Indian Polity for All Competitive Exams (State Level) Part 6

अस्थायी विशेष प्रावधान
भारतीय संविधान के भाग-21 के तहत अनु. 369 से 392 तक अस्थायी, संक्रमणकालीन तथा विशेष उपबंधों का प्रावधान है।
अनुच्छेद 370 का संबंध जम्मू-कश्मीर राज्य के अस्थायी उपबंधों से है।
जम्मू-कश्मीर को छोड़कर, भारत मे एक ही संविधान के अंतर्गत केन्द्र एवं समस्त राज्यों की संपूर्ण व्यवस्था का संचालन किया जाता है।
ध्यातव्य है कि जम्मू-कश्मीर राज्य का अपना अलग संविधान है।
जम्मू-कश्मीर का संविधान 17 नवंबर, 1957 को अंगीकार किया गया तथा 26 जनवरी, 1957 को प्रभाव में आया।
संविधान के भाग-6 (राज्य के बारे में उपबंध) के अध्याय 1 के अनुच्छेद 152 में  राज्य को परिभाषित करते हुए, जम्मू-कश्मीर राज्य को इसमें शामिल नही किया गया है।
अनु. 371 के अंतर्गत महाराष्ट्र एवं गुजरात राज्यों के संबंध में विशेष उपबंध हैं।
अनु. 371 क में नगालैंड राज्य के संबंध में विशेष उपबंध किया गया है।
अनु. 371 ख में असम, अनु. 371-ग में मणिपुर, अनु. 371-घ में आंध्र प्रदेश या तेलंगाना के संबंध में विशेष उपबंध, अनु. 371-च में सिक्किम, अनु. 371-छ में मिजोरम, अनु. 371-ज में अरुणाचल प्रदेश, अनु. 371-झ मे गोवा तथा अनु. 371-ञ में कर्नाटक राज्य के संबंध में विशेष उपबंध किया गया है।
भारत में एक ही संविधान प्रत्येक राज्य और केन्द्र के लिए है, परंतु जम्मू-कश्मीर राज्य इसका अपवाद है, क्योकि अनु. 370 के द्वारा जम्मू-कश्मीर राज्य के संबंध मे कुछ विशेष  अस्थायी उपबंध किए गए हैं।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 1 एवं अनुच्छेद 370, जम्मू-कश्मीर राज्य में स्वयमेव लागू होते हैं। अनुच्छेद 1, जहां जम्मू-कश्मीर राज्य को भारतीय क्षेत्र का अभिन्न भू-भाग घोषित करता है, वहीं अनुच्छेद 370 जम्मू-कश्मीर राज्य को विशेष दर्जा प्रदान करता है।
जम्मू एवं कश्मीर की संविधान सभा ने महाराजा के आनुवांशिक शासन को समाप्त कर सर्वप्रथम कर्ण सिंह को 1951 में सदर-ए-रियासत के रुप में निर्वाचित किया। आगे चलकर जम्मू एवं कश्मीर संविधान मे  छठें संविधान संशोधन अधिनियम, 1965 द्वारा सदर- ए-रियासत नाम बदलकर राज्यपाल तथा वजीर-ए-आजम का नाम बदलकर मुख्यमंत्री कर दिया गया।


चुनाव आयोग
संविधान के भाग 15 के तहत अनु. 324 से 329 तक निर्वाचन से संबंधित प्रावधान उल्लिखित हैं।
अनु. 324 के तहत एक निर्वाचन आयोग की व्यवस्था की गई है। यह एक स्थायी एवं स्वतंत्र निकाय है।
यह आयोग, संसद, राज्य विधानमंडल,राष्ट्रपति व उपराष्ठ्रपति के पदों के निर्वाचन के लिए निर्वाचक नामावली तैयार कराने, निर्वाचनों के संचालन का अधीक्षण, निर्देशन तथा नियंत्रण के लिए जिम्मेदार होता है।
अनु. 324(2) के अनुसार, निर्वाचन आयोग, मुख्य निर्वाचन आयुक्त और उतने अन्य निर्वाचन आयुक्तों से (जितने समय-समय पर राष्ट्रपति नियत करे) मिलकर बनेगा।
मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।
16 अक्टूबर, 1989 तक सर्वप्रथम निर्वाचन आयुक्त ही होता था। 16 अक्टूबर, 1989 को सर्वप्रथम निर्वाचन आयोग में दो अतिरिक्त निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति की गई। परंतु 1 जनवरी, 1990 कत ही ये पद पर रहे। 1 अक्टूबर, 1993 को पुनः दो अतिरिक्त निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति की गई और तब से यह आयोग तीन-सदस्यीय है।
राष्ट्रपति, निर्वाचन आयोग की सलाह पर प्रादेशिक आयुक्तों की नियुक्त कर सकता है।
वर्तमान में निर्वाचन आयोग में तीन निर्वाचन आयुक्त हैं। इनके पास समान शक्तियां होती हैं तथा उनके वेतन, भत्ते व दूसरे अनुलाभ भी  समान ही होते हैं, जो कि सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के समतुल्य होता है।
निर्वाचन आयुक्तों का कार्यकाल 6 वर्ष या 65 वर्ष की आयु तक (जो भी पहले हो) होता है।
अनु. 324(5) के अनुसार, मुख्य निर्वाचन आयुक्त को उसके पद से उसी रीति से और उन्ही आधारों पर ही हटाया जाएगा, जिससे सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाया जाता है। किसी अन्य निर्वाचन आयुक्त या प्रादेशिक आयुक्त को  मुख्य निर्वाचन आयुक्त की सिफारिश पर ही पद से हटाया जाएगा।
चुनाव की अधिसूचना लोक सभा एवं राज्य सभा के लिए राष्ट्रपति तथा विधानसभा एवं विधान परिषद के लिए संबंधित राज्य का राज्यपाल जारी करता है।
अनु. 326 के तहत वयस्क मताधिकार का प्रावधान किया गया है। भारत में मत देने का अधिकार एक संवैधानिक अधिकार (Statutory Right) है। जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के तहत भारत में मताधिकार और निर्वाचित होने का अधिकार मिलता है।
61वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1988 द्वारा मताधिकार की आयु को 21 वर्ष से घटाकर 18 वर्ष कर दिया गया, जो कि 28 मार्च, 1989 से प्रभावी है।
स्थानीय निकायों (पंचायतों एवं नगरपालिकाओं) का चुनाव राज्य निर्वाचन आयोगों द्वारा कराया जाता है।
परिसीमन आयोग का कार्य विगत जनगणना के आधार पर चुनाव क्षेत्रों की सीमा निर्धारित करना होता है।
अब तक चार बार (1952, 1963, 1973 एवं 2002) परिसीमन आयोग का गठन किया गया है।
मुख्य चुनाव आयुक्त को उन्ही तरीकों से हटाया जा सकता है, जो अनु. 124(4) में उच्चतम न्यायलय के न्यायाधीशों को हटाने के लिए वर्णित हैं। साबित कदाचार या असमर्थता के आधार पर हटाये जाने के लिए संसद के प्रत्येक सदन द्वारा अपनी कुल सदस्य संख्या के बहुमत द्वारा तथा उपस्थित और मत देने वाले सदस्यों के कम-से-कम दो-तिहाई बहूमत द्वारा समर्थिक समावेदन जो उसी सत्र में राष्ट्रपति द्वारा अनुमोदित कर दिया गया हो द्वारा ही हटाया जा सकता है। जबकि निर्वाचन आयुक्तों को मुख्य निर्वाचन आयुक्त के परामर्श पर राष्ट्रपति द्वारा हटाया जा सकता है।
भारत का निर्वाचन आयोग भारत में राजनीतिक दलो को मान्यता प्रदान करता है। चुनाव चिन्ह् (आरक्षण व आवंटन) आदेश,1968 मे संशोधन के अनुसार, किसी राजनीतिक दल को राष्ट्रीय स्तर, राज्य सत्रीय या क्षेत्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त करता है और उन्हें चुनाव चिन्ह भी आवंटित करता है।  भारतीय संविधान के अनु. 324 के तहत निर्वाचन का अधीक्षण, निदेशन और निंयंत्रण निर्वाचन आयोग में निहित है।
सदन के पीठासीन अधिकारियों का निर्वाचन सदन के सदस्य करते हैं। निर्वाचन से उत्पन्न विवादों का निर्णयन न्यायपालिका करती है। नगरपालिकाओं एवं नगर निगमों के निर्वाचन राज्य निर्वाचन आयोग करवाता है।
राष्ट्रीय मतदाता दिवस (नेशनल वोटर्स डे) 25 जनवरी को मनाया जाता है। भारत निर्वाचन आयोग की स्थापना के उपलक्ष्य में और लोकतांत्रिक प्रक्रिया में मतदाताओं और युवाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए यह दिवस 25 जनवरी, 2011 से शुरु किया गया था।
आनुपातिक प्रतिनिधित्व की व्यवस्था, निर्वाचन क्रियाप्रणाली के रुप में अल्पसंख्यक समूहों को उनकी संख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करती है। इस प्रणाली से सभी वर्गों का समुचित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित होता है।
राज्य निर्वाचन आयोग एक संवैधानिक प्राधिकरण है। संविधान (73 वां एवं 74वां संशोधन) अधिनियम, 1992 के तहत इसकी व्यवस्था की गई है, वहीं राज्यों में पंचायतों तथा शहरी निकायों के चुनावो में भारत के निर्वाचन आयोग की कोई भूमिका नही होती है।


राजनीतिक दल
दलीय व्यवस्था, राजनीतिक व्यवस्था का अंग है।
दलीय व्यवस्था द्वारा ही लोकतांत्रिक राजनीतिक व्यवस्थाओं मे सरकार का गठन और संचालन होता है।
जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 राजनीतिक दलों के पंजीकरण का प्रावधान करता है।
राजनीतिक दलों का पंजीकरण निर्वाचन आयोग करता है।
52वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा राजनीतिक दलो को प्रथम बार वर्ष 1985 में संवैधानिक मान्यता मिली। यह अधिनियम 1 मार्च, 1985 से लागू है।
52वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा भारतीय संविधान में दसवीं अनुसूची को जोड़कर दल-बदल को रोकने का प्रावधान किया गया। आंतरिक दलीय लोकतंत्र राजनीतिक दलो के आंतरिक चुनाव के लिए प्रयुक्त होता है, जो दल के पदाधिकारियों के चुनाव हेतु समय-समय पर होता है।
भारत के विभिन्न राजनीतिक दलों को राष्ट्रयी, राज्य स्तरीय या क्षेत्रीय स्तर का दर्जा देने का अधिकार निर्वाचन आयोग को है।
वर्तमान में देश मे कुल सात (7) राजनीतिक दलों को राष्ट्रीय स्तर का  दर्जा प्राप्त है।
जिसमें भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, भारतीय जनता पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी तथा अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस शामिल हैं।
भारत मे वयस्क मताधिकार के आधार पर मतदान होता है।
राजनीतिक दलों को अपने स्वयं के मानक स्थापित करने की स्वतंत्रता होती है।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में राष्ट्रीय शब्द ब्रिटिश शासन के विरुध्द प्रतिक्रिया से प्रभावित था।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रथम अध्यक्ष व्योमेश चन्द्र बनर्जी थे।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना 1885 मे हुई थी।
भारतीय जनता पार्टी के प्रथम अध्यक्ष अटल बिहारी वाजपेयी थे।
भारतीय जनता पार्टी का गठन 1980 में हुआ था।
इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी की स्थापना बी.आर. अंबेडकर 1936 में किया था।
भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) की स्थापना 1920 मे तथा सी.पी.एम. की स्थापना 1964 में हुई थी।
किसी राजनीतिक दल को राष्ट्रीय दल के रुप में निर्वाचन आयोग द्वारा तभी स्वीकृति प्रदान की जाती है, जबकि निम्नलिखित तीन शर्तों मे से कोई एक पूरी होती हो –
उस राजनीतिक दल द्वारा खड़े किए गए प्रत्याशियों को किन्हीं चार या अधिक राज्यों में गत लोक सभा चुनावों या उन राज्यों के विधानसभा चुनावों में पड़े कुल वैध मतों का कम से कम 6 प्रतिशत मत और साथ ही कम से कम चार लोक सभा सीटे प्राप्त हों।
उस दल को लोक सभा की कुल सदस्य संख्या की कम-से-कम 2 प्रतिशत सीटें प्राप्त तथा ये सदस्य कम से कम 3 राज्यों से चुने गए हों।
वह दल कम-से-कम 4 राज्यो में राज्य स्तरीय दल की मान्यता प्राप्त हो।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में राष्टीय शब्द ब्रिटिश शासन के विरुध्द प्रतिक्रिया से प्रभावित था।
चुनाव चिन्ह (आरक्षण व आवंटन) आदेश, 1968 में संशोधन के अनुसार, किसी राजनीतिक दल को राज्य स्तरीय या क्षेत्रीय दल की मान्यता प्राप्त करने के लिए यह आवश्यक है कि
उसे उस राज्य विशेष मे हुए गत विधानसभा आम चुनाव में न्यूनतम 6% वैध मत एवं राज्य की न्यूनतम 2 सीटें प्राप्त हो। या
गत लोक सभा आम चुनाव में न्यूनतम 6% वैध मत एवं राज्य की न्यूनतम 1 लोक सभा सीट प्राप्त हो। या
गत विधानसभा आम चुनाव में राज्य विधानसभा की न्यूनतम 3% सीटें (2.51% से अधिक को 3% मान लिया जाएग) अथवा न्यूनतम 3 सीटों मे से जो ज्यादा हो प्राप्त हो, या
गत लोक सभा आम चुनाव में प्रत्येक 25 सदस्यों के लिए कम-से –कम 1 सीट अथवा राज्य के लिए निर्धारित संख्या का कोई भाग,
गत लोक सभा अथवा विधानसभा आम चुनाव में न्यूनतम 8% वैध मत।
वर्ष 1999 मे कांग्रेस पार्टी से शरद पवार, पी.ए. संगमा तथा तारिक अनवर ने सोनिया गांधी के विदेशी मूल के होने के कारण अलग होकर, राष्टीयतावादी कांग्रेस पार्टी का गठन किया।
संविधान के संशोधन के अनुसार, 18 वर्ष की आयु के सभी वयस्कों को मत देने का अधिकार प्राप्त है। धर्म, प्रजाति, लिंग आदि के आधार पर कोई विभेद नही है। प्रत्येक क्षेत्र के लिए केवल एक निर्वाचक सूची होगी। राजनीतिक दल अपने मानक स्वयं निर्धारित कर सकते हैं।
डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने समता सैनिक दल, इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी एवं सिड्यूल्ड कॉस्ट फेडरेशन की स्थापना की थी। पीजेंट्स एंड वर्कर्स पार्टी ऑफ इंडिया की स्थापना महाराष्ट्र में 1947 मे की गई थी। यह एक मार्क्सवादी राजनीतिक पार्टी थी। जबकि वर्कर्स एंड पीजेंट्स पार्टी की स्थापना बंगाल में 1 नवंबर, 1925 को की गई। काजी नजरुल इस्लाम, हेमंत सरकार, कुतुबुद्दीन अहमद और शमुशुद्दीन हुसैन इसके संस्थापक सदस्य थे। इस पार्टी ने 1925 से 1929 के दौरान भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अंतर्गत कार्य किया।
कांग्रेस, भाजपा एवं सीपीआई राष्ट्रीय दल है, जबकि अकाली दल पंजाब राज्य में क्षेत्रीय राजनीतिक दल के रुप में मान्यता प्राप्त है। इस दल की स्थापना 14 दिसंबर, 1920 को हुई। वर्तमान अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल हैं।
तेलगूदेशम आंध्र प्रदेश में क्षेत्रीय राजनीतिक दल के रुप में मान्यता प्राप्त है। संस्थापक एनटी रामाराव व वर्तमान अध्यक्ष एन.  चंद्रबाबू नायडू हैं।
राजनैतिक दल गठन वर्ष
सी.पी.आई.                               1920
सी.पी.एम.                                1964
ए.आई.ए.डी.एम.के.                    1972
तेलगूदेशम                              1982
भारतीय साम्यवादी दल का विभाजन भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) और भारत की कम्युनिस्ट पार्टी मार्क्सवादी (CPIM) में 30 अक्टूबर से 7 नवंबर, 1964 को कोलकाता में हुए सातवें पार्टी सम्मेलन में हुआ। सी.पी.आई.एम. साम्राज्यवाद के विरुध्द संघर्ष और विभक्त कम्युनिस्ट पार्टी की क्रांतिकारी विरासत की प्रतिनिधि हैं, जिसका गठन वर्ष 1920 में हुआ  था।
दलीय व्यवस्था,राजनीतिक व्यवस्था का अंग है। दलीय व्यवस्था द्वारा ही लोकतांत्रिक राजनीतिक व्यवस्थाओं मे सत्ता का गठन एवं सरकार का संचालन किया जाता है।
आदर्श आचार संहिता राजनैतिक दलो तथा उम्मीदवारों के मार्गदर्शन हेतु उन मानदंडों का एक दस्तावेज है, जो उनके आचरण और व्यवहार को नियंत्रित करता है। यह राजनीतिक दलों की सहमति से विकसित किया जाता है तथा उन पर  बाध्यकारी होता है। आदर्श आचार संहिता निर्वाचन आयोग द्वारा निर्मित किया जाता है। यह निर्वाचन आयोग द्वारा चुनाव की तिथियों की घोषणा संबंधी प्रेस  विज्ञप्ति जारी होने के समय से लागू होती है तथा चुनाव पूरे होने तक प्रभावी रहती है (भारत संघ बनाम हरबंस सिंह जलाल व अन्य SC)।


दल-बदल निरोधक अधिनियम 15 फरवरी, 1985 को पारित किया गया। यह अधिनियम 1 मार्च, 1985 से लागू है। इसके द्वारा संविधान के अनुच्छेद 101, 102, 190 तथा 192 मे संशोधन करके तथा संविधान मे दसवीं अनूसूची को जोडकर दल-बदल को रोकने का प्रावधान किया गया।
भारतीय संविधान में 52वें संविधान संशोधन (1985) द्वारा दसवी अनुसूची के तहत दल-बदल के आधार पर निरर्हता संबंधी उपबंध किए गए हैं। इसमें किसी दल में एक साथ पूर्ण दल-बदल, एक साथ लघु दल-बदल एवं दल के प्राधिकृत व्यक्ति के निर्देश के विरुध्द मतदान करने संबंधी प्रावधान हैं। इसके तहत भारत में प्रथम बार राजनीतिक दलों को संवैधानिक मान्यता प्रदान की गई। इस कानून के तहत किसी दल में विभिन्न चरणों में बड़े पैमाने पर दल-बदल की परिस्थिति का उल्लेख नही है।
वह पध्दति जिसमें सर्वाधिक प्राप्त मतो के आधार पर निर्वाचित माना जाता है अर्थात कुल वैध मतों के प्रतिशत मत का महत्व नही होता उसे फर्स्ट पास्ट-द-पोस्ट सिस्टम कहते हैं। भारत में राज्य विधानमंडलों एवं लोक सभा में ये  पध्दति प्रचलित है।
आंध्र प्रदेश में साम्यवादी दलो ने संयुक्त रुप से भृ-पोर्तम आंदोलन चलाया। साम्यवादी दलें का आरोप था कि कांग्रेस ने सरकार में आने से पहले गरीबों को भूमि तथा घर देने का अपना वादा नही निभाया। साम्यवादी दलों ने भूमि के लिए अपने इस संघर्ष को  भू-पोर्टल का नाम दिया।
1963 में कामराज योजना, कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष के. कामराज द्वारा तैयार की गई थी। यह योजना भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को जीवन्त बनाने एवं राष्ट्रीय विकास के योगदान में वृध्दि हेतु तैयार की गई।
समाजवादी पार्टी को राष्ट्रीय दल के रुप में मान्यता नही प्राप्त है। यह राज्य स्तरीय पार्टी है। इस दल की स्थापना मुलायम सिंह यादव ने की है। वर्तमान में अखिलेश सिह यादव इस दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।
लोकसभा अध्यक्ष द्वारा विपक्ष के नेता की मान्यता हेतु लोकसभा की सदस्य संख्या 545 का न्यूनतम 10% अर्थात 54.5 या 55 सदस्य संबंधित पार्टी या गठबंधन का होना चाहिए।
रजनी कोठारी ने स्वतंत्रता के प्रारंभिक वर्षों की भारत दलीय व्यवस्था को एकदलीय प्रभुत्ववाली व्यवस्था के रुप में वर्ण किया है। रजनी कोठारी प्रसिध्द शिक्षाविद, लेखक और राजनीतिक सिध्दांतकार थे। इन्होंने सी.एस.डी.एस. (विकासशील समाज अध्ययन पीठ) और लोकायन संस्था की स्थापना की थी।


संविधान संशोधन
कोई भी संविधान कितना भी सोच समझकर क्यों न बनाया जाए, उसमें समय, काल एवं परिस्थितियों के अनुसार संशोधन करना ही पड़ता है।
भारतीय संविधान नम्यता एवं अनम्यता का मिश्रण है, इसमें संशोधन का प्रावधान किया गया है।
भारतीय संविधान के भाग 20 के अंतर्गत अनुच्छेद 368 मे संसद को संविधान संशोधन की शक्ति प्रदान की गई है।
भारतीय संविधान में तीन प्रकार से संशोधन किया जा सकता है –
साधारण बहुमत द्वारा
विशेष बहुमत द्वारा
विशेष बहुमत तथा राज्यों के अनुमोदन से
संविधान में संशोधन के लिए विधेयक संसद के किसी भी सदन में प्रस्तुत किया जा सकता है।
संविधान संशोधन विधेयक भारतीय संसद के दोनों सदनों द्वारा अलग-अलग विशेष बहुमत से पारित होना आवश्यक है।
राष्ट्रपति का निर्वाचन, संसद में राज्यों का प्रतिनिधित्व, सर्वोच्च न्यायालय एवं उच्च न्ययालय के अधिकार, संविधान संशोधन की संसद की शक्ति आदि ऐसे विषय हैं, जिन पर संवैधानिक संशोधन के लिए संसद के विशेष बहुमत कम-से-कम आधे राज्यों के विधानमंडल द्वारा संपुष्टि आवश्यक है।
संविधान के अनेक उपबंधों में ससंद, दोनों सदनों के साधारण बहुमत से संशोधन कर सकती है।
इनमें नए राज्यों का प्रवेश या गठन, नए राज्यों का निर्माण और उसके क्षेत्र, सीमाओं या संबंधित राज्यो के नाम से परिवर्तन आदि शामिल हैं।
ये व्यवस्थाएं अनु. 368 की सीमा से बाहर हैं।
भारतीय संविधान के प्रथम संशोधन, 1951 द्वारा संविधान में दो नए अनुच्छेद 31(क) और 31(ख) तथा 9वीं अनुसूची को जोड़ गया। 42वें संविधान संशोधन अधिनियम को लघु संविधान कहा जाता है।
संविधान के 52वें संशोधन अधिनियम द्वारा किसी दल के निर्वाचित सदस्यों के दल-बदल पर रोक लगाई गई।
61वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1988 द्वारा मतदाता की आयु 21 वर्ष से घटाकर 18 वर्ष कर दी गई।
86वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2002 द्वारा अनुच्छेद 21 क में 6 से 14 वर्ष के सभी बच्चो के लिए निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार उपबंधित किया गया है।
91वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा मंत्रिपरिषद के आकार को केन्द्र में प्रधानमंत्री एवं राज्यों मे मुख्यमंत्री सहित मंत्रियों की कुल संख्या लोक सभा अथवा विधानसभा की सदस्य संख्या के अधिकतम 15 प्रतिशत तक निर्धारित किया गया है।
69वें संशोधन अधिनियम, 1991 द्वारा दिल्ली को राष्ट्रीय राजधानी का दर्जा दिया गया।
97वें संशोधन अधिनियम द्वारा सहकारी समितियों को संवैधानिक दर्जा प्रदान किया गया है।
100वां संविधान संशोधन अधिनियम, भारत-बांग्लादेश सीमा,समझौते से संबंधित है।
101वां संविधान संशोधन अधिनियम, जी.एस.टी. से संबंधित है।
आधारभूत संरचना के सिध्दांत का अर्थ है कि संविधान में कुछ लक्षण ऐसे अनिवार्य हैं, जिन्हें संशोधन द्वारा परिवर्तित नही किया जा सकता।


आधारभूत संरचना के सिध्दांत का प्रतिपादन केशवानन्द भारतीय के वाद में किया गया।
42वें संविधान संशोधन अधिनियम (1976) में निदेशक तत्वों की प्राथमिकता एवं सर्वोच्चता को मूल अधिकारों पर प्रभावी बनाया गया। उन अधिकारों पर, जिनका उल्लेख अनु. 14, 19 एव 31 में है। हालांकि इस विस्तार को उच्चतम न्यायालय द्वारा मिनर्वा मिल्स मामले (1980) में असंवैधानिक एवं अवैध घोषित कर दिया गया। लेकिन अनु. 14 एव  19  द्वारा स्थापित मूल अधिकारों को 39(ख) और (ग) में बताए गए निदेशक तत्व के अधीनस्थ माना गया। अनुच्छेद 31 (संपत्ति का अधिकार) को 44वें संशोधन अधिनियम (1978) द्वारा समाप्त कर दिया गया।
44वें संशोधन अधिनियम, 1978 के द्वारा अनुच्छेद 74 में उपबंध किया गया कि राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद से अपनी मंत्रणा पर पुनर्विचार करने के लिए कह सकेगा और ऐसे पुनर्विचार के पश्चात दी गई मंत्रणा पर उसे सहमति देनी होगी।
भारत के संविधान में संशोधन की प्रक्रिया को संसद के किसी भी एक सदन में आरंभ किया जा सकता है। इसका उल्लेख संविधान के अनुच्छेद 368(2) मे किया गया किंतु संशोधन की प्रक्रिया के लिए दोनों सदनों के सदस्यों के  बहुमत की आवश्यकता होती है। मतदान की दशा में प्रत्येक सदन में उपस्थित सदस्यों की संख्या के दो-तिहाई द्वारा संशोधन प्रस्ताव की स्वीकृति अनिवार्य  होती है।भारत के संविधान मे संशोधन की प्रक्रिया को दक्षिण अफ्रीका के संविधान से लिया गया है।
अनु. 368(2) के तहत संविधान के संशोधन हेतु विधेयक संसद के दोनों सदनों में से किसी एक (लोक सभा या राज्य सभा) में प्रस्तुत किया जा सकता है।
भारतीय संविधान में कोई संशोधन लाने का उपक्रमण लोक सभा द्वारा या राज्य सभा द्वारा किया जा सकता है। अर्थात संसद के किसी भी सदन में लाया जा सकता है।
भारतीय संविधान नम्य एवं परिर्वतनशील है। इसमें आवश्यकतानुसार संविधान के अनुच्छेद 368 में दी गई प्रक्रिया के अनुसार संशोधन किया जा सकता है।
भारतीय संविधान में तीन प्रकार से संशोधन किया जा सकता है –
साधारण बहुमत द्वारा – संविधान में कुछ ऐसे अनुच्छेद हैं, जिन्हें संसद साधारण बहुमत से संशोधित कर सकती है। इस प्रकार के संशोधन को संविधान संशोधन नही माना जाता। यथा – राज्यों के नामों तथा सीमाओं में परिवर्तन करने अथवा नए राज्यों का निर्माण करने, राज्यों में विधान परिषदों को गठित करने या समाप्त करने, राष्ट्रपति, राज्यपालों, उच्चतम न्यायालय एवं उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों के वेतनों मे वृध्दि या कमी करने वाले संशोधन साधारण बहुमत से किए जाते हैं।
विशेष बहुमत द्वार – संसद के विशेष बहुमत (सदन की कुल सदस्य, संख्या के 50 प्रतिशत तथा मतदान करने वाले सदस्यों के दो तिहाई से कम न हो) द्वारा किए जाने वाले संवैधानिक परिवर्तन को संविधान संशोधन कहा जाता है।
विशेष बहुमत तथा राज्यों के अनुमोदन से – संविधान मे कुछ अनुच्छेद ऐसे हैं, जिसमें संशोधन करने के लिए संसद के विशेष बहुमत के साथ आधे से अधिक राज्यो की विधानसभाओं का अनुमोदन प्राप्त करना आवश्यक है। यथा – राष्ट्रपति के निर्वाचन के प्रक्रिया, संघ तथा राज्यों की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार, उच्चतम न्यायालय तथा उच्च न्यायालय का गठन तथा क्षेत्राधिकार, संसद में राज्यों का प्रतिनिधित्व, संविधान संशोधन प्रक्रिया, सातवीं सूची में वर्णित सूचियों की प्रविष्टि।
संविधान संशोधन विधेयक संसद के दोनों सदनों द्वारा अलग-अलग विशेष बहुमत से स्वीकृत किया जाना आवश्यक है। दोनो सदनों में असहमति की स्थिति में विधेयक अंतिम रुप से समाप्त हो जाएगा। क्योंकि संविधान संशोधन के प्रस्ताव पर विचार करने के लिए संसद के दोनों सदनों की संयुक्त  बैठक की संविधान में कोई व्यवस्था नही है।
भारतीय संविधान के लिए प्रथम संशोधन विधेयक, 1951 द्वारा अनुच्छेद 15, 19, 85, 87, 174, 176, 341, 342, 372, 376 में संशोधन किया गया तथा दो नए अनुच्छेद 31(क) एवं 31(ख) नवीं अनुसूची को संविधान में जोड़ा गया।
69वां संविधान संशोधन – दिल्ली को राष्ट्रीय राजधानी का दर्जा
75वां संविधान संशोधन – राज्य स्तरीय किराया अधिकरणों की स्थापना
80वां संविधान संशोधन – दसवें वित्त आयोग कि सिफारिशों को स्वीकारना
83वां संविधान संशोधन – अरुणाचल प्रदेश में पंचायतों में अनु. जातियों हेतु कोई आरक्षण नही है, क्योंकि वहां इनकी प्रभावकारी संख्या नही है। यहां का समाज आदिवासी समाज है।
न्यायिक पुनरीक्षण शक्ति का परिसीमन                                               – 38वां संविधान संशोधन (1975)
संपत्ति के अधिकार को मौलिक अधिकारों से हटाया जाना –                                    44वां संविधान संशोधन (1978)
मताधिकार की आयु 21 से 18 वर्ष घटाया जाना      – 61वां संविधान संशोधन (1988)
उद्देशिका में पंथ निरपेक्ष शब्द का जोडा जाना         –                                    42वां संविधान संशोधन (1976)


संवैधानिक संशोधन का प्रावधान
संवैधानिक संशोधन का क्रमांक
अनुच्छेद 19(1) (ग) के अंतर्गत सहकारी समितियां बनाने का अधिकार
97वां संशोधन, 2012 (2011)
रिक्तियों के बैकलॉग को भरने में अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति के आरक्षण का संरक्षण
81वां संशोधन, 2000
राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग का निर्माण
99वां संशोधन, 2015 (2014)
मंत्रिपरिषद के आकार को परिमित करना
91वां संशोधन, 2004 (2003)

संविधान का 98वां संशोधन विधेयक उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति एवं स्थानांतरण के संबंध में प्रक्रिया हेतु प्रस्तुत किया गया था। यह संशोधन राजग सरकार के कार्यकाल में (तत्कालीन विधि एवं कानून मंत्री अरुण जेटली द्वारा) प्रस्तुत हुआ।
संविधान के पैंतीसवें संशोधन, 1975 के द्वारा सिक्किम को भारतीय संघ में सह-राज्य का दर्जा प्रदान किया गया। छत्तीसवें संविधान संशोधन, 1975 द्वारा सिक्किम को भारतीय संघ में 22वें राज्य के रुप में प्रवेश दिया गया।
53वां संविधान संशोधन, 1986 द्वारा अनुच्छेद 371 में खंड जी जोडकर मिजोरम को  भारतीय संघ में राज्य का दर्जा प्रदान किया गया। 20 फरवरी, 1987 को मिजोरम भारतीय संघ का 23वां राज्य बना।
13वां संशोधन – नगालैंड
18वां संशोधन – राज्य को पुनर्परिभाषित किया गया।
39वां संशोधन – राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति स्पीकर और प्रधानमंत्री के चुनाव को चुनौती नही दी जा सकती
52वां संविधान संशोधन – दल-बदल अधिनियम
वर्ष 2003 तक मंत्रिपरिषद में मंत्रियों की संख्या के संबंध में संविधान में कोई उल्लेख नही था। यह प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री के विवेक पर निर्भर था। किंतु वर्ष 2003 में पारित 91वें संविधान संशोधन अधिनियम के द्वारा संविधान के अनुच्छेद 75, अनु. 164 और दसवीं अनुसूची में संशोधन करके केन्द्र में प्रधानमंत्री एवं राज्यों में मुख्यमंत्री सहित मंत्रियों की कुल संख्या लोक सभा अथवा विधानसभा की सदस्य संख्या के अधिकतम 15% तक निर्धारित की गई है।
सर्वप्रथम गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य मामले (1967) मे सर्वोच्च न्यायालय ने संसद की संविधान संशोधन शक्ति पर सीमाएं आरोपित की थी।
भारतीय संविधान की आधारभूत संरचना के सिध्दांत का तात्पर्य है कि संविधान के कुछ लक्षण ऐसे अनिवार्य हैं, जिन्हें समाप्त नही किया जा सकता है। उच्चतम न्यायालय ने सर्वप्रथम केशवानंद भारतीय बनाम केरल राज्य 1973 के अपने फैसले मे यह स्पष्ट कर दिया कि संविधान के कुछ आधारित लक्षण हैं, जिनका किसी भी स्थिति में संशोधन नही किया जा सकता है।
79वें संविधान संशोधन (1999) द्वारा लोक सभा और राज्य विधानसभाओं में अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों तथा एंग्लो इंडियंस के लिए आरक्षण की अवधि को दस वर्षों के लिए बढ़ाया गया था जिसे 87वें संविधान संशोधन (2003) द्वारा पुनः दस वर्षों के लिए बढ़ा दिया गया है।


राजभाषा
भारतीय संविधान के भाग 17 के अंतर्गत अनुच्छेद 343-351 में राजभाषा के बारे में उल्लेख है।
अनुच्छेद 343 के तहत संघ की राजभाषा हिंदी और लिपि देवनागरी होगी तथा संघ के शासकीय प्रयोजनों के लिए प्रयोग होने वाले अंकों का रुप भारतीय अंकों का अंतरराष्ट्रीय रुप होगा।
अनुच्छेद 344 के तहत राष्ट्रपति को यह अधिकार है कि वह राजभाषा के संबंध में आयोग गठित कर सकता है।
प्रथम राजकीय भाषा आयोग का गठन 1955 में, बी.जी. खेर की अध्यक्षता में हुआ था। अनु. 344(4) के तहत राजभाषा पर 30 सदस्यीय संयुक्त संसदीय समिति के गठन का प्रावधान है। इस समिति में लोक सभा से 20 सदस्य तथा राज्य सभा से 10 सदस्य शामिल होंगे।
भारतीय संविधान में किसी भी भाषा को आठवीं अनूसूची के अंतर्गत शामलि किया जाता है।
संविधान के प्रारंभ में 14 भाषाओं को आठवीं अनुसूची में शामिल किया गया था।
21वें संविधान संशोधन अधिनियम 1967 द्वारा सिंधी भाषा को तथा 71वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 द्वारा कोंकणी, मणिपुरी और नेपाली को आठवीं अनुसूची में जोड़ा गया।
92वें संविधान संशोधन द्वारा वर्ष 2003 में बोडो, डोगरी, मैथिली और संथाली को भी इसमें जोड़ा गया।
इस प्रकार वर्तमान में आठवीं अनुसूची में कुल 22 भाषाएं शामिल हैं। इसमें राज्य विधानमंडल, उस राज्य में प्रयोग होने वाली भाषाओं में से किसी एक का राजभाषा के रुप में प्रयोग कर सकेगा।
अनुच्छेद 346 के तहत एक राज्य दूसरे राज्य के बीच या किसी राज्य और संघ के बीच पत्रादि की राजभाषा का उल्लेख है।
अनुच्छेद 347 के अनुसार, किसी राज्य की जनसंख्या के किसी भाग द्वारा बोली  जाने वाली भाषा के संबंध में विशेष उपबंध का प्रावधान है।
14 सितंबर, 1949 को हिंदी संवैधानिक रुप से राजभाषा घोषित की गई।
14 सितंबर, को हिंदी दिवस के रुप में मनाया जाता है।
अनुच्छेद 348(1)(क) के तहत प्रावधान किया गया है कि, उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों की सभी कार्यवाहियां अंग्रेजी भाषा में होंगी।


अनु. 350(क) के तहत प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा मे शिक्षा की सुविधा का प्रावधान उल्लिखित है।
भाषा शास्त्रीय दृष्टि से द्रविड़ परिवार की भाषा ब्राहुई है, जो बलूचिस्तान की भाषा है।
संविधान के अनुच्छेद 350 (क) में यह प्रावधान है कि प्रत्येक राज्य और राज्य के भीतर प्रत्येक स्थानीय प्राधिकारी भाषायी अल्पसंख्यक वर्गों के बालकों को शिक्षा के प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा में शिक्षा की पर्याप्त सुविधाओं की व्यवस्था करने का प्रयास करेगा और राष्ट्रपति किसी राज्य को ऐसे निर्देश दे सकेगा, जो वह ऐसी सुविधाओं का उपबंध सुनिश्चित कराने के लिए आवश्यक या उचित समझता है।
7 जून, 1955 को तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने बी.जी.खेर की अध्यक्षता में प्रथम राजकीय भाषा आयोग का गठन किया, जिसने 1956 में अपना प्रतिवेदन राष्ट्रपति को सौंप दिया। 1957 में एक संसदीय समिति द्वारा इस रिपोर्ट का परीक्षण किया गया,  जिसके अध्यक्ष पं. गोविन्द  बल्लभ पंत ते।
अभी तक 22 भाषाओं को संविधान में अनुच्छेद 344 के तहत मान्यता प्राप्त है, यथा –
असमिया
बंगला
गुजराती
हिंदी
कन्नड़
कश्मीरी
कोंकणी
मणिपुरी
मलयालम
मराठी
नेपाली
ओड़िया
पंजाबी
संस्कृत
सिंधी
तमिल
तेलुगू
उर्दू
बोडो
डोगरी
संथाली
मैथिली
उत्तराखंड राज्य ने जनवरी, 2010 में संस्कृत भाषा को राज्य की द्वितीय राजभाषा का दर्जा प्रदान किया था। इसके कुछ दिनों बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक ने उत्तराखंड के ऋषिकेश को संस्कृत नगरी भी घोषित किया था।
वर्ष 2001 के आंकड़ों के अनुसार, सर्वाधिक लोगो द्वारा (भारत) में बंगाली बोली जाती है। वर्तमान में वर्ष 2011 की जनगणना के आंकड़ों के अनुसार 22 अनुसूचित भाषाओं में सर्वाधिक लोगों द्वारा हिंदी, दूसरे क्रम पर बंगाली तथा तीसरे क्रम पर मराठी भाषा बोली  जाती है।


स्थानीय स्वशासन
पंचायती राज लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण की व्यवस्था है। इसका उद्देश्य जनभागीदारी को बढ़ाकर विकास को निचले स्तर तक ले जाना है।
संविधान के भाग 9 के अंतर्गत अनु. 243 से 243 ण के तहत पंचायत से संबंधित प्रावधान उल्लिखित हैं।
73वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 द्वारा संविधान के भाग 9 में 16 नए अनुच्छेद तथा ग्यारहवीं अनुसूची में जोड़ी गई।
ग्यारहवीं अनुसूची में कुल 29 विषयें का उल्लेख किया गया है, जिन पर पंचायतों को विधि बनाने की शक्ति प्रदान की गई है।
पंचायती राज राज्य सूची का विषय है।
पंचायतों की संरचना से संबंधित प्रावधान राज्य का विधानमंडल तैयार करता है। पंचायत का चुनाव कराने के लिए निर्णय राज्य सरकार द्वारा लिया जाता है।
प्रत्येक पांच वर्ष पर पंचायत चुनाव होता है।
पंचायतों की वित्तीय स्थिति का पुनर्विलोकन करने के लिए वित्त आयोग के गठन का प्रावधान किया गया है।
ग्राम स्तर के पंचायत क्षेत्र के निर्वाचक नामावली में पंजीकृत लोगो से  मिलकर ग्राम सभा का गठन  होता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 40 राज्य को ग्राम पंचायतों के गठन का निर्देश देता है।
बलवंत राय मेहता समिति ने ग्रामीण क्षेत्रों में त्रि-स्तरीय पंचायत प्रणाली का सुझाव दिया था – ग्राम स्तर, ब्लॉक स्तर तथा जिला स्तर।
पंचायती राज व्यवस्था का शिल्पी (वास्तुकार) बलवंत राय मेहता को कहा जाता है।
पंचायती राज व्यवस्था का उद्घाटन पं. जवाहरलाल नेहरु ने 2 अक्टूबर, 1959 को नागौर (राजस्थान) में किया था।
73वें संविधान संशोधन द्वारा पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा प्राप्त हुआ था।
पंचायती राज को संवैधानिक स्थिति प्रदान करने की प्रथम स्पष्ट संस्तुति 1986 में लक्ष्मी मल सिंघवी समिति ने दी थी।
1988 में पी.के. थुंगन समिति ने भी पंचायती राज संस्थाओं को संविधान में सम्मिलित करने की संस्तुति प्रदान की थी।  पूर्व में 1977 में गठित अशोक मेहता समिति ने यह सहमति व्यक्ति की थी कि पंचायती राज के कुछ  प्रावधान भारतीय संविधान मे शामिल किए जाने की योग्यता रखते हैं अतः भारत सरकार को इस पर विचार करना चाहिए। इस सहमति को स्पष्ट अनुशंसा नही माना गया  है। अतः लक्ष्मीमल सिंघवी एवं पी.के. थुंगन की अनुशंसाओं को ही स्पष्ट संस्तुति माना जाता है।
73वें संविधान संशोधन का अभिपालन करने वाला प्रथम राज्य मध्य प्रदेश है।
अनुच्छेद 243घ (3) के अनुसार, पंचायतों में सभी स्तरों पर महिलाओं को एक-तिहाई आरक्षण प्रदान किया गया है।
तृण मूल लोकतंत्र (Grass Root Democracy) अर्थात जमीनी स्तर पर लोकतंत्र का संबंध लोकतंत्र के विकेन्द्रीकरण से है।
किसी व्यक्ति के लिए पंचायत सदस्य बनने की न्यूनतम आयु 21 वर्ष है।
शहरी स्थानीय स्वशासन प्रणाली को 74वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 द्वारा संवैधानिक दर्जा प्रदान किया गया।
इस अधिनियम द्वारा संविधान में एक नया भाग, 9(क), 18 नए अनुच्छेद तथा 12वीं अनुसूची को शामिल किया गया।


शहरी स्थानीय शासन 8 प्रकार के हैं, जिनमें –
नगरपालिका परिषद
नगरपालिका
अधिसूचित क्षेत्र समिति
शहरी क्षेत्र समिति
छावनी बोर्ड
शहरी क्षेत्र समिति
पत्तन न्यास
विशेष उद्देश्य के लिए गठित एजेंसी शामिल हैं।
74वें संशोधन अधिनियम के द्वारा तीन प्रकार की नगरपालिकाओं का प्रावधान है, जिनमें –
नगर निगम
नगरपालिका परिषद
नगर पंचायतें शामिल हैं।
नगरपालिका के सभी सदस्य प्रत्यक्ष रुप से उस क्षेत्र के मतदाताओं द्वारा चुने जाते हैं।
नगरपालिकाओं की कार्यकाल अवधि 5 वर्ष निर्धारित है।
हालांकि इसे समय से पूर्व भी समाप्त किया जा सकता है।
नगरपालिकाओं के चुनाव का निर्देशन, नियंत्रण और प्रबंधन राज्य निर्वाचन आयोग के अधिकार मे होता है।
राज्य विधानमंडल नगरपालिकाओं से संबंधित मामलों पर उपबंध बना सकता है।
अनु. 243(झ) के अधीन गठित वित्त आयोग नगरपालिकाओं की वित्तीय स्थिति का भी पुनर्विलोकन करेगा।
अनु. 243 य घ (1) के अनुसार, प्रत्येक राज्य में जिला स्तर पर, जिले में पंचायतों और नगरपालिकाओं द्वारा तैयार की गई योजनाओं का समेकन करने और संपूर्ण जिले के  लिए एक विकास योजना प्रारुप तैयार करने के लिए, एक जिला योजना समिति का गठन किया जाएगा।
अनु. 243 य ङ के अनुसार, प्रत्येक महानगर क्षेत्र में, संपूर्ण महानगर क्षेत्र के लिए विकास योजना प्रारुप तैयार करने के लिए, एक महानगर योजना समिति का गठन किया जाएगा।
भारत में सर्वप्रथम नगर निगम वर्ष 1687-88 में मद्रास में स्थापित हुआ था।
लॉर्ड रिपन को भारत में स्थानीय स्वशासन का पिता कहा जाता है।
संविधान के अनुच्छेद 243 ग (1) के अनुसार, राज्य का विधानमंडल पंचायतों की संरचना के बाबत उपबंध करने को अधिकृत है।
ग्राम पंचायत ग्रामीण स्तर पर स्थानीय स्वशासन की सबसे छोटी इकाई होती है। प्रत्येक ग्राम पंचायत क्षेत्र को कम-से-कम 10 और अधिक से अधिक 20 वार्डों में बांटा जाता है और प्रत्येक वार्ड से एक पंच चुना जाता है। प्रत्येक ग्राम पंचायत में निर्वाचित पंच और एक सरपंच होता है, जो कि ग्राम का मुखिया होता है।
पंचायतों की 7वीं अनुसूची में राज्य सूची की प्रविष्टि 5 का विषय माना गया है। इस प्रकार पंचायत राज्य सरकार का विषय है। इसके गठन तथा चुनाव कराने का अधिकार राज्यों को ही है।
73वें संविधान संशोधन, 1992 के द्वारा पंचायतों को संवैधानिक दर्जा प्रदान किया गया है। इसमें अनुच्छेद 243-घ के तहत अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति की  महिलाओं के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई है। साथ ही प्रत्येक पंचायत में प्रत्यक्ष निर्वाचन से  भरे जाने वाले कुल स्थानों मे से 1/3 स्थान महिलाओं के लिए आरक्षित किए गए हैं। इस आरक्षण से स्थानीय स्वशासन के स्तर पर महिलाओ में काफी जागरुकता आई है। भारत में ग्रामीण स्वशासन संस्थाओं में महिला आरक्षण की मांग, महिलाओं  द्वारा किसी आंदोलन से नही हुई।
पंचायती राज स्थानीय स्तर पर स्वशासन की एक व्यवस्था है। बलवंत राय मेहता ने इसे लोकतांत्रिक विकेन्द्रीकरण की व्यवस्था कहा है। यह एक प्रकार से त्रि-स्तरीय जैविकीय संबंधों की अभिशासन संरचना है।
पंचायत ( अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तार) अधिनियम, 1996 के अंतर्गत समाविष्ट क्षेत्रों में ग्राम सभा को लघु वन उपजों पर स्वामित्व प्रदान करने के साथ-साथ अनुसूचित क्षेत्रों में भूमि के हस्तांतरण पर प्रतिबंध लगाने की शक्ति होती है। अनुसूचित क्षेत्रों में लघु खनिजों के लिए खनन का पट्टा अथवा लाइसेंस प्रदान करने के लिए ग्राम सभा की अनुमति आवश्यक होती है, परन्तु अन्य खनिजों के खनन के संदर्भ में ग्राम सभा की अनुशंसा आवश्यक नही है।


छत्तीसगढ़ पंचायत अधिनियम के अंतर्गत अनुसूचित क्षेत्रों में जिला पंचायत की निम्न शक्तियां दी गई हैं –
लघु जलाशयों की योजना बनाना
समस्त सामाजिक सेक्टरों पर नियंत्रण रखना
जनजातीय उपयोजनाओं पर नियंत्रण रखना
राज्य सरकार द्वारा प्रदत्त कार्य करना।
छत्तीसगढ़ पंचायती राज अधिनियम, 1993 में वर्ष 2004 मे किए गए संशोधन के अनुसार, ग्राम सभा की बैठक में 1/10 गणपूर्ति तथा 1/3 महिलाओं की उपस्थिति आवश्यक है। छत्तीसगढ़ पंचायती राज अधिनियम, 1993 में वर्ष 1994 में किए गए संशोधन के अनुसार, गणपूर्ति के लिए पंच एवं सरपंच उत्तरदायी हैं और यदि ग्राम सभा की लगातार पांच बैठकों में गणपुर्ति न हो, तो सरपंच को पदच्युत किया जा सकता है।
अनुसूचित क्षेत्रों में ग्राम के सम्मिलन की अध्यक्षता उपस्थित अनुसूचित जनजाति सदस्य, जो कि ग्राम सभा द्वारा चुना जाए, द्वारा किया जाता है। पेसा (PESA) नियमो के अनुसार, यह सदस्य एक वर्ष के लिए आम सहमति से अध्यक्ष चुना जाता है। उपस्थित सदस्यों मे यदि आम सहमति नही बन पाती है, तो अनुसूचित की सबसे उम्र दराज महिला सदस्य को अध्यक्ष बनाया  जाता  है।
पंचायती राज का प्रधान लक्ष्य ग्रामवासियों मे शक्ति का विकेन्द्रीकरण है, जिससे वे अपनी आवश्यकताओं के अनुरुप नीतियां बना सकें एवं लागू कर सकें।
पंचायती राज को सफलतापूर्वक कार्य करने के लिए स्थानीय जनता के पूर्ण सहयोग की आवश्यकता होती है। बिना जन भागीदारी के पंचायती राज का स्वप्न साकार नही हो सकता है।
भारत में पंचायती राज की स्थापना ग्रामीण जनता के सर्वांगीण विकास के लिए की गई है। यह शक्तियों के विकेन्द्रीकरण, लोगो की भागीदारी एवं सामुदायिक विकास इन तीनों का प्रतिनिधित्व करता  है।
1952 मे प्रारंभ सामुदायिक विकास कार्यक्रम (CDP) और 1953 में प्रारंभ राष्ट्रीय विस्तार योजना (NES) के पुनर्गठन के लिए राष्ठ्रीय विकास परिषद द्वारा बलवंत राय मेहता समिति का गठन 1957 मे किया गया था। इस समिति ने ग्रामीण क्षेत्रों में त्रि-स्तरीय पंचायत प्रणाली की अनुशंसा की थी।
अशोक मेहता समिति ने न्याय पंचायतों के गठन की सिफारिश की थी। वर्ष 1977 मे पंचायती राज व्यवस्था पर सुझाव देने के लिए गठित अशोक मेहता समिति ने वर्ष 1978 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की जिसमें पंचायती राज के लिए त्रि-स्तरीय प्रणाली के स्थान पर द्वि-स्तरीय प्रणाली को संस्तुत किया।
समितियां सुझाव
बलवंत राय मेहता                    त्रि-स्तरीय पध्दति
अशोक मेहता                           द्वि-स्तरीय पध्दति
एल.एम. सिंघवी                        स्थानीय स्वशासन पध्दति
जी.वी.आर. राव                         प्रतिनिधित्व के तरीकें में सुधार
दिनेश गोस्वामी                       चुनाव सुधारों
सादिक अली समिति                 पंचायती राज व्यवस्था


1977 में गठित अशोक मेहता समिति ने अगस्त, 1978 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की थी, जिसमें पंचायती राज के लिए त्रि-स्तरीय प्रतिमान के स्थान पर द्वि-स्तरीय प्रतिमान की संस्तुति की  गई थी। इसमें जनपद स्तर पर जिला परिषद तथा 15000 से 20000 जनसंख्या (गांवो के समुह) पर मंडल पंचायत के गठन का सुझाव था।
73वें संवैधानिक संशोधन, 1992 (24 अप्रैल, 1993 से प्रभावी) द्वारा संविधान में  भाग  IX एवं 11वीं अनुसूची जोड़कर पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक स्तर प्रदान किया गया। 73वें संविधान संशोधन 1992 के समय प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हाराव थे।
पंचायती राज को संवैधानिक स्थिति प्रदान करने की संस्तुति एल.एम. सिंघवी समिति (1986) द्वारा की गई थी। साथ ही सिंघवी समिति ने पंचायत चुनावों को गैर-दलीय आधार पर कराने की भी अनुशंसा की थी।
पंचायतों के लिए संविधान के अनु. 73वें संशोधन अधिनियम, 1992 द्वारा निम्न के प्रावधान हैं –
राज्य निर्वाचन आयोग अनु. 243 (K)
राज्य वित्त आयोग अनु. 243 (I)
जबकि नगरपालिकाओं के लिए 74वें संशोधन अधिनियम 1992 द्वारा निम्न प्रावधान किए गए हैं –
राज्य निर्वाचन आयोग अनु. 243 (ZA)
राज्य वित्त आयोग अनु. 243 (Y)
जिला नियोजन समिति अनु. 243 (ZD)
उत्तर प्रदेश जिला योजना समिति अधिनियम, 1999 के अनुसार, जिला योजना के अंतर्गत ऐसे विषय समाविष्ट होंगे जो यथास्थिति, ग्रामीण क्षेत्रों के लिए संयुक्त प्रांत पंचायती राज अधिनियम, 1947 और उत्तर प्रदेश क्षेत्र पंचायत तथ  जिला पंचायत अधिनियम, 1961 और नगरीय क्षेत्र के लिए  उत्तर प्रदेश नगरपालिका अधिनियम, 1916  या उत्तर प्रदेश नगर निगम अधिनियम, 1959 मे प्रमाणित किए गए हों।
73वां संविधान संशोधन अधिनियम, 1992, 24 अप्रैल, 1993 को लागू हुआ। इसका अभिपालन करने वाला पहला राज्य मध्य प्रदेश है। इस संशोधन अधिनियम के लागू होने के  बाद वर्ष 1994 में मध्य प्रदेश में चुनाव आयोजित किया गया।
73वां संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 देश में मजबूत एवं जीवंत पंचायती राज संस्थाओं की बुनियाद रखता है। संविधान के भाग 9 के अनु. 243 से 243 (ण) तक में इसका उल्लेख किया गया है।
महिलाओं को पंचायतों में आरक्षण संविधिन का 73वां संशोधन करके दिया गया है। अनु. 243 घ (3) के अनुसार पंचायतों में सभी स्तरों पर महिलाओं को एक तिहाई आरक्षण प्रदान किया गया है।
अनुच्छेद 243D(1) के अंतर्गत प्रत्येक पंचायत में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए स्थान उस-पंचायत क्षेत्र में उनकी जनसंख्या के अनुपात मे आरक्षित रहेंगे।
संविधान के अनुच्छेद 243 (ख) के अनुसार पंचायती राजव्यवस्था में स्थानीय स्वशासन त्रि-स्तरीय है – ग्राम स्तर, मध्यवर्ती (खंड) स्तर एवं जिला स्तर पर, किंतु मध्यवर्ती स्तर पर पंचायत का उस राज्य में गठन नही किया जा सकेगा, जिसकी जनसंख्या 20 लाख से कम है।
छत्तीसगढ़ पंचायत राज अधिनियम, 1993 के अंतर्गत धारा-127 में खंड एवं जिला पंचायतों की सीमा में परिवर्तन के विषय में वर्णन किया गया है। जिसके अनुसार, राज्यपाल खंड एवं जिला पंचायतों की सीमा मे परिवर्तन की अधिसूचना जारी करता है।


संविधान के प्रावधानों के तहत पंचायत चुनाव कराने का निर्णय राज्य सरकार द्वारा किया जाता है। अनु. 243-K के तहत किसी राज्य का विधानमंडल, विधि द्वारा, पंचायतों के निर्वाचनों से संबंधित या संसक्त सभी विषयों के संबंध में उपबंध कर सकता है।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 243 च (1) के अनुसार, कोई व्यक्ति पंचायत चुनाव लड़ सकता है यदि उसने 21 वर्ष का आयु पूर्ण कर ली है।
बिहार पंचायती राज अधिनियम के तहत ग्राम न्यायलयों की व्यवस्था है जिन्हें 3 माह तक की जेल एवं 1000 रु. तक जुर्माने की सजा सुनाने की शक्ति प्राप्त है।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 243 च के अनुसार, किसी व्यक्ति के लिए पंचायत सदस्य बनने की न्यूनतम आयु 21 वर्ष है। वहीं अनुच्छेद 243 ङ के खंड (4) के अनुसार, किसी पंचायत की अवधि की समाप्ति के पूर्व उस पंचायत के विघटन पर गठित की गई कोई  पंचायत उस अवधि के केवल शेष भाग के लिए बनी रहेगी, जिसके लिए विघटित पंचायत बनी रहती  यदि वह विघटित नही की जाती ।
नगर परिषद में चुने जाने के लिए वह तभी योग्य होगा जब वह उस नगर की मतदाता सूची में सम्मिलित हो।
संविधान के अनुच्छेद 243(झ)(I) के तहत राज्यपाल द्वारा गठित राज्य वित्त आयोग सरकार तथा स्थानीय शासन के बीच राजस्व बंटवारें के लिए मार्गदर्शक सिध्दांत सुझाने हेतु उत्तरदायी  है।
संविधान के अनुच्छेद 243-I के अनुसार, राज्य की पंचायतों द्वारा निवियोजित हो सकने वाले करों और शुल्कों आदि के निर्धारण हेतु संस्तुति के लिए एक वित्त आयोग होगा जिसका गठन राज्यपाल द्वारा प्रत्येक 5 वर्ष पर किया जाता है।
स्थानीय इकाइयों पर नागरिकों की शिकायतों के मामलों मे राज्य सरकार का नियंत्रण नही होता है।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 243(ZJ) के अनुसार, सहकारी समिति के बोर्ड में उतनी संख्या में निदेशक होंगे, जितने राज्य विधानमंडल द्वारा विधि बनाकर उपबंधित किया जाए। परंतु सहकारी सोसाइटी के निदेशकों की अधिकतम संख्या 21 से अधिक नही होगी।
भारतीय संविधान के अनुसार, स्थानीय शासन के लिए उपबंध अनुच्छेद 40 एवं भाग 9 तथा भाग 9-क में किए गए हैं। अतः स्वतंत्र स्थानीय शासन का वर्णन किया गया है।
74वें सविधान संशोधन, 1992 के अनुसार, अनुच्छेद 243(प) में नगर पालिकाओं की अवधि 5 वर्ष नियत की गई है। अतः मेयर का कार्यकाल 5 वर्ष होता है।
उप-प्रभाग स्तर पर जिला परिषद –    असम
मंडल प्रजा परिषद                     –      आंध्र प्रदेश
जनजातीय परिषद                     –      मेघालय
ग्राम पंचायतों का अभाव             –      मिजोरम
ऐसे सभी स्थान जहां नगर पालिका, नगर निगम, छावनी बोर्ड या अधिसूचित नगर क्षेत्र समिति आदि शामिल हो, नगरीय क्षेत्र के अंतर्गत आते हैं, जो निम्नलिखित सभी तीन शर्तें एक साथ पूरी करते हों –
न्यूनतम जनसंख्या 5000 हो।


कार्यशील पुरुषों का न्यूनतम 75% गैर कृषि कार्यो में संलग्न हो।
जनसंख्या घनत्व कम से कम 400 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी. हो।
जिला फोरम उन्हीं शिकायतों की सुनवाई करता है, जिनमें माल या सेवाओं का कुल मूल्य 20 लाख रुपये से  अधिक न हो। बीस लाख  से एक करोड़ तक के माल या सेवाओं के कुल मूल्य की सुनवाई स्टेट कमीशन, जबकि एक करोड़ से ऊपर तक के माल या सेवाओं के कुल मूल्य की सुनवाई नेशनल कमीशन करता है।
भारत में वर्तमान मे मिजोरम, दिल्ली एवं नगलैंड  राज्यों में पंचायती राज संस्था नही है।
छत्तीसगढ़ नगरपालिका परिषद अधिनियम, 1961 की धारा 79 (2) के अंतर्गत पंचायत और छावनी बोर्ड के मध्य विवाद की स्थिति में अंतिम निर्णय के संबंध में वर्णन किया किया गया है। जिसके अनुसार, यदि पंचायत और छावनी बोर्ड के मध्य विवाद हो, तो अंतिम निर्णय राज्य सरकार, केन्द्र सरकार के अनुमोदन के अधीन करेगा।
छत्तीसगढ़ नगरपालिका अधिनियम, 1961 की धारा-47 के अंतर्गत नगरपालिका परिषद के अध्यक्ष के प्रत्यावर्तन के विषय में वर्णन किया गया है। इसके अनुसार –
सामान्य मतदाताओं द्वारा जिन्होंने प्रत्यावर्तन मे भाग लिया है, उनकी आधी से अधिक की संख्या ने प्रत्यावर्तन के पक्ष में मत दिया है तो अध्यक्ष को प्रत्यावर्तित किया जा सकता है। (47(1))
इसके (47(1) अंतर्गत ही परिषद के ¾ निर्वाचित सदस्यों के हस्ताक्षरित प्रस्ताव के द्वारा प्रत्यावर्तन की कार्यवाही प्रारंभ की जा सकेगी।
अध्यक्ष के निर्वाचित होने (अध्यक्ष के रुप में) के 2 वर्षों के पश्चात ही प्रत्यावर्तन की कार्यवाही प्रारंभ की जा सकती है। (47(1)(i))
यदि टाई निर्वाचन में आधे से अधिक समय शेष है, तो अध्यक्ष के कार्यकाल में एक बार ही प्रत्यावर्तन की कार्यवाही की जा सकती है। 47(1) (ii)
छत्तीसगढ़ नगरपालिका परिषद अधिनियम, 1961 की धारा-34 के अंतर्गत नगरपालिका परिषद के चुनाव के लिए अर्हता दी गई हैं, जिसके अनुसार –
जिस व्यक्ति का नाम नगरपालिका मतदाता सूची में है, वह चुनाव लड़ने की अर्हता रखता है। (34(1))
अध्यक्ष पद हेतु उसकी आयु 25 वर्ष से कम नही होनी चाहिए। (34(1)(a))
पार्षद हेतु आयु 21 वर्ष से कम नही होनी चाहिए (34(1)(b))
कोई व्यक्ति दो वार्ड से पार्षद का चुनाव एक साथ नही लड़ सकता है (34(2)।
कोई भी व्यक्ति यदि अध्यक्ष और पार्षद चुना जाता है, तो ऐसी स्थिति में 7 दिनों के अंदर एक पद से इस्तीफा  देना होगा (34(4))


भारतीय संविधान के अनु. 243-ZE (74वें संविधान संशोधन से) के तहत देश के प्रत्येक महानगर क्षेत्र के लिए विकास योजना प्रारुप तैयार करने के लिए, महानगर योजना समिति के गठन का  प्रावधान किया गया है। तथापि इसका कार्य विकास योजना का प्रारुप तैयार कर संबंधित सरकार को भेजने तक सीमित  है।
झारखंड में पंचायत समिति का गठन झारखंड पंचायत राज अधिनियम, 2001 (2010 में यथा संशोधित) के अनु. 32 के तहत किया गया है। इसके सदस्य जनता द्वारा प्रत्यक्ष रुप से चुने जाते हैं।
उत्तर प्रदेश क्षेत्र पंचायत तथा जिला पंचायत अधिनियम, 1961 की धारा 19 के अंतर्गत प्रत्येक  जिला पंचायतों के निर्वाचित सदस्यों द्वारा अपने में से ही एक अध्यक्ष और उपाध्यक्ष चुने जाएंगे। हालांकि धारा 19(क) के अनुसार, राज्य में जिला पंचायतों के अध्यक्षों के पद अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजाति और पिछड़े वर्गो के लिए चक्रानुक्रम मे आरक्षित रहेंगे, परंतु इनके चयन में सभी सदस्य भाग लेते हैं।
वर्तमान में उत्तर प्रदेश में किसी नगरपालिका के अध्यक्ष का निर्वाचन अपने नगर क्षेत्र की निर्वाचन सूची में सम्मिलित सभी निर्वाचकों द्वारा (जो कि प्रायः उस नगर क्षेत्र के वार्डों के निर्वाचक भी होते हैं) किया जाता है।
ब्लॉक स्तर पर पंचायत समिति एक प्रशासनिक प्राधिकरण के रुप में कार्य करती है। यह ग्राम पंचायत और जिला प्रशासन के मध्य संपर्क स्थापित करती है। क्षेत्र पंचायत में निर्वाचित सदस्यों द्वारा अपने में से एक प्रमुख, एक ज्येष्ठ उपप्रमुख तथा एक कनिष्ठ उप्रमुख चुने जाएंगे। क्षेत्र पंचायतों को सौंपे गए कार्य समितियों के माध्यम से संचालित किए जाएंगे तथा इसके लिए निम्न समितियां गठित की जाएंगी –
शिक्षा समिति
निर्माण कार्य समिति
नियोजन एवं विकास समिति
स्वास्थ्य एवं कल्याण समिति
प्रशासनिक समिति
महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना में प्रत्येक ग्राम पंचायत, ग्राम सभा की सिफारिशों पर विचार करने के पश्चात एक विकास योजना तैयार करेगी तथा मांग के अनुसार, कार्यों के क्रियान्वयन एवं निष्पादन के लिए स्वयं उत्तरदायी होगी।
सामुदायिक विकास कार्यक्रम देश मे पर्याप्त वृध्दि प्रदान करने के लिए वर्ष 1952 में पायलट आधार पर शुरु किया गया था। सामुदायिक विकास का पहला स्थापित कार्यक्रम राष्ट्रीय प्रसार सेवा था जो वर्ष 1953 मे शुरु किया गया था। भारत सरकार ने सामुदायिक विकास कार्यक्रम (1952) और राष्ट्रीय प्रसार सेवा (1953) के कामकाज की जांच के लिए बलवंत राय मेहता समिति का गठन 1957 में किया था।