1997
डॉ. के. कृष्णकांत –      1997-2002
भैरो सिंह शेखावत –      2002-2007
मोहम्मद हामिद अंसारी –      2007-2017
वेंकैया नायडू –      2017 से अब तक
भारत का उपराष्ट्रपति, राष्ट्रपति के पश्चात भारत का द्वितीय उच्चतम प्रतिष्ठित पदधारी है। वह राज्य सभा का पदेन सभापति होता है परंतु उसके पास उपराष्ट्रपति पद से संबध्द कोई औपचारिक दायित्व नही है। वह राष्ट्रपति के पद-त्याग, अपदस्थीकरण अथवा मृत्यु की स्थिति या राष्ट्रपति की अनुपस्थिति में उसके कार्यों का निर्वहन करता है।
जाकिर हुसैन जामिया मिलिया कालेज के प्रिंसीपल एवं शिक्षा मंत्री थे। डॉ. एस. राधाकृष्णन 1949 से 1952 तक यू.एस.एस.आर. (S.S.R.) में भारत के राजदूत थे। वी.वी. गिरि 1947 से 1951 तक सिलोन (श्रीलंका) मे भारतीय उच्चायुक्त के पद पर थे। के.आर. नारायणन भी चीन में राजदूत (1976-78) रहे।
श्री मोहम्मद हामिद अंसारी का भारत के उपराष्ट्रपति के रुप में व्यक्ति के अनुसार क्रमांक 12वां है।


केन्द्रीय मंत्रिपरिषद
केन्द्रीय मंत्रिपरिषद में प्रधानमंत्री, कैबिनेट मंत्री, राज्य मंत्री तथा उपमंत्री शामिल होते हैं।
अनुच्छेद 74(1) के अनुसार, राष्ट्रपति को सहायता और सलाह देने के लिए एक मंत्रिपरिषद होगी, जिसका प्रधान प्रधानमंत्री होगा।
राष्ट्रपति, मंत्रिपरिषद की सलाह से कार्य करेगा परंतु राष्ट्रति ऐसी सलाह पर साधारतया या अन्यथा पुनर्विचार करने की अपेक्षा कर सकेगा और राष्ट्रपति ऐसे पुनर्विचार के पश्चात दी गी सलाह के अनुसार, कार्य करेगा (44वें संविधान संशोधन द्वारा शामिल)।
अनुच्छेद 74(2) के अनुसार, इस प्रश्न की किसी न्यायालय में जांच नही की जाएगी कि क्या मंत्रियों ने राष्ठ्रपति को कोई सलाह दी, और यदि दी तो क्या दी।
अनुच्छेद 75(1) के अनुसार, प्रधानमंत्री की नियुक्ति राष्ट्रपति करेगा और अन्य मंत्रियों की नियुक्ति राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री की सलाह से करेगा।
अनुच्छेद 75(1) (क) के अनुसार, मंत्रिपरिषद मे प्रधानमंत्री सहित मंत्रियों की कुल संख्या लोक सभा के सदस्यों की कुल संख्या के 15 प्रतिशत से अधिक नही होगी।
राज्यों में जहां पर सीटों की संख्या 40 होगी वहां अधिकतम 12 मंत्री बनाए जा सकते हैं।
संविधान (91वां संशोधन) अधिनियम, 2003 के द्वारा उपर्युक्त प्रावधान को संविधान मे शामिल किया गया।
मंत्री, राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत अपना पद धारण करते हैं। मंत्रिपरिषद लोक सभा के प्रति सामूहिक रुप से उत्तरदायी होती है।
संविधान में मंत्रिमंडल शब्द का प्रयोग केवल एक बार अनु. 352 के खंड (3) में किया गया है।
कैबिनेट या मंत्रिंडल, प्रधानमंत्री सहित कैबिनेट स्तर के मंत्रियों की परिषद होती है।
मंत्रीय उत्तरदायित्व के कारण अधिकारी अनामता के सिध्दांत से संरक्षित रहते हैं और अधिकारियों के द्वारा किए गए कार्यान्वयन की जिम्मेदारी अंतिम रुप से मंत्री की होती है।
केन्द्रीय कैबिनेट सचिवालय सीधे प्रधानमंत्री के अधीन होता है। इसका प्रशासनिक प्रमुख कैबिनेट सचिव होता है, जो सिविल सर्विसेज बोर्ड का पदेन अध्यक्ष भी होता है।
कोई मंत्री जो निरंतर 6 माह की किसी अवधि तक संसद के किसी सदन का सदस्य नही है, उस अवधि की समाप्ति पर मंत्री नही रहेगा।
प्रधानमंत्री तथा अन्य मंत्रियों को शपथ राष्ट्रपति दिलाता है।
प्रधानमंत्री अपना त्याग-पत्र राष्ट्रपति को देता है।
संघीय मंत्रिमंडल के बैठक की अध्यक्षता प्रधानमंत्री करता है।
अनुच्छेद 78 के अनुसार, प्रधानमंत्री राष्ट्रपति को ऐसी कानूनी सूचना देगा जो संघीय प्रशासन तथा विधान के बारे में उसके द्वारा मांगी जाए।
15 अगस्त, 1947 को केन्द्र में मंत्रालयों की संख्या 18 थी।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 78 में प्रधानमंत्री के दायित्वों का प्रावधान है, जिसके तहत प्रधानमंत्री का यह कर्तव्य होगा कि वह –
संघ के कार्यकलाप के प्रशासन संबंधी और विधान विषयक प्रस्थापनाओं संबंधी मंत्रिपरिषद के सभी विनिश्चय राष्ट्रपति को संसूचित करे।
संघ के कार्यकलाप के प्रशासन संबंधी और विधान विषयक प्रस्थापनाओं संबंधी जो जानकारी राष्ट्रपति मांगे, वह दे, और
किसी विषय को जिस पर किसी मंत्री ने विनिश्चय कर दिया है किंतु मंत्रिपरिषद ने विचार नही किया है, राष्ट्रपति द्वारा अपेक्षा किए जाने पर परिषद के समक्ष विचार के लिए रखे।
कैबिनेट या मंत्रिमंडल प्रधानमंत्री सहित कैबिनेट स्तर के मंत्रियों की परिषद होती है , जबकि मंत्रिपरिषद में  प्रधानमंत्री एवं कैबिनेट स्तर के मंत्रियों सहित राज्यमंत्री एवं उपमंत्री भी शामिल होते हैं। मंत्रिमंडल का उल्लेख मात्र अनु. 352 में (44वें संशोधन से ) है।
भारतीय संविधान के अनुसार, प्रधानमंत्री का पद बहुत महत्वपूर्ण होता है क्योंकि संसदीय शासन में वास्तविक कार्यपालिका शक्ति प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली मंत्रिपरिषद के पास होती है। प्रधानमंत्री के चयन तथा नियुक्ति के संबंध में संविधान के अनुच्छेद 75 में उल्लेख है।
प्रधानमंत्री या मंत्रिपरिषद का कोई सदस्य जो किसी भी सदन का सदस्य है वह वहां बोल सकता है, मतदान कर सकता है किंतु वह जिस सदन का सदस्य नही है, वहां बोल तो सकता है किंतु मतदान मे  भाग नहीं ले सकता है।


वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद के अध्यक्ष भारत के प्रधानमंत्री होते हैं।
राष्ट्रीय सुरक्षा समिति के प्रधान या अध्यक्ष प्रधानमंत्री होते हैं।
राष्ट्रपति द्वारा उस व्यक्ति को प्रधानमंत्री नियुक्त किया जाता है जिसे लोक सभा में बहुमत प्राप्त दल के द्वारा अपना नेता चुना जाता है। प्रधानमंत्री की नियुक्ति के समय उसका किसी सदन का सदस्य होना आवश्यक नही है किंतु प्रधानमंत्री पद पर नियुक्त किए जाने के 6 माह के भीतर उसे किसी एक सदन (लोक सभा या राज्य सभा) का सदस्य बन जाना आवश्यक होगा। अन्यथा 6 माह बाद वह अपने पद पर नही बना रह पाएगा।
उपप्रधानमंत्री पद का उल्लेख संविधान में नही है तथा राजनीतिक बाध्यताओं के कारण संविधान के प्रावधानों से हटकर इस पद का सृजन किया जाता है, जो पूर्णतः गैर-संवैधानिक पद है।
राजीव गांधी की समाधि स्थल वीर भूमि है, कर्मभूमि समाधि स्थल भारत के पूर्व राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा की है।
जय किसान जय किसान का नारा भारत के द्वितीय प्रधानमंत्री (1964-66) लाल बहादुर  शास्त्री ने भारत-पाक युध्द के समय 1965 मे दिया था।
भारत सरकार (कार्य आवंटन) नियम, 1961 में मंत्रिमंडल सचिवालय को नियमों की प्रथम अनुसूची मे स्थान दिया गया है। इस सचिवालय को आवंटित विषय है –
मंत्रिमंडल तथा मंत्रिमंडलीय समितियों को सचिवीय सहायता, और
कार्य के नियम।
मंत्रिमंडल सचिवालय द्वारा मंत्रिमंडल और मंत्रिमंडलीय समितियों को उपलब्ध कराई  जाने वाली सचिवीय सहायता में शामिल है –
प्रधानमंत्री के आदेश पर मंत्रिमंडल की बैठकें आयोजित करना।
मंत्रिमंडलीय बैठकें के लिए कार्यसूची तैयार और वितरित करना।
कार्यसूची से संबंधित दस्तावेजों का वितरण करना।
किए गए विचार-विमर्श का रिकॉर्ड तैयार करना।
प्रधानमंत्री की अनुमति प्राप्त होने के बाद रिकॉर्ड का वितरण।
मंत्रिमंडल द्वारा लिए गए निर्णयों के क्रियान्वयन की निगरानी।
एन. गोपालस्वामी आयंगर ने वर्ष 1949 में प्रस्तुत अपनी रिपोर्ट में अनुशंसा की थी कि केन्द्रीय मंत्रालय ब्यूरो ऑफ नेचुरल रिसोर्सेस एंड एग्रीकल्चर, ब्यूरो ऑफ इंडस्ट्री एंड कॉमर्स, ब्यूरो ऑफ ट्रांसपोर्ट एवं कम्युनिकेशन तथा ब्यूरों ऑफ लेबर एंड सोशल सर्विसेज में संयुक्त किए जाने चाहिए।
भारत के संविधान के अनुच्छेद 257 (1) के अनुसार, प्रत्येक राज्य की कार्यपालिका शक्ति का इस प्रकार प्रयोग किया जाएगा जिससे संघ की कार्यपालिका शक्ति के प्रयोग में कोई उड़चन न हो या उस पर कोई प्रतिकूल प्रभाव न पड़े और संघ की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार किसी राज्य को ऐसे निदेश देने तक होगा, जो भारत सरकार को इस प्रयोजन के लिए आवश्यक प्रतीत हो।
भारत में सरकार द्वारा द्वारा अथवा उसके किसी मंत्रालय द्वारा किसी विषय पर विस्तृत एवं आधिकारिक विवरण श्वेत पत्र (White Paper) के रुप में जारी किया जाता है।

15 अगस्त, 1947 को केन्द्र में मंत्रालयों की संख्या 18 थी। वर्तमान में केन्द्र में मंत्रालयों की संख्या 52 है।
91वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2003 द्वारा संविधान के अनुच्छेद 75 में धारा (1) के बाद निम्नलिखित धाराएं जोड़ी गई –
(1ए) मंत्रिपरिषद में प्रधानमंत्री सहित मंत्रियों की कुल संख्या  सदन के कुल सदस्यों की संख्या के 15 प्रतिशत  से अधिक नही होनी चाहिए।
24 जुलाई, 1991 को तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव ने नई औद्योगिक नीति की घोषणा की। इनके द्वारा किए गए आर्थिक सुधारों मे उदारीकरण, निजीकरण, भूमंडलीकरण तथा बाजारीकरण की नीति अपनाई गई।
चौधरी चरण सिंह 28 जुलाई, 1979 से 14 जनवरी, 1980 तक भारत के प्रधानमंत्री रहे। उनके पूरे कार्यकाल के दौरान लोक सभा की बैठक ही नहीं हुई। लोक सभा की निर्धारित बैठक से एक दिन पूर्व ही कांग्रेस द्वारा समर्थन वापसी के कारण  चौधरी चरण सिंह को प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा था।


महान्यायवादी और सी.ए.जी.
भारतीय संविधान के तहत भारत के महान्यायवादी (Attorney General of India) के पद का प्रावधान किया गया है।
महान्यायवादी, देश का सर्वोच्च विधि अधिकारी होता है।
अनु. 76 (1) के अनुसार, राष्ट्रपति, उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त होने के लिए अर्हित किसी व्यक्ति को भारत का महान्यायवादी नियुक्त करेगा।
अनु. 76 (2) के अनुसार, महान्यायवादी का यह कर्तव्य होगा कि वह भारत सरकार को विधि संबंधी ऐसे विषयों पर सलाह दे और विधिक स्वरुप के ऐसे अन्य कर्तव्यों का पालन करें, जो राष्ट्रपति उसको समय-समय पर निर्देशित करे या सौंपे।
अनु. 76(3) के अनुसार, इसे अपने कर्तव्यों के पालन में भारत के राज्य क्षेत्र में सभी न्यायालयों में सुनवाई का अधिकार होगा।
अनु. 76(4) के अनुसार महान्यायवादी, राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत पद धारण करेगा और ऐसा पारिश्रमिक प्राप्त करेगा जो राष्ट्रपति अवधारित करे।
इसे संसद के दोनों सदनों की कार्य़वाही में शामिल होने का अधिकार है लेकिन मतदान का अधिकार नही है.।
इसे एक संसद सदस्य की तरह सभी भत्ते एवं विशेषाधिकार मिलते हैं।
अनुच्छेद 165(1) के अनुसार, प्रत्येक राज्य का राज्यपाल, उच्च न्यायालय का न्यायाधीश बनने की योग्यता धारण करने वाले किसी व्यक्ति को महाधिवक्ता (Advocate General) नियुक्त करता है।
वह राज्य सरकार को कानूनी विषयों पर परामर्श देता है। वह राज्य सरकार का प्रथम विधिक सलाहकार होता है। वह राज्यपाल के प्रसादपर्यंत पद धारण करता है।
अनुच्छेद 148(1) के अनुसार, भारत का एक नियंत्रक-महालेखापरीक्षक होगा, जिसको राष्ट्रपति नियुक्त करेगा तथा यह अपने पद से केवल उसी रीति एवं आधारों से हटाया जाएगा, जिस रीति एवं आधारों से उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश को हटाया जाता है।
अनु. 148(4) के अनुसार, नियंत्रक-महालेखापरीक्षक अपने पद पर न रह जाने के पश्चात, भारत सरकार के या किसी राज्य की सरकार के अधीन किसी और पद का पात्र नही होगा।
यह अपनी नियुक्ति से 6 वर्ष या 65 वर्ष की उम्र तक पद धारण करेगा।
संसद के दोनों सदनों द्वारा विशेष बहुमत के साथ उसके दुर्व्यवहार या अयोग्यता पर प्रस्ताव पारित कर इसे पद से हटाया जा सकता है।
इसको लोक लेखा समिति का आंख व कान कहा जाता  है।
अनु. 151 (1) के अनुसार, भारत के नियंत्रक-महालेखा परीक्षक के संघ के लेखाओं संबंधी प्रदिवेदनों को राष्ट्रपति के समक्ष प्रस्तुत किया जाएगा जो उनको संसद के प्रत्येक सदन के समक्ष रखवाएगा।
अनु. 151(2) के अनुसार, नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के किसी राज्य के लेखाओं संबंधी प्रतिवेदनों को उस राज्य के राज्यपाल के समक्ष प्रस्तुत किया जाएगा, जो उनको राज्य के विधानमंडल के समक्ष रखवाएगा।
डॉ. बी.आर. अम्बेडकर ने कहा था कि नियंत्रक-महालेखापरीक्षक भारतीय परीक्षक (कर्तव्य, शक्तियां एवं सेवा शर्ते) अधिनियम, 1971 को प्रभावी बनाया गया है। इस अधिनियम को 1976 मे केन्द्र सरकार के लेखा परीक्षा से लेखा को अलग करने हेतु संशोधित किया गया।


नियंत्रक एवं महालेखा  परीक्षक (CAG) राष्ट्रपति को तीन लेखा परीक्षा प्रतिवेदन प्रस्तुत करता है – विनियोग लेखाओं पर लेखा परीक्षा रिपोर्ट, वित्त लेखाओं पर परीक्षा रिपोर्ट और सरकारी उपक्रमों पर लेखा रिपोर्ट।
राष्ट्रपति इनको संसद के दोनो सदनों के सभापटल पर रखवाता है। इसके उपरांत लोक लेखा समिति इनकी जांच करती है और इसके निष्कर्षों से संसद को अवगत कराती है।
संविधान के अनुच्छेद 88 में अभिकथित है कि, प्रत्येक मंत्री और भारत के महान्यायवादी को यह अधिकार होगा कि वह किसी भी सदन में, सदनों की संयुक्त बैठक में और संसद की किसी समिति में, जिसमें उसका नाम सदस्य के रुप में दिया गया है, बोले और उसकी कार्य़वाहियों मे अन्यथा भाग ले, किंतु इस अनुच्छेद के आधार पर वह मत देने का हकदार नही होगा।
अटॉर्नी जनरल के अतिरिक्त भारत सरकार के कानूनी सलाहकार के रुप में अन्य विधि अधिकारी भी होते हैं। इन्हें सॉलिसिटर जनरल कहा जाता है। ये अटॉर्नी जनरल को उसके दायित्वों के निर्वहन में सहायता प्रदान करते हैं।
एडवोकेट जनरल (महाधिवक्ता) राज्य सरकार को कानूनी विषयों पर परामर्श देता है। (अनु. 165(2))। प्रत्येक राज्य का राज्यपाल, उच्च  न्यायालय का न्यायाधीश बनने की योग्यता धारण करने वाले किसी व्यक्ति को एडवोकेट जनरल नियुक्त करता है। (अनु. 165(1))। वह राज्यपाल के प्रसादपर्यंत पद धारण करता है। (अनु. 165(3))। यह राज्य सरकार का प्रथम विधिक सलाहकार होता है।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 148(3) के अनुसार नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सी.ए.जी.) के वेतन एवं सेवा शर्तों के निर्धारण का अधिकार संसद को दिया गया है। अतः संसद ने सी.ए.जी.  के वेतन एवं सेवा शर्तों से संबंधित प्रावधानों को वर्ष 1971 में अधिनियमित किया जिसके अनुसार, नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक का कार्यकाल 6 वर्ष का होता है। या वह अधिकतम 65 वर्ष की उम्र तक सेवारत रह सकता है, इनमें से जो पहले हो।
भारत में नियंत्रक महालेखा परीक्षक सार्वजनिक धन की प्राप्ति और निर्गम पर नियंत्रण का कार्य नही करता है, बल्कि इसकी लेखा परीक्षा करता है।


नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक के निम्नलिखित कर्तव्य हैं –
वह केन्द्र तथा राज्य सरकारों के राजस्व से भारत के अंदर तथा बाहर किए गए व्ययों एवं लेन-देन की लेखा परीक्षा करता है।
वह व्यापारिक, निर्माण संबंधी लाभ तथा हानि के लेखों की लेखा परीक्षा करता है।
वह भंडारगृहों की लेखा परीक्षा करता है।
राष्ट्रपति के आदेश पर वह स्थानीय निकायों की लेखा परीक्षा करता है।
वह सरकारी कंपनियों एवं निगमों की लेखा परीक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक अपने नाम के अनुरुप भारत के वित्त पर नियंत्रक का कार्य न करके, केवल उसकी परीक्षा का कार्य करता है। जबकि ब्रिटेन का नियंत्रक एवं लेखा परीक्षक दोनों प्रकार के अधिकार रखता है।
भारत के नियंत्रक-महालेखा परीक्षक संसद के लोक लेखा समिति की बैठकों मे भाग ले सकता है। संविधान के अनुच्छेद 149 में नियंत्रक महालेखा परीक्षक के कर्तव्य एवं शक्तियां वर्णित हैं।
संविधान सभा में डॉ. अम्बेडकर ने कहा था कि नियंत्रक-महालेखा परीक्षक भारत के संविधान के अधीन सर्वाधिक महत्व का अधिकारी होगा। वह सार्वजनिक धन का संरक्षक होगा और उसका यह कर्तव्य होगा कि वह यह देखे कि भारत की या किसी राज्य की संचित निधि में से समुचित विधानमंडल के प्राधिकार के बिना एक पैसा भी खर्च नही किया जाए।
लोक वित्त (Public Finance) सरकार के वित्तीय क्रियाकलापों का अध्ययन है, जिसके अंतर्गत सार्वजनिक व्यय, लोक राजस्व, सार्वजनिक ऋण, वित्तीय प्रशासन तथा संघीय वित्त आते हैं। लोक वित्त का संबंध व्यावसायिक बैंकों के कार्य निष्पादन से नहीं है।
लोक लेखा समिति की कार्यवाही मध्यस्थता नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) करते हैं। इस प्रकार वे इस समिति के मित्र एवं मार्गदर्शक होते हैं।
भारतीय संविधान के तहत नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक संघ एवं राज्यों की लोक निधियों से सभी व्ययों की लेखा-परीक्षा करता है, अतः उसे लोक निधि का अभिभावक कहा जाता है।
वरीयता अनुक्रम
वरीयता अनुक्रम केन्द्र एवं राज्य सरकारों में विभिन्न पदाधिकारियों के पद क्रम से संबंधित है। इसका प्रयोग राजनीतिक समारोहों के अवसर पर किया जाता है तथा सरकार के दैनिक कार्य में इसका कोई प्रयोग नही होता है।
26 जुलाई, 1979 को इससे संबंधित अधिसूचना जारी की गई थी।
वर्तमान वरीयता अनुक्रम इस प्रकार है –
राष्ट्रपति
उपराष्ट्रपति
प्रधानमंत्री
राज्यों के राज्यपाल (अपने राज्य में)
भूतपूर्व राष्ट्रपति, 5. क उप प्रधानमंत्री
भारत के मुख्य न्यायाधीश, लोक सभा अध्यक्ष
केन्द्र के कैबिनेट मंत्री, राज्य सभा एवं लोक सभा में विपक्ष के नेता, नीति आयोग के उपाध्यक्ष, भूतपूर्व प्रधानमंत्री, राज्यों के मुख्यमंत्री (अपने राज्य में) 7 (क) भारत रत्न से सम्मानित व्यक्ति
भारत स्थित विदेशों के असाधारण तथा पूर्णाधिकारी राजदूत तथा राष्टमंडल देशों के उच्चायुक्त, राज्यों के राज्यपाल (अपने राज्य के बाहर), राज्यों के मुख्यमंत्री (अपने राज्य के  बाहर)
सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश, 9(क) संघ लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष, नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक, मुख्य निर्वाचन आयुक्त
राज्य सभा के उप सभापति, लोक सभा का उपाध्यक्ष, योजना आयोग के सदस्य, राज्यो के उपमुख्यमंत्री, केन्द्र के राज्य मंत्री (और रक्षा मंत्रालय में रक्षा मामलो के लिए कोई अन्य मंत्री)
भारत के महान्यायवादी, कैबिनेट सचिव, उपराज्यपाल (अपने संघ शासित क्षेत्र में)
जनरल अथवा उनके समान रैंक वाले सेनाध्यक्ष।
भारत सरकार में सबसे ऊंचे पद का सिविलियन अधिकारी मंत्रिमंडल सचिव होता है। वह मंत्रिमंडल सचिवालय का प्रमुख है। वह देश का परिष्ठतम लोक सेवक होता है।


संसद (1)
संसद, केन्द्र सरकार का विधायी अंग होता है।
केन्द्र स्तर पर विधि निर्माण का कार्य संसद द्वारा किया जाता है।
संविधान के भाग 5 के अंतर्गत अनुच्छेद 79 से 122 में संसद से संबंधित प्रावधान किए गए हैं।
अनुच्छेद 79 के अनुसार, संघ के लिए एक संसद होगी जो राष्ट्रपति और दो सदनों से मिलकर बनेगी, जिनके नाम राज्य सभा और लोक सभा होंगे।
लो सभा, राज्यों से 530 और संघ राज्य क्षेत्रो से 20 प्रतिनिधि सदस्यों से मिलकर बनेगी। यदि राष्ट्रपति की राय मे लोक सभा में आंग्ल-भारतीय समुदाय का प्रतिनिधित्व पर्याप्त नहीं हो तो, वह लोक सभा में उस समुदाय से 3 सदस्य मनोनीत कर सकते हैं।
लोक सभा में सदस्यों की अधिकतम संख्या 552 तक हो सकती है।
लोक सभा में राज्यवार सीटों का आवंटन 1971 की जनगणना पर आधारित है।
84वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2001 के अनुसार, यह निर्धारण वर्ष 2026 तक यथावत रहेगा।
लोक सभा में राज्यों को जनसंख्या के आधार पर सीटें आवंटित होती हैं।
लोक सभा की अवधि प्रथम अधिवेशन के लिए नियत तारीख से 5 वर्ष तक की होगी। हालांकि राष्ट्रपति को पांच वर्ष से पूर्व किसी भी समय लोक सभा को विघटित करने का अधिकार है।
आपातकाल में संसद की अवधि एक बार मे एक वर्ष तक बढ़ायी जा सकती है।  आपातकाल की उद्घोषणा के प्रवर्तन में न रह जाने के पश्चात उसका विस्तार किसी भी दशा में 6 माह की अवधि से अधिक नही होगा।
लोक सभा सदस्य बनने के लिए  व्यक्ति की आयु कम से कम 25 वर्ष होनी चाहिए। लोक सभा का स्थगन अध्यक्ष करता है, जबकि सत्रावसान और विघटन राष्ट्रपति करता है।
अनु. 93 के अनुसार, लोक सभा के सभी सदस्यों द्वारा अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष का चुनाव लोक सभा के सदस्यों मे से ही किया जाता है।
अनु. 94(ख) के अनुसार, लोक सभा का अध्यक्ष अपना त्याग-पत्र उपाध्यक्ष को तथा उपाध्यक्ष अपना त्याग-पत्र अध्यक्ष को सौंपता है।
लोक सभा के अध्यक्ष को लोक सभा के सभी सदस्यों के बहुमत से पारित संकल्प द्वारा हटाया जा सकता है। जब अध्यक्ष या उपाध्यक्ष को पद से हटाने को कोई संकल्प विचाराधीन हो, तब वे सदन में उपस्थित रहते हुए भी पीठासीन नही होंगे।
जब अध्यक्ष को उसके पद से हटाने का कोई संकल्प लोक सभा में विचाराधीन हो, तब वह प्रथमतः मत का तो हकदार होगा, किंतु मत बराबर होने की स्थिति में निर्णायक मत नहीं दे सकेगा।
लोक सभा का अध्यक्ष अपने निर्णायक मत (Casting Vote) का प्रयोग केवल तब करते हैं, जब किसी विषय के संदर्भ में हुए मतदान में सत्ता पक्ष एवं विपक्ष दोनों के वोट बराबर अर्थात टाई (Tie) हो जाते हैं।
लोक सभा सचिवालय प्रत्यक्ष रुप से लोक सभा अध्यक्ष के अंतर्गत कार्य करता है।
प्रो-टेम स्पीकर (Pro-tem Speaker) आम चुनाव के बाद नव-निर्वाचित लोक सभा सदस्यों को शपथ  दिलाते हैं।
नव-निर्वाचित सदन में लोक सभा अध्यक्ष (Speaker) के चुनाव से पहले लोक सभा के सामान्यतः सबसे वरिष्ठ सदस्य को प्रो-टेम स्पीकर के रुप में चुना जाता है।


अनु. 85(1) के अनुसार, लोक सभा में एक सत्र की अंतिम बैठक और आगामी सत्र की प्रथम बैठक के बीच 6 माह से अधिक का अंतर नही होगा।
इस प्रकार लोक सभा के कम से कम वर्ष  मे दो बार सत्र  बुलाए जाते हैं।
अनु. 100(3) के अनुसार, लोक सभा या राज्य सभा का कोरम (गणपूर्ति) कुल सदस्य संख्या का 1/10 भाग होता है।
मुख्य विपक्षी दल की मान्यता हेतु भी यही सदस्य संख्या आवश्यक है।
उत्तर प्रदेश राज्य लोक सभा में सर्वाधिक प्रतिनिधि (80) भेजता है। इसके बाद क्रमशः महाराष्ट्र (48) तथ पश्चिम बंगाल (42) का स्थान है।
वर्तमान में लोक सभा निर्वाचन क्षेत्र के लिए चुनाव व्यय की अधिकतम सीमा 70 लाख रु. तथ विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र के लिए 28 लाख रु. कर दिया गया है।
लोक सभा का प्रथम चुनाव 25 अक्टूबर, 1951 से 21 फरवरी, 1952 तक चला था। यह चुनाव 489 सीटों के लिए हुआ था।
प्रथम लोक सभा का पहला अधिवेशन 13 मई, 1952 को हुआ था।
15 मई, 1952 को गणेश वासुदेव मावलंकर लोक सभा के प्रथम अध्यक्ष बने तथा 27 फरवरी, 1956 तक अपनी मृत्यु तक इस पद पर बने रहे।
पहली लोक सभा के शेष कार्यकाल के लिए एम. अनंतशयनम आयंगर लोक सभा अध्यक्ष रहे थे।
वर्ष 1954 में जे.बी. कृपलानी सहित विपक्ष के 21 सांसदों द्वारा लोक सभा के प्रथम अध्यक्ष जी.वी. मावलंकर के विरुध्द अविश्वास प्रस्ताव लाया गया था, जिसे लोक सभा द्वारा अस्वीकृत कर दिया गया था।
लोक सभा की प्रथम महिला अध्यक्ष मीरा कुमार थी।
वर्तमान लोक सभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन हैं।
संविधान के अनुच्छेद 84(ख) के अनुसार, लोकसभा में निर्वाचित होने के लिए न्यूनतम आयु सीमा 25 वर्ष है तथा राज्य सभा में निर्वाचित होने के लिए न्यूनतम आयु सीमा 30 वर्ष है।
भारत में मतदाता सूची का निर्माण केन्द्रीय निर्वाचन आयोग के निदेशन और नियंत्रण में किया जाता है। (अनु. 324(1)) ।
जन-प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के अनुसार, लोक सभा सदस्य के निर्वाचन के लिए नामांकन-पत्र दाखिल करने के लिए किसी नागरिक को राज्य या संघ राज्य क्षेत्र के उस निर्वाचन क्षेत्र का पंजीकृत मतदाता होना चाहिए अर्थात उस क्षेत्र की समतदाता सूची में उसका नाम दर्ज होना चाहिए। वर्ष 2003 मे सरकार द्वारा राज्य सभा के निर्वाचन के लिए ऐसी बाध्यता को समाप्त कर दिया गया था।


31वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1973 द्वारा लोक सभा में राज्यों के प्रतिनिधित्व की अधिकतम संख्या 500 से बढ़ाकर 525 तथा केन्द्रशासित प्रदेशों के सदस्यों की अधिकतम संख्या 25 से घटाकर 20 की गई। (अनु. 81(1) में संशोधन द्वारा)। इस प्रकार लोक सभा में कुल सदस्यों की अधिकतम संख्या 525 से बढ़ाकर 545 की गई। वर्तमान में 530 सदस्य राज्यों से एवं 13 सदस्य केन्द्रशासित प्रदेशों से निर्वाचित होते हैं, जबकि 2 एंग्लो-इंडियन सदस्यों का मनोनयन राष्ठ्रपति करता है। ज्ञातव्य है कि वर्तमान में लोक सभा की अधिकतम सदस्य संख्या 552 हो सकती है, जिसमें 530 से अनधिक हो सकते हैं (गोवा, दमन एवं दीव पुनर्गठन अधिनियम, 1987 से), जबकि दो एंग्लो-इंडियन सदस्यों का मनोनयन राष्ट्रपति कर सकता है। वर्तमान में 543 लोक सभा निर्वाचन क्षेत्रों में 530 निर्वाचन क्षेत्र राज्यों के हैं, जबकि शेष 13 निर्वाचन क्षेत्र केन्द्र शासित प्रदेशों के (दिल्ली-7, अंडमान एवं निकोबार-1, दादरा व नगर हवेली-1, दमन एवं दीव-1, लक्षद्वीप-1 पुडुचेरी-1, चंडीगढ़-1) हैं। इनके अतिरिक्त दो एंग्लो-इडियन सदस्य राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत किए जाते हैं।
संविधान के अनु. 82 के अनुसार, लोक सभा की सीटों का राज्यों के मध्य आवंटन 1971 की जनगणना के आधार पर है। यह व्यवस्था पहले वर्ष 2000 तक के लिए थी, परंतु 84वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2001 द्वारा इसे 2026 तक संशोधित ने किए जाने का प्रावधान किया गया है।
अनुच्छेद 330(2) के अधीन किसी राज्य (या संघ राज्य क्षेत्र) में अनुसूचित जातियों या अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित स्थानों की संख्या का अनुपात, लोक सभा में उस राज्य (या संघ राज्य क्षेत्र) को आवंटित स्थानों की कुल संख्या से वही होगा, जो उस राज्य (या संघ राज्य क्षेत्र) के भाग की अनूसूचित जनजातियों की, जिनके संबंध में स्थान इस प्रकार आरक्षित हैं। जनसंख्या का अनुपात उस राज्य या संघ राज्य क्षेत्र की कुल जनसंख्या से है। उदाहरणार्थ, वर्ष 1996 में पश्चिम बंगाल एवं तत्कालीन आंध्र प्रदेश मे लोक सभा सदस्यों की संख्या 42 थी, जिसमें अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सींटे क्रमशः 8 एवं 6 थी। वर्ष 2008 में परिसीमन के  बाद इन दोनों राज्यों में अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित स्थान क्रमशः 10 एवं 7 हैं।
परिसीमन आयोग की सिफारिशों के लागू होने के बाद (2008 से) लोक सभा में अनुसूचित जनजातियों के लिए सर्वाधिक आरक्षित सीटें मध्य प्रदेश (6) हैं। उत्तर प्रदेश एवं बिहार में ऐसी सीटों की संख्या शून्य है, जबकि गुजरात में ऐसी सीटें 4 है।
अनुच्छेद 331 के अनुसार, यदि राष्ट्रपति की राय मे लोक सभा में आंग्ल-भारतीय समुदाय का प्रतिनिधित्व पर्याप्त नहीं है, तो वह इस समुदाय के अधिकतम 2 सदस्यों को लोक सभा में नामित कर सकता है।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 333 के अनुसार यदि किसी राज्य के राज्यपाल की राय में कि उस राज्य की विधान सभा मे आंग्ल-भारतीय समुदाय का प्रतिनिधित्व आवश्यक है और उसमें उसका प्रतिनिधित्व प्रर्याप्त नही है, तो वह उस विधान सभा में उस समुदाय का एक सदस्य नाम निर्देशित कर सकेगा।
अनु. 85(2)(ख) के अनुसार, लोक सभा को कार्यकाल पूरा होने से पहले भंग किया जा सकता है। ऐसा प्रधानमंत्री (मंत्रिपरिषद) की सिफारिश पर राष्ट्रपति द्वारा किया जा सकता है।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 101(4) के तहत संसद तथा अनु. 190 (4) के तहत राज्य विधान मंडल के किसी सदस्य की सदस्यता तब समाप्त हो समझी जाती है, जब वह 60 दिन की अवधि तक सदन की अनुज्ञा के बिना उसके सभी अधिवेशनों में अनुपस्थित रहता है। परंतु इस अवधि मे सदन के सत्रावसान या निरतंर चार से अधिक दिनों के लिए स्थगित समय नही जोड़ा जाएगा।


राज्य लोकसभा सीटें
उत्तर प्रदेश                               80
महाराष्ट्र                                 48
प. बंगाल                                 42
बिहार                                      40
मध्य प्रदेश                              29
तमिलनाडु                               39
लोक सभा में राजस्थान हेतु 25 सींटे निर्धारित हैं, जिनमें 4 अनुसूचित जातियों और 3 सींटे अनु. जनजातियों के लिए आरक्षित हैं।
राज्य लोक सभा में स्थान
पंजाब                                      13
असम                                       14
गुजरात                                   26
राजस्थान                                25
मध्य प्रदेश                              29
तमिलनाडु                               39
आंध्र प्रदेश                               25
पश्चिम बंगाल                          42
छत्तीसगढ़                                11
महाराष्ठ्र                                 4
अविभाजित आंध्र प्रदेश में 42 लोक सभा सीटें थी। आंध्र प्रदेश के विभाजन के पश्चात वहां कुल 25 लोक सभा सीटें ही उपलब्ध हैं। शेष 17 सीटें तेलंगाना राज्य को प्राप्त हुई हैं।
चंडीगढ़, सिक्किम, मिजोरम, नगालैंड, पुडुचेरी तथा दादरा और नगर हवेली मे लोक सभा की मात्र एक-एक सींटे हैं। त्रिपुरा, गोवा, मेघालय, मणिपुर और अरुणाचल प्रदेश मे लोक सभा की 2-2 सींटे हैं।
2008 मे लागू परिसीमन के बाद उत्तर प्रदेश में निर्वाचकों की संख्या के अनुसार, सबसे  बड़ा लोक सभा संसदीय क्षेत्र उन्नाव है।
पांचवी लोकसभा का कार्यकाल 6 वर्ष है, जिसने 19 मार्च, 1971 से 18 मार्च, 1977 तक कार्य किया।
नवीं लोकसभा का गठन 2 दिसंबर, 1989 को हुआ था और यह 13 मार्च, 1991 को भंग की गई।
12वीं लोक सभा के लिए निर्वाचन फरवरी, 1998 में हुए थे। 12वीं लोक सभा का गठन 10 मार्च, 1998 को हुआ था और इसका विघटन 26 अप्रैल, 1999 को हुआ।
क्षेत्रफल के आधार पर 5 बड़े लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र क्रमशः लद्दाख (173266.37 वर्ग किमी.), बाड़मेर (55074 वर्ग किमी.), कच्छ (41414 वर्ग किमी), अरुणाचल पूर्व (39704 वर्ग किमी.) तथा अरुणाचल पश्चिम (39613 वर्ग किमी.) है। क्षेत्रफल की दृष्टि से सबसे छोटा लोक सभा निर्वाचन क्षेत्र चांदनी चौक (दिल्ली) (10.59 वर्ग किमी.) है।


भारत मे लोक सभा अथवा राज्य विधान सभाओं के चुनाव फर्स्ट पास्ट द पोस्ट (First Past the Post) पध्दति के आधार पर कराए जाते हैं। इसके तहत देश तथा राज्यों/केन्द्रशासित प्रदेशों को अलग-अलग चुनाव क्षेत्रों में बांट दिया जाता है। क्षेत्र विशेष के मतदाता एक उम्मीदवार के लिए एक मत देते हैं और सर्वाधिक मत प्राप्त करने वाला उम्मीदवार विजयी घोषित किया जाता है। जीतने वाले उम्मीदवार के लिए 50 प्रतिशत मत प्राप्त करना अनिवार्य नही है। इसके अलावा भारतीय संविधान के अनुच्छेद 93 के प्रावधानों के तहत, लोक सभा, यथाशीघ्र अपने दो सदस्यों को अपना अध्यक्ष और उपाध्यक्ष चुनती है। ऐसी परंपरा रही है कि अध्यक्ष सत्तारुढ़ पार्टी या गठबंधन का सदस्य तथा उपाध्यक्ष विपक्षी पार्टी का सदस्य होता है।
लोक सभा के स्पीकर का चयन लोक सभा के सभी सदस्यों द्वारा किया जाता है।
पी.ए. संगमा वर्ष 1995 में प्रथम जनजातीय केन्द्रीय मंत्री बने थे। वर्ष 1996 मे वह लोक सभा के पहले जनजातीय अध्यक्ष बने थे।
15वीं लोक सभा की अध्यक्ष मीरा कुमार ही लोक सभा की प्रथम महिला अध्यक्ष थी, जो  जून, 2009 में इस पद के लिए चुनी गई थी। वर्तमान में 16वीं लोक सभा की अध्यक्षा सुमित्रा महाजन हैं।
विधेयक को पुरःस्थापित करने का प्रक्रम उसका प्रथम वाचन होता है। द्वितीय वाचन में विधेयक पर विचार-विमर्श होता है। सभा के सदस्य उसी स्तर पर आम बहस करते हैं। द्वितीय वाचन में ही सभा विधेयक को प्रवर समिति या दोनों सभाओँ की संयुक्त समिति को सौंप सकती है। द्वितीय वाचन में ही विधेयक पर खंडशः विचार भी होता है। प्रभारी सदस्य का यह प्रस्ताव कि विधेयक या यथासंशोधित विधेयक पारित किया जाए विधेयक का तृतीय वाचन कहलाता है।
वर्तमान में जारी 16वं लोकसभा में कुल महिला सदस्यों की संख्या 11% से अधिक है। इस समय लोकसभा में नामंकित महिला सदस्य को लेकर कुल 63 महिला सदस्य हैं। कांग्रेस पार्टी से 55 तथा भारतीय जनता पार्टी से 32 महिला सदस्य हैं।राजस्थान से एक महिला सदस्य निर्वाचित हैं। अधिकतम 13 महिला सदस्य उत्तर प्रदेश में निर्वाचित हैं।
संसद (2)
संसद के उच्च सदन को राज्य सभा कहते हैं। इस सदन की अधिकतम सदस्य संख्या 250 निर्धारित की गई है।
अनुच्छेद 80 के अनुसार, राज्य सभा, राज्यों और संघ राज्य क्षेत्रों के 238 निर्वाचित (अप्रत्यक्ष रुप से) तथा राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत 12 सदस्यों से मिलकर बनेगी।
राष्ट्रपति द्वारा नामांकित किए जाने वाले सदस्य ऐसे व्यक्ति होंगे, जिन्हें साहित्य, विज्ञान, कला और समाज सेवा में विशेष ज्ञान या व्यावहारिक अनुभव हो।
राज्य सभा में प्रत्येक राज्य के प्रतिनिधियों का निर्वाचन उस राज्य की विधान सभा के निर्वाचित सदस्यों द्वारा किया जाता है।
राज्य सभा के लिए निर्वाचन आनुपातिक प्रतिनिधित्व पध्दति के अनुसार, एकल संक्रमणीय मत द्वारा किया जाता है.
राज्य सभा का विघटन नही होता है। यह एक स्थायी सदन है।
राज्य सभा के एक-तिहाई सदस्य प्रत्येक दूसरे वर्ष सेवानिवृत्त हो जाते हैं। इस प्रकार इसके सदस्यों का कार्यकाल 6 वर्षों का होता है।
राज्य सभा सदस्य होने के लिए न्यूनतम आयु 30 वर्ष होनी चाहिए।
राज्य सभा का सभापति राज्य सभा का सदस्य नही होता है।
भारत का उपराष्ट्रपति, राज्य सभा का पदेन सभापति होता है।
जब उपराष्ट्रपति, राष्ट्रपति के रुप में कार्य करता है, तो उसे राज्य सभा के सभापति के रुप में कोई वेतन या भत्ता नही मिलता है। इस अवधि में वह राष्ट्रपति को मिलने वाले वेतन एवं भत्ते प्राप्त करता है।
राज्य सभा अपने सदस्यों में से एक उपसभापति चुनती है।
उपसभापति अपना त्याग-पत्र सभापति को देता है।


उपसभापति को राज्य सभा बहुमत से पद से हटा सकती है। जब सभापति का पद रिक्त हो तो उपसभापति उस पद के कर्तव्यों का पालन करेगा। जब उपराष्ट्रपति को उसके पद से हटाने का कोई संकल्प विचाराधीन हो, तब वह सभापति के रुप में पीठासीन नही होंगे।
जब उपसभापति को उसके पद से हटाने का संकल्प विचाराधीन हो, तब उपसभापति पीठासीन नहीं होंगे।
राज्य सभा मे राज्यों का प्रतिनिधित्व उनकी जनसंख्या के अनुपात में दिया गया है।
वर्ष 2003 में जन-प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 में संशोधन के माध्यम से यह व्यवस्था की गई है कि कोई भी व्यक्ति राज्य सभा के लिए कही  भी चुनाव लड़ सकता है, चाहे वह किसी भी राज्य का निवासी है।
अखिल भारतीय सेवाओं सृजन राज्य सभा की एकांतिक शक्ति है।
भारत के संघ राज्य क्षेत्रों से मात्र 2 (दिल्ली तथा पुडुचेरी) संघ राज्य क्षेत्र के प्रतिनिधित्व राज्य सभा मे शामिल होते हैं।
भारतीय संविधान की चौथी में राज्य सभा के लिए राज्यों व संघ राज्य क्षेत्रों में सीटों के आवंटन का प्रावधान उल्लिखित है। संविधान के अनुच्छेद 249 के तहत यदि राज्य सभा अपने उपस्थित एवं मत देने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई बहुमत में ऐसा संकल्प पारित करे कि राज्य सूची के किसी विषय पर विधि बनाना राष्ट्रीय हित में आवश्यक है, तो संसद उस विषय पर विधि बना सकती है। परंतु यह प्रस्ताव एक वर्ष  से अधिक समय तक अस्तित्व में नही रहता है।
अनुच्छेद 250 के अनुसार, आपात काल की स्थिति में केन्द्रीय संसद को राज्य सूची में अंकित किसी विषय के संबंध में  भारत के संपूर्ण राज्य क्षेत्र या उसके किसी  भाग के लिए कानून बनाने की शक्ति होती है परंतु आपातकाल की समाप्ति के 6 माही की अवधि से अधिक यह प्रावधान प्रभावी नही रहता है।
अनुच्छेद 252 के तहत, दो या दो से अधिक राज्यों के विधान मंडल एक प्रस्ताव पारित किया, यदि संसद से अनुरोध करे कि राज्य-सूची के विषयों पर संसद द्वारा कानून बनाया जाए, तो संसद उन विषयों पर कानून बना सकती है।
अनुच्छेद 253 के अनुसार, संसद को किसी अन्य देश या देशों के साथ संधि अथवा समझौते को लागू करने के उद्देश्य से किसी भी विषय का कानून बनाने का अधिकार है।
संविधान के अनुच्छेद 80(1)(क)(ख) में कहा गया है कि राज्यों के और संघ राज्य क्षेत्रों के 238 से अनधिक प्रतिनिधियों तथा राष्ट्रपति द्वारा नाम निर्देशित किए जाने वाले 12 सदस्यों से मिलकर राज्य सभा बनेगी।
राज्य सभा में राज्यों और संघ राज्य क्षेत्रों को प्रतिनिधित्व उनकी जनसंख्या के अनुपात में दिया गया है। इस प्रकार किस राज्य में राज्य सभा में किटनी सीटें होंगी, इसका निर्धारण संविधान की चौथी अनूसुची मे कर दिया गया है।


भारत की पहली अभिनेत्री जिन्हें राज्य सभा के नामांकित किया गया नरगिस दत्त थी। उनका कार्यकाल 3 अप्रैल, 1980 से 3 मई, 1981 तक रहा। जयललिता जयराम, AIDMK की राज्य सभा सदस्या थी, जो 3 अप्रैल, 1984 से 28 जनवरी, 1989 तक अपने पद पर रही। वैजंती माला बाली (27 अगस्त, 1993 से 26 अगस्त, 1999) राज्य सभा के लिए नामांकित सदस्यों में थी। देविका रानी चौधरी वर्ष 1969 में प्रथम दादा साहेब फाल्के पुरस्कार प्राप्त करने वाली अभिनेत्री थी।
संविधान के. अनु. 249 के तहत यदि राज्य सभा अपने उपस्थित एवं मत देने वाले सदस्यों के कम से कम दो तिहाई बहुमत से ऐसा संकल्प पारित करे कि राज्य सूची के विषय पर विधि बनाना राष्ठ्र हित में आवश्यक है, तो संसद उस विषय  पर विधि बना सकती है। साथ ही ऐसी विधि संपूर्ण भारत या उसके किसी  भाग के लिए बनाई जा सकती है। राज्य सूची में सम्मिलित विषय पर राष्ट्रीय हित में विधि राज्य सभा द्वारा प्रस्ताव पारित होने के उपरांत संसद  बनाती है, न कि केवल राज्य सभा।
चौथी अनुसूची में राज्य सभा मे राज्यों के लिए अलग-अलग स्थानों का आवंटन है। संघ एवं राज्यों के बीच शक्तियों का विवरण सातवीं अनुसूची मे है। भाषाएं आठवी अनुसूची में हैं। जनजाति क्षेत्रो के प्रशासन संबंधी प्रावधान पांचवी और छठी  अनुसूची में हैं।
राज्य राज्य सभा के सदस्यों  की संख्या
गुजरात                                   11
कर्नाटक                                  12
केरल                                      9
ओडिशा                                   10
वह मंत्री जो राज्य सभा का सदस्य हो, राज्य सभा का सदस्य होते हुए भी लोक सभा की कार्यवाही में भाग ले सकता है।
संसद (3)
संसद उच्चतम विधायी संस्था है। संविधान मे संशोधन का अधिकार संसद को प्राप्त है।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 368 के अंतर्गत संसद संविधान के किसी भाग में संशोधन कर सकती है।
संसद के दो सत्रों के बीच अधिकाधिक अंतराल छः महीने का होता है।
लोक सभा के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, महासचिव, राज्य सभा के सभापति, उपसभापति आदि संसद के अधिकारी कहलाते हैं।
कोई संसद सदस्य जब 60 दिन तक सदन में बिना सूचि किए अनुपस्थित रहता है तो, उनकी सदस्यता समाप्त की जा सकती है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 105 संसद के सदस्यों के विशेषाधिकार एवं अन्मुक्तियों को निर्धारित करता है।
अनु. 253 के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय संधियों को संपूर्ण भारत मे या उसके किसी भाग में लागू करने के लिए संसद राज्य सूची के विषयों पर कोई भी कानून बिना किसी राज्य की सहमति से बना सकती है।
अंतरराष्ट्रीय समझौते को प्रभावी बनाने के लिए संसद राज्य सूची के विषय पर कानून बना सकती है।
सदन का अध्यक्ष किसी सदस्य को बोलने से रोककर अन्य को बोलने के लिए कह सकता है। यह बैठ जाना कहलाता है।
सदन के किसी सदस्य द्वारा, वह जिल दल से चुनकर आता है, उसका त्याग कर दूसरे दल मे शामिल होना पक्षत्याग (Crossing the floor) कहलाता है।
शून्य काल (Zero Hour), भारत के संसदीय व्यवस्था की देन है। यह अधिकतम एक घंटे का हो सकता है। लोक सभा में इसका समय दोपहर 12 बजे से अपराह्न 1 बजे तक होता है।
अनु. 109(1) के अनुसार, धन विधेयक लोक सभा में पुरः स्थापित किया जाता है, राज्य सभा में नही है।
कोई विधेयक जिसमें केवल व्यय उल्लिखित है और अनु. 110(धन विधेयक) में विनिर्दिष्ट कोई विषय उसमें सम्मिलित नही है, तो उसे संसद के किसी भी सदन में प्रारंभ किया जा सकता है। इसे साधारण विधेयक की तरह पेश किया जाता है।
लोक सभा द्वारा पारित धन विधेयक राज्य सभा द्वारा भी पारित मान लिया जाता है, यदि उस राज्य सभा द्वारा  14 दिन तक कोई कार्यवाही नही की जाती है।


लोक सभा द्वारा विचार के लिए भेजे गए धन विधेयक को राज्य सभा 14 दिन तक रोक सकती है।
अनु. 108 के अनुसार, संसद के दोनों सदनों का संयुक्त अधिवेशन तब आयोजित किया जाता है, जब किसी विधेयक पर विचार करने और उसे पारित करने में दोनों सदनों में मतभेद हो।
अनु. 118(4) के अनुसार, लोक सभा का अध्यक्ष संसद के दोनों सदनों की संयुक्त बैठक की अध्यक्षता करता  है।
संसद के दोनों सदनों की संयुक्त बैठक साधारण विधेयक और वित्त विधेयक के संबंध में होती है।
अब तक तीन बार दोनो सदनों की संयुक्त बैठक बुलाई जा चुकी है।
वर्ष 1961 मे प्रथम संयुक्त बैठक दहेज निरोधक विधेयक पर, वर्ष 1978 में द्वितीय संयुक्त बैठक बैंक सेवा आयोग (निरसन) निधेयक पर तथा वर्ष 2002 में तृतीय संयुक्त बैठक पोटा के लिए बुलाई गई थी।
कोई कानूनी विधेयक संसद के दोनों में से किसी एक पटल पर रखा जा सकता है। कोई विधेयक धन विधेयक है या नहीं, इसका निर्णय लोक सभा अध्यक्ष करता है।
भारत के लोक वित्त पर संसद के नियंत्रण के लिए संसद के समक्ष वार्षिक वित्तीय विवरण प्रस्तुत किया जाता है।
भारत की संचित निधि से धन निकालने के लिए विनियोग विधेयक पारित करना पड़ता है।
संविधान के अनु. 116 के अनुसार, विनियोग विधेयक के पारित ने होने की स्थिति मे जब संघ सरकार को धन की आवश्यकता होती है, तो लोक सभा को लेखानुदान के माध्यम से निश्चित अवधि के लिए भारतीय संचित निधि से अग्रिम निधि प्रदान करने की शक्ति प्राप्त है।
प्राक्कलन समिति सबसे बड़ी संसदीय समिति है। इसमें 30 सदस्य होते हैं।
भारतीय संसद का सचिवालय सरकार से स्वतंत्र होता है।
भारतीय संसद संसदीय समितियों के माध्यम से प्रशासन पर नियंत्रण करती है।
अनुच्छेद 368 के अनुसार, इस संविधान में किसी बात के होते हुए भी, संसद अपनी संविधायी शक्ति का प्रयोग करते हुए इस संविधान के किसी उपबंध का परिवर्धन, परिवर्तन या निरसन के रुप में संशोधन इस अनुच्छेद में अधिकथित प्रक्रिया के अनुसार कर सकेगी। संसद, भारत की जनता द्वारा निर्वाचित उच्चतम विधायी संस्था है, इसी कारण संविधान में संशोधन का यह अधिकार संसद को प्राप्त है।
लोक सभा के 552 से अनधिक सदस्यों मे से 530 से अनधिक राज्यों के प्रतिनिधि, 20 से अनधिक संघ राज्यों के प्रतिनिधि (अनु. 81) और 2 से अनधिक एंग्लो-एडियन हो सकते हैं। (अनु. 331)।
संविधान के अनुसार, संसद के अधिकारियों मे सम्मिलित हैं – राज्य सभा का सभापति एवं उपसभापति (अनु. 89), लोक सभा का अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष (अनु. 93) तथा संसद का सचिवालय (अनु. 98) ।
सर्वप्रथम नवंबर, 2000 में पंजाब में निर्दलीय राज्य सभा सांसद बरजिंदर सिंह हमदर्द को इस आधार पर सदस्यता से अयोग्य घोषित किया गया था, कि वह सदन की अनुमति के बिना उसकी लगातार साठ बैठको में अनुपस्थित रहे थे।


भारतीय संविधान का अनुच्छेद 105 संसद के सदनों की तथा उनके सदस्यों की शक्तियां, विशेषाधिकार तथा उन्मुक्तियों को निर्धारित करता है।
संसदीय नियमों एवं प्रक्रिया के तहत किसी मंत्री के विरुध्द विशेषाधिकार प्रस्ताव उठाया  जा सकता है, यदि वह किसी मामले के तथ्यों को रोकता है अथवा तथ्यों का बिगड़ा हुआ वर्णन देता है।
संसदीय विशेषाधिकार संसद के दोनों सदनों, उसकी समितियों तथा सदस्यों को प्राप्त विशिष्ट अधिकार, उन्मुक्तियां व छूट होते हैं। इन विशेषाधिकारों को दो वर्गों में बांटा जा सकता है –
वे, जो संसद के प्रत्येक सदन द्वारा सामूहिक रुप में प्रयोग किए जाते हैं,
वे, जो व्यक्तिगत रुप से संसद सदस्यों द्वारा उपभोग्य होते हैं।
संसद के प्रत्येक सदन द्वारा सामूहिक रुप से प्रयोग किए जाने वाले विशेषाधिकार निम्न हैं –
अपनी बहस और कार्यवाही के प्रकाशन को रोकने का विशेषाधिकार
सदन से अपरिचितों को बाहर रखने का तथा विशिष्ट विषयों पर चर्चा हुते गुप्त बैठक करने का विशेषाधिकार
अपनी स्वयं की प्रक्रिया व आंतरिक विषयो-व्यवसाय के संचालन तथा उन्हें विनियमित करने का विशेषाधिकार,
सदन के सदस्य और साथ ही साथ बाहरी व्यक्तियों को भी, भर्त्सना चेतावनी या निलंबन (सदस्यों हेतु) या निश्चित अवधि हेतु कारावास से सदन की अवमानना हेतु दंडित करने का विशेषाधिकार,
किसी सदस्य की गिरफ्तारी, निरोध, सजा, कारावास या रिहाई की तत्काल सूचना प्राप्त करने का विशेषाधिकार,
संसदीय समितियों द्वारा जांच के प्रयोजन के लिए, प्रासंगिक व्यक्तियों, पत्रो व अभिलेखो को बुलाने-मंगाने का विशेषाधिकार
सदन के परिसर मे किसी (सदस्य या अन्य) व्यक्ति की गिरफ्तारी और कानूनी प्रक्रिया किए जाने से पूर्व पीठासीन अधिकारी की अनुमति लिए जाने का विशेषाधिकार।
राज्य विधानमंडल के निम्न सदन (विधानसभा) के निर्वाचित सदस्यो को लोक सभा (एक नागरिक अधिकार से) और राज्य सभा (अनुच्छेद 80 मे खंड 4 में वर्णित) दोनो के निर्वाचनों में मतदान का अधिकार है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 248 संसद की अवशिष्ट विधायी शक्ति के बारे में प्रावधान करता है। इसक अनुसार, संसद को किसी ऐसे विषय के संबंध में जो समतवर्ती सूची या राज्य सूची में वर्णित (उल्लेखित) नही है, विधि बनाने की अनन्य शक्ति प्राप्त है।
मर्यादा – विनम्र एवं स्वीकार्य व्यवहार बनाये रखना।
पक्ष त्याग – सदन के किसी सदस्य द्वारा, वह जिस सदन दल से चुनकर आया है, उसका त्याग कर दूसरे दल मे शामिल होना पक्ष त्याग कहलाता है।
अंतर्प्रदन – किसी सरकारी अधिकारी से किसी नीति या कार्य के विवरण की मांग  हेतु संसदीय प्रक्रिया अंतर्प्रदन कहलाती है।
बैठ जाना – अध्यक्ष किसी भी सदस्य को बोलने से रोककर अन्य को बोलने के लिए कह सकता  है।
यदि दोनों सदनों की संयुक्त बैठक (अनु. 108) मे कोई विधेयक (संशोधन सहित) दोनों सदनों के उपस्थित और मत देने वाले सदस्यों की कुल संख्या के साधारण बहुमत से पारित होता है, तो इसे दोनों सदनों द्वारा पारित समझा जाता है। ज्ञात हो कि अनु. 108 के तहत संयुक्त बैठक की प्रक्रिया सामान्य विधेयन तक ही सीमित है, संविधान संशोधन हेतु यह लागू नही होती है।
कोई कानूनी विधेयक संसद सदनों मे से एक के पटल पर रखा जा सकता है, जबकि धन विधेयक केवल लोकसभा में और अखिल भारतीय सेवाओं के सृजन संबंधी विधेयक मात्र राज्य सभा में प्रस्तुत किए जा सकते हैं।
अनुच्छेद 89(1) के अनुसार, राज्य सभा का सभापति, उपराष्ट्रपति होता है। साथ ही अनुच्छेद 89(2) के अनुसार, राज्य सभा का उपसभापति सदस्यों में से चुना जाता है। अनुच्छेद 54(क) के अनुसार, राष्ट्रपति के निर्वाचन मे संसद के दोनो सदनों के निर्वाचित सदस्य निर्वाचक गण होते हैं न कि मनोनीत सदस्य जबकि अनुच्छेद 66(1) के अनुसार, उपराष्ट्रपति के निर्वाचन में संसद के दोनों सदनों के सभी सदस्य भाग लेते हैं।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 266 के अनुसार, भारत की संचित निधि भारत सरकार को प्राप्त सभी राजस्व, उस सरकार द्वारा राजहुंडियां निर्गमित करके, उधार द्वारा या अग्रिम अर्थोपाय द्वारा लिए गए सभी उधार और उधारो के प्रतिसंदाय में उस सरकार को प्राप्त सभी धनरासियों से मिलकर बनती  है। यह संसद के नियंत्रणाधीन होती है। संचित निधि से कोई भी धनराशि तब तक निर्गमित नही की जा सकती, जबतक संसद की अनुमति प्राप्त न कर ली जाए। इसी बजट प्रावधानों के अनुरुप कार्यपालिका को संचित निधि से धन निकालने का अधिकार तभी प्राप्त होता है, जब संसद अनु. 114 के तहत विनियोग अधिनियम के माध्यम से इस  हेतु अनुमति प्रदान करती है।


संविधान के अनुच्छेद 112(3) के अनुसार, भारत की संचित निधि पर भारित व्यय इस प्रकार है –
राष्ट्रपति की उपलब्धियां और भत्ते तथा उसके पद से संबंधित अन्य व्यय
राज्य सभा के सभापति और उपसभापति के तथा लोक सभा अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के वेतन और भत्ते,
ऐस ऋण भार जिनका दायित्व भारत सरकार पर है, जिनके अंतर्गत ब्याज, निक्षेप निधि भार और मोचन भार तथा उधार लेने और ऋण सेवा तथा ऋण मोचन से संबंधित अन्य व्यय हैं.
– उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों को या उनके संबंध में संदेय वेतन, भत्ते और पेंशन
फेडरल न्यायालय के न्यायाधीशों को या उनके संबंध में संदेय पेंशन
उस उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को या उनके संबंधी में दी जाने वाली पेंशन, जो  भारत के राज्य क्षेत्र के अंतर्गत किसी क्षेत्र के संबंध में अधिकारिता का प्रयोग करता है या जो  भारत डोमिनियन के राज्यपाल वाले प्रांत के अंतर्गत किसी  क्षेत्र के संबंध में इस संविधान के प्रारंभ  से पहले किसी भी समय अधिकारिता का प्रयोग करता था।
किसी न्यायालय या माध्यस्थम, अधिकरण के निर्णय की तुष्टि हेतु अपेक्षित राशियां
भारत के नियंत्रक महालेखा परीक्षक को या उनके संबंध में संदेय वेतन, भत्ते और पेंशन
कोई अन्य व्यय ज इस संविधान  द्वारा या संसद की विधि द्वारा इस प्रकार भारित घोषित किया जाता है।
नोट) भारत के उपराष्ट्रपति राज्य सभा के सभापति के रुप में वेतन व भत्ते प्राप्त करते हैं। राज्य सभा के सभापति एवं उपसभापति का वेतन व भत्ता भारत की संचित निधि पर भारित है।
बजट तैयार करने की प्रमुख जिम्मेदारी वित्त मंत्रालय की होती  है, न कि केवल राजस्व विभाग की। वित्त मंत्रालय का राजस्व विभाग, विगत वर्षों में राजस्व संबंधी आंकड़ों के संदर्भ में आने वाले वर्ष के लिए राजस्व का अनुमान तैयार करता है।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 266(1) मे संचित निधि का प्रावधान है। संसद की अनुमति के बिना संचित निधि मे कोई धन नही निकाला जा सकता है।
अनुच्छेद 266(2) में सार्वजनिक लेखा का प्रावधान किया गया है। इसमे संचित निधि मे जमा के अतिरिक्त अन्य सार्वजनिक धन जमा किए जाते हैं। इसे भविष्य निधि, न्यायिक जमा आदि धन शामिल किए जाते हैं।
सार्वजनिक लेखा से धनराशि निकालने के लिए संसद की अनुमति आवश्यक नही है। इस निधि का नियंत्रण कार्यपालिका के पास होता  है।


भारतीय संविधान का अनुच्छेद 267 एक आकस्मिकता निधि की स्थापना का प्रावधान करता है। यह राष्ठ्रपति के नियंत्रणाणीन होती है। इसका गठन किसी अत्यावश्यक, आकस्मिक प्रकृति के व्ययों हेतु किया गया है, जबकि विनियोग विधेयक में उक्त प्रावधान न हो तथा अनु. 115 एवं 116 के अधीन अपलब्ध अनुदानों को प्राप्त किया जा सकना संभव न हो। आकस्मिकता निधि पूर्णतः राष्ट्रपति के नियंत्रण मे होती  है और इससे धन निकासी के लिए संसद की स्वीकृति नही लेनी पड़ती है।
निंदा प्रस्ताव – सरकार की दोष पूर्ण नीतियों के सुधार के लिए लाया जाता है।
ध्यानाकर्षण प्रस्ताव – किसी अत्यावश्यक सार्वजनिक महत्व के विषय पर मंत्री का ध्यान आकृष्ट करने और उससे पद एवं सत्ता के अनुरुप औपचारिक कथन की प्राप्ति के लिए लाया जाता है।
कटौती प्रस्ताव – बजट पेश होने पर अनुदान मांगो पर बहस के दौरान संसद सदस्यों को धनराशि मे वृध्दि का अधिकार नही है, वे मात्र कमी कर  सकते हैं और ऐसा वे कटौती प्रस्ताव के द्वारा करते हैं, जो तीन प्रकार का होता है – प्रतीक कटौती, नीति कटौती  एवं मितव्ययिता कटोती।
स्थगन प्रस्ताव – किसी अत्यावश्यक सार्वजनिक महत्व के विषय पर सदन के सदस्यों का ध्यान आकृष्ट करने हेतु लाया जाता है।
प्रश्न काल – प्रत्यक सदन की पहली बैठक का पहला घंटा प्रश्न काल कहलाता है। दोनों सदनों मे प्रत्येक बैठक के प्रारंभ में एक घंटे तक प्रश्न किए जाते हैं और उसके उत्तर दिए जाते हैं।
अनुपूरक प्रश्न – संसद के प्रत्येक सदन मे प्रश्न सामान्यतया मंत्रियों से पूछे जाते हैं और वे प्रश्न तीन श्रेणियों के होते हैं – तारांकित, अतारांकित एवं अल्पसूचना प्रश्न।
61वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1989 के द्वार जन-प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 में संशोधन कर मताधिकार की आयु 21 से घटाकर 18 वर्ष कर दी गई। यह संशोधन 28 मार्च, 1989 से प्रभावी हुआ।
संसदीय कार्य मंत्रालय रेलवे के प्रत्येक जोन के लिए सलाहकारी समिति का गठन करता है। इसमें संबंधित जोन की सीमा से चुने गए सांसद सदस्य होते हैं।
ध्यानाकर्षण की संकल्पना भारत की देन है। यह आधुनिक संसदीय प्रक्रिया की एक नवीन संकल्पना है और इसमें प्रश्न तथा अनुपूरक प्रश्न पूछे जाते हैं। इसमें सदस्यों को अविलंबनीय लोक महत्व के विषय में सरकार की विफलता अथवा उसके द्वारा की गई अपर्याप्त कार्यवाही को सामने लाने का अवसर मिलता है। यह स्थगन प्रस्ताव के सदृश है, परंतु इसमें निंदा का पक्ष नही होता है।
कैबिनेट सचिव, कैबिनेट सचिवालय का प्रमुख होता है, जो सिविल सर्विसेज बोर्ड का पदेन अध्यक्ष भी होता है। मंत्रालयों की विभिन्न गतिविधियों के बारे में एवं कार्य संचालन संबंधी नियमों के  बारे में   जानकारी प्राप्त करना इसका कार्य होता है।
प्रधानमंत्री की सलाह पर भारत के राष्ट्रपति द्वारा किसी मंत्री को नियुक्त किया जाता है तथा मंत्रालयों/विभागों का बंटवारा भी राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री की सलाह पर करता है।
स्वतंत्रता से पूर्व भारतीय विधानमंडल के लिए भारत सरकार से स्वतंत्र एवं असंबध्द पृथक सचिवालय का विचार जनवरी, 1926 मे प्रभावी रुप से सामने आया। स्वतंत्रता के बाद भी इस विचार को अपना लिया गया। संविधान के अनुच्छेद 98 के तहत भारतीय संसद के प्रत्येक सदन के लिए एक पृथक सचिवालय की व्यवस्था है, जो कि सरकार से स्वतंत्र  होते हैं।
भारतीय संविधान के तहत संसद सर्वोच्च विधि निर्मात्री संस्था है, परंतु उसके द्वारा निर्मित विधि संविधान के मौलिक ढांचे का अतिक्रमण न करे, इस हेतु सर्वोच्च न्यायालय उसकी न्यायिक समीक्षा कर सकता है।


संसद (4)
खाद्य मिलावट निवारण अधिनियम (Prevention of Food Adulteration Act) सर्वप्रथम वर्ष 1954 मे लागू हुआ था।
सिविल अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1955 के अधीन सभी दंडनीय अपराध संज्ञेय एवं संक्षिप्ततः विचारणीय होते हैं।
सिविल अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1955 के अंतर्गत अपराध का विचारण प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट तथा महानगरों के मामलें में मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट द्वारा किया जाता है।
घरेलू हिंसा से महिलाओं की सुरक्षा अधिनियम, 2005, 26 अक्टूबर, 2006 से लागू है।
क्रिमिनल ट्राइव्स एक्ट सर्वप्रथम 1871 में अधिनियमित हुआ था।
अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 भारत में 30 जनवरी, 1990 से लागू है।
अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के उद्देश्यों को क्रियान्वित करने के लिए केन्द्र सरकार के पास नियम बनाने की शक्ति है।
यह अधिनियम संरक्षा विभेद के सिध्दांत पर आधारित है। इस अधिनियम के तहत गिरफ्तारी पूर्व जमानत पूर्णतः निषिध्द है।
अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के अधीन किए गए अपराध का अन्वेषण पुलिस उपाधीक्षक से नीचे रैंक के अधिकारी द्वारा नही किया जाएगा। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के अधीन अपराधों का विचारण करने के लिए सेशन न्यायालय को विशेष न्यायालय के रुप में निर्दिष्ट करने का उद्देश्य शीघ्र विचारणीय है।
हिंदू विवाह अधिनियम 1955 में हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 में तथा सती (निरोध) अधिनियम, 1987 में लागू हुआ था।
सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005, 12 अक्टूबर, 2005 से लागू है।
सूचना का अधिकार एक विधिक अधिकार है। सूचना का अधिकार अधिनियम का उद्देश्य सार्वजनिक अधिकारियों से सूचना प्राप्त करना है।
नमित शर्मा बनाम भारत संघ वाद, सूचना के अधिकार अधिनियम, 2005 से संबंधित है।
राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण अधिनियम, 2010 के द्वारा देश में एक राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (NGT) का गठन किया गया है।
पंचायत विस्तार अधिनियम, 1966 का उद्देश्य अनुसूचित क्षेत्रों में स्वशासन स्थापित करना है, जिससे पारंपरिक अधिकारों की रक्षा हो सके तथा जनजातीय लोगो को शोषण से मुक्त किया जा सके।
सिविल अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1955 की धारा 15 के अनुसार, सभी अपराध संज्ञेय तथा संक्षेपतः विचारणीय प्रकृति के होंगे। इस अधिनियम 1955 के अंतर्गत अपराध का विचारण प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट तथा महानगरों के मामलें में मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट द्वारा किया जाता है।
सिविल अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1955 की धारा 15 (1) के तहत दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) में किसी बात के होते हुए भी इस अधिनियम के अधीन दंडनीय पर अपराध संज्ञेय होगा। इस अधिनियम की धारा 10(1) में सामूहिक जुर्माना लगाने के लिए राज्य सरकार की शक्ति का उल्लेख है।साथ ही दोषी व्यक्तियों पर जुर्माने और सजा दोनों का प्रावधान है।
सिविल अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1955 की धारा 1(2) के अनुसार, इस अधिनियम का विस्तार संपूर्ण भारत पर है।


सिविल अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1955 के अंतर्गत कंपनियों द्वारा अपराध किए जाने की दशा में वे सभी व्यक्ति उत्तरदायी होंगे, जो अपराध घटित होते समय कंपनी का कार्यभार संभाल रहे हो तथा जो कंपनी के कार्य-व्यवहार के प्रति उत्तरदायी हो। यदि कोई अपराध कंपनी के निदेशक प्रबंधक तथा मैनेजर की सहमति से हो तो सभी उत्तरदायी होंगे।
महिलाओं को घरेलू हिंसा से संरक्षण प्रदान करने के लिए घरेलू हिंसा से महिलाओं की सुरक्षा अधिनियम, 2005 संसद द्वारा सर्वसम्मति से पारित किया गया, जिसे राष्ट्रपति की सहमति 13 सितंबर, 2005 को मिली तथा 26 अक्टूबर, 2006 से संपूर्ण भारत (जम्मू-कश्मीर राज्य को छोड़कर) लागू किया गया।
मीसा (MISA) आंतरिक सुरक्षा अधिनियम वर्ष 1971 में बना तथा 1977 में निरस्त कर दिया गया। यह आंतरिक सुरक्षा के संदर्भ में बनाया गया अधिनियम था। अतः यह सामाजिक अधिनियम नही है।
सन 1986 में भारत सरकार के द्वारा उपभोक्ता के अधिकारों के संरक्षण के लिए उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 पारित किया गया। इसके तहत उपभोक्ता को खाद्य की जांच करने के लिए नमूने लेने का अधिका है। उपभोक्ता गड़बड़ी पाए जाने पर उपभोक्ता फोरम में अपनी शिकायत दर्ज कर सकता है। इसके लिए उसे मामूली सी फीस देनी पड़ती है। यदि वाद के दौरान उपभोक्ता की मृत्यु हो जाती है। तो उसके वैधानिक उत्तराधिकारी को यह अधिकार है कि वह उपभोक्ता मंच में अपनी शिकायत दर्ज करा सके।
वनों के संरक्षण तथा उससे संबंधित अथवा उससे आनुवंषिग या प्रासंगिक विषयों का उपबंध करने के लिए इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 है। इसका विस्तार जम्मू-कश्मीर राज्य के अतिरिक्त संपूर्ण भारत पर है। यह 25 अक्टूबर, 1980 से यह प्रभावी है।


संसदीय समितियां
संसद, विभिन्न समितियों के माध्यम से अपने कर्तव्यों का निर्वहन करती है।
ये समितियां सदन द्वारा नियुक्त अथवा निर्वाचित की जाती हैं या अध्यक्ष/सभापति द्वारा नाम निर्देशित की जाती हैं।
ये अध्यक्ष/सभापति के निर्देशानुसार कार्य करती हैं तथा अपना प्रतिवेदन सदन को या लोकसभाध्यक्ष/सभापति को सौंपती हैं।
संसदीय समतियों को मुख्यतः दो भागों में विभाजित किया जाता है –
संसदीय समितियां
तदर्थ समितियां
स्थायी समितियां, स्थायी प्रकृति की होती हैं, जो निरंतरता के आधार पर कार्य करती हैं। इनका गठन प्रत्येक वर्ष अथवा समय-समय किया जाता है।
तदर्थ समितियों की प्रकृति अस्थायी होती है। जिस उद्देश्य के लिए गठन किया जाता है, उसके पूरा होते ही इनका कार्यकाल भी समाप्त हो जाता है ।
स्थायी समितियां हैं –
वित्त समितियां
विभागीय समिति
जांच समिति
परीक्षण एवं नियंत्रण के लिए गठित समिति
सदन के दैनिक कार्यों से संबधित समितियां
सदन समिति अथवा सेवा समिति
वित्त समितियो के अंतर्गत लोक लेखा समिति, प्राक्कलन समिति तथा सार्वजनिक उपक्रम समिति शामिल हैं।
अपवादस्वरुप कुछ समितियों को छोड़कर लगभग सभी स्थायी समितियों मे लोक सभा एवं राज्य सभा के सदस्यों का अनुपात क्रमशः 2:1 का होता है।
लोक लेखा समिति में कुल 22 सदस्य होते हैं, जिनमें 15 सदस्य लोक सभा से और 7 सदस्य राज्य सभा से होते हैं। यह समिति भारत सरकार के विनियोग लेखा और उन पर नियंत्रण तथा महालेखापरीक्षक के प्रतिवेदन की जांच करती है। इस समिति का कार्यकाल एक वर्ष होता है।
प्राक्कलन समिति में सदस्यों की संख्या 30 होती है। इसके सदस्य केवल लोकसभा से निर्वाचित होते हैं। यह समिति यह बताती है कि प्राक्कलनों में निहित नीति के अनुरुप क्या मितव्ययिता बरती जा सकती है तथा संगठन, कार्यकुशलता और प्रशासन में क्या-क्या सुधार किए जा सकते हैं।
सरकारी उपक्रम समिति में 22 सदस्य (15 लोक सभा 7 राज्य सभा) होते हैं। यह समिति सरकारी उपक्रमों के प्रतिवेदनों ओर लेखकों की जांच करती है।
याचिका समिति के सदस्यों की संख्या 15 होती है।
लोक लेखा समिति अपनी रिपोर्ट लोक सभा के अध्यक्ष को सौंपती है।
सामान्यतया लोक सभा के विपक्ष के किसी सदस्य को इसका अध्यक्ष नियुक्त किए जाने की परंपरा है।
इस समिति के अध्य की नियुक्ति लोक सभा अध्यक्ष द्वारा की जाती है।
लोक लेखा समिति (Public Account Committee) लोक व्ययों पर नियंत्रण रखने वाली एक संसदीय समिति है। इनमें लोक सभा के 15 और राज्य सभा के 7 सदस्यों समेत कुल 22 सदस्य होते हैं। इसका उद्देश्य लोक व्यय के दुरुपयोग एवं अनियमितताओं को सदन के समक्ष उजागर करना होता है। यह उन लोक प्राधिकारियों के विरुध्द कार्यवाही की भी सिफारिश करती है, जो व्यय के दुरुपयोग  हेतु उत्तरदायी पाए जाते  हैं। समिति नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की रिपोर्ट को आधार मानकर लोक व्ययों का प्रतिपरीक्षण करती है। सामान्यतः विपक्ष  के लोक सभा सदस्य को इसका अध्यक्ष नियुक्ति किये जाने की प्रथा (1967-68) है। लोक लेखा समिति के अध्यक्ष की नियुक्ति लोक सभा के अध्यक्ष द्वारा की जाती  है। लोक लेखा समिति द्वारा अपनी रिपोर्ट लोस सभा के स्पीकर को प्रस्तुत की जाती  है।
लोक लेखा समिति – वित्तीय समिति
याचिका समिति                       – कार्यकारी समिति
स्टॉक बाजार-स्कैम संयुक्त समिति      –     तदर्थ समिति
विभागीय समितिंयां                 – स्टैंडिंग समिति
सार्वजनिक लेखा समिति, प्राक्कलन समिति एवं सार्वजनिक उपक्रम समिति, ये तीनों भारतीय संसद की वित्तीय समितियां हैं।
2-जी स्पेक्ट्रम घोटाले की जांच हेतु संयुक्त संसदीय समिति (JPC) के प्रस्ताव को लोक सभा द्वारा 24 फरवरी, 2011 को एवं राज्य सभा द्वारा 1 मार्च, 2011 को पारित किया गया। इस संयुक्त संसदीय समिति में कुल 30 सदस्य शामिल किए गए हैं, जिसमें 20 लोक सभा से तथा 10 राज्य सभा से हैं।
2-जी स्पेक्ट्रम कांड की जांच करने हेतु संयुक्त संसदीय समिति का अध्यक्ष पी.सी. चाकों को बनाया गया था, जिसने अपनी रिपोर्ट (तत्कालीन) लोक सभा अध्यक्षा मीरा कुमार को सौंपी।
भारतीय संसद संसदीय समितियों के माध्यम से प्रशासन पर नियंत्रण करती है। उदाहरणार्थ लोक वित्त पर नियंत्रण वह तीन समितियों के माध्यम से करती है – लोक लेखा समिति, प्राक्कलन समिति एवं लोक उपक्रमों पर समिति। ध्यातव्य है कि भारतीय संविधान मे संसदीय समितियों के बारे में विशेष रुप से कोई उपबंध नही किया गया है।


सर्वोच्च न्यायालय
भारतीय संविधान के तहत एकीकृत न्याय व्यवस्था की स्थापना की गई है, जिसमें शीर्ष पर सर्वोच्च न्यायालय व उसके अधीन उच्च न्यायालय तथा अधीनस्थ न्यायालयों की श्रेणियाँ हैं।
न्यायपालिका की यह एकल प्रणाली, भारत सरकार अधिनियम, 1935 से ली गई है।
भारत के सर्वोच्च न्यायालय का उद्घाटन 28 जनवरी, 1950 को किया गया था।
भारतीय संविधान के भाग 5 के अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय से संबंधित प्रावधान अनुच्छेद 124 से 147 में उल्लिखित हैं।
सर्वोच्च न्यायालय मे न्यायाधीशों की कुल संख्या मुख्य न्यायाधीश सहित 31 है।
सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति करते हैं।
मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति राष्ट्रपति अन्य न्यायाधीशों एवं उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की सलाह के बाद करता है।
इसी तरह अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति भी  होती है। अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति में मुख्य न्यायाधीश बनने के लिए किसी व्यक्ति को भारत का नागरिक होना चाहिए। उसे किसी  उच्च न्यायालय का कम-से-कम पांच वर्ष के लिए न्यायाधीश होना चाहिए, या उसे उच्च न्यायालय या विभिन्न न्यायालयों में मिलाकर 10 वर्ष तक वकील होना चाहिए था। राष्ट्रपति के विचार में वह कानून का ज्ञाता हो।
सर्वोच्च न्यायालय का न्यायाधीश होने के लिए संविधान में न्यूनतम आयु का उल्लेख नही है।
सर्वोच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की संख्या में वृध्दि संसद कर सकती है।
सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को राष्ट्रपति शपथ दिलाते हैं।
सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश राष्ट्रपति को संबोधित कर अपना पद त्याग सकते हैं।
सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश संसद की सिफारिश पर राष्ट्रपति द्वारा हटाए जा सकते हैं। जब इस प्रकार हटाए जाने हेतु संसद द्वारा उसी सत्र में ऐसा संबोधन किया गया हो।
इस आदेश को संसद के दोनों सदनों के विशेष बहुमत (यानि सदन की कुल सदस्यता का  बहुमत तथा सदन के उपस्थित एवं मत देने वाले सदस्यों का दो-तिहाई) का समर्थन प्राप्त होना चाहिए।
न्यायाधीशों को हटाने का आधार उनका दुर्व्यवहार या सिध्द कदाचार होना चाहिए। इस शक्ति के तहत सर्वोच्च न्यायालय द्वारा केन्द्र व राज्य दोनों स्तरों पर विधायी व कार्यकारी आदेशों की सांविधानिकता की जांच की जाती है।
अधिकारातीत पाए जाने की स्थिति में इन्हें अविधिक, असंवैधानिक और अवैध घोषित किया जा सकता है।
उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश की सेवानिवृत्ति की आयु 65 वर्ष है।
सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश का वेतन संसद द्वारा निर्धारित होता है। सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश सेवानिवृत्ति के बाद भारत के किसी भी न्यायालय में वकालत नही कर सकते हैं।
अनु. 127 के तहत सर्वोच्च न्यायालय के किसी सत्र के लिए न्यायाधीशों का कोरम पूरा करने हेतु तदर्थ न्यायाधीशों की नियुक्ति की जाती है।


सर्वोच्च न्यायालय मे संविधान के निर्वाचन से संबंधित मामले की सुनवाई के लिए न्यायाधीशों की संख्या कम-से-कम पांच होनी चाहिए। इसे संविधान के पीठ के रुप में अभिहीत किया जाता है।
संविधान के अनुच्छेद 129 के अनुसार, उच्चतम न्यायालय अभिलेख न्यायालय है। इसे अपने अवमान के लिए दंड देने की शक्ति है।
अभिलेख न्यायालय का अर्थ है कि इसके सभी निर्णयों का साक्ष्यात्मक मूल्य होता है।
अनुच्छेद 131 मे केन्द्र और राज्यों के बीच, दो या अधिक राज्यों के बीच तथा भारत सरकार और किसी राज्य या राज्यों और दूसरी ओर एक या अधिक अन्य राज्यों की बीच होने वाले विवादों का निर्णय करने की सर्वोच्च न्यायालय की शक्ति मूल अधिकारिता के अंतर्गत आती है।
अनु. 132-136 के तहत सर्वोच्च न्यायालय के अपीलीय क्षेत्राधिकार का उल्लेख किया गया है।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 136 के अंतर्गत अपील के लिए उच्चतम न्यायालय की विशेष इजाजत है। अनुच्छेद 137 के  अंतर्गत निर्णयों या आदेशों का उच्चतम  न्यायालय  द्वारा पुनर्विलोकन (Review) किया जाता  है।
भारतीय संविधान में न्यायिक पुनर्विलोकन का आधार विधि का शासन है।
संविधान की व्याख्या करने का अंतिम अधिकार सर्वोच्च न्यायालय को है।
सर्वोच्च न्यायालय को भारतीय संविधान का संरक्षक तथा अभिभावह कहा जाता है।
अनुच्छेद 143 के अंतर्गत राष्ट्रपति विधि या तथ्य के व्यापक महत्व के प्रश्न पर सर्वोच्च न्यायालय से परामर्श ले सकते हैं।
सर्वोच्च न्यायालय के अधिकार क्षेत्र को बढ़ाने का अधिकार संसद को है।
देश की किसी न्यायालय मे चल रहे मामला/वाद को अन्यत्र भेजने का अधिकार सर्वोच्च न्यायालय को है।
भारतीय संविधान के आधारित संरचना के सिध्दांत का स्रोत न्यायिक व्याख्या है। संविधान के अनु. 141 के अनुसार, सर्वोच्च न्यायालय द्वारा घोषित विधि भारत के सभी न्यायालयों पर आबध्दकर होती है।
केशवानन्द भारती (1973) मामले मे सर्वोच्च न्यायालय ने संविधान के मूल ढांचे का सिध्दांत प्रतिपादित किया।
भारत में सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना भारतीय संविधान के अनु. 124 के तहत की गई है। अनु. 124 में न्यायाधीशों की संख्या का भी उल्लेख है। जब संविधान प्रारंभ हुआ तब उच्चतम न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या मुख्य न्यायमूर्ति के अतिरिक्त सात थी। संसद ने उच्चतम न्यायालय न्यायाधीश संख्या अधि. 1956 अधिनियमित करके इस संख्या को ग्यारह कर दिया, 1960 में बढ़ाकर चौदह, 1978 में अठारह और 1986 में इसे 26 (मुख्य न्यायाधीश सहित) कर दिया गया। 2008 के अधिनियम के तहत मुख्य न्यायाधीश सहित सर्वोच्च न्यायलय में न्यायाधीशों की कुल संख्या 31 रखने का प्रावधान किया गया है।
भारतीय संविधान के अनु.124(2)(क) के अनुसार, सर्वोच्च न्यायालय को कोई न्यायाधीश, राष्ट्रपति को संबोधित अपने हस्ताक्षर सहित लेख द्वारा अपना पद त्याग सकता है। राष्ट्रपति अपने हस्ताक्षर और मुद्रा सहित अधिपत्र द्वारा उच्चतम न्यायालय के प्रत्येक न्यायाधीश की नियुक्ति भी करती है।
सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों के लिए सेवानिवृत्ति की आयु 65 वर्ष है, जबकि उच्च न्यायालयों में यह 62 वर्ष है।


संविधान के अनु. 125 (1) के तहत उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों के वेतन का निर्धारण संसद द्वारा बनाई गई विधि के तहत किया जाता है।
उच्चतम न्यायालय को देश का प्रहरी माना जाता है, अतः उसकी स्वायत्तता को बनाए रखने के लिए संविधान में कई उपबंध मौजूद है। उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश की नियुक्ति करते समय राष्ट्रपति को सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से परामर्श करना आवश्यक होगा। न्यायाधीशों को राजनीति के प्रभाव से दूर रखने के लिए उनका वेतन भारत की संचित निधि पर भारित होता  है, जिसके लिए संसद में मतदान ही होता है।
संविधान के अनु. 124(7) के अनुसार, सेवानिवृत्त होने के पश्चात सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश किसी भी न्यायालय में वकालत नही कर सकते हैं, जबकि अनु. 220 के अनुसार, उच्च न्यायालय के न्यायाधीश सेवानिवृत्त होने के  बाद उच्चतम न्यायालय में एवं अन्य उच्च न्यायालयों (जिस उच्च न्यायालय मे स्थायी न्यायाधीश रहा हो, उसमें नही) मे वकालत कर सकते हैं।


राज्यपाल
भारतीय राज्यों मे सरकार की व्यवस्था उसी प्रकार की है, जैसी कि केन्द्र स्तर पर संविधान के भाग 6 के अंतर्गत अनुच्छेद 153 से 167 तक राज्य कार्यपालिका के संबंध्द में उल्लेख है।
राज्यपाल, राज्य का कार्यकारी प्रमुख होता है।
सामान्यतः प्रत्येक राज्य के लिए एक राज्यपाल होता है, लेकिन सातवें संविधान संशोधन अधिनियम, 1956 के अनुसार, एक ही व्यक्ति को दो या अधिक राज्यों का राज्यपाल भी नियुक्ति किया जा सकता है।
संविधान के अनुच्छेद 155 के तहत राज्य के राज्यपाल की नियुक्ति भारत का राष्ट्रपति द्वा की जाती है।
सामान्यतया, राज्यपाल का कार्यकाल पदग्रहण से पांच वर्ष की अवधि के लिए होता है।
अनुच्छेद 156(1) के तहत राज्यपाल, राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत अपना पद धारण करता है।
अनुच्छेद 156(2) के तह राज्यपाल, राष्ट्रपति को संबोधित अपने हस्ताक्षर सहित लेख द्वारा अपना पद त्याग कर सकता है।
अनुच्छेद 157 के अनुसार, राज्यपाल पद के लिए अर्हताएं हैं –
वह भारत का नागरिक हो
वह 35 वर्ष की आयु पूरी कर चुका हो
जम्मू और कश्मीर के राज्यपाल की नियुक्ति भारत का राष्ट्रपति करता है।
राज्य सरकार के सभी कार्यकारी कार्य औपचारिक रुप से राज्यपाल के नाम पर होते हैं।
अनुच्छेद 239 क क(5) – संघ राज्य क्षेत्र दिल्ली के मुख्यमंत्री की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाएगी।
अनुच्छेद 202(3)(क) के अनुसार, राज्यपाल की नियुक्ति उपलब्धियां भत्ते तथा उसके पद से संबंधित अन्य व्यय राज्य की संचित निधि पर भारित होते हैं।
संविधान के अनुच्छेद 164(1) के अनुसार, मुख्यमंत्री की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा तथा, मंत्रियों की नियुक्ति राज्यपाल, मुख्यमंत्री की सलाह पर करेगा।


राज्यपाल, राज्य विधानसभा का अभिन्न अंग होता है। वह राज्य विधानसभा के सत्र को बुलाने या सत्रावसान करने तथा विघटित करने की शक्ति रखता है।
राज्यपाल, राज्य विधान परिषद के कुल सदस्यों के 1/6वें भाग को नामित करता है। वह राज्य विधानसभा के लिए आंग्ल-भारतीय समुदाय से एक सदस्य की नियुक्ति कर सकता है।
अनु. 165 के तहत राज्यपाल, उच्च न्यायालय का न्यायाधीश होने के लिए योग्य  किसी व्यक्ति को राज्य का महाधिवक्ता नियुक्त करेगा।
राज्य विधानमंडल द्वारा पारित किसी विधेयक को राज्यपाल स्वीकृति दे सकता है, स्वीकृति रोक सकता है या वह विधेयक को राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित रखता है। वह विधेयक को पुनर्विचार के लिए वापस कर सकता है (धन विधेयक न होने पर)।
राज्य विधानमंडल द्वारा पुनः भेजे जाने पर राज्यपाल को अपनी स्वीकृति देनी होती है।
अनु. 201 के अनुसार, जब कोई विधेयक राज्यपाल द्वारा राष्ट्रपति के विचारार्थ आरक्षित रख लिया जाता है, तब राष्ट्रपति यह घोषित करेगा कि वह विधेयक पर अनुमति देता है या रोक लेता है।
अनु. 213 के अनुसार, जब राज्य विधानमंडल का सत्र न चल रहा हो तो राज्यपाल अध्यादेश की घोषणा कर सकता है।
अनुच्छेद 161 के अनुसार, किसी राज्य के राज्यपाल को उस राज्य की कार्यपालिका विधि के विरुध्द किसी अपराध के लिए दंड को क्षमा, उसका प्रतिलंबन, विराम या परिहार करने की अथवा दंडावेश के निलंबन, परिहार या लघुकरण की शक्ति होगी।
सरोजिनी नायडू भारत की प्रथम महिला थी, जिन्हें राज्यपाल पद पर मनोनीत किया गया था।
वह 15 अगस्त, 1947 से  1 मार्च, 1949 तक उत्तर प्रदेश की राज्यपाल थी।
संविधान सभा में इस बात पर काफी बहस हुई कि राज्य का राज्यपाल नियुक्त हो या निर्वाचित। कृष्णामचारी, बी.जी.खेर, जी.बी. पंत जैसे नेता निर्वाचित राज्यपाल के पक्ष मे थे, जबकि अम्बेडकर, जवाहरलाल नेहरु जैसे नेता नामित राज्यपाल के पक्ष मे थे। अंततः देश की परिस्थितियों एवं आम सहमति के आधार पर नामित राज्यपाल का प्रावधान किया गया और निर्वाचित प्रावधान की मूल योजना को छोड़ दिया गया क्योकि –
अनावश्यक निर्वाचन व्यय बढ़ेगा
निर्वाचन के दुष्परिणामों से बचा जा सकेगा
राजनैतिक महत्वकांक्षाएं द्वंध्द एवं संघर्ष को जन्म देंगी
केन्द्र का राज्यों पर प्रभावी नियंत्रण न हो सकेगा।
अलगाववाद को बढ़ावा मिलेगा।
राज्य का राज्यपाल निम्नलिखित संदर्भों में अपने विवेकानुसार कार्य कर सकता है –
विधानसभा मे सरकार को बहुमत सिध्द करने को कहने के लिए।
अल्पमत मे आए मुख्यमंत्री को बर्खास्त करने के लिए।
किसी विधेयक पर अनुमति देने, अनुमति रोकने अथवा भारत के राष्ट्रपति के विचारार्थ उस विधेयक को आरक्षित करने के लिए (अनु. 200)।
विधायिका द्वारा पारित किसी विधेयक को पुनर्विचार हेतु वापस करने के लिए (अनु. 200 का परंतुक)।
इसके अतिरिक्त राज्य मे राष्ट्रपति शासन लगाने तथा विधानसभा के समय पूर्व विघटन जैसे कुछ अन्य संदर्भों में भी वह अपने विवेक का पर्योग कर सकता है तथापि उसे उच्च न्यायालय से परामर्श मांगने के लिए अधिकृत नही किया गया है।


अनुच्छेद 200 के अनुसार राज्य विधान मण्डल के दोनों सदनों से पारित विधेयक राज्यपाल के समक्ष प्रस्तुत किए जाने पर राज्यपाल उस पर अपनी सहमति देने या रोकने के अतिरिक्त विधेयक को राष्ट्रपति के विचारार्थ आरक्षित रख सकता है।
अनुच्छेद 201 मे राष्ट्रपति ऐसे आरक्षित विधेयक पर विचार करता है तथा अपनी अनुमति देता है या रोक लेता है ।
संविधान के अनुच्छेद 154(1) के अनुसार, राज्य की कार्यपालिका शक्ति राज्यपाल में निहित होगी, जिसका प्रयोग वह इस संविधान के अनुसार स्वयं या अपने अधीनस्थ अधिकारियों के द्वारा करेगा।
जम्मू एवं कश्मीर राज्य को संविधान के अनुच्छेद 370 के तहत भारत के अन्य राज्यों से अलग विशेष राज्य का दर्जा प्रदान किया गया है। इसी परिप्रेक्ष्य में वहां की कार्यपालिका के प्रधान का चुनाव भारत के राष्ट्रपति द्वारा न होकर, जम्मू एवं कश्मीर की विधानसभा द्वारा किया जाता था किंतु इस विषमता को 1965 में समाप्त कर दिया गया, फलस्वरुप जम्मू एवं कश्मीर के कार्यपालिका प्रमुख को सदर-ए-रियासत के स्थान पर राज्यपाल नाम से जाना जाने लगा तथा उसकी नियुक्ति भारत के राष्ट्रपति द्वारा की  जाने लगी।
भारतीय संविधान के भाग 6 के तहत अनुच्छेद 158(3A) के अंतर्गत यह प्रावधान किया गया है कि जब एक ही व्यक्ति को दो या अधिक राज्यो का राज्यपाल नियुक्त किया जाता है, तो उसे संदेय उपलब्धियां और भत्ते उन राज्यों के बीच ऐसे अनुपात में आवंटित किया जाएगा जैसा राष्ट्रपति  आदेश द्वारा अवधारित करें।
संविधान के अनुच्छेद 213(2)(क) के तहत राज्यपाल द्वारा जारी अध्यादेश का विधायिका के सत्र प्रारंभ होने से छह सप्ताह की अवधि मे विधायिका द्वारा अनुमोदन आवश्यक है, अन्यथा वह प्रवर्तन में नही रहेगा।
संविधान के अनुच्छेद 356(1) के अनुसार, किसी राज्य के राज्यपाल द्वारा भेजी गई राज्य में संविधान के उपबंधों के अनुसार शासन नही चलाए जा सकने की रिपोर्ट मिलने पर या अन्यथा राष्ट्रपति द्वारा उस राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाया जा सकता है। यह रिपोर्ट भेजना राज्यपाल की विवेकाधीन शक्ति के अंतर्गत आता है।
राज्यपाल अनु. 168 के तहत राज्य की विधायिका का अंग होता है, राज्यों के उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्ति अनु. 217 के तहत राष्ट्रपति द्वारा की जाती है, तथा राज्यपाल के पास राष्ट्रपति की तरह आपातकालीन शक्तियां नही हैं।
अनु. 161 के तहत राज्य की कार्यपालिका शक्ति के विस्तार वाले विषयों पर किसी अपराध के लिए दोषसिध्द ठहराए गए व्यक्ति के दंड का राज्यपाल निलंबन, परिहार लघुकरण अथवा क्षमा कर सकता है परंतु मृत्युदंड को क्षमा नही कर सकता है।
पश्चिम बंगाल की प्रथम महिला राज्यपाल पद्मजा नायडू (1956-1967) थी। जबकि प्रथम राज्यपाल चक्रवती राजगोपालाचारी थे। वर्तमान में पश्चिम बंगाल राज्यपाल केशरीनाथ त्रिपाठी (24 जुलाई, 2014 से) हैं।
प्रतिवर्ष 13 फरवरी को सरोजिनी नायडू की स्मृति में महिला दिवस मनाया जाता है। सरोजिनी नायडू का जन्म 13 फरवरी, 1879 को हुआ था।
भारत में सर्वप्रथम बर्खास्त किए गए राज्यपाल तमिलनाडु के राज्यपाल प्रभुदास पटवारी थे जिन्हें अक्टूबर, 1980 में बर्खास्त किया गया था। अगस्ता, 1981 में राजस्थान के राज्यपाल रघुकुल तिलक को बर्खास्त किया गया था, जो कि राजस्थान के ऐसे पहले राज्यपाल थे।